Saturday, March 10, 2018

तुम गाना गीत


जब गुजरना सहराओं से
गुनगुनाना नदियों और झरनों के गीत
जब गुजरना पथरीले ऊबड़ खाबड़ रास्तों से
गुनगुनाना हरियाली के, पगडंडियों के खेतों के गीत
जब अँधेरा बिगुल बजाये कान पर
तुम गुनगुनान रौशनी के गीत

जब जिन्दगी उदासियों की बाड़ लगाये
तुम गाना खिलखिलाहटों के गीत

जब मृत्यु हाथ थामे
तुम मुस्कुराना और गाना जिन्दगी के गीत.

------

कभी-कभी कोई सवाल न पूछकर भी
दी जा सकती है राहत
कभी कुछ न पूछकर भी और कभी
मौन रहकर भी

हमेशा साथ होने के लिए नहीं जरूरी होता
साथ में होना
कभी दूर रहकर भी दिया जा सकता है साथ

प्यार के लिए गले से लगाना ही काफी नहीं होता
कई बार लगाने पड़ते हैं थप्पड़
बकनी पड़ती हैं गलियां
और बनानी पड़ती है बेस्वाद चाय

दोस्त, सांत्वना से बचो
जब जरूरी लग रहा हो सांत्वना देना
कि सांत्वना से बड़ा दंश कोई नहीं.

7 comments:

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अनजाने कर्म का फल “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

RADHA TIWARI said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (12-03-2018) को ) "नव वर्ष चलकर आ रहा" (चर्चा अंक-2907) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी

Onkar said...

सुन्दर रचना

Dhruv Singh said...

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १२ मार्च २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

निमंत्रण

विशेष : 'सोमवार' १२ मार्च २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने सोमवारीय साप्ताहिक अंक में आदरणीया साधना वैद और आदरणीया डा. शुभा आर. फड़के जी से आपका परिचय करवाने जा रहा है।

अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

Digamber Naswa said...

सांत्वना कई बार और द्रवित कर जाती है मन ...
सच कहा है इस रचना में ... लाजवाब ...

Abhi said...

बेहतरीन प्रस्तुति।
आप जागरण लखनऊ से जुड़ी रहीं हैं?

Abhi said...

सुंदर रचना।