Monday, February 26, 2018

फेनिल लहरों का दुलार...


छोड़ जाऊंगी तुम्हारे लिए
बसंत का सारा उजास
रक्तिम आभा उगते सूर्य की

छोड़ जाउंगी फसलों से भरे खेत
वक़्त पे आने वाला मानसून
बर्फ से ढंकी वादियाँ
जंगल की खुशबू और
पत्तियों की सरसराहट का संगीत

शरारतें छोड़ जाऊंगी उस नन्हे मेमने की
जिसे तुमने एक बार उठाया था गोद में
वो बारिश की पहली बूँद जिसके नाक पर गिरने के इंतजार में
तुम घूमती थीं नाक उठाये पूरे आंगन में

तुम्हारी हथेलियों में रख जाऊंगी
जिन्दगी जीने की ख्वाहिश वाले सोने से चमकते सिक्के
छोड़ जाऊंगी तुम्हारे लिए
फेनिल लहरों का दुलार...

(5 फरवरी 2018 के सुबह सवेरे में प्रकाशित)

Tuesday, February 20, 2018

वो दिन मुझसे खेल रहा है...



सीढियां उतरती हूँ तो जी चाहता है सीढियां ख़त्म ही न हों कभी. रास्तों पर निकलती हूँ तो चलती ही जाती हूँ लगातार, बिना थके, बिना रुके. खूब बात करती हूँ लोगों से लेकिन जीती हूँ ख़ामोशी ही. 'हाँ, सब ठीक है' दूसरों को बताते हुए किसी मन्त्र की तरह दोहराती हूँ. चाहती हूँ कोई आसपास न हो, कोई भी नहीं. हालाँकि जानती हूँ कोई है भी नहीं. कभी होगा भी नहीं. जो साथ थे  वो भी भरम ही थे होने का कि असल में वो तब भी कभी नहीं थे जब वो थे...इसलिए अब जो साथ है वो इस बात को समझ पाना भर है.

एक लम्बे समय से खुद को किसी कारागार में पा रही हूँ. हर उदास करने वाली चीज़ अच्छी लग रही है. ये उदासी का मौसम है. भीतर भी, बाहर भी. जिन पंक्षियों को उड़ते देख खुश होती थी अब खुश नहीं होती. अपनी उदासी को पहचानती हूँ. उसे हाथ में लेकर गोल-गोल घुमाती हूँ, उसे मेज पर अख़बार के ठीक बगल में. रख देती हूँ, उदासी उसके प्रति मेरी इस बेजारी से परिचित नहीं है इसलिए चौंक रही है.

यह अलग सा अनुभव है कि उदासी है लेकिन उदास नहीं हूँ, ठीक वैसे ही जैसे जीवन है लेकिन जीवन में नहीं हूँ

मोह कोई नहीं है सिवाय एक कप चाय पीने की इच्छा के कि आखिर एक दिन सब छूट ही जाना है.
टटोलती हूँ तो वो छूट जाने वाला दिन बहुत आसपास लगता है...

वो दिन मुझसे खेल रहा है...

Sunday, February 18, 2018

उनका सम्मान उनका हक है


एक मेज बड़ी सी. उस मेज के उस पार जमीन पर दरी बिछाकर बैठे बच्चे. उनकी आँखों में ‘कुछ मिलेगा’ की उम्मीद. मेज के इस पार कुछ गर्वीले लोग. मेज पर प्लास्टिक के फूलों वाला गुलदान. जमा किये गए कुछ गाँव के लोग भी. गर्वीले लोग एक-एक कर भाषण देते हैं, जिसे सुनते हुए बच्चे ऊब रहे हैं. उनकी नजर उन बंद डिब्बों में है जिनमें उनको दान में दिए जाने वाला सामान बंद है. शिक्षिकाएं बच्चों की लाइन लगवाकर दान लेने के लिए तैयार करती हैं. दान में पेन्सिल, और कॉपियों का सेट है, एक पैकेट बिस्कुट का है और एक पैकेट जूस. देने वाले ने अपनी पोजीशन फोटो के हिसाब से ठीक सेट की. दूसरे साथी ने अच्छी तस्वीरों के लिए कैमरा मुस्तैद कर लिया है. ‘लडकियों को आगे करो, लड़कियों को आगे करो’ का स्वर गूंजता है. ‘बेटी पढ़ाओ’ के नारे की भरपाई तस्वीर में नज़र आये इसका ख्याल रखा गया. बच्चे बिस्कुट के पैकेट खोलते हैं, बड़े चाय नमकीन खाते हुए अपनी दानवीरता पर मुग्ध हैं. शिक्षिकाएं खुश हैं कि उनके स्कूल के बच्चों को ‘कुछ तो मिला’. ये सरकारी स्कूल के बच्चे हैं. 
अपने काम के सिलसिले में मुझे अक्सर सरकारी स्कूलों में जाने का अवसर मिलता है. इस दौरान इस तरह के दान के माहौल वाले दृश्य कई बार नज़रों से गुजरे हैं. स्कूलों से लौटते समय आमतौर पर हमेशा कोई न कोई एक सवाल साथ लौटता है जो महीनों सोने नहीं देता. (कभी-कभी कुछ सुकून देनी वाली संतुष्टियाँ भी लौटती हैं.) दान की इस प्रक्रिया में लगे स्कूल के दो घंटे का समय और बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों में एक अलग तरह की कृतज्ञता की भावना भी लम्बे समय से ऐसी ही बेचैनी का सबब है.

पहला सवाल तो यही कि दान शब्द की अवधारणा क्या है, कहाँ से आती है, इसके निहितार्थ क्या हैं. दूसरे दान करने वाले व्यक्ति का उद्देश्य क्या होता है, क्या इससे उसके भीतर किसी तरह का अपराध बोध कम होता है या दानवीर होने का अहंकार पुष्ट होता है. तीसरे दान लेने वाले व्यक्ति को हम किस तरह देखते हैं.

दान देने वाला सुपीरियर और लेने वाला इन्फीरियर ही क्यों होता है हमेशा. हालाँकि जातीय समीकरणों के मद्देनजर मामला एकदम उलटा नजर आएगा जहाँ भरे पेट ब्राह्मण को भी भूखे पेट किसान व अन्य लोग दान देते हैं. लेकिन यहाँ बात सरकारी स्कूलों के संदर्भ में ही केन्द्रित करना ठीक है.

सरकारी स्कूलों के बच्चों को इस तरह दान केन्द्रित बनाने के अर्थ क्या हैं आखिर? और यह किस कीमत पर हो रहा है? दान की प्रक्रिया क्या है? क्यों है? फिल्म हिंदी मीडियम का वह दृश्य याद आता है जहाँ नायिका और नायक को जब यह एहसास हो जाता है कि उन्होंने किसी गरीब की जगह पर अपने बच्चे का एडमिशन कराके उसका हक छीना है तो इस अपराधबोध से बचने के लिए वो (नायिका) बड़े नामी स्कूल से अपने बच्चे को निकालकर उस गरीब बच्चे को उसका हक लौटा देने की बजाय उस सरकारी स्कूल की मदद करने जा पहुँचते हैं जहाँ वो बच्चा पढ़ रहा है जिसका हक उनके बच्चे ने मारा है. फर्नीचर और किताबों की मदद, स्कूल को बेहतर बनाने की मदद, रंगाई पुताई सब. इसके साथ ही अपराध बोध खत्म.

हम ऐसे ही समाज बनते जा रहे हैं. अपने बेहतर होने के गर्व से उन्नत हमारा माथा और अकड़ी हुई गर्दन हमारे अहंकार का ही प्रतिरूप है. फिर यह कैसा बेहतर होना है. सरकारी स्कूल के बच्चों के सम्मान के बारे में आखिर किस तरह सोचता है यह समाज? वो ज़रूरतमंद हैं यह सोचकर अपनी अहम पुष्टि के तमाम दरवाजे लोगों को वहां खुलते नज़र आते हैं. राजनैतिक, धार्मिक, सामजिक बैनर के तहत यहाँ दान दिए जाते हैं. कभी-कभार लोग अपने बच्चों का जन्मदिन मनाने भी यहाँ आ पहुंचते हैं. जन्मदिन वाला बच्चा बाकी बच्चों को गिफ्ट देता है, बाकी बच्चे लाइन लगाकर गिफ्ट लेते हुए उसकी लम्बी उम्र की दुआ करते हैं. दान लेते हुए बच्चों की तस्वीरें खींची जाती हैं, सोशल मीडिया पर अपनी पीठ ठोंकी जाती है. जबकि दूसरी ओर एक पूरी पीढ़ी हाथ बढ़ाने और कृतज्ञ होने की आदी होते हुए, दान दाता के जयघोष में अपनी आवाज ऊंची करते हुए बड़ी होती है.

समानता, समता के संवैधानिक मूल्यों में क्या अवसरों की समानता के साथ सबके लिए बराबर सम्मान की बात भी निहित नहीं है? जब भी मैं इन सवालों से जूझ रही होती हूँ तो कुछ लोग कहते हैं कि ‘इसका क्या मतलब है कि किसी की मदद ही न की जाए?’ मैं कहती हूँ मदद कहाँ है यह, यह तो आत्मप्रचार है, आत्म संतुष्टि है और सामने वाले के सम्मान के साथ खिलवाड़ भी है. सुना था कि असल दान वो होता है जिसमें दाहिने हाथ से दिया जाय और बाएं हाथ को खबर न लगे. देने के साथ ही देने वाला भी भूल जाय.

जब तक किसी भी समाज में एक हाथ फैला रहेगा और दूसरा हाथ देने वाला बना रहेगा तब तक समता और समानता एक सपना ही बना रहेगा. अगर इसकी जड़ें स्कूल स्तर पर ही पनपने लगें तो चिंता और भी बढ़ जाती है. अगर शिक्षक अपने स्कूलों को मिलने वाली मदद के बदले अपने बच्चों की प्रदर्शनी लगाने से बचने को तत्पर हों, बच्चों को जो भी चीज़ें मिलें उन्हें इस तरह मिलें कि वो उनका ही हक हैं किसी के द्वारा दी गयी खैरात नहीं, जिसमें उनका सम्मान पूरी तरह बचा रहे तो शायद एक छोटी सी शुरुआत हो सकती है. इस शुरुआत में मिड डे मील परोसती भोजनमाता का स्नेहिल व्यवहार, स्कूल से मिलने वाली ड्रेस और किताबें देते समय शिक्षक का व्यवहार सब कुछ शामिल है. इस सबके लिए हमें पहले खुद यह समझना होगा कि सरकारी सकूलों के बच्चों का सम्मान बचाना है, उन्हें अपने सम्मान और हक के बारे में बताया जाना भी जरूरी है. बाकी हिंदी, गणित, विज्ञान तो बाद की बातें हैं जो लम्बे समय से हो ही रही हैं. लेकिन ऐसा हो सके इसके लिए बच्चों के सम्मान की जरूरत को महसूस करना जरूरी है.

(सुबह सवेरे में प्रकाशित )