Monday, October 9, 2017

मेरी जान हो तुम प्यारी रैना...



जिंदगी के सबसे बुरे दिनों में तुम्हारा होना कीमती था, तुम न कुछ पूछतीं न मैं कुछ बताती थी फिर भी एक रिश्ता गहराने लगा था भीतर ही भीतर...रैना, तुम्हारा सिर्फ नाम लिखती हूँ और एक संसार खुलने लगता है.

उस शहर में तुम्हारा होना उन दिनों सिर्फ मेरे लिए ही था मानो...बाहर के युद्ध लड़ लेना आसान होता है भीतर के मुश्किल...तुम्हारा साथ मेरे भीतर के युध्ध में मेरा साथ दे रहा था....करियर के सबसे काले दिनों में एक तुम ही उजाला थीं...तुम्हारी दिप दिप करती मुस्कुराहट मेरा हाथ थामे रहती थी.

कभी मेरी गोद में तुम्हारा यूँ ही सर रख कर बैठ जाना, कभी चुप से बगल में आकर खड़े हो जाना कितनी ताकत देता था कितनी ऊर्जा समेट देता था. कानपुर मेरे लिए बहुत बुरी यादों का शहर है जिसमें सिर्फ तुम इकलौती सुख की याद हो...तुम्हें मैंने बहुत सहेज कर रखा है...

नाराज़ मत हो तुम अब भी मेरी पहली 'प्यारी चुड़ैल' हो...लव यू...जन्मदिन मुबारक हो मेरी जान! 

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (11-10-2017) को
होय अटल अहिवात, कहे ध्रुव-तारा अभिमुख; चर्चामंच 2754
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी said...

शुभकामनाएं जन्मदिन पर ।

Kavita Rawat said...

हमारी ओर से भी जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं!

Pushpendra Dwivedi said...

बेहतरीन रचनात्मक अभिव्यक्ति