Monday, October 2, 2017

चोटिल चन्द्रमा चल रहा है- डॉ. स्कंद शुक्‍ल


डॉ. स्कंद  शुक्‍ल को पढ़ना अलग तरह का अनुभव देता है. संवेदना, ज्ञान और जानकारियों का ऐसा सामंजस्य अमूमन कम ही देखने को मिलता है. और भाषाई कौशल तो है ही. यूँ तो वो रुमेटोलॉजिस्ट और इम्यूनोलॉजिस्ट हैं
लेकिन उनकी लेखनी ने उन्हें दिलों का डॉक्टर बना रखा है. उनकी बातों से कई बार मेरी असहमतियां भी होती हैं लेकिन उनके लिखे का आकर्षण असहमतियों का सौन्दर्य बढ़ाता ही है....पाठक होने के अलावा उनसे एक और रिश्ता है मेरा वो है लखनऊ का रिश्ता. आज 
स्कंद  शुक्ल ने अपनी कहानी 'प्रतिभा की दुनिया 'के लिए देकर उन्होंने इस लखनवी रिश्ते को मान दिया है.- प्रतिभा
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ढेला किसी मेढक-सा उस झील की सतह पर उछलता निकल गया था। दो-तीन-चार छलाँगें और गुडुप्प !
"कहाँ तक पहुँचाना है ?" मैंने पूछा था।
"और आगे ?"
"कितना आगे ?"

उसने आँखें उचकायीं मानो किसी तरुण हंसिनी ने अपने पंख फैलाये हों। चेहरे पर उड़ान।

"फेंका गया पत्थर नीचे क्यों आता है, विधु ?"
"क्योंकि धरती उसे खींच लेती है।"
"क्यों खींच लेती है ?"
"क्योंकि उसमें गुरुत्व है।"
"तो तुरन्त क्यों नहीं खींचती ?"
"क्योंकि तुमने उसमें अपने हाथ की ताक़त भरी है। जब तक उसमें तुम्हारी दी ऊर्जा है , वह धरती के ऊपर किसी पक्षी-सा उड़ रहा है। और फिर धीरे-धीरे नीचे-नीचे , और नीचे और धड़ाम।" मैं अपनी मुट्ठी को हथेली पर गिराता हूँ।

"तो सारा मामला खिंचावों के बीच लड़ाई का है। कौन किसे कितना खींच ले जाए।"
"हाँ।"
उसे इतनी छोटी सहमति नहीं चाहिए थी।
"तो अगर किसी कंकड़ को आसमान की सैर करानी हो इस तरह कि वह घर ही न लौटे तो क्या करें ?"
"तो इतनी तेज़ फेंको कि धरती उसे वापस न खींच पाये। वह जाए , जाए , जाए और धरती का एक पूरा चक्कर लगा आए। चाँद की तरह।"
"चाँद धरती का चक्कर लगाता है न। रोज़। लेकिन गिरता नहीं कभी।बस दिखता है। घूमता हुआ। रात को। कभी पूरा , कभी आधा। कभी पतला , कभी मोटा।

चाँद नहीं गिरेगा। क्योंकि वह घूम रहा है धरती के चारों ओर। उसकी माशूक़ा गोल है। वह ख़ुद भी गोल चक्कर लगा रहा है। वह धरती पर गिरता हर दिन है , लेकिन पहुँचता नहीं उस पर। यही विधु-वसुधा की कथा का वर्तुल है। जिसमें गोल देह हैं , गोल रास्ते हैं और कभी न मिलने , केवल देखने की सुखद विडम्बना।"
"सुखद विडम्बना ?"
"हाँ , सुखद विडम्बना। चाँद रुक गया तो वह धरती के गले लग जाएगा। और मर जाएँगे हम-सब। धरती निपूती हो जाएगी।"
वसुधा का ढेला अबकी बार बहुत दूर गया है। दूर , बहुत दूर। पानी को बिना छुए। और फिर ओझल। न जाने कहाँ। तभी वह झील के उस पार के पेड़ों की ओर इशारा करती है।
"वह देखो। मैंने अपने नन्हें मुसाफ़िर को चाँद पर पहुँचा दिया। अब वह कभी नहीं लौटेगा। घूमता रहेगा सदा चारों ओर अपनी धरती के।"

चाँद काले पेड़ों के पार से लुकछिप कर झाँक रहा था। उसकी देह पर एक और नये पत्थर की मार थी...

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (04-010-2017) को
"शुभकामनाओं के लिये आभार" (चर्चा अंक 2747)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'