Friday, July 7, 2017

अवसाद में कौन नहीं है...



अजीब सी उधेड़बुन चल रही है. चलती ही जा रही है. उधेड़बुन यही कि अवसाद में कौन नहीं है... कहाँ नहीं है अवसाद? क्या अकेलेपन का अवसाद से कोई रिश्ता होता है. अकेलापन आखिर होता क्या है. यह जानते हुए कि सामने वाला अवसाद में है या हो सकता है क्या सचमुच हम उसकी मदद करने की योग्यता रखते हैं. मदद होती क्या है. कैसी होती है वो.

अकेलापन बाहर की चीज़ है या भीतर की? लगती तो भीतर की है लेकिन देखी बाहर जाती है. 'उसका इस दुनिया में कोई नहीं था/थी. वो बेहद अकेला था/थी.' अगर ऐसा है तो जिनके आसपास बहुत  हैं वो तो कतई अकेले नहीं हैं और न ही वो कभी अवसाद में जाएंगे। लेकिन बहुत सारे लोगों को देखा है अवसाद में धंसे हुए जिनके आसपास बाकयदा मज़मा लगा होता था. और ऐसे लोगों को भी बेहद खुशमिज़ाज़ और जिंदगी से भरा हुआ पाया जिन्होंने खुद को दुनियादारी से दूर रखा और अपने होने के उत्सव में किसी को भी शामिल करने से इंकार किया.

कभी-कभी आसपास देखती हूँ तो पाती हूँ कि अवसाद में कौन नहीं है भला. कोई कम,कोई ज्यादा। जो जितना संवेदनशील वो उतना ही अवसाद में. अवसाद में धंसे व्यक्ति की मदद कैसे की जा सकती है भला, उससे बात करके? क्या बात करके? किस वक़्त बात करके? कितनी और कैसी बात करके?

कई बार अवसाद में मदद को आगे बढे लोग अनजाने ही, उदासी और अवसाद को और भी ज्यादा बढ़ा देते हैं. उन्हें लगता है वो मदद कर रहे हैं जबकि वो समस्या को बढ़ा रहे होते हैं. कितने कम लोग होंगे जो समस्या पर बात किये बगैर समस्या तक पहुँचने और उससे लड़ने की ताक़त बन सकते हैं. बहुत कम. जबकि मैं यह अच्छी तरह से जानती हूँ कि मुझे मेरे काले, गहरे, गाढ़े, मृत्यु के करीब तक ले गए अवसाद से मेरे दोस्तों ने ही निकाला है, डॉक्टरों का नंबर तो बहुत बाद में आया. मुझे वो सारे दोस्त याद हैं जिन्होंने थप्पड़ लगाए हैं, जिन्होंने सीने में भींचकर रात-रात भर पीठ सहलाई है और वो भी जिन्होंने कहकहों की वजहें जानबूझकर बनायीं, जिन्होंने बिना मुझे खबर लगने दिए मेरी जिंदगी के रास्ते बदले हैं.... इसके बावजूद कहती हूँ कि अवसाद में मदद करने की ताक़त और योग्यता  बहुत कम लोगों में होती है.

अवसाद में धंसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होता वो सिम्पैथी और लेक्चर दोनों से चिढ़ता है. इससे बचने के लिए वो खुद को समेटता है, अपने भीतर की हलचल को किसी से साझा नहीं करता। वो  हँसता है, मिलता जुलता है, पार्टी करता है, फेसबुक पर स्टेटस लगाता है और अंदर ही अंदर लड़ता रहता है.

तो जिन्हें अकेलापन बाहर की चीज़ लगता है, उन्हें गलत लगता है शायद। परिवारों के भीतर सबसे ज्यादा अकेलापन और अवसाद पल रहा है. और परिवार के लोग बहुत कम समझ पाते हैं कि घर का कोई सदस्य अवसाद में है. एक दोस्त ३ साल तक डिप्रेशन का बाक़ायदा इलाज कराता रहा, दवाइयां काउंसलिंग सब लेकिन परिवार में किसी को बता नहीं सका.

एक और बात लगती है कि अगर कोई मदद की हाथ बढ़ाये तो क्या ज़रूरी है आप मदद की स्थिति में हों? हो सकता है जिसकी तरफ मदद का हाथ बढ़ा हो वो खुद गहरे अवसाद में धंसा हो. हो सकता है वो खुद मदद की तलाश में हो...अवसाद में घिरा व्यक्ति दूसरे के अवसाद से बहुत जल्दी इफेक्टेड होता है. ऐसे में वो या तो अपना नुकसान कर रहा होता है या दूसरे की मदद न कर पाने के अपराधबोध से घिर जाता है.

तो आखिर क्या हो? क्यों यह समाज अवसाद के साथ डील कर पाने में लगातार असफल हो रहा है. यह बात व्यक्ति के तौर पर कम समूह के तौर पर ज्यादा सोचे जाने की जरूरत लगती है. जिस तरह शरीर से जुडी तमाम बीमारियों को लेकर हमारा व्यव्हार होता है वैसा मन की बीमारी को लेकर नहीं होता। या तो हम खुद उसे समझ नहीं पाते, दूसरे की बीमारी को सतही तरह से लेते हैं और मान लेते हैं कि ज्ञान पिलाने से लेक्चर के बूस्टर सुबह शाम लगा देने से बात बन जायेगी, या 'बेकूफ़ हो क्या इतनी चीज़ें तो हैं फिर काहे अवसाद में हो ' कहकर उसके  दुःख को, उसके अवसाद को छोटा, तुच्छ साबित करने में लग जाते हैं. हम शायद नहीं जानते कि अवसाद में धंसा व्यक्ति अपने दुःख से बहुत प्यार करता है, उसे यह कतई सहन नहीं होता कि कोई उसे मूर्ख और उसके अवसाद को फ़ालतू कहे.

और तो और यह समाज मनोवैज्ञानिक बीमारी, अवसाद या डिप्रेशन का इलाज कराने वाले को पागल न समझ ले इसका भी खतरा कम नहीं होता इसलिए इलाज कराने वाले किसी को बताना नहीं चाहते कि वो क्लिनिकल या सायकोलॉजिकल मेडिकेशन में हैं. जॉब में भी इसका उल्टा असर पड़ सकता है. निजी जिंदगी में भी, दोस्तों में भी... यानी एक समाज के तौर पर हम डिप्रेशन से लड़ने के लिए तैयार नहीं हो सके हैं न अपने और दूसरों के तो बिलकुल नहीं।

सब कुछ बेहद उलझा हुआ नज़र आता है. सारे लोग रोबोट जैसे लगते हैं. लोग ऊपर से हंस रहे हैं, चल रहे हैं, घूमने जा रहे हैं, सिनेमा देख रहे हैं, सेल्फी ले रहे हैं लेकिन अंदर ही अंदर टूट रहे हैं... यह टूटन सुनने की हमारी क्षमता नहीं है. क्षमता अगर है भी तो कुछ कर सकने की सामर्थ्य नहीं है...इन बीमारियों का इलाज करने योग्य डॉक्टर्स भी अभी बहुत नहीं हैं. सायकोलॉजिकल काउंसलिंग के नाम पर लेक्चर और क्लिनिकल ट्रीटमेंट के नाम पर नींद की गाढ़ी डोज़ के आगे कम ही बढ़ पाए हैं डॉक्टर्स। यह गंभीर बात है... इलाज कहाँ हैं पता नहीं... जो इलाज आप किसी अवसाद में धंसे व्यक्ति को सुझाने वाले हैं यकीन मानिये वो उनसे ज्यादा इलाज़ आपको बता सकता है... फिर क्या हो... पता नहीं..

कुछ गाली देने वाले, थप्पड़ लगाने  वाले, गोद में समेट लेने वाले दोस्त तो होने ही चाहिए खैर...

5 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सटीक विश्लेषण है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-07-2017) को 'पाठक का रोजनामचा' (चर्चा अंक-2661) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

vandana gupta said...

विचारणीय

प्रतिभा सक्सेना said...

जीवन बड़ी उलझी हुई चीज़ है -जितना सोचो-समझो उलझने बढ़ती जाती है, इसलिये -सबसे भले विमूढ़ ,जिन्हइ न व्यापे जगत-गति.

Meena Sharma said...

आज के जीवन का सच बयान कर दिया आपने