Wednesday, February 8, 2017

निदा फ़ाज़ली: एक टुकड़ा याद


कोई खिड़की से झांककर कहता है, 'गाड़ी आराम से चलाना, आहिस्ता.’

मैं मुस्कुराकर देखती हूँ. वो निदा फ़ाज़ली से आखिरी मुलाकात का आखिरी लम्हा था. उनकी मुझसे कही गयी आखिरी बात. मेरी उनसे यह मुलाक़ात पिछली हुई तमाम मुलाकातों से अलग थी. उस रोज़ मैं उनसे अखबार के नुमाइंदे के तौर पर मिलने नहीं जा रही थी. न ज़ेहन में सवालों के फ्रेम उभर रहे थे, न वक़्त पर कॉपी फ़ाइल करने का, सबसे अच्छी कॉपी फ़ाइल करने का कोई दबाव था.

उन्होंने शहर पहुँचते ही फ़ोन पर अपने आने की इत्तिला दी थी. ये पिछली मुलाकातों की कमाई थी कि वो आते तो फोन ज़रूर करते थे. इस बार कोई एक्सक्लुसिव इंटरव्यू की कोई योजना अख़बार के पास नहीं थी, इसलिए उनसे मिलने का कोई असाइनमेंट भी नहीं था. शाम का वक़्त अख़बार की दुनिया में मरने की फुर्सत भी न होने जैसा ही होता है. ऐसे में वक़्त चुराना ख़ासा मुश्किल काम था. लेकिन उनके साथ एक कप चाय पीने का लालच बड़ा था. सो जल्दी जल्दी काम समेटा और स्कूटर उठाया. मौसम में हलकी सी खुशबू दाखिल हो चुकी थी. रास्ते भर, पिछली तमाम मुलाकातें जेहन में चलती रहीं. जाने क्यों उस रोज उनकी आवाज में कुछ नमी, कुछ बेचैनी सी थी. हालांकि पिछली कुछ मुलाकातों में वो मुझे बेचैन से ही मिलते रहे थे. जैसे कुछ तलाश रहे हों, जैसे सबसे नाराज़ हों, जैसे कुछ न कर पाने की उलझन में घिरे हों...लेकिन इस बार की आवाज़ में बेचैनी कुछ ज्यादा ही थी.

इसी जेहनी उथल-पुथल के बीच आखिर पहुँच ही गई उनके पास. हमेशा की तरह उन्होंने गंभीर मुस्कान के साथ स्वागत किया. ‘इस वक़्त परेशान किया तुमको?’ उन्होंने कहा.

‘अरे नहीं, तो. मेरी खुशकिस्मती है यह तो.’ मैंने कहा ज़रूर लेकिन शायद उन्होंने सुना नहीं.

‘जानता हूँ अखबार का कारोबार.’ उन्होंने कहा और बिना पूछे चाय मंगवा ली. वो अब तक मेरे चाय के चस्के से वाकिफ हो चुके थे. हम सादा सी बातचीत में मसरूफ हो गए. वो मेरी उनसे हुई तमाम मुलाकातों में से सबसे लम्बी मुलाकात थी. न कोई कागज़, न कलम, न सवाल कोई न जवाब. बस कुछ बात होती रही. बीच-बीच में वो मुझे खूब पढ़ने की ताकीद करना न भूलते.

उस रोज़ उन्होंने समकालीन हिंदी और उर्दू कविता पर काफी बात की थी. उन्हें चिंता होती थी कि आजकल के लोग पढ़ते नहीं, लिटरेचर की गहराई में नहीं उतरते. पढने वालों में एक हड़बड़ी सी रहती है, लिखने वालों में और भी ज्यादा. इससे पोयट्री को बहुत नुकसान हो रहा है. विदेशी कवियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अफ़्रीकी कविताओं का खासकर जिक्र किया था. देश के ताजा हालात से बहुत दुखी थे वो कि हर शब्द, हर बात धर्म के चश्मे से क्यों देखी जाती है और क्यों साम्प्रदायिकता के खांचे में जड़ दी जाती है. न कोई टोपी में सुरक्षित है, न भगवा दुपट्टे में, फिर भी सब आपस में भिड़ रहे हैं.

वो पहले भी कई बार कह चुके थे कि यह कितनी अजीब बात है कि मुझे क्या सुनाना है यह इस बात से तय होता है कि शहर कौन सा है, देश कौन सा है और सामने पगड़ी वाले बैठे हैं या टोपी वाले. इस बात का जितना दुःख एक शायर को होता है उसे कोई समझ नहीं सकता. एक अजीब सा सतही दौर है, पॉपुलर चीज़ सुनना चाहते हैं लोग. शायरी का काम पॉपुलर कल्चर का पेट भरना नहीं है. लेकिन कौन समझाए.

उस पूरी मुलाकात में वे काफी उदास थे, चिंतित थे. वो सरहदों के दर्द को खूब महसूस करते थे. उनका कहना था कि लिटरेचर की कोई सरहद नहीं होती. लिटरेचर सारी सरहदों को तोड़ सकता है. तमाम भाषाओँ के पार जा सकता है. इसलिए हमें देश, भाषा की सीमाओं से पार जाकर पढना चाहिए, दुनिया को समझना चाहिए, महसूस करना चाहिए, सीखना चाहिए, प्यार करना चाहिए.

जाने कैसी उदासी तारी थी उस रोज कि तीन कप चाय और दुनियाभर की बातों के दरम्यान मौजूद ही रही. जैसे उनका दिल बहुत भरा हुआ हो. मुशायरों के स्तर में आई कमी से भी कुछ उदासी थी.. पुराने बीते मुशायरों की, उनके दोस्तों की यादें ज़ेहन में ताज़ा थीं...

जगजीत सिंह की इस दुनिया से रवानगी के कुछ ही रोज बाद की इस मुलाकात में उनके अज़ीज़ जगजीत सिंह की जुदाई का ग़म भी शामिल रहा. उन्होंने कहा, ‘‘पक्का यार चला गया. उसी ने मेरी ग़ज़लों को लोगों तक पहुँचाया, पॉपुलर बनाया.’’ जगजीत सिंह भी उन्हें अपनी हर मुलाकात में निदा साहब को इसी तरह याद किया करते थे.

मैं निदा साहब की बात सुनते हुए जगजीत सिंह को भी याद करते हुए मुस्कुराई थी. दोनों की यादों में दोनों को यूँ आपस में घुलते देखना सुखद जो था. तक़रीबन ढाई घंटे की वो मुलाकात जो अख़बार में कहीं दर्ज नहीं हुई. ये पहले से तय था कि ये निजी बातचीत है. वो निजी ही रही. अनौपचारिक...

मुझे आपको याद करना हमेशा अच्छा लगता था निदा साहब लेकिन सिर्फ आपका ‘याद’ बनकर रह जाना ये तो तय न था. अभी जगजीत सिंह की याद, उनकी वो बेतकल्लुफ हंसी, उनके वो जल्द आने का वादा ही आँखों में नमी बनकर तारी था कि आपके जाने की खबर...

आज बरस हुआ आपको गए, लेकिन यकीन अब भी नहीं आता कि अब कभी मुलाकात नहीं होगी आपसे. कैसे दोस्त निकले न आप भी कि दोस्त जगजीत के जन्मदिन पर उनसे मिलने ही चल दिए...८ फरवरी...

यूँ आपकी याद का मौसम तो कभी मुरझाता नहीं, फिर भी जाने क्यों आज ये स्मृति की डाल पर कुछ ज्यादा ही फूल खिले हैं...नहीं, उदासी के नहीं...आपसे प्यार के...हर लम्हे की याद के...आपसे मिली हर हर ताकीद की याद के फूल...

ये कुछ अपने लिखे में से अक्सर वो दोहराया करते थे...

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया

लफ़्ज़ों से जुदा हो गए लफ़्ज़ों के मआनी
ख़तरे के निशानात अभी दूर हैं लेकिन

सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है
कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन

बूढ़ा पीपल घाट का, बतियाए दिन-रात
जो भी गुज़रे पास से, सिर पे रख दे हाथ

सीधा सादा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान

अंदर मूरत पर चढ़े , घी, पूरी ,मिष्ठान
मंदिर के बाहर खड़ा, ईश्वर मांगे दान

बरखा सब को दान दे, जिसकी जितनी प्यास
मोती सीये सीप में, माटी में घास

जीवन के दिन रैन का, कैसे लगे हिसाब
दीमक के घर बैठ कर, लेखक लिखे किताब

ईसा, अल्लाह, ईश्वर, सारे मंतर सीख
जाने कब किस नाम से मिले ज्यादा भीख

स्टेशन पर ख़त्म की भारत तेरी खोज
नेहरू ने लिखा नहीं कुली के सर का बोझ...
(तस्वीर दूसरी मुलाकात की है, इस मुलाकात की हर बात सिर्फ जेहन में है )

2 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 10 फरवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

savan kumar said...

कुछ लोग शब्दों को अमर कर जाते हैं।
कुछ लोग शब्दों में अमर हो जाते हैं।
निदा फ़ालज़ी जी दोनों में अमर हैं।