Friday, December 16, 2016

चाँद बेचारे को कॉफ़ी नहीं मिलेगी..


एक पूरा और चमकता हुआ चाँद कर भी क्या लेगा, तब जबकि आपके सामने दो कप हों कॉफ़ी से भरे हुए और आपके पास चाँद को देखने की फुर्सत ही न हो. दोनों कपों से बारी-बारी से कॉफ़ी पीने के बाद भीतर का खालीपन मुस्कुराता है...यूँ खाली होने को जी कब से बेचैन था. एक ऐसा निस्सीम खालीपन जिसमें कोई मिलावट न हो. न सुख की, न दुःख की, न व्यस्तता की, न कुछ छूट जाने की खलिश की, न पुकार कोई, न इंतजार, न उलाहना, न अतिरेक से भरा कोई लम्हा. कप से छलकती कॉफ़ी मुस्कुराकर ताकीद करती है, तुम मत छलकना, तुम डूबते जाना, और गहरे...और गहरे...

बाद मुद्दत हथेलियाँ खाली हैं, बाद मुद्दत माथे पे सलवट कोई नहीं...शब्द ख़ामोशी के साथ सुरमई शामों के कांधों से टिककर बुझे हुए सूरज की आंच टटोल रहे हैं...वो अब अर्थ नहीं तलाशते. जानते हैं...अर्थ से भर दिए गये शब्द जबरन भावनाओं से भर दिए गये इंसानों जैसे होते हैं. जबरन अर्थ का बोझ ढोते शब्दों के कंधे झुक चुके थे, बिलकुल जबरन ठूंस दी गयी भावनाओं से झुके इंसानों की तरह. इंसान भले ही न झटक पाए हों भावनाओं का बोझ लेकिन शब्द ये सलीका सीख गए हैं. वो मुक्त हो गए हैं...

कोई भी शब्द तोड़ लो किसी भी भाषा के वृक्ष से, कोई फर्क नहीं पड़ेगा उसे कहीं भी रख दो, कैसे भी...रुदन को हटाकर हंसी रख दो,...दिन को हटाकर रात रख दो...कोई फर्क नहीं पड़ेगा...सिवाय इसके कि सूरज रात को चमकने लगेगा और चाँद दिन को खिलखिलाने लगेगा...

जब भीतर इतना खालीपन हो तो आसपास का शोर बाधा नहीं बनता, वो महकने लगता है, लोग बोल रहे होते हैं, हम सुन नहीं देख रहे होते हैं...उनके बोले को नहीं, उन्हें नहीं अपने भीतर के खालीपन को...कित्ती शिद्दत से तलाश थी इस होने की...कब तक रहेगा पता नहीं..बस कि जो है उसे जी रही हूँ...खुली हथेलियाँ आसमान को सौंप रखी हैं...लकीरों से खाली हथेलियाँ...

सुना है मेरे शहर को कुदरत ने कोहरे की चुनर से ढँक लिया है...मैं देर रात कोहरे की उस खुशबू को महसूस करती हूँ...सोए हुए शहर की चादर उठाकर धीरे से उसमें आँख मूंदकर लेट जाने की आदत..ऊंघते शहर में वो बेसब्र जागती आँखें...सब याद आता है...

पहाड़ों पर कोहरा नहीं, खिलखिलाती धूप है...खुली धुली सी रात है...इन ठन्डी रातों में दूर तक पैदल चलते जाने का लोभ मैं कभी नहीं छोड़ पाती...यूँ बरसती रातों में घूमते-फिरने का लोभ भी कब छोड़ पायी हूँ...जाने क्यों लोभी होना बुरा कहा गया होगा, मैंने जब लोभ शब्द उठाया तो बड़ा मीठा लगा मुझे...बिलकुल उसी तरह जैसे मीठा लग रहा है इस वक़्त का खाली मन...बाद मुद्दत सुकून है...चाँद बेचारा दूसरे कॉफ़ी के कप को लालच से देख रहा है...मैं उसे मुंह चिढाकर कॉफ़ी खत्म कर देती हूँ...रात के सीने में खूब रौशनी है...


1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (18-12-2016) को "जीने का नजरिया" (चर्चा अंक-2559) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'