Thursday, March 3, 2016

जानती हूं वो जागेगा सारी रात...



कोई सर्पीली सी राह गुजरती है सामने से। एक बूढ़ा दरख्त जो राहगीरों को रास्ता बताया करता था, थक चुका है। वो धूप में अलसाया खड़ा है। दिन भर उंघता रहता है। राहगीर रास्ता पूछने को अब उसके पास नहीं रुकते। उन्हें लगता होगा कि क्यों बेचारे  के आलस में खलल डाले। रास्ता बताने को अब एक नया पेड़ आ खड़ा हुआ है। उससे जरा सी दूरी पर। इन दिनों लहक रहा है। जब मौसम आता है तो नाशपातियां लटकती हैं इस पर। तब वो राहगीरों को राह भटका देता है। बच्चे उसे घेरे रहते हैं और बड़े भी लालच से देखते हैं। कभी हाथ भी बढ़ा देते हैं। कभी मन को रोक भी लेते हैं। हाथ वो राहगीर ज्यादा बढ़ाते हैं जो इस शहर में अजनबी है। जिनकी आंखों के आगे यह शहर किसी नये संसार सा खुलता है।

नया है लेकिन बुजुर्ग दरख्त की सोहबत में वो बहुत कुछ सीख चुका है। भटके हुए राहगीरों को रास्ता बताना नहीं भूलता वो। मन से भटके हुओं को भी। अभी इस पर कोई फल नहीं हैं लेकिन फूलों से लहलहा रहा है ये। धूप की पहली लकीर उसके माथे पर गिरती है और वो झक्क सफेदी में जगमगा उठता है। रात के अंधेरे में चमकता उसका सफेद भोर की गुनगुनी धूप में चमकते सफेद से बहुत अलग है। अभी दो स्कूल की बच्चियां गुजरी हैं यहां से, वो राह नहीं भटकी थीं...बस गुजरी थी यहां से। बच्चे राह नहीं भटकते शायद, बड़े भटकते हैं। 

मैं पलकें झपकाकर बच्चों से दोस्ती करने का तरीका जानती हूँ. जाने क्यों इस फूलों भरे पेड़ पर पहली नज़र पड़ते ही मन वैसा ही किलक उठा जैसे किसी नन्हे बच्चे को देखकर किलक उठता है। वो दूर अपनी मां की गोद में होता है और एक लम्हे में मेरे मन के आंगन में भी चहकने लगता है। मैं पलकें झपकाती हूं वो मुस्कुरा देता है और थोड़ी सी देर में वो भी पलकें झपकाने लगता है। पलकें झपकाने का खेल शुरू हो जाता है। मैं इस पेड़ को देखकर वहीं ठहर जाती हूं...

मैं तो कबसे अपनी सारी राहों से भटकी फिर रही हूं। वो मुझे देखकर पलकें झपका देता है। मैं चौंक  जाती हूं। मेरी वाली ट्रिक मुझ पर ही। मैं हंसती हूं। हम दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। देखते जाते हैं। धूप का एक टुकड़ा रेंगते हुए चुपके से मेरी कलाई थाम लेता है, फिर वो धूप कंधे पर आ बैठती है और धीरे-धीरे पूरी तरह से मुझे घेर लेती है। अब हम दोनों धूप की नदी में तैर रहे हैं।

कुछ राहगीर गुजरते हैं उस राह से, वो बिना नजर से नजर तोड़े एकदम सही राह बताता है। कोई बूढ़ी दादी उसके पास बैठ जाती है। थक गई होगी शायद। कोई लड़का गुजरता है अठखेलियां करता सीटी बजाता हुआ और हाथ में पकड़ी हुई लकड़ी को हवा में लहराते हुए। मैं मुग्ध हूं...वो भी। सामान्य जीवन का सादा सौन्दर्य कहां गुमा आये हम। कैसा जीवन उगा लिया है अपने आसपास।

एक पहाड़ी लड़का मुझे पुकारता है, मैम आपका सामान आपके कमरे में रख दिया है। मैं मुस्कुराकर उसे धन्यवाद देती हूं...तभी फोन बजता है...बिटिया पूछती है, ठीक से पहुंच गई? मैं उस पेड़ की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहती हूं ठीक से भी और ठीक ठिकाने  पर भी।

सुबह, दोपहर, शाम, रात...मैं उसे देखती हूं...दोस्ती हो गई है। देर रात तक उससे बातें करती हूं। दिन भर की बातें पूछती हूं उससे। कितने लोगों को राह बताई, कितनों के सर पर हाथ फेरा, कितनी कमसिन लड़कियों की राहों में फूल बिछाये, कितने बुजुर्गों से आशीर्वाद लिया। वो सब बताता है...विस्तार से। मैं भी बताती हूं कि किस तरह दीवानावार शहर के चप्पे-चप्पे को चूम लेना चाहती हूं। किस तरह दौड़ती फिरती हूं ताल के आसपास, किस तरह ठहर जाती हूं नाशपाती, पुलम और आ़ड़ू के झमक के खिले फूलों के आसपास और किस तरह फयूली कि फूलों ने मेरा श्रंगार किया...सब बताती हूं उसे...

सुबह उठने का वक्त बदल लिया है कि उसके माथे पर पहली किरन देखने का सुख छोड़ना नहीं चाहती।
मैं पहले भी आई हूं इस शहर में लेकिन सलीका नहीं था तब शायद आने का। मैं उसे यह बात बताती हूं तो वो ठठाकर हंस देता है। उसकी हंसी में वो जिस तरह लहरा रहा है उसका सौंदर्य लगातार बढ़ता ही जा रहा है। मैं उसकी हंसी से विस्मित हूं...यूं यह समूचा शहर ही यूं ठठाकर हंसता नज़र आता है...बिना शोर वाली हंसी...रगों में उतर जाने वाली हंसी...रंगों में ढल जाने वाली हंसी...हवाओं में घुल जाने वाली हंसी।

उसकी हंसी थमती है पल भर को, मैं इंतजार में हूं कि वो हंसी की वजह बतायेगा शायद। वो नहीं बताता। मैं नहीं पूछती। मुंह घुमा लेती हूं उसकी ओर से, हालांकि नाराज नहीं हूं...वो जानता है...मैं नाराज नहीं हूं सिर्फ मुंह घुमाया है। वो यह भी जानता है कि ज्यादा देर रह नहीं पाउंगी मुंह घुमाकर। वो बिना पूछे कहता है, पहले तुम्हें इस शहर से ऐसी मोहब्बत कैसे होती भला, पहले मैं जो नहीं था...अब मुस्कुराने की बारी मेरी थी। 

चांदनी रात उसके सौन्दर्य को निखारती है...मैं सोने जाती हूं...जानती हूं वो जागेगा सारी रात...

(भीमताल डायरी)


5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (04-03-2016) को "अँधेरा बढ़ रहा है" (चर्चा अंक-2271) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat said...

बहुत सुन्दर ..

Kavita Rawat said...

बहुत सुन्दर ..

dr.mahendrag said...

सुन्दर अभिव्यक्ति

vidyaarthee said...

Pratibhaji,

If you are the same who has written a book on Mariana Tsvetaeva, please contact me charumatir@gmail.com

Good luck,
Charumati