Monday, February 8, 2016

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा


कोई खिड़की से झांककर कहता है, 'गाड़ी आराम से चलाना, आहिस्ता' मैं मुस्कुराकर देखती हूँ. वो निदा फ़ाज़ली से आखिरी मुलाकात का आखिरी लम्हा था. उनकी मुझसे कही गयी आखिरी बात. यह उनसे अखबार के नुमाइंदे की मुलाकात नहीं थी, प्रतिभा की थी. उन्होंने शहर पहुँचते ही फ़ोन किया था. शाम के वक़्त अख़बार की मसरूफियत से वक़्त निकालना खासा मुश्किल होता है लेकिन निदा साहब से मिलने का लालच सबसे बड़ा था.

वो मेरी उनसे हुई तमाम मुलाकातों में से सबसे लम्बी मुलाकात थी. उस रोज़ उन्होंने समकालीन हिंदी और उर्दू कविता पर काफी बात की थी. उन्हें चिंता होती थी कि आजकल के लोग पढ़ते नहीं, लिटरेचर की गहराई में नहीं उतरते, एक हड़बड़ी सी रहती है, इससे पोयट्री को बहुत नुकसान हो रहा है. विदेशी कवियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अफ़्रीकी कविताओं का खासकर जिक्र किया था. देश के ताजा हालात से बहुत दुखी थे वो कि हर शब्द, हर बात धर्म के चश्मे से देखी जाती है और साम्प्रदायिकता के खांचे में जड़ दी जाती है. न कोई टोपी में सुरछित है, न भगवा दुपट्टे में, फिर भी सब आपस में भिड रहे हैं,

उस पूरी मुलाकात में वे काफी उदास थे, चिंतित थे. मुझसे उन्होंने खूब पढने को कहा था, लिटरेचर की कोई सरहद नहीं होती, कोई भाषा नहीं, उसके करीब जाना चाहिए, उससे सीखना चाहिए, प्यार करना चाहिए. जाने कैसी उदासी तारी थी उस रोज कि तीन कप चाय और दुनियाभर की बातों के दरम्यान मौजूद ही रही. जैसे उनका दिल बहुत भरा हुआ हो. मुशायरों के स्तर में आई कमी से भी कुछ उदासी थी.. पुराने बीते मुशायरों की, उनके दोस्तों की यादें ज़ेहन में ताज़ा थी.

जगजीत सिंह की रवानगी के कुछ ही रोज बाद की इस मुलाकात में जगजीत की जुदाई भी का भी गम शामिल रहा. उन्होंने कहा, पक्का यार चला गया. उसी ने मेरी ग़ज़लों को लोगों तक पहुँचाया, पॉपुलर बनाया. जगजीत सिंह भी उन्हें अपनी हर मुलाकात में इसी तरह याद किया करते थे, मैं मुस्कुराई, दोनों की यादों में दोनों को यूँ आपस में घुलते देखना सुखद जो था. तक़रीबन ढाई घंटे की वो मुलाकात जो अख़बार में कही दर्ज नहीं हुई. ये पहले से तय था कि ये निजी बातचीत है. वो निजी ही रही. अनौपचारिक...मुझे आपको याद करना हमेशा अच्छा लगता था निदा साहब लेकिन सिर्फ आपका याद बनकर रह जाना अच्छा नहीं लगा. अभी इंतजार हुसैन साहब की स्मृतियां तारी ही थीं कि आप का दिल भी अटक गया. जानती हूँ, बहुत बहुत बहुत याद आयेंगे आप....

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समंदर मेरा...

(तस्वीर दूसरी मुलाकात की है, इस मुलाकात की हर बात सिर्फ जेहन में है)


1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (10-02-2016) को ''चाँद झील में'' (चर्चा अंक-2248)) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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चर्चा मंच परिवार की ओर से स्व-निदा फाजली और अविनाश वाचस्पति को भावभीनी श्रद्धांजलि।

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'