Friday, January 23, 2015

हम ख़ुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही



तुमको हम दिल में बसा लेंगे, तुम आओ तो सही
सारी दुनिया से छुपा लेंगे, तुम आओ तो सही

एक वादा करो अब हमसे ना बिछड़ोगे कभी
नाज़ हम सारे उठा लेंगे, तुम आओ तो सही

बेवफा भी हो, सितमगर भी, जफापेशा भी
हम ख़ुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही

राह तारीक है और दूर है मंजि़ल लेकिन
दर्द की शम्में जला लेंगे, तुम आओ तो सही...

- मुमताज़ मिर्जा

3 comments:

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (25-01-2015) को "मुखर होती एक मूक वेदना" (चर्चा-1869) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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बसन्तपञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत उम्दा l
वसंत पंचमी