Monday, December 3, 2012

खामोशी की संगत पर कुदरत का राग


8 नवंबर

अनंतनाग के रास्ते केसर के खेतों से होकर गुजरते थे. जिस समय केसर फूलती होगी यहां नीले रंग की फूलों की कैसी कतारें सजती होंगी हम बस सोच ही पा रहे थे. क्यारियों की तरह कटे हुए केसर के खेत. तो यहीं से उठती है वो खुशबू जो सारी दुनिया का चक्कर लगाते हुए राजस्थान के 'केसरिया बालम' पर जाकर ठहरती है. अखरोट, सेब के बागान और केसर के खेत देखते हुए डेढ़ घंटे का रास्ता मानो मिनटों में कट गया. आज के लिए विशेष संगीत चुना गया था. बीती रात हीर सुनते हुए हमारी आंखें भीगी थीं आज के लिए हमने अपने मन की उदासियों को हीर के बहाने रेशमा आपा की आवाज को सौंप दिया था. हालांकि अनंतनाग के रास्ते में नुसरत साब की आवाज के साये में बैठे रहे...रास्तों से खेलते रहे. कशमीर यूनिवर्सिटी का एक कैम्पस ये भी है...सुंदर, विशाल.
आनन-फानन हमारी ढेर सारे लोगों से मुलाकात हुई. बात हुई. काम के अच्छे ढंग से निपट जाने के उत्साह लबरेज हम वापस लौटे तो रास्ते और भी खिले-खिले से लगे. एक जगह ठहरे। पूरे अनंतनाग को एक दृश्य के रूप में आखों में समेटा और रुख किया पहलगाम की ओर.
पता नहीं पहलगाम को टूरिज्म के नक़्शे में किन चीजों के लिए दर्ज किया गया है लेकिन मुझे इन रास्तों पर चलते हुए जो महसूस हुआ उसे कह पाना, लिख पाना नितांत असंभव है. मेरी यात्राओं में कभी धार्मिक वजह शामिल नहीं होती वरना लोग यही कहते कि वो पहलगाम जहाँ से शिव जी ने पार्वती जी के साथ एकांतवास को अमरनाथ की गुफाओं में प्रस्थान करने से पहले अपने प्रिय नंदी का त्याग किया वहां जाना सुखद तो लगना ही था. मैंने किसी मंदिर का विचरण नहीं किया. अगर धर्म इतनी बड़ी वजह है शांति की तो सचमुच समूची कुदरत से बड़ा मंदिर कोई नहीं. रास्ते हमारी आत्मा की अशांति को खुरचते रहे. रास्ते भर झेलम कंधे सहलाती रही...सारे रास्ते हम अपने भीतर डूबते रहे, उतराते रहे...क्या ऐसे ही वक्त में सुनने के लिए रेशमा आपा ने अपनी आवाज में गाया होगा मेरे हमजोलियां कुछ यहां, कुछ वहां....
तां उम्र काबिज रहेंगी इस सफर की स्मतियां. वक्त कम ही सही लेकिन जिंदगी को मांजने को काफी था...झेलम तीरे घंटों बैठने का ख्वाब अब ख्वाब नहीं था....दूर तक पसरा गहन सन्नाटा, खामोश चिनार, बिना आवाज किये बहती जाती झेलम...हाथ बढाओ तो गले लगाने को आतुर. जाने क्या था यहां के जर्रे-जर्रे में कि कब से बंधी पड़ी मन की गिरहें अचानक खुलने को व्याकुल...मानो सब झेलम में बह जाना चाहती हों...चिनारों के साये से लिपट जाना चाहती हों. सचमुच यात्राओं से बड़ा कोई सुख नहीं, प्रकति से बड़ा कोई गुरू नहीं और संगीत से बडा कोई मरहम नहीं.
चिनारों के जंगलों पर चढते हुए सांस फूलने को हो आई. कायदा तो यही था कि मुझे भी रनदीप के साथ झेलम के किनारों पर निकल जाना चाहिए लेकिन मैंने जुबेर और प्रदीप जी का हाथ थामा और चढ़ाई पर पांव रख दिया. पहंुची तो लगा कि अच्छा किया. जैसे एक के बाद एक जादुई करिशमे छुपे हों यहां. पलक झपकते ही सीन चेंज और आप अवाक...ये तो पहले वाले से भी सुंदर...न...न...कोई कम्पैरिजन नहीं. सामने खड़ा हिमालय...बर्फ से ढंका हुआ. इतना करीब....दूर तक फैला बर्फ का मैदान और चमकते पहाड़. मंत्रमुग्ध करता दृश्य. खामोशी की संगत पर कुदरत का यह राग दिल के हर कोने में पसर गया था. हमें अपनी सुध ही नहीं थी. इतनी भी नहीं कि इन लम्हों को कैमरे में कैद भी करना है. इस सुंदर राग में खुद को पैबस्त करके तस्वीरें खिंचवाना या खींचना जैसे राग को तोड़ना हो...बस कि आंखों में भर लें सारे दश्य. आज वो सारे बोर्ड याद आये जो मंदिरों में लगे होते हैं कि तस्वीरें खींचना मना है. दरअसल, जब आप किसी दृश्य में विलीन होते हैं तो तस्वीर खींचने का ख्याल ही कहां होता है. यह विलीन होना ही तो महत्वपूर्ण है. फिर भी चलते-चलते कुछ तस्वीरें जुबेर ने खींची जरूर. हालांकि तस्वीर में उस खूबसूरत मंजर का एक प्रतिशत भी नहीं आ सकता. दुनिया का कोई फोटोग्राफर नहीं उतार सकता उन धड़कते हुए लम्हों को अपने कैमरे में...
न चाहते हुए भी आखिर लौटना ही था. लौटना ही होता है हर सफर से...ओह...यानी कोई कहीं नहीं जाता. जाना या आना सिर्फ वहम है...भ्रम है. क्योंकि लौट ही आता है हर कोई सफर से...जीवन के सफर से भी तो...डूबते हुए सूरज का पीछा करते हुए झेलम को निहारते हुए दिल इतना भारी था जैसे प्रेमी से आखिरी मुलाकात का मौका हो...
कशमीर यात्रा का यह ऐसा दिन था, ऐसा पड़ाव जिसका असर तां-उम्र रहेगा. सारी रात झेलम आंखों में लहराती रही. बाहर पेड़ो से चिनार के पत्ते झर रहे थे और भीतर मन...तो क्या ये कुछ नया उगने की आहट थी...इस सवाल का जवाब सिर्फ वक्त के पास है यही सोचकर लिहाफ में बची-खुची रात समेट दी.
जारी...
(जनसत्ता में प्रकाशित )

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रकृति सदा ही शीर्ष रही है, मन में अपनी..

jyoti nishant said...

दरअसल, जब आप किसी दृश्य में विलीन होते हैं तो तस्वीर खींचने का ख्याल ही कहां होता है. यह विलीन होना ही तो महत्वपूर्ण है......