Friday, October 5, 2012

कर्ज़ अल्फाजों का, शुक्रिया दोस्तों का


कलम पकड़ती, तो न जाने कितनी देर तक उसे ताकती ही जाती. आंखों में जो दृश्य थे वो एहसास बनकर रगों में दौड़ते फिरते थे. एक दृष्य कई-कई रंगों में, कई-कई अहसासों में मंडराता. लिखने को शब्द नहीं. कागज कोरा का कोरा...क्या लिखें, कैसे लिखें और उससे भी बड़ा प्रश्न कि क्यों लिखें...? रात की सियाही जैसे-जैसे आसमान पर छलकती जाती न लिखने की पीड़ा गहराती जाती. 


न लिखने की...? अम्म्म्म्....नहीं, न लिखने की नहीं, न लिख पाने की. कागज पर कुछ अगड़म-बगड़म से शब्द गिर पड़ते तो चैन आता. सवेरे उस कागज को चिंदी-चिंदी करके हवा में उछाल देना और शुक्रिया अदा करना अक्षरों का जिनसे खुद को खाली किया. इसी बीच रिल्के के कुछ खत हाथ लगे. उन्होंने काप्पुस को लिखा, अगर तुम लिखे बगैर जी नहीं सकते तो लिखो...तब ही लिखो

लिखने को लेकर कभी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही, बस कि यह एक मजबूरी सा शामिल रहा जीवन में. जिसके न होने से होने तक का सफर एक तकलीफ का सफर ही रहा. लिखना कोई लग्जरी नहीं, युद्ध है अपने भीतर का. इस युद्ध में लेखक की बस हार ही होती है. हां, उसके पाठकों को जरूर कुछ हासिल होता है. पाठकों का हासिल कभी-कभार लेखक के जख्मों पर मरहम लगाता है.

इसी बीच प्रोफेशनल राइटिंग की राह मिली. पेशा चुन लिया पत्रकारिता का. यहां दिल-विल की सुननी ही नहीं थी. बस आंखों देखी लिखनी थी. सच देखना, उसकी पड़ताल करना और वही लिखना. लेकिन कोई बताये कि बिना संवेदना के कुछ भी लिखना संभव है क्या. हर घटना पहले दिल पर नक्श होती है, फिर लफ्जों में उतरती है. इसी के चलते पत्रकारिता भी दुश्वार ही रही. 

हर लेखक अपने मौन में रहता है. उसका एकान्त उसकी पूंजी होता है. पत्रकारिता आपको न मौन रहने की गुंजाइश देती है, न एकान्त. कभी लेखक पत्रकार से कहता मैं भी हूं. कभी पत्रकार लेखक को डपट देता, तुम्हारी जरूरत ही नहीं. इसी युद्ध में बारह बरस गुजर गये. अनुभवों के न जाने कितने गांव देखे, अहसासों की न जाने कितनी रणभूमि पर अक्षरों के युद्ध लड़े. इस युद्ध में कभी लेखक जीतता, कभी पत्रकार. कभी-कभी दोनों एक साथ हो लेते और संभाल लेते एक-दूसरे को. लेकिन यकीन मानिए इस खेल में मैं हमेशा ही हारी. मुझे कविताओं ने पनाह दी. वो कविताएं जिन्हें कविता कह पाने का साहस कभी हुआ ही नहीं. एक संकोच घेरे रहा कि क्या ये कविता है? वो संकोच अब भी अपने हर लिखे को लेकर कायम है. ये लिखते वक्त एक मित्र की बात याद आती है कि विनम्रता भी एक किस्म का अहंकार है. फिर भी इस संकोच से नहीं निकल पाती. 

तो लिखना एक किस्म की तकलीफ है, जिससे उम्मीद का जन्म होता है. लेखक चाहे तो अपने पाठकों का आसमान बड़ा कर सकता है....लेकिन ये जिम्मेदारी बहुत बड़ी है. लेखक होना....बहुत बड़ी बात है अगर कोई आपके लिखे को मान दे तो उसे पलकों पर उठाना चाहिए.

यह पलकों पर उठाना ही था कि जब मुझे अपने साथियों के साथ लेखन कार्यशाला हेतु उधमसिंह नगर जाना था तो संकोच को पीछे धकेल ही दिया और अपने गुरुओं का देय चुकाने चल पड़ी. सिखाने नहीं, सीखने. सामने वही सवाल थे जो हर रोज मेरे सामने होते हैं, तब से जब से होश संभाला. हर बार लिखने से पहले वही बात कि कहां से शुरू किया जाए लिखना. कैसे आगे बढ़ें और किस तरह पाठकों का हाथ पकड़ लें. भाषा, शैली, विन्यास, लिखने को लेकर संकोच सब कुछ तो वैसा का वैसा ही. ऐसा लगा कि सवाल भी मेरे ही हैं और जवाब भी मुझे ही देने हैं. अपने गुरू का स्मरण करते हुए उन्हें ही सामने कर देती हूं. कितनी बार झगड़ी हूं मैं रिल्के से भी कि जब काप्पुस के सवालों के जवाब दिए तो मेरे क्यों नहीं. मैं काप्पुस से कम योग्य तो नहीं. वो फिर मुस्कुराते हैं, अगर अब तक के गुजरे अवसाद से बड़ा अवसाद गुजर रहा है तो समझ लो जीवन ने तुम्हें बिसारा नहीं है...हां, हां, समझ गई मैं...गुस्से से भर उठती हूं. बचपन से अब तक सैकड़ों बार पढ़ चुकी हूं ये लाइनें. बहुत अवसाद मिल गया. अब जरा ये भी बताइये कि रखूं कहां इसे....वो चुप ही रहते हैं. जवाब आता है 'लिखने में.' जवाब कहां से आता है. रिल्के तो खामोश थे. मैं भी चुप थी. फिर कौन बोला? 

पता नहीं. बस इतना पता है कि हर अनुभव का दर्ज होते जाना जरूरी है. न जाने आने वाले वक्त में कौन सा अनुभव रोशनी बनकर किसी को राह दिखा रहा हो. अच्छा, बुरा, सही, गलत लिखने में कुछ नहीं होता. बस कि दिल से महसूस करना और उस महसूस किये को अक्षरों में शरण देना. आखिर सदियों पहले के वक्त को हमने अक्षरों से ही तो जाना है. अपने सवालों को तराशते हुए, अपने ही सवालों में बार-बार उलझते हुए, सुलझते हुए बस कुछ दर्ज करते जाना...यही तो है लिखना. संकोच...यही तो बचाता है हमारे भीतर हमारा होना...उधमसिंहनगर के सभी साथियों की शुक्रगुजार हूं जिन्होंने अपने सवालों के योग्य मुझे चुना. एक उम्मीद जागती है कि अपने भीतर के सवालों को बाहर निकालने के बाद भीतर जो जगह बनी होगी, उसमें लिखने की संभावनाओं ने जरूर जन्म लिया होगा. आमीन!

4 comments:

वन्दना said...

लेखन की इस समस्या से हम सभी जूझते हैं मगर लिख रहे हैं अब इतिहास बने या नहीं मगर लिखना हमारी मजबूरी है जैसे जीने को सांस जरूरी है।

प्रवीण पाण्डेय said...

मन में कितना कुछ है, बहे तो प्रवाह है, न बहे तो कुछ नहीं।

डिम्पल मल्होत्रा said...

लिखने बैठी हूँ..देर तक बिना कुछ सोचे बैठी रहती हूँ..
किसी और दुनिया से लौटती हूँ..
डायरी है..एक पेंसिल...इरेज़र जाने क्यों २ है...
यानि लिखने से ज्यादा मिटने का सामान है...:(

Anand Dwivedi said...

अगर तुम लिखे बगैर जी नहीं सकते तो लिखो...तब ही लिखो...

बहुत खुश नसीब हूँ मैं कि आप हो ..और जब आप हो तो कुछ क्यों न कुछ आपसे ले लिया जाए ये शार्टकट नहीं है मौसी ..आग़ में तो खुद ही जलना होगा मगर आपके रहते मार्गदर्शन जैसी शब्द बनावट के लिये कहीं भटकना नहीं पड़ेगा

इस लेख का एक एक शब्द उपयोगी है मेरे लिये ये अप बखूबी जानते हो !