Thursday, July 12, 2012

कितना कम जानते हैं हम ज़िंदगी को...



'बच्चों की आवाज व अनुभवों को कक्षा में अभिव्यक्ति नहीं मिलती. प्रायः केवल शिक्षक का स्वर ही सुनाई देता है. बच्चे केवल अध्यापक के सवालों का जवाब देने के लिए या अध्यापक के शब्दों को दोहराने के लिए ही बोलते हैं. कक्षा में वे शायद ही कभी स्वयं कुछ करके देख पाते हैं. उन्हें पहल करने के अवसर भी नहीं मिलते हैं. किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास की बजाय पाठ्यचर्चा बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि वे अपनी आवाज ढूंढ सकें....'

एनसीएफ यानी राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा 2005 के दूसरे अध्याय के दूसरे पन्ने के चौथे पैराग्राफ की इन लाइनों को पढ़ते हुए यहीं पर ठहर जाती हूं. बच्चों को इतना सक्षम बनाएं कि वे अपनी आवाज ढूंढ सकें... कौन बनायेगा बच्चों को इतना सक्षम...हम में से कितनों ने सुनी है अपनी आवाज. अपनी आवाज सुनने के मानी भी समझते हैं क्या हम. सैकड़ों बरस पहले गौतम बुद्ध ने सुनी थी...

आवाज़ क्या है. बोले हुए को सुनना या इससे आगे कुछ. दरअसल, हम बोले हुए को  आवाज़ समझने के आदी हैं. बोले हुए के कानों में जाने को सुनना कह देते हैं और ठीक उसी जगह न जाने कितने सारे मानी गिरकर खो जाते हैं. हम किसी भाषा के कुछ वाक्यों को उठा लाते हैं. उन वाक्यों में उलझ जाते हैं. वाक्यों से लाड़ लगा बैठते हैं या फिर झगड़ा कर बैठते हैं. तुमने ये कहा था, तुमने वो कहा था...तुमने ऐसा क्यों कहा, मैंने तो ये नहीं कहा था. तीस-पैंतीस, पचास-साठ, कभी कभी इससे भी ज्यादा की उम्र निकल जाती है बोले हुए वाक्यों से उलझते हुए. कभी इन वाक्यों में हाथ फंसता है, कभी पांव. कभी तो गर्दन ही उलझ जाती है और दम घुटने लगता है. अगर वाक्यों की तरफ हाथ बढ़ाने से पहले मानी की तरफ हाथ बढ़ाया होता तो शायद वो लम्हा महक ही उठता और उस महकते हुए लम्हे में पूरी उम्र ही बीत जाती.

सुबह ही फोन पर एक लड़की की टूटी, बिखरी आवाज को समेटते हुए सोच रही थी कि वो खुद क्यों नहीं सुन रही अपनी आवाज. छह महीने पहले प्रेम विवाह किया था. अब लगता है कि लड़का तो उसे प्रेम ही नहीं करता. क्या पता कि लड़के को भी यही लगता हो. सवाल प्रेम का नहीं उन बातों का है, जिन्होंने आवाज बनकर एक-दूसरे को छला था. वो फेसबुक के संदेशों में अपनी आवाजें भरकर भेजते, मोबाइल के मैसेजेस में भी और कभी-कभी कॉल बटन के जरिये अपनी आवाज़  में भी खुद को भरकर एक-दूसरे को भेजते. लगता कि जिंदगी उन्हीं संदेशों में है कहीं, उसी आवाज़ में. वो मोबाइल कंपनियां बदलते हैं और फ्री टॉक वाउचर को साक्षी मानकर अपनी आवाजों को ब्याह देते हैं. फिर खुद को भी ब्याह देते हैं. पर छद्म आवाजें जिंदगी की आंच में पिघलने लगती हैं. संदेशों में रह जाते हैं सिर्फ वाक्य रूमानियत उड़ जाती है सारी. इस तरह रिश्तों के दरकने की शुरूआत होती है और इल्ज़ाम आता है आवाज़ के सर.

उस लडकी से पूछना चाहती हूं कि अपने चेहरे पर उसकी आवाज को कभी उगते देखा था क्या. कभी त्वचा पर रेंगते हुए आंखों तक जाती आवाज को छुआ था. दिन में कई बार आंखों की चौखट छूकर लौटी थी क्या कोई आवाज़... कुरान की आयतों सी पाकीज़ा आवाजों को मैंने अक्सर आंखों से बहते हुए देखा है. सुना नहीं कभी. उसने जो सुना था वो क्या रहा होगा...

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ओह....कहां से कहां आ पहुंचती हूं मैं भी...एनसीएफ का वो पन्ना फड़फड़ाकर एक ध्वनि बनता है...आवाज़. अपनी ओर ध्यान खींचता है. मैं गर्दन झटकती हूं, लौटती हूं एनसीएफ की ओर.... किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास की बजाय पाठ्यचर्चा बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि बच्चे अपनी आवाज ढूंढ सकें....हम्म्म्म्म..!

कितना कम जानते हैं हम ज़िंदगी को...

12 comments:

संगीता पुरी said...

किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास की बजाय पाठ्यचर्चा बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि बच्चे अपनी आवाज ढूंढ सकें....हम्म्म्म्म..!
आने वाली पीढी को अधिक सक्षम बनाने के लिए हमें अपने अनुभवों के साथ साथ उन्‍हें भी प्रयोग के अवसर देना चाहिए !!

अशब्द said...

बहुत सुन्दर.

संध्या शर्मा said...

जिंदगी को पूरी तरह से जानना तो हमारे बस में नहीं लेकिन उम्र के साथ बढ़ते अनुभव द्वारा आने वाली पीढ़ी को सचेत किया जा सकता है

poonam said...

उस लडकी से पूछना चाहती हूं कि अपने चेहरे पर उसकी आवाज को कभी उगते देखा था क्या. कभी त्वचा पर रेंगते हुए आंखों तक जाती आवाज को छुआ था. दिन में कई बार आंखों की चौखट छूकर लौटी थी क्या कोई आवाज़... कुरान की आयतों सी पाकीज़ा आवाजों को मैंने अक्सर आंखों से बहते हुए देखा है. सुना नहीं कभी. उसने जो सुना था वो क्या रहा होगा..ufff kya kha hae

devyani said...

Pratibh aap behad khoobsoorat likhatee hain... aapko bahut badhai

सदा said...

बिल्‍कुल सच ... संध्‍या जी की बात से सहमत हूँ

प्रवीण पाण्डेय said...

औरों के सहारे निर्मित होती जिन्दगी, स्वयं को न समझने की सहूलियत में बीती जाती जिन्दगी।

jyoti nishant said...

awazon ke bazaron main .....

दीपक की बातें said...

लोग तो बच्चों से अपनी बातें मनवा कर ही खुद को बड़ा समझ लेते हैं

सुखदरशन सेखों said...

हमारे अनुभव आने वाली नस्लों से साझा करने का वक़्त हमी को निकलना पड़ेगा |

Anita mishra dubey said...

hey pratibha was searching u on Face book n i found u too bt was unable to connect wid u as u hve nt left any scope of communication there ;) i mean i cn nt message u nor i can add u as frnd .so jst checked dis incormation on ur facebook page n clicked on it n dats how i manged to see u.yet have to read ur blogs.will do dat in 'fursat'.hope u remember me v were together in AGDC.if want to connect wid me u cn search me on facebook by "Anita Mishra Dubey."nice to c u after so many years :)

Anand Dwivedi said...

मौसी डेढ़ महीने बाद आया हूँ ... तो देखा कि हमेशा की तरह आपको सब पहले से ही पता होता है ..एक शब्द भी बिना बताए ...देखो ना ऐसा ही तो है ..

वो फेसबुक के संदेशों में अपनी आवाजें भरकर भेजते, मोबाइल के मैसेजेस में भी और कभी-कभी कॉल बटन के जरिये अपनी आवाज़ में भी खुद को भरकर एक-दूसरे को भेजते. लगता कि जिंदगी उन्हीं संदेशों में है कहीं, उसी आवाज़ में. वो मोबाइल कंपनियां बदलते हैं और फ्री टॉक वाउचर को साक्षी मानकर अपनी आवाजों को ब्याह देते हैं. फिर खुद को भी ब्याह देते हैं. पर छद्म आवाजें जिंदगी की आंच में पिघलने लगती हैं. संदेशों में रह जाते हैं सिर्फ वाक्य रूमानियत उड़ जाती है सारी.