Friday, December 14, 2012

बेसलीका ही रहे तुम


तुम्हें जल्दी थी जाने की
हमेशा की तरह
वैसी ही जैसे आने के वक्त थी

बिना कोई दस्तक दिए
किसी की इजाजत का इंतजार किये
बस मुंह उठाये चले आये
धड़धड़ाते हुए
चंद सिगरेटों का धुंआ कमरे में फेंका


मौसम के गुच्छे
उठाकर टेबल पर रख दिए
थोड़ा सा मौन लटका दिया उस नन्ही सी कील पर
जिस पर पहले कैलेंडर हुआ करता था

फिर एक दिन उठे और
बिना कुछ कहे ही चले गये
जैसे कुछ भूला हुआ काम याद आ गया हो
न..., कोई वापसी का वादा नहीं छोड़ा तुमने
लेकिन बहुत कुछ भूल गये तुम जाते वक्त
तुम भूल गये ले जाना अपना हैट
जिसे तुम अक्सर हाथ में पकड़ते थे

लाइटर जिसे तुम यहां-वहां रखकर
ढूंढते फिरते थे
लैपटाप का चार्जर,
अधखुली वार एंड पीस,
तुम भूल गये दोस्तोवस्की के अधूरे किस्से
खिड़की के बाहर झांकते हुए
गहरी लंबी छोड़ी हुई सांस

तुम समेटना भूल गये
अपनी खुशबू
अपना अहसास जिसे घर के हर कोने में बिखरा दिया था तुमने

टेबल पर तुम्हारा अधलिखा नोट
तुम ले जाना भूल गये अपनी कलाई घड़ी
जिसकी सुइयों में एक लम्हा भी मेरे नाम का दर्ज नहीं
आज सफाई करते हुए पाया मैंने कि
तुम तो अपना होना भी यहीं भूल गये हो
अपना दिल भी
अपनी जुंबिश भी
अपना शोर भी, अपनी तन्हाई भी
अपनी नाराजगी भी, अपना प्रेम भी

सचमुच बेसलीका ही रहे तुम
न ठीक से आना ही आया तुम्हें
न जाना ही...

Tuesday, December 11, 2012

जीवन यात्रा को विराम कब मिलेगा?

10 नवंबर-
पूरा दिन जैसे सर्रर्रर्र से बीत गया हो. पूरे हफ्ते की मेहनत का रंग आज दिखा. एक सेमिनार होना था जो खूब अच्छा हो गया. कैम्पस में लोगों से बात करते हुए कितनी पर्तें खुलीं. यूं पहले भी पूरा मुंह आंचल में ढंके दौड़ती भागती औरतों ने मुझे पहले दिन से आकर्षित किया था. मैं अपने पत्रकार को आजकल सुला के रखती हूं. फिर भी वो बीच-बीच में आँखें खोलता ही रहता है. बच्चियां पूरे उत्साह से बात करती हैं. फौजिया, हिना, महताब, गुल...मैं उन्हें अपनी एक और दोस्त फौजिया के बारे में बताती हूं तो वे शिकायत करती हैं कि यानी आपको बस फौजिया ही याद रहेगी. लड़कियां भले ही पर्दे में हों लेकिन उनके जेहन में पर्दा हरगिज नहीं था. उन्हें सब पता है दुनियादारी. ओबामा को क्यों मीडिया इतना कवरेज देता है इरोम शर्मिला को क्यों नहीं....वो सवाल उछालती हैं. हम क्या नहीं जानते इन सवालों का जवाब. हमें सब पता है कि सियासत कब, कहां, कैसे इंसानियत का सीना छलनी करती है और कैसे बाजार खबरें बनाता है.

मैं मुस्कुराती हूं. सुन लो दुनियावालों, तहरीर चौक जल्द ही गली-गली में नजर आयेंगे. मन ही मन सोचती हूं.
ये आखिरी दिन था श्रीनगर में. इस दिन के हिस्से बड़े काम थे. बचे हुए श्रीनगर को घूमना भी, शापिंग भी और वापसी की तैयारी भी. जाने वक्त को पता चल गई हमारी मुश्किल कि प्रदीप जी की प्लानिंग काम आई दिन मानो फैलकर दोगुना हो गया. हालांकि इसमें हमारा लंच न करने का इरादा भी काम आया.

शालीमार गार्डन, मुगल गार्डन, चश्माशाही, निशात गार्डन, परी महल...जर्रर्रर्र से घूम लिये. मानो किसी ने पकड़कर गोल गोल घुमा दिया हो. हालांकि जिस जगह का जर्रा-जर्रा खुदा ने खुद संवारा हो वहां अलग से किसी गार्डन में जाना क्या और न जाना क्या...फिर भी... इन सारे गार्डन के लिए जाने के लिए हमें डल झील के किनारों पर ही दौड़ना था और ये बेहद खूबसूरत बात थी.

रात आई तो बाजारों का रुख किया गया. बाजारों को हमने अपनी जेबों में यथासंभव ठूंसा और लौटे अपने ठीहों पर. ये आखिरी रात थी. हम देर तक बैठे रहे. रनदीप का दिल आ गया था श्रीनगर पर. वो यहीं छूट जाना चाहती थी. उसकी आंखें छलक रही थीं. हमें वापस क्यों जाना है....क्योंकि वापस फिर आना है. और उसी रात ये तय हुआ कि हम फिर आयेंगे...
इसी वादे को सिरहाने रख हम सोने गये तो घर वापसी की स्वप्निल रजाई ने हमें ढांक लिया.
11 नवंबर-
आज आखिरी दिन था. मलिक साब मिलने आये थे. नाश्ता करते हुए उनकी और अनंत जी की बातचीत को सुनते हुए मैं पराठा कुतर रही थी. मलिक साब ने हमारी काफी मदद की थी. बड़े खुश मिजाज इंसान हैं वो. उनसे पहली मुलाकात देहरादून में ही हुई थी. उन्होंने एजूकेशन सेक्टर में काफी काम किया है. वो भी अलग ढंग का काम. शिक्षा के भारतीय दर्शन पर काम किया है. उनसे मिलकर अच्छा ही लगता है हमेशा.
एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच का लंबा सिलसिला था. एक खूबसूरत जगह जहां प्यार के फूल खिलते हों कैसे छावनी में तब्दील हो गया है. न जाने किसकी काली नजर लग गई? क्यों बंदूकों का सीना कांप नहीं गया, क्यों उनके सीने से गोलियों की जगह फूल नहीं बरस उठे...

श्रीनगर एयरपोर्ट पर मैं अपने साथियों से बिछड़ गई. मेरे हिस्से में आया था एयरपोर्ट पर इंतजार. करीब तीन घंटे अपने सामान से मुक्त होकर काॅफी पीते हुए, निर्मल को पढ़ते हुए अजनबी चेहरों को देखते हुए बिताना...जाने क्यों हमेशा से अच्छा लगता रहा है. इतने रिलेक्स होकर मैंने किसी को भी रेलवे स्टेशन पर इंतजार करते हुए नहीं देखा.
मैंने तीसरा काफी का प्याला लेते हुए खुद से वादा किया नो मोर काफी प्रतिभा...लेकिन दिल्ली पहुंचते-पहुंचते दो काफी और हो ही गई. कभी-कभी नियम तोड़ने में हर्ज ही क्या है.
दिल्ली पहुंचते ही दुनिया बदल गई. लदे हुए कपड़े हमें एलियन बना रहे थे. यहां सर्दी बस छू रही थी. मेरे पास वक्त भी नहीं, सुविधा भी नहीं कि दूसरी फ्लाइट का टाइम हो रहा था. लगभग भागते हुए मैंने अपनी फ्लाइट पकड़ी। फिर वही काफी, वही सैंडविच वही, निर्देश बस इस बार बदलाव इतना था कि मैं लखनऊ जा रही थी. चंद घंटों में बिटिया के पास....
अमौसी एयरपोर्ट पर उतरते ही किसी अपनेपन की खुशबू में भीग गई. धनतेरस की रात सजे हुए शहर को देखते हुए घर पहुंचना...मेरा लड्डू...(मेरी बिटिया) दरवाजे पर खड़ी मिली...
यात्रा को एक सुंदर विराम मिला...जीवन यात्रा को विराम कब मिलेगा?

Monday, December 10, 2012

डल झील- जैसे महबूब को जी भर के देखना


9 नवंबर

सूरज की हथेली पर मानो किसी ने बर्फ का ढेला रख दिया हो. ठंडी सी गर्माहट थी उसके आने में. हमारे यहां आने के मकसद को बस अंतिम अंजाम मिलना बाकी था. काम बेहतर हो जाए तो उस संतुष्टि के साथ महसूस करने की क्षमता बढ़ जाती है. नौ नवम्बर का दिन दस तारीख के कार्यक्रम की तैयारियों को अंजाम देने के लिए था. सारा दिन कालेज, यूनिवर्सिटी के चक्कर लगाने के बाद...हजरत बल और फिर...डल झील.

इतने दिन से हम डल झील के करीब थे लेकिन आज यहां जाना हुआ. सच ही है जो करीब होता है अक्सर उसी के पास हम सबसे देर में जा पाते हैं.

पानी से मुझे कितनी मोहब्बत है यह माधवी जानती है. नदी, पोखर, समंदर, झील देखते ही पहला ख्याल आता है कूद जाऊं? तैरना जानबूझकर नहीं सीखा। हाँ, पार जाना ज़रूर सीखा है. मेरे दोस्तों को अब पता है मेरा पागलपन सो पहले से हजार नसीहतें हाथ थामे थीं. कुछ पूरे समय हाथ थामे बैठी भी रहीं, कुछ फोन पे टिमटिमाती रहीं।मैंने झील के ठीक मध्य में कहवा पीने के बाद खुद को खुद से विलग किया. नजर की आखिरी हद तक पानी ही पानी और चारों ओर खूबसूरत पहाडि़यां. रास्ता रोकती पहाडि़यां नहीं, रास्ता देती हुई. हमारा नाविक हमें बता रहा था कि कहां किस फिल्म की शूटिंग हुई, कहां की क्या खासियत है. समूची डल किसी दुल्हन सी सजी थी. झील के बीच में कोई नाव आपकी नाव के करीब आ लगेगी और आपको शापिंग कराने ले जायेगी. चाय भी पिला देगी. ये पानी में तैरता एक शहर है. बाजार पानी में. खेत पानी में. जिंदगी में, पानी में. पांव रखने को जमीन तलाशने पर नाव ही मिलेगी...अरे हां, वही शिकारा...हाउसबोट कुछ भी कह लो यार. शापिंग में मेरी दिलचस्पी कभी रही ही नहीं लेकिन सामान बेचने वालों को गौर से देखती हूं. हमारा नाविक डल झील की खासियत बता रहा था...दूर कहीं सूरज झील के भीतर उतरने को बेताब था.

 ऐसी खूबसूरतें शामें जिंदगी में कम ही आती हैं. ये लम्हे चुपके से स्मतियों में दर्ज होते जा रहे थे. कैमरे की क्लिक में समेटते हुए झील के पानी को छूने का जी चाहा...'इसकी गहराई कितनी होगी?' अनायास पूछ बैठी थी. 'तुम्हारे मन से कम...' किसी ने हंस के कहा...तो फिर डूबने से क्या फायदा...डूबना कैंसिल...हम सब हंस दिये.
दो-ढाई घंटे का वो सफर कहने को बीत चुका था लेकिन सच तो यह है कि बीतता कुछ भी नहीं.
लैया चना खाते हुए झील को आंख भर देखना जैसे महबूब को जी भर के देखना...

Monday, December 3, 2012

खामोशी की संगत पर कुदरत का राग


8 नवंबर

अनंतनाग के रास्ते केसर के खेतों से होकर गुजरते थे. जिस समय केसर फूलती होगी यहां नीले रंग की फूलों की कैसी कतारें सजती होंगी हम बस सोच ही पा रहे थे. क्यारियों की तरह कटे हुए केसर के खेत. तो यहीं से उठती है वो खुशबू जो सारी दुनिया का चक्कर लगाते हुए राजस्थान के 'केसरिया बालम' पर जाकर ठहरती है. अखरोट, सेब के बागान और केसर के खेत देखते हुए डेढ़ घंटे का रास्ता मानो मिनटों में कट गया. आज के लिए विशेष संगीत चुना गया था. बीती रात हीर सुनते हुए हमारी आंखें भीगी थीं आज के लिए हमने अपने मन की उदासियों को हीर के बहाने रेशमा आपा की आवाज को सौंप दिया था. हालांकि अनंतनाग के रास्ते में नुसरत साब की आवाज के साये में बैठे रहे...रास्तों से खेलते रहे. कशमीर यूनिवर्सिटी का एक कैम्पस ये भी है...सुंदर, विशाल.
आनन-फानन हमारी ढेर सारे लोगों से मुलाकात हुई. बात हुई. काम के अच्छे ढंग से निपट जाने के उत्साह लबरेज हम वापस लौटे तो रास्ते और भी खिले-खिले से लगे. एक जगह ठहरे। पूरे अनंतनाग को एक दृश्य के रूप में आखों में समेटा और रुख किया पहलगाम की ओर.
पता नहीं पहलगाम को टूरिज्म के नक़्शे में किन चीजों के लिए दर्ज किया गया है लेकिन मुझे इन रास्तों पर चलते हुए जो महसूस हुआ उसे कह पाना, लिख पाना नितांत असंभव है. मेरी यात्राओं में कभी धार्मिक वजह शामिल नहीं होती वरना लोग यही कहते कि वो पहलगाम जहाँ से शिव जी ने पार्वती जी के साथ एकांतवास को अमरनाथ की गुफाओं में प्रस्थान करने से पहले अपने प्रिय नंदी का त्याग किया वहां जाना सुखद तो लगना ही था. मैंने किसी मंदिर का विचरण नहीं किया. अगर धर्म इतनी बड़ी वजह है शांति की तो सचमुच समूची कुदरत से बड़ा मंदिर कोई नहीं. रास्ते हमारी आत्मा की अशांति को खुरचते रहे. रास्ते भर झेलम कंधे सहलाती रही...सारे रास्ते हम अपने भीतर डूबते रहे, उतराते रहे...क्या ऐसे ही वक्त में सुनने के लिए रेशमा आपा ने अपनी आवाज में गाया होगा मेरे हमजोलियां कुछ यहां, कुछ वहां....
तां उम्र काबिज रहेंगी इस सफर की स्मतियां. वक्त कम ही सही लेकिन जिंदगी को मांजने को काफी था...झेलम तीरे घंटों बैठने का ख्वाब अब ख्वाब नहीं था....दूर तक पसरा गहन सन्नाटा, खामोश चिनार, बिना आवाज किये बहती जाती झेलम...हाथ बढाओ तो गले लगाने को आतुर. जाने क्या था यहां के जर्रे-जर्रे में कि कब से बंधी पड़ी मन की गिरहें अचानक खुलने को व्याकुल...मानो सब झेलम में बह जाना चाहती हों...चिनारों के साये से लिपट जाना चाहती हों. सचमुच यात्राओं से बड़ा कोई सुख नहीं, प्रकति से बड़ा कोई गुरू नहीं और संगीत से बडा कोई मरहम नहीं.
चिनारों के जंगलों पर चढते हुए सांस फूलने को हो आई. कायदा तो यही था कि मुझे भी रनदीप के साथ झेलम के किनारों पर निकल जाना चाहिए लेकिन मैंने जुबेर और प्रदीप जी का हाथ थामा और चढ़ाई पर पांव रख दिया. पहंुची तो लगा कि अच्छा किया. जैसे एक के बाद एक जादुई करिशमे छुपे हों यहां. पलक झपकते ही सीन चेंज और आप अवाक...ये तो पहले वाले से भी सुंदर...न...न...कोई कम्पैरिजन नहीं. सामने खड़ा हिमालय...बर्फ से ढंका हुआ. इतना करीब....दूर तक फैला बर्फ का मैदान और चमकते पहाड़. मंत्रमुग्ध करता दृश्य. खामोशी की संगत पर कुदरत का यह राग दिल के हर कोने में पसर गया था. हमें अपनी सुध ही नहीं थी. इतनी भी नहीं कि इन लम्हों को कैमरे में कैद भी करना है. इस सुंदर राग में खुद को पैबस्त करके तस्वीरें खिंचवाना या खींचना जैसे राग को तोड़ना हो...बस कि आंखों में भर लें सारे दश्य. आज वो सारे बोर्ड याद आये जो मंदिरों में लगे होते हैं कि तस्वीरें खींचना मना है. दरअसल, जब आप किसी दृश्य में विलीन होते हैं तो तस्वीर खींचने का ख्याल ही कहां होता है. यह विलीन होना ही तो महत्वपूर्ण है. फिर भी चलते-चलते कुछ तस्वीरें जुबेर ने खींची जरूर. हालांकि तस्वीर में उस खूबसूरत मंजर का एक प्रतिशत भी नहीं आ सकता. दुनिया का कोई फोटोग्राफर नहीं उतार सकता उन धड़कते हुए लम्हों को अपने कैमरे में...
न चाहते हुए भी आखिर लौटना ही था. लौटना ही होता है हर सफर से...ओह...यानी कोई कहीं नहीं जाता. जाना या आना सिर्फ वहम है...भ्रम है. क्योंकि लौट ही आता है हर कोई सफर से...जीवन के सफर से भी तो...डूबते हुए सूरज का पीछा करते हुए झेलम को निहारते हुए दिल इतना भारी था जैसे प्रेमी से आखिरी मुलाकात का मौका हो...
कशमीर यात्रा का यह ऐसा दिन था, ऐसा पड़ाव जिसका असर तां-उम्र रहेगा. सारी रात झेलम आंखों में लहराती रही. बाहर पेड़ो से चिनार के पत्ते झर रहे थे और भीतर मन...तो क्या ये कुछ नया उगने की आहट थी...इस सवाल का जवाब सिर्फ वक्त के पास है यही सोचकर लिहाफ में बची-खुची रात समेट दी.
जारी...
(जनसत्ता में प्रकाशित )

Sunday, December 2, 2012

धूप का उबटन और भागते दिन...


7 नवंबर

हथेलियों पर सूरज को उगाने का अपना मजा है. बीता दिन इतना दौड़ भाग भरा रहा कि सिरहाने ढेर सारी स्म्रतियों के साथ एक कुंटल थकान भी छोड़ गया. थकान के समंदर में गोता लगाते हुए यह सुकून भी था कि सूरज हथेलियों में है. जब हम चाहेंगे तब सुबह होगी. सारी रात मुट्ठियों में सूरज लिये हम सोते रहे और उठे तो माथे पर धूप का उबटन लगा था. गुनगुनी धूप हौले-हौले पलकों को सहला रही थी. सामने कबूतरों की मटरगशती चल रही थी. शहरों को जानने के लिए टूरिस्ट की तरह जाने की बजाय एक इनसाइडर की तरह जाना हमेशा से भला लगता रहा है. हम टूरिस्ट नहीं थे. हम यहां एक रिश्ता बनाने आये थे. लोगों से मिलने. कुछ लेने नहीं, देने भी नहीं बस कि एक जैसी सोच के लोगों का कारवां बनाने. आज कई कालेजों में लोगों से मुलाकात हुई, टीचर्स से, छात्रों से भी. सबसे ज्यादा हैरत उन्हें यह जानकर होती कि क्या कोई बिना किसी काम के सिर्फ एक काम का हिस्सा होने के नाते मिलने आ सकता है...इतनी दूर...

तहजीब, सलीका, मिठास बेहिसाब. लोग ऐसे मोहब्बत भरे कि गले लग के रो लीजिये जी भर के. हम भागते थे सारा दिन और दिन की हमसे होड़ होती थी. वो और तेजी से सरकता. जब हम थक हार के पांव पसार के बैठते...भूख को महसूस करते तब तक षाम कंधे से कंधा मिलाकर बैठ जाती...अरे...शाम कहां...शाम को छूकर निकलती हुई सी रात. दिन यहीं ठहरता था आकर. गहरी तनहाई और लंबी फुरसत.

यहां सिर्फ एक ही कमी खली अपने वेजिटेरियन होने की. हालांकि ये कमी हर जगह चुभती ही है. खासकर तब, जब बाकी लोग नान वैजेटिरयन हों. सारे दिन की भूख पर नानवेज की खुशबू काबिज होती और भूख आमतौर पर गायब ही हो जाती. दिन के कुछ फल, बिस्किट दाल और सब्जी के बीच भूख से दो-दो हाथ करना. हालांकि सारा दिन प्रदीप जी हमारे खाने का ख्याल रखते. इतना कि कभी-कभी हैरत भी होती और खुद पर गुस्सा भी आता. क्यों इतना साॅफेस्टिकेशन है खाने को लेकर. ये नहीं...वो नहीं...यहां नहीं...वहां नहीं...

आज जुबेर से मिली. जुबेर सोनमर्ग का रहने वाला है. उसने हमें ज्वाइन कर लिया है आफिशियली भी, पर्सनली भी. भोली सी सूरत वाला भला सा वो लड़का बता रहा था कि कल रात सोनमर्ग में बर्फ गिरी है...उसके कहने भर की देर थी हमने हथेलियों पर बर्फ झरती देखी...शीशे के पार का मौसम झांककर हमें देख रहा था. दोस्ती तो अब हो ही चली थी.
.......................
सारे दिन उत्साह हमारे सर पर नाचता रहता. शाम की थकान में वो भी अपना हिस्सा मांगता...रातें खिलखिलाते हुए आतीं और देर तक पास में बैठी रहतीं.
प्रदीप जी ने आज हीर सुनाई. मद्धिम रोशनी के बीच रेशमा आपा की आवाज घुल रही थी. हम कितने ज्यादा खामोश थे. कोई किसी के एकांत में दस्तक नहीं दे रहा था. साथ होते हुए भी तन्हा हुआ जा सकता है बशर्ते कि जिसके साथ आप हैं उसे तनहाई की हिफाजत करने का हुनर आता हो. आंखों का पता नहीं पर अंदर से हम सब भीगे से थे.
देर रात गये ख्याल आया कि कल सूरज हमारी मुट्ठियों में नहीं होगा...हमें उसके पीछे भागना है. सुबह अनंतनाग और पहलगाम के लिए निकलना जो था. बड़े बेमन से हमने अपने-अपने कमरों का रुख किया...हालांकि नींद ने ज्यादा नखरे नहीं दिखाये...

जारी...

Monday, November 26, 2012

जिंदगी की सलाखें बड़ी मजबूत हैं


5 नवंबर
दिन को पकड़ने को हाथ बढ़ाया तो शाम के आंचल का कोना ही हाथ लगा. वो भी जल्दी ही सरक गया...सर्द गहराती रातों को आने की बड़ी जल्दी रहती है... बड़े से विंडो ग्लास के बाहर मौसम कैसा ठहरा सा था. इत्मीनान से शाख पर रखे पत्ते मानो कोहरे की खुशबू में नहाने को बेताब हों...सिरहाने रखे चिनार के पत्तों पर नमी सी रखी है हालांकि कमरे में ओस का कोई कतरा भी नहीं.

6 नवंबर
जब हम जागे तो मुट्ठियों में सुबह छुपी हुई थी. बारामूला और गुलमर्ग...मुझे क्या याद रहा. रास्ते...रास्ते...रास्ते...पथिकों को रास्तों से प्यार न होगा तो किससे होगा. एक बार फिर खुद को रास्तों के हवाले करना. गुलमर्ग रास्ते भर पुकारता रहा 'आ जाओ... ' इतने खूबसूरत रास्ते कि इन्हीं रास्तों में रह जाने को दिल चाहे. न भूख न प्यास...ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते बर्फ से ढंकी पहाडि़यां और करीब आती जाती, खामोश जंगलों के बीच से गुजरते हुए हम सब कितने खामोश थे. हम सब...एक से धरातल पर. सबको पता है कि खामोशी के राग की तासीर कैसी होती है. मैं किसी ईश्वर को नहीं जानती लेकिन कुदरत के करीब जाते हुए महसूस कर पाती हूं उन आंसुओं की नमी को जो प्रार्थना या दुआ के वक्त ढुलक आते होंगे...' मुझे मुझसे मुक्त करो...' ऐसे ही बुदबुदा उठे थे होंठ...शायद यही मेरी प्रार्थना का ढंग है...गुलमर्ग की दिल लुभाने वाली खूबसूरती को देखते हुए अचानक सिहरन सी हुई. कोई आवाज कानों से टकराई...'अभी रिहाई का वक्त नहीं आया.' किसने कहे होंगे ये शब्द ...दूर-दूर तक तो कोई नहीं था. हां, सामने बर्फ से ढंकी चोटी के ठीक उपर चमकता सूरज पल भर को छुप गया था...सिर्फ पल भर को. जिंदगी की सलाखें बड़ी मजबूत हैं.
जारी...

Wednesday, November 21, 2012

जिंदगी की शराब में अवसाद के टुकड़े


4 नवंबर 2012

हमने देखी है चिनारों से पिघलती हुई बर्फ
उनके शाने से ढलते हुए आंचल की तरह...

एक साथी ने ये पंक्तियां पकड़ा दी थीं निकलते वक्त. यहां तक हथेलियों में बंद ये पंक्तियां अब खुलकर घुल गई थीं फिजाओं में. चिनारों की खुशबू उसके रंग, रूप से पहले पहुंच रही थी. मन के मौसम का भी अजब हाल है कि कोई भी सुकून देने वाली बात, जगह, लोग मिलते ही बरसने को बेताब होने लगता है. भीतर न जाने कितना बड़ा कुंआ है, इसे न जाने कितना दुःख चाहिए न जाने कितना सुख न जाने कितना प्यार ये भरता ही नहीं...जब भी इसमें एक टुकड़ा सुख फेंको बदले में अवसाद की प्रतिध्वनि उभरती है..औटम ...क्यों कश्मीर ने मुझे इसी सीजन में पुकारा...बड़ा बेजा सवाल था. भला मेरे लिए इससे बेहतर और कौन सा सीजन हो सकता था...झरते हुए पत्तों के बीच से निकलते हुए महसूस करती हूं अपना झरना भी. दुःख से बड़ा रोमैंन्टिसिज्म कोई नहीं. ये हौले-हौले हमारी रगों में दाखिल होता है और नशे की तरह हम इसके आदी हो जाते हैं. जिंदगी की शराब में अवसाद के कुछ टुकड़े जिंदगी का स्वाद बढ़ा देते हैं.

कश्मीर रेजिडेन्सी के कमरा नंबर 301 में सामान पटकने के बाद खिड़की के बाहर झरती शाम को देखना आईना देखना सा लगा. फिर लाल चौक की सनडे मार्केट का रुख किया. बाहर निकलते ही जो पहला चिनार का पेड़ मिला हम उसी से लिपट गये. प्रदीप जी आसपास घूमने वाली जगहों के बारे में कुछ पूछताछ करने गये, तब तक रनदीप ने चिनार के पत्तों पर धावा बोल दिया. उसकी याद कोई का तार चिनारों से जुड़ा था. मैंने उसे वादा किया कि उसकी ढेर सारी सुंदर तस्वीरें खींचूंगी चिनारों के साथ...
लाल चौक की सनडे मार्केट घूमते हुए न जाने कहां निकल गये हम. भटके हुए मुसाफिर की तरह सड़कों का आनंद उठाते हुए. छोटे-छोटे अलाव जल चुके थे. बाजारों में बहुत सी नई चीजें थीं जिनके बारे में जानने की दिलचस्पी थी. रनदीप का कैमरा चल रहा था और मेरा दिमाग... ये वही लाल चौक था जिसे कभी खौफ के साये में न्यूज़ चैंनलों ने दिखाया था।

कभी किसी ने कहा था कि भीतर की दुनिया के सवालों के जवाब बाहर की दुनिया में तलाशना एक गलत खोज है...सोचती हूं भीतर की दुनिया के सवाल गर्भ में तो न रोपे गये होंगे. फिर ये प्रक्रिया गलत कैसे हुई.

जबरन थमा दी गई मुस्कुराहटें हमेशा खाली नहीं जातीं. अपने साथियों को स्नेह से देखती हूं शुकराना नहीं कर पाती उनके होने का...उनके इतने अच्छे होने का.

कोहरे की खुशबू को जेबों में भरने के बाद हम अपने-अपने कमरों में लौट तो आये लेकिन ठहर नहीं पाये. ये समूह का सफर था तो साथ ही रहना भला लगा. प्रदीप जी के संगीत के खजाने में इतने अनमोल नगीने थे कि घड़ी के कांटों का ख्याल ही नहीं रहा...न खाने की सुध...न सोने की.

फिर भी सुबह सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी और कश्मीर यूनिवर्सिटी के लोगों से तय मुलाकात पर समय से पहुंचने की जिम्मेदारी लिए नींद की दरगाह पे सजदा किया...
जारी...

Monday, November 19, 2012

कुछ बदलियाँ हथेलियों पर


4 नवंबर 2012

कई बरस पुरानी अपनी ही बात रास्ते भर याद आती रही. हिल सिकनेस के चलते पहाड़ों पर कैसा गुस्सा फूटा था शिमला जाते वक्त. नहीं अच्छे लगते मुझे पहाड़.वो मुझे किसी अडि़यल, जिद्दी, अहंकारी पुरुष से लगते हैं. आप ही जाइये उनके पास हजार मुश्किलें उठाकर...खुद के नदी होने पर नाज़ था कि ठहरती नहीं एक जगह बहती फिरती हूं धरती पर. किसी सरहद में नहीं समाती. आज फिर से दोहराती हूं अपनी ही बात कि खुद के लिखे को काटना और रचना नया यही प्रक्रिया है जीवन की भी और लिखने की भी. मेरी नाराजगी मानो पहाड़ों तक जा पहुंची थी. जैसे सारे पहाड़ों ने मिलकर मुझे मनाने की ठान ली हो. उत्तराखंड के पहाड़ों ने हाथ पकड़कर अपनी पनाह में बिठा लिया. और अब कश्मीर से अचानक से आई यह पुकार. मैं इस दुनिया में अगर किसी चीज पर आस्था रखती हूं तो वो कुदरत है. उसकी बात को ध्यान से सुनती हूं और मानती हूं. कश्मीर की वादियों का रुख करती हूं यह सोचते हुए कि जितने गौर से कुदरत मुझे सुनती है, सहेजती है, संभालती है कोई और क्यों नहीं सुनता...

दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचते ही सबसे पहली इच्छा कॉफ़ी पीने की हुई. यहां आकर बड़ा अपनापन सा लगता है. न जाने कितना वक्त काटा है इस एयरपोर्ट पर. वो कोना देख मुस्कुराती हूं जिसके साथ छह घंटे फलाईट लेट होने पर वक्त साझा किया था. वो कॉफ़ी कार्नर, वो सिक्योरिटी चेक. अपना ही सामान कितना बोझ लगने लगता है न कभी-कभी. कि जिस सामान को चाव से बैग में रखा वही बैग कार्गो में देने के बाद कितनी राहत मिली. ऐसा ही तो है जीवन कि जिस देह से इतना लाड़ है उसी का बोझ ढोने में जिंदगी जा रही है. एक पल भी हम अपने होने के अहसास से मुक्त नहीं हो पाते. काश कि ये देह भी कार्गो में चली जाती तो हम प्लेन की सीट पर नहीं पंखों पर बैठ के जाते....

शीशे के उस पार दिखता आसमान अब ललचा नहीं रहा था। हालाँकि टेक ऑफ करते समय हमेशा यही ख्याल आस पास होता है ऊंचा होने के लिए सीढियां चढ़ना नहीं नींव में उतरना ज़रूरी होता है। फिर भी हम सीढियां ही क्यों तलाशते हैं।

यूं दिल्ली से श्रीनगर तक रास्ता मात्र डेढ घंटे का ही है लेकिन जाने क्यों मुझे यह बीच का छोटा सा वक्त भी बहुत बड़ा ही लगता है. तेज धूप में चमकते आसमान को निहारने के बाद आंखें परिचारिकाओं पर टिकानी चाहीं तभी लोगों की सीत्कारियां कानों में पड़ीं. मेरे दाहिनी तरफ खिड़की के पास लोग जुटे हुए थे. मैंने अपनी खिड़की से बाहर देखा तो आसमान ही दिखा. मंडराते बादल. कुछ चमकती चोटियां भी. लेकिन उस पार क्या था. आखिर उठना ही पड़ा देखने के लिए. उठी तो स्तब्ध रह गई. ऐसा खूबसूरत मंजर मैंने आज तक नहीं देखा था. नजर की आखिरी हद तक बर्फ की चादर ओढ़े खड़ी वो पहाडि़यां किसी नवयौवना सी दिलकश लग रही थीं. हम कश्मीर में दाखिल हो चुके थे और स्वागत के लिए ये पहाडि़यां चमकती दमकती खड़ी थीं. नहीं, किसी अहंकारी पुरुष से नहीं होते पहाड़, किसी नाज़नीन से नाजुक और मासूम भी होते हैं. बाहर की कोई बदली टकरायी नहीं थी आखों से फिर भी कुछ मोती थे हथेलियों पर...श्रीनगर आ चुका था. 

जारी....

Sunday, November 18, 2012

फिर-फिर प्यार तुम्हीं से....


4 नवंबर 2012

उदासियों की चादर ताने मौन के तकिये पर सर टिकाये एक टुकड़ा नींद की अभिलाषा लिए न जाने कितने युग बीत चले थे. कभी करवटें बदलते-बदलते पीठ अकड़ जाती या आसमान टोहते-टोहते ऊब सी घिर आती तो किन्ही अनचीन्हे रास्तों को पांव में बांधकर चल पड़ती. बिना किसी मंजिल की तलाश के रास्तों पर चलने का सुख कोई-कोई ही जान सकता है. उस रोज भी एक बदली सिरहाने बैठी रही रात भर हाथ थामे, तभी रास्तों ने आवाज दी '...आ जाओ.' मैंने करवट बदलते हुए कहा '...उंहूहूं...मेरा मन नहीं.' रास्तों से मेरा नाता पुराना है. वो मेरे मन का सब हाल जानते हैं. कितने ही अनजाने रास्ते क्यों न हों....दुनिया में शायद इतने लाड़ से किसी ने मुझे न मनाया होगा जितने लाड़ से मुझे रास्ते पुकारते हैं. मेरा इनकार कब उसे स्वीकार था. उसने सिरहाने बैठी बदली को चाय बनाने भेजा और मेरे सर पर हाथ फिराते हुए कहा, चलो. कोई सम्मोहन ही था शायद कि आनन-फानन में पैकिंग हो गई. 4 नवंबर को सुबह चार बजे करीब 50 किलोमीटर का सफर तय कर चुकने के बाद जब एक जगह चाय पीने को रुके तो एहसास हुआ कि जिस रास्ते ने मुझे मनाया था वो कश्मीर का रास्ता था. कोहरे की चादर ओढ़े किशोरी अमोनकर को सुनते हुए उस रोज एक बार फिर रास्तों पर बहुत प्यार आया...

Saturday, October 27, 2012

आकाश से टकराती खिलखिलाहटें


मासूम खिलखिलाहटों के एक रेले ने जिस मजबूती से मुझे अचानक आ पकड़ा था कि व्यक्तित्व में समाई शाश्वत उदासियां भी भाग खड़ी हुईं. कैसा अजूबा था. उन चेहरों से, उन नामों से कोई पहचान नहीं थी सिवाय इसके कि वो बच्चे थे और मुझे बच्चों से बेहद प्रेम. बच्चे प्रेम को सूंघ लेते हैं. शुरूआती संकोच बमुश्किल दस मिनट में धराशायी हो चुका था.

मैं ऊधमसिंह नगर से थोड़ी ही दूर स्थित प्राथमिक विद्यालय रामसजीवनपुर में एक छात्र बनकर गई थी. उनके बीच बैठी, उनकी किताबें पलटते हुए. उस स्कूल में बच्चे एक अखबार निकालते हैं. हर रोज वो गांव के कोने-कोने में फैल जाते हैं और खबरें लेकर आते हैं. फिर उन खबरों को लिखते हैं और एक चार्ट पेपर पर उन खबरों को चिपकाते हैं. बच्चों की खबरों को चिपकाते हुए अपनी पहली अखबार की नौकरी की याद ताजा हो आई जब कंप्यूटर का जमाना नहीं था. 

अखबार बोर्ड पर चिपका कर बनते थे. मैं कैंची से खबरों की कटाई-छंटाई करके खबरों को चिपकाती हूं. उनसे पूछते हुए कि कौन सी खबर कहां लगेगी. बच्चों का उत्साह इस कदर उफन रहा था कि वो मुझ पर गिरे जा रहे थे. हर बच्चा करीब बैठना चाहता था. मुझे छूना चाहता था. मैं बीच-बीच में सबके किसी के सर पर हाथ फिरा रही थी, किसी के गाल छू रही थी. हम सब कितने गहरे दोस्त हो गये थे.
हमारे एक साथी को इन बच्चों के शिक्षक राघवेन्द्र का साक्षात्कार रिकार्ड करना था, मैं उस साक्षात्कार को सुनना चाहती थी. बच्चों के हुजूम को मैं उंगली से इशारा करके चुप रहने को कहती हूं. वो सब मुझे घेरे हुए थे. मैं जैसे उस हुजूम में घिर गई थी. ये कैसी नाइंसाफी थी कि इतने सारे बच्चों को चुप रहने को कहा जाए. उंगली के इशारे का असर कुछ सेकेंड्स में गुम हो जाता. आखिर मुझे क्लास से बाहर आना पड़ा ताकि साक्षात्कार आसानी से हो सके.

बाहर बड़ा सा आसमान और बड़ी सी जमीन थी. लेकिन मेरे इन बच्चों की खिलखिलाहटों के शोर को समेट पाने को आज धरती छोटी पड़ रही थी. बच्चे मुझे खींच रहे थे. मैडम जी, आपको नहर दिखायेंगे. मैंने देखा मना करते-करते भी मैं नंगे पांव आधा रास्ता तय कर चुकी हूं. आधे रास्ते से लौटती हूं. मैडम जी, हम आपको डांस दिखायें कुछ बच्चे नाचने लगते हैं. तभी कोई मेरी हथेली पर एक टाॅफी रख जाता है. डांस खत्म हो जाता है, अंताक्षरी शुरू होती है...मजा नहीं आता. उनका उत्साह आसमान छूने वाला था. सुभाष जी को आती है कला बच्चों का हाथ पकड़कर आसमान छूने की मैं तो बस हक्का बक्का थी. मुझे बस प्यार करना आता है, कई बार उस प्यार को भी संभाल नहीं पाती. आज भी वही हाल था. बच्चों के प्यार से मेरा दिल भरा था लेकिन मैं उन्हें संभाल नहीं पा रही थी.

मैडम जी, हमें कोई खेल खिला दो ना? बच्चे मेरी मुश्किल समझ गये थे शायद. मैं कौन सा खेल खिलाउं....अपने बचपन में लौटती हूं...खो-खो, कबड्डी...अचानक याद आता है कि सुभाष जी ने बच्चो से हाथ पकड़कर गोला बनवाया था. मैं कहती हूं चलो सब एक दूसरे का हाथ पकड़ो और गोला बनाओ. सेकेंड्स में गोला बन गया. बच्चे इतने ज्यादा थे कि धरती कम पड़ गई. मैं अनाड़ी थी. अंदाजा ही नहीं मिली कि मेरे बच्चों के कदमों को ये धरती तो बहुत कम है. मैंने थोड़ी सी अक्ल का इस्तेमाल करते हुए कहा दो गोले बनाओ. वाह! सेकेंड्स में दो गोले तैयार हो गये. बाहर वाला गोला घूमता तो अंदर वाला गोला तालियां बजाता. फिर अंदर वाला गोला घूमता और बाहर वाला गोला तालियां बजाता. मैंने चैन की सांस ली....बच्चे इतने खुश थे कि चिल्ला रहे थे. उनका शोर आसमान से भी ऊंचा जा रहा था. कुछ बच्चे बीच बीच में गोले से बाहर आकर मेरे करीब बैठ जाते. मैडम जी, आप जाना मत...उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा. मैंने कहा, नहीं जाउंगी...अपने झूठे शब्दों पर मुझे खुद हैरत थी क्योंकि मेरे आना भले ही तय नहीं था लेकिन जाना तो तय था ही. आप झूठ बोल रही हो आप चली जाओगी...एक लड़की उदास हो जाती है. मेरी गोद में सर रखती है. कोई आकर मेरी हथेली पर हाजमोला की गोली रख देता है. उधर गोले वाला खेल भी अब बिगड़ चुका था और सब के सब फिर मुझे घेरे बैठे थे.

तभी स्कूल की घंटी बजी और इंटरवल हो गया. मैंने राहत भरी नजरों से बच्चों को देखा. लेकिन ये बच्चे हमें हमेषा गलत साबित करते हैं. बहुत सारे बच्चों ने घोशणा कि उन्हें भूख ही नहीं लगी है. वो खाना नहीं खायेंगे. मैं समझ गई थी कि ये और कुछ नहीं मुझे न छोड़ने का लालच था. मैं कहती हूं खाना खाओ तुम लोग फिर खेलेंगे. नहीं,,,,फिर आप चली जाओगी...मैं उदास हो गई थी कि मुझे सचमुच ही जाना था. बच्चे खाना छोड़े बैठे थे. मैंने कहा, मुझे बहुत भूख लगी है चलो सब मिलकर खाना खाते हैं. मिड डे मील खाने का सिलसिला तो उत्तरकाशी के स्कूल से शुरू हो ही चुका था. बच्चे यह सुनकर बेहद खुश थे कि मैं उनके साथ खाना खाने वाली हूं. मिनटों में सबके हाथ में खाना था. गर्मगर्म उरद की दाल और चावल. सच कहूं...बच्चों के प्यार में याद ही नहीं रहा था कि हम बिना एक कप चाय पिये ही इस सफर को निकल पड़े थे. खाने की खुशबू ने याद दिलाया कि पेट को कुछ चाहिए. बच्चों की थालियां बढ़ी हुई थीं. मैं सबकी थाली से एक एक कौर खाती हूं और तृप्त होती हूं. आत्मा की भूख शांत हो रही थी उन निवालों से. जाने कितनों ने कितने ढंग बताये, योग, ध्यान, पूजा, अर्चना, मुझ पर कभी कुछ असर नहीं किया....लेकिन बच्चों की उस दुनिया में जाकर लगा कि आत्मा पर जितने घाव थे वो भर गये हों जैसे. मन उस मुक्ति ओर प्रस्थान कर चुका था जिसकी तलाष में जाने कितने सदियों से ऋषी मुनि, संतजन भटक रहे हैं. यही वो शोर था जो भीतर के कोलाहल को शांत कर रहा था. हां, बिना धार्मिक हुए भी संत हुआ जा सकता है...बरबस खुद से कह उठती हूं.

हमारे स्कूल से जाने का वक्त था. बच्चे हाथ छोड़ने को तैयार नहीं. मैं एक झूठा वादा बोकर उठती हूं कि फिर आउंगी जल्दी ही. जानती मैं भी हूं कि उत्तराखंड के इस सुदूरवर्ती गांव के छोटे से स्कूल में दोबारा आउंगी या नहीं पता नहीं...बच्चे भी इस सच को जानते हैं. वो इस झूठ का बुरा नहीं मानते. नजर की आखिरी हद तक वो हाथ हिलाते रहते हैं. मैं जानती हूं वो बच्चे हैं. वो अब तक मुझे भूल भी चुके होंगे लेकिन उन्होंने उन चंद घंटों में जो मुझे दिया उसे मैं उम्र भर नहीं भूल सकती.

नाम, पता, ओहदा उन्हें किसी बात से मतलब नहीं था उन्हें मतलब था बस प्यार से. ऐसा निष्छल संसार बच्चों का ही हो सकता है. समंदर, रेगिस्तान, जंगल पहाड़ न जाने कितनी यात्राएं एक टुकड़ा षान्ति के लिए कर डाली थीं. वह शांति यहां मिली. मैं खाली हाथ गई थी और भरे मन लौटी...

उस रात जिंदगी ने एक टुकड़ा नींद बख्शी थी मुझे.

Monday, October 8, 2012

अभिनय


'अभिनेता का कर्तव्य मनुष्य की आत्मा को रंगमंच पर जीवन प्रदान करना है'- . स्तानिस्लाव्स्की

'सच्ची ट्रेजडी बाहरी परिस्थितियों और घटनाओं के कारण घटित नहीं होती, वह घटित होती है क्योंकि वह व्यक्ति जिसके साथ ट्रेजडी घटित होती है, वैसा है जैसा कि वह है. ट्रेजिक हीरो अपनी ट्रेजडी अपने साथ लाता है जो वह है उस कारण वह अभिशप्त होता है ' - सिडनी कासलमैन
इन दिनों रंगमंच पर कुछ किताबें पलट रही हूं. जानने को जितना भी विस्तार मिले कम ही लगता है. पिछले दिनों रंगमंच के एक साथी ने कहा,' दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो एक्टिंग न करता हो'. यह कहकर उसने मेरी उस बात को धडाम से गिरा दिया कि 'मुझे एक्टिंग करनी नहीं आती' . लेकिन मुझे तो सचमुच एक्टिंग करनी नहीं आती. अगर आती होती तो जीवन आसान न हो जाता. यह बात मैं खुद से कहती हूँ. नाटक में इसे 'स्वगत' कहते हैं. 

जिंदगी ढेर सारे मास्क लिये खड़ी रही लेकिन मुझे अपने चेहरे पर लगाने लायक कोई मास्क नहीं मिला. जब भी कोशिश की कि कोई मास्क लगाकर जिंदगी को आसान बनाया जाए, इतनी घुटन हुई कि बिना मास्क के जिंदगी के जोखिम उठाना ही बेहतर आॅप्शन लगा.. 

रंगमंच से जुड़ाव सिर्फ नाटक देखने तक का रहा हो ऐसा भी नहीं. नाटकों को पढ़ने, रंगमंच से जुड़े दोस्तों से जुड़ने और कुछ नाटक लिखने से भी जुड़ाव रहा. नाटकों की समीछायें लिखने से भी. सोचती हूं तो खुद को काफी करीब पाती हूं रंगमंच के. लेकिन अजीब सा डर है जो रंगमंच से सीधे जुड़ने के बीच आता रहा. शायद वो मास्क लगाने का डर था, या लोगों के हुजूम का. भीड़ मुझे कभी अच्छी नहीं लगती. डर लगता है. मुझे याद है मेरी दोस्त ज्योति जब इप्टा में थी और मैं उसके नाटक देखने जाया करती थी, मंच पर वो होती थी और रोएं मेरे खड़े होते थे. वो कभी गल्तियां नहीं करती थी और मैं हमेशा नर्वस रहती थी. मेरी बेटी जब पहली बार मंच पर थी तो मैं कांप रही थी. मेरे आंसू बह रहे थे. हालांकि अपने दोस्तों को नाटक की भूमिकाओं में खुद को खोते हुए देखती हूं तो बहुत अच्छा लगता है. कुछ देर को वो अपना 'मैं' उतारकर रख देते हैं. एक किरदार को पहन लेते हैं. उसका सुख, उसका दुख, उसका जीवन, उसकी भाव-भंगिमाएं, उसका मौन, उसके शब्द. कम से कम उतनी देर उनका 'मैं' राहत में होता है. वो दूर बैठकर हमारे भीतर बसे दूसरे शख्स को देखता है, तालियाँ बजाता है लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं, अभिनेता का अस्तित्व किरदार के अस्तित्व में लगातार सांस लेता रहता है.

हम जिन चीजों में कमजोर होते हैं उनके प्रति आसक्ति होती ही है. जाने अनजाने न जाने कितनी बार अभिनय की तरफ खिंचाव हुआ है. नाटकों को देखने का जुनून, रंगमंच से जुड़े लोगों से मिलने की बात और अब सोचती हूं अपनी पहली कहानी (जिसने पहचान दी थी) अभिनय ही थी. सोचा तो कभी नहीं था इस बारे में फिर भी...

न...न....एक्टिंग करनी नहीं. बस सीखनी है. हालांकि बिना सीखे भी मास्क वाले चेहरों में और बिना मास्क के चेहरों में भेद करना खूब आता है मुझे, शायद इसीलिए एकान्त ही मुझे रास आता है भीड़ नहीं... 

Friday, October 5, 2012

कर्ज़ अल्फाजों का, शुक्रिया दोस्तों का


कलम पकड़ती, तो न जाने कितनी देर तक उसे ताकती ही जाती. आंखों में जो दृश्य थे वो एहसास बनकर रगों में दौड़ते फिरते थे. एक दृष्य कई-कई रंगों में, कई-कई अहसासों में मंडराता. लिखने को शब्द नहीं. कागज कोरा का कोरा...क्या लिखें, कैसे लिखें और उससे भी बड़ा प्रश्न कि क्यों लिखें...? रात की सियाही जैसे-जैसे आसमान पर छलकती जाती न लिखने की पीड़ा गहराती जाती. 


न लिखने की...? अम्म्म्म्....नहीं, न लिखने की नहीं, न लिख पाने की. कागज पर कुछ अगड़म-बगड़म से शब्द गिर पड़ते तो चैन आता. सवेरे उस कागज को चिंदी-चिंदी करके हवा में उछाल देना और शुक्रिया अदा करना अक्षरों का जिनसे खुद को खाली किया. इसी बीच रिल्के के कुछ खत हाथ लगे. उन्होंने काप्पुस को लिखा, अगर तुम लिखे बगैर जी नहीं सकते तो लिखो...तब ही लिखो

लिखने को लेकर कभी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही, बस कि यह एक मजबूरी सा शामिल रहा जीवन में. जिसके न होने से होने तक का सफर एक तकलीफ का सफर ही रहा. लिखना कोई लग्जरी नहीं, युद्ध है अपने भीतर का. इस युद्ध में लेखक की बस हार ही होती है. हां, उसके पाठकों को जरूर कुछ हासिल होता है. पाठकों का हासिल कभी-कभार लेखक के जख्मों पर मरहम लगाता है.

इसी बीच प्रोफेशनल राइटिंग की राह मिली. पेशा चुन लिया पत्रकारिता का. यहां दिल-विल की सुननी ही नहीं थी. बस आंखों देखी लिखनी थी. सच देखना, उसकी पड़ताल करना और वही लिखना. लेकिन कोई बताये कि बिना संवेदना के कुछ भी लिखना संभव है क्या. हर घटना पहले दिल पर नक्श होती है, फिर लफ्जों में उतरती है. इसी के चलते पत्रकारिता भी दुश्वार ही रही. 

हर लेखक अपने मौन में रहता है. उसका एकान्त उसकी पूंजी होता है. पत्रकारिता आपको न मौन रहने की गुंजाइश देती है, न एकान्त. कभी लेखक पत्रकार से कहता मैं भी हूं. कभी पत्रकार लेखक को डपट देता, तुम्हारी जरूरत ही नहीं. इसी युद्ध में बारह बरस गुजर गये. अनुभवों के न जाने कितने गांव देखे, अहसासों की न जाने कितनी रणभूमि पर अक्षरों के युद्ध लड़े. इस युद्ध में कभी लेखक जीतता, कभी पत्रकार. कभी-कभी दोनों एक साथ हो लेते और संभाल लेते एक-दूसरे को. लेकिन यकीन मानिए इस खेल में मैं हमेशा ही हारी. मुझे कविताओं ने पनाह दी. वो कविताएं जिन्हें कविता कह पाने का साहस कभी हुआ ही नहीं. एक संकोच घेरे रहा कि क्या ये कविता है? वो संकोच अब भी अपने हर लिखे को लेकर कायम है. ये लिखते वक्त एक मित्र की बात याद आती है कि विनम्रता भी एक किस्म का अहंकार है. फिर भी इस संकोच से नहीं निकल पाती. 

तो लिखना एक किस्म की तकलीफ है, जिससे उम्मीद का जन्म होता है. लेखक चाहे तो अपने पाठकों का आसमान बड़ा कर सकता है....लेकिन ये जिम्मेदारी बहुत बड़ी है. लेखक होना....बहुत बड़ी बात है अगर कोई आपके लिखे को मान दे तो उसे पलकों पर उठाना चाहिए.

यह पलकों पर उठाना ही था कि जब मुझे अपने साथियों के साथ लेखन कार्यशाला हेतु उधमसिंह नगर जाना था तो संकोच को पीछे धकेल ही दिया और अपने गुरुओं का देय चुकाने चल पड़ी. सिखाने नहीं, सीखने. सामने वही सवाल थे जो हर रोज मेरे सामने होते हैं, तब से जब से होश संभाला. हर बार लिखने से पहले वही बात कि कहां से शुरू किया जाए लिखना. कैसे आगे बढ़ें और किस तरह पाठकों का हाथ पकड़ लें. भाषा, शैली, विन्यास, लिखने को लेकर संकोच सब कुछ तो वैसा का वैसा ही. ऐसा लगा कि सवाल भी मेरे ही हैं और जवाब भी मुझे ही देने हैं. अपने गुरू का स्मरण करते हुए उन्हें ही सामने कर देती हूं. कितनी बार झगड़ी हूं मैं रिल्के से भी कि जब काप्पुस के सवालों के जवाब दिए तो मेरे क्यों नहीं. मैं काप्पुस से कम योग्य तो नहीं. वो फिर मुस्कुराते हैं, अगर अब तक के गुजरे अवसाद से बड़ा अवसाद गुजर रहा है तो समझ लो जीवन ने तुम्हें बिसारा नहीं है...हां, हां, समझ गई मैं...गुस्से से भर उठती हूं. बचपन से अब तक सैकड़ों बार पढ़ चुकी हूं ये लाइनें. बहुत अवसाद मिल गया. अब जरा ये भी बताइये कि रखूं कहां इसे....वो चुप ही रहते हैं. जवाब आता है 'लिखने में.' जवाब कहां से आता है. रिल्के तो खामोश थे. मैं भी चुप थी. फिर कौन बोला? 

पता नहीं. बस इतना पता है कि हर अनुभव का दर्ज होते जाना जरूरी है. न जाने आने वाले वक्त में कौन सा अनुभव रोशनी बनकर किसी को राह दिखा रहा हो. अच्छा, बुरा, सही, गलत लिखने में कुछ नहीं होता. बस कि दिल से महसूस करना और उस महसूस किये को अक्षरों में शरण देना. आखिर सदियों पहले के वक्त को हमने अक्षरों से ही तो जाना है. अपने सवालों को तराशते हुए, अपने ही सवालों में बार-बार उलझते हुए, सुलझते हुए बस कुछ दर्ज करते जाना...यही तो है लिखना. संकोच...यही तो बचाता है हमारे भीतर हमारा होना...उधमसिंहनगर के सभी साथियों की शुक्रगुजार हूं जिन्होंने अपने सवालों के योग्य मुझे चुना. एक उम्मीद जागती है कि अपने भीतर के सवालों को बाहर निकालने के बाद भीतर जो जगह बनी होगी, उसमें लिखने की संभावनाओं ने जरूर जन्म लिया होगा. आमीन!

Monday, September 24, 2012

इनमें तो कुछ भी ठीक से दर्ज नहीं....


भूगोल के किसी भी पन्ने में नहीं दर्ज हैं
एवरेस्ट से भी ऊंचे वे पहाड
जिन्हें पार किये बगैर
जिंदगी तक नहीं जाता कोई रास्ता

नहीं दर्ज कोई जंगल
जिनसे गुजरे बगैर
मुमकिन ही नहीं खुद की
एक सांस भी छू पाना

नहीं हैं कोई जिक्र उन नदियों का
जो आंखों से लगातार बहती हैं
और सींचती रहती हैं
पूरी दुनिया में प्रेम की फसल

ना...कहीं नहीं लिखा उन सहराओं का नाम
जिसके जर्रे-जर्रे में छुपे हैं
इश्के के नगमे
और विरह की कहानियां

उन दिशाओं का नाम तक नहीं
जिस ओर गया था प्रेम का पथिक
देकर उम्र भर का इंतजार

भला किस पन्ने पर लिखा है
उन लहरों का नाम
जिन पर मोहब्बत लिखा था
और वो हो गई थी दुनिया की सबसे उंची लहर

बार-बार घुमाती हूं ग्लोब
पलटती हूं दुनिया भर के मानचित्र
नहीं नजर आता उस देश का नाम
जहां अधूरा नहीं रहता
प्यार का पहला अक्षर
मुरझाती नहीं उम्मीदें

स्मृतियाँ शाम के उदास साये में
लिपटकर नहीं आतीं
और एक दिन मुकम्मल हो ही जाता है इंतजार
जिंदगी के इसी पार

किसने लिखी हैं ये भूगोल की किताबें
किसने बनाये हैं दुनिया के नक्शे
इनमें तो कुछ भी ठीक से दर्ज नहीं....

(२३ सितम्बर को अमर उजाला के साहित्य पेज पर प्रकाशित )

Wednesday, September 19, 2012

कूदो तो इतना कि आसमान छू लो


वो एक कमरे में टहल रहे थे. जैसे किसी बागीचे में हों. टहलना खत्म हुआ और सुभाष सर ने पूछा, किसने क्या देखा? किसी ने पंखा देखा, किसी ने बोर्ड, किसी ने मैम को देखा किसी ने किताबें. सुभाष सर एक बच्चे का जवाब सुनकर ठिठक गये, जब उसने कहा मैंने सूरज देखा. वो पलटे. क्या...क्या देखा आपने? वो उस बच्चे के करीब पहुंच गये. उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा मैंने सूरज देखा. कमरे में सूरज...शायद यही सोच रहे थे सुभाष सर...उस बच्चे ने चार्ट पेपर पर अपने नाम के साथ अपने हाथ से बनाये सूरज की ओर इशारा किया...वहां देखा.

कौन तय करता है सूरज के उगने और डूबने की दिशा और समय. बच्चों की दुनिया में वो सब कुछ खुद तय करते हैं. नाटक सीखने आये बच्चे खुद अपने सुभाष सर को न जानेे क्या-क्या सिखा गये. पंद्रह सितंबर का जो दिन थियेटर एक्टिवटी के लिए तय था, उस दिन का नाटककार कोई और ही था. यूं तो हमारी जिंदगी के हर लम्हे का राइटर डायरेक्टर कोई और ही है लेकिन उस दिन यह बात डीएम के आदेश के रूप में सामने आई. सामने आई बारिश की उस विभीषिका के रूप में. मौसम के गुस्से का असर ये कि दून के सारे स्कूल बंद. जिन बच्चों को कार्यशाला के लिए आना था उन्हें घर भेज दिया गया. सुभाष जी परेशान, लेकिन शो मस्ट गो आॅन...तो राजकीय जितने भी बच्चे आये थे उनके साथ खेल शुरू हुआ.

अपनी उंगलियों को हिलाते हुए नीचे से पर लाना... ऊपर से नीचे. बच्चों के मन में रखी संकोच की पर्तें एक-एक कर उतरने लगी थीं. हां, एक बहुत सुंदर बात ये दिखी कि सुभाष सर ने सख्त हिदायत दी, खेल में शामिल सबसे छोटी बच्ची मधु के हाथ से ऊपर कोई अपना हाथ नहीं ले जायेगा. हमें अपना ही नहीं अपने साथियों की क्षमताओं का भी ख्याल रखना चाहिए. हमारी गति, हमारा वेग कहीं किसी का दिल न दुखा दे. कि पकड़ लंे हाथ अगर तो सब साथ बढ़ें...खूब बढ़ें. शायद रोजमर्रा की जिंदगी में हम बच्चों को ऐसे ही संदेश देना भूल जाते हैं, जिसे सुभाष सर ने बच्चों को प्यार से समझाया. खेल का असली मजा तब है जब सब साथ चलें.

खेल आगे बढ़ने लगा. दो हाथ किरदार बने. एक ने दूसरे से उसका नाम पूछा, हाल पूछा और भी बहुत कुछ. एक कहानी सुनाई गई. एक पढ़ाकू बच्चे की कहानी. जिसे सिर्फ पढ़ना पसंद है. उसका दोस्त, मम्मी पापा सब उसे समझाते हैं कि पढ़़ने के अलावा खेलना भी जरूरी है लेकिन वो समझता ही नहीं. इसी कहानी को बच्चों के अलग-अलग ग्रुप में नाटक के रूप में भी करके दिखाया.

बच्चे अब अपने पूरे रंग में आ चुके थे. खाने के डिब्बे भी आ चुके थे. बच्चे अंदाजा लगा रहे थे कि उसमें क्या होगा. सब अपनी पसंद की चीजों का नाम ले रहे थे. मधु, मुस्कान, धर्मवीर, जीशान, आशाराम, अमनजोत सिंह, करन, सौरभ, दिग्विजय, बिलाल, अभिषेक ने सुभाष सर और प्रिया दीदी के साथ मिलकर नाश्ता किया और दुगुने जोश से नाटक की ओर लौटे.

कूदो तो इतना कि आसमान छू लो....सुभाष सर ने कहा भी और कूदकर दिखाया भी. सारे बच्चे अपने-अपने सर के ऊपर टंगे आसमान से होड़ लेने में जुट गये. अपनी पूरी ताकत से आसमान की ओर छलांग लगाते. उनकी आंखों में ऐसी चमक थी कि लगा कि आसमान उनकी मुट्ठियों में आ गया हो. हालांकि मुझे तो वो बेचारा उनके कदमों में बिछा हुआ नजर आ रहा था.

नाटक सिर्फ संवाद नहीं होता, सिर्फ मंच नहीं...जिंदगी हर पल एक नाटक है, एक खेल. कितनी अजीब बात है कि नाटक में हम स्वाभाविक होना चाहते हैं और जिंदगी में नाटकीय. सुभाष सर कोई किताब पढ़ रहे थे. उसे पढ़ते हुए उन्हें बहुत मजा आ रहा था. कभी वो किताब पढ़ते हुए दीवार से टकरा जाते, कभी लेट जाते, कभी पैर ऊपर करके जोर-जोर से हंसते. बच्चे उन्हें देखकर खूब खिल रहे थे. रोज की स्वाभाविक बात पढ़ना जब अभिनय बनी तो मुश्किल हो गई. सब सुभाष सर की तरह पढ़ रहे थे. सचमुच....आसान नहीं अभिनय करते हुए सहज हो पाना...

यह एक तकनीक थी बच्चों के करीब जाने की, दोस्ती करने की, नाटक को खेलने की और खेल को अभिनीत करने की. थोड़ी देर में पूरे कमरे में सफेद रंग की बाॅल थीं और बच्चों की चमकती आंखें. अगर हम खेल में डूब जाये ंतो सारे संकोच धराशायी हो जाते हैं. खेल की शुरुआत में जो बच्चे सहमे हुए थे, वो अब खूब चहक रहे थे. फिर मिलेंगे के वादे के साथ धमाचैकड़ी का सिलसिला अगली गतिविधि तक के लिए रूका जरूर लेकिन इस कार्यशाला का असर उन बच्चों के जेहन पर तारी रहेगा.

Monday, September 10, 2012

आओ चलें...



सड़कें मुझे बहुत पसंद हैं. मेरा दिल अक्सर सड़कों पर आ जाता है. साफ़ सुथरी दूर तक फैली सड़कें. आमंत्रण देती हुई कि आओ...चलें...सड़क या रास्ता? कुछ भी कहिये. हालाँकि मुझे पगडंडियाँ भी पसंद हैं इसलिए रास्ता कहना भला है. वो भी ऐसी ही एक सड़क थी माफ़ कीजियेगा, रास्ता था. दूर से पुकारते उस रास्ते के सीने पर आखिर खुद को रख ही दिया एक रोज. वो किस मंजिल को जाता था पता नहीं लेकिन उस रास्ते पर चलना मुझे रास आया. वो रास्ता मुझे शायद इसलिए भी पसंद था क्योंकि उसमे कोई दोराहे नहीं थे. बस कि चलते जाना था. दो राहों वाले रास्ते मुझे पसंद नहीं. वहां हमेशा एक दुविधा होती है. इधर चलूँ या उधर? जिन्दगी का कुछ ऐसा याराना रहा है मुझसे कि जब भी खुद से चुनना हुआ हमेशा पहले गलत रास्ता ही चुना. हालाँकि इसका ये फायदा भी हुआ कि मुझे दो राह फूटने वाले सभी रास्तों के बारे में विस्तार से पता होने लगा. फिर मैंने एक तरकीब चुनी.( फिर चुनाव...कभी कभी हम चाहकर भी चुनाव से बच नहीं सकते.) खैर, तो मैंने ये तरकीब चुनी कि जिस रास्ते पर कम लोग जाते दिखेंगे, मैं उन पर चलूंगी. इसमें एक बात का सुख तो पक्का था कि रास्ते में कोई भीड़ नहीं मिलने वाली थी. एकांत. दूर तक पसरा हुआ मीठा सा एकांत. इक्का-दुक्का कोई दिख जाता तो लगता कि ये भी या तो मेरी ही तरह एकांत की तलाश में है या रास्ता भटक गया है....भटकना...ओह...कितना सुन्दर शब्द है. भटकाव...जिन्दगी का सारा सार तो भटकाव में है न...हम सब भटके हुए मुसाफिर हैं. न जाने किस राह को निकलते हैं...किस राह को मुड जाते हैं. कौन सी राह तलाशने लगते हैं. भूल जाते हैं कि किस तलाश में निकले थे. तलाश....कोई थी भी या नहीं. थी शायद...अम्म्म...नहीं थी शायद. पता नहीं. पर चलना तो तय था.
देखा, भटकाव का कितना आनंद है...कहाँ से कहाँ आ पहुंची. मैं तो उस रास्ते की बात कर रही थी जिसे मैंने इसलिए चुना था कि उस पर धूप और छांव का खेल बड़ा अद्भुत चलता था. उलझाने के लिए कोई दूसरी राह नहीं. भीड़ नहीं. बस कि चलते जाने की आज़ादी. उस रास्ते पर बारिश का ठिकाना था. ये तय है कि पूरे रास्ते में आपका भीगना तय है. तर-ब-तर होना. फिर धूप का मिलना भी तय है. बारिश की बदमाशी को धूप बड़े करीने से सहेजती और देह से लेकर मन तक को ऐसे सुखाती जैसे माँ अपने बच्चे को देर तक भीगने के बाद सुखाती है..अपने आँचल से. वैसे तो ये रास्ता कहीं ले नहीं जाता लेकिन फिर भी अगर कहीं आप पहुँच गए तो आपके पास न बारिश का पता होगा, न धूप का. आप खाली हाथ ही पहुंचेंगे. हाँ, संभव है कि बादल का कोई टुकड़ा पैरों में उलझा हो और रास्ते की कारस्तानियों की चुगली कर दे.

मैंने आज न जाने कितने बरसों बाद बहुत लम्बी ड्राइव का आनंद लिया..कानों में अमीर खुसरो...कहीं न मुड़ने वाला रास्ता और शायद मेरी ही तरह भटका हुआ एक मुसाफिर कि जिसके साये के पीछे चलते जाने में खो जाने का भी सुख था और मिल जाने का भी....रास्ता...चलता गया...चलता गया...

Sunday, September 2, 2012

जानती हूँ सब





'उसके माथे पर से रात फिसल गई थी. इससे पहले वो गिरकर टूट जाती गिरजे से किसी के बुदबुदाने की आवाज आई. सिसकियों में डूबी वो आवाज ईशू ने कितनी सुनी, कितनी नहीं यह तो नहीं पता लेकिन वो आवाज फिजाओं में कुछ इस तरह घुली कि टूटकर गिरने को हो आई थी जो रात वो बच ही गई बस. उस रात की मियाद बढ़ती गई...बढ़ती गई...'

'भादों की रातें यूं भी कुछ ज्यादा ही लंबी लगती हैं और सुनते हैं कि कभी कभी दो-दो भादों लग जाते हैं जैसे एक रात में कई रातें....एक इंतजार में कई इंतजार, एक जिंदगी में कई जिंदगियां. मौत भी एक कहां रह जाती है. जानने वाले जानते हैं कि न हम एक बार जन्म लेते हैं और न ही एक बार मरते हैं. यह तो बड़े से बड़े गणितज्ञ नहीं बता पाये कि अक्सर जिंदगी कम और मौत ज्यादा कैसे हो जाती है. कि जिंदा रहने के पल बस मुट्ठियों में समा जायें या उंगलियों पर गिन लिए जाएं या पलकों पर उठा लिए जाएं और मौत के पल इतने कि गिनते-गिनते मौत आ जाए.' लड़का अपनी कहानी को विस्तार दे रहा था...
लड़की का ध्यान लड़के के दर्शन पर नहीं, कहानी पर था कि दर्शन तो वो खुद भी कम नहीं जानती थी.
'तो वो जो रात फिसलकर टूटने से बच गयी थी वो जिंदगी की रात थी या मौत की...?'
लड़की कहानी सुनने के लिए बेकरार थी. वो जानती थी कि लड़का हर रोज जो भी अफसाना सुनाता है, वो अफसाना महज झूठ होता है लेकिन होता बेहद खूबसूरत है. उसकी किस्सागोई ऐसी कि लड़की ही क्या कायनात का जर्रा-जर्रा उन अफसानों का तकिया लगाये अगले दिन का इंतजार करता. बारिशें पेड़ों की डालों पर अटककर बूंद-बूंद टपकती रहतीं. पहाड़ों पर लुकाछिपी खेलते बादल थमकर सुनने लगते किस्से. लड़की जिस जंगल को पारकर लड़के से मिलने आती थी वो जंगल बेहद सुंदर था. उस जंगल के सारे जुगनुओं से उसकी दोस्ती हो गई थी. सारे रास्ते वो उनसे बातें करते हुए आती थी. कई बार लड़के को भ्रम होता कि वो उससे मिलने आती है कि जंगल से गुजरने के लिए.
'बताओ ना...वो जिंदगी की रात थी या...? ' लड़की की आवाज जैसे मिश्री.
'तुम्हें पूछना चाहिए कि गिरजे से जिसकी आवाज आई थी वो किसकी आवाज थी. '
लड़के ने लड़की की पीठ पर अपनी पीठ टिका दी और सिगरेट के छल्ले बनाने लगा.
लड़की झटके से हट गई वहां से और वो गिरते-गिरते बचा.
लड़की ने देखा भी नहीं लड़के की ओर.
'मैं जानती हूं वो किसकी आवाज थी. '
'अच्छा? तब तो तुम्हें यह भी पता होगा कि वो जिंदगी की रात थी या मौत की?'
लड़के की आवाज में अहंकार था. किस्सागो था आखिर. वो किस्सागो ही क्या जो किस्से के किसी हिस्से में किसी की जिंदगी को लटकाने का माद्दा न रखे.
'हां, जानती हूं.' लड़की झरने की तरफ बढ़ती गई. जानती हूं सब.
लड़का जोर से हंस दिया.
'सब जानती हो?'
'हां....' उसने देखा नहीं लड़के की ओर.
'क्या जानती हो मेरी कहानियों के बारे में? ये मेरी कहानियां हैं इनके बारे में सिर्फ मैं जानता हूं. इन्हें मैं जब चाहे बदल सकता हूं.'
'ये भी जानती हूं.'
'अच्छा?' लड़का अब नाराज हो चला था.
'तो मुझसे कहानियां सुनने आती क्यों हो इतनी दूर. हर रोज.'
लड़की की आवाज सर्द हो चली. 'यह तुम नहीं समझोगे.'
'ओह...मैं नहीं समझूंगा.' लड़का बेहद सख्त हो चला था.
'हां, तुम नहीं समझोगे.' लड़की ने उसी दृढ़ता से कहा.
'तो सुनो....अहंकारी लड़की. कुछ नहीं जानती तुम. मेरी कहानियों के बारे में भी नहीं और इस संसार के बारे में भी. कुछ नहीं जानतीं.
मेरी कहानियां....'
'बस... आगे कुछ न बोलना.'
'क्यों...क्यों न बोलूं. कैसे जानती हो तुम कुछ भी जबकि मेरी कहानियां सिर्फ झूठ होती हैं. कैसे जान सकता है कोई वो बात जो सच है ही नहीं. बोलो?'
लड़की सिसक पड़ी. 'मैंने कहा था न कि कुछ मत कहो. कुछ भी मत कहो. जानती थी मैं ये भी. यह भी जानती थी मैं....बस कि कुछ झूठ बचाये जाने बहुत जरूरी होते हैं. उनसे जिदंगी सांस लेती रहती है. मैं जानती हूं और भी बहुत से सच...जो तुम्हारी कहानियों की तरह ही झूठे हैं पर मैं खामोश रहती हूं.'
'वो रात जो टूटकर गिरते-गिरते बच गई थी उस रोज वो मोहब्बत की रात थी. गिरजे से आयी थी प्रार्थना की आवाज वो प्रेम पर विश्वास करने वालों की प्रार्थना की आवाज थी. उसी आवाज ने मोहब्बत पर यकीन को बचा रखा है जैसे बच गई थी तुम्हारी कहानी में टूटने से वो रात.'
लड़की रोती जा रही थी....लड़का अवाक....ये उसकी कहानी थी लेकिन इस कहानी के रेशे-रेशे पर लड़की का अधिकार था. वो जैसे अजनबी. अपनी ही कहानी से बेदखल.
'और तुम नहीं बचा पाये इस रात को टूटने से...हां, ये तुम्हारी ही कहानी है जिसमें अब तुम ही नहीं हो...'
लड़की ने अपनी धानी चुनर में अपने माथे से टूटकर गिरी भादों की उस काली रात के सारे टुकडों को बांध लिया.

उस रोज वो सारे बादल के टुकड़े जिन्हें उसने यहा-वहां सजाकर रखा था, कुछ को पलकों के पीछे, कुछ को आंचल में, कुछ को घर की देहरी पर कुछ को जूड़े में कोई आंगन में बैठा था चुपचाप और कुछ तानपूरे के ठीक बगल वाली चैकी पर बस रखे हुआ था कि रियाज के वक्त कभी-कभी छलक भर जाने से रियाज में चार चांद लग जाते थे...उस रोज वो सारे बादल बरसे...बेतरह बरसे...बरसते रहे....लोग कहते हैं इतनी बारिश पहले न देखी न सुनी....
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Monday, August 6, 2012

एक लायक आदमी इश्क के लायक नहीं बचता...




इश्क को उसने उठाकर जिन्दगी के सबसे ऊंचे वाले आले में रख दिया था. उस आले तक पहुँचने के लिए पहले उसने खुद को पंजों पर उठाया. अपने हाथों को खींचकर लम्बा करना चाहे. इतनी मशक्कत मानो अचानक
उसके पैरों की लम्बाई बढ़ जाएगी, हाथों की लम्बाई भी. इतनी ज्यादा कि उसके बराबर दुनिया में कोई लम्बा ना हो सके...और जिन्दगी के सबसे ऊंचे आले तक कोई कभी ना पहुँच सके. अचानक उसने महसूस किया कि वाकई उसका कद बढ़ने लगा है...उसने अपने इश्क को अपने दिल के रैपर में लपेटकर उस आले में रख दिया. ऊपर से कुछ पुआल भर दिया ताकि उसकी सबसे कीमती चीज़ पर किसी को कोई नजर ही ना पड़े. काम हो जाने के बाद वो वापस अपने कद में लौट आया. यही कोई पांच फुट ग्यारह इंच.

वो हमेशा कहती थी कि 'एक इंच कम क्यों...? पूरे छह क्यों नहीं...' ऐसा कहकर वो अक्सर हंस देती. लड़का उसकी बात सुनते हुए अपने कद की एक इंच कम लम्बाई के बारे में सोचने लगता. लड़की उसकी लम्बी बाँहों में झूलते हुए कहती...'तुम पांच फुट के होते तब भी मुझे तुमसे इतना ही प्यार होता पगले...' लड़का खुश हो जाता. उनका प्रेम किशोर वय का प्रेम था. हालाँकि प्रेम हर उम्र में किशोर वय ही होता है...वे खेतों में दिन भर घूमते. उसे लड़की के लिए सबसे ऊंची डाल पर लगे फूल तोड़ने में सबसे ज्यादा सुख मिलता था.

पापा का उसे आईएएस बनाने का ख्वाब उसे खासा बोरिंग लगता.
गांव के तालाब में कंकड़िया फेंकते हुए उसे इतना सुख मिलता कि उसे लगता जिन्दगी में इससे बड़ा कोई सुख ही नहीं. लड़की उसे हर बार नया निशाना बताती और उसकी कंकड़ी ठीक उसी जगह जा पहुँचती. लड़की खुश होकर नाचने लगती. कई बार अति उत्साह में उसे चूम भी लेती थी. फिर अगले ही पल उसकी आँखें भर आतीं.
वो संकोच में सिमट जाती और अपने कदम पीछे लौटा लाती...लड़का अभिसार के रंग में रंग चुका होता और बहुत प्यार से पूछता, 'क्या हुआ?' लड़की कहती, ' कुछ नहीं'  
'कुछ तो?' वो फिर से पूछता.

लड़की रोने लगती और रोते रोते उसके कन्धों पे टिक जाती. उसका रोना बढ़ता जाता. लड़के को समझ में नहीं आता के प्रेम के सबसे खूबसूरत पलों में लड़की अचानक रोने क्यों लगती है. वो उसे चुप करता रहता...और लड़की रोती जाती. सूरज डूबने को होता और जाते जाते लड़की के कान में कह जाता कि आज कि मुलाकात
का वक़्त ख़त्म हुआ. लड़की आंसूं पोंछती और घर की और भाग जाती. जाने क्यों लड़के को जाते हुए क़दमों में लड़की का आना ही सुनाई देता हमेशा. अपने सीने में बसी लड़की के आंसुओं की खुशबू में वह डूब जाता. वो अकेले ही तालाब के किनारे बैठ जाता और सूरज का डूबना फिर चाँद का उगना देखता रहता. इन दिनों उसे किसी से मिलना, बात करना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था. घर देर से पहुँचता और खाने से बचने के लिए तुरंत चादर के भीतर छुप जाता. वो रात भर छत को देखता रहता...छत अचानक आसमान बन जाती और कमरे में पड़ी चारपाई जमीन. वो अपनी बाँहों में लड़की के सर का होना महसूस करता और महसूस करता
कि तारे उतारकर लड़की की मांग में सज जाते...इस वक़्त भी लड़की की आँखों में कोई नदी उफनने को होती. वो यह कभी नहीं समझ पाया कि लड़की आखिर क्यों रो पड़ती है प्रेम के असीम पलों में. लेकिन वो उन आसुंओं को अपनी हथेलियों में समेट लेता.

एक रोज उसने कहा, 'एक दिन तेरे सारे आंसुओं को धरती पर बो दूंगा और प्यार की फसल लहलहाएगी....' लड़की रोते-रोते हंस देती....हर प्रेम कहानी की तरह ये भी एक सामान्य प्रेम कहानी थी. जिसमे लड़के को जाना पड़ा. पापा को और टालना मुश्किल था. उसे शहर जाकर लायक आदमी बनना था.
'इश्क काफी नहीं जिन्दगी के लिए' सोचते हुए उसने भीगी पलकों की गठरी में सारे ख्वाब बांधे और निकाल पड़ा. उसने लड़की को वादा किया वो जल्दी लौटेगा और उसे हमेशा के लिए ले जायेगा. जाते वक़्त उसने अपने इश्क को जिन्दगी के सबसे ऊंचे आले में संभाल के रख दिया. तीन बरस लड़का लायक आदमी बनने में लगा रहा. लौटा तो उसने जिन्दगी के उसी आले को ढूँढा जिसमे उसने अपना इश्क रखा था. अब ना वो दरो-दीवार रहे, ना वो जिन्दगी, ना आला कोई. वो अपने पंजो से उचक-उचक कर जिन्दगी के सारे खानों को तलाशता फिरता...लेकिन उसका ही इश्क अब उसकी पहुँच से बहुत दूर हो गया..बहुत दूर...एक लायक आदमी इश्क के लायक नहीं बचता.... उसने सोचा. अब वो अकेले ही रोता था...अकेले ही तालाबों के किनारों घूमता,
खेतों में वही दिन वही खुशबू ढूंढता. ना जाने कितने बरस बीत गए...वो लायक आदमी अब किसी का पति है
किसी का पिता और किसी का बेटा...उसकी आँखें अक्सर नाम रहती हैं. जिन्दगी ने उसके साथ बेईमानी की. अपने ही इश्क तक उसके हाथ क्यों नहीं पहुँचने दिए...

वो धरती के ना जाने किस कोने में अब सांस लेती होगी. वो क्या अब भी रोती होगी प्यार के पलों में...क्या वो कभी किसी और को प्रेम कर पायेगी...उसे अपनी बाँहों में वही नमी महसूस होती, वही खुशबू...नहीं वो अब कभी नहीं रोती होगी...लड़के की आँखें भीग जतिन तो उसकी पत्नी पूछती 'क्या हुआ?' लड़का कहता 'आँख में कोई तिनका चला गया शायद...' जिन्दगी का तिनका...वो नहीं कह पाता. 

जिन्दगी के सबसे ऊंचे आले में रखा उनका इश्क पूरी दुनिया में अपनी खुशबू बिखेर रहा है.

Wednesday, July 25, 2012

कहानी- बोनसाई


जब तुम नहीं थीं, तब मैं तुम्हारा होना चाहता था. एक साया सा दाखिल होता था ख्यालों में. उसका कोई चेहरा नहीं होता था. लेकिन उस अनजाने साये से लिपटकर मैं खूब रोता था और मां के पूछने पर कि क्यों आंखें सूजी हैं मैं हमेशा कहता कि देर रात तक पढ़ता रहा. मां की पहरेदारी में अपने कहे को सच साबित करने के लिए मैं सचमुच कोई किताब खोलकर बैठा या अधलेटा सा रहता. मां आश्वस्त हो जाती लेकिन पापा नहीं. उन्हें अपने बेटे के झूठ समझ में आते थे. लेकिन उन्होंने चुप्पियों में ही अपना जीवन साधना सीखा था. मां के दिन भर बड़बड़ाने को वो अपने मौन से ऐसे उठाकर किनारे रख देते जैसे कोई पढ़ा हुआ अखबार रख देता है. पिता के लिए मां पढ़ा हुआ अखबार थीं या अनचीन्हा अक्षर, यह मैं उनसे कभी पूछ ही नहीं पाया. वो हर काम बड़ी मुस्तैदी से करते थे और चुपचाप. मेरे फिसड्डी नतीजों के बावजूद उन्होंने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा. बहन की शादी करने के बाद वो मेरी तरफ कुछ ज्यादा ही देखने लगे थे.

उनकी खामोश निगाहों का सामना करने की ताकत मुझमें नहीं थी. तब तक तुम मेरी जिंदगी में आ ही चुकी थीं. तुम्हें तो मालूम है ना? लेकिन तुम्हें कैसे मालूम होगा, क्योंकि तुम्हारा न कोई नाम था, न चेहरा. तुम बस एक साया थीं. मेरे सारे दोस्तों की गर्लफ्रेंड्स थीं. मेरी तुम थीं. तुम जिसे मैंने अपने कल्पनालोक में गढ़ा था. मैं पढ़ाई में फिसड्डी सही लेकिन प्रेम में फिसड्डी नहीं रहना चाहता था. सो मैंने ढेर सारी कहानियां तुम्हारी और अपनी गढ़ डालीं. दोस्तों को जब वो कहानियां सुनाता तो वे ईष्र्या से जलभुन जाते. धीरे-धीरे वो कहानियां तुम तक भी जा पहुंची. तुम्हारी किसी सहेली ने मुझे बताया था कि कैसे तुम मेरी कहानी सुनकर रो पड़ी थीं. कितनी देर तक रोती रहीं. और किसी पुराने एलपी की तरह बार-बार उससे वो कहानी सुनती रहीं. उस रोज पहली बार मुझे लगा कि वो तुम ही हो जो रोज साया बनकर मेरे सिरहाने बैठती हो कभी हाथ पकड़कर घूमती हो मेरे साथ.

मैं अब तक तुम्हारा नाम नहीं जानता था. चेहरा भी नहीं. बस मेरी झूठी कहानियां ही वो पुल थीं, जिसके उस पार तुम थीं. मैंने और तेजी से कहानियां लिखना शुरू किया. मेरी कहानियों में दर्द के धारे बहते थे. लोग आह आह करते थे. और मैं किसी खिलाड़ी की तरह खुश होता था अपनी जीत पर. कहानियों के चक्कर में मेरे इम्तिहानों के नतीजे और खराब होने लगे और मैं फेल हो गया. मुझे पहला ख्याल आया कि तुम मेरे बारे में क्या सोचोगी. पहली बार फेल होने पर पापा का चेहरा सामने नहीं आया. सारा दिन मैं मुंह छुपाये बैठा रहा. लेकिन शाम मेरे लिए एक सुंदर पैगाम लेकर आई थी. जानती हो वो सुंदर पैगाम क्या था.

नहीं, तुम्हें कैसे पता होगा कि वो सुंदर पैगाम क्या था. वो पैगाम यह था कि तुम भी फेल हो गई थीं. मैं अपने पास होने पर कभी इतना खुश नहीं हुआ, जितना तुम्हारे फेल होने पर हुआ. सचमुच. अब तक मैं तुम्हारा नाम जान गया था. पुष्पा. यही नाम था न तुम्हारा.

सच कहूं मुझे तुम्हारा नाम कभी अच्छा नहीं लगा. किसी पुराने जमाने की हीरोईन जैसा नाम. मैं तो डॉली, मोना, नैन्सी जैसे मॉर्डन नाम की कल्पना करता था या फिर रितु, अरुणिमा, कशिश, रिद्मा जैसे मनोहारी नामों की कल्पना करता था. वैसे मुझे कौन सा अपना ही नाम अच्छा लगता था. मनोज. भला कोई नाम है. एक क्लास में पांच मनोज तो हमेशा से रहे. मुझे पापा पर इस बात का गुस्सा भी हमेशा रहा कि वो अपने बेटे का एक कायदे का नाम नहीं रख सके. ऐसे लोगों को मां-बाप बनने का हक ही नहीं होना चाहिए जो बच्चों का कम से कम एक अच्छा सा नाम न रख सकें. बहरहाल, मेरे मनोज और तुम्हारे पुष्पा होने को अब कोई बदल नहीं सकता था.

उस रात मैं कितना खुश होकर सोया था कि जिसकी याद में न पढ़कर मैं फेल हुआ वो भी फेल हो गई. जरूर उसने भी मेरे सपने देखने में रातें गारत की होंगी और नतीजा मेरे बराबर आ पहुंचा. असल में यह हमारे प्रेम का नतीजा था जो फेल होने के रूप में पुष्पित पल्लवित हो रहा था. इस तरह एक साथ बीए में फेलकर हमने अपने प्रेम का पहला इम्तिहान पास किया. लेकिन पापा, वो अब चुप रहने वाले कहां थे. वो अंदर ही अंदर मुझसे बदला लेने या मुझे दुरुस्त करने की योजनाएं बनाने में लगे थे. मेरा उनका सामना अब और कम होने लगा था.

मैं उनकी ओर ध्यान ही नहीं देता था. मैं जमकर कहानियां लिखता था. इस बीच मेरी कहानियों की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी. कुछ कहानियां छपने भी लगीं. मेरी उत्सुकता अब सिर्फ मेरी कहानी पर तुम्हारी प्रतिक्रिया जानने की रहती थी. मैं हर उस व्यक्ति से बात करता, जो तुम्हें जानता था ताकि शायद कभी बात निकले कि तुमने मेरी कहानी के बारे में कुछ कहा. उधर तुम्हारी सहेली जो हमारे बीच संवाद का इकलौता पुल थी शादी करके दूसरे शहर जा चुकी थी. दोस्तों के सामने इतनी डींगे मार चुका था अपने और तुम्हारे बारे में कि उनसे किस मुंह से कहता कि मेरी एक मुलाकात तो करवा दें. उस दिन मां ने मेरे लिए निर्जला व्रत रखा था. मां ने कहा शाम को घर जल्दी आ जाना पूजा में तेरा होना जरूरी है. मैं मां के पांव छूकर निकला. पापा सामने पड़े लेकिन मैंने उन्हें अनदेखा कर दिया. तभी एक दोस्त ने बताया कि आज के अखबार में तेरी कहानी छपी है और फोटो भी. मनोज कुमार अब फिल्मी मनोज कुमार टाइप हीरो हो चले थे. सारा दिन कॉलेज में कॉलर उठाये घूमता रहा. क्लास की उन लड़कियों को भी भाव नहीं देता था जो मेरी कहानियों पर फिदा थीं क्योंकि मैं तो तुम पर फिदा था. उस रोज तुम्हारी किसी सहेली ने मुझे संदेश दिया कि तुमने मेरी कहानी पर बधाई दी है और तुम मुझसे मिलना चाहती हो. शाम आठ बजे का वक्त हमारी मुलाकात का तय हुआ. मैं कितना खुश था बता नहीं सकता. बिल्कुल आम सी पे्रम कहानी जो हमारे बीच अब घटने वाली थी उसको लेकर कितना खास उत्साह था. फिल्मों में देखे सारे मिलन के दृश्य याद आने लगे. कि तुम मेरा हाथ थामोगी फिर शरमा जाओगी. वो मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन था. कट ही नहीं रहा था. सेंकेंड की सुइयों पर नजर टिकी हुई थी. इस बीच मां के व्रत वाली बात दिमाग से ही निकल गई थी.हमारा लीला टाकीज के पास वाले शहर के सबसे कम चलने वाले रेस्टोरेंट में मिलना तय हुआ था. मैं वहां समय से पहले तैनात था. अपनी बेसब्री को अपने भीतर निगलते हुए एक किताब में नजरें गड़ाये था. एक खुली पेन जो मेरी किताब के प्रति गहनता को सिद्ध करे को बेवजह इधर-उधर किताब पर टहला रहा था. इसी बीच मेरा एक दोस्त आ पहुंचा.

पापा को दिल का दौरा पड़ा था. मुझे ऐसे हालात का सामना करना आता ही नहीं था. मैं सदा से निकम्मा रहा. घर पहुंचा तो पता चला कि सब अस्पताल गये हैं. अस्पताल पहुंचा तो पापा के सामने खड़े होते ही टांगे थर थर कांपने लगीं. जैसे मैं अपनी जिंदगी के सारे इम्तिहानों के रिजल्ट लेकर सामने खड़ा हूं. पापा की आंखे मेरे चेहरे पर थीं. मैं अरसे बाद उन आंखों में आंखें डालकर खड़ा था कि पापा शायद आंखों से कुछ कहना चाहते हैं, तभी मां की रोने की तेज आवाज ने मुझे चौंकाया. मां के रोने पर मुझे ख्याल आया कि उसका निर्जल व्रत है जो उसने मेरे लिए रखा है. पापा की आंखें अब भी खुली थीं. लेकिन पापा जा चुके थे. पहली बार जब मैंने पापा की आंखों में देखा तो वे मरी हुई आंखें थीं. किसी की आंखों में जीने के तमाम ख्वाब देखना और किसी की चाहत में मर जाने की बातें कहानी में लिखने वाला कहानीकार असल जिंदगी में अपने मृत पिता की आंखों का सामना नहीं कर पा रहा था.

पापा को पता था कि उनका बेटा नाकारा है. कभी कुछ नहीं कर पायेगा. इस बात का अहसास मुझे उनकी नौकरी की जगह नौकरी के लिए अप्लीकेशन लिखते समय हुआ. उस दिन मैं इतना रोया, इतना रोया कि मेरी तमाम कहानियां उसमें जरूर बह गई होतीं अगर उन्हें पढऩे वालों ने संभाल न रखा होता. रिटायरमेंट से ठीक कुछ महीने पहले पापा का जाना जैसा उनकी सोची समझी योजना थी. अपने कंधों पर अपना बोझ तबसे लिए घूम रहा हूं. लेकिन मैं तुम्हें कभी नहीं बता पाया कि मैं उस दिन तुमसे मिलने क्यों नहीं आ पाया था.

तुम्हारी शादी की खबर मिली थी मुझे. लेकिन अपनी शादी की खबर को मैं अब तक पचा नहीं पा रहा था. पापा जाते-जाते मेरी शादी भी तय कर गये थे. पापा की अंतिम इच्छा के आगे मेरी सारी कहानियां बौनी थीं. मैंने मां की सूनी आंखों में अपनी स्वीकृति रखकर उनके होठों पर एक सूखी मुस्कान जुटाने का उपक्रम किया.

जिस दिन तुम्हारी शादी हुई उस दिन मैंने पहली बार शराब पी. किताबों में पढ़ा, फिल्मों में देखा इस तरह भी असर करता है शायद. यूं मुझे सचमुच इतनी तकलीफ हुई भी थी कि नहीं, इस बारे में मैं पक्की तरह से कुछ नहीं कह सकता लेकिन मेरे मन में यह बात जरूर उठी थी कि मेरी प्रेमिका की शादी हो रही है और मैं शराब भी नहीं पी रहा हूं. अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो दुनिया के तमाम प्रेमी मुझे लानतें भेजेंगे सो मैंने उस दिन प्रेमी धर्म का निर्वाह किया और पहली बार शराब पी. इसमें मेरे उन पियक्कड़ दोस्तों की भी भूमिका सहयोगात्मक रही जो मेरे पैसे से मुझे ही पिलाकर, और खुद पीकर मुझे सांत्वना देने के बहाने लुत्फ उठा रहे थे. मैं पहली बार पीकर न जाने क्या क्या बक रहा था. लेकिन पुष्पा मैंने तुम्हारा नाम नहीं लिया था यह पक्का है. क्योंकि अगली सुबह भी दोस्तों की सुई नाम पर अटकी रही. यानी मैंने नशे में भी दोस्तों को सिर्फ कहानियां ही सुनाईं. मेरी और तुम्हारी कहानियां. वो कहानियां जो सिर्फ फिक्शन थीं और लोगों को सच लगती थीं.

मेरी शादी हो गई उसी लड़की से जिसे पापा ने मेरे लिए पसंद किया था. उसका नाम रागिनी था. मुझे यह नाम अच्छा लगा. यह वैसा ही नाम था जैसा मैं अपनी प्रेमिका का चाहता था. सच कहता हूं उस दिन मेरे मन से तुमसे बिछडऩे की तकलीफ थोड़ी कम हुई थी. रागिनी...कितना सुंदर नाम था. अब जब भी मैं कोई कहानी बुनता उसका साया तुम ही होतीं और नाम रागिनी यानी मेरी होने वाली पत्नी का. मेरी कहानियों के शेड्स चेंज हो रहे थे. उनकी चर्चा लगातार बढ़ रही थी. सच कहूं मेरी कहानियां तुमसे उपजीं थीं और तुम मेरे कल्पनालोक से. मुझे तुम्हारी आवाज याद आने लगी जब तुमने अपनी शादी से पहले वाली रात मेरे दोस्त के फोन पर बात की थी. बात क्या थी वो आंसुओं की बरसात थी. मैं दोनों हाथों से तुम्हारे आंखों से बहती बरसात सकेर रहा था.

जिस दिन मेरा विवाह हुआ मैं लगातार तुम्हारे बारे में सोचता रहा. हालांकि शादी के कार्ड पर मनोज परिणय रागिनी मुझे मनोज परिणय पुष्पा से ज्यादा अच्छा लग रहा था.

रागिनी मेरी जिंदगी में मेरी पसंद से नहीं आई थी. वो पापा की पसंद थी. मुझे जाने क्यों लगता कि पापा जाते-जाते मुझसे मेरी उन सारी बातों का बदला ले गये हैं, जिन पर उन्होंने जिंदगी भर कुछ नहीं कहा. मैं रागिनी से बात करना पसंद नहीं करता था. तुम यकीन नहीं करोगी लेकिन सच यही है कि सुहागरात वाले दिन मैं सारी रात खिड़की के पास खड़ा रहा. और सच्चे प्रेमी की भूमिका निभाता रहा. आसमान पर कोई चांद भी नहीं था देखने को. हालांकि इसका एक पहलू यह भी है कि मैं काफी नर्वस था. खुद को रागिनी के काबिल नहीं समझता था. वो इंटर कॉलेज में पढ़ाती थी. इसका मतलब वो पढऩे में अच्छी रही होगी. मुझे पढऩे में अच्छे लोगों से एक किस्म की चिढ़ हो गई थी. उसका नाम भी मेरे नाम से अच्छा था. और वो बहुत खूबसूरत थी. लेकिन इससे क्या मैं तो तुम्हें प्यार करता था. तुम्हारी उस टूटी सी आवाज को जिसमें तुमने मुझसे कुछ नहीं कहा. तुम्हें तो पता है कि हमारा समय कोई ईमेल और फेसबुक वाला तो था नहीं. मैंने तुम्हें हमेशा परछाइयों में देखा था और एकाध बार फोन पर सुना था. जिसमें आधे वक्त तुम रोती रहती थीं.

खूबसूरती एक किस्म का जादू होती है. रागिनी बहुत प्यारी निकली. जितनी वो खूबसूरत थी उतनी ही $जहीन. मैं उसके सामने हमेशा पिद्दी साबित होता. वैसे मैं हमेशा से दब्बू ही रहा था. रागिनी में पापा के जैसा अधिकार था. उसके सामने आते ही मैं अच्छे बच्चे की तरह रिएक्ट करने लगता. धीरे-धीरे मैं तुम्हें भूलने लगा. या फिर याद करता तो यह सोचकर गर्व से भर जाता कि तुम्हारे काले गंजे पति के मुकाबले मुझे अच्छी बहुत अच्छी पत्नी मिली है. और बुरा मत मानना, कई बार मैंने यह भी सोचा कि अच्छा हुआ तुम मेरी पत्नी न हुईं. तुम्हारा सांवला रंग, औसत कद सब रागिनी के आगे बौने पड़ते और तुम्हें खोने का दुख सुख में बदलने लगता.

मां को अचार बनाने में मदद करने से लेकर मेरी कहानियों में जरूरी तब्दीलियां करने तक रागिनी समर्थ थी. थोड़े ही दिनों में मुझे रागिनी से चिढ़ होने लगी. वो मेरे होने को खा जाती थी. मैं खुद को पिटा हुआ सा मनोज महसूस करने लगा. जिसका नाम तक घिसा हुआ हो वो भला क्या करेगा. मेरी कहानियां भी अब पिटने लगी थीं. पत्रिकाओं से लौटी कहानियों को मैं छुपाकर रखने लगा. मैं तुम्हें फिर से याद करने लगा. एक दिन मैंने रागिनी से बदला लेने के लिए उसे तुम्हारे बारे में बता दिया. तुम यकीन नहीं करोगी उसने मेरा कैसा मजाक उड़ाया. कितना हंसी थी वो. उसने मां को भी इस बात के बारे में बताया. फिर मां और वो दोनों खूब देर तक हंसती रहीं. उस दिन मैं अंदर ही अंदर खूब रोया. मुझे जाने क्यों लगा कि तुम होतीं तो मुझे संभाल लेतीं. मैंने तुम्हारा नंबर भी उस दिन लगाया था लेकिन तुम्हारे पति की आवाज सुनकर रख दिया. उस रात मैंने उन सब लड़कियों को याद किया जिनके साथ मैंने कभी न कभी होना चाहा था.

मैंने रागिनी से अंदर ही अंदर हार मान ली थी. जैसे पापा से मान ली थी. एक चिढ़ी हुई हार. लेकिन तुम्हें पता है उस दिन जब मेरे बच्चे को जन्म देते हुए वो बिलख रही थी तो मेरे अंदर का राक्षस जाग उठा था. मुझे जीवन में पहली बार खुशी का अनुभव हो रहा था. सब समझ रहे थे कि बच्चे की आमद की खुशी है लेकिन मैं असल में रागिनी से अपना बदला पूरा होता महसूस कर रहा था. लेकिन रागिनी तो जैसे जीत लेकर ही पैदा हुई थी. बच्चा होने के बाद उसका यशगान और बढ़ गया. मेरी उसके प्रति चिढ़ का संबंध तुम्हारे प्रति प्रेम से नहीं रह गया था फिर भी मैं उन दोनों को आपस में मिलाता रहता था.

मेरी कहानियां मुझसे रूठकर जाने लगीं. मैं एक तिनके में समूची प्रकृति को उकेरने का माद्दा रखने वाला कोरे कागज के आगे निरीह महसूस करने लगा. मेरे सारे शब्द मुझसे रूठ गया. मुझे जब अपने बच्चे का नाम रखना था तब भी मैं कुछ नहीं सोच पाया और रागिनी ने उसका नाम प्रखर रख दिया. कितना सुंदर नाम. मैं अपने निरीह नाम के साथ वापस अपनी दुनिया में लौट आया.

तुम सोच रही होगी कि आज ये क्या मुसीबत हाथ लगी है. जिंदगी भर तो कुछ कहा नहीं और अब ये खर्रा लिख भेजा है. लेकिन पुष्पा ये बहुत जरूरी है. मैंं यह नहीं लिखूंगा तो मर जाऊंगा. तुम ही तो हो जो मुझे समझती हो. यह मैं इतने यकीन से क्यों कह रहा हूं पता नहीं. हमें दुनिया के वही हिस्से सबसे बेहतरीन लगते हैं जहां हम गये नहीं होते. वही पल जिन्हें हमने जिया नहीं होता. शायद इसीलिए मेरी और तुम्हारी दुनिया ही सबसे बड़ा सच रही हमेशा मेरे लिए.

प्रखर बहुत शैतान है. वो मेरे सामने यूं खड़ा होता है जैसे पापा खड़े होते थे. वो मुझे यूं डांटता है, जैसे मैं उसका पिता नहीं वो मेरा पिता है. मां और रागिनी दोनों हंसती हैं. मैं खुद में लौट आता हूं. अंदर ही अंदर महसूस होता है कि मैं बोनसाई होता जा रहा हूं. मेरे अपने गढ़े हुए जीवन का आकार मुझसे बड़ा होता जा रहा है. पुष्पा अगर तुम होतीं तो ऐसा नहीं होता ना? मैं तुम्हें बहुत प्यार करता, वो प्यार जो मैं रागिनी को उसके डर के चलते नहीं कर पाया. तुम मेरा आकाश, मेरी जमीन, मेरा स्वप्न, मेरा यथार्थ सब कुछ. इस रागिनी ने आकर मेरा सब कुछ छीन लिया. मुझे बोनसाई बनाकर रख दिया है. मैं अब अपना जीवन ढो नहीं पा रहा हूं. मेरी कहानियों ने मेरा हाथ छोड़ दिया है.
तुम्हें याद करते हुए मैं इस दुनिया से विदा ले रहा हूं. तुम अपना ख्याल रखना और याद रखना कि मैंने हमेशा तुम्हें बहुत प्यार किया.

तुम्हारा

मनोज...

इसके पहले कि मैं इस चिट्ठी को कहानी का नाम देता यह रागिनी के हाथ लग गई और उसका हंसते-हंसते बुरा हाल है. वो इसका पाठ करके मां को भी सुना चुकी है. मां अपनी हंसी का सुर रागिनी की हंसी से मिलाते हुए पूछती हैं कि तुम मसखरी करने से बाज नहीं आओगे? प्रखर चिट्ठी को हवाई जहाज बनाकर उड़ा रहा है. रागिनी मुझे चिकोटी काटकर पूछती है ये पुष्पा कौन है? मैं हंसकर कहता हूं 'कोई नहीं'. शायद जिंदगी में पहली बार मेरे कानों ने अपने मुंह से कहा कोई सच सुना था...

(दैनिक जागरण के साहित्य विशेषांक पुनर्नवा में प्रकाशित)

Sunday, July 15, 2012

आयत...



मेरे कानों में कुछ गिरने की आवाजें थीं..सफ़र के दौरान क्या गिरा होगा भला. चौंक के देखती हूँ आस पास. सब सलामत है. ट्रेन अपनी गति से चल रही है. चीज़ें अपनी गति से छूट रही हैं. लोग नींद की ताल से ताल मिला रहे हैं..मैं रात भर कुछ गिरने की आवाजें सुनती हूँ. खुद को टटोलती हूँ बार-बार. गिरने की आहटें बीनते-बीनते रात बीत जाती है. सुबह झांकती है ट्रेन के डिब्बे में. पर्दा हटाते ही वो इत्मिनान से भीतर चली आती है. मेरी आँखों में भी कोई हैरानी नहीं, उसकी आदत से वाकिफ हूँ सदियों से. सुबह ही क्या कुदरत की हर चीज़ हम तक आने को बेताब ही रहती है हमेशा. हम ही न जाने कैसे रेशमी पर्दों की छांव में खुद को छुपाये फिरते हैं.

बीच के सारे शहर छूट गए थे. दौसा...गुजर रहा था. लोग अपना सामान समेट रहे थे और मैं ख़ुद को. तभी एक नन्ही बच्ची (जिससे आँखों ही आँखों में लुका-छिपी का खेल खेला था शाम को) चुपके से आकर पीछे खड़ी हो जाती है. मेरे बालों को छूती है. मैं अनजान होने का मुखौटा पहनती हूँ. वो और करीब आ जाती है. मैं और अनजान, वो और करीब. एकदम सटकर बैठ जाती है. झांककर देखती है मेरे चेहरे की ओर. मैं ध्यान खिड़की के बाहर के मौसम पर टिकाती हूँ...हालाँकि ध्यान वहीँ है पूरा, उस बच्ची के पास. शायद दुनिया ने हमसे पहले उस बच्ची की सिखा दिया है कि हमें खतरा अनजान लोगों से नहीं जान पहचान वालों से ज्यादा है. अजनबी सूरतों में हम सहज होते हैं और किसी जानने वाले को देखते ही अपने मुखौटे सँभालते फिरते हैं. मैंने उस बच्ची को अपने अजनबी होने की सहजता दी और उसने अपनी खुशबू से मुझे नवाज़ दिया. सुबह वाकई बेहद खुशनुमा हो उठी. मैंने उसके गाल खींचे. उसने मेरे बाल. हिसाब बराबर. हम दोनों हंस दिए.

जयपुर आ गया....मैं इत्मिनान से उतरती हूँ. टैक्सी एयरपोर्ट की ओर दौड़ रही थी....उस बच्ची की खुशबू मानो फिजाओं में घुली हुई थी. मैंने महसूस किया कि रात भर जो गिरने कि आवाजें बीनी हैं वो असल में मेरे भीतर के तमाम विकारों के किले के ध्वस्त होने की आवाजें थी..मन एकदम शान्त...धुला धुला सा.

वो नन्ही परी अपने पापा की बाँहों में सिमटे हुए मुझे देखे जा रही थी...

Thursday, July 12, 2012

कितना कम जानते हैं हम ज़िंदगी को...



'बच्चों की आवाज व अनुभवों को कक्षा में अभिव्यक्ति नहीं मिलती. प्रायः केवल शिक्षक का स्वर ही सुनाई देता है. बच्चे केवल अध्यापक के सवालों का जवाब देने के लिए या अध्यापक के शब्दों को दोहराने के लिए ही बोलते हैं. कक्षा में वे शायद ही कभी स्वयं कुछ करके देख पाते हैं. उन्हें पहल करने के अवसर भी नहीं मिलते हैं. किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास की बजाय पाठ्यचर्चा बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि वे अपनी आवाज ढूंढ सकें....'

एनसीएफ यानी राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा 2005 के दूसरे अध्याय के दूसरे पन्ने के चौथे पैराग्राफ की इन लाइनों को पढ़ते हुए यहीं पर ठहर जाती हूं. बच्चों को इतना सक्षम बनाएं कि वे अपनी आवाज ढूंढ सकें... कौन बनायेगा बच्चों को इतना सक्षम...हम में से कितनों ने सुनी है अपनी आवाज. अपनी आवाज सुनने के मानी भी समझते हैं क्या हम. सैकड़ों बरस पहले गौतम बुद्ध ने सुनी थी...

आवाज़ क्या है. बोले हुए को सुनना या इससे आगे कुछ. दरअसल, हम बोले हुए को  आवाज़ समझने के आदी हैं. बोले हुए के कानों में जाने को सुनना कह देते हैं और ठीक उसी जगह न जाने कितने सारे मानी गिरकर खो जाते हैं. हम किसी भाषा के कुछ वाक्यों को उठा लाते हैं. उन वाक्यों में उलझ जाते हैं. वाक्यों से लाड़ लगा बैठते हैं या फिर झगड़ा कर बैठते हैं. तुमने ये कहा था, तुमने वो कहा था...तुमने ऐसा क्यों कहा, मैंने तो ये नहीं कहा था. तीस-पैंतीस, पचास-साठ, कभी कभी इससे भी ज्यादा की उम्र निकल जाती है बोले हुए वाक्यों से उलझते हुए. कभी इन वाक्यों में हाथ फंसता है, कभी पांव. कभी तो गर्दन ही उलझ जाती है और दम घुटने लगता है. अगर वाक्यों की तरफ हाथ बढ़ाने से पहले मानी की तरफ हाथ बढ़ाया होता तो शायद वो लम्हा महक ही उठता और उस महकते हुए लम्हे में पूरी उम्र ही बीत जाती.

सुबह ही फोन पर एक लड़की की टूटी, बिखरी आवाज को समेटते हुए सोच रही थी कि वो खुद क्यों नहीं सुन रही अपनी आवाज. छह महीने पहले प्रेम विवाह किया था. अब लगता है कि लड़का तो उसे प्रेम ही नहीं करता. क्या पता कि लड़के को भी यही लगता हो. सवाल प्रेम का नहीं उन बातों का है, जिन्होंने आवाज बनकर एक-दूसरे को छला था. वो फेसबुक के संदेशों में अपनी आवाजें भरकर भेजते, मोबाइल के मैसेजेस में भी और कभी-कभी कॉल बटन के जरिये अपनी आवाज़  में भी खुद को भरकर एक-दूसरे को भेजते. लगता कि जिंदगी उन्हीं संदेशों में है कहीं, उसी आवाज़ में. वो मोबाइल कंपनियां बदलते हैं और फ्री टॉक वाउचर को साक्षी मानकर अपनी आवाजों को ब्याह देते हैं. फिर खुद को भी ब्याह देते हैं. पर छद्म आवाजें जिंदगी की आंच में पिघलने लगती हैं. संदेशों में रह जाते हैं सिर्फ वाक्य रूमानियत उड़ जाती है सारी. इस तरह रिश्तों के दरकने की शुरूआत होती है और इल्ज़ाम आता है आवाज़ के सर.

उस लडकी से पूछना चाहती हूं कि अपने चेहरे पर उसकी आवाज को कभी उगते देखा था क्या. कभी त्वचा पर रेंगते हुए आंखों तक जाती आवाज को छुआ था. दिन में कई बार आंखों की चौखट छूकर लौटी थी क्या कोई आवाज़... कुरान की आयतों सी पाकीज़ा आवाजों को मैंने अक्सर आंखों से बहते हुए देखा है. सुना नहीं कभी. उसने जो सुना था वो क्या रहा होगा...

....................................

ओह....कहां से कहां आ पहुंचती हूं मैं भी...एनसीएफ का वो पन्ना फड़फड़ाकर एक ध्वनि बनता है...आवाज़. अपनी ओर ध्यान खींचता है. मैं गर्दन झटकती हूं, लौटती हूं एनसीएफ की ओर.... किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास की बजाय पाठ्यचर्चा बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि बच्चे अपनी आवाज ढूंढ सकें....हम्म्म्म्म..!

कितना कम जानते हैं हम ज़िंदगी को...

Friday, July 6, 2012

ज़िन्दगी अगर अल्फाज़ होती


हर यात्रा के बाद हम वापस मुडते हैं. वापस अपने ठीहे पर लौटने के लिए. हमारे लौटने की टिकट कनफर्म हो, न हो. तारीख तय हो, न हो लेकिन हमारे कदम वापस लौटने के लिए मुड़ते ही हैं. नहीं मुड़ पाने की स्थिति में हमारी गर्दन मुड़ती है बार-बार और किसी नास्टैल्जिया से जाकर जुड़ जाती हैं आंखें.

हमारी वापस आने की तारीख भी मुकर्रर थी और टिकट भी कनफर्म. हम लौट रहे थे...उस लौटने में हमसे एक शहर छूट रहा था. हम आगत की ओर दौड़ रहे थे विगत से दूर होने को आकुल. लेकिन आगत की ओर दौड़ते हुए न जाने कब, कैसे विगत के तमाम टुकड़े स्म्रतियों में चिपके रह गये. बच्चे के जन्म के सिवा कोई भी आगत उतना निश्छल नहीं होता न ही उतना मजबूत कि विगत को अपने कंधों पर संभाल सके और जिंदगी का बाकी का सफर आसान कर सके.
दिन ने अपनी चौड़ी हथेली को पसार दिया था. आगत के आने वाले पलों की आहटें और बीते हुए पलों की स्म्रतियों का खेल जारी था. दिन की चौड़ी हथेली पर इन लम्हों की धमाचौकड़ी देखते हुए न जाने कैसे उसकी हथेली खुल गई आखों के सामने. उसकी हथेलियों के रेखाओं के जाल में मेरा नाम लिखा तो था लेकिन जहां-जहां मेरे नाम के अक्षर थे, वहां-वहां लकीरें टूट रही थीं. जैसे गाते-गाते सांस अटक गई हो. उसकी खुली हथेली को अपनी हथेलियों से बंद करते हुए इतनी तो आस रहती ही थी कि मेरे नाम के अक्षर तो हैं वहां. मैं उससे कहती कि बंद रखना हथेली कि मेरे नाम के अक्षर कहीं गिर न जायें धरती पर.

वो कहता कि गिर गये तो क्या होगा...तुम तो रहोगी न मेरे दिल में

मैं खामोश रहती, मेरे नाम के अक्षर अगर इस धरती पर गिर पड़े तो...? मैं नहीं चाहती मेरी तरह कोई और भी विरह की वेदना में शहर-दर-शहर भटके. सांस-सांस खुद को जज्ब करे और एक लंबे इंतजार के कांधे पर जिंदगी का सिरा टिका दे.
ज़िन्दगी अगर अल्फाज़ होती तो मैं उसे पलकों पर उठाती, अगर वो राग होती तो उसे दिल में रख लेती और दिल से गाती जिंदगी का राग लेकिन जिंदगी तो वो खुद था और उसके हाथों की लकीरों में मेरे नाम के टूटे अक्षर ही थे बस.

स्म्रतियों में उसकी हथेली की खुशबू कुछ यूं जज्ब हुई कि दिन की खुली हथेली का ख्याल कहीं गिर गया शायद. तभी आसमान ने करवट बदली और उंटों ने अपनी गर्दन झटकी. आसमान में नदियां उतर आईं और सूरज उन नदियों में उतराने लगा. वो अठखेलियां कर रहा था. तेज गर्मी से दुनिया को झुलसाने वाला सूरज अब आकाश गंगा में डुबकियां ले रहा था. कभी उसकी डुबकी लंबी हो जाती है और आकाश का रंग लाल हो जाता. मानो लाल रंग की कोई नदी आसमान में उतर आई हो बस उसकी बौछारें हम तक नहीं आ रहीं. ये लाल रंग की नदी कभी नीली हो जाती, कभी भूरी और सूरज इन नदियों में लोट लगाता फिरता. दिन की हथेली काफी चौड़ी लगी उस रोज. कुछ दिन इतने लंबे होते हैं कि बीतते ही नहीं...
मैंने निर्मल वर्मा की कहानी पर ध्यान लगाना चाहा...‘नींद के लिए छटांक भर थकान, छटांक भर लापरवाही जरूरी है. अगर इन दोनों के बावजूद नींद नदारद हो तो छटांक भर बियर....’ सोचती हूं सदियों की थकान, कुंटलों लापरवाही और लीटरों बियर भी कभी-कभी नींद का इंतजाम नहीं कर पाती. स्मतियां रात भर नींद को धुनती रहती हैं और सुबह तक तैयार कर देती हैं नये सिरे से इंतजार की रेशमी चादर.

छूटते शहर के नाम में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी न आने वाले  शहर के नाम में. न पीछे कोई छूटा था, न आगे कोई इंतजार में था. ऐसे सफर अपने आपमें गोल-गोल घूमने जैसे होते हैं बस. किसी अनजान स्टेशन पर उतरते हुए वहीं रह जाने का जी चाहता है. दिन की हथेली बंद हो चुकी थी. आसमान पर चांद की हाजिरी दर्ज हो चुकी थी. उस अनजान से छोटे से स्टेशन पर किसी ने कहा ‘अलवर तो निकल गया...’ तो अचानक दिशाबोध हुआ. गाड़ी चली और न चाहते हुए चलती गाड़ी की सीढि़यों पर अपना पैर रख दिया. जिंदगी बस दो कदम के फासले पर थी फिर भी...

Friday, June 22, 2012

सौन्दर्य


जबसे समझ लिया सौन्दर्य का असल रूप
तबसे उतार फेंके जेवरात सारे
न रहा चाव, सजने सवरने का
न प्रशंसाओं की दरकार ही रही
नदी के आईने में देखी जो अपनी ही मुस्कान
तो उलझे बालों में ही संवर गयी
खेतो में काम करने वालियों से
मिलायी नजर
तेज़ धूप को उतरने दिया जिस्म पर
न, कोई सनस्क्रीन भी नहीं.
रोज सांवली पड़ती रंगत
पर गुमान हो उठा यूँ ही
तुम किस हैरत में हो कि
अब कैसे भरमाओगे तुम हमें...

Friday, June 15, 2012

कई दिनों से शिकायत नहीं ज़माने से...


आते-जाते बादलों को ताकते हुए देखना भी कई बार नीरस और ऊबाऊ होने लगता है. गर्मी से बेहाल पंछियों को डालों पे लटकते देख खुद पर भी झुंझलाहट ही होती अक्सर कि हम भी ज़िंदगी की डाल पे बेसबब लटके ही हुए हैं बस. क़दमों की रफ़्तार कभी तेज, तो कभी कम लेकिन सफ़र का हासिल एक नया सफ़र...यूँ सफ़र में होना हमेशा खुशगवार होता है फिर भी कई बार हम चाहते हैं कि सफ़र सिर्फ आनंद के लिए ना रह जाये...खासकर ज़िंदगी का सफ़र. हर शाम दिन के लम्हों का गुणा भाग करना और अगले दिन कुछ बेहतर हो पाने की उम्मीद के साथ रात के तकिये पे सर टिका देना...इस तरह ज़िंदगी एक आदत सी बनने लगी ना चाहने के बावजूद.

ज़िंदगी से ख्वाहिशें हज़ार मेरी भी थीं लेकिन उनका रूप रंग वीयर्ड था शायद. किसी एलियन की तरह कभी परिवार में कभी दोस्तों के बीच अपने 'होने ' में अपने 'ना होने' को चुराते हुए हमेशा महसूस हुआ कि ये वो सफ़र नहीं है शायद जिसमें बड़ी हसरतों से शामिल हुई थी. ना जाने कब, कैसे रास्ते मुड़ते गए और हमें अपना ही चेहरा अजनबी लगने लगा. फिर खुद को समझाने के लिए कई तरह के तर्क ढूंढ लिए...ज़िंदगी ऐसी ही होती है. लेकिन नहीं...'ज़िंदगी जैसी है वैसी मुझे मंजूर नहीं' की तर्ज पर अपने भीतर एक आक्रोश को पलने दिया. लेकिन सिर्फ आक्रोश से आप कुछ नहीं कर सकते...वो आपका जीना मुश्किल ही करता है....ऐसे ही मुश्किल भरी लम्बी काली रात आखिर विदा हुई.

एक ऐसे ठिकाने पर हूँ जहाँ लोगों में प्यार है, संभाल है, सद्भाव है...एक सिरे से उगता है राग खमाज तो दूसरे सिरे पर कुमार गंधर्व कबीर गा रहे होते हैं. जहाँ 'मैं' धराशायी हैं सारे, या तो 'आप' हैं या 'हम'. काम है पर काम सा नहीं लगता, ऑफिस है जो घर सा लगता है. बॉस हैं जो किसी दोस्त से लगते हैं. किताबों की खुशबू है...और दूर तक फैला हुआ ऐसा एकांत कि कुछ गुना जा सके, कुछ बुना जा सके.

कितने दिन हुए किसी ने किसी की बुराई नहीं की. किसी राजनीति का कसैलापन जबान पर नहीं बैठा, नहीं दिखा कोई जेंडर बायस. नहीं लड़ना पड़ा एक सिगल कॉलम जेनुइन खबर के लिए और साथियों के बीच नहीं उठीं तलवारें महिला मुद्दों पर बात करने पर. कितने दिन हुए ज्यादा बोले हुए. सुनती ही ज्यादा हूँ इन दिनों. हर किसी का बोलना किसी संगीत को सुनने सा लगता है और दे जाता है बहुत कुछ. किसी अनाड़ी की तरह अक्सर शामिल होती हूँ उन सबके बीच और देखती हूँ ज्ञान की डालियों को लगातार झुकते हुए. अहंकार का कोई रूप नहीं दिखा कई दिनों से.

कई दिनों से सूरज सही समय पर आ बैठता है खिड़की पर और चमकता ही रहता है देर रात तक...बड़ी अनमनी सी हो चली हैं अमावस की रातें...

Friday, June 1, 2012

कर चुके तुम नसीहतें हम को ...


हम तो चलते हैं लो ख़ुदा हाफ़िज़
बुतकदे के बुतों ख़ुदा हाफ़िज़

कर चुके तुम नसीहतें हम को
जाओ बस नासेहो ख़ुदा हाफ़िज़

आज कुछ और तरह पर उन की
सुनते हैं गुफ़्तगू ख़ुदा हाफ़िज़

बर यही है हमेशा ज़ख़्म पे ज़ख़्म
दिल का चाराग़रों ख़ुदा हाफ़िज़

आज है कुछ ज़ियादा बेताबी
दिल-ए-बेताब को ख़ुदा हाफ़िज़

क्यों हिफ़ाज़त हम और की ढूँढें
हर नफ़स जब कि है ख़ुदा हाफ़िज़

चाहे रुख़्सत हो राह-ए-इश्क़ में अक़्ल
ऐ "ज़फ़र" जाने दो ख़ुदा हाफ़िज़

Saturday, May 26, 2012

यमन की सी मिठास गंगा की शान्ति



उसे रंगों से बहुत प्यार था. कुदरत के हर रंग को वो अपने ऊपर पहनती थी. उसका बासंती आंचल लहराता तो बसंत आ जाता. चारों ओर पीले फूलों की बहार छा जाती. वो हरे रंग की ओढनी ओढती तो सब कहते सावन आ गया है. उसका मन भीगता जब भी तो बादल आकर पूरी धरती को बूंदों के आंचल में समेट लेते. सावन लहराने लगता. उसकी उदासियां काली बदलियों में और उसका अवसाद भीषण तूफान में जज्ब हो जाता. वो लाल रंग पहनती कभी-कभी. वो सुर्ख शरद के दिन हुआ करते थे. धूप अच्छी लगने लगती और नजर की आखिरी हद तक सुर्ख फूलों की कतार सज जाती. यहां तक कि उसके गालों पर भी गुलाब उतर आते. उसकी नाराजगी के दिनों को गर्मियों का नाम दिया लोगों ने. हालांकि वो जानती थी कि ये नाराजगी उसकी खुद से है और इससे किसी को नुकसान नहीं होना चाहिए. ऐसे में उसकी आंखें छलक पडतीं और तेज गर्मियों में बारिश की कुछ बरस पडतीं. वो मुस्कुराती और दुनिया को तेज गर्मियों से राहत मिलती. असल में उसे जिंदगी से प्यार था. जिंदगी के हर रंग से, हर खुशबू से.

वो रोज खुशबुओं के गुच्छे उतारकर लाती और उन्हें घर के हर कोने में लटका देती. खुशबुओं के उन गुच्छों को हर रोज एक नया रंग देती. कभी गुलाबी रंग वाला गुच्छा बाहर वाले कमरे के ठीक सामने टांग देती और बैंगनी रंग का गुच्छा रसोई में. सफेद रंग की खुशबू वो अपने सोने के कमरे में ले जाती और और दीवारों से लेकर छत तक, खिडकियों से लेकर फर्श तक बिखरा देती. सोने के कमरे में कोई बिस्तर नहीं था...सफेद फूलों की खुशबू जमीन पर बिखराकर वो खुद भी जमीन पर बिखर जाती....कभी-कभी खुशबुएं अपना रंग बदलतीं, जगह बदलतीं. हवाओं में हलचल होती और वे उठकर एक कमरे से उठकर दूसरे कमरे की ओर चल पडतीं. सुर्ख रंग की खुशबू अमूमन दरवाजे पर टंगी होती थी और बडी हसरत से सफेद खुशबू वाले कमरे की ओर देखती थी.

एक रोज लडकी सारी खुशबुओं को समेटकर बैठी थी. सुर्ख भी, सफेद भी, गुलाबी भी, नारंगी भी....उसने खुशबुओं के चेहरों पर अपना हाथ फिराया और पल भर में उनकी पहचान गुम हो गई. सारी खुशबुएं उसकी हथेलियों में उतर आईं और रंग वहीं बेजान से पडे रहे...लड़की वक्त के दरख्त पर पीले रंग की खुशबू तलाश रही थी...वो खुशबू जिसमें राग यमन की सी मिठास होती थी और गंगा की लहरों सी शान्ति. वो तलाशती रही....उसकी आंखों में गंगा यमुना, ब्रहृमपुत्र, गोदावरी, कावेरी सब की सब उतर आईं. अपनी खुशबू भरी हथेलियों से उसने उन नदियों को साधना चाहा लेकिन नहीं साध पाई...उसकी हथेली में सिमटी हुई सारी खुशबुएं नदियों में बह गईं...हर नदी का पानी महकने लगा...लेकिन लडकी की हथेलियां भी सूनी हो गईं, आखें भी और घर भी....

लडकी का मन हल्का हो रहा था. अपनी आंखों से प्रवाहित होने वाली नदियों में उसने समस्त इच्छाओं का तर्पण जो कर दिया था...नदियों के पानी में उसके अवसाद का नीला रंग घुल गया. खुशबू के साथ अवसाद के नीले रंग का मेल किसी नई कंपोजिशन सा मालूम होता.

बिना खुशबू वाले उस घर से उस रोज पहली बार चंदन की खुशबू आती लोगों ने महसूस की...लडकी फिर कभी नहीं दिखी ऐसा लोग कहते हैं, हालाँकि खुशबू और नदियां हमेशा उसके होने का ऐलान करती हैं...

Wednesday, May 23, 2012

नहीं, इतना एकांत काफी नहीं...



दूर-दूर तक फैला एकांत का विस्तार और उसमें चहलकदमी करती खामोशी. एक पांव की आहट दूसरे को सुनाई नहीं देेती. एकांत का हर हिस्सा अंधकार मे डूबा हुआ. इतना घना अंधेरा कि सब कुछ एकदम साफ नजर आ रहा है...सचमुच अंधेरे में चीजें साफ नजर आती हैं. जिंदगी का हर लम्हा बिखरा पडा है.
एकांत के विस्तार में जिंदगी भर का कोलाहल गुम हो गया है. असीम शांति का अनुभव हो रहा है. मानो युगों से ऐसी ही नीरव शांति की कामना में थी. क्या यही वो शांति है जिसकी तलाश में संतजन निकल पडते थे...क्या यही वो शांति है जिसके बाद जिंदगी की कोई भी अभिलाषा बाकी नहीं रहती. क्या यही वो शांति है जिसका हाथ थामकर दूर कहीं निकल जाने को जी बेताब था.

नहीं, ये वो शांति नहीं है. अभी इसमें अपने होने का अहसास बाकी है. मैं जिन्दा है कहीं और उसके साथ जुडा है अहंकार भी. अभी इसे मेरी शांति कह रही हूं. जब तक ये मेरी है, ये शांति नहीं हो सकती. इसके लिए मेरा को अपना स्थान छोडना होगा. लेकिन होश संभालने के साथ जिस मैं ने हाथ पकड लिया हो वो कैसे छूटेगा भला. ये मैंने लिखा, ये मैंने नहीं लिखा, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ...ये मैं तो मुझसे भी बडा हो गया है. एकांत के विस्तार में भी मैं नहीं छूट रहा. न ही छूट रही है सांसों की रफतार...न नब्ज रुकी है अभी और न बंद हुआ है दिल का धडकना...कितना शोर है चारों तरफ. कितनी तेज है सांसों की रफतार...नहीं, इतना एकांत काफी नहीं है मेरे लिए अभी इसका विस्तार होना बाकी है इतना विस्तार कि वहां किसी की याद न आए, अतीत से कोई आवाज न आए, आने वल कल की कोई उम्मीद भी नहीं बस अंधेरे को चीरती एक सफेद चादर हो. शफफाक....सफेद फूलों का काफिला हो. गालिब का दीवान सिरहाने रखा हो और युगों की यात्रा कर मेरी आंखों में लौटी नींद हो....सदियों की नींद सदियों तक.

अभी इतना एकांत नहीं भरा जीवन में. कल शाम रियाज के वक्त झन्ननननन से टूट गया था सितार का तार...न जीवन का रियाज ही हुआ ढंग से न मत्यु का. कितनी कमअक्ल विद्यार्थी निकली मै जिंदगी की पाठशाला की. कोई ग्रेसमार्क भी नहीं.

Sunday, April 29, 2012

ओस की बिछावन पर स्म्रतियों के पंख ...


ना जाने कब ज़िंदगी का सम छूट गया...अपने ही सम को पकड़ने के लिए हाथ बढाया और खुद से ही छूट गयी. इस दरम्यान एक नींद के गाँव के बारे में सुना. सुना था कि उस गाँव में ख्वाब आते हैं. पलकों की डालों से चिपक जाते हैं. ख्वाबों की रेशमी छुवन ज़िंदगी के रेगिस्तान में कुछ नमी भर जाती है... ...सुना था कि उदासी नहीं रहती उस गाँव में. उस गाँव के हर घर के बाहर मुस्तैद पहरेदार होता है, जो उदासियों को भीतर जाने नहीं देता...रोक देता है दरवाजे पर. पहरेदार कभी बारिश, कभी बादल, कभी खुशबू की शक्ल में होता...उदासियों को हाथ पकड़कर गाँव के बाहर छोड़ आता. उस गाँव का रुख किया तो उदासियों से कहा, 'तुम मेरे साथ नहीं जा सकतीं. जहाँ मैं जा रही हूँ वहां तुम्हारे लिए कोई जगह ही नहीं है...' उदासियाँ और उदास हो गयीं, उन्हें मेरे साथ की आदत थी. मुझे भी, फिर भी नजर घुमा ही ली. 
नींद का गांव खूबसूरत था. रास्तों में प्रेम की रौशनी थी. मौसम में हलकी सी शोखी. बादल कोई टुकड़ा कभी सर के ठीक ऊपर से निकलता बालों को छूते हुए और कभी पैरों के पास बैठकर सुस्ताने लगता. चाँद आसमान से उतरकर घर के ठीक सामने वाली नदी में तैरने लगता. लहरों से अठखेलियाँ करने लगता. रात को जब जंगल सारे सो जाते तो और लोग अपनी ख्वाब्गाहों का रुख करते तो ख़ामोशी का एक ऊंचा सुर समूचे गांव को अपनी चादर में समेट लेता. नींद का गांव सुरों की चादर में करवटें लेता. ओस की बूंदों की बिछावन पर हमने भी अपनी टूटी हुई नींद के टुकड़े रखे...लेकिन मेरी इस बिछावन पर ख्वाब नहीं तुम्हारी याद आई...

Wednesday, April 11, 2012

उगना...


' न...अब सांस लेने की कोई गुंजाइश नहीं बची. जीने का जी नहीं करता कि अब सीने में कोई ख्वाहिश नहीं उगती...न ख्वाब आते हैं नींद के गांव में... जीवन अब सहा नहीं जाता, न लडऩे का मन होता है न जूझने का. कोई खुशी खुश नहीं करती न कोई दु:ख उदास करता है. जीवन में अब कुछ भी नहीं बचा जो रोक सके मुझे अपने पास. मुझे जाना ही है अब जिंदगी के पार कि शायद वहां कोई उम्मीद रखी हो मेरे लिए....'

मेज पर टेढ़ी-मेढ़ी सी लिखावट में ये शब्द रखे थे. पेपरवेट के नीचे दबे हुए. मेज के ठीक सामने एक खिड़की थी. खिड़की जो ज्यादा बड़ी नहीं थी, बहुत छोटी भी नहीं. पुराने जमाने के घरों की तरह कुछ सीखचेनुमा सी खिड़की. खिड़की के उस पार से कोई वनलता गुजर रही थी. जिस पर बेशुमार पीले फूलों का कब्जा था. इस कदर कब्जा कि वनलता अपना अस्तित्व ही भूल गई हो मानो. उन फूलों में ही वो अपना होना रख चुकी थी.

ये किसका कमरा है, ये किसकी लिखावट है और मानी क्या हैं इन शब्दों के. क्या कोई इस तरह अंजुरी भर शब्द रखकर जिंदगी से जा सकता है कि उसकी जिंदगी में अब कोई उम्मीद नहीं उगती. कैसे खो जाती हैं सारी उम्मीदें कि निराशाएं कमरे में फैले सारे उजियारे पर काबिज हो जाती हैं और जिंदगी पर भारी पडऩे लगती हैं.
नहीं, उम्मीद कभी उगना बंद नहीं करती कि बस हम उनके उगने पर अपनी निगाहों की बंदिश लगा देते हैं. आगे बढ़ते हुए कदम लगातार पीछे लौटाने लगते हैं. वजह कुछ भी हो, सृष्टि का यही नियम कि उगना कभी बंद नहीं होता.

बंजर से बंजर धरती पर एक न एक दिन कोई फूल खिलता ही है. घनी काली रात के सीने में एक सूरज छुपा ही होता है. रात के सीने में छुपा वह सूरज अपने उगने के सही समय का इंतजार करता है. गर्भ के गृह में एक किलकारी उग रही होती है. किसी चिडिय़ा के घोसले में नन्हे-नन्हे पंख उग रहे होते हैं. रास्तों पर उग रही होती हैं मंजिलें और मंजिलों पर एक नया ख़्वाब उगने को बेकरार होता है कि इसके बाद नये सफर की शुरुआत होनी है. धरती के हर कोने में हर वक्त कुछ न कुछ उग रहा होता है. और तो और जिस वक्त डूब रहा होता है सूरज किसी देश में ठीक उसी वक्त वो उग भी रहा होता है किसी दूसरे देश में. कहीं चांद भी उग रहा होता है ठीक उसी वक्त.

फिर आखिर क्यों कोई नाउम्मीदी से इस कदर भर उठा कि जीवन से बेजार हो गया. आखिर ये किसका खत है जो उम्मीद के न उगने की बात कह रहा था. कौन था वो, अब कहां होगा, क्या वो जीवन की वैतरणी को पार कर चुका होगा या कि बस उतरने ही वाला होगा उस नदी में. क्या ये अंजुरी भर शब्द उसकी जिंदगी की जिजीविषा के द्योतक नहीं हैं. क्या इन शब्दों से यह आवाज नहीं आ रही कि क्यों नहीं कोई आता और मुझे जिंदगी की तरफ घसीट लाता....

मैंने बहुत पूछा लोगों से, पता लगाने की कोशिश की कि ये किसका कमरा है. ये किसका खत है...लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया. मैं समझ चुकी थी कि ये शब्द हम सबके हैं. कभी न कभी हम सब जिंदगी से यूं ही मायूस हो उठते हैं जिंदगी किसी कारा से कम नहीं लगती. और हम जिंदगी की इस कारा से खुद को आजाद कर लेना चाहते हैं. टेढ़ी-मेढ़ी इबारत में अपनी निराशाओं को दर्ज करते हैं कि अब बाकी नहीं रहा किसी उम्मीद का उगना और ठीक उसी वक्त कोई उम्मीद जाग रही होती है हमारे ही भीतर. पेपरवेट से दबे वो शब्द अपने अर्थहीन होने पर मुस्कुराते हैं और खिड़की के बाहर पीले फूलों में झलकती उम्मीद से लाड़ लगा बैठते हैं.

असल में जिंदगी वहीं कहीं सांस ले रही होती है, जहां कोई उम्मीद दम तोड़ती है. मैं उन निराशा से भरे शब्दों को उठाकर खिड़की के बाहर फेंक देती हूं और महसूस करती हूं कि मैं खुद अपने ही भीतर नये सिरे से उग रही हूं.