Thursday, June 30, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला... 5


इधर मरीना की जिंदगी में उम्मीदें महक रही थीं. निराशा हाथ छुड़ा रही थी, मुस्कुराहटें हर वक्त उसके होठों के आसपास खेलती रहती थीं, उधर बोरिस भी अपनी दुनिया में उम्मीदों का नया संसार रच रहा था. बोरिस परस्तेनाक...रूस का वही महान कवि जो मरीना और रिल्के के पत्राचार की पहली कड़ी बना था. वो मन ही मन मरीना के ख्वाब बुनने लगा था. उसी आसक्ति के चलते ही शायउ उसने चाहा होगा कि रिल्के के पत्र को पाकर जो खुशी उसे मिली है, वो मरीना को भी जरूर हासिल होनी चाहिए. प्रेम अक्सर हमारी चेतना पर हावी होता जाता है और हम अवचेतन में ठहर चुके स्नेह के बताये रास्तों पर दौड़ पड़ते हैं. अच्छे-बुरे के बारे में सोचने का वक्त ही कहां होता है तब. बोरिस अपनी ही बेख्याली में था. मरीना की कविता द एंड को वो बार-बार पढ़ता था. उसे मरीना के चमकदार व्यक्तित्व और पवित्र रूह से अगाध जुड़ाव हो चुका था. आखिर एक रोज उसने खुद से कन्फेस किया कि हां, उसे मरीना से प्यार है. मास्को के हालात ऐसे थे कि जीवन में सिर्फ उथल-पुथल और अव्यवस्था ही थी. ऐसे में मरीना के ख्यालों का साथ उसे एक बेहद खूबसूरत संसार में ले जाता था.
ओह...मरीना...बरबस वो बुदबुदा उठता.


आखिर 20 अप्रैल को थोड़े संकोच, उलझन और ढेर सारे प्यार के साथ मरीना को उसने एक पत्र लिख ही दिया, 

प्रिय मरीना,
आज मैं तुमसे वो कहना चाहता हूं जिसे मैं लंबे समय से अपने भीतर छुपाये हूं. उन शब्दों को तुम्हें सौंपना चाहता हूं जिनकी आग में मैं न जाने कब से झुलस रहा हूं. मरीना, तुम्हारे ख्याल का मेरे आसपास होना मुझे क्या से क्या बना देता है तुम नहीं जानतीं. मैं तुम्हारे पास होना चाहता हूं, तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं हमेशा. तुम नि:संकोच होकर अपनी भावनाओं के बारे में मुझे बताना क्योंकि मैं तुम्हारे कारणों को समझने की योग्यता रखता हूं. निकट भविष्य में तुमसे मिलने की इच्छा रखता हूं. जब तुम कहो, जहां तुम कहो...
बोरिस...

यह पत्र पोस्ट करने के बाद बोरिस बेचैनी से मरीना के जवाब का इंतजाऱ करने लगा. उसे पक्का यकीन था कि जवाब उसके हक में आयेगा. लेकिन समय....इसके गर्भ में क्या है हममें से कोई नहीं जानता. बोरिस मरीना के पत्र का इंत$जार कर रहा था और उसके पास पत्र पहुंचा रिल्के का. इस पत्र में रिल्के ने परस्तेनाक से चिंतित भाव से मरीना की कुशल लेनी चाही थी और जानने की कोशिश की कि आखिर उसका लिखा अंतिम पत्र मरीना को क्यों नहीं मिला.


रिल्के के इस छोटे से पत्र से परस्तेनाक अवाक था. उसे रिल्के और मरीना के बीच की नजदीकियों और खतो-किताबत का पूरा आभास हो चुका था, जिसके बारे में उसे कुछ भी नहीं पता था. वो गहरे दु:ख में डूब गया.


जैसा कि मरीना अपनी डायरी में भी लिखा था कि परस्तेनाक एक अधैर्यवान पुरुष था. परस्तेनाक ने 23 मई को मरीना को एक कटु पत्र लिखा.

ये तुमने क्या किया? क्यों किया? कैसे कर पाईं तुम? कल मुझे रिल्के से मिले पत्र ने तुम्हारे और रिल्के के बारे में सब स्पष्ट कर दिया है. मैं इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता मरीना कि तुम्हारी जैसी प्यारी, खूबसूरत दिल रखने वाली स्त्री, जिसका जन्म समय के वाद्य पर मोहब्बत का राग गाने के लिए हुआ है वो कैसे ऐसा बेसुरा राग छेड़ सकी. मुझे नहीं पता अपनी जिंदगी में मैंने इतना दु:ख और गुस्सा एक साथ पहले कब महसूस किया था. 


परस्तेनाक गहरे अवसाद में था. अधैर्यवान पुरुषों के लिए अवसाद को साधना अक्सर आसान नहीं होता. हर कोई रिल्के जो नहीं होता. परस्तेनाक ने उसी दिन मरीना के नाम एक और खत लिखा...


मैं इस बारे में रिल्के को कुछ भी नहीं लिख रहा हूं मरीना. क्योंकि मैं उन्हें भी तुमसे कम प्रेम नहीं करता. तुम ये सब क्यों न देख पाईं मरीना. मेरे दो प्रिय लोगों को मुझसे छीन लिया तुमने...


जिन दिनों का यह घटनाक्रम है परस्तेनाक उन दिनों कविताओं की एक श्रृंखला पर काम कर रहा था. उसने मरीना के लिए एक कविता लिखी थी अ डेडिकेशन. इस पत्र के साथ उसने मरीना को यह कविता भी भेजी...

(जारी...)

Tuesday, June 28, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला... 4



12 मई 1926 की सुबह के  उजाले में कुछ नई रंगत भी शामिल थी. कुदरत का यह नजारा मरीना को प्रिय लगा. कई बार हमें आगत का भान हो जाता है. अनायास दु:खी होना, बेचैन होना या मुस्कुराना असल में उस अनजाने आगत की गंध होते हैं. मरीना भी उस दिन बेवजह मुस्कुराहटों का पिटारा खोले बैठी थी. जैसे-जैसे दिन चढ़ रहा था, वो ढेर सारे घरेलू कामों के बीच मुस्कुराये जा रही थी. उसे यह सुख किसी कविता के पूरा होने के बाद के सुख से भिन्न लगा. तभी पोस्टमैन दरवाजे पर नजर आया. उसे देखते ही मरीना का चेहरा खिल उठा. असल में उसे भी इस आगत का इंतजार था. नौ मई के बाद से हर पल वो दरवाजे की ओर बेचैनी से देखती थी. आखिर उसे रिल्के का पत्र मिला. वो चार लाइनें, 'मरीना त्स्वेतायेवा, क्या तुम सचमुच हो. अगर हो तो क्या यहां नहीं हो? अगर यहां हो तो मैं कहां हूं...?' उसने सैकड़ों बार इन पंक्तियों को पढ़ा. इन पंक्तियों में अपने लिये रिल्के के भीतर महसूस की गई भावनाओं को छूकर देखा और कुदरत का शुक्रिया अदा किया.

जैसा कि प्रेम के बारे में एक शाश्वत सत्य प्रचारित है कि प्रेम में 'धीरज' और 'समझ' का कोई काम नहीं होता. बड़े से बड़ा ज्ञानी इसके आगे औंधे मुंह पड़ा होता है, वो शाश्वत सत्य अपना असर यहां भी काम कर रहा था. मरीना ने जरा भी विलंब किये बगैर रिल्के को उसी दिन एक और पत्र लिखा. लंबा पत्र. यह पत्र भी जर्मन में था. एक ही पत्र के आदान-प्रदान के बाद मरीना रिल्के को खुद के करीब महसूस कर रही थी. और अपना अतीत, वर्तमान, भविष्य के सपने, सुख सारे, दर्द जो सहे उसने सबके सब बांट लेना चाहती थी.
'धीरज'...बस एक शब्द भर रह गया था और वो उसकी बुकशेल्फ के आसपास मंडराता रहता था. मरीना पत्र लिखने में इतनी मसरूफ थी कि उसके पास धीरज के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं था. रिल्के को पत्र लिखते समय मरीना कभी तो मुस्कुरा उठती और कभी सिसक ही पड़ती. उसके अतीत का एक-एक धागा उधड़ रहा था. उसने उस लंबे पत्र में खुद को उड़ेल दिया और उसी दिन वह पत्र रिल्के के लिए रवाना किया. पत्र भेजने के बाद मरीना ने अपने भीतर परिवर्तन महसूस किया. उसे लगा कि उसका शरीर पंखों से भी हल्का हो गया है. बरसों से जिस तन्हाई और उदासी की पर्तों को वो भीतर छुपाये थी, उन्हें उसने बाहर निकाला था. रिल्के को खत लिखने के बहाने उसने खुद से बात की थी और अपने आपको सुना था. रिल्के अब उसके लिए एक महान कवि भर नहीं था.

रिल्के को मरीना के पत्र का उतनी ही बेसब्री से इंतजार था या नहीं इसका ब्योरा कहीं उपलब्ध नहीं है सिवाय इस बात के कि रिल्के को जैसे ही 17 मई को मरीना का यह लंबा पत्र मिला, उसी दिन इस महान कवि ने उस पत्र का पूरी आत्मीयता से जवाब दिया. रिल्के ने मरीना की संवेदनशीलता से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा की. उसकी कविताओं पर बात की. कुछ कविताओं के बारे में दरयाफ्त की जो कठिन रूसी में होने के कारण उसे ठीक से समझ में नहीं आई थी. इन पत्रों के जरिये वे अनौपचारिक ढंग से बात करने लगे थे और रिल्के ने मरीना को स्पष्ट रूप से लिखा कि अगर कभी व्यस्तता के चलते उसे पत्र का जवाब देने में विलंब हो या वो जवाब न दे पाये तो इसे अन्यथा लिये बगैर मरीना उसे लगातार पत्र लिखती रहे. यह संदेश मरीना के लिये रिल्के की जिंदगी में खास जगह बना लेने की मुनादी जैसा था. मरीना को यूं भी लंबे-लंबे खत लिखने की आदत थी. उसका अधिकतम जीवन उसके द्वारा लिखे खतों से ही झरता है. जैसे ही कोई खत झाडि़ए अंजुरी भर मरीना झरती है. अन्ना अख्मातोवा, बोरिस परस्तेनाक, इवानोविच युरकेविच, एफ्रोन,अन्ना अन्तोनोव्ना, असेयेव, पाब्लेन्को, मायकोवेस्की आदि न जाने कितने लोग थे जिनसे मरीना का नियमित पत्र-व्यवहार होता था. ये पत्र रूस के उस समय के हालात, कवियों, कलाकारों के सामाजिक, राजनैतिक और निजी जीवन के संघर्ष, कविता की स्थिति, कविता के संघर्ष आदि को बयान करते हैं.

बहरहाल, मरीना अब रिल्के को नियमित पत्र लिखने लगी थी और उसने महसूस किया कि रिल्के के संपर्क में आने के बाद, कविता पर लंबी बातचीत के बाद मरीना की कविताओं में सुधार हो रहा है. वो अब अपनी कविताओं से पहले से ज्यादा संतुष्ट थी. जीवन से भी. एक मुस्कुराहट उसके उदास जीवन में उम्मीद बनकर बरस रही थी. वो उस उम्मीद की बारिश में अपनी कविताओं के साथ खुद को खुला छोडऩे को आतुर थी...


(जारी...)

Sunday, June 26, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला... 3


जैसा कि हर अच्छा और बड़ा लेखक करता है रिल्के ने भी बोरिस के पत्र का तुरंत जवाब दिया.

मुझे जो प्रेमपूर्ण भावनाएं अभी प्राप्त हुईं उनसे मैं अभिभूत हूं. उन कोमल भावनाओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मेरे पास सचमुच शब्द नहीं हैं. मरीना, कृप्या मेरी भावनाएं हमारे मित्र बोरिस तक पहुंचा दें. पत्र के साथ बोरिस ने जिस किताब की दरकार की थी उसे भी भेज रहा हूं. 
शुभकामना
रिल्के

7 मई का वो एक ऊबा हुआ सा दिन था जब मरीना रोज के घरेलू कामों में उलझी थी. अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई थी. पोस्टमैन उसे एक पार्सल और एक खत दे गया था. उस दिन पोस्टमैन की वो दस्तक असल में उसके दरवाजे पर नहीं, सीधे दिल पर थी. रिल्के के खत में लिखी उन चार लाइनों को मरीना ने न जाने कितनी बार पढ़ा. किताब को उलट-पुलटकर देखा. खिड़की से बाहर देर तक मौसम को ताका जो अचानक खुशनुमा हो उठा था. उसने पत्र और पार्सल बोरिस को उसी दिन रवाना किया लेकिन खुद को रिल्के के पत्र की खुशबू से मुक्त नहीं कर पाई. आखिर उसने रिल्के को पत्र लिखने का मन बनाया. नौ मई को रिल्के के लिए अपनी समस्त भावनाओं को पिरोते हुए उसने जर्मन भाषा में एक लंबा पत्र लिखा. इस पत्र में मरीना ने लिखा कि उसे कितनी खुशी हुई रिल्के का पत्र पाकर. उसने पत्र में कविता के प्रति अपनी आसक्ति का ब्योरा देते हुए बताया कि कैसे छोटी सी उम्र में कविता ने उसका हाथ थाम लिया था. असल में यह पत्र लंबा इसलिए था क्योंकि वो रिल्के के प्रति अपनी भावनाओं को ढेर सारे शब्दों के बीच छुपा ले जाना चाहती थी. जैसे कई बार हम बोलकर मौन को साधते हैं कुछ उसी तरह. उसने विस्तार से लिखा कि उनकी कविताएं पढ़ते हुए वो अपने भीतर कितनी हलचल महसूस करती रही है. यह उसका पहला पत्र था रिल्के के लिए.

लेकिन जिसके लिए पत्र लिखा गया था वो कोई मामूली आदमी नहीं था. वो रिल्के था. शब्दों के अंदर डुबकी लगाना उसे आता था. वो उसके भीतर छुपे सघन भावों को आसानी से पकडऩे का हुनर जानता था. तभी तो उस लंबे पत्र का छोटा सा उत्तर कुछ इस तरह दिया उसने.

'मरीना त्स्वेतायेवा....क्या तुम सचमुच हो? क्या तुम यहां नहीं हो? अगर तुम यहां हो तो मैं कहां हूं..'
रिल्के

दस मई को मरीना के पत्र के जवाब में रिल्के ने ये कुछ शब्द लिख भेजे. समूची सृष्टि पूरे कौतूहल से इन शब्दों के मरीना के पास पहुंचने का इंतजार कर रही थी. आखिर 12 मई को मरीना को जादुई शब्दों का यह खजाना मिल ही गया.


(जारी....)

Saturday, June 25, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला... 2


जादुई एहसास रू -ब-रू 
वो बीतते बसंत के दिन थे. अप्रैल 1926 की कोई शाम रही होगी शायद. अनमने दिनों ने अभी अपनी गठरी बांधी भी नहीं थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई थी. बोरिस परस्तेनाक (रूस का महान कवि) ने अनमने मन से दरवाजा खोला और डाकिये से डाक ली. डाकिये ने बोरिस को दो खत पकड़ाये और बोझिल से दिन को अपने कांधों पे लादकर चलता बना.
परस्तेनाक ने पहला पत्र खोला. यह मरीना त्स्वेतायेवा का खत था. उसने इस खत में अपनी कविता 'द एंड' के बारे में कुछ दरयाफ्त की थी इस खत में. दूसरा खत था उसके पिता लिओनिद ओसिपोविच परस्तेनाक का जो कि म्यूनिख में रहते थे. वो मशहूर जर्मन कवि रिल्के के मित्र थे और उन्होंने अपने बेटे को इस खत में लिखा कि रिल्के ने परस्तेनाक की कविताओं की तारीफ की है. बोरिस रिल्के की कविताओं के घनघोर प्रशंसक थे और रिल्के द्वारा उनकी कविताओं की तारीफ बहुत मायने रखती थी. पिता के इस खत के बाद उनका मन हुआ कि क्यों न रिल्के को पत्र लिखा जाये. 12 अप्रैल 1926 को बोरिस ने आखिर रिल्के को पत्र लिखा. यह पत्र उन्होंने जर्मन में लिखा. बोरिस का जर्मन भाषा पर अच्छा अधिकार था. उन्होंने लिखा, 
'मेरे प्यारे और महान कवि रिल्के,
मुझे नहीं पता कि इस खत में क्या लिख पाऊंगा. मुझे नहीं पता कि मैं इस खत के $जरिये आप तक अपना प्यार, सम्मान, दिल की गहराइयों से आपके प्रति महसूस की गई भावनाओं को संप्रेषित कर पाऊंगा या नहीं. लेकिन आज मैं जो कुछ भी हूं, जैसा मैं सोचता हूं, जैसा मैं महसूस करता हूं वो सब आपका दिया हुआ है. आपको पढ़ते हुए मैंने आपको अपने भीतर बूंद-बूंद समेटा है. मेरा लिखा हर शब्द अगर वो किसी लायक है तो वो आपकी ही देन है. आपको पढ़ते हुए मैं हमेशा एक जादुई अहसास से गुजरता हूं और मेरा पूरा व$जूद एक सिहरन महसूस करता है.
बोरिस आगे लिखते हैं-
जिस दिन मुझे अपने पिता द्वारा भेजे गये आपके मेरे प्रति उदार शब्द मिले ठीक उसी दिन मुझे एक ऐसी कविता पढऩे को मिली जिसे पढ़कर मैं हतप्रभ हूं. विश्वास करिये, रूस में ऐसी कविताएं लिखने वाले बहुत कम लोग हैं. और जानते हैं मेरे प्रिय कवि, यह कविता किसकी है. यह कविता है यहां की मशहूर कवियत्री मरीना त्स्वेतायेवा की. वो जन्मजात कवियत्री है. बेहद प्रतिभाशाली और संवेदनशील है वो. इन दिनों वो पेरिस में रह रही है. प्रिय रिल्के मुझे माफ करना, लेकिन मैं चाहता हूं कि अपनी कविताओं पर आपकी टिप्पणियां पाकर जो खुशी मुझे महसूस हुई है वही खुशी इस कवियत्री को भी मिले. आप इसे मेरी धृष्टता कह सकते हैं लेकिन मेरे प्रिय मैं जानता हूं आप मेरी संवेदना और भावना भी समझ सकेंगे. मैं आपको मरीना की कुछ कविताएं भेज रहा हूं. साथ ही मैं आपसे गुजारिश करता हूं मेरे प्रिय रिल्के कि आप अपना कविता संग्रह 'डियोनो एल्जिस' जिससे मैंने हमेशा प्रेरणा ली है उसे अपने स्नेह के साथ मरीना के पते पर भेज दें. यह हम दोनों के लिए बहुत सम्मान की बात होगी.
उम्मीद है मेरा बहुत सारा प्यार और सम्मान आप तक पहुंचेगा और आपका स्नेह हम तक.
आपका
बोरिस
(इसके बाद मिला मरीना को रिल्के का पहला ख़त. फिर क्या हुआ...इंतजार..)

Friday, June 24, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला...

साजन की पतियाँ मिलीं मन बौराया जाये..
खतो-किताबत पुराना शगल रहा है. अगर कहूं कि खतों और डायरियों ने मुझे जिंदा रखा है तो अतिशयोक्ति न होगी. हमेशा लिखकर ही खुद को कुछ हद तक अभिव्यक्त कर पाई हूं. बोलकर कहने का सलीका तो आया ही नहीं. हर बात कहने के बाद लगता है ओह...कुछ रह गया. इसी शगल के चलते साहित्य में भी डायरियां, खत, आत्मकथाओं ने ज्यादा आकर्षित किया. सोचती हूं कि दो लोगों के बीच की बात क्या दो लोगों के बीच की ही बात भर होती है. नहीं, वो सृष्टि के दो टुकड़ों के बीच संवाद होता है. एक सिरे की दूसरे से जुडऩे की प्रक्रिया. एक व्यक्ति, एक समष्टि के दूसरे से संवाद की प्रक्रिया. इसीलिए अक्सर कहना सिर्फ कहना नहीं, रहना यानी रह जाना होता है. उस कहे हुए में कितने लोग अपना अक्स देखते हैं. अमृता आपा के लिखे से अगर उनकी डायरियां, खत और रसीदी टिकट निकाल दें तो...? हम कल्पना भी नहीं कर सकते ना? 
ऐसे ही रूस की महान कवियत्री मरीना के बारे में  सोचती हूं कि पत्र, डायरियों के बगैर मरीना को समझ पाना कितना मुश्किल होता. रूस का वह मुश्किल दौर. एक संवेदनशील जुझारू लड़की जो किस्मत या बदकिस्मती से कवि भी. पति फौज में. देश से निर्वासन, बिना किसी आर्थिक आधार के बच्चों की परवरिश, बीमारी, कविताओं पर पाबंदी...न जाने क्या-क्या. सोचती हूं कि इस स्त्री ने कैसे सहा सब कुछ. और इसके बावजूद उसकी दृढ़ सोच और भाषाई कमनीयता में कोई कमी नहीं आई. कड़वे जीवन का हलाहल अपने गले में उतारने के बावजूद उसका जीवन प्रेम की अभिलाषा में हमेशा नम रहा.

जीवन क्या होता है, जब यह समझ भी नहीं आई थी, तबसे मरीना का जीवन मेरे सामने खुला पड़ा था. मैं इस स्त्री के नाम का सजदा करती हूं. उसकी पसंद, नापसंद, जीने का ढंग, अभिव्यक्ति को लेकर उसकी साफगोई और अतिरेक, खुली समझ, वैचारिक स्पष्टता सब मुझे बचपन से आकर्षित करते हैं. ठीक उसी तरह जैसे रिल्के. बीए फस्र्ट ईयर में थी उन दिनों. सवालों की खेती लहलहा रही थी जेहन में. ऐसे में किसी ने रिल्के थमा दिये थे. बस जी, काम हो गया हमारा उसी दिन से. जिसने किताब दी थी उसकी अहसानमंद रहूंगी हमेशा. हर शब्द जैसे मन के भीतर चल रहे सवालों के अंधड़ को विराम देता था. 

जानती हूं रिल्के के खतों को पढ़ते हुए मेरी ही तरह या हो सकता है इसे ज्यादा गहन अनुभूति से भी बहुतों ने महसूस किया होगा. ऐसा सघन वैचारिक तालमेल आसानी से कहां मिलता है. ऊपर से राजी दी ने अनुवाद भी ऐसा किया मानो सामने बैठकर रिल्के खुद बात कर रहे हों. इन पत्रों को खूब-खूब पढ़ा गया. हर पढऩे-लिखने वाले की प्रिय किताबों में रिल्के की कविताओं के साथ-साथ उनके पत्रों ने भी खास जगह बनाई.

रिल्के और मरीना एक ही वक्त में रचना प्रक्रिया में रत थे. रिल्के महान कवि थे और मरीना नवोदित. मरीना रिल्के से प्रेरित थी लेकिन रिल्के मरीना से नावाकिफ. मेरे लिए यह जानना बड़ा दिलचस्प था कि मरीना के भीतर रिल्के के प्रति आकर्षण था. लेकिन इतने छोटे से सच की दूसरी कडिय़ां नहीं मिल पा रही थीं. पिछले दिनों मरीना की जिंदगी की तमाम कडिय़ां मेरे हाथ लगीं. शरारती मन कहिये या इंसानी फितरत, सबसे पहले रिल्के और मरीना के बीच की कडिय़ों को जा पकड़ा मैंने. आखिर क्यों न होता दोनों मेरे प्रिय जो हैं. (यकीन मानिए ये लिखते हुए भी मैं मुस्कुरा रही हूं.) पता नहीं कौन, कब, कैसे कड़ी बन जाता है दो लोगों को जोडऩे की हमें नहीं पता होता. रिल्के और मरीना भी ऐसे ही जुड़ गये थे. उनके बीच संवाद की प्रक्रिया कब और किस तरह शुरू हुई इसका ब्योरा सोचती हूं साझा कर ही लिया जाए. बस, जरा सा इंतजार ...

Wednesday, June 22, 2011

अब लिखूंगी तुम्हे हर बात माय लव...


(कल २१ जून को ज्यां पाल सात्र का जन्मदिन था. सारा दिन नीम हरारत में करवटें बदलते हुए सात्र और सिमोन के बारे में सोचती रही. कहते हैं ज्यादा सोचो तो फिर कुछ कहने सुनने को बचता ही नहीं. न लिखा जाता है कुछ. तो उसी नीम हरारत में सात्र के जन्मदिन पर सिमोन का यह पत्र  पढ़ती रही बार-बार - प्रतिभा )


डियर लव,
आखिरकार तुम्हारा एक पत्र तो आया, जिससे मुझे पता चला कि तुम्हें मेरे पत्र मिलते रहे हैं! (उन दिनों सात्र एक युद्धबंदी के रूप में जर्मनों की कैद में थे) मुझे कितना पछतावा हो रहा है, माय स्वीट लिटल वन, कि मैंने रोजाना तुम्हें एक पत्र क्यों नहीं लिखा! मैं बहुत ज्यादा दुखी थी. लेकिन, अब मैं जरूर लिखा करूंगी. इससे मेरी पूरी जिंदगी बदल गई है. पुराने दिनों की तरह, तुम फिर से मेरे साथ घटी हर बात जान सकोगे. 

मुझे बहुत डर लग रहा है, माय लिटल वन कि कहीं तुम वहां बहुत दुखी तो नहीं हो? मैं जानती हूं कि तुम चट्टान की तरह मजबूत हो लेकिन तुम एक 'संवेदनशील आत्मा भी हो और तुम्हारे दिल को हुआ जरा सा भी दर्द का एहसास मेरे दिल को बहुत ज्यादा  कचोट जाता है. निस्संदेह, मैं यहां कर्तव्य की भावना से नहीं ऊब रही हूं, डियर लिटल वन. उलटे मुझे दुखी रहने से नफरत है और जून से ही मैं इस दुख से मुक्त होने की कोशिशों में लगी रही हूं, अमूमन काफी सफलता के साथ. मेरी जिन्दगी  भरी हुई है. लोगों से, काम से, संगीत से, लेकिन कई बार तुम्हें देखने की इच्छा इतनी ज्यादा कचोटने लगती है कि मैं न चाहकर भी दुखी हो जाती हूं. सच्चाई यह है कि मैं तुमसे प्यार करती हूं माय लिटल वन. तुमसे और किसी भी चीज से नहीं. तुम्हारे उस भोले चेहरे से, जिसे मैंने कई दिनों से नहीं देखा, तुम्हारे नन्हे व्यक्तित्व से, तुम्हारी विनम्रता से और हम दोनों की साझी खुशी से.
आमतौर पर मैं अपने आपसे यही कहती हूं कि कुछ भी खोया नहीं है और प्रतीक्षा में जीती रहती हूं, लेकिन कभी-कभी इंसान इस प्रतीक्षा से बहुत थक जाता है. कुछ मुक्ति चाहिए होती है और वह मुक्ति मुझे तुम ही दे सकते हो, लेकिन जैसा कि तुम कहते हो, मैं तुम्हें जल्दी ही वापस पा लूंगी, हमेशा-हमेशा के लिए और फिर हमारे सामने एक पूरी जिंदगी होगी. पर अब तुम मेरे लिए बिल्कुल चिंता नहीं करना. खासकर तुम्हारा यह पत्र मिल जाने के बाद मैं दिमागी तौर पर काफी सुकून महसूस कर रही हूं. मेरी जिंदगी बिल्कुल पिछले साल की तरह चल रही है. दुखों की बजाय, खुशियों के ज्यादा नजदीक, एक तरह से एक निलंबित खुशी की तरह. कल से मैं हर रोज तुम्हें यहां की जिन्दगी के बारे में बताऊंगी. 

मैं इन दिनों कुछ खास नहीं पढ़ पा रही हूं. फिर भी कांट को मैंने काफी गहराई से पढ़ा है और इधर संगीत में भी मैं कुछ रुचि ले रही हूं. मैं अपने उपन्यास से बहुत खुश हूं. यह तीन महीनों में पूरा हो जाएगा. सिर्फ तुम्हारी टिप्पणियों का अभाव बहुत खल रहा है. माय लव, कितनी खुशी होती है मुझे तुम्हें पत्र लिखकर! कुल मिलाकर मेरी जिन्दगी काफी खुशगवार गुजर रही है, काश तुम्हारे बारे में भी मैं यही बात कह पाऊं! माय लिटल वन, बहुत प्रेम करती हूं मैं तुमसे, और तुम्हें अपने अस्तित्व से अलग नहीं पाती! मुझे हमेशा अपने करीब रखना.
तुम्हारी चार्मिंग बीवर

(यह पत्र सिमोन डी बोउवा ने सात्र को  १४ दिसम्बर १९४० पेरिस से लिखा था)


- आहा जिंदगी के जून अंक से साभार


 

Thursday, June 16, 2011

चैन परिंदा घर आये दुआ करो...



किस दर्द के बेल और बूटे हैं
जो दिल की रगों में फूटे हैं
कोई झूठ ही आकर कह दे रे
ये दर्द मेरे सब झूठे हैं
चैन परिंदा घर आये दुआ करो
दर्द परिंदा उड़  जाये दुआ करो.

मेरी तड़प मिटे हर रोग कटे
इस जिस्म से लिपटा इश्क हटे
तुम साफ़ हवा सी मिला करो
चैन परिंदा घर आये दुआ करो…
.
आँखों के आंसू सब देखें
कोई रूह की दरारें देखे न
मेरी ख़ामोशी के लब सी दो
ये बोले न ये चीखे न
मेरी सोच के पंख क़तर डालो
मेरे होने पे इलज़ाम धरो
मेरे गीत सभी के काम आये
कोई मेरा भी ये काम करो
न हवस रहे न बहस रहे
कोई टीस रहे न कसक रहे
तुम मुझको मुझसे जुदा करो
चैन परिंदा घर आये दुआ करो…

मैं एक ख़बर अखबार की हूँ
मुझे बिना पढ़े ही रहने दो
कागज़ के टुकड़े कर डालो
और गुमनामी में बहने दो
तुम मुझको ख़ुदपे फ़ना करो
चैन परिंदा घर आये दुआ करो

अश्कों की खेती सूखे अब
ज़ख्मों से रिश्ता टूटे अब
दिल तरसे न दिल रोये न
कोई सड़क पे भूखा सोये न
कोई बिके न कोई बेचे न
कोई खुदगर्ज़ी की सोचे न
कोई बंधे न रीत रिवाजों में
दम घुटे न तल्ख़ समाजों में
मैं सारे जहाँ का फिकर करूँ
फिर अपना भी मैं ज़िकर करूँ
मैं तपती रेत मरुस्थल की
इक सर्द शाम तुम अता करो
चैन परिंदा घर आये दुआ करो
- इरशाद कामिल 

Monday, June 13, 2011

चक्रव्यूह

तुम बुन रहे थे चक्रव्यूह,
मैं खुश थी कि
उस दौरान
मेरा ख्याल था तुम्हारे आसपास.


तुम रच रहे थे साजिशें
मैं खुश थी कि
ध्यान मेरी ही तरफ था तुम्हारा
उस सारे वक्त में.


तुम लगा रहे थे आरोप
मैं खुश थी कि
कितनी शिद्दत से
सोचा होगा तुमने मेरे बारे में
जब तय किये होंगे आरोप.

तुम इकट्ठे कर रहे थे पत्थर
मैं खुश थी कि
इसी बहाने
इकट्ठी कर तो रहे थे अपनी ताकत.

और इतनी देर
दुनिया के कारोबार में
नहीं डाला खलल तुमने...

Friday, June 10, 2011

उसकी जेब में तो जिंदगी का पता था...


बचपन से उसे शाम के मुकाबले धूल के बगूले उठाते गर्मियों के दिन और ठिठुरती, कंपकंपाती रातें ज्यादा पसंद थीं. वो कलाई पर बंधी टिकटिक करती सुइयों की चौबीस घंटों की कदमताल में से शाम को आजाद कर देना चाहती थी. कभी-कभी यूं भी ख्याल आता कि कोई हो, जिसके कांधों पर अपनी सारी शामें टिका दी जायें और फिर मस्ती से घूमा जाये. कोई डर ही न रहे. गोधूलि की बेला के समय बजती बांसुरी की धुन उसे अवसाद से भर देती थी. वो अपने कानों पर हथेलियां रखकर सर झुकाकर बैठ जाती थी. शाम को अपने घरों को लौटते परिंदों की आहट से उसे वहशत होती थी. 

'लगता है पिछले जन्म में तेरी सास का नाम शाम था', किसी सहेली ने उसे छेड़ा था. जमाना कितना भी बदला हो लेकिन बेचारी सासों को अब भी लड़कियों का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाना बंद नहीं हुआ. सो तानों और फिकरों में सासें अब भी ललिता पवार और बिंदू की तरह ही मुस्कुराती थीं. लड़की इन तानों से बेफिक्र थी. उसे बस अपने डर से निजात पानी होती थी. उसने अपनी शामें छुपाकर रखनी शुरू कर दीं.

उस रोज आकाश में बादल लुका-छिपी खेल रहे थे. आसमान खूब साफ था, मानो किसी ने अभी-अभी धोकर सुखाया हो. पहाड़ों पर चूंकि सैलानियों की आमद कुछ ज्यादा ही हो गई थी, सो उस रोज बादलों के कुछ टुकड़ों ने मैदानी शहरों का रुख किया. वे घर की छतों पर बैठकर शहर की जिंदगी देखते और मुस्कुराते. वो भी ऐसी ही एक उतरती शाम थी. लड़की उस शाम के बीत जाने के इंतजार में अनमनी सी यहां से वहां भागती फिर रही थी. बांसुरी की आवाज से बचने के लिए शहर के शोर में डूब जाने को व्याकुल थी. तभी उसे किसी ने आवाज दी थी.
'ये पता बतायेंगी जरा,' 
अजनबी लड़के ने पूछा था. 
लड़की ने पता बता दिया. लेकिन वो आवाज उसके कानों में ठहर सी गई. उसकी आवाज में उसे अपने जीवन की सारी शामें खिलती नजर आईं. अचानक उसे बांसुरी की आवाज मीठी लगने लगी. 
कभी-कभी किसी लम्हे में कैसे जिंदगी धड़कने लगती है. लड़की की शामों में इंद्रधनुष के सारे रंग घुलने लगे, सरगम के सातों स्वर. 

अब उसे शामों से डर नहीं लगता था. लड़का अक्सर उसके पास कुछ न कुछ पूछने को लौटने लगा और हर बार कुछ भूल जाता. लड़की हर बार उसे उसका पिछला भूला हुआ सामान लौटाती और नया वाला सहेजकर रख लेती. छत पर बैठे बादलों को लड़की का यह अंदाज खूब भला लगता. जब वो लड़के को कुछ लौटा रही होती और कुछ चुरा रही होती तब कभी-कभी वे बादल उन पर अपनी बूंदें बरसा देते. लड़की चिहुंक उठती. लड़का भी खिल जाता. लड़के ने उस दिन कहा, 'मैं कई बार पता भूला हूं लेकिन तुमने ऐसा पता बताया कि खुद अपना पता ही भूल गया हूं.' लड़का जब ऐसा कह रहा था तो छत पर बैठा बादल उसकी आंखों में जा बैठा था. लड़की को ऐसे स्नेह की छुअन की आदत नहीं थी. उस एक बूंद में उसका पूरा जीवन भीग गया. 

बादलों से उनकी दोस्ती थी, सो वे दोनों बादलों पर बैठकर दुनिया भर घूमते-फिरते थे. सतरंगी सपनों की उड़ान ऐसी कि आकाश भी छोटा लगे. लड़की को अक्सर अपनी बाहें नन्ही और आंचल कम पड़ता मालूम होता. 
लड़का कहता, 'चोर हो तुम. हर बार कुछ चुरा लेती हो.' 
लड़की मुस्कुरा देती. 
'हां हूं तो सही और बेईमान भी. एक दिन मुकर जाऊंगी सब लेकर. कुछ वापस नहीं दूंगी.' 
लड़का हंस देता. 
'मुझे कुछ भी वापस नहीं चाहिए. '
'बस, अपने पास रहने देना.'
लड़की इतरा उठती. 

जिंदगी अब उसकी दहलीज पर थी. अचानक कहीं से कोई आवाज आई थी. किसी ने लड़के को पुकारा था. आवाज पहाड़ों के उस पार से आई थी शायद, या समंदर पार से. नहीं नहीं सतपुड़ा के जंगलों के पार से आई थी वो आवाज. अरे नहीं, लड़के की जेब से ही तो आई थी आवाज. वो उस आवाज के जवाब में उठ खड़ा हुआ था. 
चल पड़ा था. हड़बड़ी में सामान समेटा था उसने. पैरों में सैंडल बस फंसाये भर थे. पलटकर देखने का भी वक्त नहीं था उसके पास. जाने कैसी बेचैनी थी उसके जाने में. लड़की उसके जाने के बाद देर तक आसपास कुछ तलाशती रही. लेकिन इस बार लड़का अपना कोई सामान भूलकर नहीं गया था. लड़की को याद आया कि उसकी जेब में तो उसने अपनी जिंदगी का पता भी रख दिया था. 

घड़ी देखी तो शाम के साढ़े छह बज रहे थे. तबसे हर शाम से वो अपनी जिंदगी का पता पूछती फिरती है...शामें उसके सवाल के जवाब में बस उदासी ओढ़ लेती हैं. 


Thursday, June 9, 2011

तुम एक पूरा संसार हो...

रिश्तों को, उम्र को बरसों में गिनना मेरे लिए हमेशा मुश्किल काम रहा है. एक पल में जहां हजार सदियों को जीने का हुनर सीखा  है, वहीं एक ही लम्हे  को उम्र भर कांधों पर लिये घूमने से मुक्ति का रास्ता भी  ढूंढ रही हूं. मैथमेटिक्स में कभी मन लगा ही नहीं, सो उम्र और बरसों के हिसाब को दीवार पर टंगे कैलेंडर पर ही रहने दिया हमेशा. इसलिए नहीं पता कि तुमसे कितनी सदियों पुरानी मोहब्बत है. मैंने कभी  तुम्हारा हाथ थामकर नहीं कहा कि तुमसे कितना प्यार है. कभी हमने आँखों  में आँखें डालकर एक-दूसरे से नहीं कहा कि हम कितने जरूरी हैं एक-दूसरे के लिए. 


बरसते दिनों में सड़कों को रौंदने निकल पडऩे को एक साथ व्याकुल होता मन और बिना फोन, बिना संदेश के टेलीपेथी के सहारे निकल ही पडऩा और सामने आ खड़ा होना एकदम से. इधर से नंबर डायल करना और उधर घंटी बजने से पहले ही फोन का उठ जाना. यह सब था हमारे बीच. लेकिन हमने कभी नहीं कहा आई लव यू जैसा कुछ भी. दिन भर कॉलेज में साथ रहने के बाद घंटो फोन का बिल बढ़ाने के बाद भी जाने क्या रह जाता था कि हम निकल पड़ते थे मिलने को. किसी को कभी समझ ही नहीं आया कि आखिर क्या रह जाता है हर बार, जिसे पकड़ने को व्याकुल रहते हैं हम हमेशा. हमें भी कहाँ समझ में आया है कुछ भी हालाँकि सिलसिला अब तक बदस्तूर जारी है.  तुम्हें  याद है, तुमने मेरे जन्मदिन पर खूबसूरत  रूमाल दिये थे. शायद वो पहला तोहफा था तुम्हारा. हमारी दोस्ती तब नई-नई थी. किसी ने कहा था, अरे रूमाल. इससे तो दोस्ती टूट जाती है. एक सुझाव मिला, रख लो लेकिन इस्तेमाल न करना. मैंने रखे भी और इस्तेमाल भी  किये.. देखो कितने बरस बह गये बरसातों में. उन रूमालों में तुम्हारे प्यार की जो खुशबू  थी, उसका असर अब भी कम नहीं हुआ. जरा भी  नहीं. एक बार एक फ्रेंडशिप डे के कार्ड पर कुछ मीठा सा लिख भेजा था तुमने, लाल पेन से. फिर कहीं से आवाज आई थी लाल रंग से नहीं लिखते प्रेम की बात, दुश्मन को ख़त  लिखते  हैं लाल रंग से. देखो, वो लाल रंग कैसा खिल  रहा है हमारे बीच. हमने हमेशा नियम तोड़े ना? हम बिल्कुल एक जैसे नहीं हैं. तुम पूरब तो मैं पश्चिम. फिर भी देखो ना कैसे सरपट दौड़ रही है हमारी जिंदगी. जिंदगी चंद लोगों में सिमटी है मेरी और तुम उन चंद लोगों में सबसे करीब हो. मैं बीमार तो तुम, मैं परेशान तो तुम, मैं खुश तो कौन था सिवा तुम्हारे. मेरे एकान्त में तुम्हें ही इंट्री मिलती रही हमेशा से. कितना कुछ समझा तुमने बिना कहे. 

कितने आंसू तुमने मेरी पलकों से चुराकर अपने पास रख  लिये हैं. कितनी मुस्कुराहटें तुमने यूं ही मुझे पकड़ाई हैं. जब छूट रहा था जीवन और टूट रहा था आत्मविश्वास तब कौन था तुम्हारे सिवा. हजारों कोस दूर बैठकर तुम्हें मेरी दवाइयों का वक्त, डॉक्टर से अप्वाइंटमेंट, लेख भेजने की आखिरी तारीख, कौन सी फिल्म देख  ही लेनी चाहिए मुझे तुरंत सब याद रहता है. मेरे हर लिखे  को पढऩा, हर कहे को सुनना तुम्हारी आदत बना दी है मैंने. जब निराशा के गहन तिमिर का हमला होता है, एक फोन बजता है और तुम्हारी आवाज प्रकट होती है. तुम्हारी आवाज मेरी आवाज की उदासी चुरा ले जाती है. दोस्त, मैं बहुत बुरी हूं. अपने जीवन की उलझनों में अक्सर भूली  तुम्हारी  जिंदगी के ख़ास दिन. खुद फोन करके याद दिलाया तुमने कि यार विश तो कर दो. कभी कोई नाराजगी नहीं. 

पिछले दिनों कुछ नये दोस्त बने हैं, तुम्हें तो पता ही है. उन्होंने सिखाया है कि जो दिल के करीब हों, उन्हें कह दो कि कितना प्यार है उनसे. न जाने जिंदगी फिर ये मौका दे न दे. दोस्त, आज तुम्हारे जन्मदिन पर मैं चिल्ला-चिल्लाकर यह कहना चाहती हूं कि मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं. कहना चाहती हूं कि तुम्हारा होना बहुत मायने रखता है मेरी जिंदगी में. तुम्हारे प्रेम में नहीं, अपने प्यार में स्वार्थी होकर मैं तुम्हें आज बहुत सारी दुआएं देती हूं कि कायम रहें तुम्हारी मुस्कुराहटें. तुम्हारे कंधों यूं ही मजबूत रहें जिन पर मैं सर टिकाती रहूं. मेरी गुरू, मेरी दोस्त, मेरी जान ज्योति तुम मेरा एक पूरा संसार हो...तुम्हारे जन्मदिन पर बहुत सारा प्यार...हैप्पी बर्थ डे...!

(- सुना है जिन्हें हम सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, उनके बारे में लिखने से प्यार कम हो जाता है. (ये शायद इसीलिए कहा गया होगा कि उनके बारे में लिखना सबसे मुश्किल होता है) लेकिन आज फिर एक नियम तोड़ ही दिया मैंने. ...जाओ बाहर पूरा मौसम तुम्हारा इंतजार कर रहा है.)

Saturday, June 4, 2011

धूप तब खिलखिलाती थी...




'ये लो तुम्हारी फेवरेट बटर स्कॉच...' लड़के ने आइसक्रीम का कोन लड़की की ओर बढ़ाया. दिन के बढ़े हुए टेम्परेचर को आइसक्रीम के मेल्ट होने की बेताबी से नापा जा सकता था. लड़की उसे देखकर मुस्कुरा रही थी.
खाओ भी. 'ऐसे देख क्या रही हो. मेल्ट हो जायेगी.' लड़के ने कहा.
लड़की मुस्कुराई. उसने आइसक्रीम का स्वाद जीभ पर आने दिया. मेल्ट होती आइसक्रीम में वो खुद को देख रही थी. वो खुद भी तो न जाने कब से मेल्ट हुई जा रही है. जाने ये किस मौसम का असर था.
न्यूज चैनल्स गला फाड़-फाड़कर 45 डिग्री टेंम्परेचर को 56 डिग्री तक पहुंचा चुके थे. एयरकंडीशंड कमरों के भीतर भी लोग मौसम की तल्खी को रेंगता हुआ महसूस कर रहे थे. आइसक्रीम का अंतिम टुकड़ा मुंह में डालते हुए लड़की ने कहा 'चलो एक ड्राइव लेकर आते हैं.'
'पागल हो गई हो. इतनी धूप में कोई ड्राइव लेता है क्या?'
'तुम चलो तो, मैं धूप को छांव बना दूंगी.' लड़की ने जोर देकर कहा. लड़के के पास कोई चारा नहीं था. उसने सूरज की ओर देखा और मन ही मन कहा, 'रहम..'.
लड़के ने ड्राइव करना शुरू किया. लू के थपेड़े दोनों पर किसी क्रूर जल्लाद के कोड़ों की तरह बरसने लगे. तभी लड़की ने अपने दोनों हाथ हवा में लहराये और गाना शुरू किया. 'बोले रे पपीहरा...पपीहरा...एक मन प्यासा, एक मन तरसे रे....बोले रे पपीहरा...' लड़की के सुर एकदम पक्के थे. सड़कें एकदम सुनसान पड़ी थीं. सड़क के दोनों तरफ गुलमोहर और अमलताश की जुगलबंदी चल रही थी. लड़का सुरों की गिरफ्त में घिरने लगा और जल्द ही उसे धूप मीठी लगने लगी.
लड़की गाते हुए हथेली को खोले हुए थी मानो धूप को हथेलियों में भर रही हो. लड़का मुस्कुरा दिया.
'वाकई, तुमने धूप को छांव बना दिया.' वो बोला. लड़की हंस दी.
'प्यार एक तरह का कवच होता है जो हर मुश्किल को आसानी में बदल देता है. अगर आप प्यार में हैं तो मौसम आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकते. मौसम क्या, कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता.
अगर मैं हवा को घूरकर देखूं और कहूं रुको...तो वो रुक जायेगी. अगर मैं बादलों से कहूं कि बरसो...अभी तो उन्हें बरसना ही होगा. अगर मैं समंदर से कहूं हटो सामने से मुझे जाना है अपने प्रिय के पास तो कोई कारण नहीं कि वो मुझे रास्ता न दे. प्यार में बहुत ताकत होती है...समझे. कभी इसका जादू चलाकर देखना.' लड़की की आवाज में जरा सा गुरूर शामिल हो गया था.
'देख ही रहा हूं. लड़के ने मुस्कुराकर कहा. 45 डिग्री टेम्परेचर में सड़कों पर ऐसे घूम रहे हैं जैसे बसंत के दिन हों. बीमार पड़े तो डाक्टर साब इलाज भी कर दीजियेगा. लड़के ने चुटकी ली.'
'प्रेम रोग से बड़ा क्या रोग होगा.' लड़की जोर से हंसी. 'तुम चिंता मत करो. हमें कुछ नहीं होगा. हम प्रेम के सुरक्षा कवच में हैं. '
'अच्छा अब तुम पीछे बैठो. गाड़ी मैं चलाऊंगी.'
'क्यों? लड़के ने हैरत से पूछा. '
'तुम बहुत स्लो चलाते हो. अब जरा मेरी ड्राइविंग का आनंद लो.'
 लड़के के पास फिर उसकी बात मान लेने के सिवा कोई चारा नहीं था.
गुलमोहर ने अमलताश की ओर देखते हुए अपने दांत काटे और रहस्यभरी मुस्कान उसकी शाखों पर खिल गई. अमलताश को यह मुस्कुराहट बेजा लगी और उसने प्यार से कुछ फूल उन दोनों पर बरसा दिये. पीले फूलों की ओढऩी दोनों के सर पर आ गिरी.
हाथ में एक्सीलेटर आते ही लड़की ने सड़कों को रौंदना शुरू कर दिया. तेज...तेज..बहुत तेज...जितनी तेज गाड़ी चलती उतनी तेज लड़की हंसती.
'क्या कर रही हो?' लड़का घबरा गया. 'धीरे चलो. आहिस्ता.'
'क्यों?' लड़की ने एक्सीलेटर यूं दबाया मानो घोड़े को ऐड़ लगाई.
'क्यों का क्या मतलब है यार. जान यूं गंवाने के लिए भी नहीं है. धीरे-धीरे खर्च करो आराम से.'
'मरने से डरते हो?' लड़की ने एक्सीलेटर को जरा धीरे छोड़ा. लड़के का ध्यान लड़की के सवाल पर कम, बाइक की स्पीड पर .ज्यादा था.
'हां, यार डरता हूं. मर गया तो तुम्हें प्यार कैसे करूंगा. मुझे तुम्हारे साथ जीना है.'
'और मुझे तुम्हारे साथ मरना है...' लड़की ने खिलखिलाते हुए कहा. उसकी हंसी आज उसके भीतर के सारे कोनों को भर रही थी. वो बहुत खुश थी. वो अपनी इस खुशी को समूची धरती पर बो देना चाहती थी.
'अगर हममें से कोई एक मरा तो...?' लड़के के मन में मरने का डर बैठ गया था.
'ऐसा नहीं होगा. अगर हम एक-दूसरे को सच्चा प्रेम करते हैं तो हमें मौत भी जुदा नहीं कर सकती. प्लेटो ने कहा है कि प्रेम एक आत्मा होता है जिसके दो टुकड़े प्रेमियों को बांट दिये जाते हैं. अब आधा टुकड़ा जिये और आधा मर जाये ऐसा कहीं होता है क्या. इसीलिए रोमियो जूलियट, हीर रांझा, शीरी फरहाद के किस्से बने हैं.'
'अच्छा? एक आत्मा...दो शरीर. बेचारे एक शरीर को एक पूरी आत्मा भी न मिली. तुम्हारा भी ज्ञान अधूरा है. '.ज्यादा दिमाग मत चलाओ और गाड़ी मुझे दो.'
 लड़के ने तेज थपेड़ों को अपनी जेब में भरते हुए लड़की के जलते हुए कंधों को चूम लिया. अचानक बरसती आग में सावन की नमी घुल गई.
दिन इतनी बड़े होते थे कि गाड़ी का पेट्रोल अक्सर कम पड़ जाता और सड़कें अक्सर अपना आकार बढ़ाती हुई नजर आतीं. वे अक्सर मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों से लेकर अमेरिका की करतूतों तक के पन्ने उघेड़ डालते. लड़का अक्सर थक जाता. उसे लगता कि एक दिन में कई दिन उग आये हैं. वो कहना चाहता कि चलो क्यों न किसी मॉल में चलें? या कोई फिल्म ही देख लें. चूंकि बेरोजगारी के दिन अब बीत चले थे इसलिए जेब की हालत उतनी तंग नहीं रही थी. लेकिन उसकी हिम्मत नहीं होती थी.
लड़की मॉल के नाम पर गुस्सा हो जाती थी. उसे ये नकली प्यार के अड्डे लगते थे. सिनेमा जाने में उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी. वो इन जगहों को मोहब्बत की कब्रगाह कहा करती थी. 'अब घर चलें...?' लड़के ने धीमी आवाज में कहा.
लड़की उदास हो गई. 'घर? मेरा घर तो तुम हो. तुम्हारी आवाज, तुम्हारा साथ.'
कहीं से खामोशी का एक टुकड़ा आकर उन दोनों के बीच आकर बैठ गया. लड़का समझ गया था कि उससे गलत सुर लग गया है. उसे चुप्पियों से निजात पाना नहीं आता था. लड़की चुप्पियों से बहुत घबराती थी. उसे लगता था चुप्पियों के खेतों में न जाने कौन सी खरपतवार उग आये इसके पहले सुंदर भावों वाले शब्द बो देने चाहिए. वो अपना मौन भी कहीं शब्दों में ही साधती थी. आखिर उसने अपने बीच आ बैठे खामोशी के उस टुकड़े को डपटकर भगाया.
'मेरा घर देखोगे?' उसने लड़के की आंखों में आंखें डालकर मुस्कुराते हुए पूछा? 'देखो ये मेरे घर की बाउंड्री है. वो लड़की की छाया को घेरकर कहती. उसकी बाहों के घेरे में सिमटते हुए वो कहती ये देखो दरवाजा है घर के अंदर जाने का. ये कमरा वो उसके सीने में सिमटते हुए कहती. मेरा नाम पुकारो तो...पुकारो ना...'
वो जिद करती.
लड़का उसके कान में उसका नाम फुसफुसाता....लड़की की आंखें मुंद जातीं. 
'तुम्हारी यह आवाज पूजाघर है. इसी पूजाघर में मैं हूं इस सृष्टि की पूजा करने के लिए. इस धरती पर प्रेम के अंकुरों के फूटने की प्रतीक्षा करने के लिए मैं इसी आवाज के दरीचों में बैठी हूं. बोलो अब मैं कहां जाऊं तुम्हें छोड़कर.'
लड़का इतना प्रेम देखकर दुखी हो गया.
उसे पता था कि अनाथालय की दीवारों के बीच लड़की ने घर शब्द को सिर्फ किताबों में पढ़ा था.
'मैं तुम्हें तुम्हारा घर दूंगा...' उसने भीगी आंखों से कहा.
'तुम जब ऐसा कहते हो ना तो मालूम होता है धरती पर एक भी स्त्री उदास नहीं रही. एक भी स्त्री बेघर नहीं रही.'
उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में एक बादल आकर बैठ गया. लड़का उन बादलों के बरसने के पहले कहीं छुप जाना चाहता था और लड़की अपने काजल को बहने से बचा लेना चाहती थी.
जलती दोपहर को दोनों ने मात दे दी थी. वे अंजुरी में भर-भरकर धूप पी रहे थे और सड़कों पर दिन का पीछा करते घूम रहे थे.
शाम ने आकर दिन को आंख दिखाई, चलो, बहुत हुई तुम्हारी मटरगश्ती, अब रास्ता नापो. लेकिन जेठ की दोपहरी के दिन बड़े मनमाने होते हैं. शाम आकर सर पर सवार हो जाती फिर भी मजाल है कि वो टस से मस हो जाये. लड़की को दिन की ये बदमाशियां बहुत पसंद थीं. वो जानती थी कि उसके इंतजार का सूरज शाम के आते ही उग आता है. फिर कब अस्त होगा पता नहीं. वो चाहती थी दिन को दोनों हाथों से पकड़कर बैठ जाए.
लेकिन अब न मौसम उसकी सुनते थे, न दिन-रात. समंदर भी रास्ता नहीं देता था. धूप उसे सचमुच झुलसाने लगी थी. कितनी सेफ ड्राइविंग करता था वो...फिर भी...
लड़की अमलताश के पेड़ के नीचे अकेली बैठी अपनी आत्मा के आधे टुकड़े पर छाई उदासी को खुरच रही थी.
'मैं तुम्हें घर दूंगा...' उसके कानों ने सुना. उसने खुद को अमलताश की छाया में घिरा पाया...

(आज ५ जून को अमर उजाला में प्रकाशित )

Friday, June 3, 2011

अबाबील- मानव कौल


( मानव कौल की यह कहानी जब पढ़ी थी तो ख़याल आया था की सहज होना इतना मुश्किल भी तो नहीं. मानव की अनुमति से इसे अपने ब्लॉग पर सहेज रही हूँ )

'तुम अगर कहो तो मैं तुम्हें एक बार और
प्यार करने की कोशिश करूंगा,
फिर से,शुरु से।
तुम्हें वो गाहे-बगाहे आँखों के मिलने की
टीस भी दूंगा।
तुम्हारा पीछा करते हुए,
तुम्हें गली के किसी कोने में रोकूंगा,
और कुछ कह नहीं पाऊंगा
रोज़ मैं तुम्हें अपना एक झूठा सपना सुनाऊँगा
पर इस बार
'सपना सच्चा था'- की झूठी कसम नहीं खाऊँगा
अग़र तुम मुझे एक मौक़ा ओर दो...
तो मैं तुमसे...
सीधे सच नहीं कहूंगा,
और थोड़ी-थोड़ी झूठ की चाशनी,
तुम्हें चटाता रहूँगा।
 'बस रोक दो मुझे ये नहीं सुनना है।'
 उसने कुर्सी पर से उठते हुए कहा, वो कुछ सुनना चाहती थी ये ज़िद्द उसी की थी।मैं चुप हो गया।वो कमरे में धूमती रही,उसे अपना होना उस कमरे में बहुत ज़्यादा लग रहा था,वो किसी कोने की तलाश कर रही थी जिसमें वो समा जाए, इस घर में रखी वस्तुओं में गुम हो जाए, इस घर का एक हिस्सा बन जाए, जैसे वो कुर्सी, जिसपर से वो अभी-अभी उठ गयी थी। 
'क्या हुआ?'
मैंने अपनी आवाज़ बदलते हुए कहा, उस आवाज़ में नहीं जिसमें मैं अभी-अभी अपनी कविता सुना रहा था।
'तुम्हारी कविता से मुझे आजकल बदबू आती है। किसकी?... मैं ये नहीं जानती।'
उसे शायद मेरे छोटे से कमरे में एक कोना मिल गया था, या कोई चीज़ जिसे पकड़कर वो सहज हो गई थी और उसने ये कह देया था।... पर मेरे लिए वो कुर्सी नहीं हुई थी, वो मुझे अभी भी घर में लाई गई एक नई चीज़ की तरह लगती थी।मेरे घर की हर चीज़ के साथ 'पुराना' या 'फैला हुआ' शब्द जाता है, पर वो हमेशा नई लगती है, नई...धुली हुई, साफ सी।ऎसा नहीं है कि मेरे घर में कोई नयी चीज़ नहीं है, पर वो कुछ ही समय में इस घर का हिस्सा हो जाती है। यहाँ तक की, नई लाई हुई किताब भी, पढ़ते-पढ़्ते पुरानी पढ़ी हुई किताबों में शामिल हो जाती है।पर वो पिछले एक साल से यहाँ आते रहने के बाद भी, पढ़े जाने के बाद भी, पुरानी नहीं हुई थी... , जिसे मैं भी पूरे अपने घर के साथ पुराना करने में लगा हुआ था।
'मेरे लिखे में, तुम्हारे होने की तलाश का, मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ।'
इस बात को मैं बहुत देर से अपने भीतर दौहरा रहा था, फिर एक लेखक की सी गंभीरता लिए मैंने इसे बोल दिया।
रात बहुत हो चुकी थी, उसे घर छोड़ने का आलस,उसके होने के सुख को हमेशा कम कर देता था।वो रात में,कभी भी मेरे घर में सोती नहीं थी, वो हमेशा चली जाती थी। बहुत पूछने पर उसने कहा था कि उसे सिर्फ अपने बिस्तर पर ही नींद आती है।उसने मेरी बात पर चुप्पी साध ली थी, कोने में जल रहे एक मात्र टेबिल लेंप की धीमी रोशनी में भी वो साफ नज़र आ रही थी, पूरी वो नहीं,बस उसका उजला चहरा, लम्बें सफेद हाथ। अचानक मैं अबाबील नाम की एक चिड़िया  के बारे में सोचने लगा, जिसे मैंने उत्तरांचल में चौकोड़ी नाम के एक गांव में देखा था। वो उस गांव की छोटी-छोटी दुकानों में अपना घोसला बनाती थी,छोटी सी बहुत खूबसूरत। शुरु शुरु में मुझे वो उन अधेरी,ठंड़ी दुकानों के अंदर बैठी, अजीब सी लगती थी,मानो किसी बूढ़े थके, झुर्रीदार चहरे पर किसी ने रंगबिरंगी चमकदार बिंदी लगा दी हो। पर बाद बाद में मैं उन दुकानों में सिर्फ इसलिए जाता था कि उसे देख सकूं, जो उसी दुकान का एक खुबसूरत हिस्सा लगती थी।
'मुझे पता है ये केवल कल्पना मात्र है, उससे ज्यादा कुछ नहीं, पर मुझे लगता है कि तुम मुझे धोखा दे रहे हो, नहीं धोखा नहीं कुछ और। कल रात जब मैं तुम्हारे साथ सो रहे थे तो मुझे लगा कि तुम किसी और के बारे में सोच रहे हो,तुम मेरे चहरे को छू रहे थे पर वंहा किसी और को देख रहे थे।उस वक्त मुझॆ लगा, ये सब मेरी इन्सिक्योरटीज़ है और कुछ नहीं। पर अभी ये कविता सुनते हुए मुझे वो बात फिर से याद आ गई।मैं इसका कोई जवाब नहीं चाहती हूँ, मैं बस तुम्हें ये बताना चाहती हूँ।'
रात में उसके सारे शब्द अपनी गति से कुछ धीमे और भारी लग रहे थे। मुझे लगा मैं उन्हें सुन नहीं रहा हूँ, बल्कि पढ़ रहा हूँ।
'ये तुम्हारी इन्सिक्योरटीज़ नहीं हैं, अगर तुम इसे धोखा मानती हो तो मैं तुम्हें सच में धोखा दे रहा हूँ। अभी भी जब तुम उस कोने में जाकर खड़ी हो गई थी,तो मैं किसी और के बारे में सोच रहा था।'
अब मैं उसे ये नहीं कह पाया कि मैं उस वक्त, असल में अबाबील के बारे में सोच रहा था, पता नहीं क्यों, पर शायद मुझे कह देना चाहिए था।
'मैं एक बात और पूछना चाहती हूँ, कि जब तुम मेरे साथ होते हो तो कितनी देर मेरे साथ रहते हो।''
'पूरे समय।'
 'झूठ।'
 'सच।'
 'झूठ बोल रहे हो तुम।'
 'देखो असल में...'
 'मुझे कुछ नहीं सुनना... मैं जा रही हूँ...।'
 'मैं तुम्हें छोड़ने चलता हूँ... रुको।'
'कोई ज़रुरत नहीं है...।'
 और वो चली गई, खाली कमरे में मैं अपनी आधी सुनाई हुई कविता,और अपनी आधी बात कह पाने का गुस्सा लिए बैठा रहा।सोचा कम से कम वो आधी कविता अपने घर की पुरानी, बिखरी पड़ी चीज़ो को ही सुना दूं,पर हिम्मत नहीं हुई।उसे घर, आज घर नहीं छोड़ा इसलिए शायद वो यहाँ थी का सुख अभी तक मेरे पास था। मैं क्या सच में कल रात उसके साथ सोते हुए किसी और के बारे में सोच रहा था, किसके बारे में?
हाँ याद आया, मैं जब उसके चहरे पे अपनी उंगलियां फेर रहा था... तो अचानक मुझे वो सुबह याद हो आई, जब मैं अपनी माँ को जलाने के बाद, राख से उनकी अस्थीयाँ बटोर रहा था। मैंने जब तुम्हारी नाक को छुआ तो मुझे वो, माँ की एकमात्र हड़्डी लगी जिसे उस राख में से मैंने ढूढा़ था। उसके बाद मैं काफी देर तक राख के एक कोने में यू ही हाथ घुमाता रहा,हड्डीयाँ ढूढ़ने का झूठा अभिनय करता हुआ, क्योंकि मैं माँ की और हड़्ड़ीयों को नहीं छूना चाहता था... उन्हें छूते ही मेरे मन में तुरंत ये ख्याल दोड़ने लगता कि वो उनके शरीर के किस हिससे की है... ये उनकी मौत से भी ज़्यादा भयानक था।फिर मैं तुम्हारे बारे में सोचने लगा कि जब तुम्हें जलाने के बाद मुझे अगर तुम्हारी अस्थीयों को ढूढ़ना पड़ा तो... और इस विचार से मैंने अपना हाथ तुम्हारी पीढ़ पर ले गया... लगा कि तुम जलाई जा चुकी हो,तुम्हारा ये शरीर राख है और मैं उस राख में से तुम्हारी हड़्ड़ीयाँ टटोल रहा हूँ। तुम अचानक हंसने लगी थी, पर मैं शांत था क्योंकि मैं सच में तुम्हारी हड़डीयाँ टटोल रहा था।
वो सच कहती है मैं हर वक्त लगभग उसे ही देखते हुए कुछ और देखता होता हूँ...। मैंने सोचा टेबल लेंप बंद कर दूं, पर उसके बंद करते ही कमरे में इतना अंधेरा हो गया कि मुझसे सहन ही नहीं हुआ... मैंने उसे तुरंत जला दिया।नींद की आदत उसके कारण एसी पड़ गई थी कि रात के कुछ छोटे-छोटे रिचुअल्स बन गये थे, जिन्हें पूरा किए बिना नींद ही नहीं आती थी।जैसे उसे घर छोड़ने के बाद अकेले वापिस आते वक्त,  उसके रहने के सुख का दुख ढूढ़ना।वापिस घर आते ही उसे काग़ज़ पे उतार लेना... वैसे यह अजीब है, जब मैं अपने सबसे कठिन दौर से गुज़र रहा था तो जीवन की खूबसूरती के बारे में लिख रहा था, और जब भी घर में सुख छलक जाता है तब मैं पीड़ा लिखने का दुख बटोर रहा होता हूँ। शायद यही कारण है कि जब वो घर में होती है तो मैं उसके बारे में लिखना या सोचना ज़्यादा पसंद करता हूँ, जो उसके बदले यहाँ हो सकती थी।कल उसे छोड़ने के बाद ही मैंने ये कविता लिखी थी जिसे वो पूरा नहीं सुन पाई।बाक़ी रिचुअल्स में वो संगीत तुरंत आकर लगा देना जिसे उसके रहते सुनने की इच्छा थी।घर में धुसते ही शरीर से कपड़े और उसके सामने एक तरह का आदमी बने रहने के सारे कवच और कुंड़ल उतार फैकना।नींद के साथ उस सीमा तक खेलना जब तक कि वो एक ही झटके में शय और मात ना दे दे, और फिर चाय पीना, ब्रश करना या कभी कभी नहा लेना.... अलग।
अब ना उसे छोड़ने गया और ना ही रात का वो पहर शुरु हुआ है जहां से मैं अपने रिचुअल्स शुरु कर सकूँ। अचानक मैं फिर से अबाबील के बारे में सोचने लगा, उसी गांव (चौकोड़ी) के एक आदमी ने मुझे बताया था कि इस चिड़िया का ज़िक्र कुरान में भी हुआ है, और ये उड़ते-उड़ते हवा में अपने मूहँ से धूल कण जमा करती है, जिसे थूक-थूक कर वो अपना घोसला बनाती है।मैंने कुछ संगीत लगाने का सोचा पर फिर तय किया कि अभी तो रात जवान है.. पहले चाय बना लेता हूँ,मैं अपने किचिन में चाय बनाने धुसा ही था कि मुझे डोर बेल सुनाई दी, मैंने तुरंत दरवाज़ा खोल दिया। वो बाहर खड़ी थी। मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो तेज़ कदमों से चलती हुई भीतर आ गई।
'तुम मुझे मनाने नहीं आ सकते थे, तुम्हें पता है मैं अकेली घर नहीं जा सकती हूँ, मुझे डर लगता है।'  मुझे सच में ये बात नहीं पता थी। मुझे उसका यह चले जाने वाला रुप भी नहीं पता था सो उसका वापिस आ जाना भी मेरे लिए उतना ही नया था जितना उसका चले जाना। दोनों ही परिस्थिती में कैसे व्यवहार करना चाहिए इसका मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था। मैं कुछ देर तक चुपचाप ही बैठा रहा। फिर अपने सामान्य व्यवहार के एकदम विपरीत, मैं उसके बगल में जाकर बैठ गया।
 आई एम सॉरी... माफ कर दो मुझे..।’
इस बात में जितना सत्य था उतनी चतुरता भी थी, पर इसमें मनऊवल जैसी कोई गंध नहीं थी। पर उसने शायद इन शब्दों के बीच में कुछ सूंघ लिया और वो मान गई।वो मेरी तरफ पलटी और मुस्कुरा दी।उसने अपने हाथ मेरे बालों में फसा लिए, और उनके साथ खेलने लगी।
'मैं जब पहली बार तुमसे मिली थी, याद हैं तुम्हें....मुझे लगा था कि तुम एक हारे हुए आदमी हो जो सबसे नाराज़ रहता हैं। क्या उम्र बताई थी तुमने उस वक्त अपनी?...पेत्तालीस साल... हे ना!'
'वो सिर्फ एक साल पुरानी बात है... i was 43 last year...'
'ठीक है 44... एक साल इधर-उधर होने से क्या फ़र्क पड़ता है।'
वो हंसने लगी थी, मैं जानता था वो मुझे उकसा रही है। कोई और वक्त होता तो शायद मैं जवाब नहीं देता पर मैं जवाब देना चाहता था क्योंकि मैं वो हारे हुए आदमी वाली बात को टालना चाहता था।उसके हाथ मेरे बालों पर से हट गए थे।
'चालीस के बाद,एक साल का भी इधर-उधर होना बहुत माईने रखता है।'
मैं एक मुस्कान को दबाए बोल गया था।
'हाँ.. मुझॆ महसूस भी होता है।'
ये कहते ही उसकी हंसी का एक ठहाका पूरे कमरे में गूंजने लगा।मैं चुप रहा, मानो मुझे ये  joke समझ में ही नहीं आया हो।वो थोड़ी देर में शांत हुई...उसके हाथ वापिस मेरे बालों की तलाशी लेने लगे... हाँ मुझे अब उसका बाल सहलाना, अपने बालों की तलाशी ही लग रहा था।
 'मैं जब छोटी थी, उस वक्त हमारे घर में बहुत महफ़िले जमा होती थी...।’
उसने अचानक एक दुसरा सुर पकड़ लिया... मैंने इस सुर को बहुत कम ही सुना है खासकर उसके मुहँ से.... वो मेरे हाथों को भी टटोल रही थी... मानो वो सारा कुछ, जो वो बोल रही है... मेरे ही हाथों मे लिखा हो...
* * * * *

Wednesday, June 1, 2011

रहे सलामत मेरा पागलपन...



रास्तों को बांधकर पीछे वाली सीट पर डाल दिया. कानों में कुछ अपनी पसंद के सुर पहने और उछलती-कूदती सी जा पहुंची उसी किनारे पर. वही किनारा, जहां मुझे चैन मिलता है. हां जी, गोमती नदी का किनारा. कलकल की कोई आवाज नहीं, पानी में कोई धार नहीं, बस कि धीरे-धीरे बहता पानी. मानो ऊब गया हो बहते-बहते. अक्सर मुझे नदी उदास सी लगती है. मैं फिर भी जाती हूं उसके पास. कि जिसे आप प्यार करते हैं जरूरी तो नहीं उसके पास तभी जाएं जब वो खुश हो. मैं उसे पूरे दिल से गले लगाना चाहती हूं. लेकिन बस पानी में पांव डालकर बैठ जाती हूं. गुलजार साब का गीत कान में बजता है, 'सीली हवा छू गई...सीला बदन छिल गया...नीली नदी के परे गीला सा चांद खिल गया...' जैसे-जैसे शाम गुजर रही है शहर जाग रहा है और चांद उदास नदी के आंचल में छुपने को बेताब है. मानो वो भी कहता हो कि अपार्टमेंट्स की छत पर टंगे रहने में कोई मजा नहीं आता. आंगन में खिलने की बात ही कुछ और थी. कम्बख्त इसे भी ना नॉस्टैल्जिया की बीमारी है. नदी मैं और चांद तीनों हंस देते हैं. नदी चांद की तरह किसी से कोई शिकायत नहीं करती.

शहरों में उगते जंगलों ने नदियों को भी कितना उपेक्षित कर दिया है. ईंट पत्थरों की खूबसूरती और तेज रोशनियों के बीच दौड़ती भागती एसी गाडिय़ों में बैठे लोगों को तो ख्याल भी न आता होगा कि यहीं उनके बेहद करीब एक नदी है. बस हाथ बढ़ाकर उसे छुआ जा सकता है. शायद इसीलिए जब भी मैं गोमती की ओर बढ़ती हूं तो अक्सर अकेली ही होती हूं. और लोग मुझे हैरत से देखते हैं. सिक्योरिटी वाला दौड़कर पास आता है. उसे डर है कि कहीं... उसका डर वाजिब है. दर्द से भरे दामन को संभाल न पाने वाले तमाम मायूस प्रेमियों को नदियों का ही ठौर मिला है. गोमती ने भी न जाने कितने रा$ज, कितनी मोहब्बत की दास्तानें, कितने धड़कते दिल अपने भीतर संभाले हुए हैं. प्रशासन की सतर्कता ने जाल लगवा दिये, रेलिंग ऊंची करवा दी. अब पुलों से गुजरो तो लगता है जेल से गुजर रहे हैं. नदी दिखती ही नहीं. हमने उसे छुपा दिया है. उसके आसपास न जाने क्या-क्या उगा लिया है. पूरे शहर में गोमती खामोशी से चुपचाप पड़ी रहती है. मानो थक गई हो. लेकिन उसके पास इस तरह पड़े रहने के सिवा कोई चारा ही न हो. जैसे घरों में अक्सर बुजुर्ग पड़े रहते हैं. उनके पास चुपचाप एक कोना पकड़े रहने और सबकी खुशी में खुश होने के सिवा कोई विकल्प भी कहां होता है.

सुख हमारी हथेलियों पर रखा होता है और अक्सर हम अनजाने उसे ढूंढते हुए ही हथेलियां उलट देते हैं. वो गिर जाता है. खो जाता है. हम ढूंढते रहते हैं. ताउम्र. हमने नदियों को नहीं खोया, खुद को खोया. ये कोई पर्यावरण प्रेम नहीं, स्वार्थ है. हम सब नदी ही तो हैं. बहते जा रहे हैं. अपने भीतर की ठंडक को, गहराई को, उत्साह को, निर्मल अहसास को न जाने कैसे और क्यों हमने खो दिया. जीवन को मरुस्थल बना लिया. जीवन के कुछ लक्ष्य थे, कुछ सपने. कुछ कहे, कुछ अनकहे. एक दौड़ थी और ढेर सारे रास्ते. उन रास्तों पर दौड़ते हुए अपने ही आप से कब हाथ छूटा पता ही नहीं चला. नदी में जब चेहरा देखा तो लगा ये कौन है?

सप्ताह में एक दिन छुट्टी का होता है और उस दिन मेरे भीतर की नदी मेरे शहर की नदी से मिलने को व्याकुल हो उठती है. किल्लोल करता मन उसका आंचल थामने को उत्सुक हो उठता है और कदम बेसाख्ता उधर चल पड़ते हैं. वो मुझे देख मुस्कुराती है और मैं उसे देख. नदी के ठंडे पानी में पांव डाले जिस वक्त बैठी होती हूं ना, सारी दुनिया न जाने कहां छूट जाती है. बस वही एक पल जीवन का हासिल होता है...किसी को ये पागलपन लगे तो लगे...