Friday, July 1, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला... 6


बोरिस के पत्र मरीना के जीवन में चल रहे बसंत पर अवसाद का पतझड़ लेकर आये. मरीना बोरिस के पत्र पढ़कर गहन पीड़ा में डूब गई. उसे बोरिस की भावनाओं का जरा भी अंदाजा नहीं था लेकिन उसके पत्रों के बाद उसके दु:ख का उसे अहसास हो चुका था. उसे महसूस हुआ कि अनजाने ही वो अपने अच्छे दोस्त के दु:ख का कारण बन चुकी है. यह दु:ख उसके हिस्से के उजाले की सारी किरणें बीनने लगा. आखिर उसने बोरिस को 23 मई को एक पत्र लिखा.
बोरिस,
मेरे कारण तुम्हारी भावनाओं को ठेस लगी इसका मुझे दु:ख है. मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था. अब मैं रिल्के को कोई पत्र नहीं लिखने वाली हूं. मैं किसी के भी हिस्से के दु:ख को नहीं बढ़ाना चाहती. हालांकि मैं जानती हूं इससे सबसे ज्यादा मुझे ही दु:ख होगा. रिल्के इतने महान हैं कि वो दु:ख, प्रेम, अवसाद सब साध चुके हैं. उन्हें मेरे पत्र लिखने, न लिखने से बहुत फर्क नहीं पडऩे वाला.
रिल्के के लिए मेरी मन में बहुत गहरी भावनाएं हैं. उनका मेरी जिंदगी में होने का अहसास मुझे रचनात्मक और भावनात्मक सुरक्षा के केंद्र में ले जाता है. उनसे संवाद करके मेरे लंबे अकेलेपन को विराम मिलता है. मानो रिल्के के शब्द किसी ब्लॉटिंग पेपर की तरह मेरा दु:ख सोख लेते हों. बोरिस, रिल्के मुझसे बड़े हैं. उम्र में भी रचनात्मकता में भी और समझ में तो इतने विशाल हैं कि मैं सालों नहीं युगों छोटी हूं उनसे लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं है. मैं उनकी छाया में खुद को खोती नहीं, बल्कि उनके साथ खुद को मजबूत पाती हूं. हमारा छोटा सा अल्पकालिक संवाद मुझे बहुत कुछ प्रदान कर चुका है. लेकिन प्रिय बोरिस, अब मैं उन्हें पत्र नहीं लिखूंगी क्योंकि तुम्हारे दु:ख का मुझे अहसास है. हालांकि यह फैसला खुद को विषाद के कुंएं में धकेलने जैसा है फिर भी.
इस पत्र के साथ रिल्के के वे दोनों पत्र भी भेज रही हूं, जो उन्होंने मुझे लिखे थे.
अपना ख्याल रखना
मरीना

रिल्के के प्रेम में डूबी मरीना ने अपने पत्र में यह तो कह दिया कि बोरिस की भावनाओं को उसके कारण ठेस पहुंची इसके लिए उसे दु:ख है और वो अब रिल्के को पत्र नहीं लिखेगी. लेकिन रिल्के के प्रति अपनी आत्मीयता को उसने अनजाने ही इस कदर अभिव्यक्त किया कि बोरिस मरीना के पत्र को पढ़कर पहले से ज्यादा दु:खी हो गया. उसे लगा रिल्के के पत्र उसे भेजकर मरीना एक किस्म की नाटकीयता कर रही है. यह उसने मरीना को अपने पत्र में लिख भेजा.

बोरिस के नाराजगी भरे पत्र के जवाब में मरीना ने बोरिस को 25 मई को फिर से पत्र लिखा,

बोरिस,
मैंने तुम्हें रिल्के के पत्र इसलिए नहीं भेजे कि मैं तुम्हें कोई सफाई देना चाहती थी. मैंने रिल्के को पत्र न लिखने का निर्णय भी इसीलिए लिया कि रिल्के से संवाद खत्म करने के लिए उसके मोह से खुद को मुक्त करना जरूरी है. सब कुछ खो देने के बाद उपजे गहन अवसाद में डूबी शांति को अनुभव कर रही हूं. इस शांति ने मुझे खुद चुना है.
(यकीनन ये पंक्तियां लिखते समय मरीना की आंखें छलक रही थीं जिसका जिक्र दस्तावेजों में कहीं नहीं है.)
वो आगे लिखती है-

मैंने रिल्के के प्रति अपनी भावनाओं को तुमसे नहीं छुपाया जबकि तुम्हारी भावनाओं के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता था. बोरिस, मैंने अपनी सहज विनम्रता के चलते तुम्हें रिल्के के पत्र भेजे और अपनी सहज ईमानदारी के चलते रिल्के के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया इस उम्मीद से कि जिसे प्यार करने की बात कर रहे हो उसे समझ भी सकोगे.
मरीना

(जारी...)

4 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

यह पोस्ट भावुक कर देने वाला है। आंखों की कोरों को गीला भी कर देती है।

बाबुषा said...

मेरे पास वक़्त की कमी है इन दिनों और रिल्के मरीना और बोरिस जान लेने पे उतारू हैं .

jyoti nishant said...

rula gayi yeh chhithhi.

वृजेश सिंह said...

बहुत-बहुत शुक्रिया प्रतिभा जी रिल्के के पत्रों के सिलसिले से मिलवाने के लिए।