Wednesday, April 6, 2011

हमको दुश्मन की निगाहों से न देखा कीजै...


पिछले बरस मेरे हाथों एक किताब की नींव पड़ी थी. किताब का नाम था 'चर्चा हमारा.' स्त्री विमर्श की इस किताब में मेरी भूमिका को पढ़कर आज एक दोस्त का भावुक सा फोन आया. उसी के आग्रह पर यह भूमिका आज ब्लॉग पर दे रही हूं.- प्रतिभा


वो खुरदुरा था, बेडौल था. किसी भद्र जगह पर, भद्रजनों के बीच रखने के लायक नहीं था. उसे देखते ही लोग मुंह बिदकाते और न$जर फेर लेते. वो विचार था. स्त्री के मन में उपजा विचार. स्त्री और विचार पहले तो यही बात गले में अटकती है. इतनी सुंदर, नाजुक, ममतामयी, समर्पण और त्याग की देवी स्त्री का विचार जैसी चीजों से क्या लेना-देना. उसकी दुनिया तो चांद की रूमानियत, फूलों की सरगोशियों और ब्यूटी पार्लरों के दारीचों में सिमटी अच्छी लगती है. मर्दों ने समझाया तुम नाहक हलकान हुई जाती हो प्रिये, आराम करो. थक गई होगी. देखो तो आज गार्डन में कितना सुंदर फूल खिला है और हां कल बिट्टू का टेस्ट है. देखना तैयारी अधूरी न रह जाये. उसके अव्वल आने पर तुम्हारे चेहरे का जो संतोष होता है ना, वही मेरी जागीर है. स्त्री बहक गई. चली गई घर के दारीचों में खुशी-खुशी. फुलकों के फूलने का सुख उसे पुकारने लगा. लेकिन फुलके फुलाते, फूलों और बच्चों की परवरिश करते-करते, पतियों के लिए सजते-संवरते, जाने कब और कैसे उसकी निगाहें आसमान की ओर उठने लगीं. उसे माथे पर बिंदी नहीं, सूरज उगाने का जी चाहा. सूरज की आग को पकडऩे का मन हुआ. तारे गिनने का नहीं, चांद ताकने का नहीं, चांद तक पहुंचने का ख्याल आया. तब उसे अहसास हुआ कि जब-जब वह आसमान देखना चाहती है, दरवाजे बंद कर दिये जाते हैं. उसके परमेश्वर रूपी पति खुद आसमान बनकर छा जाते हैं उसके ऊपर. वह फिर बहक जाती है.

कोई हवा को झोंका बाहर से आकर उसे सहलाता है तो उसके भीतर न जाने क्या-क्या उगने लगता है. अखबार पर न$जर जाती है तो उसे अंदर कुछ मजबूत होता लगता है. उसे महसूस होता है कि बैठक में पुरुष जिन विषयों पर बात कर रहे हैं, वहां उसकी भूमिका सिर्फ चाय पहुंचाने भर की क्यों है? वह भी वहां होना चाहती है, बात करना चाहती है. तुम अंदर चलो ये सब औरतों की बातें नहीं कहकर उसे फिर से चूल्हे, पार्लर और सीरियल्स की दुनिया में धकेल दिया जाता.

लेकिन जो उसके भीतर है वो उसे जीने नहीं देता बेचैन किये रहता है. उसके अंदर का विचार, उसकी समझ, उसका दिमाग. उसे ऊब होने लगी है लिपिस्टिक, बिंदी, चूड़ी, साड़ी से. सास-बहू, ननद की कलह में सर खपाने से बेहतर मानती है वह पढऩा या फिर बच्चों को पढ़ाना. फिर भी वो अंदर डोलता, खुरदुरा, बेडौल बेढब सा विचार उसे बेचैन किये रहता है.

गलती से एक दिन स्त्री बाजार से साड़ी के पैसों से 'चाक' उठा लाई. पढऩा शुरू किया तो पढ़ती ही गई. हैरान, परेशान, उलझी हुई. उसकी आंखें फटी की फटी. उसके भीतर के चलते और सदियों से दबाये जाते सवाल यहां निर्विघ्न घूम रहे थे. कितनी बेखौफ थी सारंग. और मैत्रेयी...बाप रे!
ऐसा कोई लिख सकता है क्या? वह भी एक औरत करवे की लौ में प्रेमी का अक्स...धर्म न भ्रष्ट हो गया सारंग का...मैत्रेयी का...ये औरत क्या सचमुच औरत है वो भी इसी दुनिया की...ऐसा नहीं हो सकता है. वह किताब को छुपा देती है. लेकिन दूसरी चाक का इंतजार करने लगती है. चाक, इदन्नमम, अल्मा कबूतरी, गुडिय़ा...एक के बाद एक स्त्री को किताबों के रूप में अपनी बेचैनी के साझीदार मिलने लगते हैं. मैत्रेयी जिनसे वह मिली नहीं, उसे सचमुच सहेली लगने लगती है. कितना सच्चा, साफ लिखती हैं आप?
डर नहीं लगता?

डर...हां, यहीं से शुरू होती है हमारी इस किताब की अवधारणा. डर लगता है हम स्त्रियों को. बहुत डर लगता है सिर्फ इतना कहने में कि हम जीना चाहती हैं. सिर्फ इतना कहने में कि एक टुकड़ा आसमान हमें भी दो ना.. जरा उड़कर देखें. डर लगता है कि कैसे कहें हम कि एक बार खुलकर जीने दो हमें, हटा लो बंदिशें...कि हम आजाद सांस का स्वाद ले सकें. जिसे सचमुच प्रेम करते हैं, उसे कम से कम जी भरकर याद तो कर सकें. डर तो बहुत लगता है हमें. कुछ भी सोचना वर्जित है. हम सेवा, समर्पण के लिए बने हैं. संस्कार, परंपरा रिवाज सब हमारे खिलाफ हैं. हम पुरुष की संपत्ति हैं, उसकी जागीर हैं. संपत्ति क्या खुद सोचती है कभी? हमारी इच्छा, अनिच्छा, हमारी सोच का कोई मतलब नहीं. चूड़ी, गहना, कपड़ा और बच गया तो सास-बहू का ड्रामा काफी है हमारी जिंदगी को पूरने के लिए. पर ये स्त्री तो डरती ही नहीं. आंखों में आंखें डालकर सवाल करती है, पूछती है अगर तुम देर रात तक घूमकर आ सकते हो तो मैं क्यों नहीं? वही काम जब तुम करते हो तो परंपरायें नहीं टूटतीं, हम करते हैं तो क्यों कोहराम मच जाता है? रिवाजों का बोझ हमारे ही सीने पर क्यों, थोड़ा सा तुम भी क्यों नहीं उठाते और हमारे $जरा से संास लेते ही परिवार भला क्यों टूटने लगते हैं? मैत्रेयी कहती हैं, टूट जाने दो ऐसे परिवार जिनकी नींव तुम्हारी घुटन पर रखी गई हो. बड़ी अहमक औरत है यह तो, इसके खिलाफ फतवा जारी नहीं हुआ अब तक मैत्रेयी पुष्पा पहली ऐसी लेखिका हैं, जो इतनी साफगोई से बात कहती हैं ऐसा मैं नहीं मानती क्योंकि इसके पहले भी, कृष्णा सोबती, इस्मत चुगताई, कुर्तुल ऐन हैदर का लेखन जेहन में है. यहां मैं भाषा की दीवारों को गिराकर सिर्फ भारतीय स्त्रियों की बात पर ही फोकस कर रही हूं.

अब यह मैत्रेयी जी का सोच-समझकर गढ़ा गया ढंग है या उनका स्वाभाविक तरीका कि उनके किरदार ऐसे लगते हैं जैसे पास में बैठकर बात कर रहे हों. उनकी रचनाओं में लेखकीय विद्वता, प्रवीणता या कुशलता, किस्सागोई कम हकीकत ज्यादा है. जैसे वो चाहती हों कि बहुत हुई चुतराई, कला कौशल, चलो अब सीधी बात करें. क्या झिझक है यह कहने में कि मुझ भूख लगी है...प्यास लगी है...कि मैं जीना चाहती हूं...खुले आकाश में उडऩा चाहती हूं.

मैत्रेयी की रचनाएं पुराने उपमानों, बिम्बों को तोड़ती हैं. कथा तत्व नये रूप में उभरते हैं. कहीं कोई सास किसी बहू का दमन नहीं कर रही है उनकी रचनाओं में. कहीं कोई औरत, किसी औरत की दुश्मन नहीं है. कहीं कोई औरत समाज का विनाश नहीं कर रही है. वह समाज को गढ़ रही है. स्कूल संस्था को बचाने के लिए अपनी देह की परवाह न करने वाली सारंग के रूप में उभर रही है. पति से बेवफाई नहीं करती लेकिन प्रेमी का सम्मान करना भी नहीं छोड़ती. वह जीती है पूरी ताकत से, जुल्म से थककर आंसू नहीं बहाती...जूझती है, सामना करती है. ऐसी स्त्री जब सामने आकर खड़ी हुई तो खलबली होना तो तय था. बवंडर, विशाल प्रलय, त्राहिमाम जैसी आवाजें उठीं लेकिन उन स्त्रियों के चेहरे की मुस्कुराहटों ने इस रचना प्रक्रिया को गले से लगा लिया जो अपने भीतर की कुलबुलाहटें पकड़ नहीं पा रही थीं.

कहानी, कविता, उपन्यास विधा कोई भी हो विचार उसका आधार होता है. लेखक का विचार उसकी विविध रचनाओं में, कैरेक्टर्स में डिजॉल्व होता रहता है. चूंकि मैत्रेयी का सारा लेखन शिल्प, बिम्ब, प्रतीक, उपमान आदि से परे है इसलिये उनके विचार कुछ ज्यादा मुखर होकर सामने आते हैं उन्हें पढ़ते हुए लगता है कि हां, यही तो हम कहना चाहते थे. ऐसा ही तो हम सोच रहे थे...तो उन सारे विचारों को एकत्र करना ही इस किताब का मकसद है. यानी कभी अल्मा, कभी सारंग कभी कलावती चाची, कभी श्रीधर की देह में भटकते विचारों को एक छत के नीचे सुरक्षित कर देना.

एक मकसद और है इस पुस्तक को लाने का कि वे सारे सवाल जो अकसर बड़े बेढब होते हैं और बहुत ही आक्रामक ढंग से पूछे या उठाये जाते हैं उनके जवाब तलाशना. मसलन, क्यों ये माना जाता है कि स्त्री की स्वतंत्रता ही उसकी स्वच्छंदता है? कितनी ही स्त्रियां स्वयं इस बात को माने बैठी हैं कि स्त्रियां ही स्त्रियों की दुश्मन होती हैं. वे इस बात की तह में जाना ही नहीं चाहतीं कि दरअसल, यह सारी व्यूह रचना पुरुषों ने इस चालाकी से की कि हमें एक-दूसरे के दुश्मन के रूप में आमने-सामने खड़ा कर दिया और खुद निकल गया चौसर खेलने या बाहर आनन्द करने. आप आपस में जूझते रहिये ताकि बाकी दुनिया में उनका वर्चस्व कायम रहे. 
कुछ लोग सवाल करते हैं कि स्त्री आजाद होकर अश्लीलता के घेरे में, बाजार के घेरे में फंस गई है. आखिर क्या फायदा हुआ ऐसी स्वतंत्रता का? स्वंत्रता और स्वछंदता का भेद हमें पता है मान्यवर इसमें हमें न उलझाइये...

महिलाओं के  मुद्दे सिर्फ मंच पर डिस्कस करने भर के या नारी विमर्श के झंडे के नीचे पलने भर के नहीं रह गये हैं. उन्हें अब हर घर में, हर स्त्री और पुरुष में भी पनपना होगा. स्त्रियों की चुनौतियां नये दौर में और बढ़ी हैं. नौकरी, घर, समाज सबको संभालते हुए वह टूटने की स्थिति में आ जाती है. पर हिम्मत नहीं हारती. इस किताब के $जरिये हम दो औरतें (मैं और मैत्रेयी) सिर्फ इतना कहना चाहती हैं कि हमको दुश्मन की निगाहों से देखना बंद कीजिये. आरोपों, प्रत्यारोपों और अपेक्षाओं की प्रत्यंचा उतार दीजिये. हम साथी हैं, मित्र हैं. तुम्हारी ताकत बनना चाहते है. तुम्हारे साथ चलना चाहते हैं, तुमसे अलग नहीं. समाज...परिवार ...जोडऩा चाहते हैं..तोडऩा नहीं लेकिन अपने टूटने की कीमत पर अब और नहीं....
- प्रतिभा कटियार 



5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

साथ रह कर ही संभव है शान्ति जीवन की।

ZEAL said...

जागरूक करती बेहतरीन पोस्ट ।

kase kahun?by kavita. said...

agar ye bhoomika hai to pustak kaisi hogi....aurat ke man ki bat ,uski chah ko is tarah shabdon me saral aur sateek tarah se pahli bar dekha....

priya said...

बहुत ही कमाल की भूमिका है. जैसे कोई पास बैठकर बात कर रहा हो. किताब पढने का मन हो रहा है. ये कहाँ मिलेगी. किस प्रकाशन से आई है प्रतिभा जी.

rohitkaushikmzm said...

प्रतिभा जी इस दौर में स्त्री लगातार स्वतंत्रता की ओर बढ रही है लेकिन अभी भी उसे अनेक मोर्चो पर जूझना पड रहा है । आत्मनिर्भर बनने और आसमान छूने के लिए वह बधी-बधाई लीक तोड रही है लेकिन यहां भी उसे दोहरे शोषण का शिकार होना पड रहा है । कार्यस्थल पर काम करने के बाद जब शाम को वह घर आती है तो घर का सारा काम उसे ही निपटाना पडता है । हम भले ही हितैशी बनने के चक्कर में थोडा बहुत काम में हाथ बटा दे । लेकिन सारी जिम्मेदारी स्त्री की ही होती है । हमें भले ही समानता की बातें करें लेकिन अभी भी असमानता की एक गहरी खाई है । सुखद यह है कि स्त्री इन सभी बातों को नजरअन्दाज कर लगातार आगे बढ रही है ।