Sunday, March 27, 2011

प्यारी शिम्बोर्स्का की याद में


आज विश्व रंगमंच दिवस है. हर बार की तरह इस बार भी शिम्बोर्स्का की यह कविता जेहन में दौड़ रही है. दुनिया के इस नाटक में हम अपने चेहरों पर न जाने कितने चेहरे लगाये, न जाने कितनी भूमिकाओं में हैं. इन नाटकों के दुखांत या सुखांत भी हम तय नहीं कर पाते . काश कि कर पाते...आइये अपनी भूमिकाओं में लौटते हुए अपने चेहरों पर मुखौटों को तरतीब से सजाते हुए पढ़ते हैं मेरी प्यारी शिम्बोर्स्का की यह कविता-


 दुखांत 

मेरे लिए दुखांत नाटक का सबसे मार्मिक हिस्सा
इसका छठा अंक है
जब मंच के रणक्षेत्र में मुर्दे उठ खड़े होते हैं
अपने बालों का टोपा संभालते हुए
लबादों को ठीक करते हुए 
जब जानवरों के पेट में घोंपे हुए छुरे निकाले जाते हैं
और फांसी पर लटके हुए शहीद
अपनी गर्दनों से फंदे उतारकर 
एक बार फिर 
जिंदा लोगों की कतार में खड़े हो जाते हैं
दर्शकों का अभिवादन करने.

वे सभी दर्शकों का अभिवादन करते हैं
अकेले और इकट्ठे 
पीला हाथ उठता है जख्मी दिल की तरह
चला आ रहा है वह जिसने अभी-अभी खुदकुशी की थी
सम्मान में झुक जाता है
एक कटा हुआ सिर.

वे सभी झुकते हैं
जोडिय़ों में
ज़ालिम मज़लूम की बाहों में बांहें डाले
बुजदिल बहादुर को थामे हुए
नायक खलनायक के साथ मुस्कुराते हुए

एक स्वर्ण पादुका के अंगूठे तले शाश्वतता कुचल दी जाती है
मानवीय मूल्यों का संघर्ष छिप जाता है एक चौड़े हैट के नीचे.
कल फिर शुरू करने की पश्चातापहीन लालसा.

और अब चला आ रहा है वह मेहमान
जो तीसरे या चौथे अंक या बदलते हुए दृश्यों के बीच
कहीं मर गया था
लौट आए हैं
बिना नाम-ओ-निशान छोड़े खो जाने वाले पात्र
नाटक के सभी संवादों से ज्यादा दर्दनाक है यह सोचना
कि ये बेचारे
बिना मेकअप या चमकीली वेशभूषा उतारे
कब से मंच के पीछे खड़े इंतजार कर रहे थे.

सचमुच नाटक को सबसे ज्यादा नाटक बनाता है 
पर्दों का गिरना
वे बातें जो गिरते हुए पर्दे की पीछे होती हैं
कोई हाथ किसी फूल की तरफ बढ़ता है, 
कोई उठाता है टूटी हुई तलवार
उस समय, सिर्फ उस समय
मैं अपनी गर्दन पर महसूस करती हूं
एक अदृश्य हाथ,
एक ठंडा स्पर्श.

- विस्साव शिम्बोर्स्का 
अनुवाद- विजय  अहलूवालिया 



6 comments:

jyoti nishant said...

it seems i am developing sense of good poetry.if this is happaning really,the credit goes to and yuor blog.thanx.

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर कविता, संप्रेषणीय अनुवाद।

नीरज बसलियाल said...

वाकई, बेहद शानदार

मनोज पटेल said...

सचमुच नाटक को सबसे ज्यादा नाटक बनाता है
पर्दों का गिरना
बहुत अच्छी कविता.

daanish said...

परदे का गिर जाना
नाटक का समापन तो नहीं... !?!
शायद
नहीं ......... !!

Manpreet Kaur said...

अच्छा पोस्ट है जी !हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर जरुर आना !
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