Tuesday, January 19, 2010

बुद्धू सा एक मन, कुछ आहटें और बसंत


कबसे महसूस हो रहा था कि कोई है जो पीछे चल रहा है. कोई आहट सी थी जो लगातार पीछे महसूस हो रही थी. पलटकर देखा तो कोई नहीं...कोई भी नहीं. ध्यान हटाया, कुछ और सोचने का मन बनाया. लेकिन चंद कदम चलते ही फिर आहटें पीछा करने लगी. मुस्कुरा पड़ी मैं. बुढ़ा गई हूं...कान बजने लगे हैं. कोई नहीं है...सचमुच कोई भी तो नहीं. सब अपनी जगह पर स्थिर...सब अपनी गति से चलते हुए. रास्ते वही...फासले वही. कोई भी तो नहीं. कहीं नहीं. क्यों लगता है कि कोई पीछे-पीछे चल रहा है. अब आंखें, कान, नाक, दिमाग चौकन्ना होने लगा था. जासूसी फिल्मों का सा सीन बन रहा था. कदम आगे बढ़ाते हुए और ध्यान पीछे लगाते हुए. जब तक ध्यान पीछे रहता कोई आहट नहीं आती और जैसे ही ध्यान हटता किसी के कदमों की चाप सुनाई देती. एकदम साफ सुनाई देती. मुझे लगा अब डॉक्टर के पास जाना होगा शायद. किसी को बताया तो बिना मेडिकल सर्टिफिकेशन के ही पागल मानने वालों की कमी नहीं है.
लेकिन ये आहटें लगातार बेचैन कर रही थीं. कोई तो है जो मुझे दिक कर रहा है. ऐसे मौकों पर रास्ते भी फैलकर और लम्बे हो जाते हैं. खत्म ही नहीं होते. सारी दुनिया किस कदर खुश है. किसी उत्सव में मगन है और मुझे न जाने कौन सी बीमारी लग गई सुबह-सुबह. बैठ ही जाती हूं सीढिय़ों पर. मुस्कुराती हूं. देखती हूं कहां हैं आहटें. कब तक मुंह छुपायेगा यूं पीछे चलने वाला. जानती हूं कोई नहीं फिर भी चाहती हूं कि कहीं कोई हो...ये आहटें भ्रम न हों. चल देती हूं ताकि चलती रहें आहटें पीछे-पीछे. भ्रम ही सही कि कहीं कोई है जो हर पल साथ है. शरारत ही सही. ये जीवन शरारतों के नाम ही सही. पूरे वक्त उन आहटों के बारे में सोचती रही. किसके होने का इंत$जार है ये सोचती रही. काम...व्यस्तताएं...परेशानियां...सब नाकाम. आहटों की कैद में रहना अच्छा भी लग रहा था. जैसे घनघोर ठंड में कोहरे को बूंद-बूंद पीना, गर्म कॉफी के घूंट की तरह...तेज बारिशों के साथ खुद भी एक धार हो जाना. ओह...कैसा हो जाता है जीवन. कैसी-कैसी आदतें लग जाती हैं. और ये आहटें...अब गुस्सा नहीं आ रहा. अगर ये भ्रम है, तो भ्रम ही सही. घर के करीब पहुंचने पर महसूस हुआ कि कोई दुपट्टे का कोना खींच रहा है धीरे-धीेरे. पलटती हूं तो कोई नहीं...एक झोंका...तेज हवा का... नहला कर जाता है सर से पांव तक. सिहरन सी महसूस होती है. मेरे ही भीतर से आवाज आती है बसंत मुबारक...ओह तो ये बसंत था जो साथ चल रहा था...उसकी आहटें थीं जिन्हें पहचान नहीं पा रही थी. मैं भी कैसी बुद्धू हूं...खैर, आप सबको बसंत मुबारक!

- प्रतिभा

6 comments:

अभिषेक ओझा said...

वसंत पंचमी की शुभकामनायें !

deepakkibaten said...

basant ka mausam wah kya kahne

सुशीला पुरी said...

वसंत पंचमी की हार्दिक बधाई ....

हिमांशु । Himanshu said...

अंत गज़ब है इस प्रविष्टि का ।
आपको भी वसंत की शुभकामनायें ।

rohit said...

Aacha laga.Aapko bhi Basant ki Subhkamnayee.
Rohit Kaushik

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर