Saturday, November 18, 2017

वो लम्हे


'सिखाना' मुझे हमेशा सीखना' सुनाई दिया हमेशा. 'समझाना' सुनाई दिया 'समझना' और 'कहना' सुनाई दिया 'सुनना' ही. तो ऐसे ही सीखने, समझने और सुनने के रास्तों पर चलना लुभाता है. युवाओं से संवाद के हर अवसर को मैंने चुना अपनी आंतरिक ऊष्मा को संजोये रखने के लिए, उनकी आँखों के सपनों की भाषा को पढने के लिए, उनके सवालों की गठरी को टुकुर टुकुर देखने के लिए. उन सवालों में कुछ अपने सवाल भी मिला देने के लिए.

पिछले दिनों यह मौके कई रूपों में मिले, कभी दून स्कूल ने बच्चों से संवाद का अवसर दिया, कभी केन्द्रीय विद्यालय ने और अभी हाल ही में दून विश्वविद्यालय ने. भूमिका कुछ भी रही हो मैंने किया वही जो मैं कर सकती थी कि बच्चों को सुना उनसे बातें कीं. 

दून विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी 'बज़्म' में जिस तरह के रंग सजाये थे उसने अभिभूत किया. महसूसने के इस सफ़र में गीता गैरोला जी और राकेश जुगरान जी भी साथ ही रहे. बहुत उम्मीद भरे लम्हे थे,  उम्मीद की इस  खुशबू में यह दुनिया डूब जाए तो कितना सुन्दर हो...!


ख़्वाबों को थामे रहना सिखाती है 'तुम्हारी सुलू'


अगर आपके पास सपने नहीं हैं तो यकीनन कुछ भी नहीं हैं लेकिन अगर आपके पास सपने हैं और उन सपनों ने आपकी नींदें हराम कर रखी हैं, आप किसी भी कीमत पर अपने सपनों को पानी देना नहीं भूलते तो वही पूरा समाज, पूरा परिवार आपके खिलाफ खड़ा होने को आतुर होता है जो असल में पूरी जिन्दगी दूसरों के सपनों को पहले पोसता रहा और फिर जीने लगा. 'तुम्हारी सुलू' समाज और व्यक्ति के ऐसे ही बारीक़ धागों के उलझाव की ओर इशारा करती है.

फिल्म पूरी तरह से विद्या बालन और मानव कौल की है, विद्या अपने ख़ास अंदाज से एक मध्यवर्गीय स्त्री के सोये सपनों को झिन्झोडती हैं. मानव ने एक मध्यमवर्गीय पतियों के थोड़ा इम्प्रूव्ड वर्जन बनने की कोशिश करने और उसमे फेल होने की पीड़ा को बखूबी निभाया है .

सुलू असल में हर उस मध्मवर्गीय स्त्री की कहानी है जो पैसा कमाने के लिए काम नहीं करती यानी काम तो करती है लेकिन अनपेड.क्योंकि वो हाउसवाइफ है. वो दुनियावी सफलता के मीटर में फिट नहीं है लेकिन जिसकी आँखों में सपने बहुत हैं. इस मायने में सुलू थोड़ी अलग है कि उसने आम गृहिणियों की तरह खुद को रोजमर्रा की जिन्दगी को नियति मानकर सपने देखना और उनका पीछा करना नहीं छोड़ा है. वो हमेशा कुछ करने की खोज में लगी रहती है और अपने सपनों की ऊर्जा से भरी हुई है. हालाँकि उसे खुद भी यह स्पष्ट नहीं है कि उसके सपने हैं क्या लेकिन उसे यकीन है कि वो कर सकेगी. यही फिल्म की पंचलाइन है. बिलीव इन योर ड्रीम.

सुलू जिन्दगी के हर लम्हे को बेहद प्यार से अपनाती है, बेहद अपनेपन से. इसकी वजह पैसा कमाना नहीं है बल्कि कुछ करने की ख़ुशी को महसूस करना है. सुलू का पति अशोक उसके इन सपनों में उसका साथ भी देता है. दोनों की रूमानी कहानी खुशनुमा एहसासों से भरती है. बच्चे के स्कूल में मम्मियों की चम्मच नीबू की रेस हो या सोसायटी के कार्यक्रम या अन्य छोटे मोटे कम्पटीशन जीतना उसे सब खुश करता है. वो कहती भी है कि 'मैं हर चीज़ में बड़ी जल्दी खुश हो जाती हूँ.' लेकिन कहानी एक नाटकीय मोड़ लेती है और सुलू आरजे बन जाती है. पहली नौकरी, नाईट शिफ्ट, अच्छी सैलरी, शो का हिट होना, सुलू का स्टार बन जाना और शुरू होना घर में एक बार फिर 'अभिमान' फिल्म की कहानी का दोहराव. समाज, परिवार तो टांग अड़ाने की ताक में हमेशा रहता ही है अबकी बार हमेशा से मित्र रहे और प्रेम से भरे पति का ईगो भी आड़े आ ही गया. इसके बाद तमाम नाटकीय मोड़ लेते हुए कहानी आगे बढ़ती है.

सच कहें तो कहानी बहुत आगे बढ़ नहीं पाती है जिसकी गुंजाईश थी. कहानी में बहुत नयापन नहीं है इसके बावजूद फिल्म के संवाद, बीच बीच में मजबूत स्ट्रोक लगाते हैं. मानव और विद्या के अभिनय ने कहानी के कच्चेपन को जरूरत से ज्यादा संभाला है. निर्देशन एकदम चुस्त है, कहानी में घटनाएँ बहुत हैं, फिल्म तेजी से भागती है, कई जगह लगता है कि घटनाओं की भरमार महसूसने के आड़े आ रही है.

फिल्म का एक दृश्य है जब नायक की नौकरी छूटती है और वो बालकनी से जहाज उड़ाता है बेहद इंटेंस है. लेकिन जब तक रोयें खड़े होते, जब तक दर्शक नायक के भीतर के उद्वेलन के साथ रिश्ता बन पाते सीन कट हो जाता है. हालाँकि कुछ दृश्यों में इसकी गुंजाईश बरकरार भी रही है लेकिन वो दृश्य नायिका के हिस्से में ज्यादा आये हैं जैसे बच्चे के स्कूल में प्रिंसिपल द्वारा बच्चे के सस्पेंड होने की बात पर नायक का यह कहना कि 'अब वो ख्याल रखेगा बच्चे का' या फिल्म के परम नाटकीय क्लाइमेक्स में बच्चे के गायब होने और फिर मिलने पर नायिका द्वारा उसे भींच लेना.

फिल्म के कुछ दृश्य बेहद सशक्त बन पड़े हैं, जिसमें फिल्म के अंत में बच्चे को ढूंढते हुए स्टेशन पर बैठे नायक और नायिका. जहाँ नायक पर्स में रखे बच्चे के खत को नायिका से साझा करता है.

तुम्हारी सुलू खूब ख्वाब देखने, ख़्वाबों को सहेजने की, उन्हें पूरा करने के प्रयासों की फिल्म है. फिल्म का गीत 'रफू' बेहद खूबसूरत है. फिल्म मनोरंजन करती है, मैसेज भी देती है, सकारात्मकता से भरती भी है फिर भी कुछ कमी सी रह गयी लगती है. या कहानी पर और काम होना था या उस हड़बड़ी से बचना था शायद जहाँ सबकुछ ढाई घंटे में घोंट कर पिला देने की जिद हो.

फिल्म को देखना बनता है विद्या बालन और मानव कौल के अभिनय के लिए, मनोरंजन के लिये और अपने आस पास ख्वाब देख रहे लोगों को समझना सीखने के लिए उनको सम्मान देने के लिए भी.

Tuesday, November 14, 2017

जब टूटता है दिल


टूटना
पहाड़ तब नहीं टूटता
जब पहाड़ टूटता है
पहाड़ तब टूटता है
जब टूटता है दिल.

भरना
दिल भर आने से नहीं भर आतीं
सूखी नदियाँ
पोखर
कुएं
बावडी
इनके सूखेपन से
भर आता है दिल.

Saturday, November 11, 2017

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ



जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
पल भर को थम जाती है धरती की परिक्रमा
बुलबुल का जोड़ा मुड़कर देखता है
टुकुर टुकर

लीची के पेड़ के पत्तों पर से टपकती बूँदें
थम जाती हैं कुछ देर को
जैसे थम जाती हैं मुलाकात के वक़्त
प्रेमियों की साँसे

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
नदियों की कलकल में एक वेग आ जाता है
जंगलों के जुगनुओं की आँखें चमक उठती हैं
सड़क के मुहाने पर फल बेचने वाली बूढी काकी
सहेजती हैं फलों की नमी

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
बढ़ जाती हैं बच्चों की शरारतें
गिलहरियों की उछलकूद
ज्यादा गाढे हो जाते हैं फूलों के रंग
और मीठी लगने लगती है बिना चीनी वाली चाय

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ
चरवाहे के गीत गूंजने लगते हैं फिजाओं में
शहर की टूटी सड़कें भी गुनगुना उठती हैं
प्यार में टूटे दिलों की धडकनों को
मिलता है कुछ पलों को आराम

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ
होंठों से नहीं निकलता कोई भी शब्द
फिर भी सुनती है
पूरी कायनात...

करीब करीब सिंगल होती है दिलों से मिंगल



संवादों के इस शोर में, लोगों की इस भीड़ में कोई अकेलापन चुपके से छुपकर दिल में बैठा रहता है, अक्सर बेचैन करता है. जीवन में कोई कमी न होते हुए भी ‘कुछ कम’ सा लगता है. अपना ख्याल खुद ठीक से रख लेने के बावजूद कभी अपना ही ख्याल खुद रखने से जी ऊब भी जाता है. वीडियो चैटिंग, वाट्सअप मैसेज, इंटरनेट, दोस्त सब मिलकर भी इस ‘कुछ कम’ को पूर नहीं पाते. करीब करीब सिंगल उस ‘कुछ’ की तलाश में निकले दो अधेड़ युवाओं की कहानी है. जया और योगी यानी इरफ़ान और पार्वती.

योगी के बारे में फिल्म ज्यादा कुछ कहती नहीं हालाँकि योगी फिल्म में काफी कुछ कहते हैं. लेकिन जया के बहाने समाज के चरित्र की परतें खुलती हैं. दोस्त उनके अकेले होने का बिंदास फायदा उठाते हैं और पीछे उनका मजाक भी उड़ाते हैं. कभी उसे कोई बच्चों के साथ शौपिग के लिए भेजती है, कभी कोई बेबी सिटिंग के लिए पुकार लेती है. मित्र भाव से जया यह सब करती भी है लेकिन साथ ही अकेले होने को लेकर एक तानाकशी का रवैया भी महसूस करती रहती है. एक अकेली स्त्री किस तरह समाज के लिए स्टपनी की तरह समझी जाती है. जिसे हर कोई अपना काम निकालने के लिए कहीं भी इस्तेमाल करना चाहता है. और खूँटी समझकर उस पर अपनी सलाह टांगने के लिए. जिस दिन वो खूँटी होने से मना कर देती है स्टपनी होने से इंकार कर देती है उस दिन उस दिन इस समाज की शक्ल देखने लायक होती है.

फिल्म की नायिका जिन्दगी में जिन्दगी तलाश रही है लेकिन उदासी को ओढ़े नहीं फिर रही है. शिकायत का रंग उसकी जिन्दगी के रंग में घुला हुआ हो ऐसा भी नहीं है. वो विधवा है लेकिन वैधव्य की नियति में घिसट नही रही. उसने भीतर जिन्दगी सहेजी हुई है, जिन्दगी जीने की लालसा को खाद पानी दिया है लेकिन इस जीने की जिजीविषा में ‘कुछ भी’ ‘कैसा भी’ की हड़बड़ी नहीं है. एक एलिगेंस, एक ठहराव वो जीती है और इसी की तलाश में है.

एक रोज वो एक डेटिंग वेबसाईट पर लॉगिन करती है. एकदम से वीयर्ड कमेंट्स नमूदार होते हैं, जया हडबडा जाती है. लेकिन अगले रोज एक मैसेज मिलता है उसे जो उसे अलग सा लगता है. यहीं से शुरू होती है फिल्म. किसी कॉफ़ी शॉप का बिजनेस बढ़ाने के बहाने शुरू हुई मुलाकातें ट्रैवेल एजेंसी का बिजनेस बढ़ाने लगती हैं. डेटिंग वेबसाईट कितनी भरोसेमंद होती हैं पता नहीं लेकिन फिल्म उनके प्रति उदार है. योगी की तीन पुरानी प्रेमिकाओं से मिलने के बहाने दोनों निकल पड़ते हैं पहले ऋषिकेश, फिर अलवर और उसके बाद गंगटोक.

फिल्म एक साथ दो यात्राओं पर ले जाती है. रोजमर्रा की आपाधापी वाली जिन्दगी से दूर प्राकृतिक वादियों में नदियों की ठंडक, हवाओं की छुअन महसूस करते हुए भीतर तक एक असीम शान्ति से भरती जाती है जिसमें योगी का चुलबुला अंदाज़ अलग ही रंग भरता है. प्रेम का पता नहीं लेकिन दोनों साथ में अलग-अलग यात्राओं को जीने में कोई कसर नहीं छोड़ते खासकर जया.

फिल्म की कहानी और इस कहानी का कहन दोनों ही अलहदा है. वो जो अकेले होना है, फिल्म में उसका बिसूरना कहीं नहीं है, उसकी गहनता है. जो संवाद हैं वो अपने भीतर ढेर सारे अनकहे को सहेज रहे होते हैं. और वो जो ख़ामोशी है वो बहुत गहरे उतरती है. शब्दहीनता में कोई जादू गढ़ती. फिल्म दिल्ली, देहरादून, ऋषिकेश, अलवर, गंगटोक घुमाते हुए ले जाती है अपने ही भीतर कहीं. यह एक खूबसूरत प्रेम कहानी है जो असल में प्रेम की यात्रा है. बेहद अनछुए लम्हों को सहेजते हुए, अनकहे को उकेरते हुए.

किसी ताजा हवा के झोंके सी मालूम होती है यह फिल्म. सारे मौसम, सहरा, पहाड़, जंगल, फुहार सब महसूस होते हैं. योगी की शायरी के बीच सुनी जा सकती है वो खामोश कविता जिसे इंटरनेट पर पब्लिसिटी की दरकार नहीं है.

यह फिल्म असल में ख्वाबों पर यकीन करने की फिल्म है, जिन्दगी में आस्था बनाये रखने की फिल्म है. एक संवेदनशील और मौजूं विषय को सलीके से उठाया भी गया है और निभाया भी गया है जिसमें हास्य की मीठी फुहारें झरती रहती हैं. बस योगी के किरदार को थोड़ा बंद सा रखा गया है, मसलन एक स्त्री के अकेलेपन पर समाज के रवैये को तो दिखाया गया है लेकिन एक पुरुष किरदार के जरिये दूसरे पक्ष को भी सामने लाने का मौका जैसा गँवा दिया गया हो. या फिर योगी करते क्या हैं, 'मेरे पास बहुत पैसा है 'और पुरानी गर्लफ्रेंड द्वारा 'फटीचर'कहे जाने के बीच वो कहीं अटके हुए हैं जिसका भेद खुलता नहीं है.

फिल्म के कुछ दृश्य बेहद प्रभावी हैं. तारों भरे आसमान के नीचे नींद की गोद में लुढ़क जाना हो या नींद की गोलियों के असर में जया की पजेसिवनेस का उभरना या बात करते करते योगी का सो जाना. फिल्म का क्लाइमेक्स बिना किसी हड़बड़ी के अपने मुकाम तक पहुँचता है...एक रिदम में. वो रिदम फिल्म के अंतिम दृश्य के अनकहे संवाद तक बनी रहती है.

फिल्म की खूबसूरती को सिनेमेटोग्राफी ने खूब निखारा है. कुछ फ्रेम तो जेहन में ठहर से जाते हैं. फिल्म की एडिटिंग चुस्त है, एक भी दृश्य या संवाद बेवजह नहीं लगता. इरफ़ान हमेशा की तरह लाजवाब हैं जया के किरदार में पार्वती भी खूब खिली हैं. बिना किसी ‘आई लव यू’ के यह साफ सुथरी सी प्रेम कहानी दिल को छू लेती है. संगीत फिल्म को कॉम्प्लीमेंट करता है. खासकर वो जो था ख्वाब सा क्या कहें या जाने दें’ गाना जो सुनने में मधुर, मौजूं और प्रभावी पिक्चरजाइशेन बांधता है. फिल्म के संवाद काफी चुटीले और असरदार हैं.