Saturday, November 2, 2019

दो पैसे की धूप चार आने की बारिश



जब किसी से मिलने के बाद उसका मिलना छूट जाता है स्मृतियों में, जब कोई बात कहे सुने जाने के बाद जिन्दगी में ख़ास जगह घेरे रहती है, जब कोई किताब पढ़े जाने के बाद चलती रहती है जेहन में हलचल करती हुई, जब कोई फिल्म स्क्रीन पर अपने हिस्से की अवधि घेर चुकने के बाद मन के हिस्सों पर काबिज रहती है तो लगता है कि जिन्दगी आसपास ही है कहीं. हाल ही में ऐसी ही फिल्म से गुजरना हुआ. दीप्ति नवल की फिल्म 'दो पैसे की धूप चार आने की बारिश.' मैंने फिल्म पर कुछ भी लिखने से खुद को बचाए रखा कि फिल्म को भीतर बचाए रखना अच्छा लग रहा है इन दिनों. अब उस बचे हुए को शब्दों में सहेजना भी सुख हुआ,

फिल्म फ्रेम दर फ्रेम, डायलाग दर डायलाग जिस रूमानियत में इंसानियत को गढ़ती है वो मोहता है. फिल्म बादलों की है, बारिश की है, एक प्यारी सी बिल्ली की है, एक चलने और बोलने से महरूम बच्चे की है और है दो बेहद खूबसूरत इन्सान जूही और देव की. रिश्तों की कोई डोर किसी को किसी से नहीं बांधती लेकिन इंसानियत की, जिन्दगी से मिले थपेड़ों की, भूख की, प्यास की जीने की इच्छा की मौसमों से प्यार करने की डोर फिल्म में सबको एक दूसरे से बांधती है.

एक सेक्स वर्कर स्त्री और एक संघर्ष याफ्ता गीतकार किस तरह जिन्दगी के दो अलग-अलग सिरों पर खड़े होकर भी बंधे हैं फिल्म इसे बयां करती है.अमूमन खींचतान कर स्त्री पुरुष सम्बन्ध को सेक्सुअल डिजायर में कन्वर्ट कर ही दिया जाता है, फिल्म में भी यह कन्वर्जन है लेकिन यह बताने के लिए कि यह कितना गैर जरूरी है.
सेक्सुलिटी से परे इन्सान के रूप में  स्त्री पुरुष का एक-दूसरे से कनेक्ट करने का भी एक रिश्ता होता है. हम सब अपनी कमियों, कमजोरियों से बंधे हैं लेकिन उन्हें उसी रूप में स्वीकारना और एक-दूसरे के होने से खुद को समृद्ध करना यही तो जीवन है.

फिल्म में बहुत सारा अमूर्त प्रेम है जो पूरी फिल्म में बरसता रहता है. यह प्रेम किरदारों का एक-दूसरे से तो है ही उससे इतर फिल्म की लेखिका,निर्देशक दीप्ति नवल का उनके तमाम दर्शकों से है. वो स्क्रीन पर बरसता है मुसलसल वो कुछ और नहीं सुंदर दुनिया का ख्वाब है...जिसे एक पीले गुब्बारों से सजा ऑटो लेकर बार-बार गुजरता है.

मनीषा कोइराला और रजित कपूर दो सुंदर आत्माओं की मानिंद मिलते हैं खिलते हैं और महकते हैं...

कोई यूँ ही तो नहीं बारह मास मौसम बेच सकता. गुलज़ार और सन्देश शांडिल्य ने मिलकर ये मौसम बुने हैं और रचे हैं खूबसूरत गीत मीठे संगीत में ढले-
ख्वाब के बागानों में खिल जाएगी
गर ढूंढोगे तो जिन्दगी फिर मिल जाएगी...

Friday, November 1, 2019

पर्व, प्रगतिशीलता और हम


जब मैं कॉलेज के दिनों में थी तब पहली बार नाम सुना था छठ पूजा का. एक दोस्त के घर से आया प्रसाद खाते हुए इसके बारे में थोड़ा बहुत जाना था. नदी में खड़े होने वाली बात दिलचस्प लगी थी तो अगली साल जब यह पर्व आया तो मैंने इसे देखने की इच्छा जताई और दोस्त की मम्मी की उपवास यात्रा में शामिल होकर गोमती किनारे जा पहुंची. बहुत गिने-चुने लोग ही थे वहां. बाद में कुछ और साथियों से बात की तो ज्यादातर को पता नहीं था इस पर्व का. उत्तर प्रदेश में कुछ ही जगहों पर यह मनाया जाता था शायद मूलतः बिहार में मनाया जाता है ऐसा बताया गया.

छुटपन में करवा चौथ का व्रत रखने वाली स्त्रियाँ बड़ी आकर्षक लगती थीं लेकिन वो सहज ही नहीं दिखती थीं. पूरे मोहल्ले में दो-चार. उनकी सजधज देखने का चाव होता था.

गणेश पूजा, डांडिया के बारे में तो अख़बारों में पढ़ते थे या टीवी में छुटपुट देख लिया. सामने से देखा नहीं.

आज हर उपवास, पर्व की रेंज बढ़ गयी है. बाजार सजे हुए हैं, अखबार रंगे हुए हैं, राज्य सरकारें छुट्टी घोषित कर रही हैं. करवा चौथ को स्त्री सम्मान दिवस तक कहा जाने लगा है. स्त्री सम्मान दिवस घोषित किये जाने पर निहाल होने वाली स्त्रियों ने इस पर कोई सवाल खुद से नहीं पूछा कि किस तरह उनका सम्मान है यह ये अलग ही सवाल है.

सोचती हूँ पिछले दो दशकों में जितनी तेजी से हम धार्मिक अनुष्ठानों, पर्वों के प्रति सक्रिय हुए हैं, जितनी तेजी से इन अनुष्ठानों ने राज्यों की, वर्गों की सीमायें पार की हैं अपनी महत्ता के आगे सरकारों को नत मस्तक कराया है काश उतनी ही तेजी से धर्मों की, जातियों की ऊंच-नीच की बेड़ियाँ तोड़ने, एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील होने की ओर अग्रसर भी हुए होते. धर्म, संस्कृति और पर्व अब सब किसी और के कंट्रोल में हैं वो जो जानते हैं इसकी यूएसपी. कि कैसे इनका इस्तेमाल किया जा सकता है. धर्मों का सकारात्मक इस्तेमाल करना आखिर कब सीखेंगे हम.

मुझे लगता है इसकी कमान स्त्रियों को अपने हाथ में लेनी होगी.

Thursday, October 24, 2019

निर्मल वर्मा स्मृति- बीतकर भी कहाँ बीतता है कुछ


बीतता अक्टूबर पलटकर देख रहा है. सुबह के छह बजे हैं. यह निर्मल वर्मा की सुबह की चाय का वक़्त है. मेरे पास एक प्याला चाय है और हैं निर्मल वर्मा की ढेर सारी स्मृतियाँ. पेड़ों की शाखों पर खिले धूप के गुच्छे अच्छे लगने लगे हैं. गुलाबी ठंड में सिमटी सड़कें अपने आंचल में पीले और लाल फूलों की पंखुडियां समेटे हुए मुस्कुरा रही हैं. दूर किसी कोने पर चाय की टपरी के पास कुछ युवा चाय पी रहे हैं. पास ही नीली गर्दन और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया बांस के झुरमुट में छुपने और दिखने का खेल खेल रही है.

थोर्गियर अभी-अभी यहीं कहीं से गुजरे हैं. निर्मल उन्हें देख मुस्कुरा रहे हैं. धीमे क़दमों से चलते हुए वो थोर्गियर के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद धीमे अंदाज और आवाज में कहते हैं, ‘आदमी को पूरी निर्ममता से अपने अतीत में किये कार्यों की चीर-फाड़ करनी चाहिए, ताकि वह इतना साहस जुटा सके कि हर दिन थोड़ा सा जी सके.’ थोर्गियर चाय की टपरी पर रुककर चाय के लिए हाथ बढ़ा देते हैं. निर्मल की बात को चाय के साथ चुभलाते हुए वो नीली गर्दन और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया को देखने लगे हैं.

न...न...यह प्राग नहीं है, बर्लिन भी नहीं, पेरिस नहीं, कोपेनहेगन भी नहीं. यह 2019 है. लगभग बीत चुके अक्टूबर की 14 बरस पुरानी पगडण्डी पर निर्मल वर्मा की स्मृति की एक शाख अब तक हिलती है. स्मृति की यह शाख जब हिलती है तो उनके कहानी संग्रह ‘परिंदे’, ‘जलती झाडी’, ‘पिछली गर्मियों में’, ‘कौव्वे और काला पानी’, ‘सूखा व अन्य कहानियां’ याद आते हैं. उनके उपन्यास ‘वे दिन’ ‘एक चिथड़ा सुख’ ‘रात का रिपोर्टर’ ‘लाल टीन की छत’ ‘अंतिम अरण्य’ मुस्कुराते हैं. साथ ही ‘चीड़ों पर चांदनी’ के साए में कोई ‘धुंध से उठती धुन’ सुनाई देती है जो ‘हर बारिश में’ की याद दिलाती है.

निर्मल की डायरी के पन्नों को पलटना अपने भीतर की तमाम गांठों को खोलने सरीखा लगता है. ये पन्ने ज़ेहन पर छाई धुंध को छांटने में मदद करते हैं. उनकी डायरी के इन पन्नों का हाथ थाम काफ़्काई हरारत को अपने भीतर उतरते महसूस करना सुख है. लंदन की सड़कों पर टहलते हुए निर्मल की डायरी के पन्नों की याद का सुख है. किसी दोस्त से प्राग के किस्से सुनना और बर्लिन की यात्रा पर निकल पड़ना सुख है. शिमला की सड़कों से गुजरते हुए शाल को शरीर पर कसकर लपेटते हुए किसी पगडण्डी पर खुद को चलते देखना सुख है. किसी यात्रा के दौरान बड़े से डैने वाले सफेद पंछी(जहाज) के काँधे पर बैठकर बादलों के गाँव में विचरते हुए डूबते सूरज को करीब से देखना और याद करना किसी अल्हड़ सी पहाड़ी धुन को, धुंध में डूबी वादियों में डूबते हुए खुद को डूबने से बचा भी लेना और चीड़ों पर झरती चांदनी को हथेलियों पर उतरते हुए महसूस करना सुख है. यह निर्मल के करीब से होकर गुजरने का सुख है, उन्हें महसूस करने का सुख है. सुख की इस जब्त में उनकी वो सुफेद कोमल और बेहद मुलायम हथेलियों की याद लाज़िम है जब कई बरस पहले ऐसे ही एक मौसम में उनका हाथ मेरे हाथ में था. उस स्नेहिल स्पर्श की स्मृति पलकों के भीतर चमकता हुआ सुख है.

जीवन को देखने का नज़रिया ही तो जीवन को जीवन बनाता है. वरना सांसों के कारोबार से ज्यादा भला क्या है जीवन. निर्मल के करीब बैठना, उस नज़रिये को बनते हुए देखना है. निर्मल का नज़रिया नहीं उनकी जानिब से हमारा खुद का नज़रिया. जीवन के द्वंद्व, उहापोह, आसक्ति, विरक्ति, सामाजिक चेतना, राजनैतिक पक्षधरता, जीवन, मृत्यु सब पर सोचने का एक ढब मिलता है उनके यहाँ.

उनकी डायरियां सिर्फ यात्राओं के कुछ पड़ाव भर नहीं हैं, वो पूरी यात्रा हैं, जीवन की यात्रा. मनुष्य के चेतनशील, संवेदनशील बनने की यात्रा. एक ईमानदार यात्रा जिसमें सिर्फ सुख नहीं था. इसी के साथ यह बात भी मन में उठती है कि सुख आखिर है क्या? वो लिखते हैं, ‘यात्राओं में अनेक ऐसी घड़ियाँ आई थीं जिन्हें शायद मैं आज याद करना नहीं चाहूँगा...लेकिन घोर निराशा और दैन्य के क्षणों में भी यह ख्याल कि मैं इस दुनिया में जीवित हूँ, हवा में साँस ले रहा हूँ, हमेशा एक मायावी चमत्कार-सा जान पड़ता था। महज़ साँस ले पाना-जीवित रहकर धरती के चेहरे को पहचान—पाना यह भी अपने में एक सुख है—इसे मैंने इन यात्राओं से सीखा है.’

उनका कहा कान में गूंजता है, ‘जिस हद तक तुम इस दुनिया में उलझे हो, उस हद तक तुम उसे खो देते हो.’

डायरियों के साथ यह खूबसूरत बात होती है कि वो ईमानदारी से खुद को अभिव्यक्त करने का ठीहा बनती हैं. डायरियों की बाबत निर्मल खुद कहते हैं, ‘डायरी हमेशा जल्दी में लिखी जाती है. उड़ते हुए, अनुभवों को पूरी फड़फड़ाहट के साथ पकड़ने का प्रलोभन रहता है, अनेक वाक्य अधूरे रह जाते हैं, कई बार अंग्रेजी के शब्द घुमड़ते चले आते हैं एक लस्तम-पस्तम रौ में बहते हुए.’

इस लस्तम-पस्तम रौ का अलग ही आकर्षण है. इसी में मिलते हैं कई ईमानदार सवाल और कई बेहद ईमानदार जवाब भी. जीवन अपनी रवानगी में बहता हुआ लस्तम-पस्तम दरिया ही तो है. लगता है निर्मल कहीं गए नहीं हैं, यहीं हैं. बस कि जितनी देर में चाय का पानी खौल चुका होगा, चिड़िया अपने बच्चों को कोई गीत सुना चुकी होगी उतनी देर में वो आकर बैठेंगे ड्राइंग के सोफे पर चाय का इंतजार करते हुए. और पूछेंगे, ‘कैसा चल रहा है जीवन.’ हमारे पास दो ही शब्द होंगे कहने को लस्तम-पस्तम. वो मुस्कुरा देंगे.

https://hindi.thequint.com/zindagani/remembering-nirmal-verma-writer-of-rare-sensibilities?fbclid=IwAR1tPdmm1KuLwi4l-D7GmqCuwbh6iEb-jtLzZ6jjPBtJ17YgnTddCyUZHNc

Friday, October 18, 2019

ये दुनिया तुमसे सुंदर है


इन दोनों ने मुझे संभाल रखा है, मेरा घर संभाल रखा है. ये सोनू और सोनम हैं. एक ने स्वाद का जिम्मा लिया है भूख का जिम्मा लिया है दूसरी ने घर को तरतीबी देने का. दोनों खूब मेहनती हैं और खुशदिल भी. इनके आने से घर में सुबह होती है. सोनू जहाँ मध्धम मुस्कान लिए घर में डोलती फिरती है वहीं सोनम ठठाकर अपनी हंसी से पूरा घर गुंजा देती है. घर में काम तब शुरू होता है जब स्पीकर में बजने शुरू होते हैं इनकी पसंद के गाने. दोनों हँसते गुनगुनाते हुए घर और रसोई सहेजती हैं.

दोनों प्यारी रहेलियां हैं. घर के प्रति, मेरे प्रति दोनों इतनी जिम्मेदार हैं कि कई बार आँखें छलक पड़ती हैं कि कितना प्यार है जीवन में. कितनी ही बार बीमारी की हालात में सोनू ने बिस्तर से उठने नहीं दिया. सब्जी से लेकर दूध तक सब संभालती है. जब भी घर से बाहर होती हूँ, दोनों की मुस्तैदी बढ़ जाती है. मुझसे ज्यादा चिंता करती हैं ये घर की बेटू की, माँ पापा की.

ईमानदारी, प्यार और खुशमिजाजी से भरी ये सहेलियां कई बार मुझे डांटती भी हैं, 'क्या दीदी, आप तो सब भूल ही जाती हैं.' सचमुच ये दोनों मुझे लापरवाह भी बना रही हैं. और इनसे डांट खाने का सुख भी अलग ही होता है.

कितने ही मुश्किल पलों को ये दोनों आगे बढ़कर आसान बना देती हैं, यह कहकर, 'आप फ़िक्र न करो, हम कर देंगे.' इन दिनों घर से दूर हूँ और पल-पल घर की फ़िक्र में ये दोनों मुस्तैद हैं. पापा को ठंडी रोटी न खानी पड़ी इसकी फ़िक्र सोनम संभाले है और बेटू का टिफिन टाइम पर बने और घर बिखरा न रहे इसकी चिंता सोनू उठाये हैं.

इन दोनों प्यारी लड़कियों को मुझसे बहुत प्यार है क्या यह कहने की बात है कि मुझे भी...

शुक्रिया प्यारी सखियों, तुम्हारी मुस्कुराहटें यूँ ही बने रहें.

Saturday, October 12, 2019

स्काई इज़ पिंक



'अगर तुम्हारा स्काई पिंक है तो वो पिंक ही है. किसी के कहने से तुम अपने स्काई का कलर मत बदलना. जो टीचर कहती है कि तुमने स्काई का कलर गलत पेंट किया वो टीचर गलत है. समझे' गले तक भर आये आंसुओं के सैलाब को संतुलित आवाज में समेटते हुए अपने छोटे से बच्चे को उससे बहुत दिनों से बहुत दूर गयी माँ समझाती है. वो उसे नहीं समझाती वो हम सबको समझाती है कि गलत सही के खांचों से बाहर निकलकर हमें बच्चों की दुनिया में प्रवेश करना चाहिए.

'स्काई इज़ पिंक' ओह क्या तो राहत था इसे देखना. क्या तो सुख. कोई कुछ भी कहे लेकिन एक बात को बार-बार महसूस करती हूँ कि माँ होना माँ होकर ही जाना जा सकता है. हालाँकि इसी कन्ट्रास्ट को पोट्रे किया है प्रियंका ने. यह फिल्म है तो बेटी के बारे में लेकिन है एक माँ की फिल्म. प्रियंका चोपड़ा के अभिनय ने एक बार फिर दिल पर मुहर लगा दी है. अदिति (प्रियंका), निरेन (फरहान), ईशान (रोहित), आयशा (जायरा) एक परिवार है. दुःख और संघर्ष की डोर से बंधा परिवार उम्मीद का गुलाबी आसमान रचता नजर आता है.

एक माँ अपने बच्चे के लिए यमराज से भी लड़ जाती है कुछ ऐसी है यह कहानी. जिस बच्चे के जन्म के साथ ही उसके न जी पाने की बात (SCID नामक बीमारी) जुड़ी हो उसके जन्म पर कैसा एहसास हुआ होगा, कैसे उसकी परवरिश एक हर पल के युद्ध में तब्दील होती है. यही कहानी है.

फिल्म की कहानी का बेस दुःख है, संघर्ष है, पीड़ा है, आत्मसंघर्ष है लेकिन पर्दे पर निराशा नहीं उम्मीद दौड़ती है, मुस्कुराहटें गुनगुनाती हैं, आसमान में उड़ने के ख्वाब हैं. वो आसमान जिसका रंग नीला नहीं गुलाबी है, मुस्कुराहटों वाला गुलाबी. जिन्दगी के डिफरेंट शेड्स का कोलाज है फिल्म जो पूरे वक्त कलाई नहीं दिलों की धडकनों को थामकर रखती है.

आमतौर पर जब भी मैं और बेटू फिल्म देखने जाते हैं वो मुझे चिढाती है मम्मा रोना नहीं. जरा सा भी इमोशनल सीन मेरी हिचकियाँ बाँध देता है. इसे लेकर मुझमें कोई संकोच भी नहीं है. कि रोना कोई बुरी बात भी नहीं.

मेरे लिए इस फिल्म पर लिखते हुए फिल्म के बारे में लिख पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि मैं इस फिल्म के जरिये अपनी जिन्दगी को ही जी रही थी. 1991 का वह भयंकर एक्सीडेंट. माँ-पापा शहर में थे नहीं. उन्हें दो खबरें मिलीं एक कि गुड़िया अब नहीं रही, दूसरी कि जल्दी पहुँचिये शायद आखिरी बार मिल सकें.
माँ रोई नहीं इस खबर पर. उन्होंने बस इतना कहा बस मुझे उसकी एक सांस मिल जाय फिर मैं सब ठीक कर लूंगी. उन्हें वो एक साँस मिल गयी और उस एक सांस को पकड़कर वो जूझ गयीं. बरसों उन्होंने रुई के फाहे में छुपाकर रखा. सांस-सांस सहेजा, लेकिन टूटी नहीं, हारी नहीं. नौकरी, घर, अस्पताल और एक-एक लम्हे को सिर्फ माँ पर आश्रित बच्ची की तीमारदारी. शायद माँ सोती नहीं थीं. वो थकती भी नहीं थीं. कभी किसी पर नाराज नहीं होती थीं. हमेशा उम्मीद से भरी. और आखिर उन्होंने मुझे खड़ा कर दिया. मुझे उस दौर में माँ की भावनात्मक मजबूती आकर्षित करती है. हालाँकि मैं उनके जैसी मजबूत नहीं हूँ. क्योंकि मेरी बच्काी च वैक्सीनेशन भी मेरे लिए बड़ा युद्ध रहा हमेशा. सो यह जिम्मा उसकी नानी और पापा को मिला. अपने कानों में अपने बच्चे की रोती हुई आवाज को सहेजना कितना मुश्किल होता है यह दिल ही जानता है.

फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं थी. भावनात्मक यात्रा थी. परिवार की ताकत को महसूसना था. भाई किस तरह दोस्त बनकर सामने से हंसाता रहता है और चुपके-चुपके रोता है. पिता जो मजबूत दिखने का जिम्मा कन्धों पर उठाये हैं लेकिन टूटते हैं वो भी. यह मजबूती से जुड़े रहने और चुपके-चुपके टूटने की कहानी है.

'भाई मैं मरना नहीं चाहती' लंदन के मेट्रो स्टेशन पर फोन पर मरती हुई बहन से यह सुनना और उसे हल्के-फुल्के अंदाज में सहेज पाना कितना मुश्किल रहा होगा यह फोन कटने के बाद उसके एक्सप्रेशन से कन्वे होता है. जब छोटी बहन के लिए एक-एक सांस सहेजने में माँ-बाप जूझ रहे हों तब माँ से दूर इण्डिया में रह रहा ईशान भी तो बचपन के लिए जूझ रहा होगा लेकिन इसकी कोई शिकायत नहीं दर्ज होती समझ दर्ज होती है. बच्चों को खेलने, शैतानी करने और जिद करने की उम्र में समझदार होने की सजा बड़ी सजा होती है. मेरे जेहन में ईशान के उस बचपन के पन्ने खुलते हैं जो सेल्यूलाइड के पर्दे पर नहीं खुले.

अपने हाथों में सिर्फ 24 घंटे का जीवन लेकर आई रोती-बिलखती बच्ची को सहेजती प्रियंका की पीड़ा झकझोर देती है.आह. जीवन कितना क्रूर होता है, फिर भी कितना सुंदर कि पैसे की कमी इलाज के आड़े आने नहीं देते दुनिया भर के लोग सिर्फ एक रेडियो अपील के बाद.

सच कहूँ, अभी भी रो रही हूँ. हम माँ बेटी पहली बार पूरी फिल्म में चुप थे लेकिन यह दुःख की चुप्पी नहीं थी. वापस लौटते हुए बेटू ने एक बात कही, 'मम्मा दुःख की एक ख़ास बात होती है न, वो सबको कितना जोड़कर रखता है न ?'

हम एहसासों से भरे हुए साथ चल रहे थे...जैसे चलती है हरसिंगार की खुशबू उसके करीब दो पल बैठकर चलने के बाद.

शुक्रिया सोनाली बोस!