Saturday, August 15, 2020

सर चढ़कर बोले इश्क़

इश्क़ वो शय है जो मांगे मिले न और मिल जाए तो बिना बीच धार में ले जाकर डुबोये इसे चैन आये न. जबसे मोरपंख के पेड़ में गुलाब को चढ़ते देखा है यही महसूस हुआ कि यह इनके रिश्ते की शुरुआत है. फिर मोरपंख ने गुलाब को अपने भीतर पूरी तरह समेट लिया. एक नन्हा सा गुलाब खिला था जिस रोज खूब बारिश हो रही थी. मोरपंख और गुलाब दोनों इतरा इतरा कर झूम रहे थे. देखते देखते दोनों के अस्तित्व एक दूसरे में विलीन होते गए. लेकिन बिना खुद को खोये हुए. मोरपंख और हरा हुआ और लहराया, गुलाब फैलता गया उसके भीतर और खिलने लगा. यह जो सह अस्तित्व और खुद को खोये बिना एक दूसरे को अपनाना है न यह भी प्रकृति सिखा रही है...बस हम सीख नहीं रहे.

रिश्तों में अपनों को खुद से आज़ाद रखना बिना कोई गुमान किये. यह भी तो सीखना बाकी है.
आज़ादी मुबारक!

 

Monday, August 10, 2020

बरसे तो बरसे सुख हर आंगन



आज फिर बारिश लगातार हो रही है. बारिश लोरी सी लगती है. नींद के भीतर जो एक नींद होती है न जिसमें सोने का सुख छुपा होता है, जो कभी-कभी ही मिलता है वो रात की नींद में दाखिल हुआ. जिसने नींद में होने वाली तमाम क्रियाएँ जैसे स्वप्न, करवटें, बीच -बीच में जागना सब चुरा लिया. मृत्यु की जैसी नींद. जागो तो जैसे नया जन्म. जागते ही बारिश के करीब चली गयी देर तक देखती रही...

पक्की नींद के बाद आँखों को अगर भीगते हुए हरे का सुख मिल जाय तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है. यह संभव हो पा रहा है क्योंकि यथार्थ से मुंह मोड़ने का अभ्यास कर रही हूँ. चेतन दिखते हुए चेतना को सुषुप्त रखने का अभ्यास कर रही हूँ. खुद को ठीक रखने के लिए देखो तो क्या क्या करना पडता है. यह ठीक होना नहीं विमुख होना है...यह अभ्यास ज्यादा दिन चल न सकेगा. चाहती हूँ यह अभ्यास व्यर्थ साबित हो लेकिन यह नींद बची रहे...ऐसा कैसे होगा...हो सकेगा क्या? 

चेतना विहीन हुए बगैर सुकून की नींद आना कितना दुष्कर है इन दिनों किसी से छुपा है क्या. अख़बार छुपा देने से, न्यूज़ चैनल न देखने से सोशल मीडिया से दूर रहने से भी क्या होगा. यह तो आँख बंद करना है. बस इतना ही कि जब चीज़ें असहनीय होने लगे तो बीच बीच में आँखें मूँद लेनी चाहिए इससे सामना करने की शक्ति बढ़ती है शायद....

बात करने से हालात नहीं बदलते वो बदलते हैं उन्हें बदलने के प्रयासों से. आँखें मूंदना उपाय नहीं लेकिन कभी कभी आँखें मूंदने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचता. यह आँखें मूंदना खुद को बचाये रखने के लिए  है ऐसा कहकर खुद को बहलाती हूँ. फिर से बूंदों के आगे हथेलियाँ पसारे खड़ी हूँ...

Friday, August 7, 2020

इल्तिजा


आओ सबसे पहले वार करो
मेरी रीढ़ पर
फिर निकाल लो मेरी आँखे 
कोई काम नहीं इन्हें 
बस कि ताकती रहती हैं 
तुम्हारी राह 

उँगलियाँ जो बेसाख्ता लिखती रहती हैं
तुम्हारा नाम
उन्हें अलग कर दो काटकर

पाँव जो न धूप देखते हैं न छाँव
बढ़ते रहते हैं तुम्हारी ही ओर
इन्हें भी अलग किया जाना चाहिए
शरीर से काटकर

कान इन्हें भी कुछ सुनाई नहीं देता 
सिवा तुम्हारे नाम के
इन्हें भी क्यों बख्शा जाना चाहिए

जिह्वा जो रटती रहती है
तुम्हारा ही नाम
उसे तो सबसे पहले 
अलग किया जाना चाहिए  

दिल जो धड़कता ही रहता है 
तुम्हारे नाम पर
उस पर करना सबसे अंत में वार
कि सांस की आखिरी बूँद तक
जानना चाहती हूँ
कितनी पीड़ा दे सकते हो तुम

ओ प्रेम छिन्न भिन्न करके 
जब हो जाना थक के चूर
तब सुस्ता लेना थोड़ा 
और मत बताना किसी को
कि तुम्हें मुझसे प्रेम था कभी
कि प्रेम के नाम पर पहले ही
कम नहीं हो रही है हिंसा

प्रेम के भीतर प्रेम को सांस लेने देना
उसे बख्श देना तुम
इतनी सी इल्तिजा है तुमसे. 

Tuesday, August 4, 2020

कोई दुःख की बात नहीं है


कोई है जो अभी-अभी उठकर चला गया है पास से. कौन है वो? जब तक वो पास था तब तक उसके पास होने के बारे में पता क्यों नहीं चला. ये कैसी बात है जो पास था के बारे में दूर जाने के बाद पता चलती है. हवा एकदम सर्द हो चुकी है मेरे शहर की. और मैं ऐसे शहर में हूँ जहाँ जर्रे जर्रे में रेत बसती है. ऐसे तो धरती पर प्रेम को बसना था. हाथ बढाती हूँ तो हथेलियों में हवा भर जाती है क्या इस हवा ने मेरे हाथों की लकीरों को छुआ होगा. क्या जब बारिशें हथेलियों में उतरती हैं तब वो मेरे हाथों की लकीरों को छूकर उनसे कुछ कहती होंगी. क्या कोई लकीर अपने साथ बहा ले गयी होंगी...मुझे लगता है मैं जीवन की बाबत कुछ भी नहीं जानती.

'मेरे हाथ में जो अख़बार था. उसमें एक खबर पर मेरी नजर गई. जो खबर थी वह भी बड़े होते जाने और कुछ न बन पाने के डर की दुःखद दास्तान से भरी थी. जिया खान नहीं रही. उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.मेरे मन में आया कि ये जरूर कोई बड़ी हस्ती की बात होगी जिसने समाज पर गहरा प्रभाव डाला होगा. वरना आजकल मौत इतनी मामूली चीज़ है कि लोगों ने इस पर ध्यान देना बंद कर दिया है. कोई दुनिया से गुजर जाता है और हमारी आँखों में नमी नहीं आती. हम पल भर के लिए भी इस बात पर विचार नहीं करते कि एक सुंदर और कीमती जान ने इस दुनिया को छोड़ दिया है.' (कालो थियु सै के 'शायद' से)

मेरे सामने भी अख़बार है. उसमें भी ऐसी ही खबर है. नाम बदला हुआ है. कल कोई और अख़बार था उसमें भी ऐसी ही खबर थी. मुझे अख़बार की इन खबरों में वो खबरें भी दिखाई देने लगती हैं जो अख़बार में नहीं हैं. किसान, मजदूर, गरीब, कीटनाशक पीते दम्पति, पीट-पीटकर मार दिए गये लोग, अपने ही दुपट्टों को आकाश तक लहराने का ख्वाब लिए पेड़ों या पंखों से लटक गयी लड़कियां. बिना किसी गुनाह के सालों से जेलों में सजा काटते लोग और सीना चौड़ा कर हवा में कट्टा लहराते लोग.

वो आँखें जिनमें असीम सपने भरे थे उनके बारे में सोचना सुख देता है. उन सपनों को बचाने का जी करता है. सपनों से भरी तमाम आँखों को बचाने का जी करता है.

हमारे सामने दृश्य हैं जो हमें निगलने को आतुर हैं. चमचमाते दृश्य बजबजाते दुःख को छुपा देते हैं. हमें दुःख को छुपाना नहीं था उससे सीखना था. उससे जीवन को बुहारना था, दुनिया को सुंदर बनाना था. कल सारा देश दीवाली मनायेगा. कोई रामजी से मेरी अर्जी लगा दे काश कि वो इस धरती पर हो रहे अनाचार को रोक लें...

इस मनस्थिति में किशोर चौधरी को पढ़ना रुचिकर लग रहा है. किशोर बड़े और पैने सवालों को थमाते हैं. कभी शांत करते हैं कभी बेचैनी भी देते हैं. लिखना क्या है सिवाय अपनी बेचैनियों के और पढ़ना क्या है अपनी बेचैनियों को सँवारने के. जवाब तो जाने कहाँ होंगे...कहीं होंगे शायद....

Sunday, August 2, 2020

कि जीना इसी पल में...


एक लम्बी चुप्पी के मध्य में हूँ. अकेले हुए बगैर एकान्तिक महसूस कर पाती हूँ. शब्दों के कोलाहल में शांति का ‘श’ ढूंढती हूँ. इन दिनों कभी-कभार वो मुझे मिल जाता है. पंख सा हल्का महसूस होता है. हर रोज सोचती हूँ मैं क्या हूँ, कौन हूँ. देह तो नहीं हूँ मैं यह बहुत पहले जान लिया था लेकिन देह के अलावा क्या हूँ यह जानने की यात्रा चलती जा रही है. विचार और भाव तक मेरे कहाँ हैं जब तक इन पर किसी का प्रभाव है और क्या है जो अप्रभावी है.... 

पिछले दिनों जिन्दगी और मृत्यु के बीच के फासले को और कम होते देखा है. करीब से देखा है. आसपास कई लोग थे, स्वस्थ थे, गतिमान, ऊर्जा से भरे अब वो नहीं हैं. परिवार और दोस्तों में कई युवाओं को खोया दोस्तों के माता-पिता खोये. कईयों से बरसों से मिलना शेष था अब स्मृति शेष है. कुछ को उनके बचपन से जानती थे कुछ को बचपन में देखा था. मृत्यु के आगे किसी का जोर नहीं चलता. जो अभी माँ को कहकर गया कि पूरियां खाऊँगा आकर वो लौटा ही नहीं, जिसने पिता को चाय बनाकर पिलाई उसे कहाँ पता था कि वो अंतिम बार चाय पिलाकर जा रहा है. दोस्तों को कहाँ पता था कि अंतिम बार मिलकर जा रहा है...अंतिम बार फोन पर बात कर रहा है.

मृत्यु न उम्र देखती है न यह कि अभी तो कितने काम बाकी हैं इसके झटके से लेकर चल देती है और सारा जोड़-तोड़ यहीं बिखरा पड़ा रहता है. लेकिन यह सत्य तो हमेशा से करीब था. इस करीबी को क्या हम पहचान पाते हैं.

सोचती हूँ इस सोचने का हासिल क्या है. हासिल है इससे आगे निकलने, उसको कमतर साबित करने, ज्यादा सम्पत्ति बनाने, अहंकार को पालने से दूर जाते जाना. सोचती हूँ जो इनमें फंसे हैं क्या उनकी गर्दन में अकड़े-अकड़े दर्द न होता होगा. जीवन तो हमेशा से इतना ही साफ़ था हमने उसे पहचाना नहीं. इस दौर ने उसे और साफ़ किया है कि हम शायद अब आँखें खोल सकें. समझ सकें कि जो भी है बस यही पल है. इस पल को ईर्ष्या, होड़, अहंकार, हिंसा से नहीं प्रेम से भरना ही उपाय है. 

जो करना है अभी इसी पल करना है, कोई बात कहनी है तो अभी इसी पल. शान्ति का अनुभव करना है वो भी अभी इसी पल में है. किसी से प्यार कहना हो अभी इसी पल कहना है. इस सुबह को जी भर जीना है...यह जो चाय का कप रखा है करीब उसकी एक-एक घूँट को महसूस करते हुए पीना है...

आप सबको कहना है कि आपसे प्यार है...कि इस बुरे वक़्त में जिन्दगी की खूबसूरती को आप सभी ने बचाए रखा है. ख्याल रखिये...