Thursday, August 15, 2019

पणजी में 'ओ अच्छी लड़कियों' से मुलाकात



फाइनली हम पणजी में थे. खिड़की का पर्दा हटाया तो सामने समन्दर मुस्कुराता मिला. जैसे वो मेरे सब्र का इम्तिहान ले रहा हो. शाम करीब थी और समन्दर सामने. मैं लहरों का उछाल देख पा रही थी, आवाज सुन पा रही थी बस हाथ बढ़ाने की देरी थी...लेकिन अभी हाथ बढ़ाने का वक़्त नहीं था कि गोवा ने जिस वजह से पुकारा था आज शाम तो उसी के नाम थी. कभी सोचा न था कि कोई कविता यूँ हाथ पकड़कर गोवा तक घुमाने ले आएगी. जबसे 'ओ अच्छी लड़कियों' को शुभा जी द्वारा संगीतबद्ध करने की बात सुनी थी तबसे शुभा जी के तमाम गीत साथ चलते रहते थे. एक ही बात मन में थी कि किस तरह वो इस कविता को संगीतबद्ध करेंगी भला. दूसरा उत्साह था शुभा जी और अनीश जी से मिलने का. मुझे नहीं मालूम कैसी मुलाकात होने वाली थी. एक मन हुआ चुपके से भीड़ में छुपकर बैठ जाऊं और होते देखूं सब कुछ. लेकिन यह मौका शायद कुछ और था. शाम के उत्सव में शामिल होने लिए हमने पैदल ही चलना चुना ताकि थोड़ा शहर भी तो देखें, उसे हैलो तो बोलें. एक तरफ कार्यक्रम का समय हो चला था दूसरी तरफ पेट में भूख गुडगुडा रही थी. मेरा मन हुआ कि भूख को इग्नोर कर दिया जाय लेकिन अजय जी इसके लिए तैयार नहीं थे. फाइनली हमने शॉर्ट कट वाली पेट पूजा की और उसके बाद पहुंचे कार्यक्रम की जगह. सच कहूँ तो यहाँ आने के पहले तक मुझे इस फेस्टिवल की ऊंचाइयों का पता नहीं था. यहाँ आकर देखा पूरा शहर सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के पोस्टरों बैनर से पटा पड़ा था. अब मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी थी. लेकिन ज्यादा देर घबराहट के रुकने को वक़्त नहीं मिला. गेट पर पहुँचते ही प्रेरणा लेने आ गयी. और पलक झपकते ही मैं शुभा मुदगल, अनीश प्रधान और उनकी टीम के साथ थी. शुभा जी मिलकर इतनी खुश हुईं उन्होंने तुरंत गले लगा लिया.अनीश जी ने बहुत विनम्रता के साथ स्वागत भी किया और शुक्रिया कहा इस कविता को लिखने के लिए. ऐसे मौकों पर कुछ समझ नहीं आता कि क्या कहूँ बस कि आँख भर आती है.  शुभा जी और अनीश दोनों बहुत सहज, सरल लोग हैं. यह विनम्रता ही उनके संगीत को अलग आयाम देती होगी. हमारी मुलाकात ग्रीन रूम में हुई थी. कार्यक्रम शुरू होने को था और हम कार्यक्रम स्थल की ओर ले जाए गये.

यह गोवा की यादगार शाम थी. मुझे नहीं पता था कि इस बार गोवा मुझे सर पर चढ़ाने के लिए पुकार रहा था. मुझे नहीं पता था कि गोवा ने जिन्दगी को गले लगाने, तमाम बाधाओं को पार करने के एवज में यह शाम मुझे तोहफे में देने को बुलाया था. सामने भव्य स्टेज था और पीछे शानदार ऑडियंस. इन सबके बीच मैं भी थी. मैं भी...क्या यह मैं ही हूँ. सब कुछ बहुत तेज़ था. अनीश जी ने मुझे बोला था कि 'आपकी कविता हमें इतनी ज्यादा अच्छी लगी है कि हम कार्यक्रम को इसी कविता से क्लोज करेंगे. तो मन में इतनी राहत थी कि अभी थोड़ा वक़्त था दिल को संभाल लेने को. शुभा जी मेरे बगल में बैठी थीं और उनके बगल में अनीश. मेरे दूसरी तरफ अजय जी थे. ऐसे मौकों पर दोस्तों का साथ होना कितना मायने रखता है यह सिर्फ समझा जा सकता है.


कार्यक्रम शुरू हुआ और लगातार परवान चढ़ता गया. इस शाम के लिए कुछ हिंदी कविताओं को संगीतबद्ध करने को चुना गया था. केदारनाथ सिंह, नज़ीर अकबराबादी, मीराबाई ,पल्टूदास, शुभा मुदगल और प्रतिभा कटियार की कवितायेँ थीं ये. मैं एक एक कर कविताओं की खूबसूरत प्रस्तुती देखकर मुग्ध हो रही थी. यकीन नहीं हो रहा था कि इन कविताओं को ऐसे भी प्रस्तुत किया जा सकता है. शुभा जी बीच-बीच में पूछती जा रही थीं ठीक तो है न? और मैं उनके इस विनम्र सवाल के बदले सिर्फ सर हिला पा रही थी. इन कविताओं को स्वर दिया ओमकार पाटिल और प्रियंका बर्वे ने. दोनों की ऊर्जा देखते ही बनती थी, दोनों बेहद कमाल के आर्टिस्ट हैं. ओमकार तो ऐसे हैं कि वो मानो आते ही कहते हों, खबरदार जो ध्यान रत्ती भर भी इधर-उधर किया कि जब तक मैं हूँ मैं आपका पूरा ध्यान चुरा लूँगा और धीरे से दिल भी. ऑडियंस को बांधना उसे आता है. तमाम कविताओं के बीच जब उसने केदारनाथ सिंह की कविता 'भाई मैंने शाम बेच दी है' गई तो मैं एकदम से अलग ही दुनिया में चली गयी. इतनी बार पढ़ी थी यह कविता लेकिन आज इसे शुभा जी, अनीश जी और ओमकार के जानिब से सुनना कुछ अलग ही अनुभव था.

आखिर कार्यक्रम आखिरी कविता तक आ पहुंचा. यानी मेरी कविता 'ओ अच्छी लडकियों.' कविता शुरू होने से पहले अनीश जी और शुभा जी ने मेरी तरफ देखा और कहा 'उम्मीद है आपको पसंद आएगी.' स्टेज पर मेरा नाम लिया जा रहा था और मैं अपनी हथेलियाँ शुभा जी की हथेलियों में छुपाये बैठी थी. जैसे ही ओमकार ने कहा, प्रतिभा जी हमारे बीच मौजूद हैं, शुभा जी ने उत्साह में भरकर कहा, यहाँ हैं यहाँ हैं...और सारी तेज़ लाइट्स हम पर थीं. उफ्फ्फ. ऐसी चकाचौंध की आदत कहाँ हमें. घबरा से गये कुछ पल की. कविता शुरू हो चुकी थी..'ओ अच्छी लड़कियों तुम मुस्कुराहटों में समेट देती हो दुःख और ओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनर...'  काफी तेज़ संगीत में इसे ढाला गया था. कहाँ रुकना है, कहाँ ज्यादा रुकना है, कहाँ ऊंचा करना है स्वर ओमकार को सब पता था. मुझे लग रहा था क्या यह सच में मैं हूँ. देहरादून के किसी कोने में बहुत उलझे से मन और द्वंद्व के बीच जब लिख रही थी यह कविता तब कहाँ जानती थी कि इसे इतना प्यार मिलेगा. शुभा जी हथेलियों का दबाव मुझे कसता जा रहा था यह उनका प्यार था. शायद वो भी मेरी तरह संकोच में थीं.


कविता खत्म हुई...अँधेरे में अपने आँखों में भर आये समन्दर को संभालना आसान था. कार्यक्रम खत्म होते ही रौशनी ने हमें घेर लिया था. बधाइयों, फोटो खींचने, खिंचाने, लोगों से मिलने मिलाने के बीच गोवा की वह खूबसूरत शाम दिल में दर्ज हो गयी. शाम ने बीतते-बीतते अगले दिन की सुबह नाश्ते पर शुभा जी से आराम से मिलने, बतियाने का प्रस्ताव भी दे दिया.

हम एक बेहद खूबसूरत शाम को जीकर, समेटकर लौट रहे थे.

जारी....

Tuesday, August 13, 2019

मिलूंगी तुमसे तसल्ली से...


मुम्बई से गोवा के लिए हमें अल्सुबह तेजस एक्सप्रेस पकडनी थी. मुम्बई में मैं माधवी के घर रुकी थी. उसके घर पहले भी जा चुकी हूँ. उस मुलाकात और इस मुलाकात के बीच कई बरस बीत चुके थे. उससे मिलकर लगा कि वो और भी खूबसूरत हो गयी है, उसकी खूबसूरती में मातृत्व का नमक जो शामिल हो चुका है. उसके दो प्यारे से बच्चों से मिलना बहुत सुंदर अनुभव था. जरा सी देरी में दोनों बच्चे मासी-मासी की धुन में थे. शरारतें, मस्ती, गप्पें इन सबके बीच नींद कहाँ. ट्रेन पकड़ने के लिए सुबह चार बजे ही निकलना था. लगभग न के बराबर नींद लिए हम गोवा के लिए निकले थे. हालाँकि नींद कहीं थी भी नहीं. यह शायद उत्साह के कारण हुआ होगा..

मेरे साथ अजय गर्ग थे. वो घुमक्कड़ हैं. दुनिया भर घूमते फिरते हैं. सच कहूँ तो घूमने का चस्का अजय जी और माधवी का ही दिया हुआ है. लेकिन मैंने अजय जी के साथ कभी ट्रेवल नहीं किया था. मेरे लिए यह यात्रा कई मायनों में अलग होने वाली थी. पहली राहत की बात तो यही थी कि अजय जी के साथ होने के कारण टिकट, ट्रेवल, स्टे इन सबके इंतजाम के झंझटों से मैं मुक्त थी. यानी मुझे सिर्फ मजे करने थे. लम्बे समय बाद यह राहत मिली थी. वरना तो हर ट्रेवल चाहे परिवार के साथ हो या दोस्तों के साथ या अकेले इन सब जिम्मेदरियों का ठेका मेरा ही होता रहा है. जिम्मेदारियों से राहत भी चाहिए होती है कभी कभी. हम स्टेशन वक़्त पर पहुंचे लेकिन ट्रेन थोड़ी सी लेट हो गयी. स्टेशन की चाय हम पी सकें शायद इसलिए. किसी शहर को महसूस करना हो तो वहां के रेलवे स्टेशन पर थोड़ा वक़्त जरूर बिताना चाहिए. यहाँ जीवन जैसा है, वैसा मिलता है. एक ऊंघती हुई बच्ची अपने पापा के कंधों पर झूल रही थी, गजरा बालों में टांके एक लड़की एक लड़के के कंधे से टिककर ऊंघ रही थी. एक लड़का अभी-अभी बगल में खडे अंकल को चाय देकर गया. इधर से उधर तेजी से जाती ज्यादातर औरतों ने गजरे पहने हुए थे. ये इनके गजरे हमेशा फ्रेश कैसे रहते होंगे मैंने मन में सोचा और गम्भीर मुद्रा बनाकर ट्रेन के एनाउंसमेंट पर ध्यान केन्द्रित किया. थोड़ी ही देर में ट्रेन आ गयी और गोवा का हमारा सफर शुरू हुआ.

अजय जी मुझे खिड़की वाली सीट देकर यह बताकर कि 'रास्ता बेहद खूबसूरत है, देखती जाना' सो गये. उनके लिए यह रास्ता नया नहीं था और रात की नींद उनकी भी अधूरी ही रही थी. जब भी ट्रेन में कुछ खाने को आता, ब्रेकफास्ट या लंच या कुछ और वो जागते, खाते और सो जाते. जितनी देर वो जागते उनकी बातचीत बड़ी मजेदार होतीं. खूब हंसी आती मुझे और लगता कि सफर अच्छा कटने वाला है. मेरी अजय जी से दोस्ती पुरानी है लेकिन यह दोस्ती कम संवादों और इक्का-दुक्का छोटी छोटी मुलाकातों भर की है. उनसे अनौपचारिक मुलाकात का यह पहला मौका था और मुझे नहीं मालूम था कि उनकी उपस्थिति सहजता से भरपूर होगी. हमारी छुटपुट नोक-झोंक शुरू हो चुकी थी जो पूरे सफर में चलती रही.

मुम्बई से गोवा का रास्ता सचमुच बेहद खूबसूरत है. सारे रास्ते मैं चुप होकर खिड़की के बाहर देखती जा रही थी. तेजी से छूटते जा रहे पेड़, सडकें, गाँव, पानी सब मोह रहे थे. ऐसा लग रहा था सब मुझे जानते हैं और मुस्कुराकर हैलो कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इन सबसे पहली बार मिल रही थी. ट्रेन का खूबसूरत सफर मुझे सुकून से भर रहा था. सामने लगे स्क्रीन पर देखने के लिए जो फ़िल्में थीं वो भी काफी अच्छी थीं. मन में दुविधा थी कि फिल्म देखूं या दृश्य. मैंने दृश्य ही चुने. एक बैंगनी रंग के बड़े-बड़े पत्तों वाला पेड़ अब तक मेरी स्मृतियों में झूमता है.

करमाली स्टेशन आने वाला था. स्टेशन आने से पहले ही समन्दर दिखने शुरू हो गए थे. ये समन्दर के वो किनारे थे जो शायद शहर से नहीं दिखते. मन उछल-उछल जा रहा था खिड़की से समन्दर देखकर. कुछ ही देर में हम स्टेशन पर थे. स्टेशन ज्यादा बड़ा नहीं है लेकिन साफ़ और सुंदर है. मौसम गर्म था यहाँ. दिसम्बर के महीने में देहरादून से चलते समय जो ढेर सारी जैकेट लदकर आई थीं उनमें से आधी तो मुम्बई में ही पैक हो गयी थीं और बाकी के पैकअप का समय अब था.

मैं आँख भर स्टेशन देख रही थी और अजय जी कम से कम पैसे में मिलने वाला ऑटो ढूँढने में लगे थे. मुझे अजय जी से यह भी सीखना था कि यात्राएँ कैसे इकोनोमिक और अच्छे ढंग से की जाती हैं. आखिर हमें हमारे जैसे ही दो विदेशी दोस्तों के साथ शेयरिंग में ऑटो मिल गया और हम चल पड़े गन्तव्य की ओर.

पणजी बेहद खूबसूरत है. मांडवी नदी के किनारे पर बसे इस सुंदर शहर से बातें करने का जी चाह रहा था. ऑटो होटल की ओर भाग रहा था और पेड़ों से लुकाछिपी खेलते हुए समन्दर मुझे लुभा रहा था. जी तो चाह रहा रहा अभी रुक जाऊं लेकिन खुद को मैंने दिलासा दिया अब तो आ ही गयी हूँ, मिलूंगी तसल्ली से.

जारी...

Monday, August 12, 2019

गोवा से आई पुकार और प्यार



यह मेरी नहीं लहरों की बात है. उन लहरों की जिन्होंने मुझे हमेशा हर मुश्किल वक़्त में सहेजा है. कभी पास से, कभी दूर से. नहीं मालूम इन लहरों के इश्क़ में कबसे हूँ. तबसे जब इन्हें छूकर देखा भी नहीं था शायद. न नज़र से, न हाथ से. समन्दर की लहरों की बात कर रही हूँ. सिनेमा में देखे समन्दर थे या उपन्यासों और कहानियों में पढ़े समन्दर कब कैसे मुझे समन्दर से इश्क़ हुआ पता नहीं. समन्दर को पहली बार देखने का अवसर मिला नवम्बर 2011 में. शायद समन्दर ने मुझसे मिलना तब तक के लिए मुल्तवी किया था जब तक उससे मिलना मेरे जीने की अंतिम जरूरत न रह जाय. कुछ भी योजनाबद्ध तरह से नहीं होता. कुछ भी नहीं सचमुच. जन्म भी नहीं, मृत्यु भी नहीं, जीवन के युद्ध भी नहीं और समर्पण भी नहीं. जीवन का यह समय युद्ध का नहीं था. समर्पण का था. उनहू समर्पण ठीक शब्द नहीं, ‘गिवअप’ ठीक शब्द है. दोनों में काफी फर्क है. मैं एकदम ‘गिवअप मोड’ में थी. तभी दोस्तों ने गोवा चलने का प्लान बनाया और मैं गोवा में थी. इत्तिफाक ही होगा कि जिन दोस्तों ने प्लान किया था वो खुद ही न आ सके थे और मैं और माधवी ही पहुंचे थे गोवा. शायद हम दोनों का मिलना और समन्दर से मुलाकात इससे अच्छे ढंग से नहीं हो सकती थी. हम दोनों पहली बार मिली थीं. हम दोनों जिन्दगी से जूझते-जूझते टूट रही थीं, हम दोनों मुश्किलों के बारे में बात करना पसंद नहीं करती थीं और हम दोनों समन्दर से बेपनाह प्यार करती थीं.

हमने आधी आधी रात तक गोवा के समन्दर से बातें की थीं, गोवा का चप्पा-चप्पा छानते हुए हम खुद को तलाश रहे थे. और जब हम मुठ्ठियों से समेट-समेट कर समन्दर जिन्दगी में भरकर वापस लौटे थे तो हम वो नहीं थे, जो हम गए थे. समन्दर ने हमसे उलझनें लेकर, हिम्मत और भरोसा देकर वापस भेजा था. लौटने के बाद उसी हिम्मत और भरोसे के साथ जिन्दगी को नयी राहों पर रख दिया था और वही नयी राहें आज तक हाथ थामे चल रही हैं.

इसके बाद कई बार समन्दर मिले, अलग-अलग नामों से, अलग-अलग देश में, प्रदेशों में. लेकिन 2018 के आखिरी में जब एकदम अचानक एक बार फिर से गोवा ने आवाज दी तो मैं चौंक गयी. इस वक़्त, गोवा? सोचना भी नामुमकिन था. जिन्दगी एक साथ कई खानों में उलझी और अटकी हुई थी. पहले से इतनी उलझनें थीं कि उनमें संतुलन बनाना ही मुश्किल हो रहा था और उस वक़्त गोवा से आई यह आवाज? आखिर क्या मायने हैं इसके. जब मोहब्बत आवाज दे तो इनकार कर पाना कितना मुश्किल होता है यह कोई आशिक मन ही जान सकता है. लेकिन हाँ कहना भी आसान नहीं था. गोवा से आई यह पुकार मुझे सोने नहीं दे रही थी. इस बार जब यह पुकार आई थी तब जिन्दगी में बहुत कुछ बदल चुका था. सचमुच बहुत कुछ. पहले आई पुकार उदासियाँ पोछने और हिम्मत देने के लिए थीं लेकिन इस बार हौसलों को परवाज देने, पहचान देने और जिन्दगी की मुश्किलों से लड़ने का ईनाम देने को थी. यह बुलावा था मेरी एक कविता 'ओ अच्छी लड़कियों' का इंटरनेशल सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल में शामिल किये जाने पर. इस कविता को मेवरिक प्ले लिस्ट में जगह मिली थी जिसे संगीतबध्ध किया था मेरी प्रिय शास्त्रीय संगीत सिंगर और संगीतकार शुभा मुद्गल और अनीश प्रधान ने. यह सब इतना अचानक, इतना अनायास था कि यकीन सा नहीं हो पा रहा था. यह मेरे लिए ऐसा समय था जैसे खेल रही हो जिन्मेदगी मेरे संग. जैसे-जैसे गोवा जाने की तारीखें करीब आती जा रही थीं वैसे-वैसे न जाने देने की स्थितियां मजबूत होती जा रही थी.

इश्क़ की पुकार में बहुत ताकत होती है. आखिर मैं गोवा के लिए निकल ही पड़ी ठीक वैसे ही जैसे लड़की भागती है मंडप से उठकर सारे बंधन तोड़कर. इसमें जोखिम भी बहुत होता है और रोमांच भी. आखिर मैंने गोवा को हाँ कर दी थी. मेरे इस हाँ कहने में यानी लड़की को जिन्दगी की तमाम दुश्वारियों वाले मंडप से भगाने में मेरे भाई, भाभी और दोस्त ज्योति का बड़ा रोल रहा. लहरों की ताल पर थिरकता मन मुम्बई एयरपोर्ट पर उतरा तो खुश था. मुम्बई से एक दोस्त को मैंने साथ चलने के लिए मना लिया था. हमने मुम्बई से गोवा ट्रेन से जाना चुना था.

  जारी...

(गोवा डायरी, दिसम्बर 2018 )

Monday, August 5, 2019

तुमसे प्यार है सोनम, डरो नहीं


'दीदी, आप नहीं जानतीं मुसलमान बहुत ख़राब होते हैं. बहुत कट्टर होते हैं. इनके साथ यही होना चाहिए. कश्मीर में कितना दंगे करते हैं ये लोग. अब मोदी जी सब ठीक कर देंगे.' सोनम एक सांस में अपनी बात उड़ेल देती है और पूछती है 'आज खाने में क्या बनेगा?' वो पहले भी ऐसी बातें करती रही है. ज्यादा बात नहीं करती लेकिन जब करती है तो मोदी जी की तारीफ ही करती है. गर्व से उसने बताया था कि उसने और उसके परिवार ने भाजपा को वोट दिया. यह कहना बल्कि सोचना भी मुझे बुरा लगता है कि सोनम कौन है किस जाति या धर्म की है, मैंने कभी नहीं पूछा किसी भी अपने सहायक से. लेकिन सोनम को अपनी पहचान छुपानी पड़ी थी. उसने खुद को हिन्दू बताकर घर में खाना बनाना शुरू किया था. हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था लेकिन एक महीने काम करने के बाद पता चला कि वो हिन्दू नहीं है. और यह पता चला मोहल्ले की पढ़ी लिखी आंटी से. उन्होंने मुंह बनाकर बताया 'आपको पता है सोनम मुलसमान है? वो रोजे से होती थी लेकिन छुपाती थी. डरती थी कि कहीं पहचान न खुल जाए.

सोनम हिन्दू नहीं है, मुलसमान है वो. बहुत डरी हुई है वो. हिन्दू घरों में काम करती है और वही बोलती है जो उन्हें सुनना अच्छा लगेगा. यही सोचकर वो मुझसे भी वह सब बोलती है जो काम करने के लिए, जीने के लिए रटकर घर से निकलती है. मैं उसकी तकलीफ समझ सकती हूँ. अभी भी वो मुझ पर पूरा यकीन नहीं कर पायी है हालाँकि उसे एक राहत है कि अब उसे मेरे घर में अपनी पहचान को लेकर झूठ नहीं बोलना पड़ता.

उसने किसे वोट दिया यह उसका अधिकार है, उसका चुनाव लेकिन वो अपना सच बता नहीं सकती. उसे सिर्फ लहर के मुताबिक बात करनी है. मुसलमानों को बुरा भला कहना है और किसी तरह अपनी रोजी रोटी कमानी है. एक रोज उसने कहा, दीदी आपकी बात और है, लेकिन सब लोग यही सुनना चाहते हैं कि मुसलमान ख़राब होते हैं तो हम वही बोलते हैं.

मैं उसके भीतर के डर का सामना नहीं कर पाती. सोनम अकेली नहीं है. बहुत से लोग हैं आसपास. जो चुप हैं. जो इस शोर में, उन्माद में आपके ठहाकों में आपके साथ ही नजर आते हैं लेकिन उनकी आँखों में जो डर है, पीड़ा है उसे देखने की फुर्सत किसी को नहीं. न सरकार को न नागरिकों को. उनके इस डर को अपना बनाना कैसे कहा जा सकता है?

जहाँ धारा 370नहीं है वहां क्या किया है सिवाय नफरत बोने के कि कश्मीर को अपना बनाने का यह तरीका निकाला गया है. इस तरह तो किसी को अपना बनाया नहीं जाता. कश्मीर सिर्फ जमीन नहीं है दिल है वहां के लोगों के उस दिल में क्या इस तरह जगह बना पायेंगे हम? क्या सोनम को अपनी पहचान न छुपानी पड़े यह हमारी चिंता है, हमारे दोस्तों को अपने मन की बात कहते-कहते रुक न जाना पड़े, या उनकी पलकें न भीग उठे, आवाज रुंध न जाए यह हमारी चिंता है. कश्मीर तो हमारा ही था पहले भी, उससे प्यार तब भी था,अब भी है.

अभी-अभी दोस्ती दिवस मनाया है और अब इस बात पर खुश हैं? कितना अच्छा होता कि यह होता लेकिन डर के साए में नहीं मोहब्बत के साए में होता. वो खुद शामिल होते इस फैसले में ख़ुशी से.

#standforpeaceandlove

Monday, July 29, 2019

'कविता कारवां'- गुलज़ार


कुछ खो दिया है पाई के
कुछ पा लिया गँवाई के...

बारिश की चुनरी ओढ़े सावन की कोई शाम गुलज़ार साहब के पहलू में सिमटकर बैठी हो तो दिल के हाल क्या कहें. बिलकुल ऐसा ही दिलफरेब मौसम बना कविता कारवां की देहरादून की बैठक में. जिस्म सौ बार जले फिर वही मिट्टी का ढेला है, रूह देखी है कभी रूह को महसूस किया है...गुलज़ार साहब की नज्म को उन्हीं की आवाज में सुनने से शाम का आगाज़ हुआ और यह आगाज़ उनकी तमाम नज्मों, गीतों, त्रिवेणियों के जरिये परवान चढ़ता गया. बाहर धुला धुला सा मौसम इतना हरा था मानो किसी रेगिस्तान की लड़की की दुआ क़ुबूल हो गयी हो. और गुलज़ार साहब की शोख मखमली आवाज में उनकी ही नज्मों का जादू.

कविताई में डूबी इस पहाड़ी शाम में 'बूढ़े पहाड़ों पर' का जिक्र कैसे न होता भला. विशाल भारद्वाज, सुरेश वाडकर और गुलज़ार साहब की त्रयी 'बूढ़े पहाड़ों पर' को सुनना किस कदर रूमानी था इसे बयान करना मुश्किल है. इसके बाद एक-एक कर 'अबके बरस भेज भैया को बाबुल', 'किताबें करती हैं बातें', 'बारिश आती है तो पानी को भी लग जाते हैं पाँव', 'प्यार कभी इकतरफा नहीं होता', 'अभी न पर्दा उठाओ', 'आँखों को वीजा नहीं लगता', 'यार जुलाहे', 'मुझको इतने से काम पर रख लो', 'मोरा गोरा अंग लई ले' सहित रचनाओं के साथ शाम गुलज़ार हुई.

गुलज़ार साहब से मुलाकातों के किस्से छिडे, उनकी फिल्मों का जिक्र हुआ, उनकी कविता के अलावा उनके प्रोज उनकी कहानियों पर भी बात हुई. बात हुई कि किस तरह बंटवारे की खराशें उनके लिखे में तारी हैं. गुलज़ार पोयट्री के साथ पोलिटिकल जस्टिस और पोलिटिकल बेचैनी को पोयटिक बनाने में माहिर हैं यह उनकी फिल्म आंधी, हू तू तू आदि में अच्छे से दिखता है. शाम थामे नहीं थम रही थी. गुलज़ार यूँ ही तो गुलज़ार नहीं हुए होंगे कि उनका जिक्र होगा तो जिक्र अमृता आपा का भी होगा और मीना कुमारी का भी और किस तरह उनका नाम गुलज़ार पड़ा इसका भी जिक्र होगा ही, सो हुआ. शाम बीत गयी लेकिन हम सब बैठक से गुलज़ारियत लिए लौटे हैं.

18 अगस्त को उनका जन्मदिन है देहरादून में उनके दीवानों ने उनका जन्मदिन एडवांस में मना लिया...मौसम ने इस शाम में खूब रंग भरे...