Saturday, March 28, 2020

ये लोग देश हैं, देशद्रोही नहीं हैं


यह नफरत का समय नहीं है, ये सरकार को कोसने का समय नहीं है, ये लेफ्ट राईट के खांचों में बंटने का समय नहीं है. ये समय अपने घरों में बैठे हुए बेघर होने का दर्द महसूस करने का है. अपने पांवों में लगातार चलने से होने वाले दर्द को महसूस करने का. कई कईं दिन की भूख को महसूस करने का. और जितना संभव हो किसी की भूख को खाने से बदल पाने का. ज्यादा और ज्यादा मनुष्य होने का.

ये समय है किसी भी तरह पैदल, भटकते देश के साथ खड़े होने का. वो लोग जो पैदल चले जा रहे हैं वो न हिन्दू हैं, न मुसलमान. न स्त्री, न पुरुष. वो इन्सान हैं. उन्हें आप पर आस्था थी. भरोसा था. जिनके पास थालियाँ थीं उन्होंने थालियाँ बजाई होंगी, आपके गाल बजाने से ज्यादा बजाई होंगी जिनके पास थालियाँ नहीं रही होंगी उन्होंने तालियाँ बजायी होंगी. उन्होंने प्रधानमन्त्री जी की बात को हमेशा गौर से सुना, उनकी बात मानी भी. उन्हें वोट भी दिए. लॉकडाउन हुआ तो भी उन्होंने बात मानी. उदास हुए लेकिन जहाँ थे वहीं रुक गए.

फिर क्या हुआ...जहाँ वो थे वहां से उन्हें खदेड़ा जाने लगा. काम से, बसेरे से. भूखे, बेघर जेब से खाली लोग सड़क पर आ गये. सडक पर आये तो पीटे जाने लगे.

वो पिकनिक मनाने नहीं जा रहे हैं. वो भी हमारी, आपकी तरह घर में रहना चाहते हैं, सैनीटाइज़र से हाथ साफ़ करते, रामायण देखते, खाने की फोटू लगाते फेसबुक पर लेकिन उनके पास नहीं है ये सुविधा. उनके पास एक देह है, भूख है, असुरक्षा है इसलिए वो चल रहे हैं.

सदियों से जो एक सी सामजिक, आर्थिक स्थिति में ठहरे हुए हैं आज वो चल रहे हैं. तब उनके ठहरे हुए जीवन पर हमारी नजर नहीं गयी कि क्यों पीढ़ी दर पीढ़ी ये वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं. जीडीपी के आंकड़ों में ये कहीं भी क्यों नहीं हैं. ये सदियों से भूखे हैं, इनका कोई सम्मान नहीं. इनके बच्चे दुखी नहीं होते अपने माँ बाप को पिटते देख. इनके माँ बाप का दिल रोता नहीं जब बच्चा रोटी (पिज़्ज़ा या चाऊमीन नहीं ) मांगता है तो ये एक चमाट मार देते हैं. इनके बच्चे बनती हुई भव्य इमारतों के बीच कहीं कोने में पड़े-पड़े बड़े हो जाते हैं. वही भव्य इमारतें जिनके बन जाने के बाद ये उसमें घुस भी नहीं सकते.

ये दीवारों के पीछे छुपाये जाते लोग हैं. इन्हें हर हाल में मौत से लड़ना होता है, हर दिन. ये देश हैं, देशद्रोही नहीं हैं. इनके प्रति आपके मन में इतना आक्रोश क्यों है आखिर? कहाँ से आया? और खुद को संवेदनशील कहते हैं आप?

नफरत मिटाकर हाथ बढ़ाने का वक्त है इंसानियत की तरफ. जितनी संभव हो जरूरतमंदों की मदद करने का. परिवार के साथ रामायण देखते हुए थोड़ा सा रो लेने का. कोरोना से नहीं नफरत के वायरस से भी लड़ने का वक्त है ये.

(लॉकडाउन डेज़)

तुम हो तो जीने को जी चाहता है


तुम साथ होती हो तो
आसमान झुक कर
करीब आ जाता है

काँधे से सटकर
बैठ जाती हैं उम्मीदें

बारिश की बूंदे
सिर्फ तुम्हारी खातिर
अटकी रहती हैं देर तक
पत्तों पर

तुम हो तो हर उम्मीद को
थाम लेने की जी चाहता है
तुम हो तो जीने को जी चाहता है.

जन्मदिन मुबारक प्यारी संज्ञा

Thursday, March 26, 2020

किसे याद करता था समय?

संज्ञा उपध्याय 
कई बरस हुए. भोपाल से बहुत सी मधुर यादों के साथ एक किताब भी आई थी साथ 'पेड़ नीला था'. छोटी सी पतली सी. रुस्तम जी की कवितायें .किताब इतने सलोनेपन से बनी थी कि अपनी बनावट में ही कविताओं की बुनावट भी सहेजे हुए थी. एकलव्य प्रकाशन की खासियत है यह. रुस्तम जी की कविताओं से यह मेरा पहला परिचय था .उस परिचय को बहुत गाढ़ा किया सुशील शुक्ल की बात ने. मैंने इस कविता को बार-बार पढ़ा. उलट-पुलट कर पढ़ा. अलग-अलग मौसम में पढ़ा. अलग-अलग पहर में पढ़ा. हर बार यह अलग लगी. सुशील जी की बात को भी पढ़ा. इस कविता पर उनकी बात को. कविता ही है उनकी बात भी. किसी कविता को कैसे पढ़ा जाना चाहिए यह ढब आना जरूरी है. मेरी ही तरह सुशील भी कविता को उलट-पुलट कर पढ़ते दिखे. तो इस तरह इस कविता में चार लोग शामिल हैं. रुस्तम जी की कविता पर कवि सुशील शुक्ल की बात. उनकी उस बात को पढ़ती मैं और इन सबको अपने हरे में समेटती संज्ञा की तस्वीर. - प्रतिभा 

सिर्फ एक पत्ते पर
रोशनी गिर रही थी
सिर्फ एक पत्ता हरा था
सिर्फ एक पत्ता हिल रहा था
हौले-हौले हिल रहा था
पृथ्वी शांत थी
पूरी पृथ्वी शांत थी
सिर्फ एक पत्ता हिल रहा था. - रुस्तम 

इस कविता में एक सांगीतिकता है. पहले यह कविता और इसकी भाषा एक बहुत ही शांत माहौल रचती है. फिर अपनी बात कहती है.
सिर्फ एक पत्ते पर रौशनी गिर रही थी.एक साथ नहीं कहती है.
पहले कहती है सिर्फ एक पत्ते पर.
रोशनी गिर रही थी. ज्यादा महत्वपूर्ण चीज रोशनी नहीं है, वह तो बाद की बात है. जरूरी बात है कि सिर्फ एक पत्ते पर गिर रही थी. सिर्फ एक पत्ता हरा था. सिर्फ एक पत्ता हिल रहा था.

पृथ्वी शांत थी. पूरी पृथ्वी शांत थी. एक पत्ते की बात इस कविता में चल रही है. एक पत्ते की बात इस कविता में चल रही है. एक पत्ते की बात करती यह कविता पृथ्वी पर आ जाती है. कहाँ एक पत्ता और पृथ्वी? इसलिए कविता पृथ्वी की शायद विशालता को, विराट को रचने के लिए दुबारा कहती है- पूरी पृथ्वी शांत थी.  जैसे पृथ्वी शांत थी कहने से कुछ छूट सकता था. पूरी पृथ्वी शांत थी, बस एक पत्ता हिल रहा था. क्यों क्योंकि सिर्फ वही हरा था. क्यों? क्योंकि सिर्फ उसी पर रोशनी गिर रही थी.

यह कविता पढ़ते हुए कई तरह के मन बनते हैं. एक, जैसे कोई याद आती है. रह रहकर. कोई चीज कचोटती है.
रह रहकर. इस कविता का ढांचा उस तरह का भी है. रह रहकर...एक सांस में कोई बात कह दी. झट से. ऐसा नहीं है.

दूसरा, जैसे बस कुछ को ही रोशनी हासिल है. और पृथ्वी शांत है. पूरी पृथ्वी शांत है. तो पूरी पृथ्वी का शांत होना एक सवाल बन जाता है कि पूरी पृथ्वी शांत क्यों है?

एक मन कहता है कि यह किसी सघन क्षण की याद है. जब शेष कुछ नहीं था. बस वह क्षण था. वह पत्ता इस तरह दिख रहा था कि जैसे उसे देखने भर की रौशनी ही बची थी या बाकी थी. पर क्या उस पत्ते की खास स्थिति की वजह से रोशनी सिर्फ उसी पर गिर रही थी? या वह क्षण ख़ास था?

क्या रोशनी ज्ञान और उससे पैदा हुई सत्ता का प्रतीक है? कि वह इस पृथ्वी नाम के दरख्त के एक पत्ते हिस्से को हासिल है? और पूरी पृथ्वी शांत है? चुप.

कभी यही कविता उस एक पत्ते को समूची पृथ्वी से बाहर लाकर खड़ा कर देती है.

पूरी पृथ्वी शांत थी. पूरी पृथ्वी में तो वह पत्ता भी शामिल होना चाहिए. पर वह तो हिल रहा है. हरा है. उस पर रोशनी गिर रही है. कि उस एक पत्ते के बिना भी पृथ्वी पूरी थी. कि यह क्षण पारलौकिक था. पत्ता पृथ्वी से बाहर का लगता था. या कि पूरी पृथ्वी में उस पत्ते की कोई गिनती नहीं थी. उसका होना या न होना बराबर था.
सुशील शुक्ल 

Wednesday, March 25, 2020

बसंत त्रिपाठी की कवितायें संध्या राग

बसन्त त्रिपाठी की कवितायें 1998 में पहली बार पढ़ी थीं. तब उनकी कविताओं की सादगी और गहनता ने आकर्षित किया था आज इतने बरस बाद उनकी कविताओं की सादगी में इजाफा हुआ है. गहनता ने और गोते लगाये हैं. उनकी भाषा की तरलता में अलग किस्म का सम्मोहन है. यह उनकी कहानियों को भी विशेष बनाती है और कविताओं को भी. वो सक्रियता के उफान में कविता के फलक पर आने और छाने वाले कवि नहीं हैं. उनकी उपस्थिति गरिमामय और संजीदा है जो निरंतर अपना स्पेस बढ़ाती जा रही है. बसंत को पढ़ना बसंत के मौसम को महसूस करने सरीखा लगता है. आज मेरे इस प्रिय कवि मित्र का  जन्मदिन है. उनकी कुछ कवितायें जो शाम के अलग-अलग रंग बिखेर रही हैं, यहाँ सहेज रही हूँ. जन्मदिन मुबारक दोस्त! - प्रतिभा 

संध्या राग 
1.
शामें कितनी भी अच्छी क्यों न हों
रात की दराज़ में
प्रेम-पत्र की तरह पड़ी होती हैं
प्रेम, जो अपनी सघन भावनाओं की
अनुभूत उपस्थिति के साथ
बीत चुका है
कालातीत
रात खुद
सुबह की चमक से चौंधियाकर
ससुराल आई नई बहू की तरह
कोठरी में दुबकी होती
दोपहर की थाली में
सुबह को
भोजन की तरह परोसा जाता है
और साँझ उसे
निवाले की तरह निगल जाती है

2.

यह गर्म लू के थपेड़ों से
भुनी हुई एक साँझ है
मूंगफली की तरह नहीं
कि छिलके उतारे और दाना मुँह में
कुरकुरा और मज़ेदार
भुट्टे की तरह भी सिंकी हुई नहीं
कि नींबू और नमक से मिलकर
जायकेदार
यह दोपहर की भट्टी से
अभी-अभी उतरी साँझ है
बड़भूँजे सूरज ने इसे
देर तक भूना है
इसी दोपहर की कड़ाह में कभी
महाकवि ने देखा था
पत्थर तोड़ती मजूरन को
गर्म साँझ धीरे-धीरे काली हो गई है
लेकिन बैसाख की रात
अब भी धमका रही है
3.
धूल का बवंडर
उठा है अभी-अभी
सूखी पत्तियों ने भी साथ दिया
बंद दरवाज़ों की दरार से 
भीतर घुस आई है धूल
सारी चीज़ों को अपने घेरे में लेती हुई
सड़कें तो जैसे
धूल की चादर
फर फर उड़ रही हैं
मुँह के भीतर किचकिचा रही है धूल 
परिन्दों ने ढूँढ़ लिया है
तत्काल कोई सुरक्षित जगह
खुशगवार शामों को
बेस्वाद बना रही है
सड़कों पर बिछी अलक्षित धूल.

4.

पल को
पलकों ने उठाया
तह कर रख दिया
करीने से
मेरी नींद के स्याह जल में
नींद के जल में
उजले कपड़ों की तरह
धीरे-धीरे घुल रहा है
बीत हुआ सघन पल
स्वप्न इशारे से बुलाता है अपने पास
मैं उस ओर जाता हूं
शब्दहीन शब्दातीत
जैसे शाम
चुप पड़े खेतों के बहुत पीछे
रात की गोद में
धीरे-धीरे दुबककर सो जाती है.
5.
यह एक संभ्रांत की शाम है
लगभग घटनातीत
घटनाओं के नाम पर
आसमान में बादलों के कुछ थिर टुकड़े हैं
और उनके भीतर से झाँकता
पका हुआ संतरा
पंछियों की लौटती हुई उड़ाने हैं
आसमान की दीखती हलचल है
और उसके पीछे ठहरा हुआ नील
जो बरस रहा है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे
यह पक्के मकान की छत की शाम है
घनी आबादी वाले रिहाईशी से लगभग बाहर
भौतिक आशंकाओं के घेरे से बाहर खड़े
सौंदर्यवादी के लिए
शाम
दरअसल कब्रगाह है
जिसमें वह पहले ज़िन्दा गिरता है
मौत फिर धीरे-धीरे आती है
आती चली जाती है
6.

मामूली से मामूली दोपहरें भी
दिहाड़ी मजदूर की भूरी-नीली बनियान में
नमक की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें छोड़ जाती है
बस शाम ही है
जो उसे थपकी देती है
तनी हुई नसों में
राहत बनकर दौड़ती है
हाथठेला खींचता हुआ मजदूर
छत्तीसगढ़ी लोकगीत की धुन पर
लगभग थिरकता हुआ
देशी ठेके तक पहुँचता है
शाम उसकी नसों में
नशा बनकर उतरती है.
7 . 

शाम चाहे समुद्री हो, पहाड़ी हो,
मरुस्थली, ऊसर या पथरीली
घने जंगल या नदी किनारे की नम शाम
या टूटे छप्परों वाली छत के भीतर
धीरे धीरे उतरती हुई
ये सारी शामें मेरे लिए
सैलानी की शामें हैं
मैं हर बार
बस देखता हूँ
अपने शहर की भागती धूल उड़ाती
गर्म और ठंडी शामें
मेरी हर शाम
मेरे शहर की ही शाम
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हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज – 211001

मो. 09850313062

Tuesday, March 24, 2020

बारिश पंचम सुर में आलाप ले रही है



एक समय था जब मैं प्यार में मर जाना चाहती थी. एक वक़्त है जब मैं प्यार को पी जाना चाहती हूँ. एक वक़्त था जब बेजारी थी जिन्दगी से एक ये वक़्त है जब यारी है जिन्दगी से. सुबहों को घंटों परिंदों से बाते करते हुए महसूस होता है मेरे भी पंख उग आये हों जैसे. उनके साथ मैं भी उड़ती जाती हूँ . पंडित शिव कुमार शर्मा संतूर पर राग भैरवी बजा रहे हैं. पहाड़ियां उन मधुर लहरियों में डूबती जा रही हैं. 

मुझे इन दिनों अपने आस पास कोई नजर नहीं आता, कोई महसूस भी नहीं होता. ज़रूरत भी नहीं महसूस होती. वो जो खाली केंद्र था अपनेपन की महक से भर गया है. बाहर कुछ भी नहीं, सब भीतर है. उस भीतर तक पहुँचने के लिए बाहर भटकते रहते हैं. सेहरा, पहाड़, दरिया पार करते हैं, लेकिन मिलता है वो किसी पेड़ के नीचे ही, एक चम्मच खीर खाकर या किसी कुटिया में झूठे बेर खाकर.

हम सबको झूठे बेरों की तलाश है. कोई इतने प्यार से चखकर रखे तो. कोई इतने प्यार से खीर बनाकर लाये तो. वो खीर की चाह थी जिसने खीर को ज्ञान का माध्यम चुना, वो चाह जिसे दुनिया भूख कहती है. हमें अपनी भूख तलाशनी है असल में. जिन चीज़ों के पीछे भाग रहे हैं, जिनके लिए जान दे रहे हैं वो हमारी भूख हैं ही नहीं. जो भूख है वहां हम पहुंचे ही नहीं. वहां पहुँचने की यात्रा ही जीवन है. मुझे मेरी भूख मालूम है. मुझे बारिश चाहिए (बेमौसम नहीं), मुझे ढेर धूप चाहिए, अंजुरी भर सर्दी चाहिए, अमलताश चाहिए, मोगरे का गजरा चाहिए, सामने मुस्कुराती जूही और हरसिंगार की गमक चाहिए.

मुझे इंतजार चाहिए...यही मेरी चाह है. मेरी इस चाह को परिंदे समझते हैं. तुम भी तो परिंदे ही हो...उड़ते उड़ते जा बैठे हो किसी और डाल पर. तुम कनखियों से देखते हो, मुस्कुराते हो, मैं पुकारती नहीं, तुम आते नहीं....दूर जाकर तुम ज्यादा करीब जो आ गये हो...मेरी शामों में मेरी सुबहों में तुम घुले हुए हो...डाल कोई भी हो तुम्हारी, दिल मेरे ही पास है जानती हूँ...

बारिश पंचम सुर में आलाप ले रही है, सुन रहे हो न तुम.
(इश्क़ शहर, लॉकडाउन डेज़)