Saturday, October 12, 2019

स्काई इज़ पिंक



'अगर तुम्हारा स्काई पिंक है तो वो पिंक ही है. किसी के कहने से तुम अपने स्काई का कलर मत बदलना. जो टीचर कहती है कि तुमने स्काई का कलर गलत पेंट किया वो टीचर गलत है. समझे' गले तक भर आये आंसुओं के सैलाब को संतुलित आवाज में समेटते हुए अपने छोटे से बच्चे को उससे बहुत दिनों से बहुत दूर गयी माँ समझाती है. वो उसे नहीं समझाती वो हम सबको समझाती है कि गलत सही के खांचों से बाहर निकलकर हमें बच्चों की दुनिया में प्रवेश करना चाहिए.

'स्काई इज़ पिंक' ओह क्या तो राहत था इसे देखना. क्या तो सुख. कोई कुछ भी कहे लेकिन एक बात को बार-बार महसूस करती हूँ कि माँ होना माँ होकर ही जाना जा सकता है. हालाँकि इसी कन्ट्रास्ट को पोट्रे किया है प्रियंका ने. यह फिल्म है तो बेटी के बारे में लेकिन है एक माँ की फिल्म. प्रियंका चोपड़ा के अभिनय ने एक बार फिर दिल पर मुहर लगा दी है. अदिति (प्रियंका), निरेन (फरहान), ईशान (रोहित), आयशा (जायरा) एक परिवार है. दुःख और संघर्ष की डोर से बंधा परिवार उम्मीद का गुलाबी आसमान रचता नजर आता है.

एक माँ अपने बच्चे के लिए यमराज से भी लड़ जाती है कुछ ऐसी है यह कहानी. जिस बच्चे के जन्म के साथ ही उसके न जी पाने की बात (SCID नामक बीमारी) जुड़ी हो उसके जन्म पर कैसा एहसास हुआ होगा, कैसे उसकी परवरिश एक हर पल के युद्ध में तब्दील होती है. यही कहानी है.

फिल्म की कहानी का बेस दुःख है, संघर्ष है, पीड़ा है, आत्मसंघर्ष है लेकिन पर्दे पर निराशा नहीं उम्मीद दौड़ती है, मुस्कुराहटें गुनगुनाती हैं, आसमान में उड़ने के ख्वाब हैं. वो आसमान जिसका रंग नीला नहीं गुलाबी है, मुस्कुराहटों वाला गुलाबी. जिन्दगी के डिफरेंट शेड्स का कोलाज है फिल्म जो पूरे वक्त कलाई नहीं दिलों की धडकनों को थामकर रखती है.

आमतौर पर जब भी मैं और बेटू फिल्म देखने जाते हैं वो मुझे चिढाती है मम्मा रोना नहीं. जरा सा भी इमोशनल सीन मेरी हिचकियाँ बाँध देता है. इसे लेकर मुझमें कोई संकोच भी नहीं है. कि रोना कोई बुरी बात भी नहीं.

मेरे लिए इस फिल्म पर लिखते हुए फिल्म के बारे में लिख पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि मैं इस फिल्म के जरिये अपनी जिन्दगी को ही जी रही थी. 1991 का वह भयंकर एक्सीडेंट. माँ-पापा शहर में थे नहीं. उन्हें दो खबरें मिलीं एक कि गुड़िया अब नहीं रही, दूसरी कि जल्दी पहुँचिये शायद आखिरी बार मिल सकें.
माँ रोई नहीं इस खबर पर. उन्होंने बस इतना कहा बस मुझे उसकी एक सांस मिल जाय फिर मैं सब ठीक कर लूंगी. उन्हें वो एक साँस मिल गयी और उस एक सांस को पकड़कर वो जूझ गयीं. बरसों उन्होंने रुई के फाहे में छुपाकर रखा. सांस-सांस सहेजा, लेकिन टूटी नहीं, हारी नहीं. नौकरी, घर, अस्पताल और एक-एक लम्हे को सिर्फ माँ पर आश्रित बच्ची की तीमारदारी. शायद माँ सोती नहीं थीं. वो थकती भी नहीं थीं. कभी किसी पर नाराज नहीं होती थीं. हमेशा उम्मीद से भरी. और आखिर उन्होंने मुझे खड़ा कर दिया. मुझे उस दौर में माँ की भावनात्मक मजबूती आकर्षित करती है. हालाँकि मैं उनके जैसी मजबूत नहीं हूँ. क्योंकि मेरी बच्काी च वैक्सीनेशन भी मेरे लिए बड़ा युद्ध रहा हमेशा. सो यह जिम्मा उसकी नानी और पापा को मिला. अपने कानों में अपने बच्चे की रोती हुई आवाज को सहेजना कितना मुश्किल होता है यह दिल ही जानता है.

फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं थी. भावनात्मक यात्रा थी. परिवार की ताकत को महसूसना था. भाई किस तरह दोस्त बनकर सामने से हंसाता रहता है और चुपके-चुपके रोता है. पिता जो मजबूत दिखने का जिम्मा कन्धों पर उठाये हैं लेकिन टूटते हैं वो भी. यह मजबूती से जुड़े रहने और चुपके-चुपके टूटने की कहानी है.

'भाई मैं मरना नहीं चाहती' लंदन के मेट्रो स्टेशन पर फोन पर मरती हुई बहन से यह सुनना और उसे हल्के-फुल्के अंदाज में सहेज पाना कितना मुश्किल रहा होगा यह फोन कटने के बाद उसके एक्सप्रेशन से कन्वे होता है. जब छोटी बहन के लिए एक-एक सांस सहेजने में माँ-बाप जूझ रहे हों तब माँ से दूर इण्डिया में रह रहा ईशान भी तो बचपन के लिए जूझ रहा होगा लेकिन इसकी कोई शिकायत नहीं दर्ज होती समझ दर्ज होती है. बच्चों को खेलने, शैतानी करने और जिद करने की उम्र में समझदार होने की सजा बड़ी सजा होती है. मेरे जेहन में ईशान के उस बचपन के पन्ने खुलते हैं जो सेल्यूलाइड के पर्दे पर नहीं खुले.

अपने हाथों में सिर्फ 24 घंटे का जीवन लेकर आई रोती-बिलखती बच्ची को सहेजती प्रियंका की पीड़ा झकझोर देती है.आह. जीवन कितना क्रूर होता है, फिर भी कितना सुंदर कि पैसे की कमी इलाज के आड़े आने नहीं देते दुनिया भर के लोग सिर्फ एक रेडियो अपील के बाद.

सच कहूँ, अभी भी रो रही हूँ. हम माँ बेटी पहली बार पूरी फिल्म में चुप थे लेकिन यह दुःख की चुप्पी नहीं थी. वापस लौटते हुए बेटू ने एक बात कही, 'मम्मा दुःख की एक ख़ास बात होती है न, वो सबको कितना जोड़कर रखता है न ?'

हम एहसासों से भरे हुए साथ चल रहे थे...जैसे चलती है हरसिंगार की खुशबू उसके करीब दो पल बैठकर चलने के बाद.

शुक्रिया सोनाली बोस!

Thursday, September 26, 2019

ये दुनिया तुमसे सुंदर है


जब ये कक्षा 6 में थीं तब इनसे मुलाकात हुई थी. पहली बार. फिर इनसे दोस्ती हो गयी. फिर दोस्ती गाढ़ी होती गयी. अब ये कक्षा 8 में हैं. हम बातें करते हुए सीखते हैं एक-दूसरे से. मैं ज्यादा सीखती हूँ ऐसा महसूस करती हूँ. इन बच्चियों ने अपने जीवन की पहली चिठ्ठी लिखी मेरे संग. अपने सपनों के बारे में बताया मुझे. मेरे सपनों की पड़ताल की. मेरा हाथ थामकर अपने स्कूल के बारे में सब बताया. कोना-कोना घुमाया. आज जब स्कूल पहुंची तो थोड़ी नाराजगी से मिलीं ये सहेलियाँ. नाराजगी इसलिए कि काफी दिन बाद जाना हुआ था. लेकिन जैसे ही मैंने कान पकड़कर माफ़ी मांगी सब की सब हंस दीं. माफ़ कर दिया मुझे. और हाथ पकड़कर ले गयीं उस बगिया में जो इन बच्चों ने अपने हाथों से उगाई है, सजाई है. उन पेड़ों के पास ले गयीं जो इन्होने लगाये हैं. वादा किया जब इन आम के पेड़ों में फल आयेंगे तो मुझे भी मिलेंगे. बस कि मुझे वहां आना होगा.

तनिषा एथलीट है अभी स्टेट लेवल की खेल कूद प्रतियोगिताओं में उसने तीसरा स्थान प्राप्त किया है. अनीता पेंटर बनना चाहती है. नीति पुलिस में जाना चाहती है. उसकी आँखों में चमक है. वो चाहती है कि सारी लड़कियों को सुरक्षा दे सके अंशिका टीचर बनना चाहती है. हम बातें करते हुए जिन रास्तों से गुजर रहे थे बरसात ने उन सड़कों की हालत खराब कर रखी थी. हवाओं के पंखों पर सवार ये लड़कियां उड़ती फिर रही थीं. मैं संभल-संभल कर चल रही थी वो फलांगती फिर रही थीं. नीति ने कहा प्रधान जी आयेंगे तो सड़क बनेगी. क्या तुममें से कोई प्रधान नहीं  बनना नहीं चाहती? मैंने पूछा तो अंशिका ने कहा, राजनीति पसंद नहीं हमें. यानि प्रधान होना राजीनति में होना है यह पता है उन्हें. उनमें से एक बच्ची के पिता प्रधान हैं. हमने छवि राजावत के बारे में बात की. मैंने उन्हें छवि के बारे में बताया तो अंशिका ने कहा, अरे वाह हमने सोचा नहीं था ऐसा कि हम प्रधान भी बन सकती हैं. अब हम जरूर इस बारे में सोचेंगे.

लड़कियां बोलती कम थीं, हंसती ज्यादा थीं. इन लड़कियों ने शहर ने नहीं देखा है. इनकी दुनिया में मोबाईल नहीं है. फेसबुक नहीं है. वाट्स्प भी नहीं है. इनकी दुनिया में पेड़ हैं, नदियाँ हैं, पगडंडियाँ हैं, बारिशें हैं...खिलखिलाहटें हैं. मैं इनकी खिलखिलाहटों को पूरी दुनिया में बिखेर देना चाहती हूँ. मैं इनकी मुस्कुराहटों को नजर के काले टीके में सहेज देना चाहती हूँ. 

जब मैं वहां से चली, ये लड़कियां मेरे नाम की चिठ्ठी लिख रही थीं...मुझे उनकी लिखी चिठ्ठियों का इंतजार नहीं है. शायद मैं जानती हूँ उन चिठ्ठियों में क्या लिखा होगा. उनकी खिलखिलाहटों की कर्जदार हूँ. उनके लिए एक बेहतर दुनिया बनाने का कर्ज...

Thursday, September 19, 2019

थोड़ा सा उगने लगी हूँ



गृह प्रवेश कराने को कोई दरवाजे पर धान का कटोरा भरकर, रंगोली का थाल सजाकर नहीं बैठा था. किसी ने दरवाजे पर हथेलियों की थाप नहीं ली. कोई इंतजार में नहीं था रोली कुमकुम लिए स्वागत का शगुन करने को. उल्टे करने को बहुत सारे काम थे. दीवारों के रंग सूखे नहीं थे, लकड़ी का काम अधूरा ही पड़ा था अभी, सामान कहीं से लोड कराना था कहीं उतरवाना था. कितने लोग थे पेमेंट के इंतजार में. कितना ही रखो हिसाब कुछ न कुछ गड़बड़ा ही जा रहा था. थक के चूर था जिस्म कुछ भी महसूस करने की गुंजाईश के बिना बस भागते-दौड़ते हुए धरती एक कोने पर अपना नाम लिखना था, सो लिख दिया. यूँ सुरक्षा जैसा कुछ होता नहीं फिर भी कुछ वहम बचे रहें तो जीना जरा आसान हो जाता है यही सोचकर सर पर एक छत होने का सुख आंचल में बाँधने चल दी थी. अपने लिए या अपनों के लिए पता नहीं.

इस दौड़-भाग में ही एक रोज धरती के इस कोने से बतियाने बैठी थी. बारिश थी उस रोज बहुत. मिट्टी की खुशबू बारिश के लिबास में सजकर अलग ही रूआब में थी. मैंने हथेलियों में जितनी आ सकती थी उतनी मिट्टी भरी. दोनों हथेलियों को कसकर भींच लिया था. बरिश बहुत तेज़ हो गयी थी. हथेलियों से मिट्टी बहते हुए सरक रही थी. मैं भी सरक रही थी धीरे-धीरे. यह धरती के उस कोने से जुड़ने के पल थे...मोहब्बत के पल थे. मैं उस पल मिट्टी हुई जा रही थी. मिट्टी में समाती जा रही थी. कुछ ही देर में बारिश, मिट्टी और मुझमें कोई अंतर नहीं बचा था. उसी रोज उसी मिट्टी में मैंने जूही का एक छोटा सा पौधा लगाया था. सोचा था यह लम्हा सहेज दूँगी इस पौधे में. मिट्टी से प्यार करिए, बारिश से प्यार करिए वो कभी धोखा नहीं देती. उस लम्हे को खूब प्यार से सहेजा धरती के उस कोने ने. जूही का वह नन्हा पौधा अब बड़ा हो गया है. बेल बनकर चढने को आतुर है. अलग-अलग शाखाएं इधर-उधर कूदफांद करते हुए हाथ-पाँव मार रही हैं.

आँखें मलते हुए इस नन्हे की हथेलियों पर पहली-पहली कलियाँ आयीं हैं. जूही की कच्ची कलियाँ. गुलाबी रंग है इनका. अभी खिली नहीं हैं, अभी ठीक से मुस्कुराना भी नहीं सीखा है इन्होंने. बस कि आवाज देकर मुझे पुकारना सीखा है. मैं देर तक इन कलियों के करीब बैठी रही. जूही की इस बेल के बहाने मैंने खुद को ही तो रोपा था मिट्टी में, देखती हूँ जड़ें पकड़ ली हैं...जिंदगी का सफर चल पड़ा है. संघर्ष की मिट्टी में ख्वाहिशों की बेल उगने लगी है. कलियों के खिलने में, खुशबू बिखरने में अभी वक़्त है लेकिन बिखरेगी जरूर.

यह खुशबू इस धरती से तमाम नाउम्मीदी को मिटाएगी.
आमीन !

Saturday, September 14, 2019

ऊँचाई एक भ्रम है


जब मैं छोटी थी तब बहुत तेज़-तेज़ चढ़ा करती थी सीढ़ियाँ. एक सांस में झट से ऊपर जा पहुँचती थी, दूसरी ही सांस में सरर्र से नीचे. सीढियां उतरते हुए नहीं लगभग फिसलते हुए. खेल था ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना. इस चढने और उतरने के दौरान बीच का हिस्सा कब गुजर जाता पता ही नहीं चलता. मुझे हमेशा पहली सीढ़ी और आखिरी सीढ़ी की अनुभति ही गुगुदाती थी. माँ की आवाज आती और मैं सर्रर्र से नीचे, पतंगों का खेल देखना हो सर्रर्र से ऊपर.

तब मेरे लिए ऊपर का अर्थ सिर्फ पतंगों से भरा आसमान, पंछियों की टोली, नीला आसमान और वो एकांत था जिसमें मुझे सुख मिलता था और नीचे का अर्थ था माँ की पुकार, जिम्मेदार बेटी के हिस्से के कुछ काम, चीज़ों को ठीक से जमाना, मेहमानों की आवभगत. ऐसा नहीं कि नीचे आना मुझे बुरा लगता था कि बुरे भले की समझ ही कहाँ थी. लेकिन यह सच है कि सीढ़ियों वाला खेल मुझे पसंद था.

इस खेल में ऊपर चढने का वो अर्थ नहीं था जिसे सफलता से जोड़ा जाता है, यह बाद में समझ में आया. जब से समझ में आया ऊपर चढने का रूमान जाता रहा. अब यह आनंद नीचे उतरने में आने लगा. नदियों में, पोखरों में, समन्दर में उतरने का आनंद. नीचे उतरते हुए पैरों को धरती पर जमाये रखने का आनंद.

असल आनंद साथ का है यह सबसे बाद में समझ में आया. साथ खुद का. सीढियां सिर्फ माध्यम हैं ऊँचाई एक भ्रम है. गहराई महत्वपूर्ण है. गहराई में उतरते हुए पैरों को जमाये रखना, डूबने की इच्छा के साथ डूबना भी.

माँ की पुकार गहराई की पुकार थी. आज भी माँ की पुकार तमाम सीढ़ियों को भरभराकर गिरा देती है. चाय बनाते हुए मुस्कुराती हूँ. अपने भीतर की सीढियां उतरते हुए अपने भीतर की नदी में छलांग लगा देती हूँ....छपाक!

(इश्क़ शहर, डूबता मन )

Friday, September 13, 2019

बारिश का बोसा और सितम्बर


पीले फूलों में आस भर देता है
तेज़ कर देता है खिलखिलाहटों की लय
बिखेरता है धरती पर मोहब्बत के बीज
उदास ख़बरों की उदासी पोंछता है
बंधाता है ढाढस
बारिश का बोसा देता है सितम्बर...