Thursday, August 25, 2016

मैं सुख में सिर्फ रो सकती हूँ- सिल्विया प्लाथ



सत्रहवाँ साल, सिल्विया प्लाथ का ख़त उसकी माँ के नाम

२७ अक्टूबर १९३२ को अमेरिका में जन्मी सिल्विया ज़िन्दगी से इस कदर भरपूर थी कि क़ायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में धड़कती ज़िन्दगी को पी लेना चाहती थी, जी लेना चाहती थी...वो इस कदर जीना चाहती थी कि महज़ इकतीस बरस की उम्र में ही अपनी ज़िन्दगी गँवा बैठी। जो लोग सुसाईड करते हैं वो ज़िन्दगी से हारे हुए नहीं होते, असल में वो ज़िन्दगी से बहुत ज़्यादा भरे होते हैं...शायद किसी लम्हे में कोई तालमेल बिगड़ जाता है और वो ज़िन्दगी में रत्ती भर भी आयी कमी को सह नहीं पाते...क्या जाने ये सच हो भी, न भी हो...लेकिन सिल्विया प्लाथ का यह ख़त देखकर मालूम तो ऐसा ही होता है। ये ख़त सिल्विया ने अपनी माँ को सोलह साल पूरे होने पर लिखा था, तारीख ठीक ठीक नहीं मिलती इसकी- प्रतिभा 


माँ,
मुझे सत्रहवें साल की इस खुशबू को, उमंग को सहेजकर रखना है। हर दिन बेशकीमती है। मुझे यह सोचकर ही अजीब लगता है कि जैसे जैसे मैं बड़ी होती जाऊँगी, धीरे-धीरे ये लम्हे बीत जायेंगे...यह मेरी ज़िन्दगी का सबसे सुंदर समय है...
अगर मैं अपने पिछले बीते हुए सोलह बरसों की बात करूँ तो मैंने सुख और दुःख दोनों को ही देखा है। लेकिन अब दोनों की ही कोई कीमत नहीं। मैं अब तक अपने बारे में अनजान ही हूँ। शायद हमेशा ही रहूँगी। लेकिन मैं आज़ाद महसूस करती हूँ...बिना किसी भी ज़िम्मेदारी के बंधन के...


मैं चाहती हूँ कि ज़िन्दगी मुझे बहुत प्यार करे। मैं इन लम्हों में बहुत खुश हूँ। अपनी डेस्क पर बैठी हूँ। खिड़की से बाहर घर के चारों ओर लगे पेड़ों को देख रही हूँ, गली के दोनों ओर लगे पेड़ों को भी। मैं हमेशा चीज़ों को देखना और महसूस करना चाहती हूँ, ज़िन्दगी को छूना चाहती हूँ, उसमें रच बस जाना चाहती हूँ। लेकिन इस तरह भी नहीं कि खुद को महसूस न कर सकूँ....
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माँ, मुझे बड़ा होने से डर लगता है। मुझे शादी करने से डर लगता है। मुझे तीनों वक़्त खाना बनाने से दूर ही रखना, मुझे रोज़मर्रा के जो काम होते हैं उनसे उकताहट होती है।
मैं आज़ाद रहना चाहती हूँ। मैं पूरी दुनियाँ के बारे में जानना चाहती हूँ...मुझे लगता है कि मैं चाहती हूँ कि मुझे ख़ुदा की लाडली लड़की के तौर पे जाना जाये। सोचती हूँ कि अगर मैं इस देह में न होती तो? लेकिन मैं तो अपनी देह को, अपने चेहरे को, अपनी साँसों को भी बहुत प्यार करती हूँ।

मुझे मालूम है कि मैं बहुत लम्बी हूँ और मेरी नाक मोटी है, फिर भी मैं आईने के सामने इतराती हूँ, बार-बार देखती हूँ कि मैं कितनी सुंदर दिखती हूँ। मैंने अपने दिमाग में अपनी एक छवि बनाई है कि मैं खूबसूरत हूँ। क्या यह गलत है कि मैं अपने बारे में इस तरह सोचती हूँ? ओह, कभी-कभी लगता है कि क्या बेवकूफ़ी की बातें मैंने लिखीं, कितनी नाटकीय।

वैसे परफ़ेक्शन क्या है...क्या कभी भी मैं वहाँ पहुँच सकूँगी? शायद कभी नहीं। मेरी कवितायें, मेरी पेंटिंग्स, मेरी कहानियाँ...सब अधूरी अभिव्यक्तियाँ....

एक वक़्त आएगा जब मुझे खुद का सामना करना होगा...करना ही होगा। अभी भी सोचती हूँ...कैसी होगी मेरी आने वाली ज़िन्दगी, कैसा होगा मेरा कॉलेज...मेरा करियर? एक अनिश्चितता है...जिससे डर भी लगता है, जाने मेरे लिए क्या बेहतर होगा, मुझे पता नहीं। मुझे तो आज़ादी पसंद है। मैं बंदिशों की निंदा करती हूँ। हाँ, मुझे मालूम है कि मैं उतनी भी समझदार नहीं हूँ। मेरे सामने रास्ते खुले हुए हैं लेकिन वो किधर जा रहे हैं, किन मंज़िलों की तरफ, मैं नहीं देख पा रही हूँ...

लेकिन मैं सब भूलकर खुद को बहुत प्यार करती हूँ। जानती हूँ, अभी तो मेरी ज़िन्दगी की शुरुआत ही है, लेकिन मैं मजबूत हूँ...

माँ, तुम मुझसे पूछती हो न कि मैं क्यों अपना जीवन लिखने में जाया कर रही हूँ,
क्या मुझे इसमें आनंद आता है
क्या इसका कोई फ़ायदा भी है
इन सबसे ऊपर क्या इससे कुछ कमाई भी होगी
अगर नहीं, तो इस सबका क्या फ़ायदा?

माँ, मैं लिखती हूँ सिर्फ इसलिये
कि मेरे भीतर एक आवाज़ है
और वो आवाज़ हमेशा नहीं रहेगी...

सच कहूँ माँ, मैं सुख में सिर्फ रो सकती हूँ।

तुम्हारी प्यारी और खुश बेटी
सिवी

चलने से पहले....



जब चलना चाहती हूँ तो ठहर जाती हूँ
देर तक ठहरी रहती हूँ
टटोलती हूँ
अपने कदमों को

अपने चलने की इच्छा को
क़दमों के चलने की इच्छा से मिलाती हूँ
बैठ जाती हूँ

जब मैं चलना चाहती हूँ
तब आहिस्ता-आहिस्ता बटोरती हूँ आहटें
उस सबकी जो चल रहा होता है
सिर्फ स्कूटर या गाडियों की नहीं
चल रहे दिशाभ्रम की
उन बातों की जिनमें चलना शामिल है
उस हवा के चलने को महसूसती हूँ
जो छूकर गुजरी नहीं ज़माने से
उन ख्वाबों की
जिनमें हम दो कदम ही सही
साथ चले थे
उन उम्मीदों की जिनसे झरता रहता है
तुम्हारा उम्र भर साथ चलने का वादा
टप्प टप्प टप्प...

जब मैं चलना चाहती हूँ
तो देखती हूँ
किस कदर ठहर गया है सब कुछ
घडी भी चलती सी नहीं लगती उस वक़्त
उसकी सुइयां एक दुसरे में उलझकर
सुस्ता रही हों जैसे
दीवार पर रेंगती छिपकली
भी घंटों एक ही जगह रुकी रहती है
एक ही तरह से
नाक के पास ले जाती हूँ हथेली
कि सांस भी चल रही है क्या
जिन्दगी का तो पता नहीं

ये भागदौड़ के चक्कर में
चलना कबका छूट गया था
और ये जान सकना भी कि
चलना और भागना दो अलग बातें हैं...

चलने से पहले ठहरना जरूरी था...


Monday, August 22, 2016

मैं तुमसे कम भी नहीं हूँ



अदबी ख़ुतूत- हार्पर ली का पत्र अपनी प्रशंसिका के नाम 

मशहूर अमेरिकन लेखिका हार्पर ली से उनकी प्रशंसिका ने उनकी एक तस्वीर मांगी। वो कोई फेसबुक या ट्विटर का जमाना तो था नहीं की फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते ही उनकी तमाम तस्वीरें झोली में आ गिरें। और प्रशंसिका तो अपनी प्रिय लेखिका की तस्वीर सहेजना चाहती थी, वो भी उनके हस्ताक्षर वाली। ली के पास भी उस वक़्त कोई तस्वीर थी नहीं, लेकिन लेखक अपने पाठक के प्रति उदार न हुआ तो काहे का लेखक। ली ने उस प्रशंसिका को तुरंत एक ख़त लिख भेजा, देखिये न छोटे से इस ख़त में कितनी खूबसूरत बात है- प्रतिभा 
06/07/206

प्रिय जेरेमी,

इस वक़्त तो मेरे पास कोई ऐसी तस्वीर नहीं है जो मैं तुम्हें भेज सकूँ। लेकिन मैं तुम्हें कुछ लाइनें लिखकर भेज रही हूँ-

जब तुम बड़ी होगी, यह सच खुद भी याद रखना और सबको बताना भी, कि तुमसे कभी किसी का दिल न दुखे। कभी किसी को ये मत जताना कि तुम इस दुनिया की बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। गरीब या अमीर किसी को भी नहीं लेकिन प्रिय, किसी की भी आँख में झांकना और कहना, ‘हो सकता है मैं तुमसे बेहतर नहीं हूँ, लेकिन निश्चित रूप मैं तुमसे कम भी नहीं हूँ।’

हार्पर ली

Thursday, August 18, 2016

भीतर बाहर की यात्राओं के सुर तलाशती है “आज़ादी मेरा ब्राण्ड“



कोई भी यात्रा साहित्य क्यों लिखा जाना चाहिए, क्यों पढ़ा जाना चाहिए? आखिर कौन सी हैं वो जरूरी चीजें जो एक यात्रा के दौरान लिए गये नोट्स को, अनुभवों को यात्रा साहित्य बनाते हैं। क्या बाहर को चलना ही यात्रा है या बाहर चलने की शुरुआत पहले भीतर चलने से होती है। वो कौन सी चीजें हंै जो एक पर्यटक को यायावर से अलग करती हंै। अनुराधा बेनीवाल की पुस्तक “आजादी मेरा ब्राण्ड“ इन्हीं सवालों के आसपास से गुजरती है। यह किताब विदेश यात्राओं के दौरान हुए अनुभवों से गुजरते हुए भारतीय समाज के दरवाजे पर स्त्री चेतना को लेकर बंद कुंडियों को खटखटाती है। वो सवालों के जवाब नहीं परोसती बल्कि ढेर सारे सवालों को जन्म देती है।

कई लिहाज से यह पुस्तक महत्वपूर्ण है। एक तो यह पुस्तक ऐसे वक्त मंे आई है जब सूचनाओं और अभिव्यक्तियों का एक खुला समंदर हमारे इर्द-गिर्द लहरा रहा है इसके बावजूद यात्रा साहित्य में अब तक स्त्री यायावरों की जगह बहुत ज्यादा नहीं है। समूचे यात्रा साहित्य को देखें तो भी स्त्रियों के नाम ज्यादा सुनने में नहीं आते हैं।

जिस देश में एक लड़की दुपट्टे संभालने की कला में प्रवीणता हासिल करते हुए, बढ़ते कद के साथ झुकती गरदन और धीमी होती आवाज़ ताकीदों के साथ बड़ी होती हो, जहां एक बड़ी उम्र की लड़की को घर से अकेले भेजने पर अव्वल तो पाबंदियां ही हों लेकिन अगर भेजना ही पड़े तो उसकी सुरक्षा के लिए साथ में चार साल के भाई को भेजने का रिवाज हो, अगर पाबंदियों में जरा नर्मी आये तो शाम को सूरज ढलने से पहले वापस लौट आने की हिदायत रहती हो उस देश में स्त्रियों द्वारा लिखे गये यात्रा साहित्य की कमी को समझा जा सकता है। ऐसे में आजादी मेरा ब्राण्ड एक जरूरी किताब लगती है।

अनुराधा हरियाणा के रोहतक जिले के खेड़ी गांव में 1986 में जन्मी एक स्त्री है। उसकी यात्रा न तो किसी काम के सिलसिले में की गई यात्रा है न जिंदगी की मुश्किलों से भागकर कहीं चले जाने की जिद से जन्मी है। एक तथाकथित आदर्श और सफल ;सैट्ल्ड जिसे कहती है दुनिया) लड़की को आखिर वो कौन सी चीज है जो खलबला के रख देती है...जिसकी तलाश में वो बिना ज्यादा रुपया, पैसा या साधन के एक बैकपैक के साथ निकल पड़ती है। वो खोज है अपने होने की। एक स्त्री किस तरह सामाजिक ढांचे में पलती है, बड़ी होती है, सफल भी होती है लेकिन अपने बारे में, अपनी भावनाओं के बारे में लगातार अनभिज्ञ रहती है। संभवतः यही खलबलाहट उसे रास्तों पर उतारती है और एक शतरंज की नेशनल चैंपियन बैकपैकर बन जाती है। जेब में यूरोप का नक्शा, थोड़े से पैसे और ढेर सारा उत्साह उसे यायावरी को उन्मुख करता है। वो जानती है कि अगर आपको दुनिया को देखना, समझना और महसूस करना है, धरती के कोने-कोने से बात करनी है तो महंगे होटलों में रुकने, महंगा खाना खाने जैसी सुविधाभोगी आदतों से निकलना होगा। कम खर्च में ज्यादा घूमने के तरीके खोजने होंगे और यह किताब बताती है कि किस तरह

घूमने के दौरान आई आर्थिक तंगी से जूझने के लिए कई बार वहीं किसी भी तरह का काम करके (क्योंकि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता) पैसे भी कमाने होते हैं और अगर कभी कैमरा-वैमरा खो जाए तो खुद को समझाना भी होता है कि जो अनुभव साथ हैं, वो कैमरे में दर्ज तस्वीरों से कहीं ज्यादा कीमती हैं।

सामान्य से काफी अच्छा जीवन जीते हुए, सफलता के उच्चतम पायदानों पर खड़ी होने के बावजूद अगर कोई लड़की अपने भीतर की उथल-पुथल को सहेज पाती है, उसे सींच पाती है और एक रोज उसी उथल-पुथल का हाथ थामकर निकल पड़ती है दुनिया घूमने तो उस उथल-पुथल की आवाज को सुना जाना जरूरी है। इस किताब से गुजरते हुए कई बार वो आवाज सुनाई देती है, कभी किताब के पन्नों से, कभी अपने भीतर से। अनुराधा लिखती है-

“मैं पैदा हुई, काॅलेज गई, शतरंज खेली, नेशनल चैम्पियन बनी, अंग्रेजी में एम. ए. किया, लाॅ किया, पत्रकारिता की पढ़ाई की, प्रेम विवाह कर घर बसाया। कहने को परफेक्ट लाईफ। और क्या चाहिए होता है एक लड़की को...कुछ नहीं न? लेकिन वह क्या था जिसे ढूंढने को मैं भीतर से उबल रही थी। मैं आजाद देश की आजाद नागरिक होकर भी कौन सी स्वतंत्रता की बात सोच रही थी?“ अनुराधा बेनीवाल की किताब आजादी मेरा ब्राण्ड को उसकी इसी उहापोह के बरअक्स पढ़ा जाने पर तमाम सवालों के जवाब भी मिलते हैं और बहुतेरे सवाल भी। यह किताब एक अकेली औरत की घुम्मकड़ी के अनुभव हैें।

यह किताब यूरोप के तमाम देशों की यात्राओं की किताब है जो पाठक को कई यात्राओं में ले जाती है। लंदन, ब्रसेल्स, पेरिस, एम्सटर्डम, बर्लिन, प्राग, ब्रातिस्लावा, बुडपोस्ट, इंसब्रुक और बर्न घूमते हुए अनुराधा के जे़हन में हिंदुस्तान का समाज, उस समाज में स्त्रियों के लिए खड़ी चुनौतियां, सामाजीकरण किस तरह स्त्रियों की सोचने और महसूसने को प्रभावित करता है आदि बातें लगातार चलती रहती हैं। पेरिस में जूही और हरेन्द्र से हुई उसकी मुलाकात उसे यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि देश की सीमाओं को पार करके, खुलेपन के नाम पर दूसरे देशों की संस्कृतियों को अपनाने के बावजूद भारतीय पुरुष सामाजीकरण के उस वर्चस्व के शिकंजे में ही कैद हैं जहां दूसरी स्त्री प्राप्त करने की वस्तु और अपनी पत्नी छुपाकर रखने की चीज है। खुद आधुनिकता और खुलेपन की तलाश में कई स्त्रियों से संबंध रखने वाला पुरुष किस तरह अपनी पत्नी के बारे में मानसिक कसावट में है, किस तरह फेसबुक पर परफेक्ट फैमिली के इश्तिहार चिपकाती स्त्रियां भीतर ही भीतर घुट रही हैं, बेचैन हैं। देश चाहे हिंदुस्तान हो या पेरिस।

अनुराधा कहती हैं कि “कैसे निकल जाऊं घर से, यों ही? घरवाले जाने देंगे? अकेले कैसे जाऊं? कितना सेफ है यों ही अनजान जगहों पर जाना? हथियार लेकर जाऊं? टिकट-विकट की बुकिंग कैसे होगी? कहां रहूंगी? क्या खाऊंगी? जैसे सवाल अगर आपके मन में हैं तो आपका मन अभी तक सच में घूमने का नहीं हुआ है। जब होगा, तब ये सवाल नहीं होंगे।”

जैसे ही हम यात्रा के लिए कदम बाहर निकालते हैं बहुत सारे डर खुद-ब-खुद ढेर हो जाते हैं। तमाम सवाल सिरे से ख़ारिज हो जाते हैं। अनुभवों का एक अलग ही संसार जन्म लेता है। ऐसा संसार जिसमें एक यात्री होते हुए तो परिष्कार होता ही है सुधी पाठक के तौर पर भी भीतर कुछ आंदोलित होता महसूस होता है। किस तरह एक यात्रा न सिर्फ दूसरे देशों की संस्कृतियांे, वहां के रहन-सहन और लोगों के व्यवहार से जोड़ती है और किस तरह अपने देश और समाज में जड़े जमा चुकीं कुछ रवायतों पर प्रश्न उठाना सिखाती है यह इस पुस्तक को पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है। तमाम देशों की संस्कृतियों के बीच यात्राएं ही वो पुल हैं जो हमें भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सीमाओं को तोड़ती हैं। एक-दूसरे से सीखने को उद्यत करती हैं और हमें असल में मानवीय होना सिखाती हैं।

लेकिन इस सबके लिए जरूरी है एक यायावर मन होना। एक घुम्मकड़ को अपने भीतर होने वाली खलबली को समझना होता है, उसे सहेजना होता है, खाद पानी देकर सींचना होता है। दुनिया घूमने की इच्छा असल में मात्र घूमी हुई जगहों पर टिकमार्क करना, फेसबुक अपडेट या कुछ लिखकर वाहवाही पाने से ऊपर होती है। तब ही यात्रा अपना असल काम करती है, वो यात्री को बाहर के रास्तों पर चलाते हुए भीतर ले जाती है, भीतर की तमाम जड़ताओं को धीरे-धीरे तोड़ना शुरू करती है। यही जड़ताएं यात्रा वृत्तांत को पढ़ते हुए भी टूटती हैं। संभवतः यही वजह है कि एक यात्री, देश, धर्म जाति, संप्रदाय जैसी बंदिशों से लगातार आजाद होता जाता है। इस पुस्तक में भी सबसे पहले एक स्त्री होने की तमाम उन वर्जनाओं के टूटने की आवाज़ सुनाई देती है जो हिंदुस्तान में स्त्री की परवरिश से लेकर उसकी मृत्यु तक लगातार पैबस्त रहती है। एक स्त्री की आजादी सिर्फ उसके पहनावे, बोली, देर रात घूमने किसी के साथ भी सो सकने से ही नहीं तय होती है बल्कि एक व्यक्ति के तौर पर अपने इमोशंस, अपनी हारमोनल जरूरतों के प्रति सहज होना आजादी का असल मतलब है।

एक झलक देखिए तो किस तरह एक यात्रा में अपने भीतर की तमाम गिरहों का अंदाजा मिलता है।

“जितनी गिरहें जिं़दगी की हैं, आजादी की उससे ज्यादा ही होंगी। एक को खोलिए तो दूसरा सामने एंेठा रहता है। ये सब सामाजिक सभ्यता के निर्माण की गांठे हैं, जिनसे जीवन को भले स्थायित्व मिला लेकिन पग-पग पर उसकी चाल को झटका लगा। अब मुझे नहीं मिल सकी कभी। वह ऐसी कोई बड़ी बात न थी। उसे मेरा समाज, मुझे दे सकता था। उसे मेरे आसपास के लोग मुझे दे सकते थे। परिचित और अपरिचित दोनों तरह के लोगों से वह मुझे मिलनी चाहिए थी केवल चल सकनेे की आजादी। टैम बेटैम, बेफिक्र-बिंदास, हंसते-सिर उठाए सड़क पर निकल सकने की आजादी। कुछ अनहोनी न हो जाए, इसकी चिंता किए बगैर, अकेले कहीं भी चल पड़ने की आजादी। घूमते-फिरते थक जाएं तो अकेले पार्क में बैठकर सुस्ता सकने की आजादी। नदी किनारे भटकते हुए हवा के साथ झूम सकने की आजादी जो मेरे मनुष्य होने के अहसास को गरिमा भी देती है और ठोस यकीन भी।“

जैसा कि पुस्तक की भूमिका में स्वानंद किरकिरे कहते हैं कि इस पुस्तक की भाषा इसकी जान है। लेखिका कोई साहित्यकार नहीं है और बेहद सादा तरह से अपने अनुभवों को दर्ज करती चलती हैं, इसी सादगी, साफगोई के चलते किताब सिर्फ बुकशेल्फ में नहीं दिल में जगह बनाती है। यह बात भी समझ में आती है कि दिल से महसूस किये हुए को दर्ज करना असल में इतना मुश्किल भी नहीं, बस कि हमें अपने महसूस करने और लिखने के बीच के संबंध को ईमानदारी से निभाना आता हो, बगैर भाषाई परिमार्जन की परवाह किये बगैर विधा की फिक्र किए। यह किताब कभी डायरी की शक्ल लेना हुआ नज़र आता है, कभी संस्मरण की, जैसा कि किताब के आवरण पर दर्ज भी है कि ”एक हरियाणवी छोरी की यूरोप-घुम्मकड़ी के संस्मरणों की श्रंृखला।“ यानी किस तरह साहित्य की विधाएं एक-दूसरे को आत्मसात् करती चलती हैं यह किताब इसका उदाहरण भी है।

अनुराधा जानती है कि आजादी न लेने की चीज़ है न देने की। छीनी भी तो क्या-आजादी, वो तो जीने की चीज है। सो वो जीने निकल पड़ी है ये कहते हुए कि “आज मैं घूमने निकली हूं, दुनिया घूमने, अकेेले, बिना किसी मकसद के, एकदम अवारा, बेफिक्र, बेपरवाह। आज मैं जीने निकली हूं। मैं अपनी खुशियां, अपने ग़म, अपनी हंसी, अपने आंसू खोजने निकली हूं...“

इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक भी किसी यात्रा पर निकल पड़ते हैं अपने भीतर उस खलबली की आवाज को फिर से सुन पाने की यात्रा में जिसे दुनियादारी और तथाकथित समझदारी ने कहीं दबा दिया था...

पुस्तक-आज़ादी मेरा ब्राण्ड
लेखिका-अनुराधा बेनीवाल
मूल्य- रु 199
प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन


Sunday, August 14, 2016

आज़ादी लेकिन एक वर्जित शब्द हो गया...-देवयानी भरद्वाज


चौराहे पर तिरंगा बेच रहे बच्चे के हाथ में
झंडा मुस्कराया
बच्चे ने कहा भारत माता की जय
और हाथ से गिरा सिक्का उठाने बीच सड़क की ओर भागा

खाली पड़ी इमारत में
बस्तर के जंगल में
राजमार्ग के पास खेत में
लहुलुहान मिली किशोरी के पिता को
जब डाक्टरों ने कहा
थाने में रपट लिखना फिर आना
अस्पताल की ईमारत पर लहराता झंडा मुस्कराया

सोलह बरस के बाद
इरोम ने अनशन तोडा
आज़ाद भारत की सरकारें
कुछ और मगरूर हुई
राजभवन की दीवार पर गाँधी ने ऐनक सरकाया
झंडे के साथ वे भी मुस्कराए

आंबेडकर के चरणों में
कमल का फूल अर्पित किया गया
झंडा मुस्कराया

बुलडोज़र उठा कर ले जा रहे थे
रंभाती हुई गायों को
किसी को उसके निवाले की लिए पीटा
कोई अपने रोज़गार के लिए पिटा
दारू की बोतल में पानी बेचने वाला
सबके हिस्से का माल ले कर हो गया फरार
लाल किले पर फहराया गया तिरंगा
सबकी सफ़ेद पोशाकों पर
लाल छींटे चमक रहे थे
आसमान में झंडा मुस्करा रहा था

सब तरफ है जश्न-ए-आज़ादी
आज़ादी लेकिन एक वर्जित शब्द हो गया
जनता की आँखों में धूल है

जिनकी आँखों में नहीं धूल
उनके लिए त्रिशूल है
झंडा है कि मुस्करा रहा है...