Monday, April 22, 2019

'ये कविताओं के पंख फ़ैलाने के दिन हैं '


'क' से कविता यह नाम नया है लेकिन इस भावना वाला काम तो मैं तकरीबन 60-65 सालों से कर रहा हूँ कि दूसरों की कविताओं को सुनाना. वहां भी दूसरों की कविताओं को सुनाना जहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है मेरी अपनी कविताओं को सुनाने के लिये क्योंकि मुझे लगता है कि जो मुझसे भी अच्छी कवितायेँ लिखी गयी हैं वो भी उन सबको सुनानी चाहिए जो कविताओं से प्रेम करते हैं.' 
- नरेश सक्सेना 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

'क से कविता क से क्या कहने. मेरा जो मानना है कि कविता को जन तक कैसे ले जाएँ उसका यह बहुत अच्छा उपक्रम है. जनता को कविता की समीक्षा करने का मौका मिलता है मेरे ख्याल से यह बहुत बड़ी बात है. कविता अगर जिन्दा रहेगी तो लिखने से ज्यादा ऐसे कार्यक्रमों से जिन्दा रहेगी. नये नए ज्यादा से ज्यादा लोगों का कार्यक्रम से जुड़ना ही कार्यक्रम की उपलब्धि है.
- लाल बहादुर वर्मा 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

मुझे कार्यक्रम में आकर बहुत अच्छा लगा. मैं देहरादून का हूँ कविता के कार्यक्रम में इतने लोगों का जमा होना, बराबर बने रहना है यह बड़ी बात है. कार्यक्रम का कंटेंट, संचालन, पूरी बुनावट में जो तारतम्यता थी वो कमाल की थी. इसे जिस सादगी जिस सहज भाव से चलाया जा रहा है इसे ऐसे ही चलने दें.'
- हमाद फारुखी 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

कविता प्रेम, सच्चाई, मनुष्यता की ओर ले जाती है. हम सबको मिलकर स्कूलों में कॉलेजों में इस तरह के कार्यक्रम को जाना चाहिए और हम सबको छात्रों को इससे जोड़ने का प्रयास करना चाहिए.-
इन्द्रजीत सिंह 28 अप्रैल 'क' से कविता

एक बेहद सादा सा, सुंदर सा भाव था मन में कि कोई ऐसा ठीहा हो जहाँ दो घड़ी सुकून मिले. रोजमर्रा की आपाधापी से अर्ध विराम सा ठहरना हो सके. जहाँ होड़ न हो, जहाँ तालियों का शोर न हो, जहाँ छा जाने की इच्छा न हो, बस हो मिलना अपनी प्रिय कविताओं से और कविता प्रेमियों से. (अपनी कविता के प्रेमियों से नहीं).और संग बैठकर पीनी हो एक कप चाय. इस विचार ने बहुत मोहब्बत के साथ कदम रखा शहर देहरादून ने 23 अप्रैल 2016 को और दो साल पूरे होते होते यह उत्तरकाशी, श्रीनगर, हल्द्वानी, रुद्रपुर, खटीमा, टिहरी, रुड़की, पौड़ी, अगस्त्यमुनि, गोपेश्वर, लोहाघाट (चम्पावत), पिथौरागढ़,बागेश्वर और अल्मोड़ा तक इसकी खुशबू बिखरने लगी. 

कब सुभाष लोकेश और प्रतिभा पीछे छूटते चले गए और रमन नौटियाल, भास्कर, हेम,पंत शुभंकर, ऋषभ, मोहन गोडबोले निशांत, प्रमोद, विकास, राजेश, नीरज नैथानी, नीरज भट्ट, सिद्धेश्वर जी, प्रभात उप्रेती, अनिल कार्की, महेश पुनेठा, मनोहर चमोली, गजेन्द्र रौतेला, भवानी शंकर, पियूष आदि इस कारवां को आगे बढ़ाने लगे पता ही न चला. गीता गैरोला दी तो सबकी प्यारी लाडली दी हैं उन्होंने इसकी मशाल जिस तरह थामी कि मोहब्बत की आंच थोड़ी और बढ़ गयी. 

देहरादून में नूतन गैरोला, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, नीलम प्रभा वर्मा दी ने लगातार अपने प्रयासों से और स्नेह से इसे सींचा. कल्पना संगीता, कान्ता, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, सतपाल गाँधी, सुरभि रावत, स्वाति सिंह, नन्ही तनिष्का सहित सैकड़ों लोग नियमित भागीदार बनते गये. कार्यक्रम की सफलता असल में शहर की सफलता है. देहरादून को अब बारिशें ही नहीं कवितायेँ भी सींच रही हैं. उत्तराखंड के अन्य शहरों को भी.

इस कार्यक्रम को व्यक्ति का नहीं, समूचे शहर का होना था. व्यक्तियों को इसमें शामिल होना था. कहीं पहुंचना नहीं था, कुछ हासिल नहीं करना था बस कि हर बैठकी का सुख लेना था, लोगों से मिलने का सुख, सुकून से दो घड़ी बैठने का सुख, प्यारी कविताओं को पढने का सुख, सुनने का सुख.

बोलने और लिखने की होड़ के इस समय में यह पढ़ने और सुनने की बैठकी बनी. लेखकों की नहीं पाठकों की बैठकी. शहरों ने इस कार्यक्रम को अपने लाड़ प्यार से सींचा. जो लोग बैठकों में शामिल होने आये थे वो इसके होकर रह गए. अब घर हो या दफ्तर कुछ भी प्लान करते समय महीने के आखिरी इतवार की शाम पहले ही बुक कर दी जाने लगी. बच्चे, युवा, साहित्यकार, बिजनेसमैन, गृहणी, शिक्षक सब शामिल हुए. सबने अपनी प्रिय कवितायेँ पढ़ीं, कितनों ने पहली बार पढ़ीं. कितनों ने ही यहाँ आकर समझा पढने का असल ढब. सुना कि किसी को कोई कविता क्योंकर अच्छी लगती है आखिर.

यह कोई नया विचार नहीं था क्योंकि बहुत से लोग मिले जिन्होंने कहा कि ऐसा तो हम सालों से कर रहे थे. कुछ बैठकों में शामिल भी हुए हम कुछ के बारे में सुना भी. महेश पुनेठा पिथौरागढ़ में 'जहान-ए-कविता' चला ही रहे थे. भास्कर भी ऐसे तमाम प्रयोग करते रहे थे. हेम तो हैं ही प्रयोगधर्मी. फिर क्या ख़ास है इन बैठकों में. खास हुआ सबका जुडना. एक नयी जगह में बैठकी की सूचना परिवार में नए सदस्यों की आमद सा लगता.

उत्तराखंड ने इन बैठकों को अलग ही ऊँचाई दी. यहाँ हमें 'मैं' से दूर रहने वाली बात पर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. जो साथी शामिल हुए वो सब स्वयं 'मैं' से बहुत दूर थे दूर हैं. न शोहरत की तलाश, न पीठ पर किसी थपथपाहट की उम्मीद बस कि हर बैठक के बाद होना थोडा और समृद्ध, होना थोड़ा और मनुष्य, और तरल, और सरल.

इन बैठकों में शामिल लोग नाम विहीन से हो जाते थे, चेहरा विहीन. बिना तख्ती वाले लोग इतना सहज महसूस करते कि बैठकों का इंतजार रहने लगा. शहर ने बाहें पसारीं और कार्यक्रम को अपना लिया. हमें न कभी जगह की कोई परेशानी हुई न चाय की. जबकि न हमने चंदा किया न किसी से फण्ड लिया. सब कैसे इतनी आसानी से होता गया के सवाल का एक ही जवाब था प्रेम, कविताओं से प्रेम.

देहरादून में 28 अप्रैल को हुई दूसरी सालाना बैठक असल में राज्य स्तरीय बैठक न हो पाने के बाद आनन-फानन में मासिक बैठक से सालाना बैठक में बदल दी गयी. फिर न पैसे थे न इंतजाम कोई और न ही वक़्त. ज्यादातर साथी शहर में ही नहीं थे. लेकिन जब शहर किसी कार्यक्रम को अपना लेता है तो आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. और यह किसी कार्यक्रम की किसी विचार की सबसे बड़ी सफलता होती है कि उसे व्यक्तिपरक होने से उठाकर समाज से जुड़ जाए. शहर के सारे लोग इसकी ओनरशिप लेते हैं. सबकी चिंता होती है कि कोई कमी न रह जाए. सब मिलकर काम करते हैं, सब मिलकर एक-दूसरे के होने को सेलिब्रेट करते हैं. मेहमान कोई नहीं होता, मेजबान सब. कोई मंच नहीं, माल्यार्पण नहीं, मुख्य अतिथि नहीं, दिया बाती नहीं, किसी का कोई महिमामंडन नहीं. जेब में चवन्नी नहीं थी लेकिन दिल में हौसला था तो निकल पड़े थे सफर
में और देखिये तो कि आज दो बरस में पूरा उत्तराखंड कविता की इन भोली बैठकियों से रोशन है.

क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में लोग मुम्बई से भी आये थे, दिल्ली से भी लखनऊ से भी और उत्तरकाशी से भी. कबीराना थी शाम...फक्कड़ मस्ती, गाँव दुआर पे कहीं बैठकर, चौपाल में, कुएं की जगत पर खेत के किनारे मेड पर बैठकर भी जैसे कबीरी हुआ करती होगी वैसी हो चलीं हैं कविताओं की ये बैठकियां. 
 

Thursday, April 11, 2019

कहानी- स्कूल


- ज्योति नंदा

सुन ऋषि ,कल रात को खूब मजा आया" वो बोली।
"अच्छा। क्या हुआ ? फिर वही , झूठ- मूठ सोने की एक्टिंग "
"नहीं नहीं ,कल मम्मा -पापा को बहुत डांट पड़ी.।
हा हा हा..... ऋषि की हंसी रुक ही नहीं रही थी। मां पापा को भी कभी डांट पड़ती है क्या ? उसने तो कभी देखा ही नहीं था कि माँ को कभी किसी ने डाटा ?
"हंस क्यों रहा है तू ?, रात को अचानक दादी दादू आ गए ,गाँव से, उन्होंने डांटा बड़ा मजा आया। " सुडूप्प ..की आवाज़ के साथ होठों को गोल बना कर नूडल्स खाती है।
क्यों"? मुश्किल से हंसी रोकते हुए ऋषि ने पूछा।
"मम्मा पापा एक कमरे में नहीं सोते इसीलिए और क्या?" उसने व्यंग किया जिस तरह उसे फ़िज़ूल की बातो पे डात पड़ती है वैसे ही दादा ने अपने बेटे को डाटा। मानो कोई रीत हो जो पीढ़ियों से चलती आ रही है। बेवजह बातो पे बड़ो का छोटों को डांटना।
ऋषि झल्लाया "ऐ तू चुतिया है क्या?"
"ऐ ऐ तू पागल , इडियट ,जबान संभाल अपनी न न पुन.. सक हकलाती ज़बान में नया शब्द बोला उसने।

"व्हाट व्हाट.....यु सैड"
तू गन्दी बात बोलेगा तो मै भी बोलूंगी ."
"अच्छा अच्छा ठीक है अब नहीं कहूँगा पलटवार होते ही ऋषि समझौते की मुद्रा में आ गया."पर तूने क्या बोला, न न ??? यह तो कुछ नया है , कहा से सीखी ?
"पता नहीं" अदिति चिढ गयी।
ऋषि समझ गया ज्यादा पूछना ठीक नहीं "अच्छा तू ही बोल अलग सोने के लिए डांट पड़ती है क्या "?
"कल मम्मा पापा मुझे सुलाने के बाद फिर से झगड़ने लगे"
'अरे वाह! बहुत दिनों के बाद तेरे मम्मा पापा ने फाइट की" ऋषि ने चटकारे लेकर कहा.उसकी आँखे चमक से और फ़ैल गयी. ऐसा कुछ जानने कि लालसा में जो वह अक्सर सुनना चाहता है.लेकिन क्यों ? ये वो नहीं जानता।

अदिति मायूसी से बोली "अब तो मम्मा पापा बात ही नहीं करते.बस मेरे पीछे पड़े रहते है,अदिति खाना खालो, नहा लो, पढ़ लो. पर कल फिर से लड़ने लगे" मुँह टेढ़ा कर बोली."हम दिवाली पर गाँव गए थे न वहा भी दादी मम्मा पर गुस्सा कर रही थी एक छोटा भइय्या चाहिए ही चाहिए"
ऋषि परेशां हो गया "अब यह कैसे आएगा "?
"ओहो बुद्धू तुझे कुछ नहीं पता.तेरे मम्मा पापा साथ नहीं रहते न इसीलिए.जब मम्मा पापा एक कमरे में सोते हैं तभी तो छोटा भैय्या आता है." ऋषि इस नए प्राप्त हुय ज्ञान को समझने की कोशिश में लगा हुआ था.
".घर में सबको छोटा भैय्या चाहिए.दादी दादू नानू नानी सबको. पर मम्मा ने बोला उन्हें नहीं चाहिए.पापा से कहा की एक ही बहुत है. जैसे चल रहा है चलने दो, नहीं तो कुछ भी नहीं बचेगा और न मैं बचाउंगी "
"क्या बचाना है?" ऋषि के मन में जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे क्या बचाना है अदिति की माँ को। कही वो कोई सीक्रेट एजेंट तो नहीं है? या फिर सुपर मैन वीमेन के भेष में? उन्हें दुनिया बचानी है।

"यह तो मुझे भी नहीं प.ता फिर पापा उठ कर दूसरे कमरे में चले गए. रात को दादी ,दादू आ गए अचानक और मम्मा पापा को खूब डांटा.मजा आया." ताली बजा कर हसने लगी."सब समझ रहे थे में सो रही हूं पर......ऋषि ने फिर छेड़ा।
"पर तू तो नंबर वन चोरनी है सब सुनती देखती रहती है" ऋषि ने चिढाया .अदिति ने आँखे तरेरी.
"मैं तो रात भर आराम से सोता हूँ अपनी मम्मा के साथ , फिर थोडा ठहरा, गहरी सांस ली "कभी कभी नानी आ जाती है बड़ बड करने लगती है.........
...........अच्छा हुआ तू अलग हो गयी,रात को चैन से सो तो लेती है.....कोई फिजूल की झिक झिक नहीं करता........बुढा तो ना जीने देता है न मरने.....".
"बुड्डा कौन ?"अदिति ब्रेड का टुकड़ा मुह तक ले जाते हुय रुकी.
"नाना और कौन" हा हा...दोनों ने ठहाके लगाये "तेरी मम्मा क्या बोलती है?"
"कुछ नहीं बस सिर के नीचे रखा तकिया कान पे ढँक कर सो जाती है.नानी बड़ बड़ करके चली जाती है".
टन टन टन ......"चल-चल टिफिन टाइम ख़त्म हो गया.तेरी बातें ही नहीं ख़त्म होती".ऋषि ने फटाफट टिफिन समेटा और क्लास की ओर दौड़ गया.अदिति भी बेमन से पीछे हो ली.

दूसरे दिन स्कूल में सुबह से ही अदिति कुछ कहने के लिए उतावली दिख रही थी। जी.के.और मोरल साइंस की साप्ताहिक क्लास में अदिति का कभी मन नहीं लगता था। आज तो बिलकुल भी नहीं.टीचर बड़ों का आदर और माता पिता के सम्मान का महत्तव समझा रही थी। अदिति इस इन्तजार में थी कि कब टन टन की आवाज आये. ऋषि उसका उतावलापन भांप गया."ऐ ,क्या बात है?" वह अदिति के कान में फुसफुसाया.
"झूठ नहीं बोलना चाहिए" टीचेर का स्वर गूंजा.
"मम्मा पापा से बहुत गुस्सा है बोल रही थी तुम हमेशा झूठ बोलते हो" अदिति भी फुसफुसाई .
तभी घंटी बज गयी सारे बच्चे मैदान की तरफ दौड़ पड़े.अदिति और ऋषि अब भी घर का, समाज का और किताबी नैतिकता का भेद समझने की कोशिश कर रहे थे.
"कल मम्मा ऑफिस से आने के बाद थक कर लेटी थी तब पापा ने उन्हें एन्रेर्जी ड्रिंक दिया .उसके बाद मम्मा मुझे बहुत प्यार करने लगी .और......ही ही ...ही...."अदिति मुह पर हाथ रख कर हसने लगी.ऋषि फिर झल्लाया " क्या है जल्दी बता."........खी खी ....और न...और और . मम्मा,पापा को भी प्यार कर रही थी.फिर पापा ने कहा अदिति तू दादी के पास सो जा। मैं नहीं जा रही थी लेकिन दादी और पापा ने बोला सन्डे फिल्म दिखायेंगे और आइसक्रीम खिलायंगे तो मैं चली गयी.""ऐ चटोरी" ऋषि ने फिर चिढाया.
"अरे सुन तो. में तो सुबह वापस मम्मा के पास ही थी"
'"अच्छा ! जादू क्या" ऋषि को मजा आने लगा था.
"मम्मा को तो कुछ भी याद नहीं था. फिर मैंने मम्मा को बताया की उन्होंने पापा की दी हुए एनेर्जी ड्रिंक पी थी तो वह पापा से फिर लड़ने लगी और रोने लगी "तुमने मेरा रेप किया है "
"यह रेप क्या होता है? वो जो टी वी की न्यूज़ में नाना नानी दिनभर सुनते रहते है। जब पूछता हूँ तो चैनल बदल देते है। "
वो होगी कोई मामी पापा के बीच की बात, छोड़ न ,.पर दादी ने पता है.... बताया कि...कि"
क्या ?"
"अब छोटा भइय्या आयेगा हमारे घर "

Tuesday, April 2, 2019

पंचम सुर पर चढ़ी वीरानी


हाथों की लकीरें एक-एक कर टूट रही हैं. टूट-टूटकर हथेलियों से गिर रही हैं. नयी लकीरें उग भी रही हैं. टूटकर गिरने की गति नयी उगने की गति से काफी ज्यादा है. हथेली अमूमन अब बिना लकीरों की सी हो चली है. उसे देर तक देखती रहती हूँ. कोरे कागज सी कोरी हथेलियाँ. इन पर स्मृति का कोई चिन्ह तक अब शेष नहीं रहा. इतनी खाली हथेलियाँ देखी हैं कभी? मैं किसी से पूछना चाहती हूँ. लेकिन आसपास कोई नहीं. यह हथेलियों का खाली होना ही है. मुस्कुराते हुए बिना लकीरों वाले हाथ से चाय का कप थामते हुए ध्यान बाहर लगाती हूँ. मन के बाहर भी. बड़े दिन से बाहर देखा ही न हो जैसे. आसमान साफ़ है. ना-नुकुर करते हुए ही सही आखिर सर्दियों की विदाई हो चुकी है. चिड़ियों का खेल जारी है. जब मैं इन्हें नहीं देखती तब भी ये ऐसे ही तो खेलती होंगी. जीवन ऐसा ही है.

एक घर है, जिसकी बालकनी सनसेट प्वाइंट है, एक सड़क है जो आसमान को जाती है, एक पगडंडी है जो न देखे गए ख्वाबों की याद दिलाती है, एक घास का मैदान है जो पुकारता है नंगे पांव दौड़ते हुए आने को, कुछ पागल हवाएं हैं जिन्होंने शहर की सड़कों को गुलाबी और पीले फूलों से भर रखा है. इतना कुछ तो है फिर जीवन का यह वीराना कहाँ से आता है आखिर. जो भी हो यह वीरानगी किसी राग सी लग रही है. पंचम सुर पर चढ़ी वीरानी.

कुछ दिनों से पैदल चलने का मन हो रहा है. यह सड़कों से मेरे रिश्ते की बात है. बिना पैदल चले शहरों से रिश्ता नहीं बनता. बिना नंगे पाँव चले घास से रिश्ता नहीं बनता, बिना दूर जाए करीबी से रिश्ता नहीं बनता. बिना जार- जार रोये सुख से रिश्ता नहीं बनता. लकीरों का यह टूटकर गिरना सुखद है.

Thursday, March 28, 2019

चॉकलेट का पेड़ और उर्मि


उर्मि हर रोज शाम को घर लौटते पंछियों के झुण्ड को देखने को सब काम छोड़ छत पर आ जाती थी. दादी कहतीं कि शाम को पंछी लौटते हैं. वो कहाँ गये थे, कहाँ को लौट रहे थे नन्ही उर्मि को कुछ समझ में नहीं आता था. उसने दादी से कई बार पूछा, दादी वो कहाँ से लौटते है दादी ने हंसकर एक ही जवाब दिया, 'तेरे पापा की तरह वो भी तो ऑफिस जाते होंगे. है न?'

उर्मि की दुनिया में पंछियों के ऑफिस, गाय, भैंसों के ऑफिसों का दृश्य बनने लगते. वो सोचते-सोचते खुश होने लगती. 'दादी, मुझे भी जाना है पंछियों का ऑफिस देखने. वहां क्या काम होता होगा? चिडिया भी फ़ाइल देखती होगी.' ऑफिस का मतलब फ़ाइलों का ढेर और टाईपराइटर की खटर-पटर ही जाना था उर्मि ने अब तक. इसका कारण भी पापा के ऑफिस में कभी-कभार उसका जाना था.

'दादी, आराम से फुर्सत में पैर फैलाकर, खरबूजे के बीज छीलते हुए कहतीं, चिड़ियों के ऑफिस में घोसले की बात होती होगी शायद. कौन से पेड़ पर कौन सी चिड़िया का घोसला हो शायद यह तय होता होगा.'

'फिर तो उनका ऑफिस न ही होता हो यही अच्छा. उनको तो किसी भी पेड़ पर कितना भी बड़ा घोसला बनाने की आज़ादी होनी चाहिए. है न दादी?'
दादी चुप रहतीं. उर्मि का दिमाग चलता रहता.

'उनकी सैलरी कहाँ से आती होगी? कित्ते पैसे मिलते होंगे दादी?' वो भो अपने बच्चों के लिए चौकलेट लाते होंगे घर लौटते समय?

'हो सकता है वो शाम को बच्चों के लिए जो दाना लाते हों उसमें चॉकलेट होती हो.' दादी को भी उर्मि की बातों में मजा आने लगता.

'और गाय भैंस के ऑफिस में क्या होता होगा दादी?'
'क्या पता क्या होता होगा. तुम सोचो तो.'

उर्मि ने कहा, 'दादी गाय बैल को तो वैसे ही इतना काम करना होता है वो ऑफिस में कैसे काम करते होंगे. दिन भर तो खेत में काम करते हैं न बैल. गाय भी. ऊँट भी.'

'तो हो सकता है चारा चरके लौटते हों.' दादी ने कहा.

'अरे हाँ, कित्ता मजा आता होगा फिर तो. पिकनिक से लौटने जैसा. उनकी किटी पार्टी होती होगी. है न?
सुनो बहन, मेरा मालिक मुझे बहुत मारता है, क्या करूँ समझ में नहीं आता. एक कहती होगी. दूसरी कहती होगी, हाँ बहन मेरा भी यही हाल है. सारा दिन काम कराता है, सब दूध निकाल लेता है और खाना भी कम देता है. जी चाहता हूँ कहीं भाग जाऊं.'

उर्मि गाय, बैल की नकल करके ताली पीटकर हंस दी. लेकिन जल्दी ही उदास भी हो गयी. फिर तो वापस लौटते समय खुश नहीं होते होंगे न ये लोग. वही खूंटा, वही चारा, वही काम.'

दादी ने सोचा बच्ची फंस गयी है तो उसे उलझन से निकाल दें. 'लेकिन उसके बच्चे भी तो इंतजार करते होंगे न. जैसे तू करती है अपनी मम्मी, पापा का.' दादी ने कहा.

'हाँ, वो भी बच्चों के लिए चॉकलेट लाते होंगे क्या?' उर्मि की सुई चॉकलेट पर अटकी हुई थी.

'लेकिन दादी उनके पास तो पैसे नहीं होते होंगे फिर वो चॉकलेट कैसे लाते होंगे. वो कुछ भी कैसे लाते होंगे.' उर्मि फिर उदास हो गयी.

'दादी अगर मैं सबको खूंटे से खोल दूं तो ?' यह कहते हुए उर्मि की आँखें चमक उठी थीं.
 दादी ने कहा 'तुम बताओ फिर क्या होगा?'
'वो लोग भी ऑफिस जायेंगे, काम करेंगे और पैसे कमाएंगे. फिर शाम को चॉकलेट लेकर आयेंगे.'

'लेकिन यह भी तो हो सकता है उनके बच्चों को चॉकलेट पसंद ही न हो? जैसे मुझे पसंद नहीं.' दादी को उर्मि की बातों में इतना मजा आ रहा था कि उनकी दोपहर की नींद भी चली गयी थी.

'दादी. आप बूढी हो इसलिए आपको चॉकलेट पसंद नहीं. सब बच्चों को चाकलेट पसंद होती है.' उर्मि को लगा दादी एकदम बुध्धू है. भला चॉकलेट किसे पसंद नहीं होगी.

दादी पोपले मुंह से हो हो करके हंसने लगी. 'ओह मैं तो भूल गयी थी कि मैं बूढी हो गयी हूँ.'

'तो क्या करना चाहिए कि सब बच्चों को चाकलेट मिल जाए.' दादी ने उर्मि को मुश्किल में डालना चाहा.
उर्मि ने कुछ देर सोचा फिर कहा, 'मेरे पास एक आइडिया है.'
'क्या?' दादी ने पूछा.

'मैं नहीं बताउंगी.' उर्मि की आँखों में चमक थी.
दादी की उत्सुकता यह जानने की थी कि उर्मि के पास कौन सा आइडिया है. लेकिन उर्मि ने बताया नहीं.

अगले दिन से घर के बगीचे में लगे पेड़ पर बने घोसले में और पशुओं के बाड़े में  उर्मि की चॉकलेट के रैपर जब तब मिलने लगे. उर्मि अब जब भी चॉकलेट खाती तो उसमें से एक हिस्सा सबके नाम का जमीन में बोने लगी. थोड़ी चॉकलेट घोसलों में चुपके से रख आती कभी जानवरों के चारे में डाल आती.

चाकलेट भले ही चिड़ियों व जानवरों ने न खायी हो, भले ही न उगे हों चॉकलेट के पेड़ लेकिन उन चाकलेट्स की मिठास उर्मि की जिन्दगी में अब तक कायम है.


Wednesday, March 27, 2019

अभिनय


अपनी उन्मुक्त हंसी
दौड़ते भागते क़दमों की रफ़्तार
पार्टियों में लचकती कमर
और शोख अदाओं में

त्योहारों में मन जतन से शामिल होने
पकवानों को कभी खाते, कभी बनाने
दोस्तों के संग धौल-धप्पा करने
बेवजह की बातों में रूठ जाने
और फिर खुद ही मान जाने में

छुट्टे पैसे के लिए सब्जी वाले से झिक-झिक करने
और सिनेमा देखते वक़्त चुपके से रो लेने
कॉफ़ी की खुशबू में डूबने
और उतरते सूरज के संग मुस्कुराने में

सहकर्मियों संग करते हुए मजाक
या चुहलबाजियों में
वो आसानी से छुपा लेती हैंअपनी उदासियां

अभिनय कला में प्रवीण बनाता है जीवन स्त्रियों को. .

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