Monday, November 12, 2018

चलते जाने का सबब कोई नहीं


एक शोर से गुजरी हूँ, दूसरे शोर में दाखिल हुई हूँ. तीसरा शोर इंतज़ार में है. फिर शायद चौथा, पांचवां या सौवां शोर. चल रही हूँ चलने का सबब नहीं जानती शायद इतना ही जानती हूँ कि न चलना फितरत ही नहीं. चलना कई बार शोर से भागना भी होता है यह जानते हुए भी कि यह शोर अंतहीन है. भीतर जब शोर हो तो बाहर तो इसे होना ही हुआ. मुझे शोर से मुक्ति चाहिए, खूब बोलते हुए घनी चुप में छुप जाने का जी चाहता है. शांति चाहती हूँ लेकिन जैसे ही शांति के करीब पहुँचती हूँ घबरा जाती हूँ. क्या चाहती हूँ पता नहीं, बस चलना जानती हूँ सो चल रही हूँ. लगता है सदियों से चल रही हूँ. अब मेरी चाल थकने लगी है, मैं भी थकने लगी हूँ, सोना चाहती हूँ. बेफिक्र नींद.

मेरे कानों ने कभी यह नहीं सुना कि 'मैं हूँ न'. खुद को रोज हारते देख उदास हुआ करती थी. फिर हताश होने लगी. इस उदासी और हताशा में शायद जीने की इच्छा रही होगी. तो चल पड़ी एक रोज जीने की तलाश में. तबसे चलती जा रही हूँ. नहीं जानती  थी कि जीने की ख्वाहिश करना कितना मुश्किल होता है. हालाँकि बिना जिए जीते जाने से ज्यादा मुश्किल भी नहीं.

हर रोज नई जंग होती है. एक लम्हे में हजार गांठें लगी होती हैं सुलझाते-सुलझाते और उलझा लेती हूँ. कभी सुलझ जाए कोई लम्हा तो बच्चों सी चहक उठती हूँ उस पल भर की चहक में ही जीवन है. मैं उसे ही खोज रही थी शायद। खोज रही हूँ. हर रोज अपनी हाथों की लकीरों को देखती हूँ वो रोज बदली हुई नज़र आती हैं, कई रेखाएं तो घिस चुकी हैं एकदम. कुछ मुरझा चुकी हैं. मुझे कुछ नहीं चाहिए असल में. कुछ भी नहीं. मैं निराश नहीं हूँ, हताश भी नहीं हूँ बस थक गयी हूँ. बहुत थकन है पोर-पोर में. न कोई इच्छा शक्ति देती है न सपना ही कोई बस कि पैरों में बंधी चरखी पर नाचती फिरती हूँ. किसी भी लम्हे में इत्मिनान नहीं, सुख नहीं हालाँकि सुख जिसे कहती है दुनिया बिखरा है हर तरफ.

बचपन से अब तक जो बात याद आती है कि सबको मेरी जरूरत है, बहुत जरूरत, इतनी कि बचपन में बचपन की जगह ही नहीं बची. मुझे कभी नहीं बताया किसी ने कि कौन सी शरारत किया करती थी मैं, किस बात पर अड़ जाती थी जिद पर. बिना जिया हुआ उदास बचपन साथ रहता है. साथ वो सब रहता है जो था नहीं, जो साथ है वो साथ लगा नहीं कभी.

दोस्त कहती है, कुछ भी शाश्वत नहीं, हाँ, समझती हूँ. शाश्वत कुछ भी नहीं सिवाय इस उदासी के. इस उदासी की गोद में सर रखकर सो जाना ही उपाय है. 'मैं हूँ न' की यात्रा तय कर पाना आसान कहाँ होता है।

(नोट- कहीं भी साझा करने या प्रकाशित करने के लिए नहीं )

Sunday, October 28, 2018

'क' से कविता एक सुंदर मीठी सुबह से दिन का आगाज़


अक्टूबर में उतरता है मौसम हथेलियों पर, कन्धों पर, धरती पर. अक्टूबर में इंतजार शुरू होता है वादियों के शगुनों वाली बर्फ से भर जाने का, नाउम्मीदियों के उम्मीदों से बदल जाने का. अक्टूबर से शुरू होता है उत्सव का सिलसिला जो जोड़ता है मन के उत्सव से, जिन्दगी को सुंदर बनाने के ख्वाब को और मजबूती से थाम लेने से. ‘क’ से कविता की 30 वीं बैठक में भी देहरादून के कविता प्रेमियों ने उम्मीदों के ऐसे ही रंग चुने. इस बार ‘पोयट्री विद वॉक’ का विचार बना और इसके लिए सुबह का वक्त चुना गया. इस विचार का जिस तरह स्वागत हुआ उसने उत्साह बढ़ा दिया. सुबह की ताज़ा हवा में हरसिंगार के फूलों के बीच से गुजरते हुए, गिलहरियों की चुलबुली शरारतों को नजरों में भरते हुए कुछ देर को ही सही सभी कविता प्रेमियों ने खुद को तमाम तनाव से मुक्त और ऊर्जा से लबरेज महसूस किया. सबसे पहले ‘क’ से कविता के विचार को साझा किया गया कि किस तरह 23 अप्रैल 2016 को देहरादून में शुरू हुई पहली बैठकी का सिलसिला आज समूचे उत्तराखंड में फ़ैल चुका है. समूचे उत्तराखंड में 17 अलग अलग जगहों पर बैठकें होती हैं और हर शहर की अपनी स्वायत्ता है. सिर्फ दो ही मूल बातें हैं ‘क’ से कविता के कॉन्सेप्ट की पहली यहाँ अपनी कविता नहीं पढ़नी और दूसरी इसकी सादगी. मूल विचार इन बैठकों में शामिल होते हुए और इन्हें आयोजित करते हुए भी किसी भी तरह के तनाव से खुद को दूर कर पाना और जिन्दगी के थोड़ा और करीब जा बैठने की कोशिश होती है.


इसी कोशिश के चलते सबसे पहले सभी साथियों ने गांधी पार्क का पूरा चक्कर लगाया, पार्क में मौजूद फूलों, पेड़ों, पंछियों को महसूस किया. जिन्दगी में पहले से मौजूद कितनी ही कविताओं से हम रू-ब-रू होते होते रह जाते हैं उन्हीं लम्हों के करीब जाने की यह कोशिश थी. इसके बाद ‘क’ से कविता जो अब लगभग तीन वर्ष पूरे करने की यात्रा में है इसे किस तरह और बेहतर बनाया जाय इस बारे में सभी साथियों ने अपने विचार रखे. नन्ही तूलिका और तनिष्का ने बताया कि उन्हें ‘क’ से कविता की बैठकों का पूरे महीने इंतजार रहता है और उन्हें यहाँ बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

कविता पाठ का सिलसिला शुरू हुआ संतोष अर्श की गजल से जो इब्ने इंशा, केदारनाथ अग्रवाल, जावेद अख्तर, विजय गौड़, अदनान कफील, ममता से होते हुए बहुत सारे अन्य कवियों तक पहुंचा. अनत में एक मोहक भजन और मोहन गोडबोले के बेहद सुरीले बांसुरी वादन के साथ बैठक का समापन हुआ.

सभी साथियों ने कहा ‘यह सुबह यादगार हुई.’

Thursday, October 25, 2018

कोई हमें सताये क्यों


दिल ही तो है न संग-ओ-ख़ीश्त दर्द से भर न आये क्यों 
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों 

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं 
बैठे हैं रहगुज़र पे हम गैर हमें उठाये 

क्यों क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं 
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यों 

'ग़ालिब"-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं 
रोइये ज़ार-ज़ार क्या कीजिये हाय-हाय क्यों.

- ग़ालिब 

Wednesday, October 24, 2018

कहानी- पंख वाली खिड़कियाँ


दिनों को जैसे पंख लगे रहते हैं हरदम. इनसे कितनी भी होड़ करो ये पीछे छूटने को तैयार ही नहीं होते. दिनों से होड़ करना अब रीना का खेल हो चुका है. अपनी तनहाइयों से पीछा छुड़ाने के लिए उसने खुद ही अपने आसपास ढेर सारे काम का जंगल उगा लिया. न एक पल फुरसत का मयस्सर, न दिल दुखाने वाली कोई बात सोचने का वक्त. जो आये भी कोई अवसाद का झोंका, तो खुद को और झोंक दिया काम में रीना ने. काम की इसी आपाधापी में उसने कई रोज बाद इंटरनेट की दुनिया का दरवाजा खटखटाया. लॉग इन करते ही ढेर सारी हरी बत्तियां जलती न$जर आईं. उसे लगा वे सब जाने-पहचाने चेहरे हैं. वर्चुअल चेहरे. हरी बत्तियों के पीछे से झांकते...
हैप्पी बर्थ डे टू यू....हैप्पी बर्थ डे टू यू...
रीना ने जैसे ही रागिनी की मेल को क्लिक किया, एक छोटा सा क्यूट सा टेडी बियर गर्दन हिला हिलाकर गाने लगा.
अनायास ही रीना खिल गई. आज उसका जन्मदिन है, उसे तो याद ही नहीं था. लेकिन रागिनी को कैसे याद रहा...
अचानक रीना को लगा उसके ढेर सारे पंख उग आये हैं. वो खूब-खूब उडऩा चाहती है. असीमित उड़ान. अपने भीतर की खुशी को वो महसूस कर रही थी.
तो क्या प्रोग्राम है आज का?
विपिन का मैसेज चैट पर चमका.
रीना- कैसा प्रोग्राम? रीना ने अनजान बनते हुए पूछा.
विपिन- पार्टी का?
रीना- कैसी पार्टी
विपिन- तुम्हें नहीं पता?
रीना- नहीं, क्या हुआ?
विपिन- अरे, अयोध्या पर फैसला आ गया. कहीं कोई दंगा नहीं हुआ. इसकी पार्टी तो बनती है ना?
रीना- हूं....अयोध्या मंदिर तो मेरे पिताजी का है. रीना गुस्से में आ गई. हमारे भीतर का बच्चा कभी भी जाग उठता है. रीना को खुद के व्यवहार पर हैरत हुई.
विपिन- अरे यार, अपने देश के लिए इतनी उपेक्षा ठीक नहीं है. ऊपर से तुम हिंदू भी हो. खुश होना चाहिए तुम्हें. फैसला तुम्हारे हक में आया है.
रीना- सही कह रहे हो. ऊपर से मैं हिंदू भी हूं. तुम कम्युनिस्ट होने के नाम पर केवल हिंदुओं पर निशाना साधना बस. चलो जाओ, काम करने दो मुझे.
विपिन- अरे न सही अयोध्या फैसले की मिठाई, कम से कम जन्मदिन का एक लड्डू तो बनता है ना. ये कामरेड तो खाली लड्डू की फिराक में रहता है, बस.
रीना- ठीक कह रहे हो. इसीलिए जिधर का पलड़ा भारी न$जर आता है, उसी तरफ हो जाते हो. रीना ने खिंचाई की.
विपिन- यार एक लड्डू के लिए इतनी गालियां तो मत दो.
रीना- तो तुमने भी तो विश नहीं किया. अयोध्या फैसले पर मिठाई मांग रहे हो.
विपिन- मांगी तो जन्मदिन पर थी, तुम समझीं नहीं तो मैंने अयोध्या फैसले का हवाला ले लिया.
रीना- बातें मत बनाओ.
विपिन- तो
रीना- शाम को घर आओ.
विपिन- हवन करा रही हो क्या? तुम लोग तो हवन-शवन ही कराते हो जन्मदिन पर.
रीना- हां, करवा रही हूं हवन. उसमें अंतिम आहुति के तौर पर तुम्हें डालना है. जिंदगी खुद ही हवन हुई जा रही है. पता है, किसी को याद भी नहीं है घर में. रीना का स्वर उदास हो चला.
विपिन- कोई बात नहीं यार. इट्स ओके. अब हम बच्चे तो नहीं रहे.
रीना- हां, ठीक कह रहे हो. लेकिन क्या करें दिल तो बच्चा है जी...वैसे तुम घर आ आओ किसी दिन. सासूमां पूछ रही थीं तुम्हें?
विपिन- बाप रे? यार फिर वही शादी का रिकॉर्ड बजेगा. आजकल कहीं जाते घबराता हूं. मेरी शादी लगता है नेशनल इशू बन गई है.
रीना- तो कर क्यों नहीं लेते?
विपिन- डर लगता है. लगता है निभा नहीं पाऊंगा.
रीना- कोशिश करने वालों की हार नहीं होती....
विपिन- तुम कर तो रही हो कोशिश. और भी बहुत सारे लोग कर रहे हैं. हश्रे मामूल से वाकिफ न होते तो कर लेते हम भी खुदकुशी हंसते-हंसते...
रीना- वाह वाह...
विपिन- राघव कैसा है? उससे बहुत दिनों से बात नहीं हुई.
रीना- तुम्हें पता होना चाहिए. तुम्हारा दोस्त है.
विपिन- तुम्हारा भी तो पति है.
रीना- पति और दोस्त में अंतर होता है.
विपिन- लेकिन होना तो नहीं चाहिए.
रीना- होना तो बहुत कुछ नहीं चाहिए. तभी तो कह रही हूं शादी कर लो. तब देखती हूं कैसे देते हो लेक्चर...
विपिन- ना बाबा ना...चलो निकलता हूं मैं अब. कीप स्माइलिंग. जन्मदिन मुबारक एक बार फिर से?
रीना- थैंक्स.
विपिन- वैसे कितनी उम्र हुई?
रीना- मारूंगी.
विपिन- बाय
रीना-बाय.
विपिन से बात करते हुए ही रीना ने अपना चैट स्टेटस बदला. बिना ही बात मुस्कुराये रे मेरा मन...
जन्मदिन मुबारक हो मैम
अनुभूति का मैसेज कबसे पड़ा उसका इंत$जार कर रहा था.
रीना- थैंक्स. हाऊ डू यू नो?
अनु- फेसबुक मैम.
रीना- ओके. मुझे तो याद ही नहीं था.
रीना ने फटाफट फेसबुक खोला तो शुभकामनाओं की बाढ़ आई थी. वह मुस्कुरा दी. तभी मेल पर एक के बाद एक खिड़कियां खुलने लगीं.
सना- हैप्पी बर्थडे
विशू- कॉन्ग्रेट्स
निशा- व्हेयर इज द पार्टी टुनाइट
निखिल- आप जियें हजारों साल मैम
जोया- ढेर सारी बधाई
अनुभव- बधाई
अरुषि- बधाई बधाई बधाई
वैभव- मैनी हैप्पी रिटन्र्स ऑफ द डे मैम
रीना ने एक-एक करके सबका शुक्रिया अदा किया. उसे अच्छा लग रहा था. उसके चारों ओर शुभकामनाओं का इतना बड़ा संसार पहले कभी नहीं उगा था. इंटरनेट की दुनिया ने उसे कैसे-कैसे अनुभव दिए हैं. कितने सारे दोस्त. जिनमें से कुछ दोस्त तो अब लाइफलाइन बन चुके हैं. जैसे आभा दी, सना, रागिनी, प्रिया. रीना के पांव में सारा दिन तमन्नाओं की पायल बजती रही.
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ऑफिस में आज काम का ढेर लगा हुआ था. रीना बड़ी तन्मयता से किसी फाइल को पढऩे में डूबी थी, तभी प्रिया का मैसेज चमका.
हैलो....हैलो....हैलो...कोई है?
रीना- यस, आई एम देयर
प्रिया- थोड़ा सा समय ले सकती हूं?
रीना- हां बोलो. रीना बिजी थी फिर भी प्रिया को इग्नोर नहीं कर सकी.
प्रिया- रीना दी, पंकज अब पैचअप चाहता है.
बताओ कितनी मुश्किल से सब सैटेल हुआ है. ऐन वक्त पर ये नया नाटक...
रीना- पैचअप?
प्रिया- हां रीना दी. मुश्किल ये है कि उसके इस नये नाटक से मेरे पैरेंट्स
भी पिघल गये हैं. उन्हें भी लगता है कि मुझे पंकज को एक मौका और देना चाहिए.
रीना- क्या बात कर रही हो?
प्रिया- सच कह रही हूं रीना दी.
रीना- ये तो हद है.
प्रिया- वही तो. इमोशनल अत्याचार. कोई गोलू की दुहाई दे रहा है, कोई पंकज के आंसुओं की.
मैंने कहा कि मैं अपने बच्चे को अकेले पाल लूंगी तो पापा ने लेक्चर सुना दिया. आई एम फेडअप नॉव.
रीना- व्हाई पंकज हैज स्टार्टेड ऑल दिस ऑल ऑफ सडेन.
प्रिया- पता नहीं...प्रिया हताश हो रही थी.
रीना- देखो तुम अपने फैसले पर कोई इमोशनल प्रेशर मत आने देना.
प्रिया- वो तो नहीं आने दूंगी दी. लेकिन थक गई हूं अब लड़ते-लड़ते. सात साल शादी के फिर पांच साल का डिवोर्स केस. वहां भी बार-बार फैमिली काउंसिलिंग के बहाने मुझ पर ही दबाव बनाने की कोशिशें. सब कर कराकर जब फाइनल जजमेंट आने को था तो पंकज का नया नाटक. साले, तुम मेरी शक्ल देखना नहीं चाहते और रहना मेरे ही साथ चाहते हो. ये कैसा फ्रॉड है?
प्रिया का गुस्सा उसके मैसेजेस में झलक रहा था.
रीना- शांत हो जाओ. पंकज से ही बात करने पर बात बनेगी.
प्रिया- दीदी, यही तो वो चाहता है. गोलू से लिपटकर रोता है. मम्मी तो एकदम पसीज जाती हैं उसकी एक्टिंग देखकर. मेरे ही पैरेंट्स की न$जर में मुझे दोषी बना दिया उसने.
रीना- बात दोषी होने या बना देने की नहीं है प्रिया. दोषी कोई नहीं होता. बस कुछ समीकरण गलत हो जाते हैं.
प्रिया- दीदी, आप ऐसे कह रही हैं कि दोषी कोई नहीं होता. यहां सिर्फ समीकरण दोषी नहीं हैं. पंकज इज अ सिक मैन. आप जानती हैं उसने मेरे साथ क्या-क्या किया है. अगर तकदीर साथ न देती तो अभी तक या तो मैं पागलखाने में होती या मेरी तस्वीर पर हार लटका होता. मारने-पीटने, आधी रात को घर से निकाल देने से लेकर और क्या-क्या नहीं किया. मम्मी पापा सब जानते हैं फिर भी...
रीना- छोड़ो वो सब. आगे की सोचो.
प्रिया- नहीं, छोड़ूंगी नहीं. इंसान को अपना अतीत कभी नहीं भूलना चाहिए.
रीना- लेकिन अगर अतीत से लिपटी रहोगी तो भविष्य कैसे रचोगी?
प्रिया- अतीत से सबक लेकर.
रीना- ये भी ठीक है. एक नया सवेरा तुम्हारी राह तक रहा है, तभी अंधेरा लगातार गहरा रहा है.
प्रिया-काश ऐसा ही हो.
रीना- ऐसा ही होगा. ऑल द बेस्ट.
प्रिया- थैंक्स? आपसे बात करके हल्का महसूस हो रहा है.
रीना- हूं. टेक केयर. बाय.
प्रिया- बाय.
रीना अनजाने ही प्रिया की जिंदगी से अपनी जिंदगी के कुछ हिस्से मिलाने लगी. उसे लगा कि प्रिया के मुकाबले वो काफी कमजोर है. परिवार बचाने के लिए क्या कुछ नहीं सहना पड़ता है हम महिलाओं को. रीना की आंखों में उदासी के बादल का एक टुकड़ा तैरने लगा.
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चिडिय़ा उड़ी, उड़ के चली...अगले दिन की शुरुआत सना के इस स्टेटस मैसेज से हुई. उसे पढ़कर रीना मुस्कुराए बिना न रह सकी. ये लड़की भी ना जिंदगी से भरपूर है. इसके करीब से निकल भर जाओ, तो जिंदगी मुस्कुरा उठती है. जाने क्यों कोई इसकी जिंदादिली की कद्र नहीं कर पाता. रीना सोच रही थी.
स्वीट स्वीट गुडमॉर्निंग भेज रही हूं कैच करना. सना का मैसेज चैट विंडो से झांकने लगा. रीना को लगा उसके कमरे की खिड़की में सर डालकर सना खुद झांक रही है.
रीना- कैच कर लिया जी.
सना- गुड.
रीना- ये क्या है चिडिय़ा उड़ी...उड़ के चली...
सना- ये चिडिय़ा यानी मैं, अब चली.
रीना- कहां?
सना- मुम्बई नगरिया.
रीना- किसी फिल्म से ऑफर है क्या?
सना- फिल्म बनाने ही तो जा रही हूं.
रीना- ओके. चलो बढिय़ा है.
सना- आप नहीं चलोगी?
रीना- ले चलो.
सना- ठीक है फिर तैयार रहना. मैं भगा ले जाऊंगी.
रीना-पक्का?
सना- बड़ा मजा आयेगा.
रीना- मनोज से पूछ लिया?
सना- मनोज से क्या पूछना है? मेरी जिंदगी में इतनी इ$जाजत किसी को नहीं कि मेरे आड़े आये. मैं हूं बहती हवा...जो मेरे संग चले वो चले, वरना छूट जाये...
रीना- इतनी निर्मोही हो?
सना- हां, ऐसा ही समझ लो. मोह करने की बड़ी कीमतें अदा कर चुकी हूं.
रीना- अच्छा ठीक है. अब मैं निकलती हूं. आज काम भी ज्यादा है और घर भी जल्दी पहुंचना है. कुछ लोग डिनर पर आ रहे हैं.
सना- कभी हमें भी बुला लिया होता डिनर पर जानेमन.
रीना- क्यों तुम तो हवा हो. हवाएं क्या इनविटेशन कार्ड लेकर आती हैं. आ जाओ जब चाहो.
सना- ये बढिय़ा रहा. चलो जाओ, डिनर बनाओ. बाय.
रीना- बाय बाय.
चलो अपने सपनों का पीछा करने की ताकत तो है सना में. कबसे कह रही थी कि फिल्म बनाऊंगी...एकदम अलग. ऐसी फिल्म जो सपनों से, उम्मीदों से भरपूर हो. जिसमें औरतें ही औरतें हों. उसकी कुछ डाक्यूमेंट्रीज देखी हैं रीना ने. न$जर साफ है उसकी. अब मुम्बई जा रही है तो कुछ न कुछ तो करेगी $जरूर. रीना सना के बारे में सोचते हुए मुस्कुराने लगी. तभी उसे महसूस हुआ कि उसकी कोरें नम हैं. उसने अपने भीतर से सपनों के टूटने की आवाज महसूस की. न जाने कितने सपने...कितनी बार....सिर्फ सपने देखना काफी नहीं होता, उन्हें पूरा करने की ताकत भी हासिल करनी जरूरी होती है. सना के बारे में सोचकर रीना मुस्कुरा दी. बिना मां-बाप की इस लड़की ने कैसा कड़वा बचपन बिताया फिर भी अपनी हौसलों की उड़ान में कमी नहीं आने दी. काश तुम्हारे सारे सपने पूरे हों सना...रीना ने दिल से उसे दुआ दी.
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बिट्टू को स्कूल भेजने के साथ ही दिन की मुस्तैद शुरुआत के बाद रीना अखबार खोलकर बैठी तो चेहरा जर्द हो गया उसका. हैदराबाद में बम विस्फोट....तुरंत उसने टीवी ऑन किया. सारे चैनल्स खून से लथपथ न$जर आये. रीना को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, बस दिखाई दे रहा था. सबसे पहला ख्याल उसे आभा दी का आया.
उसने तुरंत फोन उठाया. लेकिन नंबर तो उनका है ही नहीं मेरे पास. एक बार मांगा भी था लेकिन बात मजाक-मजाक में ही टल गई. इतने दिनों से एक-दूसरे को जानते हैं और बात एक बार भी नहीं हुई. नंबर कहां से होगा. पियूष से पूछती हूं. उनकी भी फ्रेंडलिस्ट में हैं आभा दी. वो तो मिला भी है उनसे. उसने पियूष को फोन मिलाया.
पियूष ने बताया कि आभा दी सकुशल हैं, तो रीना की जान में जान आई. उसने तुरंत फेसबुक ऑन किया तो आभा दी की वॉल पर हाल-चाल लेने वालों की भीड़ थी.
ऑफिस पहुंची तो मन अजीब-अजीब सा हो रहा था. काम करने का तो बिल्कुल मन नहीं हुआ. उसने चाय लाने किशोर को भेजा और सिस्टम ऑन किया. ढेर सारी हरी बत्तियां जल रही थीं. उसे लगा अदृश्य रहने में ही भलाई है, वरना इन हरी बत्तियों को खिड़की बनते देर नहीं लगेगी. रीना का मन नहीं था किसी से बात करने का. सुबह की खबरों से मन उदास था उसका.
आर यू देयर?
पियूष का मैसेज था.
रीना- हां, पियूष बोलो.
पियूष- रीना, आभा इज फाइन बट...डॉ. राजेश...
पियूष ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया.
रीना- क्या हुआ उन्हें?
पियूष- यू नो अबाउट हिम? पियूष ने हिचकते हुए पूछा?
रीना- यस आई नो. बताओ क्या हुआ उन्हें? इज ही ओके?
पियूष- ही इ$ज इंजर्ड. सीरियस हैं...
रीना- हाऊ डू यू नो? तुम्हें कैसे पता? तुम्हारे पास नंबर है उनका? मुझे दो. मैं अभी बात करती हूं...
रीना हड़बड़ा गई.
पियूष- नंबर दे दूंगा. लेकिन अभी बात करने का कोई फायदा नहीं. मेरी आभा से बात हुई है. मैं शाम की ट्रेन से निकल रहा हूं. उसे हमारी जरूरत है रीना...
चैट के उस मैसेज में ही पियूष की आंखों में छलके आंसू रीना से छुप न सके. रीना को तेज रुलाई आई. खुद को समेटकर उसने बाथरूम की दीवारों में कैद किया.
मुंह धोकर बाहर निकली, तो उसका जी चाहा कि उड़कर पहुंच जाए आभा दी के पास. उनका सारा दु:ख सोख ले अपने भीतर. मेरी अच्छी आभा दी. पियूष जा रहा है रात को. क्यों न मैं भी चली जाऊं. पियूष का वो वाक्य उसे हमारी जरूरत है...उसके जेहन में तैर रहा था. घर पर क्या बोलूंगी. वर्चुअल वर्ड की ये दोस्ती घर-परिवार वालों को कितनी समझ में आयेगी. राघव से तो कोई उम्मीद है नहीं, आजकल सासू मां भी आई हुई हैं. बिट्टू के एग्जाम्स होने वाले हैं, ऐसे में उसे छोड़कर अकेले अचानक कहां जा रही हूं. किसके लिए? कैसे समझा पायेगी वो कि जिसका फोन नंबर तक उसके पास नहीं है, जिससे कभी नहीं मिली, वो उसके लिए कितनी अहमियत रखती हैं.
उसे लगा इस मुश्किल का हल भी आभा दी के पास ही है. पिछले एक साल में आभा दी की ऐसी आदत पड़ गयी है उसे कि हर छोटे बड़े फैसले में वो शामिल रहती हैं किसी न किसी रूप में. और अब जब वे खुद मुश्किल में हैं तो....
इसी उलझन में पूरा दिन बीता. फेसबुक पर लगी उनकी छोटी सी तस्वीर उसके जेहन में लगातार घूम रही थी. हमेशा वो करो जो दिल चाहे...तो दिल पर कोई बोझ नहीं रहता...किसी मौके पर उन्होंने कहा था.
रीना ने पियूष को फोन मिलाया, तुम्हारी ट्रेन झांसी से होकर जायेगी क्या?
पियूष- हां क्यों.
मैं भी चलूंगी.
अरे, मैं जा रहा हूं ना? इतनी जल्दी रिजर्वेशन वगैरह भी नहीं मिलेगा. तुम परेशान मत हो. मैं वहां जाकर फोन करूंगा तुम्हें. पियूष ने समझाना चाहा.
पियूष मैं चलूंगी. बस. आज भी अगर मैंने अपना मन मार लिया, तो कभी चैन से सो नहीं पाऊंगी.
पियूष चुप रहा.
घर आकर वो चुपचाप एक बैग में सामान ठूंसती रही. उसके आसपास सवालों का एक जंगल उगता रहा...

(2016 में नया ज्ञानोदय में प्रकाशित)

Tuesday, October 23, 2018

साढ़े चार मिनट


कमरे में तीन ही लोग थे। वो मैं और एक हमारी दोस्त...।
तीनों ही मौन थे।
मैं वहां सबसे ज्यादा थी या शायद सबसे कम।
वो वहां सबसे कम था या शायद सबसे ज्यादा।
दोस्त पूरी तरह से वहीं थी।
मैं खिड़की से बाहर देख रही थी।

सब खामोश थे। यह खामोशी इतनी सहज थी कि किसी राग सी लग रही थी। मैं खिड़की के बाहर लगे अनार के पेड़ों पर खिलते फूलों को देख रही थी। जिस डाल पर मेरी नजर अटकी थी वो स्थिर थी हालांकि उस पर अटकी पत्तियां बहुत धीरे से हिल रही थीं।

उन पत्तियों का इस तरह हिलना मुझे मेरे भीतर का कंपन लग रहा था। मुझे लगा मैं वो पत्ती हूं और वो...वो स्थिर डाल है। डाल स्थाई है। पत्तियों को झरना है। फिर उगना है। फिर झरना है...फिर उगना है।

'मुझे मां से बात करनी है...' वो बोला।

उसके ये शब्द खामोशी को सलीके से तोड़ने वाले थे।
मैं मुड़ी नही। वहीं अनार की डाल पर अटकी रही।
दोस्त ने कहा, 'अच्छा, कर लीजिए।'
'क्या वो यहीं हैं...?' उसने पूछा।
'हां, वो अंदर ही हैं।' बुलाती हूं।

कुछ देर बाद कमरे में चार लोग थे। मां मैं वो और दोस्त।
मैं अब भी खिड़की के बाहर देख रही थी।
'आप अंकल से बात कर लीजिए...' उसने मां से कहा।
मां चुप रहीं।

'लेकिन...' दोस्त कुछ कहते-कहते रुक गई।
'किसी लेकिन की चिंता आप लोग न करें...मैं सब संभाल लूंगा। सब।'
उसने मां की हथेलियों को अपने हाथों में ले लिया।
दोस्त ने कहा, 'फिर भी।'
'परेशान मत हो। यकीन करो। ' उसने बेहद शांत स्वर में कहा।

कमरे में मौजूद लोगों की तरफ अब तक मेरी आधी पीठ थी। अब मैंने उनकी तरफ पूरी पीठ कर ली ताकि सिर्फ अनार के फूल मेरे बहते हुए आंसू देख सकें।

मां कमरे से चलीं गईं...दोस्त भी।

वो मेरे पीछे आकर खड़ा हुआ। अब वो भी कमरे के बाहर देख रहा था। शायद अनार के फूल...या हिलती हुई पत्तियां। कमरे में कुछ बच्चे खेलते हुए चले आए। उसने बच्चों के सर पर हाथ फिराया...बच्चे कमरे का गोल-गोल चक्कर लगाकर ज्यूंयूयूँ से चले गए।

अब कमरे में वो था और मैं...बाहर वो अनार की डाल...
उसकी तरफ मेरी पीठ थी....उसने कहा, 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा है...'

गहरी सर्द सिसकी भीतर रोकने की कोशिश अब रुकी नहीं।
अनार की डाल मुस्कुरा उठी।
'सिर्फ साढ़े चार मिनट नहीं, साढ़े चौदह साल...' मैंने कहा...

उसने मुझे चुप रहने का इशारा किया।
हम दोनों अनार की डाल को देखने लगे...
बच्चे फिर से खेलते हुए कमरे में आ गए थे...उसने फिर से उनकी पीठ पर धौल जमाई...

वो आखिरी बार था जब मां की जिंदा हथेलियों को इस तरह किसी ने अपनी हथेलियों में रखा था।
उसी रात मां मर गई।
रोज की तरह चांद गली के मोड़ वाले पकरिया के पेड़ में उलझा रहा।
मां रात को सारे काम निपटाकर सोईं और फिर जगी नहीं।
बरसों से वो उचटी नींदों से परेशान थीं। सुबह उनके चेहरे पर सुकून था। वो सुकून जो उनके जिंदा चेहरे पर कभी नहीं दिखा।

वो आता, थोड़ी देर खामोशी से बैठता, चाय पीता चला जाता।
न वो मेरी खामोशी को तोड़ता न मैं उसकी।
हमारे दरम्यिान अब सवाल नहीं रहे थे। उम्मीद भी नहीं।
लाल कलगी वाली चिडि़या जरूर कुछ उदास दिखती थी।
मां ने पक्षियों को दाना देकर घर का सदस्य बना लिया था। वो घर जो उन्हें अपना नहीं सका, उस घर को उन्होंने कितनों का अपना बना दिया।

'तो तुमने क्या सोचा?' एक रोज उसने खामोशी को थोड़ा परे सरकाकर पूछा।
मैं चुप रही।
वो चला गया।
मैं भी उसके साथ चली गई थी हालांकि कमरे में मैं बची हुई थी।

दोस्त मेरी हथेलियों को थामती। मुझसे कहीं बाहर जाने को कहती, बात करने को कहती। उसे लग रहा था कि मैं मां के मर जाने से उदास हूं।
असल में मां की इतनी सुंदर मौत से मैं खुश थी। इसके लिए मैं उसकी अहसानमंद थी।
जीवन भर मां को कोई सुख न दे सकी कम से कम सुकून की मौत ही सही।

अनार की डाल पर इस बरस खूब अनार लटके। इतने कि डालें चटखने लगीं।
लाल कलगी वाली चिडि़या फिर से गुनगुनाने लगी।
मां की तस्वीर पर माला मैंने चढ़ने नहीं दिया।

उस रोज भी कमरे में चार लोग थे।
वो, मैं दोस्त और मां तस्वीर में.
वो जो सबसे कम था लेकिन था
मैं जो थी लेकिन नहीं थी
दोस्त पिछली बार की तरह वहीं थी न कम न ज्यादा
मां कमरे में सबसे ज्यादा थीं, तस्वीर में।

'साथ चलोगी?' उसने पूछा.
'साथ ही चल रही हूं साढे़ चौदह सालों से,' मैंने कहना चाहा लेकिन चुप रही।
'कहां?' दोस्त ने पूछा।
'अमेरिका....' उसने कहा
'लेकिन...' दोस्त ने कुछ कहना चाहा पर रुक गई।
'यहां सबको इस तरह छोड़कर...कैसे...' दोस्त ने अटकते हुए कहा।
शायद उसे उम्मीद थी कि वो पिछली बार की तरह उसे रोक देगा यह कहकर कि, 'लेकिन की चिंता मत करो, मैं संभाल लूंगा। सब। बस यकीन करो।'

उसने कुछ नहीं कहा। मैं मां की तस्वीर को देख रही थी।
'हां, मैं भी वही सोच रहा था।' उसने आखिरी कश के बाद बुझी हुई सिगरेट की सी बुझी आवाज में कहा।
'आपका जाना जरूरी है?' दोस्त राख कुरेद रही थी।

वो खामोश रहा।
चांदनी अनार के पेड़ पर झर रही थी।
'हां,' उसने कहा। दोस्त उठकर कमरे से चली गई। शायद गुस्से में। या उदासी में।
अब कमरे में तीन लोग थे मैं वो और मां।

'तुमने मेरी मां को सुख दिया,' कहते हुए मेरी आवाज भीगने को हो आई।
'तुम्हें भी देना चाहता था...' उसने कहा।
मेरे कानों ने सिर्फ 'था' सुना...

वो बिना ये कहे कमरे से चला गया कि 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा।'
न मैं यह कह पाई कि 'उम्र भर उसे न देख सकने का रियाज कर रही हूं...'