Monday, March 27, 2017

एक चम्मच प्यार


प्रेम
उसे मालूम था कि
वो स्त्री है दुनिया की सबसे मजबूत स्त्री
जो है उसके प्रेम में
इसलिए उसने
सारे निर्मम प्रहार किये उस पर ही

एक चम्मच प्यार
क्या फर्क पड़ता है जिन्दगी में
अगर कम हो जाए 
एक चम्मच प्यार
सिवाय इसके कि जिन्दगी
‘जिन्दगी’ नहीं रहती...


विसर्जन 
राख सिर्फ फुंके हुए जिस्म की ही
नहीं बहाई जाती नदियों में

फुंके हुए अरमानों की राख
आंसुओं की खारी नदी में
बहाई जाती है जिन्दगी भर...


Tuesday, March 21, 2017

जीने से भी ज्यादा जियूँगी


सफर फिर पांव में बंधा है. साथ बंधा है अकेलापन भी. सफर से पहले कितना कुछ समेटना होता है. सफर पूरा होने पर कितना कुछ होता है करने को. लेकिन सफर के ठीक बीच में राहत के सिवा कुछ भी नहीं. लोगों का रेला है, रेल है खुद से मेल है. हरी सुरंग के बीच से गुजरते हुए, पहाड़ों पे हाल में गिरी बर्फ की तासीर हथेलियों पे लिए रेगिस्तान की तरफ का रुख किया है. रुख किया है असल में अपनी ओर. न जाने कितना सूखा भर गया है पिछले दिनों. बारिशों की लड़ियों से खेलते हुए भी, चितचोर चैत से लाड़ लड़ाते हुए भी, शायद खुद से लड़ते-लड़ते थकने लगी हूँ. जिंदगी से लड़ते-लड़ते ऊबने लगी हूँ. 

खैर, सफर है, आराम है...साथ कोई नहीं. इसका भी सुख है. कभी-कभी किसी का न होना भी कितना ज़रूरी होता है. वैसे कोई कभी भी कहाँ होता है, होने के तमाम वहम ही तो होते हैं.

सफर मोहक है हमेशा की तरह. खाना है, भूख नहीं, पानी है प्यास नहीं. बर्थ है नींद नहीं। बस छूटते हुए रास्तों को देखने का सुख है. जिंदगी जीने की तलब है. यूँ हारना अच्छा नहीं लगता, थकना अच्छा नहीं लगता. तरकीबें भिड़ाती रहती हूँ. धूमिल की कवितायेँ साथ हैं... दिन के बीतने और रात के करीब आने के बीच हथेलियों में इंद्रधनुष खुलता है. नागेश कुकनूर की फिल्म 'धनक.' कबसे लिये फिर रही हूँ, लेकिन देखने की फुर्सत और इच्छा दोनों का मेल होने के इंतज़ार में हूँ. फिल्म खत्म हो चुकी है... बस इतना कह सकती हूँ कि एक बार फिर नागेश से प्यार हो गया है. पूरी फिल्म सुख में डुबो चुकी है. मैं फ़िल्में देखते हुए खूब रोती हूँ. धनक पूरे वक़्त आँखें भिगोये रखती है. सुख का रुदन, जिंदगी में डूबने का सुख...

नागेश के लिए मन में शृद्धा जागती है. कितनी बारीक नज़र है और कितना सादा सा संवेदनशील दिल. पिछले किसी सफर में नागेश की ही 'लक्ष्मी' देखी थी आज तक सिहरन महसूस होती है और आज ये धनक....मीठी सी मासूम सी फिल्म. शाहरुख़ तुम पर कभी दिल-विल आया नहीं मेरा लेकिन धनक में तुम नहीं होकर भी दिल चुरा ले गए...

हाँ नागेश, जीने से भी ज्यादा जियूँगी मैं, उड़ानों से भी आगे उडूँगी...पक्का प्रॉमिस...

( सफर, इश्क़ शहर से गुलाबी शहर )

Friday, March 17, 2017

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर...


आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो

जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो

जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो...

- जां निसार अख्तर

Wednesday, March 15, 2017

खो चुका है अपने सारे रंग लोकतंत्र


ढेर सारे भ्रष्टों में किसी एक भ्रष्ट का चुनाव है लोकतंत्र
संविधान नाम की किताब का एक पन्ना है लोकतंत्र

बदलाव का एक सुपरहिट नारा है लोकतंत्र
बेईमान, हत्यारों, बलात्कारियों के आगे हारा है लोकतंत्र

सच्चाई और ईमानदारी की जमानत ज़ब्ती का ऐलान है लोकतंत्र
भीड़ को हांकने का साधा हुआ हुनर है लोकतंत्र

हुल्लड़बाज़ी और हंगामा है लोकतंत्र
जनता का फटा हुआ पाजामा है लोकतंत्र

छुटभैये नेताओं की सहालग है लोकतंत्र
मीडिया के पेट का राशन है लोकतंत्र

सुना तुमने? कहते हैं ईवीएम की कोई कारस्तानी है लोकतंत्र?
वैसे दिमागों को बरगलाने की शैतानी तो है ही लोकतंत्र

उंगली पर लगा एक गाढ़ा नीला निशान है लोकतंत्र
हालात के बद से बदतर होने जाने का प्रमाण है लोकतंत्र

इरोम की हार का शोकगीत है लोकतन्त्र
हत्यारे के चेहरे की कुटिल मुस्कान है लोकतंत्र।

खो चुका है अपने सारे रंग लोकतंत्र
अब तो बस एक बदरंग तस्वीर है लोकतंत्र

वोटर को उंगलियों  पर नचाने का खेल है लोकतंत्र
झूठ की चाशनी चटाने का नाम है लोकतंत्र

सुनो, सम्भल के इसे छूना, इसकी है बडी तेज़ धार
देश ही नहीं रिश्तों पर भी इसने किया है खूब प्रहार।

(अगड़म बगड़म )


Thursday, March 9, 2017

क्यों है एग्जाम का हौव्वा?



इम्तिहान...एग्जाम...परीक्षाएं...सर पर सवार हैं...किसके? विद्यार्थियों के तो नहीं. फिर किसके सर पर सवार हैं? माँ बाप के, टीचर्स के, स्कूलों के, नौकरी देने वालों के? किसके सर पर सवार हैं ये जबकि चिंता तो सबको है कि बच्चे परेशान न हों, समाज बेहतर बने, शिक्षा का मकसद सिर्फ रोजगार की ललक में इकठ्ठा की गयी डिग्री न हो. तो फिर झोल कहाँ हैं? क्यों हमारे बच्चे मार्च आते ही डरने लगते हैं और जून आते ही खुश हो जाते हैं... यह सवाल बराबर खाए जाता है. जैसे और दूसरे तमाम सवाल खाए जाते हैं.

मैं जिस तरह सोचती हूँ उस तरह जीने का प्रयास करते हुए उसे महसूस करने का प्रयास भी करती हूँ. उस महसूसने के आधार पर सोचने को बदला भी है कई बार. कि सोचने और बात करने और जीने के बीच अगर कोई डिस्कनेक्ट है तो कुछ तो गड़बड़ है. तो ऐसा ही मैंने परीक्षा शब्द के साथ करने की कोशिश की. मेरे भीतर जो डर, जो भय 'परीक्षा' शब्द को लेकर बोये जा चुके थे उनका मैं कुछ नहीं कर सकी लेकिन यह प्रयास ज़रुर किया कि यह डर किसी और को न दूं. मैंने अपनी बेटी को कभी भी इस शब्द के घेरे में फंसने नहीं दिया.

जब क्लास के सारे बच्चे, बच्चों के पैरेंट्स घबराये होते थे हैं और मेरी बेटी मजे से खेल रहे होते हैं. एग्जाम को मुंह चिढाना उसे आता है. कल पेपर है इसलिए खेलना और टीवी देखना कभी बंद नहीं हुआ. न ही सोने से पहले हमारा गप्प मारने का सिलसिला. मुझे याद नहीं मैंने कभी भी उसे कहा हो पढाई करने को. बस यह कहा कि 'मजा न आये तो मत पढना, और मजा आने में अगर कोई दिक्कत आये तो ज़रूर बताना.' यह सिलसिला जारी है.

लेकिन समाज घर में सीखे हुए को चुनौती देने को तैयार रहता है. आज वो आठवी क्लास का इम्तिहान देने गयी है वैसे ही जैसे रोज जाती है, न कोई टीका, न दही चीनी न स्पेशल वाला गुड लक कि दिन अच्छा बीते और खूब मजे करो स्कूल में इस कामना के साथ रोज भेजती हूँ आज भी भेजा. लेकिन सवाल इतना भर नहीं है.

अब कुछ सवाल उसके भी हैं. मैंने उसे एग्जाम से डरना नहीं सिखाया लेकिन समाज एग्जाम नाम का डंडा लेकर पीछे पड़ा हुआ है. एक हौव्वा बना है चारों तरफ. बच्चे परेशान हैं, टीचर्स डरा रहे हैं, नाइंथ में आओ तब पता चलेगा...एग्जाम अब उसके अपने क्लास में नहीं होते. अलग से बड़े हाल में होते हैं. साथ में बैठे दोस्त अनजाने चेहरे बन जाते हैं, एग्जाम के दौरान आसपास अपने जाने पहचाने टीचर्स की जगह अनजान खडूस चेहरे टहलते हैं.

मेरा उसे बचपन से यह समझाना कि 'एग्जाम कुछ नहीं होता यह भी रोज के जैसा एक दिन है जिसे एन्जाय करो' धराशाई होने लगता है. वो पूरी हिम्मत से, लगन से मेरी सीख को बचाने की कोशिश करती है लेकिन कभी कभी हारने लगती है. तब मुझसे लडती है, सवाल करती है, 'क्यों इतना इम्तिहान का हौव्वा बना रखा है सब लोगों ने. जो आपने हमें सिखाया है वही तो पूछना चाहते हैं न? कोई नया पूछने में तो दिलचस्पी है नहीं किसी की? तो पूछ लो न आराम से, इतना डराते क्यों हो?' पेपर में सब आता होता है फिर भी काफी देर तो इस 'खतरनाक' माहौल से एडजस्ट करने में लग जाता है. वो उदास हो जाती है. कहती है 'मम्मा मुझे एग्जाम से डर नहीं लगता लेकिन ये एग्क्साम टाइम स्कूल जाने में मजा नहीं आता. '

एक रोज उसने बताया उसके क्लास एक बच्चा एग्जाम हॉल में बेहोश हो गया. वो डर के मारे बेहोश हो गया था. बहुत सारे बच्चों के पेट में दर्द होने लगता है, चक्कर आना, उलझन, घबराहट होना सामान्य बात है. बेटी कहती है, मेरे सारे दोस्त इतने परेशान होते हैं एग्जाम टाइम में कि मुझे भी बुरा लगने लगता है. क्या एग्जाम शब्द का यह हौव्वा दूर नहीं कर सकते आप लोग? मेरी बोलती बंद हो जाती है.

मुझे उन पैरेट्स के चेहरे आते हैं जो बच्चों के कम नम्बर आने पर बुझ जाते हैं और बहुत अच्छे नम्बर लाने के लिए टीचर्स से कहते हैं 'आप मारिये इसे जितना चाहे लेकिन नम्बर कम नहीं आने चाहिये.' जिनके लिए बच्चे का रिपोर्ट कार्ड उनका स्टेट्स सिम्बल है. वो पैरेंट्स भी याद आते हैं जिन्हें बच्चों को स्कूल भेजने का मतलब अच्छे नम्बर से पास होकर ही पता है.

इस अच्छे नम्बर के संसार पर बहुत सवाल हैं? रिपोर्ट कार्ड में अच्छे नम्बर जमा करने के चक्कर में जिन्दगी के रिपोर्ट कार्ड से नम्बर लगातार कम किये जा रहे हैं...यह तो ठीक नहीं है न? हमारे बच्चे परेशान हैं उन्हें इस नम्बर रेस से मुक्त तो करो.