Friday, June 5, 2020

कि तुम यहीं कहीं हो...


बहुत बरस पहले की बात है, शायद बहुत बार बता भी चुकी हूँ फिर से बताना चाहती हूँ कि बहुत बरस पहले जब ख्वाब देखने सीखे भी नहीं थे एक रोज आधी जागी आधी सोयी सी किसी रात में एक ख्वाब देखा था कि पहाड़ के किसी गाँव में हूँ. शीशे की दीवारों वाला कोई कमरा है, उसमें मेरे साथ तुम भी हो. सारी रात बारिश होती रही और हम सारी रात चाय पीते रहे बूंदों का खेल देखते रहे. सुबह जब बारिश रुकी तो चाय के कप तो दो थे लेकिन तुम कहीं नहीं थे. ख्वाब का स्वाद तबसे जबान पर लगा रहा. गया नहीं.

अब जब मैं पहाड़ के एक छोटे से हिस्से में बस गयी हूँ या यूँ कहूं कि मैंने खुद को बो दिया है यहाँ और धीरे-धीरे उगने लगी हूँ यहीं. वो ख्वाब जिसका स्वाद जबान पर अटक गया था अक्सर करीब से गुजरता है. कभी वो काँधे से कांधा मिलाकर बैठता है. कभी खिड़की के बाहर बरसता रहता है और शीशे की दीवारों पर अपने निशान छोड़ते हुए मुस्कुराता है, कभी मुंह पर बौछार बन गिरता है और मध्धम मुस्कुराहटों को भीगी खिलखिलाहटों में बदल देता है. चेहरे पर पड़ी बूंदों को पोछती नहीं हूँ, फिसलने देती हूँ, जैसे वो तुम्हारी उँगलियाँ हों. वो ख्वाब अब ढीठ हो गया है. घर में रहने लगा है. साथ चाय बनाता है, लड़ता है मुझसे और हाथ पकड़कर खींच ले जाता है शीशे की दीवारों के उस पार भी. 

कल सारी रात बारिश हुई. जैसे कोई ख्वाबरात बीती हो. जैसे सिरहाने कोई बैठा रहा हो रात भर. जैसे बूंदों के राग में तुम्हारी बातों की खुशबू घुली हो. सुबह उठी तो वो ख्वाब धूप बनकर चमक रहा था. 

कल सारा दिन फूलों और तितलियों के बीच भागती फिरी थी शायद उसी का असर होगा कि नींद में कोई जादू घुल गया होगा. मुझे पता नहीं था सचमुच कि कल कोई पर्यावरण दिवस था कि मेरे लिए हर दिन फूलों, का पंछियों का, चाँद का, कविताओं का और याद का दिन होता है....इन सबसे मिलकर जो संगीत बनता है उसका दिन होता है. लेकिन कल यह ख्वाब दिन ख्वाब रात में भी बदल गया. सारी रात सपने में फूलों की शाखें खिलखिलाती रहीं. 


क्या ये फूल बहुत से लोगों के दिलों के जख्मों को भर पायेंगे...? क्या इनका सौन्दर्य किसी के जीवन में रोटी की कमी को पूरा कर सकेगा, या रोजगार, पुलिसिया मार और अपमान के जख्म को तनिक भर में कम कर पायेगा?

नहीं, यह फूलों का काम नहीं, फूलों का काम है धरती को मानवीय होने के सबक देना, हम सबको बिना भेदभाव के प्रेम करना सिखाना, हमारे भीतर की हिंसा को, क्रोध को प्रेम में बदल देना. अगर हम यह समझ सकेंगे तो फूलों से रोटियों की उम्मीद किये बिना गेहूं की बालियों के इश्क में पड़ जायेंगे, उन बालियों को हमारी थालियों तक लाने वालों के इश्क में पड़ जायेंगे. फिर शायद कुछ हिंसा कम होगी बाहर की. 


कुदरत हमारे भीतर की हिंसा, क्रोध, ईर्ष्या को प्रेम में बदलने की ताकत रखती है बस कि हम फूलों और फलों से लदी और झुकी हुई डालियों को ठीक से देखना सीख तो लें, बारिशों को अपने ऊपर आने तो दें, हथेलियों पर धूप को फिसलते हुए देखते हुए जो फूटता है हरियाली का अंकुर भीतर उसे पाल पोस तो लें. दुनिया सच में बदलने लगेगी. कितनी तो मोहब्बत है दुनिया में और लोग मोहब्बत की कमी से मरे जा रहे हैं...हाँ सचमुच लोग भूख से या अपमान से नहीं दुनिया में कम होती जा रही मोहब्बत की कमी से मर रहे हैं. कि जो प्यार से भरे हैं वो अपने आस पास के लोगों को भूख प्यास से मरने तो नहीं देंगे. गौर से देखना उन सब लोगों के चेहरे जिन्होंने इस विषम समय में कुछ लोगों के जीवन में उम्मीद बचाई है, कुछ जिंदगियों को छांव दी है, वो सब इश्क में डूबे हुए लोग हैं.

आज ठंड बढ़ गयी है यहाँ, सुबह की धूप देख अच्छा लग रहा है, गुनगुनी सी धूप. कल कुछ किताबें मिलीं हैं. पढूंगी दिन भर. उस ख्वाब के बारे में ज्यादा मत सोचना कोई सिरा जोड़ नहीं पाओगे तुम क्योंकि जब पहली बार देखा था वो ख्वाब तुम तब भी नहीं थे कहीं, और अब जब दिन रात जीती हूँ न यह ख्वाब तुम अब भी नहीं हो. हालाँकि लगता यही है कि तुम हो, यहीं कहीं हो...

कल की कुछ तस्वीरें भेज रही हूँ....

इतना भी मत याद किया करो


क्या तुमने अभी, ठीक इसी पल कोई आवाज सुनी? टप्प से टपकने की? ढूंढना मत, वो आवाज तुम्हें नहीं मिलेगी. वो मेरी पलकों से झरे फूलों की आवाज है. आज बादलों का दिन था. रात भर बरस के थक चुके बादलों ने पूरे शहर को ढंका हुआ तो है लेकिन वो बरसेंगे नहीं यह उन बादलों की थकान बता रही है. मेरा मन किया उन बादलों को चिढ़ा दूं...बेचारे बादल.

मन आज बादलों से ऊपर है मेरा....सातवें आसमान पर. फूलों ने पुकार लिया हो मुझे जैसे. मैं बेवजह खिंची चली  गयी उस ओर जहाँ से आवाज आ रही थी. फूलों का शहर तो खैर है ही यह मोहब्बत का शहर भी है. फूलों से मोहब्बत ऐसे बरसती रहती है मानो कह रही हो धरती से कि उदास न हो, हम मिलकर संवारेंगे फिर से...

चलती हुए गयी थी गयी उन रास्तों पर और उड़ते हुए लौटी हूँ. असल में उड़ते हुए भी कहाँ लौटी हूँ वहीँ कहीं तितलियों संग उड़ ही रही हूँ अब तक.

मैंने कोई फूल डाली से अलग नहीं किया, किसी फल को इस नजर से नहीं देखा कि वो कितना स्वादिष्ट होगा. मेरे लिए जिन्दगी की आस हैं. मुझे उनके स्वाद से कोई निस्बत नहीं मैं बस फूलों और फलों से लदी डालियों को देखकर छक रही हूँ.

जब मैं पीले फूलों के नीचे से होकर गुजर रही थी गुलाबी फूल मुझे देख रहे थे और मैं सुर्ख फूलों में तुम्हें ढूंढ रही थी. अचानक मुझे महसूस हुआ कि किसी ने मेरे कंधे को छू लिया हो जैसे.

मैंने पलटकर देखा, कोई नहीं था वहां. मैं हंस दी. तुम हमेशा ऐसे ही तो होते हो, अपने न होने में बेइंतिहा होकर. मैंने अपने कंधे पर बैठे बैंगनी फूल को देखा, उसे उतारकर हथेलियों पर रखा, वो हंस दिया, मैं भी. जानती हूँ तुम भी. तुम जो वहां नहीं थे, लेकिन कितने ज्यादा थे वहीं कहीं.

गुलमोहर बहुत खुश थे, मैं उनसे ज्यादा खुश थी. पूरी धरती जैसी किसी मादक खुशबू में डूबी जा रही हो. मैं उस खुशबू में तर-ब-तर लौटी हूँ. मेरी आँखें छलक रही हैं. सुख से. सिर्फ कुदरत ही है जो मुझे इस कदर समझ पाती है, मुझे उदासी से खींचकर ले जाती है, थमा देती है मुस्कुराहटें, रो लेने की आज़ादी देती है और हंसने की वजहें. इश्क शहर मोहब्बत की गमक में डूबा हुआ था. एक पागल सी लड़की अब इस शहर का हिस्सा है, यह शहर अब उसके जीवन का प्यारा किस्सा है.

जब भी मैं तुम्हें याद करती हूँ तुम्हारे शहर में बारिश होती है, मैं जानती हूँ जब तुम मुझे याद करते हो मेरे शहर में फूल खिलते हैं. इसलिए मेरे शहर में फूल ज्यादा खिलते हैं और तुम्हारे शहर में बारिशें ज्यादा होती हैं. हम कुदरत की संतानें हमें ऐसे ही बारिशों में, हवाओं और फूलों की खुशबू के रास्तों से गुजरकर मिलना था...

मेरे कलेजे में हूक उठी और मैंने फूलों से भरी हथेलियों को चूम लिया. वो फूल जिन्हें मैंने शाखों से तोडकर अलग नहीं किया था. जो फूल जमीन चूमने को शाखों से नीचे उतर आये थे उन्हें मैंने हथेलियों में भरा और महसूस किया कि तुमने मेरा हाथ थामा है.

सारे फूल मैंने अपने बालों में टांक लिए हैं. जैसे तुम्हारी निगाहों ने मुझे आज़ाद किया हो समन्दर किनारे दौड़ते जाने को...फूलों की खुशबू में डूबते जाने को.

आज चाय मैं नहीं बनाऊँगी, तुम बनाओ, और चीनी एकदम मत डालना. प्यार की मिठास काफी है. 

Wednesday, June 3, 2020

पीले रंग के बादल और तुम



लगता है शर्मसार होने के दिन हैं. हर दिन न जाने कितनी ही घटनाएँ गुजरती हैं पास से जो शर्मिंदगी से भर देती हैं. टूटा हुआ दिल और टूट जाता है. हर रोज महसूस होता है कि समाज के तौर पर हम मनुष्य होने की काबिलियत से थोड़ा और ख़ारिज हुए हैं.

नदी ने अपने भीतर कितनी पीड़ा, कितनी चीखों और कितने ताप को सहेजा. नदी भी रोई होगी न? रोना दुःख का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है. बेहद मामूली. क्योंकि दुःख तो आंसुओं से बहुत बड़ा होता है. वो आंसुओं में कहाँ समाता है. कल किशोर को सुना/पढ़ा. सच ही कहते हैं वो कुछ भी कहाँ लिखा जा सकता है, न दुःख न सुख न सपना कोई...लिखना खुद को बहलाने का एक भरम है, कुछ देर को राहत पाने का भरम...जैसे चाय पीना, सिगरेट फूंकना. हालाँकि किसी से कुछ नहीं होता.

लेकिन जाने क्यों लगता है लिखना  बिना मेकअप के आईने के सामने बैठना है. खुद को जस का तस सामने रख देना और अपनी कमियों को ठीक ठीक देख पाना. 

यूँ भी लगता है कभी कि कैसे कोई दूर बहुत दूर किसी देश में बैठकर अपने देश के मौसम की नमी का जिक्र करता है और वो नमी पढने वाले की आँखों में उतर आती है. शायद उसने लिखा नहीं होगा, सोचा होगा सिर्फ. शायद सोचा भी नहीं होगा सिर्फ महसूस किया होगा. सिहरन सी होती है यह सोचकर कि प्रेम हो तो इस कदर भी जुड़ा जा सकता है कि संवाद निरर्थक ही हो जाएँ सब और न हो तो तमाम मौजूदगी भी बेमानी ही हो.

जाने क्यों लग रहा है तुम्हें याद करते हुए इस वक्त मेरी आँखों की नमी ने तुम्हारे शहर के मौसम को छुआ होगा. देखना तो कहीं बादल तो नहीं हैं वहां.

ऐसा कैसे होता है कि मैं सपने में पीले रंग के बादल देखती हूँ और इनबॉक्स में अमलतास के गुच्छे मुस्कुरा रहे होते हैं. मैं अपने सपनो में बहुत ताकत पिरो देना चाहती हूँ इतनी ताकत कि एक रोज पूरा अख़बार सुख की ख़बरों से भरा हो, इतनी ताकत कि एक रोज मैं जब घर लौटूं तो मेरे साथ लौटें दिन भर मिले लोगों की सच्ची मुस्कुराहटों की स्मृतियाँ. कि एक रोज मैं जागूं और मेरे सामने तुम खड़े हो...

किशोर को बार-बार पढ़ रही हूँ कल से. लगता है उन्होंने मेरे मन की हर बात लिख दी है. तुम भी उसे जरूर पढ़ना. 

दुःख को कोई कैसे लिख सकता है


- किशोर चौधरी 

उसकी बातों का किसी भाषा में
अनुवाद नहीं किया जा सकता था।
इसलिए कि वे बातें किसी भाषा में लिखी नहीं जा सकती थी।

प्रेम को कैसे कोई लिख सकता है कि वह कैसा है। इसी तरह दुख को भी कैसे लिखा जा सकता है। उपस्थिति या अनुपस्थिति को कैसे लिखा जा सकता। कुछ भी नहीं लिखा जा सकता।

केवल एक ब्योरा दिया जा सकता है कि उसकी प्रेमिल आँखें चेहरे पर किस तरह टिकी थी। उन आँखों को इस तरह देखते हुये देखना कैसा था। उनको देखकर किस तरह मन भीग गया था। लेकिन शब्द और वाक्य अधूरे रह जाते हैं।

वे ठीक-ठीक नहीं लिख पाते कि किस तरह सीले बरस उन आँखों के देखने भर से गायब हो जाते हैं। किस तरह उन आँखों की झांक पूरे बदन में लहू भर जाती है। अतीत की खरोंचों के निशान झड़ने लगते हैं। जैसे कोई पेड़ नया हो रहा हो।

कोई कैसे किसी को कुछ कह सकता है कि तुमने कितना दुख दिया या कितना प्रेम किया। भाषा के पास अभी इतना नहीं है। अभिनय के पास भी नहीं। केवल बीते हुये कल के सामने आज रखकर कहा जा सकता है कि देखो तुम्हारे होने न होने से कितना कुछ बदल जाता है। लेकिन ठीक-ठीक ये नहीं कहा जा सकता कि तुम्हारा होना कितना है।

एक तुम ही नाउम्मीदवार थे। जिसके पास कोई ऐसी कोई उम्मीद न थी कि कुछ पा लेना है। जिसके पास केवल मन था, साथ होने का मन। उसी मन की बुनियाद पर तुम्हारी आँखें झांक पाती इतना प्रेमिल। यही कहा जा सकता है मगर शायद ये उतना ठीक नहीं है कि तुम्हारा देखना बस इतना भर नहीं है। ये इससे कहीं अधिक है।

कभी-कभी बारूद से पलीते बिछड़ जाते हैं। पलीता समझते हो न? वह जो आग को वहाँ तक पहुंचाए जहां पहुंचानी है। वह पलीता है। जैसे पटाखों में लगे होते हैं। पलीता न हो तो जीवन उदास बेढब पड़ा हुआ सड़ता रहता है। तो किसी का होना एक पलीता हो जाता है। वह जो हमें किसी शोरगर के बनाए अनार की तरह रंगीन रोशनी से भरकर बिखेर दे। वह जो हमारे दुखों में एक महाविस्फोट कर दे। ये सब लिखकर भी नहीं लिखा जा सकता कि किसी को महसूस करना कैसा होता है।

सुबह छः बजे से छत पर बैठा हूँ। हवा के झकोरे बार-बार मुझे छू रहे हैं। कभी कभी ये इतनी तेज़ है कि किसी प्रेमिका ने अपने प्रेमी को शरारत में हल्का धक्का दिया हो। और उसे मजबूती से थाम लिया हो। इसी तरह मैं भी सिहर कर वापस अपने पास लौट आता हूँ। देखता हूँ कि क्या लिख रहा हूँ। समझ रहा हूँ कि वह नहीं लिख पा रहा हूँ जो लिखना चाहता हूँ।

ये मेरा दोष नहीं है। ये भाषा की कमतरी भी नहीं है। लेकिन क्या किया जा सकता है कि कुछ भी ठीक वैसा नहीं लिखा जा सकता जैसा साथ होने पर महसूस होता है। जैसा हम अपने आगे पीछे झाँककर याद कर पाते हैं।

मैं अगर कहूँ कि तुमको बाहों में भर लिया है। मेरी नाक तुम्हारे गालों को छू रही है। तो इसे सुन-कह कर जो होता है, वह कैसे भी नहीं लिखा जा सकता।

लिखने की कोशिश करना बेकार का काम है। मगर मेरी फितरत ऐसी है कि लिखकर थोड़ा सा आसान हो जाता हूँ तो लिखता रहता हूँ। इस लिखने को दरकिनार ही रखना।

Tuesday, June 2, 2020

तेरी याद संग लिली खिली है


देश चल पड़ा है, दुनिया चल पड़ी है तो मन में जाने कैसे-कैसे ख्याल आ रहे हैं. हम चल पड़े हैं क्योंकि चलना जरूरी था. जरूरत क्या है इसे कौन तय करता है? जब मजदूर चल पड़े थे तब सबको उन पर गुस्सा आया, सबसे ज्यादा गुस्सा आया सरकारों को उन पर, सरकार के भक्तों को आया. उन्होंने कहा कि जब कहा था कि रुको तो रुक जाना था न, क्यों चले जा रहे हैं. अब जब वो बात नहीं मानेंगे तो भुगतेंगे ही न? सीमायें सील हुईं, ट्रेनों पर जगह मिलीं नहीं मिली पटरियों तक पर, न बसों में न ट्रकों में सड़कों में न घर बचा था उनके पास न राशन. फिर भी समझ न पाया कोई कि वो न चलते तो क्या करते आखिर. गुनहगार भी वही साबित हुए जिन्होंने जान गंवाई. और अब देश खुल गया. दुकानें, दफ्तर, मॉल, मंदिर सब खुल गया. अब सबको चलना है. ऐसा कहा गया है. सबको काम पर पहुंचना है. दिखाना है कि इकोनोमी को कैसे दुरुस्त करेंगे हम. कैसे जान पर खेलकर दुनिया को बताएँगे कि हम डरे नहीं थे. हम डर तो रहे हैं लेकिन डरने की बात करना मना है.

ये क्या चल रहा, कैसा खेल चल रहा है जिसके सारे नियम सरकार के हैं, पासा भी हर बार वही फेंक रही है. जाहिर है जीतना भी उसी को है. हर बार. जब डर नहीं रहे थे तो डराया जा रहा था. जब सच में डर लगने लगा है तो कहा जा रहा है डरो मत. जब बाहर जाना चाहते थे तो पुलिस डंडे लेकर दौडाती थी अब घर में रहकर काम करना चाहते हैं तो रोजगार खोने का भय बाहर निकलने को मजबूर कर रहा है.

एक व्यक्ति एक समय पर टीवी पर आता है कहता है स्टेचू और पूरा देश स्टेचू हो जाता है, फिर वो कहता है 'दिए' तो देश जगमगा उठता है, फिर वो कहता है 'ताली' तो पूरे देश में नगाड़े बजने लगते हैं, फिर वो कहता है 'आत्मनिर्भर' और सब जान हथेली पर लेकर निकल पड़ते हैं. ये कैसा खेल है भाई. जब केस कम थे तो हम घरों में कैद थे जब केस ज्यादा हैं तो हम सड़कों पर हैं.

जिन्दगी आंकड़ा भर नहीं होती, आंकड़ों के हेर-फेर में आप माहिर लोग हैं लेकिन यह जो जान है न यह हमारी है, हमारी जान से सरकार को फर्क नहीं पड़ता जानते हैं. हम मर गये तो आप आंकड़ों से भी बाहर कर दोगे, या शामिल हुई भी हमारी मौत आंकड़ों में तो क्या होगा सिवाय मरने वालों की संख्या बढ़ने के. लेकिन साहब एक जिन्दगी एक जिन्दगी होती है. उस जिन्दगी का उसके परिवार के लिए महत्व होता है, जहाँ वो पूरी दुनिया होती है संख्या नहीं. देश खोल तो दिया है लेकिन इंतजाम अब भी जीरो ही हैं. ऐसे में आत्मनिर्भर वाला मन्त्र कितना और कब तक काम आएगा पता नहीं. लोग डरे हुए मिलते हैं. सबके भीतर एक डर है, ऐसा कभी नहीं देखा कि किसी से महीनों बाद मिले हों और कोई बात ही न हो. यह जो इकतरफा खेल है न यह अच्छा नहीं है, इसमें हमारी इच्छा की कोई जगह नहीं. हम जिन्दा लोग हैं लूडो की गोटियाँ नहीं हैं. इस बात को समझने वाला कोई नहीं है.

हमारे दफ्तर में तो खूब सैन्टाईज किया गया है सबकुछ, मास्क वास्क भी मिले हैं, तुम्हारे यहाँ ये सब नहीं होगा शायद. तो खूब ध्यान से रहना, कहीं से भी कुछ भी उठाकर मत खा लेना. तुम लापरवाह बहुत हो. मैं नहीं हूँ वहां इसलिए खुद ही ख्याल रखना होगा तुमको. 

मन उदास है. इस उदासी में तुम्हारी याद के संग लिली खिली है.