Tuesday, July 23, 2024
मौसम बने हैं डाकिया
›
एक रोज लड़की ने रेगिस्तान में बोयी इश्क़ की बारिश पीले कनेर भर उठे बूंदों से और धरती को लग गए पंख एक रोज नदियों ने गुनगुनाए कश्तियों के गीत और...
6 comments:
Monday, July 1, 2024
शहर का मौसम जैसे रुबाई कोई...
›
देर रात बैंगलौर की सड़कों से गुजरते हुए स्मृतियों के तमाम पन्ने उलटने-पलटने लगे। मानो कल की ही तो बात है जब मैंने डरते-सहमते इस शहर में कदम र...
2 comments:
Friday, June 21, 2024
बहुत दिन हुए
›
बहुत दिन हुए किसी झरे हुए पत्ते को हथेली पर रखकर देर तक निहारा नहीं बहुत दिन हुए किसी सूखी नदी से नहीं सुना पानी की स्मृति का गीत बहुत दिन ...
3 comments:
Tuesday, June 18, 2024
स्क्रीन पर प्रेम रचता है ये लड़का
›
एक बदली पलकों पर आ बैठी है...उस बदली को मेरे मुस्कुराने का इंतज़ार है और मुझे उसके बरसने का। हम दोनों इंतज़ार की ड्योढ़ी पर बैठी हुई हैं। बारिश...
Saturday, June 15, 2024
अब जीने से डरती नहीं हूँ
›
जैसे कोई अपना ही ख़्वाब रखा हो जरा सी दूरी पर। टुकुर-टुकुर ताक रहा हो। हाथ बढ़ाते हुए भाग जाता हो। जैसे बचपन का कोई खेल। ऐसे ही तुम आए थे जीवन...
‹
›
Home
View web version