Monday, October 19, 2026
ऋषिकेश : हसरतों का शहर
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ढलते-ढलते शाम रात के काँधों से आ लगी थी। रात के कांधे से टिकी शाम देखी है कभी? वो भी मौसम की उस दहलीज़ पर जब एक मौसम ने विदा ली न हो और दूसरे...
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Sunday, October 18, 2026
टू द सी
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सामने समंदर ऊंघ रहा था, और इधर इंट्री गेट पर लोगों का जमावड़ा था। एक अजीब सा शोर, एक अजीब सी हलचल। मैं लोगों के चेहरे देख रही थी। बच्चे, बूढ़े...
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Friday, October 16, 2026
नदी चली थी समन्दर से मिलने
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कभी ख़्वाबों के पास जाती हूँ। कभी ख़्वाबों के क़रीब आने का इंतज़ार करती हूँ। कभी यूं भी होता है कि किसी और काम की धुन में जा रही होती हूँ और अचा...
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Wednesday, September 30, 2026
जा रहा है सितम्बर...
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जा रहा है सितम्बर कंधे झुके हुए हैं उसके आँखें मायूस 30 दिन का यह सफर किसी साल सा बीतता है जाने कितनी सदियों का दुख सितम्बर के सीने म...
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Monday, September 28, 2026
मुख़्तर सी बात है...
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जागी आँखों में कोई ख़्वाब आ गया था। तमाम पहरेदारी, तमाम बाड़ेबंदी के बाद भी। जाने कैसे। जागी आँखों के ख़्वाब सोई आँखों के ख़्वाब से मुख़्तर होता ...
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