पार किया रास्ता
प्रार्थना की पंक्तियों के साथ
तुम आगे बढ़े
हम मिले गिरजे की उन सीढ़ियों पर
जहां न जाने कितने नाउम्मीद
लोगों के कदमों के निशान थे
कितनी उदासियों का ठौर था
कितने कनफेशन सर झुकाये बैठे थे
हमने एक दूसरे को थामने से पहले
उन तमाम नाउम्मीदियों को थामा
हमने एक दूसरे को चूमने से पहले
उन सीढ़ियों को चूमा
उतरते दिन की रोशनी
ने हम दोनों को ढँक लिया था।
हम दोनों सजदे में थे
हम दोनों प्यार में थे।

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 1 मार्च 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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सुंदर , प्यारी सी अभिव्यक्ति।।।।
ReplyDeleteतुम्हारी यह कविता पढ़कर मेरे मन में एक गहरी शांति उतर आई। तुमने अज़ान, प्रार्थना और गिरजे की सीढ़ियों को जिस तरह एक साथ जोड़ा, वह मुझे बहुत खूबसूरत लगा। मैं तुम्हारे शब्दों में प्यार से पहले इंसानियत को थामने की ताकत साफ महसूस करता हूँ।
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