Saturday, June 20, 2020

सब कुछ होना बचा रहेगा


यह कैसा अनुभव है, कैसी सिहरन है ये, कैसी बेचैनी है. यह एकदम जाने पहचानी नहीं. कल की सुबह जिस सुख के एहसास से भरी हुई थी वो सुख शाम तक गुम होने लगा. उस सुख में सेंध लगाकर जाने कहाँ से एक उदासी भी आ गयी. कल दोपहर के बाद यह उदासी सुबह के सुख में शामिल हुई थी. जब बारिश की तेज़ झड़ी के बीच मैंने ऑफिस के कॉरिडोर में 'बहुत दूर कितना दूर होता है' के ढेर सारे पन्ने पढ़े...मैं रुकना चाहती थी...रुक जाना चाहती थी, रुकी ही रहना चाहती थी लेकिन रुक नहीं पा रही थी. पहली बार मुझे अपनी तेज पढ़ने की आदत पर गुस्सा आया. क्यों मैं धीरे नहीं पढ़ सकती, क्यों मैं एक पन्ने पर दिन भर अटकी नहीं रह सकती. हालाँकि पढ़ चुकने के बाद तो अटकी ही हुई हूँ...

मैंने इस बेचैनी के बारे में लिखने की सोची कि पेज 136-137 पर लिखी लाइनों पर गयीं- 'कैसे यह यात्रा इतनी जल्दी अपने अंत पर है...इसके बाद फिर वापस एक असीम रिक्तता. शायद पहले से ज्यादा ही. कितना याद रहेगा इन पन्नों से गुजरते हुए उन अंधेरी रातों में जंग-हे के साथ चलना, बेनुआ की हंसी, कैथरीन की आँखें. खुद से देर तक बोलने की तड़प में बातें करना. कैफे के वेटर्स...यहाँ वहां की मुस्कुराहटें, लम्बी वॉक, सुस्त दोपहरें, कॉफियां और वह सब जिनके नाम धुंधले होते जा रहे हैं. और जिनका नाम मैं लेना नहीं चाहता. सारा कुछ. दो और दिन हैं मेरे पास...इन दो दिनों में जीने की इच्छा है अपनी ही यात्रा वापिस पढने की. शुरू से पूरा का पूरा वापिस जीने की. पर अभी नहीं, अभी कुछ और बचा है...'

यही एकदम यही तो चल रहा था मेरे मन में लेखक ने यह भी लिख दिया है. मुझे गुस्सा भी आया हंसी भी...लेकिन ज्यादा रोना आया. तभी बारिश की रफ्तार बढ़ गयी.

जब इस किताब को पढना शुरू किया था कितना उत्साह था. कितना सुख था हर पन्ने से गुजरने का. किताब का ज्यादा हिस्सा मैंने बारिश की आवाजों के बीच पढ़ा है. यह इत्तिफाक है कि यह किताब भीगते हुए ही घर पहुंची थी मानो अपने हिस्से की बारिशें लेकर आई हो और अब जबकि यह मुझे मेरे हिस्से की बारिशों के हवाले करके जाने वाली है, खत्म होने वाली है एक गहरी उदासी तारी हो गयी है. उदासी मेरी देह पर रेंग रही है. तो अब मैं क्या करूंगी...अब मेरी सुबहों में कौन होगा, कौन बीच दोपहर में कॉफ़ी पीने की इच्छा को आदेश में परिवर्तित करके सीधे रसोई में खड़ा कर देगा.

वापस फिर उस अंधी सुरंग में जाने का एकदम मन नहीं जहाँ सब व्यवस्थित और तयशुदा है, इस व्यवस्थित और तयशुदा होने में कितनी ऊब है, कितना विचलन. इन दिनों फैला हुआ घर बुरा नहीं लग रहा, बिखरा हुआ जीवन सुंदर लग रहा है...खुद को बेतरतीब शामों के हवाले करने में आनन्द आने लगा है. घर में टहलती चिड़िया से गप्पें लगाना रुचिकर लग रहा है. देहरादून की सड़कों पर भीगते हुए बारिश को महसूस करते हुए फ़्रांस की गलियों में भटकने का सुख लेने लगी हूँ...जैसे कोई जादू घट रहा हो.

लेकिन अब यह यात्रा समाप्ति की ओर है और मन घबराहट से घिर गया है. पढूं या न पढूं की बेचैनी के बीच Martine आ चुकी है. वही Martine जो 2012 में उत्तराखंड में मिली थी. सात बरसों के फासले में कितना कुछ बदल गया है. 'सेपरेट' होना सिर्फ एक शब्द नहीं है. एक जर्नी है...जिसकी एक-एक लकीर आपके चेहरे पर दर्ज होती है. दर्द आपकी मुस्कुराहटों में घुल जाता है.

'जब इस उम्र में आकर अचानक आप अकेले हो जाते हैं तो बहुत अजीब लगता है. पहले मुझे लगा था कि आज़ादी मिली है. लेकिन जल्दी ही मुझे लगने लगा कि इस आज़ादी का करना क्या है? मैं बहुत मेहनत करती हूँ खुश रहने के लिये. ख़ुशी आ जाती है पर ये आज़ादी असल में सिगरेट की तरह है...आप हमेशा से पीना चाहते थे पर जब आपके पास सिगरेट आई तो माचिस की सारी तीलियाँ खत्म हो चुकी थीं. ये आज़ादी इस वक़्त बिना माचिस की सिगरेट की तरह है...'

आज़ादी का बोझ...जो लेखक Martine के कंधे पर देख रहा है उसे मैं अपने कंधे पर महसूस कर रही हूँ. मैं Martine के गले लगकर खूब सारा रोना चाहती हूँ. मैं उसे बहुत प्यार करना चाहती हूँ, उसकी दोनों बेटियों के लिए अपने हाथों से कुछ पकाना चाहती हूँ अचानक मेरे भीतर से रुलाई का भभका फूट पड़ता है और हमेशा की तरह अचानक बिना जगह और आसपास का माहौल देखे फूटते इन रुलाई के भभकों को वाशरूम में पनाह मिली. तबियत बिगडती सी मालूम हुई तो घर जल्दी आना पड़ा.

देर तक लेटे हुए उदासी गाढ़ी होने लगी. किताब सिरहाने रखी रही...बार-बार उसके बचे हुए थोड़े से पन्नों को देखती और उदासी बढ़ जाती. क्या यह एक किताब के खत्म होने की उदासी है या कुछ और है. किताब के बहाने शायद मैं खुद की किसी यात्रा में चल पड़ी थी...और अब जबकि लेखक की यात्रा खत्म होने को है मेरे सामने कोई रास्ता नहीं वापस अपनी उसी सामान्य सी दुनिया में लौट आने के. मैं लौटना नहीं चाहती, मैं चाहती हूँ कैथरीन से बातें करना, जंग-हे के साथ घूमना...लेकिन नहीं यह चाहना बुरा रोग है. लेखक इन यात्राओं में आसक्तियों से बचना भी तो सिखा रहा है...कैथरीन की मिलने की इच्छा को यह कहकर टालना कि 'अभी तो मैं गिलहरियों के खेल को देखने में व्यस्त हूँ, अभी मैं कैसे आऊँ? ' इसमें एक सन्देश है. लेकिन वह सन्देश सुनने का मन नहीं.

ली-वान आकर सामने वाली कुर्सी पर बैठ गयी है. ली-वान चाइना से है. ली-वान से मैंने कहा,' मैं तुमसे कल मिलूंगी. अभी मुझे Martine के साथ रहना है. मैं स्मृतियों के चेहरे आपस में मिलाना नहीं चाहती.

Martine के चेहरे पर जिए जा चुके जीवन की थकन तो है लेकिन आने वाले जीवन का उत्साह नहीं है. मुझे उसके चेहरे में मेरा चेहरा उगता नजर आता है....शायद Martine भी इस वक़्त रो रही होगी...शायद कैथरीन भी...शायद ली-वान भी. शायद लेखक भी.नहीं लेखक निर्विकार है तमाम दुखों से, मोह से तभी वो लेखक है...

मैंने जानबूझकर कुछ पन्ने बचाए हैं. लेकिन यह दुःख मुझे निगल रहा है कि मैं इन पन्नों को कब तक बचाए रहूंगी...उसके बाद क्या होगा...मुझे अचानक सलीम और जीवन की याद आने लगी है और मेरा मन कर रहा है कि जीवन से बंटी की शिकायत कर दूं फिर सलीम के साथ बैठकर देखूं बंटी की चेहरे की उड़ती हुई हवाइयां.

यह शरारत भरा ख्याल मेरे भीतर की टीस को कम नहीं कर पा रहा...बारिश तेज होती जा रही. 

दोस्त ने कहा, 'फ़िक्र न करो सब कुछ होना बचा रहेगा' और मैंने दोहराया,'हाँ सब कुछ होना बचा रहेगा.' 

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