Tuesday, June 23, 2020

नींद तुम ख्वाब मैं


भरे-भरे बादल कबसे टंगे हुए हैं...ये किसके इंतजार में हैं. बरसते क्यों नहीं. जाने कहाँ चला गया है चिड़ियों का झुण्ड कि चुपचाप झरती पत्तियों की आवाजों को फिर से गाड़ियों के शोर ने ढांक दिया है. फल सारे उतर चुके हैं पेड़ों से शाखें खाली हैं, उदास हैं. यह ठहरे हुए लम्हे सहन नहीं हो रहे. मैंने फूलों की डाल को जोर से हिलाया कि कुछ हरकत तो है, कि यह स्टिल दृश्य नहीं है.

फूलों से भरी डाल इतनी जोर से हिलाए जाने बाद भी एक भी फूल नहीं छोडती धरती पर गिरने के लिए. ऐसा कैसे हो सकता है. लेकिन यह हो रहा है. कल रात मेरी नींद में जो ख्वाब चला आया था वो मेरा ख्वाब नहीं था तो वो मेरी नींद में क्यों था. उसमें मैं क्यों थी. अगर उसमें मैं थी तो मेरी बात सुनी क्यों नहीं गयी. बहुत अजीब है ये सब. मैं ऐसे तमाम सपनों को तोड़ दूँगी जिसमें मुझे जबरन रख दिया गया होगा और जिनमें मेरी आवाज की कोई आवाज नहीं होगी.

मैं नींद से उठकर पूरे घर का चक्कर लगाती हूँ ताकि उस उस ख्वाब को पटखनी दे दूं. उस ख्वाब को तो मैंने तोड़ दिया जो मेरा नहीं था लेकिन मेरी नींद में पैबस्त कर दिया गया था लेकिन इस सुबह का मैं क्या करूँ?

सोचती हूँ उसकी नींद का ख्वाब बन जाऊं...उसे वैसे ही दिक् करूँ जैसे वो मुझे करता रहा है...ख्वाब का यह ख्याल भी कितना सुंदर है.

डाल पर मुस्कुराते हुए फूलों को देखती हूँ, यूँ किसी के कहने पर डाल से न झरना, झरना तब जब तुम्हारा मन हो,..ये आंधियों को मुंह चिढाने की प्रैक्टिस है. मैं भरे हुए बादलों को देख रही हूँ, वो मुझसे कह रहे हैं,' तुम खुद बरस क्यों नहीं जातीं? मैं कहती हूँ ऑफिस को देर हो रही है...

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