Saturday, March 17, 2012

मैंने खुद को रास्तों में पाया है...


- प्रतिभा कटियार

धरती अपनी धुरी पर सदियों से घूम रही है. लगातार...लगातार...ये सफर कभी नहीं रुकता. लेकिन न धरती कहीं पहुंचती है न कोई धरती के करीब आता है. ये कैसा सफर है, कैसी चाल...कदम चलते ही जा रहे हैं बेहिस, राह बिछती ही जाती है कदमों में. इन्हीं ख्यालों की मद्धिम सी रोशनी और आंखों में उदासियों का सैलाब लिए एक रोज यूं ही घर की दहलीज को पीछे छोड़ दिया था. वक्त...कलाई पर बंधा जरूर था लेकिन याद नहीं. हां, सारा शहर दिन की ड्यूटी खत्म करके अपने-अपने घरों को लौट रहा था. रोशनी की दिप-दिप लगातार बढ़ रही थी. रोशनी को देख मुस्कुरा उठी थी. वो कौन सी रोशनी होगी जो बरसों से जमे गाढ़े अंधेरे को काट पायेगी. क्यों कोई सूरज नहीं पहुंचता मन के अंधियारों तक. क्यों नियोन लाइट का उजियारा बस अंजुरी में सिमट भर के रह जाता है...सवालों की बड़ी बुरी आदत होती है, उन्हें जरा सी ढील दो तो सरपट रेस लगाने लगते हैं. हर सवाल दूसरे सवाल को पीछे छोड़ आगे निकलना चाहता है. हालांकि किसी भी रेस का प्रतिफल कोई जवाब नहीं है.

वो शायद उस तारीख को शहर से निकलने वाली आखिरी बस थी. उस बस में मैं थी. मैं कौन...? कहां जा रही थी? कहां से जा रही थी? क्यों भला? आखिर तलाश क्या थी? न मंजिल का पता, न चलने का सबब बस एक सफर यूं ही शुरू हो गया था. मैं और कोई नहीं एक स्त्री. कहां जा रही थी, शायद खुद की तलाश में और खुद से ही दूर. गहरे नीले पर्दे को सरकाकर देखा तो शहर छूटता जा रहा था. ये जो छूट रहा था ये कौन सा शहर था. बस एक चांद था, जो पहचाना सा था. साथ वाली सीट पर एक नौजवान था, जो देर तक अपनी महबूबा से मद्धिम आवाज में गुफ्तगू कर रहा था. एकांत का एक टुकड़ा मिलते ही न जाने कितने सैलाब सवालों को लांघते हुए चले आए. कभी-कभी आंखों के समंदर में छलांग लगाने का भी अपना आनंद होता है. हालांकि हरदम आंसुओं को मुस्कुराहटों की ओट में रख देना भी कम कूव्वत का कम नहीं होता. सारा सफर उसी सैलाब के आंचल में भीगते बीता. सारे सफर में उस नौजवान की उसकी महबूबा से बात होती रही. जहां बस रुकी उसने मुझे चाय दी. बार-बार पूछता रहा, आप ठीक हैं ना? कभी-कभी अनजानी आवाजों में वो अपनापन मिलता है, जो जिंदगी भर के लिए अपनों की इबारत में गढ़ दिये गये लोगों से नहीं मिलता. वो नीम बेहोशी की रात थी. खुद से छूटने की...उस नीम बेहोशी में भी ये याद रहा कि किस तरह वो नौजवान मेरे कंधों पर शाल ढंकता रहा. जितना उससे बन पड़ा ख्याल रखता रहा.

सूजी हुई आंखों और गालों पर खिंची आंसुओं की लकीरों के साथ आखिरी स्टेशन पर उतरते हुए जब मैंने उसका नाम पूछा तो उसने नम आंखों से बस इतना कहा, अपना ख्याल रखियेगा. वो रुका नहीं, चला गया. पर वो गया नहीं, रुका ही रहा. कोई आवाज कहीं से स्टेशन के सारे शोर को रौंदती हुई आई और सीने से लिपट गई. न जाने कितनी देर हिचकियां दो देहों में लिपटी रहीं. ये सफर की शुरुआत थी या मध्य ये पता नहीं लेकिन इस सफर में एक खुशबू शामिल हो चली थी एक से मुसाफिरों के हमजोली बनने की खुशबू.

आपको कहीं देखा है...
मैं शहरों को उनके नाम से नहीं, उनमें बसने वाली प्यार भरी आवाजों के नाम से जानती हूं. वो शहर भी अपना नाम मेरी एक दोस्त की धड़कन में रखकर खुद को भूल गया था. हम एक-दूसरे को एक-दूसरे से छुपा रहे थे. हमने खिलखिलाहटों का मास्क लगाया और एक-दूसरे में प्यार भरा.
एक अजनबी चेहरा हमारे मास्क लगे चेहरों के करीब से रोज गुजरता था. अभिवादन करता और मुस्कुराता. हमें भी मालूम था कि उस चेहरे पर भी मास्क लगा है और शायद उसे भी यह मालूम ही था. फिर भी दुनिया की रवायतों को निभाना मानो सांस लेने जैसा क्रम बन गया हो. एक रोज अपने मास्क उतारकर सीढिय़ों के पास रखकर हम अपने बाल सुखा रहे थे, अपने गीले गाल भी और भीगा मन भी. तभी वो मास्क लगे चेहरे वाली स्त्री पास से गुजरी थी. हमने ध्यान से देखा तो उसका मास्क भी उस रोज नदारद था. वो वहीं बैठ गई हमारे पास. सचमुच पास.

मैंने खुद को खो दिया था-
धूप सीढिय़ों पर अठखेलियां करते हुए कंधों से आ लगी थी. अब हम दो नहीं तीन थीं. लेकिन शायद एक ही. उसने अपने शहर का नाम मुंबई बताया था. उम्र को अगर बरसों में गिना जाए तो पचास के पार की होगी शायद. नाम रक्क्षंदा हुडा. ये नाम यूं कभी याद न रहता जो उसने अपने दिल की गलियों में हमारा हाथ पकड़कर घुमाया न होता. कैनवास पर अपनी जिंदगी के बिखरे हुए रंगों को कैसे उसने पकड़-पकड़कर समेटा था. हर कैनवास पर एक संसार था. स्त्री के मन का संसार. उसकी जीने की शिद्दत का संसार, रंगों पर चढ़ी अवसाद की काली चादर का संसार, उससे बाहर निकलने की तीव्र इच्छा का संसार...कामनाओं के रंगों वाले उस संसार से हम भीगे हुए ही बाहर निकले थे. हमारी खिलखिलाहटों के मुखौटे वहीं सीढिय़ों के पास पड़े हुए मुरझा गये थे और हमारे हाथ एक दूसरे की हथेलियों को लगातार कस रहे थे. बरसती हुई आंखों में मुस्कान समेटे हम कितने करीब आ बैठे थे. जख्मों को हमने मुस्कुराहटों से पीछे धकेल दिया था. कहानी वही पुरानी...दर्द भी वही जाना पहचाना सा, हर दिल में पलता हुआ बस कि हमारी हथेलियों ने एक-दूसरे को शायद पहली बार कसा था. अपनी ही धुरी पर घूमते-घूमते धरती शायद सरककर हमारे कंधों से आ लगी थी. दो कदम आगे बढ़कर. चाय के प्याले से उठता धुआं उन गलियों में ले गया, जहां एक नयी नवेली दुल्हन अपने शौहर का हाथ थामे ख्वाबों की पनाहगाह में दाखिल होती है. सबको खुश रखना ही जहां जीवन का उद्देश्य, धर्म और कर्म था. जहां अपने बारे में सोचने का न वक्त था, न नियम. बस सबकी मुस्कुराहटों पर निसार होना ही जिंदगी. बरस बालों पर होकर गुजरते रहे और हम सब पर निसार होते रहे. न जाने कब अपना नाम भी अपना नहीं रहा, न ख्वाहिशें अपनी, न चाह कोई. बस कभी एकांत मिलता तो कमर का दर्द एक टीस देता. एक रोज तेज बुखार में तपते हुई देह के सामने एक चुनौती आ खड़ी हुई. बेटे के स्कूल में पेंटिंग कॉम्पटीशन और बाजार सारे बंद. दवाइयों से बुखार को पीछे धकेल घर में पड़े कुछ सूखे बिखरे से रंगों को समेटा और कुछ उल्टा-पुल्टा, आड़ा-टेढ़ा खींचा. अगले दिन जब बेटा स्कूल से लौटा तो गुस्से से भरा हुआ. ये आपने किसकी पेंटिंग दे दी है? आंखों में आंसू भरे हुए रक्क्षंदा ने कहा, बेटा ये तो मैंने ही बनाई है. तो कोई स्कूल में मानता क्यों नहीं. मुझे डांट पड़ी कि मैं किसी बड़े आर्टिस्ट की पेंटिंग क्यों ले आया? बेटे को सीने से चिपकाकर जोर से रोने का जी चाहा था उस रोज. वो बड़ा आर्टिस्ट तेरी मां ही है, उसने कहना चाहा पर चुप रही. अगले महीने अपनी पॉकेटमनी बचाकर एक कैनवास और कुछ रंग लाकर दिए बेटे ने...न जाने कितने सालों बाद उस रोज धरती पर सूरज उगा था. न जाने कितने सालों बाद मेघ बरसे थे. आज देश के बड़े-बड़े शहरों में उसकी एक्जीबिशंस लगती हैं लेकिन उन अंधेरे और अकेले खानों की खामोशी वो किसी को नहीं देती. सदियों के सफर में हमसफर बनते हुए उसने हमें सबसे कीमती चीज दी, अपने गम, अपना संघर्ष और अपनी आरजुएं. विदा के वक्त हथेलियों में जुंबिश थी और दिल में यह सवाल कि क्यों सदियों से एक ही छत के नीचे रहते हुए हमारे बेहद अपने हमारे चुपचाप मरने की आहटें सुन नहीं पाते...उस रोज धरती ने कुदरत का नियम तोड़ा था एक पल को और गहरी सांस ली थी. राहत की सांस.

अपना सूरज खुद-
इंतजार बहुत हुआ. बहुत संभाली उम्मीदों की पोटलियां अपने कांधों पर कि कभी तो कोई मिलेगा जो हमें एक बिंदु के चारों ओर गोल गोल घूमते जाने के अभिशाप से मुक्त करायेगा. अब कोई इंतजार नहीं. अपने हाथों को गौर से देखा तो वो कम मजबूत नहीं थे. दिल के हौसले ने और मजबूती दी. तो क्या हुआ कि एमबीए की डिग्री ने चमकता करियर सामने बिछाया है. मोटी तनख्वाह और जिंदगी के सारे ऐशो-आराम. फिर भी नींद क्यों नहीं आती रात भर. क्या यही वो जीवन था जो हमने चाहा था. नहीं, ये जीवन समाज ने हमारे लिए चुना था. उहापोह के इसी बीहड़ से गुजरते हुए एक रोज एक टहनी पर बैठे सूरज ने उसका हाथ पकड़ लिया. बस, यही फैसले की घड़ी थी. राजस्थान के एक छोटे से गांव की वो सरपंच बन गई. दुनिया उसे छवि राजावत के नाम से जानती है. यूएन में वो सोढा गांव ही नहीं हर भारतीय गांव की उन्नति का खाका पेश करती है. छवि के भीतर इस धरती के हर कोने को खुशहाल करने का ख्वाब है. इसीलिए जब वो जीन्स को फोल्ड करके खेतों में कुदाल चला रही होती है तो सूरज ठीक उसके माथे पर चमक रहा होता है.

मेरा नाम अंजलि है-
इस सफरनामे में न जाने कितने शहर छूटने थे, न जाने कितने शहर मिलने थे और न जाने कितने लोग मिलने थे. लगभग आधा सफर तय हो चुका था और हम दोनों अजनबी महिलाएं अपने-अपने ढंग से सफर की ऊब को दूर करने की कोशिश कर रही थीं. कभी किसी बच्चे को देखते, कभी खिड़की के पार का छूटता संसार. हम दोनों संकोची थे. आखिर उसने मौन तोड़ा और बातचीत का सिरा उठाया. मेरा नाम अंजलि है, क्या मैं आपके पास बैठ सकती हूं. क्यों नहीं. मैंने झट से कहा. अब वो मेरे करीब बैठी थी. खूबसूरत, लंबी, इकहरे बदन वाली वो एक आकर्षक महिला थी. काफी ठंड है ना? उसने पूछा. मैंने कहा, हां. दिल्ली तो और भी ठंडा है. उसने बात को आगे बढ़ाया. मैं चुप रही. जाने क्यों अजनबी लोगों से बातचीत के सिलसिले मौसम या देश की राजनीति से ही शुरू होते हैं. पॉलिटिकल डिस्कशंस से होते हुए हम उस मोड़ पर आ खड़े हुए जहां छुप के दिल में तनहाई रहा करती है. वो ज्वेलरी डिजाइनर है. देश ही नहीं विदेश में भी उसकी डिजाइन की हुई ज्वेलरी की काफी मांग है. ढेर सारी सफलताओं के बाद भी वो तन्हा थी. उसने बताया कि कितना मुश्किल था उसके लिए एमबीए करने के बाद बढिय़ा नौकरी छोडऩा और नये सिरे से नये करियर की ओर हाथ बढ़ाना. आज अंजलि अग्रवाल ज्वेलरी डिजाइनिंग का जाना माना नाम है. उसने धीरे से कहा, देखो घर जाकर क्या-क्या सुनना पड़े. उसकी आवाज में उदासी थी लेकिन अगले ही पल उसकी आवाज में खनक लौट आई. मैं खुश हूं यार, कि मैंने अपनी पसंद का काम चुना. हम दोनों ने अपनी हथेलियों को आपस में जोड़ा और हम दोस्त बन गये. सफर अब सचमुच खुशगवार बन चुका था. दूरियां अब दूरियां नहीं रही थीं.

कभी छांव कभी धूप-
जिंदगी के इसी सफर की उस मुसाफिर की याद ताजा हो आई जो दूसरी बार गांव की प्रधान बनी थी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक अनजाना सा गांव. एक दुबली-पतली सी औरत, जानवरों के लिए चारा काटती, दूध दुहती, घर के कामकाज करती और इस बीच उसके घूंघट को हवा भी नहीं हिला पाती थी. महिला सीट होने के कारण राजनैतिक पेचोखम से निपटने का यही तरीका था कि परिवार के लोग उसे चुनाव में खड़ा करें. जितने वोट पड़े वो पति के नाम पर पड़े. चुनाव में खड़ी होने वाली महिला भी, उसका पति भी और वोट डालने वाले वोटर भी सबको पता था कि सच्चाई क्या है. वो चुनाव जीती तो पति की गर्दन फूलों की मालाओं से भर गयी. वो दूध दुहती रही और पति प्रधानी संभालते रहे. कागज पत्तर पर जब उसके हस्ताक्षर की जरूरत होती तो उसे खड़ा कर दिया जाता. ये एक अंधी सुरंग थी जिसके दोनों सिरे पर सूरज था लेकिन उस घूंघट में सिमटी ग्राम प्रधान के हिस्से में सूरज की रोशनी पहुंचने से पहले ही चुरा ली जाती. पांच साल तक वो प्रधान रही और दूध दुहती रही, चारा काटती रही. अगली बार फिर उसे खड़ा किया गया. इस बार भी वो जीत गई. लेकिन इस बार वो सिर्फ चुनाव नहीं जीती, अंधेरा भी जीती. उसने कहा कि ये मेरा सूरज है, तुम क्यों लिए बैठे हो. पहले वो बात करते समय कांपती थी और अब विश्वास से खड़ी होती है. डेढ़ हाथ का घूंघट अब माथे तक सिमट आया है. अब वो सचमुच प्रधान है. उसकी हिम्मत ने अंधी सुरंग को काटकर रास्ता बनाया और वो इस काफिले का हिस्सा बन गई जो अपने लिए सुंदर जीवन चाहता है बिना किसी को नुकसान पहुंचाये. अरे हां, हमारी इस हमसफर को अब अपना नाम याद है, सरिता देवी.

ये सफर किसी के नाम, उसके काम, उसकी सफलताओं का नहीं है. ये सफर है खुद को जिंदा रखते हुए आगे बढऩे का नाम. हवाई जहाज में एयर होस्टेस की सबसे अच्छी बात जो मुझे लगती है वो उसका यह कहना कि इमरजेंसी की स्थिति में सबसे पहले खुद की सुरक्षा करें, बाद में दूसरों की मदद करें. कितनी सच्ची है यह बात. जो खुद अपनी मदद नहीं कर पा रहा है उस पर घर, परिवार, समाज की जिम्मेदारी का बोझ है. इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि अधिकांश स्त्रियों को पता ही नहीं कि उन्हें क्या चाहिए. जीवन वो जो उन्हें मिला है या वो जो चाहती हैं. रास्ते वो जिन पर उन्हें खड़ा कर दिया गया है या ढूंढने हैं नये रास्ते. बनी बनाई पगडंडियों पर चलने में सुरक्षा बोध है और अनजानी पगडंडियों पर चलने में जोखिम. लेकिन जीवन का आनंद जोखिम लेने में है. अपना सूरज खुद बनने में है. अपनी राहें खुद बनाने में है. अपनी मर्जी का मालिक खुद बनने में है. ये सफर कठिन हो सकता है लेकिन मुकम्मल यही होगा. कुछ नाम कुछ किस्सों के बहाने आइये हम सब जुड़ते हैं इस सफर में अपनी ख्वाहिशों की लगाम अपने हाथ में लेते हैं.

('अहा जिंदगी' के इस माह के 'स्त्री विशेषांक' में प्रकाशित)

8 comments:

  1. मैंने आह ज़िंदगी में पढ़ी थी...आप जब भी लिखती हैं ..अपने शब्दों से आँखों के सामने एक चलचित्र सा उपस्थित कर देती हैं...बधाई.

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  2. बहुत बढिया रचना ..
    सब पहलूओं को छूती हुई ..
    संतुलित !!

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  3. ये सफर किसी के नाम, उसके काम, उसकी सफलताओं का नहीं है. ये सफर है खुद को जिंदा रखते हुए आगे बढऩे का नाम. हवाई जहाज में एयर होस्टेस की सबसे अच्छी बात जो मुझे लगती है वो उसका यह कहना कि इमरजेंसी की स्थिति में सबसे पहले खुद की सुरक्षा करें, बाद में दूसरों की..........

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  4. ये सफर किसी के नाम, उसके काम, उसकी सफलताओं का नहीं है. ये सफर है खुद को जिंदा रखते हुए आगे बढऩे का नाम. हवाई जहाज में एयर होस्टेस की सबसे अच्छी बात जो मुझे लगती है वो उसका यह कहना कि इमरजेंसी की स्थिति में सबसे पहले खुद की सुरक्षा करें, बाद में दूसरों की..........

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  5. धरती अपनी धुरी पर सदियों से घूम रही है. लगातार...लगातार...ये सफर कभी नहीं रुकता. लेकिन न धरती कहीं पहुंचती है न कोई धरती के करीब आता है. ये कैसा सफर है, कैसी चाल...कदम चलते ही जा रहे हैं बेहिस, राह बिछती ही जाती है कदमों में.
    ...
    जरा देर सुस्ता लो मौसी ... ठंढा पानी पियो और मैं एक कप काफ़ी बना कर लाता हूँ आपके लिए ...थोड़ी देर आँख बंद करके लेट जाओ आप ...मगर आँख बंद करते ही किसी और सफ़र मत निकल जाना हाँ ! ...वरना मैं रो दूँगा अपनी बेबसी पर !
    किसी और के सफ़र से मेरा कोई खास वास्ता नहीं (मैं स्वार्थी ही सही )..मगर आपको हमेशा चलते हुए ही देखना... कभी कभी आपका ये बच्चा बहुत उदास हो जाता है ..वैसे भी ये अक्सर उदास ही रहता है

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  6. प्रभावशाली पोस्ट...

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