Saturday, May 26, 2012
यमन की सी मिठास गंगा की शान्ति
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उसे रंगों से बहुत प्यार था. कुदरत के हर रंग को वो अपने ऊपर पहनती थी. उसका बासंती आंचल लहराता तो बसंत आ जाता. चारों ओर पीले फूलों की ब...
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Thursday, May 24, 2012
नहीं, इतना एकांत काफी नहीं...
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दूर-दूर तक फैला एकांत का विस्तार और उसमें चहलकदमी करती खामोशी. एक पांव की आहट दूसरे को सुनाई नहीं देेती. एकांत का हर हिस्सा अंधकार मे ड...
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Monday, April 30, 2012
ओस की बिछावन पर स्म्रतियों के पंख ...
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ना जाने कब ज़िंदगी का सम छूट गया...अपने ही सम को पकड़ने के लिए हाथ बढाया और खुद से ही छूट गयी. इस दरम्यान एक नींद के गाँव के बारे में स...
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Wednesday, April 11, 2012
उगना...
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' न...अब सांस लेने की कोई गुंजाइश नहीं बची. जीने का जी नहीं करता कि अब सीने में कोई ख्वाहिश नहीं उगती...न ख्वाब आते हैं नींद के गांव...
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Sunday, April 1, 2012
तेरी जुस्तजू करते रहे...
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पहाड़ों की एक महकती शाम...लड़की न भी चाहे तो भी चाँद की किनारी आँचल से छू ही जाती. वो मुंह फिराकर नाराज होने का नाटक करे तो भी चाँद शदीद मो...
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