प्रतिभा की दुनिया ...
Monday, April 30, 2012

ओस की बिछावन पर स्म्रतियों के पंख ...

›
ना जाने कब ज़िंदगी का सम छूट गया...अपने ही सम को पकड़ने के लिए हाथ बढाया और खुद से ही छूट गयी. इस दरम्यान एक नींद के गाँव के बारे में स...
11 comments:
Wednesday, April 11, 2012

उगना...

›
' न...अब सांस लेने की कोई गुंजाइश नहीं बची. जीने का जी नहीं करता कि अब सीने में कोई ख्वाहिश नहीं उगती...न ख्वाब आते हैं नींद के गांव...
11 comments:
Sunday, April 1, 2012

तेरी जुस्तजू करते रहे...

›
पहाड़ों की एक महकती शाम...लड़की न भी चाहे तो भी चाँद की किनारी आँचल से छू ही जाती. वो मुंह फिराकर नाराज होने का नाटक करे तो भी चाँद शदीद मो...
14 comments:
Sunday, March 18, 2012

उनके लहू का रंग नीला है...

›
उनकी शिराओं में लाल रंग का नहीं नीले रंग का लहू है... देह पर कोई चोट का निशान नहीं मिलेगा न ही गुम मिलेगी होठों की मुस्कराहट साइं...
10 comments:
Saturday, March 17, 2012

मैंने खुद को रास्तों में पाया है...

›
- प्रतिभा कटियार धरती अपनी धुरी पर सदियों से घूम रही है. लगातार...लगातार...ये सफर कभी नहीं रुकता. लेकिन न धरती कहीं पहुंचती है न कोई धरती...
8 comments:
‹
›
Home
View web version
My photo
Pratibha Katiyar
A journalist,writer and always a learner
View my complete profile
Powered by Blogger.