Sunday, February 26, 2012
चोंच में अटका अंत...
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- प्रतिभा कटियार 'फिर क्या हुआ?' चिडिय़ा ने पूछा... 'फिर...?' चिड़ा खामोशी के सिरहाने पर सर टिकाते हुआ बोला...'फ...
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Wednesday, February 22, 2012
कहने को तो बहुत रहा - विनोद कुमार शुक्ल
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कहने को तो बहुत रहा इतने दिनों कि अभी तक उसका कभी आना याद नहीं और उसका जाना बार- बार याद आता है कि अभी उसका जाना हुआ उससे सब कहन...
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Monday, February 20, 2012
सांसों का भार कितना अधिक होता है...
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हमारे भीतर एक दुनिया होती है. जहां रास्ते भी होते हैं और मंजिलें भी. जहां मौसम भी होते हैं और आरजुएं भी. जहां, नदियां भी होती हैं और पठार भ...
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Friday, February 17, 2012
बोलो ना शिम्बोर्स्का...तुम हो ना?
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- प्रतिभा कटियार कविता मुझ तक पहले आई या मै कविता तक पहले जा पहुंची याद नहीं लेकिन विस्साव शिम्बोर्स्का के आँचल तले बैठते ही सुकून आ गया ...
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Thursday, February 16, 2012
शहरयार- आरज़ू उनके तसव्वुर की रखी ही रही
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- प्रतिभा कटियार वो झरते कोहरे की एक शाम थी. चाय की प्यालियों में कोहरे की खुशबू भी घुल जाती थी. शहरयार साब एक मुशायरे में आये थे. उन...
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