पिछले बरस मेरे जन्मदिन पर चमोली में मित्र ने एक पौधा लगाया था। सुना है वह पौधा अब बड़ा हो गया है।

लाल टिब्बा का वैभव अब ब्लोगर्स और फोटोग्राफर के हवाले हो चुका है। दुर्लभ प्राकृतिक दृश्यों से घिरी जगह की खूबसूरती को सम्पूर्ण मौन और समर्पण में ही महसूस किया जा सकता है। शुरुआती दिनों में कई बरस पहले जब आती थी तब इतनी भीड़ नहीं होती थी। ख़ासकर ऊपर जहां बड़ी सी दूरबीन से हिमालय की रेंज को देखने का सुख रखा था। हम अक्सर मौसम के खुलने का इंतज़ार करते थे हालांकि दूधिया ओढ़नी में लिपटे पहाड़ों और जंगलों के सौंदर्य में गुम होते हुए बर्फ से लदे पहाड़ों को न देख पाने का मलाल नहीं ही हुआ कभी।
अक्सर यहाँ चाय की प्यालियों में बादल का कोई टुकड़ा रखा देखा है। चलते हुए महसूस किया है कि पाँव ज़मीन पर नहीं बादलों पर पड़ रहे हैं। कल्पना में नहीं सच में। यही बात लैढ़ोर को खास बनाती है।
लेकिन, हम जिस सुख की तलाश में पहाड़ों पर जाते हैं उसी सुख को नष्ट करने की अभिलाषा भी साथ लिए जाते हैं। जिस डाल पर बैठे हैं उसे ही काटने में लगे लोग हैं हम। लालच इतना कि दुनिया कि हर अच्छे पर अपनी नेम प्लेट लगाने को व्याकुल। बाज़ार को दोष देना कई बार खुद को बचाना भी लगता है।
लाल टिब्बा का वैभव इस बार लोगों की भीड़ में, खुद को अच्छे अच्छे पोज में फोटो में कैद कर लेने की हड़बड़ी में और ढेर सारा खाना पीना करने में गुम होता दिखा। वो जगह जो मेडिटेटिव हुआ करती थी अब कैफे में बदल गयी है। खाना और फोटोग्राफी की होड़ मिलकर जैसे शांत पानी में कंकड़ी मार रहे थे।
जगह की कमी थी और लोग इंतज़ार की लाइन में थे। सूरज अपने पूरे वैभव के साथ डूब रहा था और लोग अपनी कॉफी, अपने खाने का ऑर्डर करने में बिज़ी थे।
वहाँ जमा तमाम लोगों में मुझे एक भी ऐसा नहीं दिखा जो प्र्कृति इस अनमोल लम्हे के सजदे में हो, जो इस सुख को आत्मसात करते हुए छलक पड़ा हो, जिसने अपने भीतर कुछ पिघलते हुए महसूस किया हो।
जिस जगह बैठकर कभी सुख से छलक पड़ा करती थी आज उस जगह के खो जाने का दुख तारी होने लगा था। एक बार फिर यह बात पुख्ता हुई कि टिकट कटाकर निकल पड़ने से आप यात्रा का सुख ले पाएंगे यह बात अधूरी है। यात्रा की तैयारी पहले भीतर करनी होती है। वरना सोशल मीडिया तो अपडेट हो जाएगा लेकिन जीवन अपडेट नहीं हो पाएगा।
मन की इस उथल-पुथल और बेचैनी को कौन सुनता वहाँ सिवाय मौसम के। सो ठंडी हवा के झोंके ने कंधे सहलाते हुए कहा, 'परेशान न हो मैं हूँ न।' मैंने चलना शुरू कर दिया...ठंड ने गाल सहलाये तो साथ लाई हुई शाल मुस्कुरा उठी।
जारी...
सूरज ढलते ढलते उदास शाम का सिरा थमा गया था। दिन के जाने और रात के आने के बीच का यह छोटा सा वक्फ़ा अपने भीतर न जाने कितनी उथल पुथल समेटे होता है। किसी के जाने और आने के बीच का वो हिस्सा जिसमें न जाने कितने संशय सांस ले रहे होते हैं। विगत की हथेलियाँ छूट नहीं रही होतीं और आगत की आहट का कोई पता नहीं होता।
देवदार के घने जंगलों के बीच रोशनी और अंधेरे के रंग खेल खेल रहे थे। यह आँख मिचौली का खेल नहीं था, यह खेल था सांस के आने और जाने के बीच जरा सा सुस्ता लेने का। लैंढ़ोर न जाने कितनी बार आई हूँ लेकिन आने और आने में फर्क होता है। इस बार का आने खुद से ख़ुद को रिहा करने के लिए जरूरी था। मैं उन रास्तों पर चलते हुए जीवन की उन पगडंडियों की स्मृतियों को भी पार कर रही थी जिन पर चलकर मेरा वजूद बना है।
जंगल की ख़ुशबू को थाम लेने को व्याकुल हथेलियाँ ख़ुद पर हंस रही थीं। ख़ुशबू को भला कोई थाम सकता है? क्या उसकी कोई तस्वीर ली जा सकती है? नहीं, ख़ुशबू को सिर्फ जिया जा सकता है। एक जगह बैठकर मैं देवदार और आसमान की गुफ्तगू को होते हुए देख रही थी। मेरे पीछे जीवन और मृत्यु का मंत्र बुदबुदा रही थीं कब्रें। उन कब्रों में सोये हुए लोग सुकून में तो होंगे शायद।
जब सब कुछ इतना फ़ानी है तो झगड़ा किस बात का है आखिर। झगड़े का संसार हमारा बनाया हुआ है। झगड़ा कितना बेवजह यह बताने को कुदरत हमेशा तैयार रहती है। टट्टू पर बैठा खिल खिल करता बच्चा, उसके साथ चलता पिता, फोटो का ठीक ठीक एंगल ढूंढती माँ की खुशी, जीवन पर भरोसा है। वह भरोसा जिसे दुनिया भर के समझदार लोग लगातार तोड़ने पर लगे हैं।
चलते-चलते पूरी धरती नाप लेना चाहती हूँ। इन दिनों पाँव थकते नहीं हैं। असल में जितना चलती हूँ मन को उतनी रिहाई मिलती है। चलना रास्तों से रिश्ता बनाना है, ख़ुद के करीब लाता है। चलते हुए चुप रहना किसी ध्यान में होने जैसा होता है। यह हाल ही में जाना है। अपने हाल में जाने हुए को मुट्ठियों में कैद कर लेना चाहती हूँ। फिर ख़ुद की बेवकूफी पर हंस देती हूँ। जो कुछ भी दुनिया में अच्छा है उस पर कब्जेदारी की हमारी फितरत।
यह मेरा जाना हुआ है, यह व्यक्ति मेरा है, यह जगह मेरी है, यह घर मेरा है...सारा झगड़ा मैं का है। ख़यालों के गहरे समंदर में डूबे हुए मैं अपने भीतर धँसती जा रही थी। भीतर धँसते जाने का अर्थ है अपने भीतर छुपा कर रखी उस क़ीमती शय जिसका नाम उदासी है को छू लेना।
मेरी आँखें बह निकली थीं और इस बात की खबर गालों के अलावा किसी को नहीं थी। लैंढ़ोर की हवा मरहम सी बन चुकी थी। भीतर का अंधेरा खाली हो रहा था और बाहर उगा रहा ताजा अंधेरा रोशनी बनकर भीतर प्रवेश कर रहा था।
युवा खिलखिलाहटों का सैलाब उधर से गुजरा तो लगा ढेर सारे फूल खिले हों। उनकी हंसी से एक फूल चुराकर मैंने अपने बालों में टाँक लिया था...
लैढ़ोर ने हाथ थाम लिया था।
(जारी...)
खुद से इतनी शिकायतें रहती हैं कि मुंह चुराती फिरती हूँ। मानो खुश रहना कोई गुनाह हो। जब-जब रत्ती भर सुख हुआ, उसके छूटने के दुख ने इतना विचलित किया कि सुख के गाल पर मानो कोई स्क्रेच आ गया हो। वो मुझे घूर के देखता और मुंह फेर लेता। सुख को नाराज़ होते देखा है कभी?
मैं उसके नाराज़ होने से उदास तो होती हूँ लेकिन उसे मना नहीं पाती। जाने कहाँ से प्रेमी की यह आदत मुझमें छूट गई।
बाज दफा तमाम शिकायतें होती ही इसलिए हैं कि उन्हें मान मिले, उनकी परवाह की जाय। देखा है अक्सर झगड़ों की वजह इतनी मामूली होती हैं कि हैरत होती है कि भला इस बात पर कोई कैसे झगड़ सकता है लेकिन जो इश्क़ के खेल से वाकिफ हैं वो जानते हैं ये झगड़ा नहीं प्रेम है। वजह पर मत जाओ, प्यार पर जाओ। जब प्रेमी रूठे तो रूठने की वजह मत तलाशो, तर्क मत करो बस बाहों में भर लो। एक स्नेहिल स्पर्श हज़ार मर्ज की दवा होती है।
सब जानते हुए भी सुख की हथेलियाँ थाम नहीं पाती, हालांकि चाहती हूँ उसके कंधे पर सर टिकाकर बची हुई उम्र गुज़ार दूँ। प्रेम में मान बहुत होता है। सुना था मानिनी प्रेमिकाओं का माथा हमेशा उन्नत होता है और उनके चेहरे पर अलग ही चमक होती है। क्या मेरे चेहरे पर वह चमक है? आईना देखती हूँ और मुस्कुरा देती हूँ।
मेरा रूठा हुआ सुख मुझे आईने में देख अपना रूठना भूल जाता है। क़रीब आकर खड़ा हो जाता है। बिलकुल सटकर। हम दोनों साथ में अच्छे लगते हैं मैंने मन में सोचा। मेरा ऐसा सोचते ही खिड़की से हवा का झोंका कमरे में दाखिल हुआ। आईने में मेरे सिवा कोई नहीं था।
कमरे में भी कोई नहीं। घबराकर इधर-उधर देखा, वो कहीं नहीं था। वो जा चुका था। नहीं जानती थी कि फिर वापस आएगा या नहीं। एक पूरा बरस या शायद उससे ज्यादा ही बीत गया उसे गए। वो सुख था पढ़ने का सुख, लिखने का सुख, संगीत का सुख, जीने का सुख। सुबह की चाय के साथ देर तक बारिश देखने का सुख, परिंदों के खेल देखने का सुख। मैंने सबको नाराज़ कर दिया और खुद को काम में झोंक दिया।
किताबें पास होने से आप उन्हें पढ़ लेंगे यह संभव नहीं। कई बार किताबों को पलटा, कुछ पन्नों का सफर तय किया और फिर जाने कहाँ खो गई। वो किताबें अच्छी हैं, मेरा ही सुर बिगड़ा हुआ है।
आज इस सुबह में जब आबिदा को कबीर गाते सुन रही हूँ तो महसूस हो रहा है कि कोंपलें सिर्फ बाहर नहीं फूट रही हैं। शायद मेरे सुख दरवाजे पर हैं। शायद वो लौटना चाहते हैं। शायद वो भी मुझे मिस कर रहे होंगे। अजीब सा दीवानापन है इस सुबह में। थोड़ी सी हड़बड़ी भी। ज्यादा सुकून है।
सोच रही हूँ चाय का पानी पहले चढ़ाऊँ या दरवाजा पहले खोलूँ? सुबह की चाय पिये कई महीने बीत चुके हैं। आखिर दरवाजा पहले खोलते हूँ, कहने को वहाँ कोई नहीं लेकिन मैं जानती हूँ एक जीवन है जो रूप बदलकर बिना दस्तक दिये आने की फिराक में है।
चाय का पानी चढ़ा दिया है, दो कप चाय का पानी। आबिदा आपा मुस्कुराकर गा रही हैं, भला हुआ मोरी मटकी फूट गई....