एक ऐसे रास्ते पर चलना जिसमें कोई होड़ न हो। जिस पर चलने वालों को कहीं पहुँचने की हड़बड़ी न हो। किसी को किसी से बेहतर साबित करने का कोई दबाव ही न हो। बस सुख हो साथ चलने का। हाँ, यह रास्ता है कविता कारवां का। कुछ कविता प्रेमियों ने सपना देखा किसी ढलती शाम में किसी पहाड़ी, किसी नदी किसी जंगल के तीरे बैठकर अपने दिल के बेहद क़रीब रहने वाली कविताओं को एक-दूसरे से साझा करने का। कवितायें भी अपनी नहीं, अपने प्रिय कवियों की। तो बस 2016 की एक शाम देहरादून के जसवंत मॉडल स्कूल में पहली बैठक हुई। तब से आज तक यह सिलसिला देश दुनिया में लगातार चल रहा है।
दिल ने कविता की देहरी पर दस्तक दी थी और कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी। आज वह दिल की दस्तक दस वर्ष का सफर तय कर चुकी है।
इस सुंदर कान्सेप्ट को किसने शुरू किया, कैसे आगे बढ़ा यह बात लगातार अर्थहीन होती गई और यही इसकी सफलता है। हर वो शख्श जो एक बार बैठक में शामिल हुआ इस आयोजन का उतना ही owner हुआ जितना शुरुआत करने वाले कभी थे। फिर यह सिलसिला बढ़ता गया, जिम्मेदारियाँ एक से दूसरे को ट्रांसफर होती रहीं। शहर-दर-शहर बैठकियां होने लगीं।
आज दसवीं सालगिरह की दहलीज़ पर खड़े हुए सिर्फ एक एहसास तारी है, कितना प्यार मिला, कितने प्यारे लोग मिले, कितना सुकून मिला। जीवन में भला और क्या चाहिए होता है।
कविता कारवां हर कविता प्रेमी का अपना कार्यक्रम है। दुनिया भर से लोग इसमें जुड़े हुए हैं। कोई कुछ चाहता नहीं है, सिर्फ देता है अपना समय, प्यार और साझेदारी। हम नहीं जानते यह दुनिया कैसे बेहतर हो सकती है, बस इतना जानते हैं कि हम जहां हैं, वहाँ से शुरुआत हो सकती है।
कविता कारवां पर नाज़ है। यहाँ कोई ईर्ष्या नहीं, द्वेष नहीं, कोई राजनीति नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्यार है और है अपनी प्यारी कविताओं के जरिये एक ख़ूबसूरत दुनिया का सपना देखना।
तो आइये, शामिल होते हैं कविता कारवां की दसवीं सालगिरह के उत्सव में और तलाशते हैं अपनी भूमिका इस दुनिया को मानवीय और करुणा से भरा हुआ बनाने की।
हैपी बर्थडे कविता कारवाँ!

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