Sunday, July 3, 2022

रूह


कल सारा दिन बारिश होती रही...मैं नीम हरारत में रूह को सिरहाने रखे बारिश देखती रही. किताब के कवर को देखती, पढ़ी हुई भूमिका को फिर-फिर पलट लेती लेकिन पहले ही वाक्य पर अटकी रही. 'यही वह किताब थी जिसे कभी लिखना न था...' यह एक वाक्य भर नहीं है. लम्बी यात्रा है. इसके भीतर कितनी उथल-पुथल, कितनी बेचैनी, कितनी तलाश, कितना अपनापन और एक ख़ोज शामिल है.

मैं अपने घर पर नहीं रहता हूँ
मैं उसे अपने साथ लिए फिरता हूँ...

कविता के साथ संवाद करते हुए घर शब्द के मायने ढूँढने लगती हूँ. पढ़ने की इच्छा को पढ़ने से ऊपर रखने का सुख अलग ही होता है. मैं इस सुख के साथ खेलती हूँ अक्सर. मानव को मैंने वैसे भी बहुत संभलकर पढ़ा है, कि थोड़ा पढ़ना बचाये रखूं कि कोई ऐसी जगह है जहाँ कभी भी जाया जा सकता है और वो जगह निराश नहीं करेगी.

इतवार की सुबह में भी हरारत बनी हुई है लेकिन बारिश थमी हुई है. मैं कश्मीर यात्रा पर निकल चुकी हूँ और किताब के दूसरे पन्ने पर ही मानव का देहरादून आना दर्ज पाकर खुश हो गयी हूँ. एक निजी सुख गुंथ गया है इस पाठकीय यात्रा में.

चेरापूंजी होते हुए कश्मीर पहुंचना, मिलना शब्बीर और बशीर से, मिलना गुल मोहम्मद से, मिलना उस नीले आसमान से, उस मंडराते चीलों से, नून चाय, कहवा, लवास की ख़ुशबू में डूबना चल ही रहा था कि सामने रूह आकर बैठ गयी है. मैं रूह से मुत्तास्सिर हूँ. ऐसी स्पष्टता, ऐसा आत्मविश्वास और ऐसी सहजता इसमें एक अलग सा आकर्षण है. 

लेखक को वाज़वान खाता छोड़कर मैं बालकनी में चक्कर काट रही हूँ.

मुझे राज्यपाल कुरैशी के दफ्तर के बाहर दो छोटे बच्चों के साथ बैठी रोती हुई औरत का चेहरा नज़र आता है. अपनी देह के उजले रंग को न नहाने से छुपाकर यहाँ के बच्चों में घुल जाने की तरकीब लगाते दो छोटे बच्चे दिखते हैं. एक चुप पिता हैं जो तमाम संवादों के ऊपर खिंची रेखा सरीखे हैं. एक डर है जिसे भीतर धकेलकर 'सब ठीक है' मन्त्र का जाप करते से मुस्कुराते लोग हैं. अनंतनाग, पहलगाम, श्रीनगर इन सब जगहों पर जा चुकी हूँ, वहां के लोगों से मिली हूँ कश्मीरी घरों में जाकर कहवा पिया है, कश्मीरी खाना खाया है, कुछ सवाल भी किये हैं कश्मीर की बाबत वहां के लोगों से और फिर पछताई हूँ सवाल करने पर कि उन सवालों के जवाब में मुस्कुराहटें पकड़ाई हैं लोगों ने.

लेखक की बेचैनी मुझे कम बेचैन करती है, ज्यादा बेचैन करती है कश्मीर को लेकर होने वाली वो तमाम राजनीति जिसने इस कदर लहूलुहान करके रख दिया है सब कुछ.

कश्मीर पर सूचनात्मक दस्तावेज तो खूब लिखे गये, पढ़े गये, चर्चा में आये लेकिन उन सूचनात्मक दस्तावेजों से इतर एक इनसाइडर स्टोरी के सामने खड़े होना आपको रुला देगा. वहां (कश्मीर में)एक बड़ा सा घर था से हम एक कमरे के छोटे से घर में रहने लगे तक को समझना. और इस समझने में कोई आक्रोश नहीं, हिंसा नहीं, किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं. यह संभव कर पाना असल में इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है. यह उस माँ की बाबत है जिसने अपने बच्चों को ऐसी तरबियत दी कि कश्मीर से आ गये फिर भी कश्मीर से प्यार नहीं कम हुआ बच्चों में, संघर्ष किये, संघर्षों की आंच में तपे लेकिन राजनीति की चतुराई के झांसे में नहीं आये कभी मोहरा नहीं बने किसी खेमे का. क्योंकि माँ और पिता दोनों जानते थे कि असल में दोनों एक ही हैं...'जिगरा तुम मुसलमान हो जाओ मैं हिन्दू हो जाता हूँ फिर देखते हैं कौन आता है हमें यहाँ से निकालने...'

बस एक बार, सारे हिन्दू मुसलमान होकर देखें और सारे मुसलमान हिन्दू होकर. बस एक बार हम अपनी चस्पा कर दी गयी पहचानों के खोल से बाहर निकलकर उन पहचानों में ढलकर देखें जिनके प्रति मन में गुस्सा है, जिनसे सवाल हैं...एक बार बस...

पेज 71 पर बुकमार्क लगाकर मैं अब तक के पढ़े हुए को चुभला रही हूँ. माया आंटी बहुत याद आ रही हैं. कि इसमें लिखे न जाने कितने किस्से उनसे सुने थे, पढ़ते हुए लगा वो ही हैं अक्षरों के बीच बैठी हुई कहीं. 

इतने सारे शब्द उलीच चुकने के बाद शब्दहीनता की शरण की तलाश में हूँ. फिर मुझे मानव का लिखा एक वाक्य शरण देता है कि 'किसी भी वाक्य पर पहुँचने के मेरे सारे रास्ते ऊबड़-खाबड़ थे'.

जारी...

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