Monday, June 6, 2022

शर्ट का तीसरा बटन



प्रशंसक की तरह नहीं एक सामान्य पाठक की तरह किताब को उठाती हूँ. किताब लिखने वाला दोस्त हो तो भी मैं किताब को ऐसे उठाती हूँ जैसे मैं लेखक को नहीं जानती. इससे पढ़ने का स्वाद अलग सा महसूस होता है.

इस बार भी मैंने इसी तरह किताब उठाई. 'शर्ट का तीसरा बटन' और इतवार की सुबह की तीसरी चाय के साथ भूमिका पर खुद को टिका दिया. आधा घंटा बीत चुका है. चाय खत्म हुए देर हो गयी है. धूप की चहलकदमी की रफ्तार कम हो गयी है वो अब ऊंघने लगी है पेड़ों पर.

मैं 'अतीत' और 'चित्रलेखा' के साथ वहीं अटकी हूँ. वही अपराध और दंड को सिरहाने टिकाये सोच रही हूँ कि किस तरह अतीत से निकलकर चित्रलेखा सामने आ खड़ी हुई है. मेरे सब दोस्त जानते हैं कि चित्रलेखा मुझे किस कदर पसंद है खासकर वो भरी सभा में कुमारगिरी के साथ शास्त्रार्थ करने वाला दृश्य. सच कहूँ लगता है चित्रलेखा की मेरे भीतर होने वाले बदलावों में बड़ी भूमिका है. आज सुबह मानव के उपन्यास में फिर से अतीत के संग चित्रलेखा का सामने आना कोई इत्तिफाक नहीं है...

पढ़ने में हड़बड़ी करना मुझे पसंद नहीं, इसलिए अभी कुछ समय भूमिका को चुभला रही हूँ.
रस्कोलोविच सोच रहे हैं कोई मुझे खत भेज भी दो...और मैं सोच रही हूँ कि अतीत को ख़त लिखूं...

चाय फिर से चढ़ा दी है, उधर धूप चढ़ रही है..

कुछ दिन 'शर्ट का तीसरा बटन' के संग गुजरने वाले हैं. और उसके बाद 'रूह' तो है ही...

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