Tuesday, March 10, 2020

मारीना- एक किताब की सहयात्रा में


- सिध्धेश्वर सिंह

इस किताब के बुने जाने के वास्ते रेशों के काते जाने की आहटें कुछेक वर्षों से मेरे कानों तक पहुंच रही थीं।इस बात का भान था कि 'कुछ' बन रहा है ; कुछ सीझ रहा है।पर इस बरस नया साल आते - आते किताब अंततः आ ही गई जो कि प्रकाशकीय हवाले से 'रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा का युग और जीवन' दर्शाने वाली एक 'जीवनी' है।आमतौर पर कोई भी (साहित्यिक)) जीवनी किसी 'था' अथवा 'थी' हो चुके व्यक्तित्व के कृतित्व पर रोशनी डालने वाली एक ऐसी किताब होती है जिसके जरिये एक पाठक अपने अब तक के जाने हुए में कुछ और जोड़कर देखता है लेकिन जिसके बारे में किताब लिखी जाय वह 'थी' होकर भी निरंतर/ सतत 'है' बनी रहे तो जाहिर है कि ऐसी किताब कुछ अलहदा ,कुछ जुदा ,कुछ न्यारी ,कुछ हट के तो होनी ही चाहिए।

किताब का नाम है 'मारीना 'और इसे लिखा है प्रतिभा कटियार ने।इसी साल जनवरी 2020 में आई यह किताब पिछले दो - ढाई महीने से मेरे साथ यात्रा करती रही है।नौकरी के सिलसिले में घर से डेरा और डेरे से घर की यात्राओं में इसे बहुत धीमी गति से ठहरकर पढ़ता रहा हूँ और अब इस स्थिति में हूँ कि एक पाठक की हैसियत से कुछ कह सकता हूँ। सबसे पहली बात तो यह कि यह जीवनी भर नहीं है बल्कि एक कविता प्रेमी का अपने प्रिय कवि को दिया गया एक ऐसा 'ट्रिब्यूट' है जिसमें महानता ,श्रद्धा और भावुकता की जगह दोस्ताना संवाद है।बड़े कवियों पर लिखी जाने वाली किताबों में उनकी बड़ी बातों पर ज्यादा फोकस रहता है और यह वह सबकुछ होता है जिसे दुनिया जाहिरा तौर पर जानती है। 'मारीना' इस अर्थ में भिन्न है कि यह वह सब तो बताती ही है जो कि एक कवि के जीवन और उसके रचे गए को सामने रखने से ज्यादा यह बता जाती है कि किसी कवि को कैसे पढ़ा जाय और उस पढ़े को गुनकर कैसे जिया जाय।पढ़ना तो मन लगाकर किया जा सकता है।समय ,समझ और उम्र के गुनने की थोड़ी सलाहियत भी आ (ही) जाती है लेकिन किसी कवि के जिये से उपजे रचे में रमकर जी जाना इतना सहल भी नहीं।मुझे लगता है कि यह वही बिंदु है जिसे जिगर मुरादाबादी और मिर्ज़ा ग़ालिब 'एक आग का दरिया है और डूबकर जाना है' तथा 'वो ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता' कह गए हैं।इस किताब को पढ़ते हुए मुझ बार - बार लगता है की मारीना की जिंदगी और शायरी का 'तीर -ए- नीमकश' जीवनीकार प्रतिभा कटियार के दिलोदिमाग में कहीं गहरे तक खुभा हुआ है। नहीं तो कोई किसी अदेखे -अजाने कवि को इतनी आत्मीयता से कैसे जान सकता है भला !

'मारीना' नामक इस किताब में कुछ रूस की एक महान कवयित्री के जीवन की 'क्रोनोलॉजी' है।उसके जगत के 'किस्से' हैं।उसकी कविताओं की किताबत है जो अनुवादों के जरिए संसार भर की अनेकानेक भाषाओं में घुलकर सदानीरा है। यह सब तो है ही इसमें लगभग हर चेप्टर के बीच पेजब्रेक की तरह 'बुकमार्क' शीर्षक से दर्ज वे इबारतें हैं जो इस एक मँझोले कद वाली किताब को हमारी हिंदी की एक जरुरी किताब बनाती हैं।.. और क्या कहूँ ! एक पाठक* के रूप में यह मेरी एक छोटी - सी टीप है जिसकी साझेदारी का मकसद बस यह है कि अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो मेरी राय है कि अवश्य पढ़िए और अगर पढ़ी है तो मैं सचमुच जानने को उत्सुक हूँ कि यह आपको कैसी लगी?
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* 'पाठक' शब्द पर स्टार लगाकर यह फुटनोट इसलिए लिख रहा हूँ कि ( हिन्दी के) एक प्रोफेसर के रूप में 'मारीना' की समीक्षा लिखना मेरे लिए बहुत आसान था लेकिन मैं अपने पाठक का क्या करूँ ! हिन्दी की पढ़ने - लिखने वाली बिरादरी में जिस तरह किसी किताब के आते ही 'ब्रेकिंग न्यूज' की तरह 'ब्रेकिंग रिव्यूज' आ रही हैं वैसे में इतनी देर से आज / अब अगर कुछ लिख सका तो अपने लिए बस यही कहूँगा कि (पढ़त - लिखत में) 'हमन को होशियारी क्या !' और जीवनीकार प्रतिभा कटियार के वास्ते भी कबीर के ही शब्द उच्चारूँगा कि 'हमन हैं इश्क मस्ताना '। तो,बस एक जानकारी भर कि एक कवि और उसकी कविताओं के इश्क में डूबी यह किताब 'मारीना' संवाद प्रकाशन से छपी है और इसका दाम तीन सौ रुपये (मात्र) है। तो ,मन करे तो 'मारीना' को खोजिए,खरीदिए और पढ़िए।
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पुनश्च : यह विश्व पुस्तक मेला ,नई दिली की तस्वीर है जिसमें 'संवाद' के स्टाल पर बैठीं एक कवि -अनुवादक की बेटी और दो युवा कवयित्रियों की प्यारी भतीजी नेहिल हैं जो मेरे इसरार पर 'मारीना' की मेरी वाली प्रति पर अपने ऑटोग्राफ दे रही हैं।

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (11-03-2020) को    "होलक का शुभ दान"    (चर्चा अंक 3637)    पर भी होगी। 
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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    रंगों के महापर्व होलिकोत्सव की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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  2. सुन्दर समीक्षा...।

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