Monday, February 3, 2020

खेलती हुई लड़कियां...


खेलती हुई लड़कियां
जोर से मारती हैं बल्ले पर आई गेंद को
गेंद निकल जाती है आसमान के पार
लौट कर नहीं आती कोई गेंद वापस वहां से
लेकिन बल्ले से गेंद को मारने वाली लड़कियां
धरती पर खड़े-खड़े ही
जान जाती हैं आसमान के उस पार का राज
कि हौसलों के आसमान के सिवा
कुछ भी नहीं है न इस पार, न उस पार

मुस्कुराती हैं वो
करती हैं अगली गेंद का इंतजार
खेलती हुई लड़कियां फुटबौल को जब मारती हैं पैर से
तो मारती हैं जिन्दगी में आई मुश्किलों को भी
थोड़ा संभल के भी और पूरे जोर से भी
जिन्दगी में घिर आई नफरतों को वो एक ही बार में
कर देना चाहती हैं 'गोल' सिर्फ प्यार बचाना चाहती हैं धरती पर

स्टेडियम गूँज उठता है तालियों से
लडकियों की आँखों में उभरी नमी
प्रेम के पौधे को सींचने का सामान बन उभरती है

शतरंज खेलती लड़कियां ध्यान से देखती हैं
राजा, रानी, हाथी, घोड़े, पैदल
उन्हें शतरंज की बिसात पर बिछा नजर आता है जीवन
शह और मात का खेल
वो बहुत सुभीते से सोच समझकर चलती हैं चाल
खेलती हुई लड़कियां जीत जाती हैं खेल के मैदान में
उन्हें अभी सीखना है जीतना जिन्दगी के मैदान में

2 comments:

  1. लड़कियां जीवन की कठिनाइयों को खेल की तरह लेती है।

    सुंदर रचना।

    पधारें लोकतंत्र 

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  2. वाह!!बेहतरीन सृजन!!

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