Monday, March 5, 2018

मिलन


जब तुम्हें देखता हूँ तब तुम्हें सोचता नहीं हूँ 
जब तुम्हारे पास आता हूँ, तब रास्ते में कहीं खो जाता हूँ
जो तुम्हारे पास पहुँचता है वो कोई और होता है
तुम जिससे मिलकर खुश होना चाहती थी
उससे मिलकर उदास होती हो
और जो तुम्हारे पास पहुँचता है वो गुनहगार
हालाँकि रास्ते में भटक जाने का गुनाह मेरा है, उसका नहीं
मैं रास्ते में भटका हुआ तुम्हारी उदासी से बहुत दूर होता हूँ
और वो उस उदासी को अपने कन्धों पर उठा पाने में लगातार नाकाम

उसके साथ चलते हुए तुम पीपल के पेड़ की ओट से झांकते चौथ के चाँद को देखती हो
चाय पीने की इच्छा को उपेक्षित करती हो
ठीक उस वक़्त मैं अपने भटकाव के रस्ते में मिली एक गुमटी में
चाय पीते हुए मैं तूम्हारे बारे में सोचता हूँ
तुम्हारी उँगलियों के नर्म स्पर्श के बारे में
तुम्हारी आँखों में उतरी उस नदी के बारे में
जिसकी तेज़ धार में हमारे ढेर सारे चुम्बन प्रवाहित हैं

मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है
और मैं तेज क़दमों से तुमसे मिलने को चल देता हूँ
जब मैं तुम्हारे पास पहुँचता हूँ तुम अपनी उदास आँखें लिए जा चुकी होती हो
मेरी देह पर तुम्हारा रुदन बिखर जाता है

मैं जानता हूँ कि अब जबकि तुम जा चुकी हो
मैं तुम्हारे ही बारे में सोचता रहूँगा देर तक
पीपल की कोई पत्ती टूटकर कांधों पर गिरी है
वो पत्ती मेरा दर्द समझती है शायद
क्या वो पत्ती तुम हो ?
(5 फ़रवरी 2018 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

7 comments:

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