Wednesday, February 21, 2018

वो दिन मुझसे खेल रहा है...



सीढियां उतरती हूँ तो जी चाहता है सीढियां ख़त्म ही न हों कभी. रास्तों पर निकलती हूँ तो चलती ही जाती हूँ लगातार, बिना थके, बिना रुके. खूब बात करती हूँ लोगों से लेकिन जीती हूँ ख़ामोशी ही. 'हाँ, सब ठीक है' दूसरों को बताते हुए किसी मन्त्र की तरह दोहराती हूँ. चाहती हूँ कोई आसपास न हो, कोई भी नहीं. हालाँकि जानती हूँ कोई है भी नहीं. कभी होगा भी नहीं. जो साथ थे  वो भी भरम ही थे होने का कि असल में वो तब भी कभी नहीं थे जब वो थे...इसलिए अब जो साथ है वो इस बात को समझ पाना भर है.

एक लम्बे समय से खुद को किसी कारागार में पा रही हूँ. हर उदास करने वाली चीज़ अच्छी लग रही है. ये उदासी का मौसम है. भीतर भी, बाहर भी. जिन पंक्षियों को उड़ते देख खुश होती थी अब खुश नहीं होती. अपनी उदासी को पहचानती हूँ. उसे हाथ में लेकर गोल-गोल घुमाती हूँ, उसे मेज पर अख़बार के ठीक बगल में. रख देती हूँ, उदासी उसके प्रति मेरी इस बेजारी से परिचित नहीं है इसलिए चौंक रही है.

यह अलग सा अनुभव है कि उदासी है लेकिन उदास नहीं हूँ, ठीक वैसे ही जैसे जीवन है लेकिन जीवन में नहीं हूँ

मोह कोई नहीं है सिवाय एक कप चाय पीने की इच्छा के कि आखिर एक दिन सब छूट ही जाना है.
टटोलती हूँ तो वो छूट जाने वाला दिन बहुत आसपास लगता है...

वो दिन मुझसे खेल रहा है...

4 comments:

  1. पलटवार, उससे खेलना शुरू करें !

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  2. पलटवार, उससे खेलना शुरू करें !

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  3. मन का मौसम ऐसा बदलता है कभी कभी

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  4. बहुत सुन्दर

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