Wednesday, August 27, 2014

नेह के पानी में भी जी लेती हैं कुछ मछलियां...


सुनो, शहर में दाखिल मत होना...शहर को अपने भीतर दाखिल होने देना...वो हाथ पकड़कर तुम्हें पहले इधर-उधर के रास्तों पर भटकायेगा...तुम घबराना मत...मुस्कुरा देना। भले ही शहर के रेलवे स्टेशन पर लिखा नहीं मिलेगा कि मुस्कुराइये कि आप इस शहर में हैं फिर भी मैं तुम्हें चुपके से बता रही हूं कि मेरे शहर को मुस्कुराहटें बहुत पसंद है। तुम बस मुस्कुराते हुए शहर की उंगली थामे भटकते रहना।

मेरे शहर से ज्यादा मुझे कोई नहीं जानता...इस शहर के हर कोने, हर सड़क हर गली, हर पेड़ हर डाल को मेरी आवारगी की खबर है...बिना भटका हुआ मुसाफिर मेरे घर तक आ ही नहीं सकता। शहर तुम्हें भटकायेगा जैसे अब तक जीवन ने भटकाया है....तुम बस हरी दीवारों में मेरी छुअन को पकड़ते जाना, रास्तों में मेरी रहन। हवाओं में समाई खामोशियों में मेरी कहन।

अरे हां, पत्तियों पर ठहरी हुई ओस की बूंदों को सलाम करना मत भूलना।

फिर एक जगह ले जाकर शहर तुम्हारा हाथ छोड़ देगा। वो तुम्हें ढेर सारे रास्ते देकर गुम हो जायेगा। एक बादलों भरा रास्ता तुम्हारा हाथ पकड़कर खींचेगा...तुम्हें मुग्ध करेगा...बादलों की ठिठोलियां तुम्हारा हाथ थामने को बेचैन होंगी। एक रास्ता ढेर सारे सुरों वाला होगा। जहां पहाड़ी धुनें, ढपली की थाप, पैरों की रिद्म कमसिन लड़कियों की खिलखिलाहटें होंगी....कोई रहस्य सा होगा वो रास्ता रहस्य जिसे तुरंत जानने को मन व्याकुल हो जाता है। एक रास्ता होगा किसी हरी सुरंग सा...अभिमंत्रित करता....तुम पलकें उठाओगे तो झुकाना भूल जाओगे....अप्रतिम सौंदर्य तुम्हें अपनी बाहों में घेरने को उत्सुक होगा, एक रास्ता झरनों और नदियों की कलकल लिये खड़ा होगा...जीवन के सफर की तमाम थकन धोने को वो झरने पुकारेंगे...वो नदियां अपना आंचल पसारेंगी...। एक रास्ता मिलेगा...गुमसुम वीरान...उबड़ खााबड़...उस रास्ते से कोई पुकार नहीं आयेगी...उस रास्ते पर कोई मुसाफिर जाता नहीं दिखेगा, कोई हलचल भी नहीं...

ओ जिंदगी के भटके हुए मुसाफिर तुम उसी गुमसुम रास्तों पर अपनी मुस्कुराते कदम रख देना... ये रास्ते कबसे तुम्हारी राह देख रहे हैं। उनकी ये मायूसी तुम्हारे इंतजार से हैं। उजड़ी सी वीरान दीवारों पर अब भी उम्मीदों का ढेर सारा हरा उगा हुआ मिलेगा...तुम उस तमाम हरे को अकोर लेना...उन दीवारों को हथेलियों से हौले से छूते हुए चले जाना...वो दीवारें तुम्हें तरह तरह के रंग बिरंगे गुलाबों के बागीचे में ले जायेगी...उसी बगीचे से होकर उपर जाती हुई चंद सीढि़यां मिलेंगी....मछलियां मिलेंगी उन सीढि़यों पर। जिंदा मुस्कुराती मछलियां...नेह के पानी में भी जी लेती हैं कुछ मछलियां...

जहां सारी सीढि़यां खत्म होंगी वहां लिखा होगा ख्वाहिश...

जिन रास्तों को तुम छोड़ आये थे वो सारे रास्ते यहीं से होकर जाते हैं....

(मेरे घर आना....जिंदगी - रास्ता )

4 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-08-2014 को मंच पर चर्चा - 1719 में दिया गया है
    आभार

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  2. वाह..लाज़वाब शब्द चित्र...

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  3. सुंदर प्रस्तुति

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