Wednesday, January 22, 2014

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना...


सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते-जाते

शिकवा-ए-जुल्मते-शब से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शमअ जलाते जाते

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते

जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वरना हम भी
पा बजोलां ही सहीं नाचते-गाते जाते

उसकी वो जाने, उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था
तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ से तो निभाते जाते...



2 comments:

  1. कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना
    फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते
    ...वाह...बहुत उम्दा ग़ज़ल...

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  2. कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना
    फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल.

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