Thursday, August 30, 2018

खेल


यह एक खेल है इन दिनों
काफी लोकप्रिय होता खेल
हालाँकि नहीं हुई है अभी इस खेल की इंट्री
ओलम्पिक, एशियाड में

जाति, धर्म, वर्ग, समुदाय का भेदभाव मिटाकर
सब इस खेल में शामिल हैं
न न, कैंडी क्रश या फॉर्म हाउस नहीं
इस खेल में इंटरनेट की दुनिया में
न शामिल लोग भी शामिल हैं
गरीब से गरीब भी
अमीर से अमीर भी

रोजगार नहीं?
कोई गम नहीं
घर में रोटी नहीं?
कोई बात नहीं
बच्चियों का बलात्कार?
ओह, दुःख हुआ
गाँव बह गये?
बुरा हुआ, कुदरत का कहर
केरल की बाढ़?
उफ्फ्फ...हम कर भी क्या सकते हैं
किसानों की आत्महत्या?
भई, इतना भी तूल मत दो इन घटनाओं को
कवियों और लेखकों की गिरफ्तारी?
उन्हह, वो इसी लायक हैं.

यही है वो खेल
एक हाथ का दर्द कम करने को
दूसरे हाथ में ज्यादा चोट देना
बुखार की शिकायत करने पर
कैंसर की बात छेड़ देना
एकता की बात करते करते
अलगाव के बीज बोना
धर्म और जातीय विभेद से लड़ने की तक़रीर पढ़ते-पढ़ते
और गहरी करते जाना खाई
संवेदना का जाप करते हुए
नफरत के हथियार पैने करते जाना
हिंसा और नफरत के इस खेल में
स्त्री, पुरुष, गरीब, अमीर, हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मण, शूद्र
शामिल करना सबको

यह सबको एक-दूसरे के प्रति नफरत से भर देने का खेल है

खिलाडियों की भीड़ है, भीड़ का उफान है
भीड़ का उत्साह देखिये इस खेल को खेलते वक्त
एक भी मौका चूक न जाए इसलिए वीडियो रिकॉर्डिंग मुस्तैदी से
फारवर्ड का अचूक अस्त्र और उत्साह बढ़ाता है खेल के प्रति

कुछ सड़क पर उतरकर खेल रहे हैं
कुछ न्यूज़ रूम में बैठकर
कुछ चौराहों पर,
कुछ चाय की गुमटियों पर
कुछ कौन बनेगा करोड़पति देखते हुए खेल रहे हैं
कुछ दांत भींचते हुए खेल रहे हैं स्मार्ट फोन के स्क्रीन पर
फेसबुक पर भी हैं बहुत से खिलाड़ी

जो इस खेल में शामिल नहीं हैं
उनकी चुप्पी शामिल है इसमें

जो मुखर होकर इस खेल के विरोध में हैं
वो या तो गायब हो जाते हैं अचानक जादू से
या 'अपनी मौत का जिम्मेदार खूद हूँ'
की चिट्ठी लिखकर झूल जाते हैं फंदे पर
या घर के भीतर कोई अदृश्य जादूगर आकर
कर जाता है उनकी हत्या
बिना कोई सुराग छोड़े

इस खेल के नियम ऐसे हैं कि हत्यारों के खिलाफ
नहीं मिलते कोई सुबूत
और लेखकों, कवियों, छात्रों,
और इस खेल में न शामिल हुए लोगों के खिलाफ
सुबूतों का ढेर मिल जाता है

कुछ भी हो हिंसा और नफरत के इस खेल ने
समूचे देश को एक सूत्र में बाँध रखा है.

Friday, August 24, 2018

साथ


जब मैं जीने की बात करती हूँ
तब असल में मैं
बात करती हूँ, अपने जीने की ही
मेरी जीने की बात करना
क्यों लगता है तुम्हें
मेरा तुम्हारे विरुद्ध होना

जब मैं हंसती हूँ खुलकर, खिलखिला कर
तब तुमसे कोई बैर नहीं होता मेरा
न मेरी हंसी होती है तुम्हें चुनौती देने के लिए
सदियों की उदासी से
मुक्त होने की ख्वाहिश भर है यह हंसी
मेरी यह हंसी क्यों लगती है तुम्हें
तुम्हारे विरोध में उठा कोई स्वर

जब मैं चलती हूँ तेज़ क़दमों से
तुमसे आगे निकलने की कोई होड़ नहीं होती
तुम्हारे साथ होने के सुख से
भरने की इच्छा होती है मन में
पीछे चलते हुए नहीं पाया मैंने साथ का सुख
शायद नहीं पाया तुमने भी

सांसों में 'जीवन' पाना चाहती हूँ
तुम्हारे साथ ही, तुम्हारे बिना नहीं
मेरे जीने की इच्छा से तुम डर क्यों जाते हो भला ?



Wednesday, August 1, 2018

बाइक राइडर गजेन्द्र रौतेला के कुछ रोमांचक एहसास

गजेन्द्र रौतेला पेशे से शिक्षक हैं मन से विद्यार्थी. मैंने उन्हें एक बेहद क्रिएटिव ऊर्जा से लबरेज और संवेदनशील युवा के रूप में जाना है. कक्षा में वे बेहतरीन प्यारे दोस्त जैसे शिक्षक होते हैं, कैमरा उठा लेते हैं तो न सिर्फ खूबसूरत नजारों को कैद करते हैं कैमरे में बल्कि खबरों का, सामजिक सरोकारों का आईना बन जाते हैं. माउंटेनिंग, बाइकिंग, ट्रेकिंग, उनके पक्के दोस्त सरीखे हैं. केदारनाथ आपदा का समय हो या हाल ही में साम्प्रदायिकता की चपेट में अगस्त्यमुनि को झुलसने से बचाने की कवायद, गजेन्द्र सबसे पहले हाजिर होते हैं. उनकी जो बात इन सबसे परे उन्हें खास बनाती है वो है उनकी सादादिली. वो अपने किसी भी काम का जिक्र सुनकर गहरे संकोच में धंस जाते हैं. गजेन्द्र ने अपना एक यात्रा संस्मरण 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए देकर 'प्रतिभा की दुनिया' का मान बढाया है.- प्रतिभा


पढ़ने लिखने की संस्कृति के बहाने बाईक राइड वाया अगस्त्यमुनि रुद्रप्रयाग (9:45 AM)-गैरसैंण-भिकियासैंण-रामनगर-काशीपुर-APF संस्थान दिनेशपुर उधमसिंहनगर 7:30 PM

दिनांक: 21 जून 2018
कभी-कभी खुद से बातें करते हुए अपने आस-पास की चीजों को महसूस करते हुए बाइक राइड करना एक अलग एहसास देता है। गुजरते वक़्त हर जगह की सरसराती कहीं गर्म, कहीं ठंडी हवा उस जगह के एहसास को भीतर तक महसूस करा लेती है।लगभग दो दशक बाद फिर से अगस्त्यमुनि से दिनेशपुर(रुद्रपुर) तक बाइक से गुजरने का मौका मिला ।बहुत सी चीजों में बदलाव भी देखा तो राज्य बनने के बाद भी बहुत कुछ यथावत भी।लगभग 350 किमी की इस बाइक राइड में गैरसैंण को राजधानी बनने की आस लगाए भी देखा तो बंजर होते खेत और खंडहर होते घर भी। बहुत कुछ झकझोर भी गया तो कुछ उम्मीदें बढाते प्रयोग भी। रामगंगा के किनारे बसा गणाई चौखुटिया के आस पास के रुपाई होते सेरे (खेत) आज भी यही बता रहे हैं कि जहाँ स्वाभाविक रूप से संसाधन उपलब्ध हैं वहाँ लोगों ने इनका भरपूर उपयोग भी किया है। वहीं दूसरी तरफ देवभूमि कहे जाने वाले राज्य में प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर वृद्ध केदार भगवान भी वैसे ही उपेक्षित हैं जैसे हमारे समाज में भी वृद्धजन उपेक्षित हैं यह अद्भुत साम्य है जहाँ इंसान और भगवान में कोई फर्क नहीं दिखता।

भतरौजखान के आस-पास का इलाका राज्य बनने अट्ठारह वर्षों के बाद भी पानी के संकट से जूझ रहा है।महिलाएं और बच्चे अपनी दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा पानी की जद्दोजहद में लगा दे रहे हैं। पूरे रास्ते भर छोटे-बड़े डिब्बों के साथ बच्चे और महिलाएं पानी के लिए भटकते हुए दिख जाते हैं। जबकि भतरौजखान के आस-पास का पूरा इलाका गढ़वाल क्षेत्र के लगभग धनौल्टी जैसा ही है । यदि इसको भी एक टूरिस्ट प्लेस के रूप में विकसित किया जाता तो स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी विकसित होते। भतरौजखान और मोहान के बीच का क्षेत्र कुछ छिटपुट बदलाव के बावजूद आज भी वैसा ही दिखता है जैसा राज्य बनने से पहले था। हाँ, कुछेक निजी पर्यटन व्यवसायियों द्वारा स्थापित कुछ अभिनव प्रयोग जरूर दिखाई दे जाते हैं।लेकिन दूसरी तरफ कभी उत्पादक रहे खेत और खंडहर होते घर हमारी आधुनिक जीवनशैली तथा पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी को बयां करती है। कभी अन्न उत्पन्न कर रहे इन बंजर खेतों में आज डिजिटल इंडिया के मोबाइल टावर उग आए हैं।यह नए उभरते भारत की एक बानगी भर है।यह भी सोचनीय है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य की जो सांस्कृतिक पहचान स्थापित होनी चाहिए थी अफसोस है उसमें आज भी हम बहुत पीछे हैं। अब देखना यह है कि इन खोखली हो चुकी जड़ों के सहारे ये दरख़्त कब तक बची -खुची मिट्टी के सहारे अपना अस्तित्व बचाये रख सकते हैं यह एक बड़ा प्रश्न है।


दिनांक : 26 जून 2018

स्थान : दिनेशपुर(रुद्रपुर) 5:30 AM-हल्द्वानी-भीमताल-भवाली-गरमपानी-भुजान-रिची-बिनसर महादेव(अल्मोड़ा)-भिकियासैंण-गैरसैंण-रुद्रप्रयाग-अगस्त्यमुनि (9PM)
दूरी लगभग 350 KM

अक्सर हम लोग किसी भी यात्रा की विशेष रूप से तैयारी और खास योजना बनाकर निकलते हैं । लेकिन कई बार इस तरह की योजनाबद्ध तरीके से की गई यात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण नए रास्तों की तलाश और नई जगहों को देखने की चाह में की गई आवारगी भरी यात्रा ज्यादा प्रभावी और यादगार हो जाती हैं।वैसे ही रही इस बार की मेरी 700 किमी की अकेले की बाइक राइड। एपीएफ के सौजन्य से 25 जून को सम्पन्न हुई 'पढ़ने लिखने की संस्कृति' के समागम के पश्चात 26 जून की सुबह 5:30 पर दिनेशपुर से वाया हल्द्वानी,भीमताल,भवाली पहुंचा तो डेढ़ दशक पुरानी यादें ताजा हो गई।

जिस सलडी में उस वक़्त गिने चुने कुछ ही कच्चे ढाबे थे वहां आज खूब सारे पक्के ढाबे दिखाई दे गए और चहल-पहल भी। भीमताल में कम होता पानी और चारों तरफ बड़े-बड़े होटलों की संख्या बढ़ते जाना मन में चिंता भी बढ़ा गई। भवाली का मेरा आशियाना जोशी जी की पीली कोठी भी कुछ उदास सी दिखी ज्यादातर बच्चे रोजगार के लिए बाहर ही हैं शायद इसलिए । कुछ देश में तो कुछ विदेशों में।यही हमारे पहाड़ की नियति है । चाहे वो गाँव हो या कोई कस्बा पलायन की मार सभी जगह है लेकिन इसका प्रभाव अलग-अलग दिखता है । जहां एक तरफ कस्बे वाले एक निश्चित अवधि में आते-जाते रहते हैं वहीं दूसरी तरफ सुदूर गाँव से गए वाशिंदे को अक्सर शहर निगल जाते हैं। भवाली के बाद गरमपानी में दुकानें तो बढ़ी हैं लेकिन जिस पानी के धारे के कारण गरमपानी को जाना जाता था वो धारा भी अब हमारी चेतना और संवेदनाओं की तरह लगभग नदारद ही है। जो धारा पहले सार्वजनिक था अब उसमें जितना भी पानी शेष बचा है पाइपों में कैद होकर व्यक्तिगत हो गया है।डर लगता है कि यह व्यक्तिगत होने का सुख किसी दिन खुद से बातें करने के लिए खुद की अनुमति ही न माँगने लगे ।भयावह होगा वह दिन तो।सोचिएगा जरूर।खैरना होते हुए रानीखेत का परम्परागत रास्ता चुनने के बजाय मैंने भुजान होते हुए भिकियासैंण पहुंचने का विकल्प चुना।अक्सर नए रास्ते आपको नए किस्म की चुनौती और एक नई दृष्टि भी देते हैं । भुजान से तीपोला सेरा,तुनाकोट सेरा,बगवान और विशालकोट गाँव होते हुए रिची पहुंचा।भुजान से कुजगड़ नाले के साथ-साथ चलते यह देखकर सुखद एहसास हुआ कि उस बीस -पच्चीस किलोमीटर के क्षेत्र में कुजगड़ के दोनों ओर सब्जी उत्पादन का शानदार काम हो रहा है। और उससे भी बड़ी बात यह कि वो भी सिर्फ स्थानीय लोगों के द्वारा।नेपाली मूल या अन्य कोई भी नहीं। मेरे लिए ये जानकारी किसी आश्चर्य से कम नहीं थी।अक्सर इस तरह की सब्जी उत्पादन का कार्य अधिकांशतः हमारे यहां नेपाली मूल के नागरिक ही करते हैं।तिपोला सेरा में सब्जी उत्पादक लाल सिंह जी से मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि-"हमारे क्षेत्र में बाहरी मजदूर कोई मिलता ही नहीं है इसलिए सारा काम खुद ही करना पड़ता है। बीज-खाद आदि खैरना-गरमपानी से या फिर हल्द्वानी से ही लाते हैं और बेचते भी वहीं हैं।सरकार द्वारा न तो बेचने के लिए कोई सुविधा दी गई है और न ही खाद-बीज की ही।सब कुछ स्वयं ही व्यवस्था करनी पड़ती है । यहां तक कि नहरों की मरम्मत तक भी हमें ही करनी पड़ती है।सरकार की गिनती में ये कोई काम थोड़े ही न हुआ ।" लेकिन ये देखकर मैं भी हैरान था कि बिना पानी वाले उखड़ के खेतों में भी स्थानीय लोग उखड़ के अनुकूल सब्जी उत्पादन कर रहे थे। सलाम है ऐसी जीवट जिजीविषा के लोगों के लिए।मेरे लिए तो यह दृश्य एक तरह से आंखें खोलने वाला ही था।

उसके बाद विशालकोट के आस-पास किसी नवयुवक द्वारा लिफ्ट माँगे जाने पर कुछ दूरी के लिए एक नया साथी मिल गया।पूछने पर पता चला कि इस बार दसवीं पास कर ग्यारवहीँ में गया है और नाम है रोहित मिश्रा।वह राजकीय इंटर कॉलेज पन्तस्थली में है और अपने ममाकोट आया हुआ था और गाड़ी न मिलने के कारण परेशान था और जाना था बिनसर महादेव में चल रही पूजा और मेले में। रिची तक साथ आने के बाद मेरा भी मन हुआ कि क्यूँ न साथी का साथ पूरा निभाया जाए तो हम भी चल दिए साथ बिनसर महादेव के रास्ते पर अपने नौजवान दोस्त रोहित मिश्रा के साथ 8 किलोमीटर दूर बिनसर महादेव। बिनसर महादेव पहुंचते ही समझ आया कि वास्तव में यह कितना बड़ा मेला है।दो घण्टे मेले की रौनक देखने के बाद रिची में खाना खाने के बाद दस-बारह किलोमीटर चला हूँगा तो पिछली रात की अधूरी नींद जोर मारने लगी।सड़क किनारे दाहिने तरफ एक सुनसान सा वीरान पड़ा मंदिर एक सुकून भरी नींद के लिए सबसे बढ़िया विकल्प मिल गया तो वहीं एक-डेढ़ घण्टे की मीठी नींद सो लिए।ट्रक के तेज हॉर्न ने नींद में खलल डाली तो मन ही मन शब्दों से पवित्र कर दिया उसको भी । आखिर मंदिर का प्रभाव जो हुआ ठैरा।सुस्ताते हुए भिकियासैंण होते हुए गैरसैंण-कर्णप्रयाग-रुद्रप्रयाग होते हुए रात 9 बजे लगभग 350 किमी की बाइक राइड के बाद अगस्त्यमुनि घर पहुंचे।

इस दौरान यह समझ भी आया कि चाहे कुमाऊं हो या गढ़वाल क्षेत्र महिलाओं की घास-लकड़ी-पानी की दिक्कतें एक सी ही हैं।राज्य को बनाने में जिस मातृ शक्ति ने सबसे ज्यादा संघर्ष और यातना झेली राज्य बनने के 18 वर्षों बाद भी उन की मूलभूत समस्याएं जस की तस हैं।आदिबद्री के आस-पास किसी नवयुवती को घास की कंडी पीठ पर लादे बारिश की रुमझुम में सरपट स्कूटी में भागते देखा तो लगा कि आधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल ऐसे भी हो सकता है।लेकिन जिनके पास सीमित साधन हैं या फिर उम्रदराज ईजा-आमा हैं उनका क्या ? तो खयाल आया कि क्या 108 जैसी इमरजेंसी सेवा की तरह ही कोई घसियारी एक्सप्रेस जैसी कॉल 10.......जैसी सेवा शुरू नहीं की जा सकती ? अक्सर देखा जाता है कि सड़कों पर हमारी माँ-बहनें जंगल से घास-लकड़ी लाने के बाद थकी -हारी सड़कों पर किसी ट्रक-गाड़ी का इंतज़ार करते हुए घण्टों भूखे-प्यासे गुजार देती हैं।उसके बाद भी यदि कोई रहमदिल ड्राइवर हो तो गाड़ी रोक लेता है अन्यथा फिर सड़क की दूरी भी फिर पैदल ही नापना शुरू।ज्यादा नहीं तो कम से कम पहाड़ की रीढ़ कही जाने वाली इन माँ-बहनों के लिए सरकार का महिला एवं बाल कल्याण विभाग या फिर बहुत सारी निष्क्रिय पड़ी सहकारी समितियों के द्वारा इनके कार्यबोझ को कम करने की कोई कोशिश तो की ही जा सकती है।और यह काम कोई असम्भव जैसा भी नहीं क्योंकि अक्सर महिलाएं वक़्त चाहे कोई भी हो समूह में ही जाती हैं घास-लकड़ी लेने के लिए जंगल।जब इनके द्वारा लाये गए घास से पल रहे जानवरों के दूध के कलेक्शन और बिक्री के लिए दुग्ध समितियां और गाड़ी हो सकती हैं तो इनके कार्यबोझ को कम करने के लिए 'घसियारी गाड़ी' क्यों नहीं हो सकती।सरकार बहादुर थोड़ा गौर जरूर कीजिए।और अगर आपके बस की बात न हो तो नाक पर हाथ रखकर जनता पर सेस लगाइए हमें खुशी होगी इसके लिए सेस देने पर।लेकिन करिये जरूर।
मेरा नई पीढ़ी के आवारा-घुमक्कड़ों से भी आग्रह है कि जहाँ तक सम्भव हो वे भी निकलें कभी कभार यूँ ही पहाड़ी रास्तों से अपने राज्य को जानने समझने और महसूस करने के लिए।पहाड़ के कठिन रास्ते होने के पूर्वाग्रहों से बाहर निकलिए और खोजिए-बनाइये अपने राज्य के नव निर्माण के नए रास्ते।तोड़ डालिए उन अवरोधों को जो आपके रास्ते की अड़चन बनें।तभी उत्तराखंड बनने की यात्रा भी सफल होगी ।अन्यथा हमारी आने वाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी कि आखिर हमने अपनी जिम्मेदारी क्यों कर नहीं निभाई।

Sunday, July 29, 2018

असफल प्रेमिकाएं- असीमा भट्ट




वो प्रेतात्माएं नहीं थीं
वो प्रेमिकाएँ थीं
वो खिलना जानती थीं फूलों की तरह
महकना जानती थीं खुशबू की तरह
बिखरना जानती थीं हवाओं की तरह
बहना जानती थीं झरनो की तरह
उनमें भी सात रंग थे इंद्रधनुषी
उनमें सात सुर थे
उनकी पाज़ेब में थी झंकार .
वो थीं धरती पर भेजी गयी हब्बा की पाकीज़ा बेटियां
जिन्हें और कुछ नहीं आता था सिवाय प्यार करने के
वो बार बार करती थीं प्यार
असफल होती थीं.
टूटती थीं
बिखरती थीं
फिर सम्हलती थीं
जैसे कुकनूस पक्षी अपनी ही राख से फिर फिर जी उठता है
फिर प्यार करती थीं
उसी शिद्दत से और उसी जुनून से
दिल ओ जान लुटाना जानती थीं अपने प्रेमियों पर
दे देना चाहती थीं उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ
बचा लेना चाहती थीं दुनिया की हर बुरी नज़र से
कोई भी बला आये तो पहले हमसे होकर गुज़रे
अपने रेशमी आंचल को बना देती थीं अपने प्रेमियों का सुरक्षा कवच
बन जाती थीं उनके लिए नज़रबट्टू लगा कर आँखों में मोटे मोटे काजल
उनके लिए बुनती थीं स्वेटर और सपने दोनों
गुनगुनाती रहती थीं हर वक़्त अपने अपने प्रेमी की याद में
खोयी खोयी अनमनी
अपनी ही धुन में
न किसी का डर
न दुनिया की परवाह
करती थीं रात रात भर रतजगा
और
ऊपर से कहती थी - ख्वाब में आके मिल
उनींदी आँखें लाल होती हैं असफल प्रेमिकाओं की
जैसे रात भर किसी जोगी ने रमाई हो धुनी

असफल प्रेमिकाएँ करती हैं व्रत, रखती है उपवास
बांधती हैं मन्नत का धागा
लगाती हैं मंदिरों और मज़ारों के चक्कर
देती हैं भिखारियों को भीख और मांगती हैं दुआँ में अपने प्यार की भीख
‘मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए’ कहते हुए गाती थी
‘हम इंतजार करेंगे तेरा क़यामत तक’
वो भूल जातीं दिन, महीने और तारीख
भूल जातीं खाना खाना
बेख्याली में कई बार पहन लेतीं उलटे कपड़े
लोग कहते - कमली है तू
और वो खुद पर ज़ोर ज़ोर से हँसतीं
बहाने बनातीं
जल्दी में थी
कमरे में अन्धेरा था
क्या करती, ठीक से दिखा ही नहीं
असफल प्रेमिकाएँ बचाये रखती हैं हर हाल में अपना विश्वास
बचाए रखती हैं अपने प्रेमी के प्रेमपत्र और उनकी तस्वीरें
गीता और कुरआन की तरह .

असफल प्रेमिकाएँ जब जब रातों को अकेली घबरा जाती हैं, रोती हैं तकिये
में मुंह रख कर
सोचती
नितांत एकांत रात में
सन्नाटे को चीरती हुई
उनकी चीत्कार ज़रूर पंहुचती होगी उनके प्रेमी के कानों में
वो अच्छा हो, वो भला हो
सब ठीक हो उनके साथ
कोई आफत न आयी हो उनके पास
जहाँ भी हो सुखी हो
मन ही मन बस यही कामना करती हैं असफल प्रेमिकाएँ
असफल प्रेमिकाएँ लगने लगती हैं असमय बूढ़ी
आ जाती है बालों में समय से पहले सफ़ेदी
और गालों पर झुर्रियां
वो झेल जाती हैं सबकुछ
नहीं झेल पातीं तो अपने प्रेमी द्वारा दी गयी पीड़ा, यातना, उपेक्षा और अपमान
लम्बी फेहरिश्त है असफल प्रेमिकाओं की
जो या तो पागल हुईं
या कुछ ने अपना लिया अध्यात्म
आश्रम या मेंटल एसालम बना उनका घर
वो जिसने खा ली नींद की गोलियां
या काट ली कलाई
किसी से न बर्दाश्त हुआ सदमा और रुक गयी दिल की धड्कन
बहुत उदास और अपमानित हो कर गयीं दुनिया से
वो मरी नहीं
उन्होंने आत्महत्या नहीं की
हत्या हुई उनकी
वो लोग जो उनसे प्यार का नाता जोड़ कर देने लगे समझदारी भरा बौद्धिक तर्क
कहने लगे - प्यार का कतई यह मतलब नहीं कि हमेशा साथ रहें.
हम दूर रह कर भी साथ रह सकते हैं
खुश रह सकते हैं
दूर हैं, दूर नहीं
वो कहती रहीं - एक झलक देखना चाहती हूँ
छूना चाहती हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारी साँसें
तुम्हारी मजबूत बाहों में पहली बार जो गरमाहट और सुरक्षा महसूस किया
था फिर से करना चाहती हूँ वैसा ही मह्सूस
और तुम ज़ोर से हँसते हुए कहते - ‘क्या बचपना है, यह सब बकवास है.’
ले ली उनकी जान इस बकवास ने
तुम्हारे आपराधिक प्रवृति ने
तुम्हारी कुटिल हंसी ने
तुम उड़ाने लगे उनका मज़ाक
खेलने लगे मासूम भावनाओं से
खेलने लगे उनके दिल से
कहती रहीं - खेलो न मेरे दिल से
पूछती रहीं - यह तुम्हीं थे
कौन था वो जो पहरों पहर मुझसे फोन पर करता था बातें
हरेक छोटी छोटी बातें पूछता
अभी कैसी लग रही हो
क्या पहना है
क्या रंग है
बताओ

बताओ ओ प्रेमी !
क्या तुम्हें नहीं लगता
वो बनी ही थीं प्यार करने के लिए
और तहस नहस करके रख दी उनकी जिंदगी
तुमने ले ली उनकी जान
अब डर लगता है तुम्हें
वो कहीं से प्रेतात्माएं बन कर आयेगीं और तुम्हें डरायेंगी
डरो मत
वो प्रेमिकाएँ हैं
प्रेतात्माएं नहीं
वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ती
वो तो क़ब्र में भी गाती हैं अपने प्रेमी के लिए शगुनों भरी कविता
देखना वो अगले बसंत फिर से निकलेंगी अपनी अपनी कब्र से बाहर
और करेंगी प्यार
और यह धरती जब तक अपनी धूरी पर घूमती रहेगी
तब तक वो करती रहेंगी प्यार
और पूरी दुनिया को सिखाती रहेंगी प्यार ...
https://www.youtube.com/watch?v=LhzBPGTydSs

Thursday, July 19, 2018

आपके साथ बीडी पीना तो रह ही गया नीरज जी


(एक पुराना लेख जो उनके जन्मदिन पर लिखा था.)



'आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी’ - नीरज

एक- एक नन्ही सी लड़की चुपचाप अपनी फ्रॉक के किनारी पर लगी फ्रिल को कुतरा करती थी. वो खामोश रहती थी. उसके कोई दोस्त नहीं थे. स्कूल में अपने हम उम्र बच्चों के बीच भी वो अकेली ही थी. क्लास में बैठकर क्लास के बाहर ताका करती और घंटी बजने का इंतजार करती. घन्टी बजते ही सब बच्चे खेल के मैदान की ओर दौड़ जाते और वो धीमे क़दमों से मैदान के किसी कोने में अकेले टिफिन खाती और अकेली घूमती रहती. वो टीचर्स की फेवरेट नहीं थी. घर में उससे यह पूछने वाला कोई नहीं था कि ड्रेस चेंज की या नहीं, खाना खाया या नहीं. ऐसे में भला ये कौन पूछता कि स्कूल में दिन कैसा रहा? क्योंकि उसके माँ बाप जीवन के दूसरे संघर्षों में उलझे थे. उस कक्षा एक में पढ़ने वाली नन्ही लड़की का अकेलापन भांप लिया एक शिक्षक ने जिनका नाम था गोपी सर. गोपी सर भी शायद स्कूल में, या हो सकता है जीवन में ही उस नन्ही बच्ची की तरह अकेले थे. उन्होंने स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए उस नन्ही बच्ची के तरह अकेले और उपेक्षित रह गए बच्चों की ओर हाथ बढ़ाया. ये वो बच्चे थे जिन्हें स्कूल के किसी कार्यक्रम में जगह नहीं मिलती थी, ये सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनते और ताली बजाते. गोपी सर ने उन सारे छूट गए उपेक्षित बच्चों का हाथ थामा और उनके लिए एक कार्यक्रम की योजना बनाई. कार्यक्रम तैयार हुआ ‘कवि सम्मेलन का’. कक्षा एक में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों को सुंदर-सुंदर कविताओं की कुछ छोटी-छोटी लाइने दी गयीं. उन्हें बाकायदा ड्रेसअप किया गया. अब वो बच्चे भी उत्साहित थे. उन बच्चों ने पहली बार मंच पर उन कवियों की कवितायेँ पढ़ीं जिनका शायद नाम भी नहीं सुना था. जिन्हें कविता होती क्या है यह भी पता नहीं था. ये 32 बरस पुरानी बात है. वो ‘इंडियन आइडियल’ और ‘सुपर डांसर’ जैसे कार्यक्रमों का समय नहीं था. उन बच्चों के जीवन में यह छोटी सी प्रतिभागिता बहुत महत्वपूर्ण थी. गोपी सर ने उस रोज न सिर्फ उन बच्चों का हाथ थामा था बल्कि उनकी जिन्दगी में हमेशा के लिए कविता का एक बीज बो दिया था. वो नन्ही सी लड़की मैं थी. उस रात मैंने जिस कवि की कविता पढ़ी थी उनका नाम है गोपालदास नीरज. यह मेरे जीवन में कविता की पहली आहट थी. वो लाइनें टूटी फूटी सी ही याद रहीं, ‘कोई कैसे जिए अब चमन के लिए, शूल भी तो नहीं हैं चुभन के लिए’.

दो- जब मैंने हाईस्कूल पास कर लिया तब पापा टेपरिकॉर्डर लाये थे. घर में बेलटेक का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी था, फिलिप्स का रेडियो भी था जिसका इस्तेमाल ‘बीबीसी की ख़बरें’ या ‘बिनाका गीतमाला’ और ‘हवा महल’ सुनने के लिए होता था, कभी-कभी ‘फौजी भाइयों के लिए कार्यक्रम’ भी. कब कौन सा कार्यक्रम रेडियो पर सुना जायेगा यह तय करने का हक बच्चों का नहीं होता था. ऐसे में टेप रिकॉर्डर आना सुखद घटना थी. चूंकि टेप रिकॉर्डर पापा लाये थे तो जाहिर है अपनी ही पसंद की चार कैसेट भी लाये थे. महीनों वो चार कैसेट ही मेरी खुराक बने रहे. उन चारों कैसेटों में से जिनमें एक थी ‘लता के सुपरहिट गीत’, दूसरी थी ‘मेरा नाम जोकर’, तीसरी थी ‘मुकेश के गीत’ और चौथी थी ‘नई उमर की नई फसल.’ मैंने पहली बार इस फिल्म का नाम सुना था. धीरे धीरे यह कैसेट मेरी फेवरेट हो गयी. ‘कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे’ तो मुझे अच्छा लगता ही था इस कैसेट का एक और गीत मुझे बेहद पसंद था, आज भी बहुत पसंद है ‘आज की रात बहुत शोख बहुत नटखट है, आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी, अब तो तेरे ही यहाँ आने का ये मौसम है, अब तबियत न ख्यालों से बहल पाएगी...’ इस तरह कोई कैसेट जो मेरी प्रिय कैसेट के रूप में और कोई कवि या गीतकार मेरी फेवरेट लिस्ट में पहली बार शामिल हुआ वो थे गोपालदास नीरज.

पत्रकारिता के दिनों की मेरे सबसे गाढ़ी कमाई यही है कि इस दौरान ढेर सारे प्यारे लोगों से मुलाकातें हुईं, उनसे स्नेह हासिल हुआ, दुलार मिला. इसी गाढ़ी कमाई में शामिल है गोपालदास नीरज का नाम भी.

अब तक मैं उन्हें काफी पढ़ चुकी थी. उनसे मेरी पहली मुलाकात थी. अख़बारों में जिस तरह की अफरा-तफरी के माहौल में काम होता है उसमें महसूस करने की स्पेस बहुत कम होती है. उनका इंटरव्यू लेना एक असाइनमेंट भर था. यह उन दिनों की बात है जब मेरी नयी-नयी शादी हुई थी और जैसा कि नयी शादी के बाद का तमाशा होता है पार्टीबाजी, सोशलाइज़िंग वगैरह तो उसका दबाव भी था. तो मुझे ऑफिस से रात नौ बजे निकलकर इंटरव्यू लेना था और साढ़े नौ बजे साड़ी पहनकर किसी पार्टी में जाना था (तब तक ‘न’ कहना सीखा नहीं था).

बहरहाल, जल्दी-जल्दी में इंटरव्यू हुआ और अच्छा हुआ. अगले दिन हिंदुस्तान अख़बार में ‘नीरज खड़े प्रेम के गाँव’ शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ. मैंने साड़ी लपेटकर, लिपस्टिक पोतकर पार्टी भी अटेंड की लेकिन मन उखड़ा ही रहा. मुझे लगा मैं मिली ही नहीं नीरज जी से, इसे क्या मुलाकात कहते हैं, इसे क्या बात होना कहते हैं. स्टोरी भले ही सफल रही हो लेकिन मन खिन्न ही रहा लम्बे समय तक. हालाँकि इस इंटरव्यू में उन्होंने अपनी प्रेम कहानी सुनाई थी, बहुत मन से.

खैर, वक़्त ने न्याय किया. इसके बाद मेरी नीरज जी से कई मुलाकातें हुईं. कुछ अख़बारों में दर्ज हुईं कुछ नहीं भी क्योंकि अब तक मेरी उनसे दोस्ती हो चुकी थी. वो शहर में होते तो हम जरूर मिलते. ढेर सारी बातें करते. मैं उन्हें सुनती ज्यादा, सवाल कम करती. पूछकर जानना मुझे सूचनात्मक ही लगता है, महसूसने की आंच में पकते हुए यात्रा करना असल में जानने की ओर जानना लगा हमेशा सो कोशिश भर यही किया, और असाइनमेंट के बोनस में खूबसूरत दोस्तियाँ और स्नेह हासिल किया.

एक शाम जब वो मंच पर थे तो मुशायरे की स्तरहीनता से मेरा मन बहुत उदास हुआ था. उस शाम नीरज जी ने याद किये थे वो तमाम मुशायरे जब मंच पर साहिर, शैलेन्द्र, कैफ़ी वगैरह हुआ करते थे. वो उन सोने सी दमकती रातों का जिक्र करते हुए बहुत खुश थे, उनकी आँखों में चमक थी. उन्होंने गीतों की यात्रा पर बात की. किसी बात के अर्थ किस तरह खुलते हैं, गीत किस तरह दार्शनिक यात्रा तय करते हैं और सुनने वालों को न सिर्फ सुकून देते हैं बल्कि उनका परिमार्जन भी करते हैं, एक अलग यात्रा पर ले जाते हैं यह लिखने वालों और सुनने वालों दोनों को समझने की जरूरत है. साहिर और शैलेन्द्र को वो काफी याद करते.

मैंने उनसे एक मुलाकात में जिक्र किया अपने बचपन वाले कवि सम्मेलन का और उनकी उस कविता भी जो मुझे ठीक से याद भी नहीं रही...वो हंस दिए थे उस बचकाने से किस्से पर. उन्हें भी कविता याद नहीं थी. वो हमेशा खूब पढ़ने को कहते, जिन्दगी जीने को कहते. उनकी कविताओं को उनके कमरे में चाय पीते हुए सुनना किसी ख़्वाब को जी लेने जैसा होता था...उनका कविता पढ़ने का ढंग मुझे बहुत म्यूजिकल लगता. हालाँकि उनकी आवाज कांपने लगी थी. लखनऊ में चारबाग के पास के एक होटल में उनसे अब तक की आखिरी मुलाकात हुई थी, उस रोज उन्हें चलने में काफी दिक्कत हो रही थी. मेरा मन बहुत उदास था. आयोजकों ने उनके सम्मान के साथ इन्साफ नहीं किया था. उनके रहने की व्यवस्था बहुत सामान्य थी. जबकि उसी कार्यक्रम के लिए आये प्रसून जोशी सरीखे लोगों के लिए दिव्य व्यवस्था थी.

हम बुजुर्गों के सम्मान का भाषण देना जानते हैं, उनके नाम उनकी शोहरत को कैश कराना भी जानते हैं लेकिन उनके साथ इन्साफ नहीं करते. सचमुच मेरा मन बहुत उखड़ा था, वो शायद मेरा मन पढ़ चुके थे. बीड़ी पी चुकने के बाद उन्होंने मेरा मन हल्का करने को कहा ‘एक फोटो तो खिंचवा लो हमारे साथ.’ मैंने छलक आये अपने आंसुओं को सहेजते हुए कहा था, ‘अरे आपसे तो मिलना होता ही रहता है, अभी आप आराम करिए, फोटो फिर कभी खिंचवा लेंगे.’ वो हंस दिए थे...’क्या पता अगली बार हो ही नहीं’. मेरी आंसुओं को सहेजने की सारी मेहनत वो बेकार कर चुके थे...तस्वीर खींची जा चुकी थी...मन की उदासी कायम ही रही...आज उनका जन्मदिन है...उन्हें बहुत बहुत याद करते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ की दुआ कर रही हूँ. दुआ कर रही हूँ कि सेल्फियों और फेसबुक के लाइक्स की भीड़ में बदलता यह समाज, तमाम सामाजिक खांचों में बंटा समाज, हिंसा और आत्ममुग्धता से तृप्त होता समाज, नकली संवेदनाओं का नया मार्केट बनता यह समाज अपनी इतनी महत्वपूर्ण धरोहरों को सहेजना सीख सके...काश!

प्यारे नीरज जी, आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपसे मिलना है जल्दी ही फिर से और सुननी हैं बहुत सी कवितायेँ...इस बार आपकी बीड़ी भी पियूंगी...पक्का. लव यू ऑलवेज, हैपी बर्थडे!