nओबल पुरस्कार विजेता विस्साव शिम्बोर्स्का की कवितायें
मुझे बहुत
priy हैं। आज उनकी यह कविता फ़िर से पढ़ी
और इसे पद्धति ही गई...आज के ज़माने में जब प्यार एक पहेली
बन चुका है शिम्बोर्स्का की कविता में अलग सी मासूमियत छलकती है
सच्चा प्यारक्या वह नॉरमल है...
क्या वह उपयोगी है...
क्या इसमे पर्याप्त गंभीरता है...
भला दुनिया के लिए वे दो व्यक्ति किस काम के हैं
जो अपनी ही दुनिया में खोये हुए हों...
बिना किसी ख़ास वजह के
एक ही जमीन पर आ खड़े हुए हैं ये दोनों
किसी अद्र्याश हाथ ने लाखों-करोड़ों की भीड़ से उठाकर
अगर इन्हें पास-पास रख दिया
तो यह महज एक अँधा इत्तिफाक था...
लेकिन इन्हे भरोसा है की इनके लिए यही नियत था
कोई पूछे की किस पुण्य के फलस्वरूप....
नही नही न कोई पुण्य न कोई फल है...अगर प्यार एक रौशनी हैतो इन्हे ही क्यो मिलीदूसरों को क्यों नहीं चाहे कुदरत की ही सहीक्या यह नैन्सफी नहीं है बिल्कुल है...क्या ये सभ्यता के आदर्शों को तहस-नहस नही कर देंगे...अजी कर ही रहे है...देखो, किस तरह खुश है दोनों।कम से कम छिपा ही लें अपनी खुशी कोहो सके तो थोडी दी उदासी ऊढ़ ले अपने दोस्तों की खातिर ही सही। जरा उनकी बातें तो सुनोहमारे लिए अपमान और उपहास के सिवा क्या है और उनकी भाषा॥कितनी संधिग्ध स्पष्टता है उसमे और उनके उत्सव, उनकी रस्मेसुबह से शाम तक फैली हुई उनकी दिनचर्या सब कुछ एक साजिश है पूरी मानवता के ख़िलाफ़...हम सोच भी नही सकते की क्या से क्या हो जाएअगर साडी दुनिया इन्ही की राह पर चल पड़ेतब धर्म और कविता का क्या होगाक्या याद रहेगा, क्या छूट जाएगाभला कौन अपनी मर्यादाओं में रहनाचाहेगा सच्चा प्यारमैं poochati हूँ क्या यह सचमुच इतना जरूरी है...व्यावहारिकता और समझदारी तो इसी में हैकी ऐसे सवालों पर चुप्पी लगा ली जाएजैसे ऊंचे तबकों के पाप कर्मों पर खामोश रह जाते हैं हमप्यार के बिना भी स्वस्थ बच्चे पैदा ही सकते हैंऔर फ़िर यह है भी इतना दुर्लभ की इसके भरोसे रहे तो ये दुनिया लाखों बरसों में भी आबाद न हो सकेजिन्हें कभी सच्चा प्यार नही मिला उन्हें कहने दो की दुनिया में ऐसी कोई छेज़ होती ही नहीं इस विश्वास के सहारे कितना आसान हो जाएगा उनका जीना और मरना....