Thursday, November 13, 2008

पूरनमाशी

पूरनमाशी की रात जंगल में
जब कभी चाँदनी बरसती है
पत्तों में तिक्लियाँ सी बजती हैं
पूरनमाशी की रात जंगल में
नीले शीशम के पेड़ के नीचे
बैठकर तुम कभी सुनो जानम
चाँदनी में धूलि हुई मद्धम
भीगी- भीगी उदास आवाजें
नाम लेकर पुकारती हैं तुम्हें
कितनी सदियों से ढूँढती होंगी
तुमको ये चाँदनी की आवाजें

Friday, November 7, 2008

एक दिन आएगा

आलोक श्रीवास्तव की यह कविता बहुत खूबसूरत है।
वैसे उनकी और भी कवितायें बहुत सुंदर हैं लेकिन
आज यही.....

एक दिन आयेगा
जब तुम जिस भी रस्ते से गुजरोगी
वहीं सबसे पहले खिलेंगे फूल
तुम जिन भी झरनों को छूऊगी
सबसे मीठा होगा उनका पानी
jin भी दरवाजों पर
तुम्हारे हाथों की थपथपाहट होगी
खुशियाँ वहीं आएँगी सबसे पहले
जिस भी शख्श से तुम करोगी बातें
वह नफरत नहीं कर पायेगा
फ़िर कभी किसी से।
जिस भी किसी का कन्धा तुम छुओगी
हर किसी का दुःख उठा लेने की
कूवत आ जायेगी उस कंधे में
जिन भी आंखों में तुम झांकोगी
उन आँखों का देखा हर कुछ
वसंत का मौसम होगा
जिस भी व्यक्ति को तुम प्यार करोगी
चाहोगी जिस किसी को दिल की गहराइयों से
सरे देवदूत शर्मसार होंगे उसके आगे....








Tuesday, November 4, 2008

ओ वाणी

ओ वाणी, मुझसे खफा न होना
की मैंने तुझसे उधार लिए
चट्टानों से भरी शब्द
फ़िर ताजिंदगी उन्हें तराशती रही
इस कोशिश में
की वे परों से हलके लगें...
शिम्बोर्स्का

Monday, November 3, 2008

मुठ्ठी भर आसमान

तुमने कहा
फूल....
और मैंने बिछा दी
अपने जीवन की
साडी कोमलता
तुम्हारे जीवन में।

तुमने कहा
शूल.......
मैं बीन आयई
तुम्हारी राह में आने वाले
तमाम कांटें

तुमने कहा
समय......
और मैंने अपनी सारी  उम्र
तुम्हारे नाम कर दी।

तुमने कहा
ऊर्जा...
तो अपनी समस्त ऊर्जा
संचारित कर दी मैंने
तुम्हारी रगों में.

तुमने कहा
बारिश.......
आंखों से बहती बूंदों को
रोककर
भर दिया तुम्हारे जीवन को
सुख की बारिशों से।

तुमने कहा
भूल....
और मैंने ढँक ली
तुम्हारी हर भूल
अपने आँचल से

और एक रोज
तुमने देखा मेरी आंखों में भी
थी कोई चाह
तुमने मुस्कुराकर कहा
तुम्हारा तो है सारा
जहाँ....

मैंने कहा जहाँ नहीं
बस, एक मुठ्ठी भर आसमान

और तुमने
फिर ली नजरें....

Thursday, October 23, 2008

सच्चा प्यार

nओबल पुरस्कार विजेता विस्साव शिम्बोर्स्का की कवितायें
मुझे बहुत priy हैं। आज उनकी यह कविता फ़िर से पढ़ी
और इसे पद्धति ही गई...आज के ज़माने में जब प्यार एक पहेली
बन चुका है शिम्बोर्स्का की कविता में अलग सी मासूमियत छलकती है

सच्चा प्यार
क्या वह नॉरमल है...
क्या वह उपयोगी है...
क्या इसमे पर्याप्त गंभीरता है...

भला दुनिया के लिए वे दो व्यक्ति किस काम के हैं
जो अपनी ही दुनिया में खोये हुए हों...
बिना किसी ख़ास वजह के

एक ही जमीन पर आ खड़े हुए हैं ये दोनों
किसी अद्र्याश हाथ ने लाखों-करोड़ों की भीड़ से उठाकर
अगर इन्हें पास-पास रख दिया
तो यह महज एक अँधा इत्तिफाक था...
लेकिन इन्हे भरोसा है की इनके लिए यही नियत था
कोई पूछे की किस पुण्य के फलस्वरूप....
नही नही न कोई पुण्यकोई फल है...

अगर प्यार एक रौशनी है
तो इन्हे ही क्यो मिली
दूसरों को क्यों नहीं चाहे कुदरत की ही सही
क्या यह नैन्सफी नहीं है
बिल्कुल है...

क्या ये सभ्यता के आदर्शों को तहस-नहस नही कर देंगे...
अजी कर ही रहे है...

देखो, किस तरह खुश है दोनों।
कम से कम छिपा ही लें अपनी खुशी को
हो सके तो थोडी दी उदासी ऊढ़ ले
अपने दोस्तों की खातिर ही सही। जरा उनकी बातें तो सुनो
हमारे लिए अपमान और उपहास के सिवा क्या है
और उनकी भाषा॥
कितनी संधिग्ध स्पष्टता है उसमे
और उनके उत्सव, उनकी रस्मे
सुबह से शाम तक फैली हुई उनकी दिनचर्या
सब कुछ एक साजिश है पूरी मानवता के ख़िलाफ़...

हम सोच भी नही सकते की क्या से क्या हो जाए
अगर साडी दुनिया इन्ही की राह पर चल पड़े
तब धर्म और कविता का क्या होगा
क्या याद रहेगा, क्या छूट जाएगा
भला कौन अपनी मर्यादाओं में रहनाचाहेगा

सच्चा प्यार
मैं poochati हूँ क्या यह सचमुच इतना जरूरी है...
व्यावहारिकता और समझदारी तो इसी में है
की ऐसे सवालों पर चुप्पी लगा ली जाए
जैसे ऊंचे तबकों के पाप कर्मों पर खामोश रह जाते हैं हम
प्यार के बिना भी स्वस्थ बच्चे पैदा ही सकते हैं
और फ़िर यह है भी इतना दुर्लभ
की इसके भरोसे रहे
तो ये दुनिया लाखों बरसों में भी आबाद न हो सके

जिन्हें कभी सच्चा प्यार नही मिला
उन्हें कहने दो की
दुनिया में ऐसी कोई छेज़ होती ही नहीं
इस विश्वास के सहारे
कितना आसान हो जाएगा
उनका जीना और मरना....