Thursday, April 2, 2020

खिलना जी भर के


बदलते मौसम की आहटों को सुनना अच्छा लगता है. लेकिन धरती पर उदासियाँ इस कदर बिखरी हैं कि कुछ भी अच्छा लगना बहुत दूर जा चुका है. इतनी दूर कि उस तक हाथ पहुँच नहीं रहा. फूल हैं, किताबें हैं, संगीत है, पंछी हैं फिर भी...

'अच्छा लगने' और और 'अच्छा होने' के बीच अगर दूरी न होती तो शायद यह मुश्किल न होता. मैं 'अच्छा लगने' को 'अच्छा होने' से बदल देना चाहती हूँ. सबके लिए. 

अपनी इस इच्छा के उगने के साथ ही कुछ चटखने की आवाज सुनती हूँ. कुछ फूल और खिल जाते हैं...वो इस कदर खिल रहे हैं मानो कह रहे हों खिलना जी भर के, मौसम कैसा भी हो....

1 comment:

Onkar said...

बहुत सुन्दर रचना