Saturday, August 31, 2019

समंदर किसी को खाली हाथ नहीं भेजता


यह आखिरी दिन था, यह वापिसी का दिन था. हम आसपास का चप्पा-चप्पा छान लेने में लगे थे. जंगल ही था आसपास. यहाँ के लोगों से बातें करना, चर्च देखना, जाने से पहले एक बार फिर से समन्दर से मिलने जाना और वापसी. कारमोना से एयरपोर्ट की दूरी कम से कम चार घंटे की होगी. हमारे पास वक़्त काफी था सो हमने कुछ रास्ता पैदल तय किया फिर एक जगह रुककर लंच किया. आज लंच में हमने गोवा की ट्रेडिशनल सब्जी गोअन चीज़ शाकुती खाई. इसे गोवन मसालों और नारियल के तेल में बनाया जाता है और सादा चावल के साथ खाते हैं. यह काफी मसालेदार होती है. गोवा में लिकर काफी सस्ती है इसलिए लोग यहाँ से ले जाना भूलते नहीं. हम जिस दुकान में पहुचे वह अच्छी सी दुकान थी. काफी करीने से सजी. ब्रांड्स का मुझे पता नहीं लेकिन लौटते समय अजय जी ने बताया कि यहाँ लगभग सभी अच्छे ब्रांड्स थे. मुझे यहाँ इस शॉप में जो बात अच्छी लगी वो माँ बेटी की जोड़ी. दोनों माँ बेटी जिस मुस्तैदी से हर ब्रांड के बारे में डिटेल से रही थीं, सजेस्ट कर रही थीं कि कौन सी वाइन अच्छी होगी या कौन सी ब्रांडी वह मुझे आकर्षित कर रहा था. हम अपने यहाँ मतलब उत्तर भारत में ऐसे दृश्यों की कल्पना नहीं कर सकते. मैं उन दोनों से देर तक बातें करती रही. जब उन्हें पता चला कि मेरी भी बेटी है और मैं उसके लिए कोई गिफ्ट ले जाना चाहती हूँ तो उन्होंने इसमें मेरी मदद की. 


गोवा में यह ख़ास बात है कि यहाँ कोई आपको जज नहीं करता. आप किसके साथ हैं, उसका आपके साथ क्या रिश्ता है आदि. न ही लोग बेवजह के अंदाजे लगाते हैं आपके बारे में, न कोई खुसुर-फुसुर. दोस्त शब्द को पूरा अस्तित्व मिलता नजर आता है. उन्हीं माँ बेटी ने हमें बताया कि सामने अगर थोड़ी देर इंतजार करें तो हमें मलाड स्टेशन तक की बस मिल जाएगी. हम उनके बताये के मुताबिक बस का इंतजार करने लगे लेकिन बस से पहले ही हमें ऑटो मिल गया. हम स्टेशन ट्रेन के आने से काफी पहले पहुँच गये थे. 30 रूपये की टिकट ली और चाय पीते हुए आराम से और उतरते सूरज को देखने लगे. छोटा सा साफ़ स्टेशन था यह. आखिरी दिन का सनसेट प्वाइंट था स्टेशन का पुल. यह गोवा से विदाई का सूरज था. ट्रेन आ चुकी थी. वापसी का सफर काफी अलग होता है. न सिर्फ जाने की दिशा बदलती है बल्कि भीतर भी काफी कुछ बदल चुका होता है. वो यात्रा यात्रा ही नहीं जो हमें भीतर से और परिपक्व और संवेदनशील और स्पष्ट न बनाये. ट्रेन चल रही थी और मैं सोच रही थी कि जब गोवा से पुकार आई थी तब कितना मुश्किल था निकल पाना लेकिन अब वापस जाते समय महसूस हो रहा है कि उसी समय तो सबसे ज्यादा जरूरी था निकलना. हम जब अपने बारे में ठीक निर्णय नहीं ले पाते तब कुदरत यह काम करती है. कम से कम मेरा तो यही अनुभव है. 

हम स्टेशन पहुँच गये. एयरपोर्ट स्टेशन के एकदम पास था. जिस एयरपोर्ट पहुँचने के लिए 4000 रूपये लगने थे वहां हम महज 160 रूपये में पहुँच चुके थे. यह मेरे लिए इतनी एक्साइटिंग बात थी कि इसे मैंने माँ को फोन करके तुरंत बताया. मैं हमेशा सोचती थी कि कुछ लोग इतनी विदेश यात्राएँ किस तरह कर लेते हैं. इतना पैसा कहाँ से लाते हैं तो अजय जी हमेशा कहते थे बहुत पैसा नहीं चाहिये होता है बस घूमने की इच्छा चाहिए होती है. आज मेरे सामने कुछ उदाहरण थे. घुमंतू को लग्जरी के पीछे भागने वाला नहीं होना चाहिए. मेहनती, कम से कम में काम चला लेने वाला होना चाहिए. महंगे होटलों में रुककर, बड़ी गाड़ियों में बैठकर साल में एक ट्रिप की जा सकती है घुमंतू नहीं हुआ जा सकता. मुझे उनकी बात ठीक लगी, तभी तो ज्यादातर सैलानी पीठ पर बड़ा सा पिठ्ठू बैग लादे पैदल चलते नजर आते हैं. मुझे अभी सैलानी बनना सीखना बाकी है मैंने खुद से कहा. 

हम वापस लौट रहे थे...सुख और शांति से भरे हुए. समन्दर किसी को खाली हाथ नहीं भेजता.

समाप्त.

Tuesday, August 27, 2019

वो प्रेम की लहरों में सिमटते जाना

समन्दर फिर सामने था, इस बार हम दोनों के चेहरे तसल्ली वाली मुस्कराहट थी. समन्दर ने पलकें झपकाकर पूछा, ‘आ गयीं?’ मैंने भी नजरें मिलाकर जवाब दिया,’बिलकुल’ अजय जी अब तक मेरे और समन्दर के रिश्ते से वाकिफ हो चुके थे उन्होंने मुझे चिढाते हुए कहा, ‘लो तुम्हारी ससुराल आ गयी’. वो मेरे बचपने पर हंसते हुए कहने लगे, ‘यह तुम जो कहती हो कि समन्दर तुम्हारा प्रेमी है यह तो तुम्हारा मानना है न कभी समन्दर बेचारे से भी पूछा है’ उनकी इस चिढाने वाली बात के बीच ही एक बड़ी सी लहर ने हमें घेर लिया. मैंने कहा, ‘मिल गया जवाब.’ वो हंस दिए. बोले ‘पागल हो तुम एकदम.’

समन्दर के किनारे वो जो लगी होती हैं न बड़ी बड़ी छतरियां और उनके नीचे लेटने को सिंहासन नुमा बेंच. फिल्मों में इन्ह्ने खूब देखा था, फिर सामने से भी देखा समन्दर के किनारे जब भी गये यह दीखते रहे लेकिन कभी इस सिंहासन पर विराजने की हिम्मत न हुई. लेकिन अजय जी ने पहुँचते ही इसी सिंहासन पर धावा बोल दिया. अगर आप इन सिंहासन पर विराजना चाहते हैं तो आपको रेस्टोरेंट से कुछ ऑर्डर करना होगा या फिर अलग से इस पर विराजने का चार्ज देना होगा. मैं यह सुबह पता कर चुकी थी. सुबह रेस्तरां वाले जिस लडके ने मुझे एक मिनट के लिए बैठकर फोटो तक खींचने नहीं दी थी अब वो हमारी सेवा में था. मुझे इत्ता मजा आ रहा था. टोपी वोपी लगाकर फिल्मों में देखे सारे पोज मारने की कोशिश मैं कर रही थी. गंवार अल्हड़ किशोरी उस सपने को जी रही थी जो उसने देखे तक नहीं थे. खुद पर ही हंसी भी आ रही थी और मजा भी आ रहा था. कोई नहीं था जो मुझे यूँ अजीबोगरीब हरकतें करते देख मुंह बनाये या मजाक उडाये मेरा. बल्कि मेरे इस पागलपन को अजय जी फोटो खींचकर बढ़ा ही रहे थे. सबकुछ बहुत रोमांचक लग रहा था.


दोपहर का समन्दर सुबह के समन्दर से अलग होता है. कुछ अलसाया सा, कुछ सुस्त सा. जैसे-जैसे शाम ढलती जाती है समन्दर का मिजाज़ बदलता जाता है और रात होते-होते वह उच्छश्रृंखल प्रेमी बन जाता है. दिन में जिस जगह हम आराम से एक रंगीन छतरी के नीचे पसरकर आलू चिप्स खाते हुए गाने सुन रहे थे शाम होते होते वह जगह पानी के हवाले थी.

मैं समन्दर के प्रेम में थी. लहरों के संग खेल रही थी. लहरें खींच कर भीतर ले जातीं. मैं वापस लौट आती फिर तैयार खींचकर भीतर ले जाए जाने के लिए. लहरों के बीचोबीच पालथी लगाकर बैठ गयी थी डूबते सूरज को देखने को. यह वही गोवा था जहाँ पिछली बार सनसेट छूट गया था हमसे. हम अग्वादा फोर्ट से भागते हुए यहाँ पहुंचे थे लेकिन सूरज डूब चुका था. इस बार ढलते सूरज के सामने धूनी लगा ली थी मैंने. उसकी हर अदा को जी भरके देख रही थी.
लहरों का जादू ऐसा होता है कि जितना भी वक़्त इनके साथ बिताओ कम ही लगता है. घंटों समन्दर में पड़े-पड़े त्वचा फूलने लगती है फिर भी मन बाहर आने का करता ही नहीं. भूख, प्यास मानो सब स्थगित. जब रात काफी हो गयी और सिक्योरिटी अलर्ट के चलते बाहर आने को बोला जाने लगा तब कोई चारा नहीं था. लेकिन डिनर वहीँ समन्दर के किनारे ही किया ताकि नजर से ओझल न हो पल भर समन्दर. 
खूब संतुष्टि, अपार सुख लिए हम लौटे तो सामने फिर वही सवाल था वापस कैसे जायेंगे. इतनी दूर पैदल जाने की तो ताकत बची नहीं थी. कम से कम मेरी तो नहीं. लेकिन कोई चारा भी नहीं था. 

यह पैदल चलकर पहुंचना अच्छा ही हुआ हमने उस छोटे से गाँव में क्रिसमस की रौनक देखी. शायद गाडी से जाते तो यह न देख पाते. नाचते, गाते, खाते पीते झूमते लोग. इतना सुंदर क्रिसमस मैंने तो नहीं मनाया था पहले.


Thursday, August 22, 2019

कहा न प्यार है !

क्रिसमस की तैयारियों ने पूरे कारमोना को दुल्हन सा सजा रखा था. लेकिन इस धज में शोर नहीं था, शांति थी. किसी सजे हुए घर से गिटार पर बजती हुई धुन सुनकर रुक ही गये कदम, कहीं नारियल के पेड़ पर अटके चाँद से आँख लड़ा बैठे. ऐसी शांति अरसे बाद मिली थी. ऐसी बेफिक्री तो शायद पहली बार ही. लम्बे सफर की थकान और अधूरी नींदों का असर था या जिन्दगी की आपाधापियों से निजात का असर जल्द ही गहरी नींद ने जकड़ लिया. याद नहीं इतनी गहरी, बेफिक्र नींद आखिरी बार कब हिस्से आई थी. सुबह एकदम खिली हुई थी. सुबह मैं जल्दी से जल्दी समन्दर के पास जाने की हड़बड़ी में थी लेकिन अजय जी की नींद उन्हें छोड़ नहीं रही थी. वो विदेशी क्लाइंट्स के साथ डील करते हैं इसलिए उन्हें देर रात तक जागने की और सुबह देर तक सोने की आदत है यह वो बता चुके थे. उनकी बायोलॉजिकल क्लॉक विदेशों के हिसाब से सेट थी. मैंने उनसे इतना भर पूछा कि क्या मैं अकेली चली जाऊं? इस पूछने में कई तरह की हिचक, संकोच सब था लेकिन जिस सहजता से उन्होंने कहा, ‘इसमें पूछने की क्या बात है, तुम्हें जाना ही चाहिए.’ मैं खुश हो गयी और जल्दी से नाश्ता ठूंसकर समन्दर की ओर भागी. बीच तक ले जाने के लिए होटल की एक गाडी जाती थी मैने झट से उसमें जगह बना ली. मेरे बगल में एक जोड़ा बैठा था. लड़की बिकनी में थीं. लड़की सहज थी, मुझे सहज होने में दो मिनट लगे. हंसी भी आई खुद पर, कितना कुछ है टूटने को अपने भीतर, कितना कुछ बाकी है उगने को. मैं हर पल बदल रही थी. हर पल मुझे मुझमें कुछ नया होता महसूस हो रहा था. सबसे ज्यादा बदल रहा था सहज होना सीखना. जेंडर के पूर्वाग्रह से मुक्त होना. दोस्त सिर्फ दोस्त होता है वो स्त्री या पुरुष नहीं होता यह समझना. इन बातों को कहना आसान है, इन्हें विमर्श बनाना आसान है लेकिन जीना इतना भी आसान नहीं होता. कंडिशनिंग आड़े आती ही है कभी चेतन में कभी अवचेतन में. उस कंडिशनिंग का टूटना सुखद होता है. 

सुबह का समन्दर रात के समन्दर से अलग होता है. बहुत अलग. अब मैं और समन्दर आमने-सामने थे. मुझे अब कहीं नहीं जाना था. समूची यात्रा जिस मुलाकात के लिए थी वो अब होने को थी. जालोर बीच शहर से दूर है, यहाँ ज्यादा भीड़ नहीं, बहुत कम टूरिस्ट हैं यहाँ वह भी तब जबकि क्रिसमस करीब है. मुझे ऐसी ही शांति तो चाहिए थी. नंगे पाँव गीली रेत पर चलते हुए मैं कहीं दूर निकलती जा रही थी. लहरों के बीच से होते हुए मैंने एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चलते जाना शुरू किया. रास्ते भर लहरें मुझसे खेलती रहीं, लुभाती रहें, ललचाती रहीं. टखने से घुटने तक घुटने से कमर तक और कमर से चेहरे तक आने में कहाँ वक्त लगा था उन्हें. जिस तेज़ बहाव से वो मेरी ओर आतीं भीतर से सीत्कारी सी फूटती. मेरी आँखें लगातार बह रही थीं. लहरें जिस दबाव के साथ जकड़ रही थीं वह कितना निर्मल कितना अद्भुत था. यही तो है प्रेम की जकडन जिससे छूटने को जी नहीं चाहता. मेरे कानों ने मेरे होंठों को कहते सुना, ’हाँ हाँ आई लव यू’. समन्दर के इसरार ने आखिर मेरा इकरार सुन ही लिया.

समन्दर के किनारे मछुवारों का संगीत बज रहा था और एक चिड़िया मेरी ही तरह लहरों के संग खेल रही थी. मैंने उस चिड़िया के खेल को कैमरे में कैद किया अपनी छाया समेत. वह चिड़िया मानो मैं ही थी और वह लहर भी मैं ही थी. और अंत में सारे मैं विलीन हो गये थे सिर्फ असीम शांति बची थी. यह अकेलापन इतना भरपूर था कि इसे जी लेने के बाद कोई इच्छा शेष नहीं रहती. पूरे बीच का चक्कर लगाने के बाद मैं लहरों के बीच धूनी जमाकर बैठ गयी थी. लहरें मुझे पूरा ढंक लेती थीं और दूर तक अपने साथ लिए चली जाती थीं. उस लम्हे में मैं कहाँ थी पता नहीं. वो लम्हे जिन्दगी थे, वो लम्हे सुख थे, वो लम्हे निर्वाण भी थे. इन्हीं लम्हों में जिन्दगी के वो तमाम झमेले जो हमें पूरी तरह जकड़े होते हैं बौने लगने लगते हैं. यही पल यात्रा का हासिल होते हैं. 
पूरे चार घंटे बीत चुके थे. होटल वापस ले जाने वाली गाडी जा चुकी थी. मैंने एक्टिवा की तलाश शुरू की जो काफी कोशिश करने के बाद भी नहीं ही मिली क्योंकि क्रिसमस के कारण सारी एक्टिवा बुक हो चुकी थीं. मेरे सामने सवाल यह था कि समन्दर में चार घंटे रहने के बाद की थकान के बाद 3 किलोमीटर पैदल चलकर कैसे जाऊं. गोवा में लिफ्ट लेकर चलने के बारे में खूब सुना था. आज मेरे सामने उस सुने हुए को आजमाने का मौका था. मैंने एक अनजान से लिफ्ट ली. उसकी एक्टिवा ने मुझे आधे रास्ते तक लिफ्ट दी. यह अनुभव भी काफी रोमांचक था. मुझे लगा जो सुना था वो मैं भी कर सकी. अच्छा लग रहा था. बाकी का आधा रास्ता मैंने पैदल तय किया. आखिर अपने कमरे तक पहुँच चुकी थी मैं. मुझे जोरों की भूख लगी थी. खाने के बाद मुझे भयंकर नींद ने जकड़ लिया. नींद खुली तो शाम के 5 बज रहे थे. फिर से समंदर पुकार रहा था, इस बार अजय जी भी साथ गए. उनके एजेंडे में मछली खाना था मेरे एजेंडे में था समन्दर में डुबकी लगाना जो सुबह बाकी रह गया था.

जारी...

Monday, August 19, 2019

महबूब की एक झलक जीने का सामान


जिस पुकार पर गोवा आई थी उसे ठीक से सुन लिया था, गुन लिया था. एक मुक्कमल शाम के बाद प्यारी सी सुबह को जी लेने के बाद अब सिर्फ इन हवाओं के हवाले करना बाकी था. मन गिलहरी हुआ जाता था. हर सडक पर भागने को व्याकुल, हर कोने में खड़े होकर गहरी सांस लेने को बेताब, बीच सडक पर खड़े होकर चिल्लाकर कहने को बेकरार कि आई लव माइसेल्फ़. ये सेल्फ न बहुत खूबसूरत होता है. इसी गोवा में अंजना, बाघा और वागातोर बीच ने मुझे खुद से मिलवाया था. लहरों ने थपकी देकर सुलाया था, कहा था खुद से प्यार करो. और आज मैं खुद के प्रेम में हूँ. यह प्रेम सेल्फ अप्रिसिएशन सेल्फ से अटैचमेंट तो हो लेकिन सेल्फ ऑब्सेशन न हो इसका ख्याल रखना होता है जिसका जिम्मा भी कुछ दोस्तों को ही दे रखा है. जैसे ही गडबड करूँ अनजाने ही सही वो थप्पड़ लगाकर सुधार लें. 

कल से जो समन्दर झलक दिखा रहा था, अब उसके करीब जाने का समय आ चुका था. इस दफे भीतर भी सुख का समन्दर था और बाहर भी. यह जो भीतर का सुख था ‘यह कोई उफान तो नहीं था,’ खुद से पूछती हूँ. आवाज आती है ‘नहीं यह अपने होने का सुख है मात्र.’ जिन्दगी का बड़ा हिस्सा दूसरों को महसूस करते हुए, समझते हुए बिताने के बाद यह खुद को महसूस करना सच में सुंदर था. बिना जिया हुआ बचपन हमेशा हाथ थामे चलता है. जिन्दगी के किसी भी मोड पर अपने जिए जाने की इच्छा लिए. शायद आज उसी बचपन को जिए जाने का समय था. मुझे नहीं पता मैं क्या होने लगी थी. मैं रूई से भी हल्का महसूस कर रही थी. कहीं भी जाने को, कुछ भी करने को, कैसे भी चलने को, कैसे भी बात करने को आज़ाद. यहाँ कोई मुझे जज नहीं कर रहा था. अजय जी साथ थे लेकिन उनका होना इस आज़ादी को बढ़ा ही रहा था. वो जज नहीं करते, दखल भी नहीं देते, टोकते भी नहीं. उनकी अपनी दुनिया है वो उसमें रहते हैं. साथ होते हैं लेकिन साथ होने के भाव से मुक्त भी करते हैं. यह बिलकुल नया अनुभव था कि ऐसे भी हुआ जाता है क्या? सडक के किनारे खड़े होकर आइसक्रीम खाना हो, अनजाने लोगों से समन्दर किनारे तस्वीर खिंचवाना हो या नंगे पाँव गार्डन में भागते फिरना. कितना आसान है अपने जीवन को अपने लिए महसूस करना लेकिन कितना मुश्किल बना दिया गया है इसे. इसी उछलकूद के दौरान मन हुआ कि ओमकार से बात की जानी चाहिए. उसका नम्बर शुभा जी ने दिया था. उससे मिलना था लेकिन उसकी फ्लाईट थी इसलिए वो सुबह जल्दी ही निकल चुका था. मैंने उसे फोन लगाकर जैसे ही कहा मैं प्रतिभा कटियार बोल रही हूँ वो इतना खुश हुआ कि क्या कहूँ. उसने कुछ भी कहने की बजाय ‘ओ अच्छी लड़कियो’ गुनगुनाना शुरू कर दिया. अब हम दोनों हंस रहे थे. मैं उससे कह रही थी तुमने बहुत अच्छे से गया उसे और वो मुझसे कह रहा था कि मैंने बहुत अच्छा लिखा. जो भी हो पणजी की हवाओं में हमारी हंसी घुल रही थी, संतुष्टि से भरी हुई हंसी. संतुष्टि कि हम दोनों मिलकर एक सन्देश को ठीक से दूर तक ले जा पाए. 

अब हमे कारमोना जाना था. जहाँ हमने दो दिन रहने के लिए बुकिंग की थी. पंजिम से 4 घंटे की दूरी पर है यह. हमने तय किया कि हम लंच करने के बाद ही निकलेंगे. क्योंकि पहुँचते हुए शाम हो ही जानी थी. मेरा मन था कि सूरज डूबने से पहले मैं समन्दर के पास पहुँच सकूँ. रास्ते भर मैं पिछली गोवा यात्रा और इस गोवा यात्रा के दरमियाँ डोलती रही. जिन्दगी के सफर के बारे में सोचती रही. उन जगहों के बारे में भी जहाँ मैं और माधवी एक्टिवा दौड़ाया करते थे. जिन्दगी पर भरोसा करना चाहिए. यह सीख मुझे जीकर मिली है. इधर हमारी कैब रुकी, उधर मैं समन्दर की तरफ भागी. कहाँ सामान है, कहाँ दस्तखत करने है, किसे आईडी देनी है मुझे कोई मतलब नहीं था. सब जिम्मेदारी एक जिम्मेदार दोस्त के हवाले थी और इतनी सी देर में यह समझ में आ चुका था कि अपनी इस हरकत के लिए मुझे कोई डांट नहीं पड़ने वाली थी. इतना सहज साथ कम ही मिलता है जो आपको मुक्त तो करता ही है इस बात का कोई बोझ आपको नहीं देता. वो साथ तो होता है लेकिन बिना आपके स्पेस में जरा भी हस्तक्षेप किये. 

आखिर कारमोना का खूबसूरत जालोर बीच सामने था, डूबता सूरज था, मैं थी और था समन्दर. विस्मित, अवाक, मंत्रमुग्ध. इन दुर्लभ पलों के लिए कितना इंतजार किया है. ओह समन्दर...मेरे पाँव आगे बढ़ते ही जा रहे थे और समन्दर करीब आता ही जा रहा था. देर तक लहरों ने मुझे सहलाया, मेरे बीते तमाम जख्मों पर मरहम रखा. मेरे भीतर की नदी सामने के समन्दर में विलीन होने को व्याकुल होने को थी कि फोन की घंटी बजी. मुझे वापस लौटना था. मैंने समन्दर के कान में कहा, कल से हर वक्त तुम्हारे साथ ही हूँ.’ उसने हंसकर विदा किया.

जारी...

Saturday, August 17, 2019

पंजिम की सुबह और शुभा जी का जादू


अगली सुबह में बीती शाम की खुशबू थी. ढेर सारा उत्साह, सुख और शांति. हमें शुभा जी के साथ ब्रेकफास्ट के लिए जाना था. कितनी ख़ुशी थी बता नहीं सकती. यकीन नहीं हो रहा था कि शुभा जी अब हमारी दोस्त हो चुकी थीं. इसमें उनकी ही सहजता, उनकी ही विनम्रता और जीने के ढब को क्रेडिट है. होटल ताज हमारे होटल मांडवी से ज्यादा दूर नहीं था इसलिए हमने पैदल जाना ही चुना यह सोचकर कि सुबह की सैर भी हो जाएगी और सुबह की ताजा हवा में पणजी शहर की देखने का आनंद भी मिलेगा. यूँ भी मौसम और साथ अच्छा हो, सड़कें साफ हों तो पैदल चलने का मजा ही कुछ और है. पणजी हमें मुस्कुराता हुआ मिला. हम वक़्त पर पहुंचे थे. शुभा जी इंतजार में थीं वो हमें लॉबी में ही मिल गयीं. बीती रात की चमक उनके चेहरे पर भी थी. लोकल के सभी अख़बार कल की शाम की खबर से सजे हुए थे.

शुभा जी और अनीश जी खूब भले लोग हैं. शुभा जी ने हमसे हमारे बारे में पूछा और बताया कि किस तरह उन्होंने इस प्ले लिस्ट के लिए तमाम कविताओं की तलाश की और उसी तलाश में उन्हें ‘ओ अच्छी लड़कियो’ मिली. उन्हें और उनकी पूरी टीम को कविता बहुत अच्छी लगी. किस तरह इस कविता की बाबत मुझे सम्पर्क किया. मैंने उन्हें बताया कि किस तरह पिया तोरा कैसा अभिमान, अली मोरे अंगना और, पिया हाजी अली मैं रिपीट में सुना करती थी. उन्हें अजय जी से यह जानकर कि वो फिल्मों के लिए गाने लिखते हैं और उनका लिखा एक गीत लता जी गा चुकी हैं वो बहुत खुश हुईं. अनीश जी ने बताया कि वो हिंदी कविताओं पर कुछ काम करना चाहते थे. उनके मन में काफी दिनों से यह सब चल रहा था. सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के लिए मेवरिक प्ले लिस्ट बनाने का अवसर उनकी उस इच्छा को साकार करने का जरिया बना. उन्होंने ओमकार जिसने इस कविता को आवाज दी थी के बारे में भी बताया कि किस तरह वो कविता पढकर एक-एक शब्द में डूब गया था. उसका वह डूबना उसकी कल की परफौर्मेंस में दिख रहा था. मैं सोच रही थी कि यही होती है शब्दों की ताकत, विचारों की ताकत जो दुनिया एक कोने में बैठे व्यक्ति को दूसरे कोने में बैठे व्यक्ति से जोड़ देती है. लिखने वाला पढने वाले से पीछे छूट जाता है और इस बात का उसे सुख होता है. इस वक़्त मैं उसी सुख में थी. सब उस कविता में डूबे हुए लोग थे और मैं उन्हें देखने के महसूस करने के सुख में. जब यह कविता लिखी थी तब सिर्फ इतना था मन में कि यह बात मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक काश पहुंचा सकूँ कि लड़कियों को अच्छे होने के बोझ से मुक्त करो अब. और यह बात दूर तक पहुँच रही थी. यह बात जीकर जानी थी कि अच्छा होने का बोझ अनजाने चुपचाप हमें भीतर ही भीतर खोखला करता रहता है, बांधता रहता है. एक किस्म की सोशल कंडिशनिंग है यह जो बहुत गहरी है. पीढ़ियों से स्त्रियाँ इसकी शिकार भी हैं और जानती भी नहीं कि वो शिकार हैं.

नाश्ते की टेबल पर शुभा जी के कुमाऊनी घर की स्मृति भी खुली. मैंने उनसे पूछा आपका मन नहीं करता कि आप कुछ पहाड़ी लोक गीत गायें. उन्होंने मुस्कुराकर कहा, बहुत मन करता है लेकिन बहुत मुश्किल है इसमें. जैसे ही मैं पहाड़ का राजस्थान का कोई लोकगीत गाना चाहती हूँ यह बात होने लगती है कि हम लोक का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन लोक के लिए कुछ कर नहीं रहे. मैं गायिका हूँ, संगीत दे सकती हूँ आवाज दे सकती हूँ मेरी भी सीमा है. मैं कोई विवाद नहीं चाहती, शांति से जीना चाहती हूँ. इसलिए किसी भी ऐसे काम को नहीं करती जिसमें कोई भी द्वंद्व हो. उन्होंने बताया कि उन्हें विद्यापति पसंद हैं. रेनकोट के समय विद्यापति को पढ़ना शुरू किया तो पढ़ती ही गयी. मीरा बहुत पसंद है, पलटूदास उन्हें पसंद हैं. केदारनाथ सिंह, दुष्यंत, साहिर, फैज़ आदि को पढ़ा है उन्होंने.

एक मजेदार बात उन्होंने बताई, हर साल दिसम्बर में वो पणजी में म्यूजिकल फेरी चलाती हैं. खुले आसमान के नीचे और समन्दर के बीचोबीच संगीत. यह पूर्णिमा के आसपास होता है. सुनकर ही सुख हो रहा था. हमारी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं. लेकिन वक़्त है न मुस्तैद पहरेदार उसने याद दिलाया कि ब्रेकफास्ट को लंच तक नहीं ले जा सकते. आखिर हमने एक मुक्कमल, भरपूर मुलाकात के बाद विदा ली.

अब सामने था पंजिम और एक नन्हा सा उन्मुक्त मन.

जारी...

Thursday, August 15, 2019

पणजी में 'ओ अच्छी लड़कियों' से मुलाकात



फाइनली हम पणजी में थे. खिड़की का पर्दा हटाया तो सामने समन्दर मुस्कुराता मिला. जैसे वो मेरे सब्र का इम्तिहान ले रहा हो. शाम करीब थी और समन्दर सामने. मैं लहरों का उछाल देख पा रही थी, आवाज सुन पा रही थी बस हाथ बढ़ाने की देरी थी...लेकिन अभी हाथ बढ़ाने का वक़्त नहीं था कि गोवा ने जिस वजह से पुकारा था आज शाम तो उसी के नाम थी. कभी सोचा न था कि कोई कविता यूँ हाथ पकड़कर गोवा तक घुमाने ले आएगी. जबसे 'ओ अच्छी लड़कियों' को शुभा जी द्वारा संगीतबद्ध करने की बात सुनी थी तबसे शुभा जी के तमाम गीत साथ चलते रहते थे. एक ही बात मन में थी कि किस तरह वो इस कविता को संगीतबद्ध करेंगी भला. दूसरा उत्साह था शुभा जी और अनीश जी से मिलने का. मुझे नहीं मालूम कैसी मुलाकात होने वाली थी. एक मन हुआ चुपके से भीड़ में छुपकर बैठ जाऊं और होते देखूं सब कुछ. लेकिन यह मौका शायद कुछ और था. शाम के उत्सव में शामिल होने लिए हमने पैदल ही चलना चुना ताकि थोड़ा शहर भी तो देखें, उसे हैलो तो बोलें. एक तरफ कार्यक्रम का समय हो चला था दूसरी तरफ पेट में भूख गुडगुडा रही थी. मेरा मन हुआ कि भूख को इग्नोर कर दिया जाय लेकिन अजय जी इसके लिए तैयार नहीं थे. फाइनली हमने शॉर्ट कट वाली पेट पूजा की और उसके बाद पहुंचे कार्यक्रम की जगह. सच कहूँ तो यहाँ आने के पहले तक मुझे इस फेस्टिवल की ऊंचाइयों का पता नहीं था. यहाँ आकर देखा पूरा शहर सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के पोस्टरों बैनर से पटा पड़ा था. अब मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी थी. लेकिन ज्यादा देर घबराहट के रुकने को वक़्त नहीं मिला. गेट पर पहुँचते ही प्रेरणा लेने आ गयी. और पलक झपकते ही मैं शुभा मुदगल, अनीश प्रधान और उनकी टीम के साथ थी. शुभा जी मिलकर इतनी खुश हुईं उन्होंने तुरंत गले लगा लिया.अनीश जी ने बहुत विनम्रता के साथ स्वागत भी किया और शुक्रिया कहा इस कविता को लिखने के लिए. ऐसे मौकों पर कुछ समझ नहीं आता कि क्या कहूँ बस कि आँख भर आती है.  शुभा जी और अनीश दोनों बहुत सहज, सरल लोग हैं. यह विनम्रता ही उनके संगीत को अलग आयाम देती होगी. हमारी मुलाकात ग्रीन रूम में हुई थी. कार्यक्रम शुरू होने को था और हम कार्यक्रम स्थल की ओर ले जाए गये.

यह गोवा की यादगार शाम थी. मुझे नहीं पता था कि इस बार गोवा मुझे सर पर चढ़ाने के लिए पुकार रहा था. मुझे नहीं पता था कि गोवा ने जिन्दगी को गले लगाने, तमाम बाधाओं को पार करने के एवज में यह शाम मुझे तोहफे में देने को बुलाया था. सामने भव्य स्टेज था और पीछे शानदार ऑडियंस. इन सबके बीच मैं भी थी. मैं भी...क्या यह मैं ही हूँ. सब कुछ बहुत तेज़ था. अनीश जी ने मुझे बोला था कि 'आपकी कविता हमें इतनी ज्यादा अच्छी लगी है कि हम कार्यक्रम को इसी कविता से क्लोज करेंगे. तो मन में इतनी राहत थी कि अभी थोड़ा वक़्त था दिल को संभाल लेने को. शुभा जी मेरे बगल में बैठी थीं और उनके बगल में अनीश. मेरे दूसरी तरफ अजय जी थे. ऐसे मौकों पर दोस्तों का साथ होना कितना मायने रखता है यह सिर्फ समझा जा सकता है.


कार्यक्रम शुरू हुआ और लगातार परवान चढ़ता गया. इस शाम के लिए कुछ हिंदी कविताओं को संगीतबद्ध करने को चुना गया था. केदारनाथ सिंह, नज़ीर अकबराबादी, मीराबाई ,पल्टूदास, शुभा मुदगल और प्रतिभा कटियार की कवितायेँ थीं ये. मैं एक एक कर कविताओं की खूबसूरत प्रस्तुती देखकर मुग्ध हो रही थी. यकीन नहीं हो रहा था कि इन कविताओं को ऐसे भी प्रस्तुत किया जा सकता है. शुभा जी बीच-बीच में पूछती जा रही थीं ठीक तो है न? और मैं उनके इस विनम्र सवाल के बदले सिर्फ सर हिला पा रही थी. इन कविताओं को स्वर दिया ओमकार पाटिल और प्रियंका बर्वे ने. दोनों की ऊर्जा देखते ही बनती थी, दोनों बेहद कमाल के आर्टिस्ट हैं. ओमकार तो ऐसे हैं कि वो मानो आते ही कहते हों, खबरदार जो ध्यान रत्ती भर भी इधर-उधर किया कि जब तक मैं हूँ मैं आपका पूरा ध्यान चुरा लूँगा और धीरे से दिल भी. ऑडियंस को बांधना उसे आता है. तमाम कविताओं के बीच जब उसने केदारनाथ सिंह की कविता 'भाई मैंने शाम बेच दी है' गई तो मैं एकदम से अलग ही दुनिया में चली गयी. इतनी बार पढ़ी थी यह कविता लेकिन आज इसे शुभा जी, अनीश जी और ओमकार के जानिब से सुनना कुछ अलग ही अनुभव था.

आखिर कार्यक्रम आखिरी कविता तक आ पहुंचा. यानी मेरी कविता 'ओ अच्छी लडकियों.' कविता शुरू होने से पहले अनीश जी और शुभा जी ने मेरी तरफ देखा और कहा 'उम्मीद है आपको पसंद आएगी.' स्टेज पर मेरा नाम लिया जा रहा था और मैं अपनी हथेलियाँ शुभा जी की हथेलियों में छुपाये बैठी थी. जैसे ही ओमकार ने कहा, प्रतिभा जी हमारे बीच मौजूद हैं, शुभा जी ने उत्साह में भरकर कहा, यहाँ हैं यहाँ हैं...और सारी तेज़ लाइट्स हम पर थीं. उफ्फ्फ. ऐसी चकाचौंध की आदत कहाँ हमें. घबरा से गये कुछ पल की. कविता शुरू हो चुकी थी..'ओ अच्छी लड़कियों तुम मुस्कुराहटों में समेट देती हो दुःख और ओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनर...'  काफी तेज़ संगीत में इसे ढाला गया था. कहाँ रुकना है, कहाँ ज्यादा रुकना है, कहाँ ऊंचा करना है स्वर ओमकार को सब पता था. मुझे लग रहा था क्या यह सच में मैं हूँ. देहरादून के किसी कोने में बहुत उलझे से मन और द्वंद्व के बीच जब लिख रही थी यह कविता तब कहाँ जानती थी कि इसे इतना प्यार मिलेगा. शुभा जी हथेलियों का दबाव मुझे कसता जा रहा था यह उनका प्यार था. शायद वो भी मेरी तरह संकोच में थीं.


कविता खत्म हुई...अँधेरे में अपने आँखों में भर आये समन्दर को संभालना आसान था. कार्यक्रम खत्म होते ही रौशनी ने हमें घेर लिया था. बधाइयों, फोटो खींचने, खिंचाने, लोगों से मिलने मिलाने के बीच गोवा की वह खूबसूरत शाम दिल में दर्ज हो गयी. शाम ने बीतते-बीतते अगले दिन की सुबह नाश्ते पर शुभा जी से आराम से मिलने, बतियाने का प्रस्ताव भी दे दिया.

हम एक बेहद खूबसूरत शाम को जीकर, समेटकर लौट रहे थे.

जारी....

Tuesday, August 13, 2019

मिलूंगी तुमसे तसल्ली से...


मुम्बई से गोवा के लिए हमें अल्सुबह तेजस एक्सप्रेस पकडनी थी. मुम्बई में मैं माधवी के घर रुकी थी. उसके घर पहले भी जा चुकी हूँ. उस मुलाकात और इस मुलाकात के बीच कई बरस बीत चुके थे. उससे मिलकर लगा कि वो और भी खूबसूरत हो गयी है, उसकी खूबसूरती में मातृत्व का नमक जो शामिल हो चुका है. उसके दो प्यारे से बच्चों से मिलना बहुत सुंदर अनुभव था. जरा सी देरी में दोनों बच्चे मासी-मासी की धुन में थे. शरारतें, मस्ती, गप्पें इन सबके बीच नींद कहाँ. ट्रेन पकड़ने के लिए सुबह चार बजे ही निकलना था. लगभग न के बराबर नींद लिए हम गोवा के लिए निकले थे. हालाँकि नींद कहीं थी भी नहीं. यह शायद उत्साह के कारण हुआ होगा..

मेरे साथ अजय गर्ग थे. वो घुमक्कड़ हैं. दुनिया भर घूमते फिरते हैं. सच कहूँ तो घूमने का चस्का अजय जी और माधवी का ही दिया हुआ है. लेकिन मैंने अजय जी के साथ कभी ट्रेवल नहीं किया था. मेरे लिए यह यात्रा कई मायनों में अलग होने वाली थी. पहली राहत की बात तो यही थी कि अजय जी के साथ होने के कारण टिकट, ट्रेवल, स्टे इन सबके इंतजाम के झंझटों से मैं मुक्त थी. यानी मुझे सिर्फ मजे करने थे. लम्बे समय बाद यह राहत मिली थी. वरना तो हर ट्रेवल चाहे परिवार के साथ हो या दोस्तों के साथ या अकेले इन सब जिम्मेदरियों का ठेका मेरा ही होता रहा है. जिम्मेदारियों से राहत भी चाहिए होती है कभी कभी. हम स्टेशन वक़्त पर पहुंचे लेकिन ट्रेन थोड़ी सी लेट हो गयी. स्टेशन की चाय हम पी सकें शायद इसलिए. किसी शहर को महसूस करना हो तो वहां के रेलवे स्टेशन पर थोड़ा वक़्त जरूर बिताना चाहिए. यहाँ जीवन जैसा है, वैसा मिलता है. एक ऊंघती हुई बच्ची अपने पापा के कंधों पर झूल रही थी, गजरा बालों में टांके एक लड़की एक लड़के के कंधे से टिककर ऊंघ रही थी. एक लड़का अभी-अभी बगल में खडे अंकल को चाय देकर गया. इधर से उधर तेजी से जाती ज्यादातर औरतों ने गजरे पहने हुए थे. ये इनके गजरे हमेशा फ्रेश कैसे रहते होंगे मैंने मन में सोचा और गम्भीर मुद्रा बनाकर ट्रेन के एनाउंसमेंट पर ध्यान केन्द्रित किया. थोड़ी ही देर में ट्रेन आ गयी और गोवा का हमारा सफर शुरू हुआ.

अजय जी मुझे खिड़की वाली सीट देकर यह बताकर कि 'रास्ता बेहद खूबसूरत है, देखती जाना' सो गये. उनके लिए यह रास्ता नया नहीं था और रात की नींद उनकी भी अधूरी ही रही थी. जब भी ट्रेन में कुछ खाने को आता, ब्रेकफास्ट या लंच या कुछ और वो जागते, खाते और सो जाते. जितनी देर वो जागते उनकी बातचीत बड़ी मजेदार होतीं. खूब हंसी आती मुझे और लगता कि सफर अच्छा कटने वाला है. मेरी अजय जी से दोस्ती पुरानी है लेकिन यह दोस्ती कम संवादों और इक्का-दुक्का छोटी छोटी मुलाकातों भर की है. उनसे अनौपचारिक मुलाकात का यह पहला मौका था और मुझे नहीं मालूम था कि उनकी उपस्थिति सहजता से भरपूर होगी. हमारी छुटपुट नोक-झोंक शुरू हो चुकी थी जो पूरे सफर में चलती रही.

मुम्बई से गोवा का रास्ता सचमुच बेहद खूबसूरत है. सारे रास्ते मैं चुप होकर खिड़की के बाहर देखती जा रही थी. तेजी से छूटते जा रहे पेड़, सडकें, गाँव, पानी सब मोह रहे थे. ऐसा लग रहा था सब मुझे जानते हैं और मुस्कुराकर हैलो कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इन सबसे पहली बार मिल रही थी. ट्रेन का खूबसूरत सफर मुझे सुकून से भर रहा था. सामने लगे स्क्रीन पर देखने के लिए जो फ़िल्में थीं वो भी काफी अच्छी थीं. मन में दुविधा थी कि फिल्म देखूं या दृश्य. मैंने दृश्य ही चुने. एक बैंगनी रंग के बड़े-बड़े पत्तों वाला पेड़ अब तक मेरी स्मृतियों में झूमता है.

करमाली स्टेशन आने वाला था. स्टेशन आने से पहले ही समन्दर दिखने शुरू हो गए थे. ये समन्दर के वो किनारे थे जो शायद शहर से नहीं दिखते. मन उछल-उछल जा रहा था खिड़की से समन्दर देखकर. कुछ ही देर में हम स्टेशन पर थे. स्टेशन ज्यादा बड़ा नहीं है लेकिन साफ़ और सुंदर है. मौसम गर्म था यहाँ. दिसम्बर के महीने में देहरादून से चलते समय जो ढेर सारी जैकेट लदकर आई थीं उनमें से आधी तो मुम्बई में ही पैक हो गयी थीं और बाकी के पैकअप का समय अब था.

मैं आँख भर स्टेशन देख रही थी और अजय जी कम से कम पैसे में मिलने वाला ऑटो ढूँढने में लगे थे. मुझे अजय जी से यह भी सीखना था कि यात्राएँ कैसे इकोनोमिक और अच्छे ढंग से की जाती हैं. आखिर हमें हमारे जैसे ही दो विदेशी दोस्तों के साथ शेयरिंग में ऑटो मिल गया और हम चल पड़े गन्तव्य की ओर.

पणजी बेहद खूबसूरत है. मांडवी नदी के किनारे पर बसे इस सुंदर शहर से बातें करने का जी चाह रहा था. ऑटो होटल की ओर भाग रहा था और पेड़ों से लुकाछिपी खेलते हुए समन्दर मुझे लुभा रहा था. जी तो चाह रहा रहा अभी रुक जाऊं लेकिन खुद को मैंने दिलासा दिया अब तो आ ही गयी हूँ, मिलूंगी तसल्ली से.

जारी...

Monday, August 12, 2019

गोवा से आई पुकार और प्यार



यह मेरी नहीं लहरों की बात है. उन लहरों की जिन्होंने मुझे हमेशा हर मुश्किल वक़्त में सहेजा है. कभी पास से, कभी दूर से. नहीं मालूम इन लहरों के इश्क़ में कबसे हूँ. तबसे जब इन्हें छूकर देखा भी नहीं था शायद. न नज़र से, न हाथ से. समन्दर की लहरों की बात कर रही हूँ. सिनेमा में देखे समन्दर थे या उपन्यासों और कहानियों में पढ़े समन्दर. कब कैसे मुझे समन्दर से इश्क़ हुआ पता नहीं. समन्दर को पहली बार देखने का अवसर मिला नवम्बर 2011 में. शायद समन्दर ने मुझसे मिलना तब तक के लिए मुल्तवी किया था जब तक उससे मिलना मेरे जीने की अंतिम जरूरत न रह जाय. कुछ भी योजनाबद्ध तरह से नहीं होता. कुछ भी नहीं सचमुच. जन्म भी नहीं, मृत्यु भी नहीं, जीवन के युद्ध भी नहीं और समर्पण भी नहीं. जीवन का यह समय युद्ध का नहीं था. समर्पण का था. ऊँहू ! समर्पण ठीक शब्द नहीं, ‘गिवअप’ ठीक शब्द है. दोनों में काफी फर्क है. मैं एकदम ‘गिवअप मोड’ में थी. तभी दोस्तों ने गोवा चलने का प्लान बनाया और मैं गोवा में थी. इत्तिफाक ही होगा कि जिन दोस्तों ने प्लान किया था वो खुद ही न आ सके थे और मैं और माधवी ही पहुंचे थे गोवा. शायद हम दोनों का मिलना और समन्दर से मुलाकात इससे अच्छे ढंग से नहीं हो सकती थी. हम दोनों पहली बार मिली थीं. हम दोनों जिन्दगी से जूझते-जूझते टूट रही थीं, हम दोनों मुश्किलों के बारे में बात करना पसंद नहीं करती थीं और हम दोनों समन्दर से बेपनाह प्यार करती थीं.

हमने आधी आधी रात तक गोवा के समन्दर से बातें की थीं, गोवा का चप्पा-चप्पा छानते हुए हम खुद को तलाश रहे थे. और जब हम मुठ्ठियों से समेट-समेट कर समन्दर जिन्दगी में भरकर वापस लौटे थे तो हम वो नहीं थे, जो हम गए थे. समन्दर ने हमसे उलझनें लेकर, हिम्मत और भरोसा देकर वापस भेजा था. लौटने के बाद उसी हिम्मत और भरोसे के साथ जिन्दगी को नयी राहों पर रख दिया था और वही नयी राहें आज तक हाथ थामे चल रही हैं.

इसके बाद कई बार समन्दर मिले, अलग-अलग नामों से, अलग-अलग देश में, प्रदेशों में. लेकिन 2018 के आखिरी में जब एकदम अचानक एक बार फिर से गोवा ने आवाज दी तो मैं चौंक गयी. इस वक़्त, गोवा? सोचना भी नामुमकिन था. जिन्दगी एक साथ कई खानों में उलझी और अटकी हुई थी. पहले से इतनी उलझनें थीं कि उनमें संतुलन बनाना ही मुश्किल हो रहा था और उस वक़्त गोवा से आई यह आवाज? आखिर क्या मायने हैं इसके. जब मोहब्बत आवाज दे तो इनकार कर पाना कितना मुश्किल होता है यह कोई आशिक मन ही जान सकता है. लेकिन हाँ कहना भी आसान नहीं था. गोवा से आई यह पुकार मुझे सोने नहीं दे रही थी. इस बार जब यह पुकार आई थी तब जिन्दगी में बहुत कुछ बदल चुका था. सचमुच बहुत कुछ. पहले आई पुकार उदासियाँ पोछने और हिम्मत देने के लिए थीं लेकिन इस बार हौसलों को परवाज देने, पहचान देने और जिन्दगी की मुश्किलों से लड़ने का ईनाम देने को थी. यह बुलावा था मेरी एक कविता 'ओ अच्छी लड़कियों' का इंटरनेशल सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल में शामिल किये जाने पर. इस कविता को मेवरिक प्ले लिस्ट में जगह मिली थी जिसे संगीतबध्ध किया था मेरी प्रिय शास्त्रीय संगीत सिंगर और संगीतकार शुभा मुद्गल और अनीश प्रधान ने. यह सब इतना अचानक, इतना अनायास था कि यकीन सा नहीं हो पा रहा था. यह मेरे लिए ऐसा समय था जैसे खेल रही हो जिन्मेदगी मेरे संग. जैसे-जैसे गोवा जाने की तारीखें करीब आती जा रही थीं वैसे-वैसे न जाने देने की स्थितियां मजबूत होती जा रही थी.

इश्क़ की पुकार में बहुत ताकत होती है. आखिर मैं गोवा के लिए निकल ही पड़ी ठीक वैसे ही जैसे लड़की भागती है मंडप से उठकर सारे बंधन तोड़कर. इसमें जोखिम भी बहुत होता है और रोमांच भी. आखिर मैंने गोवा को हाँ कर दी थी. मेरे इस हाँ कहने में यानी लड़की को जिन्दगी की तमाम दुश्वारियों वाले मंडप से भगाने में मेरे भाई, भाभी और दोस्त ज्योति का बड़ा रोल रहा. लहरों की ताल पर थिरकता मन मुम्बई एयरपोर्ट पर उतरा तो खुश था. मुम्बई से एक दोस्त को मैंने साथ चलने के लिए मना लिया था. हमने मुम्बई से गोवा ट्रेन से जाना चुना था.

  जारी...

(गोवा डायरी, दिसम्बर 2018 )

Monday, August 5, 2019

तुमसे प्यार है सोनम, डरो नहीं


'दीदी, आप नहीं जानतीं मुसलमान बहुत ख़राब होते हैं. बहुत कट्टर होते हैं. इनके साथ यही होना चाहिए. कश्मीर में कितना दंगे करते हैं ये लोग. अब मोदी जी सब ठीक कर देंगे.' सोनम एक सांस में अपनी बात उड़ेल देती है और पूछती है 'आज खाने में क्या बनेगा?' वो पहले भी ऐसी बातें करती रही है. ज्यादा बात नहीं करती लेकिन जब करती है तो मोदी जी की तारीफ ही करती है. गर्व से उसने बताया था कि उसने और उसके परिवार ने भाजपा को वोट दिया. यह कहना बल्कि सोचना भी मुझे बुरा लगता है कि सोनम कौन है किस जाति या धर्म की है, मैंने कभी नहीं पूछा किसी भी अपने सहायक से. लेकिन सोनम को अपनी पहचान छुपानी पड़ी थी. उसने खुद को हिन्दू बताकर घर में खाना बनाना शुरू किया था. हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था लेकिन एक महीने काम करने के बाद पता चला कि वो हिन्दू नहीं है. और यह पता चला मोहल्ले की पढ़ी लिखी आंटी से. उन्होंने मुंह बनाकर बताया 'आपको पता है सोनम मुलसमान है? वो रोजे से होती थी लेकिन छुपाती थी. डरती थी कि कहीं पहचान न खुल जाए.

सोनम हिन्दू नहीं है, मुलसमान है वो. बहुत डरी हुई है वो. हिन्दू घरों में काम करती है और वही बोलती है जो उन्हें सुनना अच्छा लगेगा. यही सोचकर वो मुझसे भी वह सब बोलती है जो काम करने के लिए, जीने के लिए रटकर घर से निकलती है. मैं उसकी तकलीफ समझ सकती हूँ. अभी भी वो मुझ पर पूरा यकीन नहीं कर पायी है हालाँकि उसे एक राहत है कि अब उसे मेरे घर में अपनी पहचान को लेकर झूठ नहीं बोलना पड़ता.

उसने किसे वोट दिया यह उसका अधिकार है, उसका चुनाव लेकिन वो अपना सच बता नहीं सकती. उसे सिर्फ लहर के मुताबिक बात करनी है. मुसलमानों को बुरा भला कहना है और किसी तरह अपनी रोजी रोटी कमानी है. एक रोज उसने कहा, दीदी आपकी बात और है, लेकिन सब लोग यही सुनना चाहते हैं कि मुसलमान ख़राब होते हैं तो हम वही बोलते हैं.

मैं उसके भीतर के डर का सामना नहीं कर पाती. सोनम अकेली नहीं है. बहुत से लोग हैं आसपास. जो चुप हैं. जो इस शोर में, उन्माद में आपके ठहाकों में आपके साथ ही नजर आते हैं लेकिन उनकी आँखों में जो डर है, पीड़ा है उसे देखने की फुर्सत किसी को नहीं. न सरकार को न नागरिकों को. उनके इस डर को अपना बनाना कैसे कहा जा सकता है?

जहाँ धारा 370नहीं है वहां क्या किया है सिवाय नफरत बोने के कि कश्मीर को अपना बनाने का यह तरीका निकाला गया है. इस तरह तो किसी को अपना बनाया नहीं जाता. कश्मीर सिर्फ जमीन नहीं है दिल है वहां के लोगों के उस दिल में क्या इस तरह जगह बना पायेंगे हम? क्या सोनम को अपनी पहचान न छुपानी पड़े यह हमारी चिंता है, हमारे दोस्तों को अपने मन की बात कहते-कहते रुक न जाना पड़े, या उनकी पलकें न भीग उठे, आवाज रुंध न जाए यह हमारी चिंता है. कश्मीर तो हमारा ही था पहले भी, उससे प्यार तब भी था,अब भी है.

अभी-अभी दोस्ती दिवस मनाया है और अब इस बात पर खुश हैं? कितना अच्छा होता कि यह होता लेकिन डर के साए में नहीं मोहब्बत के साए में होता. वो खुद शामिल होते इस फैसले में ख़ुशी से.

#standforpeaceandlove