Tuesday, December 31, 2019

ओ जाते हुए लम्हों तुम्हें सलाम!


बीतते हुए लम्हों को देख रही हूँ. यह समय मेरी जिन्दगी में बहुत मायने रखता है. ठीक एक दशक पहले जिन्दगी की बाज़ी पलटी थी. अच्छे या बुरे का पता नहीं लेकिन तब नयी प्रतिभा ने उगना शुरू किया था. घुटने छिले, खून और पसीने से लथपथ हुए. धूप, सर्दी, बरसात से गुजरते हुए जिन्दगी से बेजारी भी हुई. संघर्षों की आंच में तपना शुरू हुआ.

पलटकर देखती हूँ तो सुकून महसूस होता है. आज अपने भीतर खुद को महसूस कर पाती हूँ. आज मुझमें मैं हूँ. यूँ तलाश भी जारी है और तराश भी लेकिन कुछ है जो बहुत सारा खोकर बहुत थोड़ा सा पा लिया है. यह थोड़ा सा जो है, यही सुख है. लेकिन इस सुख को सिरहाने रखकर सोते समय भी नींद में कोई नीम उदासी रहती है. मुझे यह नीम उदासी प्यारी लगती है. यह मुझे भटकने नहीं देती मुझे सम पर बनाये रखती है.

यह जो बीत रहा है, इसके प्रति अगाध स्नेह है, इसने मुझे गढा है. भौतिक दृष्टि से देखें तो इस एक दशक ने मुझे अपने पाँव पर और मजबूती से खड़ा किया, नयी पहचान दी, नए दोस्त दिए, नया आत्मविश्वास दिया. बीते बरस को देखें तो इसी बरस में अपने खुद के घर में बैठकर अपनी पहली किताब की भूमिका लिखी. यह सब सुख ही तो है लेकिन जाने क्यों जब खुश होने की बारी आती है आँखों में कोई नमी सी आ बैठती है.

जानती हूँ भौतिक सुखों का कोई अर्थ नहीं. जिस बात का अर्थ है वह यही है कि क्या महसूस होना बढ़ा है? क्या मनुष्य होने की ओर कुछ कदम और बढ़ सकी हूँ, क्या अब सामाजिक मुद्ददे पहले से ज्यादा बेचैन करते हैं...जवाब हाँ में आता है और यह सुकून कम नहीं.

सुकून यह है कि दोस्त गुड मॉर्निग का मैसेज नहीं फौरवर्ड करते लेकिन यकीनन उनके होने से सुबहें खूबसूरत हैं. सुकून है कि दोस्त हैं जिनका सच मेरे सच से मिलता है और उन्हें मेरे सुख पर मुझसे ज्यादा हक है. सुकून है कि तमाम नकारात्मक ताकतों के खिलाफ देश लड़ रहा है और उन लड़ने वालों में दोस्त शामिल हैं.

इस बीतते वक़्त की यही सुंदर बात लगती है कि इसने दोस्तियों के चेहरे साफ़ किये हैं, नकाब उतारे हैं. दोस्तियों को और गाढ़ा किया है. हर बीते हुए लम्हे के प्रति आभारी हूँ, आने वाले हर लम्हे के प्रति विनम्र हूँ. फिर भी नए साल को मनाने जैसा नहीं पाती खुद को. अशोक कुमार पाण्डेय की दो लाइने जेहन से उतर ही नहीं रहीं कि
अपना नया साल तो तभी मनेगा
जब जेल के ताले टूटेंगे
और यार हमारे छूटेंगे.

चम्पक के मम्मी पापा उसे जल्द गले लगा लें, दीपक और सदफ समेत वो सब साथी घर लौट आयें जो सच के लिए लड़ रहे हैं. आंदोलनों की आंच तेज़ होती रहे नये बरस के नाज़ुक कंधो पर इन्हीं उम्मीदों को रखते हुए आने वाले हर नए लम्हे का स्वागत, सबको बधाई, शुभकामनाएं!

(इश्क़ शहर, जाते बरस की डायरी)

Wednesday, December 25, 2019

कवि का कोई देश नहीं होता- मारीना


- प्रियदर्शन, एनडीटीवी 

करीब एक सदी पहले रूस में हुई थी‌ एक कवयित्री- मारीना त्स्वेतायेवा। रूसी क्रांति के जलते हुए दिनों में वह एक कुलीन घर में बड़ी हुई थी। जीवन, प्रेम और मनुष्यता से भरी उसकी कविता उस समय की सत्ता के लिए ज़रूरी शर्तों और मुहावरों में ढल नहीं पाई थी। इसकी कई सज़ाएं उसने भुगतीं- भयावह‌ ग़रीबी, निर्वासन, अपने बच्चे की मौत, वापसी के बाद का मरणांतक संघर्ष और अंततः आत्महत्या। उसने लिखा था, कवि का कोई देश नहीं होता।

लेकिन रूस अपनी इस‌‌ कवयित्री को बहुत देर तक उपेक्षित नहीं रख सका। उसकी कविताएं छपीं‌ और कई‌ भाषाओं में अनूदित हुईं- हिंदी में भी।

सौ बरस बाद हिंदी की एक कवयित्री ने इन्हीं अनुवादों की मार्फत उसे पढ़ा। वह‌‌ उन कविताओं में डूबती चली गई। वह ख़ुद मारीना त्स्वेयातेवा होती चली गई। उसने उन पर लिखना शुरू किया। कई बरस लगा कर पूरी किताब लिख डाली।
अब इस पुस्तक मेले में यह किताब आ रही है। प्रतिभा कटियार की यह किताब 'मारीना' जिन कुछ लोगों ने छपने से पहले पढ़ी है, उनमें सौभाग्य से मैं भी हूं।
लेकिन यह किताब सिर्फ मारीना की जीवनी नहीं है- उसकी कविताओं की व्याख्या भर नहीं है। वह दो अलग-अलग कालखंडों और अलग-अलग देशों में पैदा हुई दो कवयित्रियों का वह अंतरंग संवाद भी है जो कविता या साहित्य से संभव होता है। यह‌ किताब नए सिरे से याद दिलाती है कि साहित्य या मनुष्यता में कोई एक चुंबकीय तत्व ऐसा होता है जो इतिहास, भूगोल, भाषाओं और संस्कृतियों के पार जाकर भी हमें जोड़ देता है- वहीं हमें इतनी गहनता भी देता है कि हम सदियों और सरहदों के पार जाकर किसी लेखक से इस तरह जुड़ जाएं कि बिल्कुल एक हो जाएं।
संभव है, किसी को एतराज़ हो कि रूसी भाषा से अनभिज्ञ एक कवयित्री ने मारीना पर किताब लिखने की‌ जुर्रत क्यों की। यह भी संभव है कि कुछ लोग नामों के बिल्कुल शुद्ध उच्चारण के आग्रह के साथ इसकी आलोचना करें।‌‌‌‌ लेकिन हम सब जानते हैं कि हर भाषा अपनी प्रकृति के अनुरूप, अपने मुख-सुख के हिसाब से अपने उच्चारण ख़ुद तय करती है। हमने अलेक्जेंडर को सिकंदर बना दिया है, चाइना को चीन, मस्क्वा‌ को मास्को और ऐरिस्टोटल को अरस्तु। अंग्रेजों ने भी सिंधु को इंडस बनाया और गंगा को गैंगेज़ जैसा कुछ। हज़ारों शब्द हैं जो अपना मूल स्वरूप खो चुके हैं फिर भी हमारे भीतर अपने मूल अर्थों में ही ध्वनित होते हैं। व्यक्तिवाचक संज्ञाएं भी स्थानिकता की मिट्टी का लेप लगा कर सहज हो जाती हैं। विष्णु खरे का आग्रह होता था कि मुसोलिनी को हम मुसोल्लीनी लिखें और फेलिनी को फेल्लीनी।
यही नहीं कुछ नामों के कई रूप चल पड़ते हैं।‌ जर्मनी में ही अलग-अलग हिस्सों में ब्रेख्त और ब्रैश्ट चलते हैं। 'मेरा दागिस्तान' जैसी अनूठी किताब के लेखक रसूल हमजातोव की‌ कविताएं रसूल गमजातोव के नाम से छपीं।
यानी साहित्य की संवेदना ऐसे शुद्धतावादी आग्रहों से ऊपर होती है। वैसे भी यह किताब ऐसी ही संवेदना के असर में लिखी गई है- एक प्यारी सी किताब, जिसको पढ़ते हुए हम कुछ और समृद्ध और संवेदनशील होते हैं- कुछ मारीना जैसे होना चाहते हैं और कुछ प्रतिभा जैसे। यह किताब संवाद प्रकाशन से आ रही है।


Tuesday, December 24, 2019

मारीना त्स्वेतायेवा इसी देश में


विश्व पुस्तक मेला 4 जनवरी से 12 जनवरी तक है। पिछले वर्ष इन्हीं दिनों हमने लगातार संवाद से आने वाली किताबों की सूचनाएं पाठकों को दी थीं। इस बार दो-एक किताबों को छोड़ कर सूचनाएं फेसबुक पर नहीं दी जा सकी हैं। हमारे ढेरों पाठकों के फोन और मैसेज आ रहे हैं।

संवाद से पिछले साल विश्व साहित्य और भारतीय साहित्य की 80 अत्यंत महत्वपूर्ण किताबें प्रकाशित हुई थीं। इस वर्ष भी 60 किताबों के प्रकाशन का लक्ष्य था। दरअसल पिछले तीन माह में स्वास्थ्य बहुत ठीक न होने के कारण काम में बार बार बाधा आती रही। एक बार तो ऐसा लगा कि इस बार पुस्तक मेले में भागीदारी नहीं हो सकेगी न ही नई पुस्तकों का प्रकाशन हो पाएगा। परंतु हमें यह बताते हुए संतोष है कि हम इस बार पुस्तक मेले में नई किताबों के साथ होंगे। हां, स्वास्थ्य व अन्य बहुत सारी बाधाओं और दबावों के चलते हम पूर्व-निर्धारित 60 में से मात्र 30 नई किताबें प्रकाशित कर पा रहे हैं। शेष किताबें मार्च से जून 2020 के बीच आएंगी।

इस कड़ी में पहली पुस्तक है रूस की महान कवयित्री मारीना त्वेतायेवा की एक बड़ी जीवनी। लगभग 300 पृष्ठों की इस जीवनी में मारीना का जीवन और वह पूरा समय जब रूस खलबला रहा था, मौजूद है। हिंदी की दुनिया ने लगभग तीस साल पहले मारीना से तब पहला परिचय पाया था जब रूसी भाषा के समर्पित और श्रेष्ठ अनुवादक श्री वरयाम सिंह ने उनकी कविताओं का एक संग्रह आएंगे दिन कविताओं के हिंदी में प्रकाशित करवाया था। उस संग्रह ने हिंदी कविता के पाठकों पर गहरी छाप छोड़ी थी। मारीना के साहित्य में हिंदी जगत में एक उत्सुकता पैदा हुई थी। बाद में वरयाम जी ने उनकी और भी कविताओं का अनुवाद व पत्रों का प्रकाशन करवाया। ये किताबें आधार प्रकाशन व प्रकाशन संस्थान से छपीं।

सो हिंदी पाठक मारीना से भली-भांति परिचित हैं, थोड़ा-बहुत उसके जीवन-संघर्ष से भी। संवाद से प्रकाशित हो रही यह जीवनी उन्हें मारीना के उस जीवन के पास ले जाएगी, जो इतिहास और कविता की संधिरेखा पर खड़ा था। रूस में क्रांति हुई थी। गृहयुद्ध, भूख, अव्यवस्था के बीच नया रूस जन्म लेने की पीड़ा झेल रहा था। मारीना का अपना जीवन संघर्ष इस इतिहास की बलि चढ़ गया। पर अपने पीछे वह बेहद खूबसूरत, आत्मीय, उज्ज्वल कविताएं छोड़ गई। ये वे कविताएं थीं, जिनके लिए एक जीवन जिया गया था…

प्रतिभा कटियार ने रचनात्मक ढंग से मारीना की जिंदगी को इन पन्नों में प्रस्तुत किया है।

-  आलोक श्रीवास्तव , संवाद प्रकाशन 

Saturday, December 21, 2019

प्रेम में होना



दुनिया भर में जितने भी प्रताड़ित लोग हैं चाहे वो किसी भी धर्म के हों, उनके प्रेम में हूँ.

देश भर में जितने भी लोग आंदोलनों में किसी भी तरह से सक्रिय हैं, उनके प्रेम में हूँ

वो सब लोग जो अपने हकों के लिए आवाज उठा रहे हैं, अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, उनके प्रेम में हूँ.

वो सब जो लाठियां खा रहे हैं, गालियाँ खा रहे हैं, जेलों में भेजे जा रहे हैं, उन सबके प्रेम में हूँ.

वो जो मेरे आसपास हैं, डरे हैं, सहमे हैं, चुप हैं, कुछ नहीं कहते, उनके प्रेम में हूँ.

वो जो गुस्से में बिफर ही पड़े हैं, हमसे नाराज हो बैठे हैं कि कैसे एक ही पल में उन्हें उनके ही देश में बेगाना कर दिया गया, उनके प्रेम में हूँ

वो रौशनी की नन्ही किरणें जो विशाल अँधेरे के आंगन में कूद जाने बेताब हैं, उनके प्रेम में हूँ.

कि प्रेम में होना ही है साथ होना..

Sunday, December 15, 2019

गुइयाँ




जब तुम्हें सोचती हूँ
तब सोचती हूँ आकाश
जो उदास मौसम में
झुक के आ जाता है
कन्धों के एकदम पास


जब तुम्हें सोचती हूँ
तब सोचती हूँ रास्तों को
जो जितने लम्बे होते हैं
उतनी गहन होती है उनकी पुकार
उन रास्तों पर अचानक
तुम थाम लेती हो हाथ
और रास्तों की लम्बाई
खूबसूरत साथ में बदल जाती है

जब तुम्हें सोचती हूँ
तब सोचती हूँ
मीठी सुबहों में महकती मधु मालती को
और जयपुर वाले घर की छत पर
सुबह की चाय के साथ खेलना आई स्पाई

जब तुम्हें सोचती हूँ
तब खुलती है जादू की एक पुड़िया
मासी मासी का मीठा स्वर महकाने लगता है मन
पंछियों का कोई झुण्ड गुजरता है करीब से
तुम दौड़ती भागती, मुस्कुराती आश्वस्त करती हो
कि मैं बेफिक्र हो सकती हूँ क्योंकि तुम हो मेरे पास.

Thursday, December 12, 2019

छोटा उ से उम्मीद


इसमें आश्चर्य की भला क्या बात है कि सारा देश जश्न मना रहा है कि एनकाउंटर न्याय हुआ. क्यों होना चाहिए आश्चर्य कि बाबाओं को बचाने के लिए हिंसक होने तक टूट पड़ने वाली भीड़ उसी पुलिस पर फूल बरसाती है जिसके पास जाकर रिपोर्ट लिखवाने जाने से डरती हैं स्त्रियाँ. पुलिस कस्टडी में हुए रेप की संख्या के बारे में नहीं सोचती जनता तो कोई आश्चर्य नहीं होता. कोई आश्चर्य नहीं होता कि इस जनता में ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग शामिल हैं. सांसद से लेकर पत्रकार, साहित्यकार, फ़िल्मकार सब. क्यों होना चाहिए आश्चर्य आखिर? हम अतार्किक लोग हैं. हम भीड़ हैं हमें भीड़ बनना सिखाया गया है, तालियाँ बजाना सिखाया गया है. बात मानना और झुण्ड बनकर किसी के पीछे चलना सिखाया गया है. और यही असल सुख है यह भी हमारे भीतर बो दिया गया है. किस बात पर कितना हंसना है, किस बात को किस हद तक सहन करते जाना है सदियों तक और किसे पीट-पीटकर मार डालना है यह सब हमारे लिए कोई और तय करता है. हमने कब खुद के लिए खुद की मर्जी से सोचना सीखा. हम तो बताई गयी मार्जियों पर अपनी मर्जी की मुहर लगाकर ही जीते जा रहे समाज ही रहे हैं हमेशा से.


क्यों आश्चर्य हो जब आपके तार्किक होने और यह पूछने को कि 'क्या यह कोई न्यायिक प्रक्रिया है' गुनाह मान लिया जाय. शिक्षकों के आन्दोलन को, दरकिनार किया जाय और छात्रों के फीसवृद्धि की मांग को देशद्रोह ही कह दिया जाय.

सवाल पूछना आपका काम नहीं था. ताली बजाना था, जयकारा लगाना था. सवाल पूछोगे तो मारे जाओगे इसमें हैरत क्यों भला. क्यों हैरत हो कि हम यह भी न सोचें कि यही पुलिस अपनी ही महिला अधिकारी की रक्षा में नाकाम है. पुलिस क्या कोई व्यक्ति है? भीड़ क्या कोई व्यक्ति है? नहीं दोनों ही सत्ता के खिलौने हैं जिससे सत्ता अपनी-अपनी तरह से खेलती रहती है.

पुलिस महकमा अपने भीतर भी तमाम लड़ाईयां लड़ रहा है. एक सिपाही छुट्टी न मिलने पर 5 लोगों को मारकर खुद को भी मार लेता है यह बात क्यों चर्चा का विषय नहीं बनती. महीनो उन्हें घर जाने को नहीं मिलता, हफ़्तों छुट्टी नहीं मिलती, 16-16 घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है. यह पूरे महकमे की कुंठा भरी बाते हैं. ऐसी कुंठा भरी खबरें पुलिसिया अपराधों की राह प्रशस्त करती हैं. पुलिस अपने नकारेपन को इस तरह ढंकती है और हिट हो जाती है. जनता नाच रही है कि न्याय हुआ है, पर क्या न्याय हुआ है? बिलकुल आश्चर्य नहीं होता कि यही जनता सवाल नहीं करती कि बलात्कार, हत्या व अन्य अपराधों में शामिल लोग संसद में क्यों हैं? ओहो जनता ने ही तो उन्हें चुनकर भेजा है आखिर. क्यों भेजा होगा जनता ने उन लोगों को संसद में यह सोचना मना है. हम तमाशबीन समाज हैं क्योंकि ऐसे ही हम बनाये गए हैं. इसमें आश्चर्य कैसा भला. और जो इस भेडचाल में शामिल नहीं हुए हैं, जिन्होंने सवाल करने बंद नहीं किये हैं, जिन्होंने बेहतर समाज का सपना देखना छोड़ा नहीं, जो हकों के लिए अब भी लड़ना जानते हैं उनका अगर मजाक उड़ाया जाए , उन पर मुकदमे दर्ज हों, उन्हें नजरबंद किया जाय, देशद्रोही कहा जाय तो भला क्यों आश्चर्य होना चाहिए. एक जागे हुए दिमाग से ज्यादा खतरनाक भला और क्या होता है, तो उसे घेरने में तो सत्ताएं जुट ही जाएँगी न?

नहीं आश्चर्य होता कि हम सबको, इस पूरे समाज को धर्म, जाति, मंदिर, मस्जिद और कहीं कहीं सत्ता की चापलूसी से मिलने वाले फायदों, पुरस्कारों आदि की अफीम चटा-चटाकर कठपुतली बना दिया गया है. ये कठपुतलियां भीड़ हैं, साइबर सेल हैं. ये कठपुतलियां विलक्षण लेखक हैं, पत्रकार हैं, फ़िल्मकार हैं. इनके पास तर्क हैं जो इंसानियत की पैरवी नहीं करते धर्म की करते हैं, जाति की करते हैं. तर्क जो अपराधियों में भी धर्म देखते हैं और पीड़ित में भी.

आश्चर्य तो यह है कि कोई उम्मीद है जो अब तक बुझी नहीं है. आश्चर्य तो यह है कि एक सुंदर समाज का सपना है जो तमाम किरचों में टूट जाने के बावजूद बचा हुआ है. दूर किसी गाँव में कोई शिक्षक बच्चों को सुना रहा है प्यार भरी कोई कविता और कोई बच्ची लिख रही छोटा उ से उम्मीद.

Monday, November 18, 2019

लाठियां चलाने वाले कौन हैं आखिर



रात भर शोर था आसपास. लाठियां चल रही थीं. लोग पिट रहे थे, लोग पीट रहे थे. लोग घायल हो रहे थे, लोग अस्पताल लेकर दौड़ रहे थे. लोग गालियाँ दे रहे थे, लोग दुआएं मांग रहे थे. सुबह आँख खुली थी पाया सपने में नहीं हकीकत ही सपने में थी. रात भर एक दृष्टिबाधित युवा हबीब जालिब की ग़ज़ल गाता रहा, तब भी जब उसे पुलिस पीट रही थी तब भी जब उसकी पसलियाँ टूट रही थीं,

ये लाठियां चलाने वाले कौन लोग हैं आखिर और किसे पीट रहे हैं. ये जिन्हें पीट रहे हैं ये अपने बच्चे हैं, इस देश का भविष्य. ये अपने हक के लिए लड़ रहे हैं. सच कहें तो ये हम सबके हक के लिए लड़ रहे हैं. फीस वृद्धि सिर्फ इनका मसला नहीं है यह उनका मसला भी है जिनके बच्चे अभी यहाँ पढने आये नहीं लेकिन आने का ख्वाब देखते हैं. हो सकता है कि लाठी भांजते पुलिसवालों के बच्चे भी यहाँ आने का ख्वाब देखते हों. और सिर्फ जेएनयू ही क्यों फीस वृद्धि का मसला तो मुसलसल हर जगह का है. हर अभिभावक का जो ज्यादा फीस के चलते तथाकथित अच्छे स्कूल में अपने बच्चों को नहीं भेज पाते.

खैर, लोग कहेंगे कि जो पीटते हैं वो सोचते नहीं वो आदेश का पालन करते हैं. मैं सचमुच जानना चाहती हूँ कि वो आदेश कैसे होते हैं. उनकी भाषा क्या होती है. क्या उसमें हिंसा, बेरहमी, क्रूरता, वीभत्स और अमानवीय व्यवहार मेंशन होता है. क्या होता है उन आदेशों में कि बेचारे पुलिस वाले मजबूरी में ऐसा क्रूर व्यवहार करने को मजबूर हो जाते हैं. अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में ही पुलिस और वकीलों के बीच के संघर्ष का मामला भी सामने आया. वहां वकीलों ने भी ऐसा उपद्रव किया कि पुलिसवाले बेचारे नजर आये. महिला आइपीएस के संग बदतमीजी हुई. यह कौन लोग हैं आखिर. वर्दी का नशा, पावर का नशा, अपनी ही चलाने का नशा या जिन्दगी के तमाम मोर्चों पर पराजित होने की कुंठा हाथ में लाठी और पीटने का मौका.

यही भीड़ की हिंसा में होता है. कई बार दनादन पीटने वालों को, पीट पीटकर हांफ जाने वालों को पता तक नहीं होता कि उसने किसे पीटा और क्यों पीटा. इसे समाज के तौर पर, व्यक्ति के तौर पर समझने की जरूरत है कि हमारी हताशाएं, हमारी पराजय, कुंठा हमारा कैसा व्यक्तित्व रच रही हैं. यही हिंसा घरों तक पहुँचती है, पत्नी और बच्चों को पीटने में तब्दील होती है. दफ्तरों में पहुँचती है अपने मातहतों के प्रति अपने सहयोगियों के प्रति अभिव्यक्त होती है.

मुझे बचपन से पुलिस से बहुत डर लगता रहा है. शायद इसमें भारतीय सिनेमा का योगदान रहा होगा लेकिन सिनेमा के बाहर भी जो देखा उससे डर कम नहीं हुआ. पुलिस के उन जवानों से मिलकर बात करने का मन होता है जिन्होंने लाठियां बरसाई छात्रों पर कि पीटते वक़्त उन्हें कैसा लग रहा था आखिर. क्या वो ठीक से सो पाए उसके बाद?

पिछले दिनों आई थी यह खबर भी कि पुलिस वाले बहुत ख़राब स्थितियों में ड्यूटी करने पर मजबूर हैं. अच्छा वेतन नहीं, ज्यादा सम्मान नहीं, परिवार से दूर, बिना छुट्टियों के वो लगातार काम करते हैं कहीं यह भी तो कारण नहीं इंसान को इंसान न रहने देने के.

पहले कुंठा, हताशा, निराशा को बोना और फिर उसे इस तरह एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करना राजनीति का मुख्य एलिमेंट हमेशा से रहा है लेकिन हम इसे मात देना कब सीखेंगे आखिर.

Friday, November 15, 2019

छोटी सी प्रेम कहानी



'कैन आई ट्र्स्ट यू?' लड़की ने सकुचाते हुए पूछा.
'यस यू कैन.' लड़के ने अपने कंधे चौड़े करते हुए कहा.
ठीक उसी वक़्त पूरनमासी का चाँद छपाक से नीली नदी में कूद गया. समूची रात सुफेद फूलों की खुशबू से महक उठी.
लड़की की आँखें नम हो उठीं. यह प्रेम की दास्ताँ के सबसे उजले अक्षर थे.
इन्हीं की रौशनी में लड़की की जिन्दगी दिप दिप दिप दमकने लगी. 
वक़्त सरकता गया.
न लड़की ने भरोसा करना छोड़ा न लड़के के कन्धों की चौड़ाई कम हुई है फिर भी लड़की इन दिनों उदास ही रहती है.
भरोसा करने और भरोसा न टूटने के बीच भी काफी उदासी रहती है.

Saturday, November 2, 2019

दो पैसे की धूप चार आने की बारिश



जब किसी से मिलने के बाद उसका मिलना छूट जाता है स्मृतियों में, जब कोई बात कहे सुने जाने के बाद जिन्दगी में ख़ास जगह घेरे रहती है, जब कोई किताब पढ़े जाने के बाद चलती रहती है जेहन में हलचल करती हुई, जब कोई फिल्म स्क्रीन पर अपने हिस्से की अवधि घेर चुकने के बाद मन के हिस्सों पर काबिज रहती है तो लगता है कि जिन्दगी आसपास ही है कहीं. हाल ही में ऐसी ही फिल्म से गुजरना हुआ. दीप्ति नवल की फिल्म 'दो पैसे की धूप चार आने की बारिश.' मैंने फिल्म पर कुछ भी लिखने से खुद को बचाए रखा कि फिल्म को भीतर बचाए रखना अच्छा लग रहा है इन दिनों. अब उस बचे हुए को शब्दों में सहेजना भी सुख हुआ,

फिल्म फ्रेम दर फ्रेम, डायलाग दर डायलाग जिस रूमानियत में इंसानियत को गढ़ती है वो मोहता है. फिल्म बादलों की है, बारिश की है, एक प्यारी सी बिल्ली की है, एक चलने और बोलने से महरूम बच्चे की है और है दो बेहद खूबसूरत इन्सान जूही और देव की. रिश्तों की कोई डोर किसी को किसी से नहीं बांधती लेकिन इंसानियत की, जिन्दगी से मिले थपेड़ों की, भूख की, प्यास की जीने की इच्छा की मौसमों से प्यार करने की डोर फिल्म में सबको एक दूसरे से बांधती है.

एक सेक्स वर्कर स्त्री और एक संघर्ष याफ्ता गीतकार किस तरह जिन्दगी के दो अलग-अलग सिरों पर खड़े होकर भी बंधे हैं फिल्म इसे बयां करती है.अमूमन खींचतान कर स्त्री पुरुष सम्बन्ध को सेक्सुअल डिजायर में कन्वर्ट कर ही दिया जाता है, फिल्म में भी यह कन्वर्जन है लेकिन यह बताने के लिए कि यह कितना गैर जरूरी है.
सेक्सुलिटी से परे इन्सान के रूप में  स्त्री पुरुष का एक-दूसरे से कनेक्ट करने का भी एक रिश्ता होता है. हम सब अपनी कमियों, कमजोरियों से बंधे हैं लेकिन उन्हें उसी रूप में स्वीकारना और एक-दूसरे के होने से खुद को समृद्ध करना यही तो जीवन है.

फिल्म में बहुत सारा अमूर्त प्रेम है जो पूरी फिल्म में बरसता रहता है. यह प्रेम किरदारों का एक-दूसरे से तो है ही उससे इतर फिल्म की लेखिका,निर्देशक दीप्ति नवल का उनके तमाम दर्शकों से है. वो स्क्रीन पर बरसता है मुसलसल वो कुछ और नहीं सुंदर दुनिया का ख्वाब है...जिसे एक पीले गुब्बारों से सजा ऑटो लेकर बार-बार गुजरता है.

मनीषा कोइराला और रजित कपूर दो सुंदर आत्माओं की मानिंद मिलते हैं खिलते हैं और महकते हैं...

कोई यूँ ही तो नहीं बारह मास मौसम बेच सकता. गुलज़ार और सन्देश शांडिल्य ने मिलकर ये मौसम बुने हैं और रचे हैं खूबसूरत गीत मीठे संगीत में ढले-
ख्वाब के बागानों में खिल जाएगी
गर ढूंढोगे तो जिन्दगी फिर मिल जाएगी...

Friday, November 1, 2019

पर्व, प्रगतिशीलता और हम


जब मैं कॉलेज के दिनों में थी तब पहली बार नाम सुना था छठ पूजा का. एक दोस्त के घर से आया प्रसाद खाते हुए इसके बारे में थोड़ा बहुत जाना था. नदी में खड़े होने वाली बात दिलचस्प लगी थी तो अगली साल जब यह पर्व आया तो मैंने इसे देखने की इच्छा जताई और दोस्त की मम्मी की उपवास यात्रा में शामिल होकर गोमती किनारे जा पहुंची. बहुत गिने-चुने लोग ही थे वहां. बाद में कुछ और साथियों से बात की तो ज्यादातर को पता नहीं था इस पर्व का. उत्तर प्रदेश में कुछ ही जगहों पर यह मनाया जाता था शायद मूलतः बिहार में मनाया जाता है ऐसा बताया गया.

छुटपन में करवा चौथ का व्रत रखने वाली स्त्रियाँ बड़ी आकर्षक लगती थीं लेकिन वो सहज ही नहीं दिखती थीं. पूरे मोहल्ले में दो-चार. उनकी सजधज देखने का चाव होता था.

गणेश पूजा, डांडिया के बारे में तो अख़बारों में पढ़ते थे या टीवी में छुटपुट देख लिया. सामने से देखा नहीं.

आज हर उपवास, पर्व की रेंज बढ़ गयी है. बाजार सजे हुए हैं, अखबार रंगे हुए हैं, राज्य सरकारें छुट्टी घोषित कर रही हैं. करवा चौथ को स्त्री सम्मान दिवस तक कहा जाने लगा है. स्त्री सम्मान दिवस घोषित किये जाने पर निहाल होने वाली स्त्रियों ने इस पर कोई सवाल खुद से नहीं पूछा कि किस तरह उनका सम्मान है यह ये अलग ही सवाल है.

सोचती हूँ पिछले दो दशकों में जितनी तेजी से हम धार्मिक अनुष्ठानों, पर्वों के प्रति सक्रिय हुए हैं, जितनी तेजी से इन अनुष्ठानों ने राज्यों की, वर्गों की सीमायें पार की हैं अपनी महत्ता के आगे सरकारों को नत मस्तक कराया है काश उतनी ही तेजी से धर्मों की, जातियों की ऊंच-नीच की बेड़ियाँ तोड़ने, एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील होने की ओर अग्रसर भी हुए होते. धर्म, संस्कृति और पर्व अब सब किसी और के कंट्रोल में हैं वो जो जानते हैं इसकी यूएसपी. कि कैसे इनका इस्तेमाल किया जा सकता है. धर्मों का सकारात्मक इस्तेमाल करना आखिर कब सीखेंगे हम.

मुझे लगता है इसकी कमान स्त्रियों को अपने हाथ में लेनी होगी.

Thursday, October 24, 2019

निर्मल वर्मा स्मृति- बीतकर भी कहाँ बीतता है कुछ


बीतता अक्टूबर पलटकर देख रहा है. सुबह के छह बजे हैं. यह निर्मल वर्मा की सुबह की चाय का वक़्त है. मेरे पास एक प्याला चाय है और हैं निर्मल वर्मा की ढेर सारी स्मृतियाँ. पेड़ों की शाखों पर खिले धूप के गुच्छे अच्छे लगने लगे हैं. गुलाबी ठंड में सिमटी सड़कें अपने आंचल में पीले और लाल फूलों की पंखुडियां समेटे हुए मुस्कुरा रही हैं. दूर किसी कोने पर चाय की टपरी के पास कुछ युवा चाय पी रहे हैं. पास ही नीली गर्दन और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया बांस के झुरमुट में छुपने और दिखने का खेल खेल रही है.

थोर्गियर अभी-अभी यहीं कहीं से गुजरे हैं. निर्मल उन्हें देख मुस्कुरा रहे हैं. धीमे क़दमों से चलते हुए वो थोर्गियर के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद धीमे अंदाज और आवाज में कहते हैं, ‘आदमी को पूरी निर्ममता से अपने अतीत में किये कार्यों की चीर-फाड़ करनी चाहिए, ताकि वह इतना साहस जुटा सके कि हर दिन थोड़ा सा जी सके.’ थोर्गियर चाय की टपरी पर रुककर चाय के लिए हाथ बढ़ा देते हैं. निर्मल की बात को चाय के साथ चुभलाते हुए वो नीली गर्दन और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया को देखने लगे हैं.

न...न...यह प्राग नहीं है, बर्लिन भी नहीं, पेरिस नहीं, कोपेनहेगन भी नहीं. यह 2019 है. लगभग बीत चुके अक्टूबर की 14 बरस पुरानी पगडण्डी पर निर्मल वर्मा की स्मृति की एक शाख अब तक हिलती है. स्मृति की यह शाख जब हिलती है तो उनके कहानी संग्रह ‘परिंदे’, ‘जलती झाडी’, ‘पिछली गर्मियों में’, ‘कौव्वे और काला पानी’, ‘सूखा व अन्य कहानियां’ याद आते हैं. उनके उपन्यास ‘वे दिन’ ‘एक चिथड़ा सुख’ ‘रात का रिपोर्टर’ ‘लाल टीन की छत’ ‘अंतिम अरण्य’ मुस्कुराते हैं. साथ ही ‘चीड़ों पर चांदनी’ के साए में कोई ‘धुंध से उठती धुन’ सुनाई देती है जो ‘हर बारिश में’ की याद दिलाती है.

निर्मल की डायरी के पन्नों को पलटना अपने भीतर की तमाम गांठों को खोलने सरीखा लगता है. ये पन्ने ज़ेहन पर छाई धुंध को छांटने में मदद करते हैं. उनकी डायरी के इन पन्नों का हाथ थाम काफ़्काई हरारत को अपने भीतर उतरते महसूस करना सुख है. लंदन की सड़कों पर टहलते हुए निर्मल की डायरी के पन्नों की याद का सुख है. किसी दोस्त से प्राग के किस्से सुनना और बर्लिन की यात्रा पर निकल पड़ना सुख है. शिमला की सड़कों से गुजरते हुए शाल को शरीर पर कसकर लपेटते हुए किसी पगडण्डी पर खुद को चलते देखना सुख है. किसी यात्रा के दौरान बड़े से डैने वाले सफेद पंछी(जहाज) के काँधे पर बैठकर बादलों के गाँव में विचरते हुए डूबते सूरज को करीब से देखना और याद करना किसी अल्हड़ सी पहाड़ी धुन को, धुंध में डूबी वादियों में डूबते हुए खुद को डूबने से बचा भी लेना और चीड़ों पर झरती चांदनी को हथेलियों पर उतरते हुए महसूस करना सुख है. यह निर्मल के करीब से होकर गुजरने का सुख है, उन्हें महसूस करने का सुख है. सुख की इस जब्त में उनकी वो सुफेद कोमल और बेहद मुलायम हथेलियों की याद लाज़िम है जब कई बरस पहले ऐसे ही एक मौसम में उनका हाथ मेरे हाथ में था. उस स्नेहिल स्पर्श की स्मृति पलकों के भीतर चमकता हुआ सुख है.

जीवन को देखने का नज़रिया ही तो जीवन को जीवन बनाता है. वरना सांसों के कारोबार से ज्यादा भला क्या है जीवन. निर्मल के करीब बैठना, उस नज़रिये को बनते हुए देखना है. निर्मल का नज़रिया नहीं उनकी जानिब से हमारा खुद का नज़रिया. जीवन के द्वंद्व, उहापोह, आसक्ति, विरक्ति, सामाजिक चेतना, राजनैतिक पक्षधरता, जीवन, मृत्यु सब पर सोचने का एक ढब मिलता है उनके यहाँ.

उनकी डायरियां सिर्फ यात्राओं के कुछ पड़ाव भर नहीं हैं, वो पूरी यात्रा हैं, जीवन की यात्रा. मनुष्य के चेतनशील, संवेदनशील बनने की यात्रा. एक ईमानदार यात्रा जिसमें सिर्फ सुख नहीं था. इसी के साथ यह बात भी मन में उठती है कि सुख आखिर है क्या? वो लिखते हैं, ‘यात्राओं में अनेक ऐसी घड़ियाँ आई थीं जिन्हें शायद मैं आज याद करना नहीं चाहूँगा...लेकिन घोर निराशा और दैन्य के क्षणों में भी यह ख्याल कि मैं इस दुनिया में जीवित हूँ, हवा में साँस ले रहा हूँ, हमेशा एक मायावी चमत्कार-सा जान पड़ता था। महज़ साँस ले पाना-जीवित रहकर धरती के चेहरे को पहचान—पाना यह भी अपने में एक सुख है—इसे मैंने इन यात्राओं से सीखा है.’

उनका कहा कान में गूंजता है, ‘जिस हद तक तुम इस दुनिया में उलझे हो, उस हद तक तुम उसे खो देते हो.’

डायरियों के साथ यह खूबसूरत बात होती है कि वो ईमानदारी से खुद को अभिव्यक्त करने का ठीहा बनती हैं. डायरियों की बाबत निर्मल खुद कहते हैं, ‘डायरी हमेशा जल्दी में लिखी जाती है. उड़ते हुए, अनुभवों को पूरी फड़फड़ाहट के साथ पकड़ने का प्रलोभन रहता है, अनेक वाक्य अधूरे रह जाते हैं, कई बार अंग्रेजी के शब्द घुमड़ते चले आते हैं एक लस्तम-पस्तम रौ में बहते हुए.’

इस लस्तम-पस्तम रौ का अलग ही आकर्षण है. इसी में मिलते हैं कई ईमानदार सवाल और कई बेहद ईमानदार जवाब भी. जीवन अपनी रवानगी में बहता हुआ लस्तम-पस्तम दरिया ही तो है. लगता है निर्मल कहीं गए नहीं हैं, यहीं हैं. बस कि जितनी देर में चाय का पानी खौल चुका होगा, चिड़िया अपने बच्चों को कोई गीत सुना चुकी होगी उतनी देर में वो आकर बैठेंगे ड्राइंग के सोफे पर चाय का इंतजार करते हुए. और पूछेंगे, ‘कैसा चल रहा है जीवन.’ हमारे पास दो ही शब्द होंगे कहने को लस्तम-पस्तम. वो मुस्कुरा देंगे.

https://hindi.thequint.com/zindagani/remembering-nirmal-verma-writer-of-rare-sensibilities?fbclid=IwAR1tPdmm1KuLwi4l-D7GmqCuwbh6iEb-jtLzZ6jjPBtJ17YgnTddCyUZHNc

Friday, October 18, 2019

ये दुनिया तुमसे सुंदर है


इन दोनों ने मुझे संभाल रखा है, मेरा घर संभाल रखा है. ये सोनू और सोनम हैं. एक ने स्वाद का जिम्मा लिया है भूख का जिम्मा लिया है दूसरी ने घर को तरतीबी देने का. दोनों खूब मेहनती हैं और खुशदिल भी. इनके आने से घर में सुबह होती है. सोनू जहाँ मध्धम मुस्कान लिए घर में डोलती फिरती है वहीं सोनम ठठाकर अपनी हंसी से पूरा घर गुंजा देती है. घर में काम तब शुरू होता है जब स्पीकर में बजने शुरू होते हैं इनकी पसंद के गाने. दोनों हँसते गुनगुनाते हुए घर और रसोई सहेजती हैं.

दोनों प्यारी रहेलियां हैं. घर के प्रति, मेरे प्रति दोनों इतनी जिम्मेदार हैं कि कई बार आँखें छलक पड़ती हैं कि कितना प्यार है जीवन में. कितनी ही बार बीमारी की हालात में सोनू ने बिस्तर से उठने नहीं दिया. सब्जी से लेकर दूध तक सब संभालती है. जब भी घर से बाहर होती हूँ, दोनों की मुस्तैदी बढ़ जाती है. मुझसे ज्यादा चिंता करती हैं ये घर की बेटू की, माँ पापा की.

ईमानदारी, प्यार और खुशमिजाजी से भरी ये सहेलियां कई बार मुझे डांटती भी हैं, 'क्या दीदी, आप तो सब भूल ही जाती हैं.' सचमुच ये दोनों मुझे लापरवाह भी बना रही हैं. और इनसे डांट खाने का सुख भी अलग ही होता है.

कितने ही मुश्किल पलों को ये दोनों आगे बढ़कर आसान बना देती हैं, यह कहकर, 'आप फ़िक्र न करो, हम कर देंगे.' इन दिनों घर से दूर हूँ और पल-पल घर की फ़िक्र में ये दोनों मुस्तैद हैं. पापा को ठंडी रोटी न खानी पड़ी इसकी फ़िक्र सोनम संभाले है और बेटू का टिफिन टाइम पर बने और घर बिखरा न रहे इसकी चिंता सोनू उठाये हैं.

इन दोनों प्यारी लड़कियों को मुझसे बहुत प्यार है क्या यह कहने की बात है कि मुझे भी...

शुक्रिया प्यारी सखियों, तुम्हारी मुस्कुराहटें यूँ ही बने रहें.

Saturday, October 12, 2019

स्काई इज़ पिंक



'अगर तुम्हारा स्काई पिंक है तो वो पिंक ही है. किसी के कहने से तुम अपने स्काई का कलर मत बदलना. जो टीचर कहती है कि तुमने स्काई का कलर गलत पेंट किया वो टीचर गलत है. समझे' गले तक भर आये आंसुओं के सैलाब को संतुलित आवाज में समेटते हुए अपने छोटे से बच्चे को उससे बहुत दिनों से बहुत दूर गयी माँ समझाती है. वो उसे नहीं समझाती वो हम सबको समझाती है कि गलत सही के खांचों से बाहर निकलकर हमें बच्चों की दुनिया में प्रवेश करना चाहिए.

'स्काई इज़ पिंक' ओह क्या तो राहत था इसे देखना. क्या तो सुख. कोई कुछ भी कहे लेकिन एक बात को बार-बार महसूस करती हूँ कि माँ होना माँ होकर ही जाना जा सकता है. हालाँकि इसी कन्ट्रास्ट को पोट्रे किया है प्रियंका ने. यह फिल्म है तो बेटी के बारे में लेकिन है एक माँ की फिल्म. प्रियंका चोपड़ा के अभिनय ने एक बार फिर दिल पर मुहर लगा दी है. अदिति (प्रियंका), निरेन (फरहान), ईशान (रोहित), आयशा (जायरा) एक परिवार है. दुःख और संघर्ष की डोर से बंधा परिवार उम्मीद का गुलाबी आसमान रचता नजर आता है.

एक माँ अपने बच्चे के लिए यमराज से भी लड़ जाती है कुछ ऐसी है यह कहानी. जिस बच्चे के जन्म के साथ ही उसके न जी पाने की बात (SCID नामक बीमारी) जुड़ी हो उसके जन्म पर कैसा एहसास हुआ होगा, कैसे उसकी परवरिश एक हर पल के युद्ध में तब्दील होती है. यही कहानी है.

फिल्म की कहानी का बेस दुःख है, संघर्ष है, पीड़ा है, आत्मसंघर्ष है लेकिन पर्दे पर निराशा नहीं उम्मीद दौड़ती है, मुस्कुराहटें गुनगुनाती हैं, आसमान में उड़ने के ख्वाब हैं. वो आसमान जिसका रंग नीला नहीं गुलाबी है, मुस्कुराहटों वाला गुलाबी. जिन्दगी के डिफरेंट शेड्स का कोलाज है फिल्म जो पूरे वक्त कलाई नहीं दिलों की धडकनों को थामकर रखती है.

आमतौर पर जब भी मैं और बेटू फिल्म देखने जाते हैं वो मुझे चिढाती है मम्मा रोना नहीं. जरा सा भी इमोशनल सीन मेरी हिचकियाँ बाँध देता है. इसे लेकर मुझमें कोई संकोच भी नहीं है. कि रोना कोई बुरी बात भी नहीं.

मेरे लिए इस फिल्म पर लिखते हुए फिल्म के बारे में लिख पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि मैं इस फिल्म के जरिये अपनी जिन्दगी को ही जी रही थी. 1991 का वह भयंकर एक्सीडेंट. माँ-पापा शहर में थे नहीं. उन्हें दो खबरें मिलीं एक कि गुड़िया अब नहीं रही, दूसरी कि जल्दी पहुँचिये शायद आखिरी बार मिल सकें.
माँ रोई नहीं इस खबर पर. उन्होंने बस इतना कहा बस मुझे उसकी एक सांस मिल जाय फिर मैं सब ठीक कर लूंगी. उन्हें वो एक साँस मिल गयी और उस एक सांस को पकड़कर वो जूझ गयीं. बरसों उन्होंने रुई के फाहे में छुपाकर रखा. सांस-सांस सहेजा, लेकिन टूटी नहीं, हारी नहीं. नौकरी, घर, अस्पताल और एक-एक लम्हे को सिर्फ माँ पर आश्रित बच्ची की तीमारदारी. शायद माँ सोती नहीं थीं. वो थकती भी नहीं थीं. कभी किसी पर नाराज नहीं होती थीं. हमेशा उम्मीद से भरी. और आखिर उन्होंने मुझे खड़ा कर दिया. मुझे उस दौर में माँ की भावनात्मक मजबूती आकर्षित करती है. हालाँकि मैं उनके जैसी मजबूत नहीं हूँ. क्योंकि मेरी बच्काी च वैक्सीनेशन भी मेरे लिए बड़ा युद्ध रहा हमेशा. सो यह जिम्मा उसकी नानी और पापा को मिला. अपने कानों में अपने बच्चे की रोती हुई आवाज को सहेजना कितना मुश्किल होता है यह दिल ही जानता है.

फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं थी. भावनात्मक यात्रा थी. परिवार की ताकत को महसूसना था. भाई किस तरह दोस्त बनकर सामने से हंसाता रहता है और चुपके-चुपके रोता है. पिता जो मजबूत दिखने का जिम्मा कन्धों पर उठाये हैं लेकिन टूटते हैं वो भी. यह मजबूती से जुड़े रहने और चुपके-चुपके टूटने की कहानी है.

'भाई मैं मरना नहीं चाहती' लंदन के मेट्रो स्टेशन पर फोन पर मरती हुई बहन से यह सुनना और उसे हल्के-फुल्के अंदाज में सहेज पाना कितना मुश्किल रहा होगा यह फोन कटने के बाद उसके एक्सप्रेशन से कन्वे होता है. जब छोटी बहन के लिए एक-एक सांस सहेजने में माँ-बाप जूझ रहे हों तब माँ से दूर इण्डिया में रह रहा ईशान भी तो बचपन के लिए जूझ रहा होगा लेकिन इसकी कोई शिकायत नहीं दर्ज होती समझ दर्ज होती है. बच्चों को खेलने, शैतानी करने और जिद करने की उम्र में समझदार होने की सजा बड़ी सजा होती है. मेरे जेहन में ईशान के उस बचपन के पन्ने खुलते हैं जो सेल्यूलाइड के पर्दे पर नहीं खुले.

अपने हाथों में सिर्फ 24 घंटे का जीवन लेकर आई रोती-बिलखती बच्ची को सहेजती प्रियंका की पीड़ा झकझोर देती है.आह. जीवन कितना क्रूर होता है, फिर भी कितना सुंदर कि पैसे की कमी इलाज के आड़े आने नहीं देते दुनिया भर के लोग सिर्फ एक रेडियो अपील के बाद.

सच कहूँ, अभी भी रो रही हूँ. हम माँ बेटी पहली बार पूरी फिल्म में चुप थे लेकिन यह दुःख की चुप्पी नहीं थी. वापस लौटते हुए बेटू ने एक बात कही, 'मम्मा दुःख की एक ख़ास बात होती है न, वो सबको कितना जोड़कर रखता है न ?'

हम एहसासों से भरे हुए साथ चल रहे थे...जैसे चलती है हरसिंगार की खुशबू उसके करीब दो पल बैठकर चलने के बाद.

शुक्रिया सोनाली बोस!

Thursday, September 26, 2019

ये दुनिया तुमसे सुंदर है


जब ये कक्षा 6 में थीं तब इनसे मुलाकात हुई थी. पहली बार. फिर इनसे दोस्ती हो गयी. फिर दोस्ती गाढ़ी होती गयी. अब ये कक्षा 8 में हैं. हम बातें करते हुए सीखते हैं एक-दूसरे से. मैं ज्यादा सीखती हूँ ऐसा महसूस करती हूँ. इन बच्चियों ने अपने जीवन की पहली चिठ्ठी लिखी मेरे संग. अपने सपनों के बारे में बताया मुझे. मेरे सपनों की पड़ताल की. मेरा हाथ थामकर अपने स्कूल के बारे में सब बताया. कोना-कोना घुमाया. आज जब स्कूल पहुंची तो थोड़ी नाराजगी से मिलीं ये सहेलियाँ. नाराजगी इसलिए कि काफी दिन बाद जाना हुआ था. लेकिन जैसे ही मैंने कान पकड़कर माफ़ी मांगी सब की सब हंस दीं. माफ़ कर दिया मुझे. और हाथ पकड़कर ले गयीं उस बगिया में जो इन बच्चों ने अपने हाथों से उगाई है, सजाई है. उन पेड़ों के पास ले गयीं जो इन्होने लगाये हैं. वादा किया जब इन आम के पेड़ों में फल आयेंगे तो मुझे भी मिलेंगे. बस कि मुझे वहां आना होगा.

तनिषा एथलीट है अभी स्टेट लेवल की खेल कूद प्रतियोगिताओं में उसने तीसरा स्थान प्राप्त किया है. अनीता पेंटर बनना चाहती है. नीति पुलिस में जाना चाहती है. उसकी आँखों में चमक है. वो चाहती है कि सारी लड़कियों को सुरक्षा दे सके अंशिका टीचर बनना चाहती है. हम बातें करते हुए जिन रास्तों से गुजर रहे थे बरसात ने उन सड़कों की हालत खराब कर रखी थी. हवाओं के पंखों पर सवार ये लड़कियां उड़ती फिर रही थीं. मैं संभल-संभल कर चल रही थी वो फलांगती फिर रही थीं. नीति ने कहा प्रधान जी आयेंगे तो सड़क बनेगी. क्या तुममें से कोई प्रधान नहीं  बनना नहीं चाहती? मैंने पूछा तो अंशिका ने कहा, राजनीति पसंद नहीं हमें. यानि प्रधान होना राजीनति में होना है यह पता है उन्हें. उनमें से एक बच्ची के पिता प्रधान हैं. हमने छवि राजावत के बारे में बात की. मैंने उन्हें छवि के बारे में बताया तो अंशिका ने कहा, अरे वाह हमने सोचा नहीं था ऐसा कि हम प्रधान भी बन सकती हैं. अब हम जरूर इस बारे में सोचेंगे.

लड़कियां बोलती कम थीं, हंसती ज्यादा थीं. इन लड़कियों ने शहर ने नहीं देखा है. इनकी दुनिया में मोबाईल नहीं है. फेसबुक नहीं है. वाट्स्प भी नहीं है. इनकी दुनिया में पेड़ हैं, नदियाँ हैं, पगडंडियाँ हैं, बारिशें हैं...खिलखिलाहटें हैं. मैं इनकी खिलखिलाहटों को पूरी दुनिया में बिखेर देना चाहती हूँ. मैं इनकी मुस्कुराहटों को नजर के काले टीके में सहेज देना चाहती हूँ. 

जब मैं वहां से चली, ये लड़कियां मेरे नाम की चिठ्ठी लिख रही थीं...मुझे उनकी लिखी चिठ्ठियों का इंतजार नहीं है. शायद मैं जानती हूँ उन चिठ्ठियों में क्या लिखा होगा. उनकी खिलखिलाहटों की कर्जदार हूँ. उनके लिए एक बेहतर दुनिया बनाने का कर्ज...

Thursday, September 19, 2019

थोड़ा सा उगने लगी हूँ



गृह प्रवेश कराने को कोई दरवाजे पर धान का कटोरा भरकर, रंगोली का थाल सजाकर नहीं बैठा था. किसी ने दरवाजे पर हथेलियों की थाप नहीं ली. कोई इंतजार में नहीं था रोली कुमकुम लिए स्वागत का शगुन करने को. उल्टे करने को बहुत सारे काम थे. दीवारों के रंग सूखे नहीं थे, लकड़ी का काम अधूरा ही पड़ा था अभी, सामान कहीं से लोड कराना था कहीं उतरवाना था. कितने लोग थे पेमेंट के इंतजार में. कितना ही रखो हिसाब कुछ न कुछ गड़बड़ा ही जा रहा था. थक के चूर था जिस्म कुछ भी महसूस करने की गुंजाईश के बिना बस भागते-दौड़ते हुए धरती एक कोने पर अपना नाम लिखना था, सो लिख दिया. यूँ सुरक्षा जैसा कुछ होता नहीं फिर भी कुछ वहम बचे रहें तो जीना जरा आसान हो जाता है यही सोचकर सर पर एक छत होने का सुख आंचल में बाँधने चल दी थी. अपने लिए या अपनों के लिए पता नहीं.

इस दौड़-भाग में ही एक रोज धरती के इस कोने से बतियाने बैठी थी. बारिश थी उस रोज बहुत. मिट्टी की खुशबू बारिश के लिबास में सजकर अलग ही रूआब में थी. मैंने हथेलियों में जितनी आ सकती थी उतनी मिट्टी भरी. दोनों हथेलियों को कसकर भींच लिया था. बरिश बहुत तेज़ हो गयी थी. हथेलियों से मिट्टी बहते हुए सरक रही थी. मैं भी सरक रही थी धीरे-धीरे. यह धरती के उस कोने से जुड़ने के पल थे...मोहब्बत के पल थे. मैं उस पल मिट्टी हुई जा रही थी. मिट्टी में समाती जा रही थी. कुछ ही देर में बारिश, मिट्टी और मुझमें कोई अंतर नहीं बचा था. उसी रोज उसी मिट्टी में मैंने जूही का एक छोटा सा पौधा लगाया था. सोचा था यह लम्हा सहेज दूँगी इस पौधे में. मिट्टी से प्यार करिए, बारिश से प्यार करिए वो कभी धोखा नहीं देती. उस लम्हे को खूब प्यार से सहेजा धरती के उस कोने ने. जूही का वह नन्हा पौधा अब बड़ा हो गया है. बेल बनकर चढने को आतुर है. अलग-अलग शाखाएं इधर-उधर कूदफांद करते हुए हाथ-पाँव मार रही हैं.

आँखें मलते हुए इस नन्हे की हथेलियों पर पहली-पहली कलियाँ आयीं हैं. जूही की कच्ची कलियाँ. गुलाबी रंग है इनका. अभी खिली नहीं हैं, अभी ठीक से मुस्कुराना भी नहीं सीखा है इन्होंने. बस कि आवाज देकर मुझे पुकारना सीखा है. मैं देर तक इन कलियों के करीब बैठी रही. जूही की इस बेल के बहाने मैंने खुद को ही तो रोपा था मिट्टी में, देखती हूँ जड़ें पकड़ ली हैं...जिंदगी का सफर चल पड़ा है. संघर्ष की मिट्टी में ख्वाहिशों की बेल उगने लगी है. कलियों के खिलने में, खुशबू बिखरने में अभी वक़्त है लेकिन बिखरेगी जरूर.

यह खुशबू इस धरती से तमाम नाउम्मीदी को मिटाएगी.
आमीन !

Saturday, September 14, 2019

ऊँचाई एक भ्रम है


जब मैं छोटी थी तब बहुत तेज़-तेज़ चढ़ा करती थी सीढ़ियाँ. एक सांस में झट से ऊपर जा पहुँचती थी, दूसरी ही सांस में सरर्र से नीचे. सीढियां उतरते हुए नहीं लगभग फिसलते हुए. खेल था ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना. इस चढने और उतरने के दौरान बीच का हिस्सा कब गुजर जाता पता ही नहीं चलता. मुझे हमेशा पहली सीढ़ी और आखिरी सीढ़ी की अनुभति ही गुगुदाती थी. माँ की आवाज आती और मैं सर्रर्र से नीचे, पतंगों का खेल देखना हो सर्रर्र से ऊपर.

तब मेरे लिए ऊपर का अर्थ सिर्फ पतंगों से भरा आसमान, पंछियों की टोली, नीला आसमान और वो एकांत था जिसमें मुझे सुख मिलता था और नीचे का अर्थ था माँ की पुकार, जिम्मेदार बेटी के हिस्से के कुछ काम, चीज़ों को ठीक से जमाना, मेहमानों की आवभगत. ऐसा नहीं कि नीचे आना मुझे बुरा लगता था कि बुरे भले की समझ ही कहाँ थी. लेकिन यह सच है कि सीढ़ियों वाला खेल मुझे पसंद था.

इस खेल में ऊपर चढने का वो अर्थ नहीं था जिसे सफलता से जोड़ा जाता है, यह बाद में समझ में आया. जब से समझ में आया ऊपर चढने का रूमान जाता रहा. अब यह आनंद नीचे उतरने में आने लगा. नदियों में, पोखरों में, समन्दर में उतरने का आनंद. नीचे उतरते हुए पैरों को धरती पर जमाये रखने का आनंद.

असल आनंद साथ का है यह सबसे बाद में समझ में आया. साथ खुद का. सीढियां सिर्फ माध्यम हैं ऊँचाई एक भ्रम है. गहराई महत्वपूर्ण है. गहराई में उतरते हुए पैरों को जमाये रखना, डूबने की इच्छा के साथ डूबना भी.

माँ की पुकार गहराई की पुकार थी. आज भी माँ की पुकार तमाम सीढ़ियों को भरभराकर गिरा देती है. चाय बनाते हुए मुस्कुराती हूँ. अपने भीतर की सीढियां उतरते हुए अपने भीतर की नदी में छलांग लगा देती हूँ....छपाक!

(इश्क़ शहर, डूबता मन )

Friday, September 13, 2019

बारिश का बोसा और सितम्बर


पीले फूलों में आस भर देता है
तेज़ कर देता है खिलखिलाहटों की लय
बिखेरता है धरती पर मोहब्बत के बीज
उदास ख़बरों की उदासी पोंछता है
बंधाता है ढाढस
बारिश का बोसा देता है सितम्बर...


Tuesday, September 10, 2019

देश में सब ठीक है


किसी ने नहीं मारा तबरेज अंसारी को
न, किसी ने नहीं
मॉब लिंचिंग?
वो क्या होती है
हमारे देश में तो नहीं होता ऐसा कुछ
वो तो मरा दिल के दौरे से 
अरे साहब, रिपोर्ट में आया है ऐसा 
तो अब आप साक्ष्यों पर भी शक करेंगे ?
न्यायपालिका पर भी?

नजीब अहमद तो तभी आ गया था वापस
मजे में घर में है अपनी माँ के पास
देशद्रोही है न इसलिए छुपकर बैठा है
घुमराह करने को देश को
उसे कुछ हुआ ही नहीं था

कश्मीर में सब ठीक है
सामान्य है सब
खुश हैं लोग वहां
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
काम सब ठीक से चल रहे हैं

रोहित ने किसी दबाव में नहीं की थी आत्महत्या
वो ऊब गया था जीते-जीते
नयी उम्र का जोश था कर गया गलती
व्यवस्था का कोई दोष नहीं था इसमें

किसी ने नहीं मारा
गौरी लंकेश, दाभोलकर, कलबुर्गी को

उन्नाव में कुछ नहीं हुआ
ठीक वैसे ही जैसे कठुआ में नहीं हुआ था कुछ

अब चिन्मयानन्द को फंसा रहे हैं लोग
ये देशद्रोही हैं देश की छवि बिगाड़ने वाले

बताइए मिड-डे मिल में नून रोटी बंटने की खबर
भी खबर है ?
देश का नाम बदनाम करने वाले बुडबक हैं ये लोग
इनको सजा मिलनी ही चाहिए मी लार्ड

उन सबको भी मिलनी चाहिए
जो दिमाग लड़ाते रहते हैं हमेशा
इंटीलेक्चुअल दिखने की भूख है और कुछ नहीं
इन सबको पाकिस्तान भेज देना चाहिये.

एनआरसी आ गया है न
सब ठीक कर देगा

मी लार्ड देश में सब ठीक ठाक है
बेरोजगारी, महंगाई, किसान आत्महत्या, दलित शोषण
बलात्कार, भ्रष्टाचार यह सब देशद्रोहियों के राग हैं
ये अपने ही देश का सर झुकाने को
इन मुद्दों को सामने लाते हैं
इन पर बात करते हैं

हम आपको सही वक़्त पर सेना के करतब दिखाते हैं
'उरी' दिखाते हैं
'ट्वायलेट' दिखाते हैं, 'मिशन मंगल' दिखाते हैं
और आप हैं कि बार-बार वही बात करते हैं
कुंठित हैं आप
ध्यान से देखिये सब ठीक है देश में
चैन से सोइए न पैर फैलाकर
वीकेंड आने वाला है दो पेग लगाइए
देश की चिंता छोड़िये न
देश सुरक्षित हाथों में है
देश में सब ठीक ठाक है.

Monday, September 9, 2019

'कोई था जो लड़ रहा था.'- रवीश कुमार



भावुक दिन है आज. अवतार सिंह पाश का जन्मदिन है और आज ही रवीश कुमार को मनीला में रमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित किया गया है. चाटुकारिता और टुच्चेपन की तमाम हदें तोड़ते पत्रकारिता के काले समय में रवीश का होना उम्मीद का होना हमेशा से रहा. उस उम्मीद का सम्मान सुखद है.

सम्मान समरोह के उस बड़े से हॉल में तालियों की गडगडाहट के बीच अपनी विनम्र और संकोची मुस्कान में सजे धजे रवीश को देखना ऐसा सुख था जो पलकें भिगोता है. मुझे याद है प्राइम टाइम देखने के बाद अक्सर माँ का कहना 'उससे कहो, अपना ख्याल रखे. बहुत चिंता होती है. ' माँ ट्विटर नहीं देखतीं वो फेसबुक पर भी नहीं हैं. लेकिन वो समय की नब्ज़ को समझती हैं.
आज माँ खुश हैं. भावुक हैं.

जहाँ एक तरफ अपने ही देश में उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही हों वहीँ दूसरी ओर उसी देश के नागरिकों तक सही और जरूरी सच्ची खबरों पहुँचाने की जिद के चलते उनका सम्मान किया जाना मामूली बात नहीं है.

जब रवीश हर दिन खबरों के लड़ रहे थे, झूठी खबरों के मायाजाल को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, धमकियां सुन रहे थे, ट्रोल हो रहे थे और बिना हिम्मत खोये, बिना हौसला डिगाए लगातार आगे बढ़ रहे थे तब वो नहीं जानते थे कि उन्हें ऐसा कोई सम्मान भी मिलेगा.

ईमानदार कोशिश अपने आप में काफी बड़ी चीज़ है. सही कहा सुदीप्ति तुमने 'रवीश का यह कहना कि हार लड़ाई जीतने के लिए नहीं लड़ी जाती कुछ लड़ाईयां इसलिए लड़ी जाती हैं कि कोई था जो लड़ रहा था'. हाँ सचमुच लड़ाईयां इसलिए लड़ी जाती हैं कि लडे बिना रहा नहीं जाता. कि वक़्त जब उस समय का हिसाब मांगे तो सिर्फ और सिर्फ अँधेरा ही न दिखे एक उम्मीद भी दिखे, उम्मीद जो कहे 'कोई था जो लड़ रहा था.'

रवीश जी आपने देश का सर ऊंचा किया है. आपने उम्मीद पर आस्था को बचाया है. आपने मेरी माँ जैसी और बहुत सारी माओं की चिंता में जगह बनाई थी उन सबको आज मुस्कुराहट का तोहफा दिया है.

बहुत बधाई आपको !

Wednesday, September 4, 2019

पत्नियाँ और प्रेमिकाएं- एकता नहर

1.
पत्नियां कर रही होती हैं अपडेट
डिजिटल कैमरे से कराए फोटोशूट
प्रेमिकाएं चुपके से सहेज रही होती हैं
प्रेमी के साथ आड़ी-तिरछी तस्वीरें

2.
पत्नियों के लॉकर में होते हैं
बहुमूल्य गहने
प्रेमिकाओं की अलमारी में
अनमोल प्रेम-पत्र

3.
पत्नियाँ मछली हैं, अक्वेरियम की
प्रेमिकाएं चिड़िया हैं, आसमान की
प्रेमिकाएं पालती हैं ख्वाब
प्रेमी के घर की मछली हो जाने का
पत्नियाँ चाहती हैं
प्रेमिकाओं की तरह फिर चिड़िया हो जाना

4.
प्रेमिकाएं भाग जाती हैं घर से
अपने प्रेमी के लिए
पत्नियां चाह कर भी रोक लेती हैं खुद को
अपने पति के लिए

5.
प्रेमिकाएं छिपाती हैं अपने एब
प्रेमी से पत्नी का दर्जा पाने के लिए
पत्नियां सीखती हैं रिझाने के तरीके
पति की प्रेमिका बन जाने के लिए

6.
एक दिन
पत्नी और प्रेमिका रोती हैं गले लगकर
आपस में करती हैं दुलार
एक पुरुष के लिए
वे एक-दूसरे की पूरक बन गयीं

(एकता नाहर पत्रकारिता और लेखन से जुड़ी हैं। उनका एक कविता संग्रह आ चुका है ‘सूली पर समाज’। वे दतिया मध्य प्रदेश से हैं।)

(साभार मेरा रंग)

Saturday, August 31, 2019

समंदर किसी को खाली हाथ नहीं भेजता


यह आखिरी दिन था, यह वापिसी का दिन था. हम आसपास का चप्पा-चप्पा छान लेने में लगे थे. जंगल ही था आसपास. यहाँ के लोगों से बातें करना, चर्च देखना, जाने से पहले एक बार फिर से समन्दर से मिलने जाना और वापसी. कारमोना से एयरपोर्ट की दूरी कम से कम चार घंटे की होगी. हमारे पास वक़्त काफी था सो हमने कुछ रास्ता पैदल तय किया फिर एक जगह रुककर लंच किया. आज लंच में हमने गोवा की ट्रेडिशनल सब्जी गोअन चीज़ शाकुती खाई. इसे गोवन मसालों और नारियल के तेल में बनाया जाता है और सादा चावल के साथ खाते हैं. यह काफी मसालेदार होती है. गोवा में लिकर काफी सस्ती है इसलिए लोग यहाँ से ले जाना भूलते नहीं. हम जिस दुकान में पहुचे वह अच्छी सी दुकान थी. काफी करीने से सजी. ब्रांड्स का मुझे पता नहीं लेकिन लौटते समय अजय जी ने बताया कि यहाँ लगभग सभी अच्छे ब्रांड्स थे. मुझे यहाँ इस शॉप में जो बात अच्छी लगी वो माँ बेटी की जोड़ी. दोनों माँ बेटी जिस मुस्तैदी से हर ब्रांड के बारे में डिटेल से रही थीं, सजेस्ट कर रही थीं कि कौन सी वाइन अच्छी होगी या कौन सी ब्रांडी वह मुझे आकर्षित कर रहा था. हम अपने यहाँ मतलब उत्तर भारत में ऐसे दृश्यों की कल्पना नहीं कर सकते. मैं उन दोनों से देर तक बातें करती रही. जब उन्हें पता चला कि मेरी भी बेटी है और मैं उसके लिए कोई गिफ्ट ले जाना चाहती हूँ तो उन्होंने इसमें मेरी मदद की. 


गोवा में यह ख़ास बात है कि यहाँ कोई आपको जज नहीं करता. आप किसके साथ हैं, उसका आपके साथ क्या रिश्ता है आदि. न ही लोग बेवजह के अंदाजे लगाते हैं आपके बारे में, न कोई खुसुर-फुसुर. दोस्त शब्द को पूरा अस्तित्व मिलता नजर आता है. उन्हीं माँ बेटी ने हमें बताया कि सामने अगर थोड़ी देर इंतजार करें तो हमें मलाड स्टेशन तक की बस मिल जाएगी. हम उनके बताये के मुताबिक बस का इंतजार करने लगे लेकिन बस से पहले ही हमें ऑटो मिल गया. हम स्टेशन ट्रेन के आने से काफी पहले पहुँच गये थे. 30 रूपये की टिकट ली और चाय पीते हुए आराम से और उतरते सूरज को देखने लगे. छोटा सा साफ़ स्टेशन था यह. आखिरी दिन का सनसेट प्वाइंट था स्टेशन का पुल. यह गोवा से विदाई का सूरज था. ट्रेन आ चुकी थी. वापसी का सफर काफी अलग होता है. न सिर्फ जाने की दिशा बदलती है बल्कि भीतर भी काफी कुछ बदल चुका होता है. वो यात्रा यात्रा ही नहीं जो हमें भीतर से और परिपक्व और संवेदनशील और स्पष्ट न बनाये. ट्रेन चल रही थी और मैं सोच रही थी कि जब गोवा से पुकार आई थी तब कितना मुश्किल था निकल पाना लेकिन अब वापस जाते समय महसूस हो रहा है कि उसी समय तो सबसे ज्यादा जरूरी था निकलना. हम जब अपने बारे में ठीक निर्णय नहीं ले पाते तब कुदरत यह काम करती है. कम से कम मेरा तो यही अनुभव है. 

हम स्टेशन पहुँच गये. एयरपोर्ट स्टेशन के एकदम पास था. जिस एयरपोर्ट पहुँचने के लिए 4000 रूपये लगने थे वहां हम महज 160 रूपये में पहुँच चुके थे. यह मेरे लिए इतनी एक्साइटिंग बात थी कि इसे मैंने माँ को फोन करके तुरंत बताया. मैं हमेशा सोचती थी कि कुछ लोग इतनी विदेश यात्राएँ किस तरह कर लेते हैं. इतना पैसा कहाँ से लाते हैं तो अजय जी हमेशा कहते थे बहुत पैसा नहीं चाहिये होता है बस घूमने की इच्छा चाहिए होती है. आज मेरे सामने कुछ उदाहरण थे. घुमंतू को लग्जरी के पीछे भागने वाला नहीं होना चाहिए. मेहनती, कम से कम में काम चला लेने वाला होना चाहिए. महंगे होटलों में रुककर, बड़ी गाड़ियों में बैठकर साल में एक ट्रिप की जा सकती है घुमंतू नहीं हुआ जा सकता. मुझे उनकी बात ठीक लगी, तभी तो ज्यादातर सैलानी पीठ पर बड़ा सा पिठ्ठू बैग लादे पैदल चलते नजर आते हैं. मुझे अभी सैलानी बनना सीखना बाकी है मैंने खुद से कहा. 

हम वापस लौट रहे थे...सुख और शांति से भरे हुए. समन्दर किसी को खाली हाथ नहीं भेजता.

समाप्त.

Tuesday, August 27, 2019

वो प्रेम की लहरों में सिमटते जाना

समन्दर फिर सामने था, इस बार हम दोनों के चेहरे तसल्ली वाली मुस्कराहट थी. समन्दर ने पलकें झपकाकर पूछा, ‘आ गयीं?’ मैंने भी नजरें मिलाकर जवाब दिया,’बिलकुल’ अजय जी अब तक मेरे और समन्दर के रिश्ते से वाकिफ हो चुके थे उन्होंने मुझे चिढाते हुए कहा, ‘लो तुम्हारी ससुराल आ गयी’. वो मेरे बचपने पर हंसते हुए कहने लगे, ‘यह तुम जो कहती हो कि समन्दर तुम्हारा प्रेमी है यह तो तुम्हारा मानना है न कभी समन्दर बेचारे से भी पूछा है’ उनकी इस चिढाने वाली बात के बीच ही एक बड़ी सी लहर ने हमें घेर लिया. मैंने कहा, ‘मिल गया जवाब.’ वो हंस दिए. बोले ‘पागल हो तुम एकदम.’

समन्दर के किनारे वो जो लगी होती हैं न बड़ी बड़ी छतरियां और उनके नीचे लेटने को सिंहासन नुमा बेंच. फिल्मों में इन्ह्ने खूब देखा था, फिर सामने से भी देखा समन्दर के किनारे जब भी गये यह दीखते रहे लेकिन कभी इस सिंहासन पर विराजने की हिम्मत न हुई. लेकिन अजय जी ने पहुँचते ही इसी सिंहासन पर धावा बोल दिया. अगर आप इन सिंहासन पर विराजना चाहते हैं तो आपको रेस्टोरेंट से कुछ ऑर्डर करना होगा या फिर अलग से इस पर विराजने का चार्ज देना होगा. मैं यह सुबह पता कर चुकी थी. सुबह रेस्तरां वाले जिस लडके ने मुझे एक मिनट के लिए बैठकर फोटो तक खींचने नहीं दी थी अब वो हमारी सेवा में था. मुझे इत्ता मजा आ रहा था. टोपी वोपी लगाकर फिल्मों में देखे सारे पोज मारने की कोशिश मैं कर रही थी. गंवार अल्हड़ किशोरी उस सपने को जी रही थी जो उसने देखे तक नहीं थे. खुद पर ही हंसी भी आ रही थी और मजा भी आ रहा था. कोई नहीं था जो मुझे यूँ अजीबोगरीब हरकतें करते देख मुंह बनाये या मजाक उडाये मेरा. बल्कि मेरे इस पागलपन को अजय जी फोटो खींचकर बढ़ा ही रहे थे. सबकुछ बहुत रोमांचक लग रहा था.


दोपहर का समन्दर सुबह के समन्दर से अलग होता है. कुछ अलसाया सा, कुछ सुस्त सा. जैसे-जैसे शाम ढलती जाती है समन्दर का मिजाज़ बदलता जाता है और रात होते-होते वह उच्छश्रृंखल प्रेमी बन जाता है. दिन में जिस जगह हम आराम से एक रंगीन छतरी के नीचे पसरकर आलू चिप्स खाते हुए गाने सुन रहे थे शाम होते होते वह जगह पानी के हवाले थी.

मैं समन्दर के प्रेम में थी. लहरों के संग खेल रही थी. लहरें खींच कर भीतर ले जातीं. मैं वापस लौट आती फिर तैयार खींचकर भीतर ले जाए जाने के लिए. लहरों के बीचोबीच पालथी लगाकर बैठ गयी थी डूबते सूरज को देखने को. यह वही गोवा था जहाँ पिछली बार सनसेट छूट गया था हमसे. हम अग्वादा फोर्ट से भागते हुए यहाँ पहुंचे थे लेकिन सूरज डूब चुका था. इस बार ढलते सूरज के सामने धूनी लगा ली थी मैंने. उसकी हर अदा को जी भरके देख रही थी.
लहरों का जादू ऐसा होता है कि जितना भी वक़्त इनके साथ बिताओ कम ही लगता है. घंटों समन्दर में पड़े-पड़े त्वचा फूलने लगती है फिर भी मन बाहर आने का करता ही नहीं. भूख, प्यास मानो सब स्थगित. जब रात काफी हो गयी और सिक्योरिटी अलर्ट के चलते बाहर आने को बोला जाने लगा तब कोई चारा नहीं था. लेकिन डिनर वहीँ समन्दर के किनारे ही किया ताकि नजर से ओझल न हो पल भर समन्दर. 
खूब संतुष्टि, अपार सुख लिए हम लौटे तो सामने फिर वही सवाल था वापस कैसे जायेंगे. इतनी दूर पैदल जाने की तो ताकत बची नहीं थी. कम से कम मेरी तो नहीं. लेकिन कोई चारा भी नहीं था. 

यह पैदल चलकर पहुंचना अच्छा ही हुआ हमने उस छोटे से गाँव में क्रिसमस की रौनक देखी. शायद गाडी से जाते तो यह न देख पाते. नाचते, गाते, खाते पीते झूमते लोग. इतना सुंदर क्रिसमस मैंने तो नहीं मनाया था पहले.


Thursday, August 22, 2019

कहा न प्यार है !

क्रिसमस की तैयारियों ने पूरे कारमोना को दुल्हन सा सजा रखा था. लेकिन इस धज में शोर नहीं था, शांति थी. किसी सजे हुए घर से गिटार पर बजती हुई धुन सुनकर रुक ही गये कदम, कहीं नारियल के पेड़ पर अटके चाँद से आँख लड़ा बैठे. ऐसी शांति अरसे बाद मिली थी. ऐसी बेफिक्री तो शायद पहली बार ही. लम्बे सफर की थकान और अधूरी नींदों का असर था या जिन्दगी की आपाधापियों से निजात का असर जल्द ही गहरी नींद ने जकड़ लिया. याद नहीं इतनी गहरी, बेफिक्र नींद आखिरी बार कब हिस्से आई थी. सुबह एकदम खिली हुई थी. सुबह मैं जल्दी से जल्दी समन्दर के पास जाने की हड़बड़ी में थी लेकिन अजय जी की नींद उन्हें छोड़ नहीं रही थी. वो विदेशी क्लाइंट्स के साथ डील करते हैं इसलिए उन्हें देर रात तक जागने की और सुबह देर तक सोने की आदत है यह वो बता चुके थे. उनकी बायोलॉजिकल क्लॉक विदेशों के हिसाब से सेट थी. मैंने उनसे इतना भर पूछा कि क्या मैं अकेली चली जाऊं? इस पूछने में कई तरह की हिचक, संकोच सब था लेकिन जिस सहजता से उन्होंने कहा, ‘इसमें पूछने की क्या बात है, तुम्हें जाना ही चाहिए.’ मैं खुश हो गयी और जल्दी से नाश्ता ठूंसकर समन्दर की ओर भागी. बीच तक ले जाने के लिए होटल की एक गाडी जाती थी मैने झट से उसमें जगह बना ली. मेरे बगल में एक जोड़ा बैठा था. लड़की बिकनी में थीं. लड़की सहज थी, मुझे सहज होने में दो मिनट लगे. हंसी भी आई खुद पर, कितना कुछ है टूटने को अपने भीतर, कितना कुछ बाकी है उगने को. मैं हर पल बदल रही थी. हर पल मुझे मुझमें कुछ नया होता महसूस हो रहा था. सबसे ज्यादा बदल रहा था सहज होना सीखना. जेंडर के पूर्वाग्रह से मुक्त होना. दोस्त सिर्फ दोस्त होता है वो स्त्री या पुरुष नहीं होता यह समझना. इन बातों को कहना आसान है, इन्हें विमर्श बनाना आसान है लेकिन जीना इतना भी आसान नहीं होता. कंडिशनिंग आड़े आती ही है कभी चेतन में कभी अवचेतन में. उस कंडिशनिंग का टूटना सुखद होता है. 

सुबह का समन्दर रात के समन्दर से अलग होता है. बहुत अलग. अब मैं और समन्दर आमने-सामने थे. मुझे अब कहीं नहीं जाना था. समूची यात्रा जिस मुलाकात के लिए थी वो अब होने को थी. जालोर बीच शहर से दूर है, यहाँ ज्यादा भीड़ नहीं, बहुत कम टूरिस्ट हैं यहाँ वह भी तब जबकि क्रिसमस करीब है. मुझे ऐसी ही शांति तो चाहिए थी. नंगे पाँव गीली रेत पर चलते हुए मैं कहीं दूर निकलती जा रही थी. लहरों के बीच से होते हुए मैंने एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चलते जाना शुरू किया. रास्ते भर लहरें मुझसे खेलती रहीं, लुभाती रहें, ललचाती रहीं. टखने से घुटने तक घुटने से कमर तक और कमर से चेहरे तक आने में कहाँ वक्त लगा था उन्हें. जिस तेज़ बहाव से वो मेरी ओर आतीं भीतर से सीत्कारी सी फूटती. मेरी आँखें लगातार बह रही थीं. लहरें जिस दबाव के साथ जकड़ रही थीं वह कितना निर्मल कितना अद्भुत था. यही तो है प्रेम की जकडन जिससे छूटने को जी नहीं चाहता. मेरे कानों ने मेरे होंठों को कहते सुना, ’हाँ हाँ आई लव यू’. समन्दर के इसरार ने आखिर मेरा इकरार सुन ही लिया.

समन्दर के किनारे मछुवारों का संगीत बज रहा था और एक चिड़िया मेरी ही तरह लहरों के संग खेल रही थी. मैंने उस चिड़िया के खेल को कैमरे में कैद किया अपनी छाया समेत. वह चिड़िया मानो मैं ही थी और वह लहर भी मैं ही थी. और अंत में सारे मैं विलीन हो गये थे सिर्फ असीम शांति बची थी. यह अकेलापन इतना भरपूर था कि इसे जी लेने के बाद कोई इच्छा शेष नहीं रहती. पूरे बीच का चक्कर लगाने के बाद मैं लहरों के बीच धूनी जमाकर बैठ गयी थी. लहरें मुझे पूरा ढंक लेती थीं और दूर तक अपने साथ लिए चली जाती थीं. उस लम्हे में मैं कहाँ थी पता नहीं. वो लम्हे जिन्दगी थे, वो लम्हे सुख थे, वो लम्हे निर्वाण भी थे. इन्हीं लम्हों में जिन्दगी के वो तमाम झमेले जो हमें पूरी तरह जकड़े होते हैं बौने लगने लगते हैं. यही पल यात्रा का हासिल होते हैं. 
पूरे चार घंटे बीत चुके थे. होटल वापस ले जाने वाली गाडी जा चुकी थी. मैंने एक्टिवा की तलाश शुरू की जो काफी कोशिश करने के बाद भी नहीं ही मिली क्योंकि क्रिसमस के कारण सारी एक्टिवा बुक हो चुकी थीं. मेरे सामने सवाल यह था कि समन्दर में चार घंटे रहने के बाद की थकान के बाद 3 किलोमीटर पैदल चलकर कैसे जाऊं. गोवा में लिफ्ट लेकर चलने के बारे में खूब सुना था. आज मेरे सामने उस सुने हुए को आजमाने का मौका था. मैंने एक अनजान से लिफ्ट ली. उसकी एक्टिवा ने मुझे आधे रास्ते तक लिफ्ट दी. यह अनुभव भी काफी रोमांचक था. मुझे लगा जो सुना था वो मैं भी कर सकी. अच्छा लग रहा था. बाकी का आधा रास्ता मैंने पैदल तय किया. आखिर अपने कमरे तक पहुँच चुकी थी मैं. मुझे जोरों की भूख लगी थी. खाने के बाद मुझे भयंकर नींद ने जकड़ लिया. नींद खुली तो शाम के 5 बज रहे थे. फिर से समंदर पुकार रहा था, इस बार अजय जी भी साथ गए. उनके एजेंडे में मछली खाना था मेरे एजेंडे में था समन्दर में डुबकी लगाना जो सुबह बाकी रह गया था.

जारी...

Monday, August 19, 2019

महबूब की एक झलक जीने का सामान


जिस पुकार पर गोवा आई थी उसे ठीक से सुन लिया था, गुन लिया था. एक मुक्कमल शाम के बाद प्यारी सी सुबह को जी लेने के बाद अब सिर्फ इन हवाओं के हवाले करना बाकी था. मन गिलहरी हुआ जाता था. हर सडक पर भागने को व्याकुल, हर कोने में खड़े होकर गहरी सांस लेने को बेताब, बीच सडक पर खड़े होकर चिल्लाकर कहने को बेकरार कि आई लव माइसेल्फ़. ये सेल्फ न बहुत खूबसूरत होता है. इसी गोवा में अंजना, बाघा और वागातोर बीच ने मुझे खुद से मिलवाया था. लहरों ने थपकी देकर सुलाया था, कहा था खुद से प्यार करो. और आज मैं खुद के प्रेम में हूँ. यह प्रेम सेल्फ अप्रिसिएशन सेल्फ से अटैचमेंट तो हो लेकिन सेल्फ ऑब्सेशन न हो इसका ख्याल रखना होता है जिसका जिम्मा भी कुछ दोस्तों को ही दे रखा है. जैसे ही गडबड करूँ अनजाने ही सही वो थप्पड़ लगाकर सुधार लें. 

कल से जो समन्दर झलक दिखा रहा था, अब उसके करीब जाने का समय आ चुका था. इस दफे भीतर भी सुख का समन्दर था और बाहर भी. यह जो भीतर का सुख था ‘यह कोई उफान तो नहीं था,’ खुद से पूछती हूँ. आवाज आती है ‘नहीं यह अपने होने का सुख है मात्र.’ जिन्दगी का बड़ा हिस्सा दूसरों को महसूस करते हुए, समझते हुए बिताने के बाद यह खुद को महसूस करना सच में सुंदर था. बिना जिया हुआ बचपन हमेशा हाथ थामे चलता है. जिन्दगी के किसी भी मोड पर अपने जिए जाने की इच्छा लिए. शायद आज उसी बचपन को जिए जाने का समय था. मुझे नहीं पता मैं क्या होने लगी थी. मैं रूई से भी हल्का महसूस कर रही थी. कहीं भी जाने को, कुछ भी करने को, कैसे भी चलने को, कैसे भी बात करने को आज़ाद. यहाँ कोई मुझे जज नहीं कर रहा था. अजय जी साथ थे लेकिन उनका होना इस आज़ादी को बढ़ा ही रहा था. वो जज नहीं करते, दखल भी नहीं देते, टोकते भी नहीं. उनकी अपनी दुनिया है वो उसमें रहते हैं. साथ होते हैं लेकिन साथ होने के भाव से मुक्त भी करते हैं. यह बिलकुल नया अनुभव था कि ऐसे भी हुआ जाता है क्या? सडक के किनारे खड़े होकर आइसक्रीम खाना हो, अनजाने लोगों से समन्दर किनारे तस्वीर खिंचवाना हो या नंगे पाँव गार्डन में भागते फिरना. कितना आसान है अपने जीवन को अपने लिए महसूस करना लेकिन कितना मुश्किल बना दिया गया है इसे. इसी उछलकूद के दौरान मन हुआ कि ओमकार से बात की जानी चाहिए. उसका नम्बर शुभा जी ने दिया था. उससे मिलना था लेकिन उसकी फ्लाईट थी इसलिए वो सुबह जल्दी ही निकल चुका था. मैंने उसे फोन लगाकर जैसे ही कहा मैं प्रतिभा कटियार बोल रही हूँ वो इतना खुश हुआ कि क्या कहूँ. उसने कुछ भी कहने की बजाय ‘ओ अच्छी लड़कियो’ गुनगुनाना शुरू कर दिया. अब हम दोनों हंस रहे थे. मैं उससे कह रही थी तुमने बहुत अच्छे से गया उसे और वो मुझसे कह रहा था कि मैंने बहुत अच्छा लिखा. जो भी हो पणजी की हवाओं में हमारी हंसी घुल रही थी, संतुष्टि से भरी हुई हंसी. संतुष्टि कि हम दोनों मिलकर एक सन्देश को ठीक से दूर तक ले जा पाए. 

अब हमे कारमोना जाना था. जहाँ हमने दो दिन रहने के लिए बुकिंग की थी. पंजिम से 4 घंटे की दूरी पर है यह. हमने तय किया कि हम लंच करने के बाद ही निकलेंगे. क्योंकि पहुँचते हुए शाम हो ही जानी थी. मेरा मन था कि सूरज डूबने से पहले मैं समन्दर के पास पहुँच सकूँ. रास्ते भर मैं पिछली गोवा यात्रा और इस गोवा यात्रा के दरमियाँ डोलती रही. जिन्दगी के सफर के बारे में सोचती रही. उन जगहों के बारे में भी जहाँ मैं और माधवी एक्टिवा दौड़ाया करते थे. जिन्दगी पर भरोसा करना चाहिए. यह सीख मुझे जीकर मिली है. इधर हमारी कैब रुकी, उधर मैं समन्दर की तरफ भागी. कहाँ सामान है, कहाँ दस्तखत करने है, किसे आईडी देनी है मुझे कोई मतलब नहीं था. सब जिम्मेदारी एक जिम्मेदार दोस्त के हवाले थी और इतनी सी देर में यह समझ में आ चुका था कि अपनी इस हरकत के लिए मुझे कोई डांट नहीं पड़ने वाली थी. इतना सहज साथ कम ही मिलता है जो आपको मुक्त तो करता ही है इस बात का कोई बोझ आपको नहीं देता. वो साथ तो होता है लेकिन बिना आपके स्पेस में जरा भी हस्तक्षेप किये. 

आखिर कारमोना का खूबसूरत जालोर बीच सामने था, डूबता सूरज था, मैं थी और था समन्दर. विस्मित, अवाक, मंत्रमुग्ध. इन दुर्लभ पलों के लिए कितना इंतजार किया है. ओह समन्दर...मेरे पाँव आगे बढ़ते ही जा रहे थे और समन्दर करीब आता ही जा रहा था. देर तक लहरों ने मुझे सहलाया, मेरे बीते तमाम जख्मों पर मरहम रखा. मेरे भीतर की नदी सामने के समन्दर में विलीन होने को व्याकुल होने को थी कि फोन की घंटी बजी. मुझे वापस लौटना था. मैंने समन्दर के कान में कहा, कल से हर वक्त तुम्हारे साथ ही हूँ.’ उसने हंसकर विदा किया.

जारी...

Saturday, August 17, 2019

पंजिम की सुबह और शुभा जी का जादू


अगली सुबह में बीती शाम की खुशबू थी. ढेर सारा उत्साह, सुख और शांति. हमें शुभा जी के साथ ब्रेकफास्ट के लिए जाना था. कितनी ख़ुशी थी बता नहीं सकती. यकीन नहीं हो रहा था कि शुभा जी अब हमारी दोस्त हो चुकी थीं. इसमें उनकी ही सहजता, उनकी ही विनम्रता और जीने के ढब को क्रेडिट है. होटल ताज हमारे होटल मांडवी से ज्यादा दूर नहीं था इसलिए हमने पैदल जाना ही चुना यह सोचकर कि सुबह की सैर भी हो जाएगी और सुबह की ताजा हवा में पणजी शहर की देखने का आनंद भी मिलेगा. यूँ भी मौसम और साथ अच्छा हो, सड़कें साफ हों तो पैदल चलने का मजा ही कुछ और है. पणजी हमें मुस्कुराता हुआ मिला. हम वक़्त पर पहुंचे थे. शुभा जी इंतजार में थीं वो हमें लॉबी में ही मिल गयीं. बीती रात की चमक उनके चेहरे पर भी थी. लोकल के सभी अख़बार कल की शाम की खबर से सजे हुए थे.

शुभा जी और अनीश जी खूब भले लोग हैं. शुभा जी ने हमसे हमारे बारे में पूछा और बताया कि किस तरह उन्होंने इस प्ले लिस्ट के लिए तमाम कविताओं की तलाश की और उसी तलाश में उन्हें ‘ओ अच्छी लड़कियो’ मिली. उन्हें और उनकी पूरी टीम को कविता बहुत अच्छी लगी. किस तरह इस कविता की बाबत मुझे सम्पर्क किया. मैंने उन्हें बताया कि किस तरह पिया तोरा कैसा अभिमान, अली मोरे अंगना और, पिया हाजी अली मैं रिपीट में सुना करती थी. उन्हें अजय जी से यह जानकर कि वो फिल्मों के लिए गाने लिखते हैं और उनका लिखा एक गीत लता जी गा चुकी हैं वो बहुत खुश हुईं. अनीश जी ने बताया कि वो हिंदी कविताओं पर कुछ काम करना चाहते थे. उनके मन में काफी दिनों से यह सब चल रहा था. सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के लिए मेवरिक प्ले लिस्ट बनाने का अवसर उनकी उस इच्छा को साकार करने का जरिया बना. उन्होंने ओमकार जिसने इस कविता को आवाज दी थी के बारे में भी बताया कि किस तरह वो कविता पढकर एक-एक शब्द में डूब गया था. उसका वह डूबना उसकी कल की परफौर्मेंस में दिख रहा था. मैं सोच रही थी कि यही होती है शब्दों की ताकत, विचारों की ताकत जो दुनिया एक कोने में बैठे व्यक्ति को दूसरे कोने में बैठे व्यक्ति से जोड़ देती है. लिखने वाला पढने वाले से पीछे छूट जाता है और इस बात का उसे सुख होता है. इस वक़्त मैं उसी सुख में थी. सब उस कविता में डूबे हुए लोग थे और मैं उन्हें देखने के महसूस करने के सुख में. जब यह कविता लिखी थी तब सिर्फ इतना था मन में कि यह बात मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक काश पहुंचा सकूँ कि लड़कियों को अच्छे होने के बोझ से मुक्त करो अब. और यह बात दूर तक पहुँच रही थी. यह बात जीकर जानी थी कि अच्छा होने का बोझ अनजाने चुपचाप हमें भीतर ही भीतर खोखला करता रहता है, बांधता रहता है. एक किस्म की सोशल कंडिशनिंग है यह जो बहुत गहरी है. पीढ़ियों से स्त्रियाँ इसकी शिकार भी हैं और जानती भी नहीं कि वो शिकार हैं.

नाश्ते की टेबल पर शुभा जी के कुमाऊनी घर की स्मृति भी खुली. मैंने उनसे पूछा आपका मन नहीं करता कि आप कुछ पहाड़ी लोक गीत गायें. उन्होंने मुस्कुराकर कहा, बहुत मन करता है लेकिन बहुत मुश्किल है इसमें. जैसे ही मैं पहाड़ का राजस्थान का कोई लोकगीत गाना चाहती हूँ यह बात होने लगती है कि हम लोक का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन लोक के लिए कुछ कर नहीं रहे. मैं गायिका हूँ, संगीत दे सकती हूँ आवाज दे सकती हूँ मेरी भी सीमा है. मैं कोई विवाद नहीं चाहती, शांति से जीना चाहती हूँ. इसलिए किसी भी ऐसे काम को नहीं करती जिसमें कोई भी द्वंद्व हो. उन्होंने बताया कि उन्हें विद्यापति पसंद हैं. रेनकोट के समय विद्यापति को पढ़ना शुरू किया तो पढ़ती ही गयी. मीरा बहुत पसंद है, पलटूदास उन्हें पसंद हैं. केदारनाथ सिंह, दुष्यंत, साहिर, फैज़ आदि को पढ़ा है उन्होंने.

एक मजेदार बात उन्होंने बताई, हर साल दिसम्बर में वो पणजी में म्यूजिकल फेरी चलाती हैं. खुले आसमान के नीचे और समन्दर के बीचोबीच संगीत. यह पूर्णिमा के आसपास होता है. सुनकर ही सुख हो रहा था. हमारी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं. लेकिन वक़्त है न मुस्तैद पहरेदार उसने याद दिलाया कि ब्रेकफास्ट को लंच तक नहीं ले जा सकते. आखिर हमने एक मुक्कमल, भरपूर मुलाकात के बाद विदा ली.

अब सामने था पंजिम और एक नन्हा सा उन्मुक्त मन.

जारी...

Thursday, August 15, 2019

पणजी में 'ओ अच्छी लड़कियों' से मुलाकात



फाइनली हम पणजी में थे. खिड़की का पर्दा हटाया तो सामने समन्दर मुस्कुराता मिला. जैसे वो मेरे सब्र का इम्तिहान ले रहा हो. शाम करीब थी और समन्दर सामने. मैं लहरों का उछाल देख पा रही थी, आवाज सुन पा रही थी बस हाथ बढ़ाने की देरी थी...लेकिन अभी हाथ बढ़ाने का वक़्त नहीं था कि गोवा ने जिस वजह से पुकारा था आज शाम तो उसी के नाम थी. कभी सोचा न था कि कोई कविता यूँ हाथ पकड़कर गोवा तक घुमाने ले आएगी. जबसे 'ओ अच्छी लड़कियों' को शुभा जी द्वारा संगीतबद्ध करने की बात सुनी थी तबसे शुभा जी के तमाम गीत साथ चलते रहते थे. एक ही बात मन में थी कि किस तरह वो इस कविता को संगीतबद्ध करेंगी भला. दूसरा उत्साह था शुभा जी और अनीश जी से मिलने का. मुझे नहीं मालूम कैसी मुलाकात होने वाली थी. एक मन हुआ चुपके से भीड़ में छुपकर बैठ जाऊं और होते देखूं सब कुछ. लेकिन यह मौका शायद कुछ और था. शाम के उत्सव में शामिल होने लिए हमने पैदल ही चलना चुना ताकि थोड़ा शहर भी तो देखें, उसे हैलो तो बोलें. एक तरफ कार्यक्रम का समय हो चला था दूसरी तरफ पेट में भूख गुडगुडा रही थी. मेरा मन हुआ कि भूख को इग्नोर कर दिया जाय लेकिन अजय जी इसके लिए तैयार नहीं थे. फाइनली हमने शॉर्ट कट वाली पेट पूजा की और उसके बाद पहुंचे कार्यक्रम की जगह. सच कहूँ तो यहाँ आने के पहले तक मुझे इस फेस्टिवल की ऊंचाइयों का पता नहीं था. यहाँ आकर देखा पूरा शहर सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के पोस्टरों बैनर से पटा पड़ा था. अब मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी थी. लेकिन ज्यादा देर घबराहट के रुकने को वक़्त नहीं मिला. गेट पर पहुँचते ही प्रेरणा लेने आ गयी. और पलक झपकते ही मैं शुभा मुदगल, अनीश प्रधान और उनकी टीम के साथ थी. शुभा जी मिलकर इतनी खुश हुईं उन्होंने तुरंत गले लगा लिया.अनीश जी ने बहुत विनम्रता के साथ स्वागत भी किया और शुक्रिया कहा इस कविता को लिखने के लिए. ऐसे मौकों पर कुछ समझ नहीं आता कि क्या कहूँ बस कि आँख भर आती है.  शुभा जी और अनीश दोनों बहुत सहज, सरल लोग हैं. यह विनम्रता ही उनके संगीत को अलग आयाम देती होगी. हमारी मुलाकात ग्रीन रूम में हुई थी. कार्यक्रम शुरू होने को था और हम कार्यक्रम स्थल की ओर ले जाए गये.

यह गोवा की यादगार शाम थी. मुझे नहीं पता था कि इस बार गोवा मुझे सर पर चढ़ाने के लिए पुकार रहा था. मुझे नहीं पता था कि गोवा ने जिन्दगी को गले लगाने, तमाम बाधाओं को पार करने के एवज में यह शाम मुझे तोहफे में देने को बुलाया था. सामने भव्य स्टेज था और पीछे शानदार ऑडियंस. इन सबके बीच मैं भी थी. मैं भी...क्या यह मैं ही हूँ. सब कुछ बहुत तेज़ था. अनीश जी ने मुझे बोला था कि 'आपकी कविता हमें इतनी ज्यादा अच्छी लगी है कि हम कार्यक्रम को इसी कविता से क्लोज करेंगे. तो मन में इतनी राहत थी कि अभी थोड़ा वक़्त था दिल को संभाल लेने को. शुभा जी मेरे बगल में बैठी थीं और उनके बगल में अनीश. मेरे दूसरी तरफ अजय जी थे. ऐसे मौकों पर दोस्तों का साथ होना कितना मायने रखता है यह सिर्फ समझा जा सकता है.


कार्यक्रम शुरू हुआ और लगातार परवान चढ़ता गया. इस शाम के लिए कुछ हिंदी कविताओं को संगीतबद्ध करने को चुना गया था. केदारनाथ सिंह, नज़ीर अकबराबादी, मीराबाई ,पल्टूदास, शुभा मुदगल और प्रतिभा कटियार की कवितायेँ थीं ये. मैं एक एक कर कविताओं की खूबसूरत प्रस्तुती देखकर मुग्ध हो रही थी. यकीन नहीं हो रहा था कि इन कविताओं को ऐसे भी प्रस्तुत किया जा सकता है. शुभा जी बीच-बीच में पूछती जा रही थीं ठीक तो है न? और मैं उनके इस विनम्र सवाल के बदले सिर्फ सर हिला पा रही थी. इन कविताओं को स्वर दिया ओमकार पाटिल और प्रियंका बर्वे ने. दोनों की ऊर्जा देखते ही बनती थी, दोनों बेहद कमाल के आर्टिस्ट हैं. ओमकार तो ऐसे हैं कि वो मानो आते ही कहते हों, खबरदार जो ध्यान रत्ती भर भी इधर-उधर किया कि जब तक मैं हूँ मैं आपका पूरा ध्यान चुरा लूँगा और धीरे से दिल भी. ऑडियंस को बांधना उसे आता है. तमाम कविताओं के बीच जब उसने केदारनाथ सिंह की कविता 'भाई मैंने शाम बेच दी है' गई तो मैं एकदम से अलग ही दुनिया में चली गयी. इतनी बार पढ़ी थी यह कविता लेकिन आज इसे शुभा जी, अनीश जी और ओमकार के जानिब से सुनना कुछ अलग ही अनुभव था.

आखिर कार्यक्रम आखिरी कविता तक आ पहुंचा. यानी मेरी कविता 'ओ अच्छी लडकियों.' कविता शुरू होने से पहले अनीश जी और शुभा जी ने मेरी तरफ देखा और कहा 'उम्मीद है आपको पसंद आएगी.' स्टेज पर मेरा नाम लिया जा रहा था और मैं अपनी हथेलियाँ शुभा जी की हथेलियों में छुपाये बैठी थी. जैसे ही ओमकार ने कहा, प्रतिभा जी हमारे बीच मौजूद हैं, शुभा जी ने उत्साह में भरकर कहा, यहाँ हैं यहाँ हैं...और सारी तेज़ लाइट्स हम पर थीं. उफ्फ्फ. ऐसी चकाचौंध की आदत कहाँ हमें. घबरा से गये कुछ पल की. कविता शुरू हो चुकी थी..'ओ अच्छी लड़कियों तुम मुस्कुराहटों में समेट देती हो दुःख और ओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनर...'  काफी तेज़ संगीत में इसे ढाला गया था. कहाँ रुकना है, कहाँ ज्यादा रुकना है, कहाँ ऊंचा करना है स्वर ओमकार को सब पता था. मुझे लग रहा था क्या यह सच में मैं हूँ. देहरादून के किसी कोने में बहुत उलझे से मन और द्वंद्व के बीच जब लिख रही थी यह कविता तब कहाँ जानती थी कि इसे इतना प्यार मिलेगा. शुभा जी हथेलियों का दबाव मुझे कसता जा रहा था यह उनका प्यार था. शायद वो भी मेरी तरह संकोच में थीं.


कविता खत्म हुई...अँधेरे में अपने आँखों में भर आये समन्दर को संभालना आसान था. कार्यक्रम खत्म होते ही रौशनी ने हमें घेर लिया था. बधाइयों, फोटो खींचने, खिंचाने, लोगों से मिलने मिलाने के बीच गोवा की वह खूबसूरत शाम दिल में दर्ज हो गयी. शाम ने बीतते-बीतते अगले दिन की सुबह नाश्ते पर शुभा जी से आराम से मिलने, बतियाने का प्रस्ताव भी दे दिया.

हम एक बेहद खूबसूरत शाम को जीकर, समेटकर लौट रहे थे.

जारी....

Tuesday, August 13, 2019

मिलूंगी तुमसे तसल्ली से...


मुम्बई से गोवा के लिए हमें अल्सुबह तेजस एक्सप्रेस पकडनी थी. मुम्बई में मैं माधवी के घर रुकी थी. उसके घर पहले भी जा चुकी हूँ. उस मुलाकात और इस मुलाकात के बीच कई बरस बीत चुके थे. उससे मिलकर लगा कि वो और भी खूबसूरत हो गयी है, उसकी खूबसूरती में मातृत्व का नमक जो शामिल हो चुका है. उसके दो प्यारे से बच्चों से मिलना बहुत सुंदर अनुभव था. जरा सी देरी में दोनों बच्चे मासी-मासी की धुन में थे. शरारतें, मस्ती, गप्पें इन सबके बीच नींद कहाँ. ट्रेन पकड़ने के लिए सुबह चार बजे ही निकलना था. लगभग न के बराबर नींद लिए हम गोवा के लिए निकले थे. हालाँकि नींद कहीं थी भी नहीं. यह शायद उत्साह के कारण हुआ होगा..

मेरे साथ अजय गर्ग थे. वो घुमक्कड़ हैं. दुनिया भर घूमते फिरते हैं. सच कहूँ तो घूमने का चस्का अजय जी और माधवी का ही दिया हुआ है. लेकिन मैंने अजय जी के साथ कभी ट्रेवल नहीं किया था. मेरे लिए यह यात्रा कई मायनों में अलग होने वाली थी. पहली राहत की बात तो यही थी कि अजय जी के साथ होने के कारण टिकट, ट्रेवल, स्टे इन सबके इंतजाम के झंझटों से मैं मुक्त थी. यानी मुझे सिर्फ मजे करने थे. लम्बे समय बाद यह राहत मिली थी. वरना तो हर ट्रेवल चाहे परिवार के साथ हो या दोस्तों के साथ या अकेले इन सब जिम्मेदरियों का ठेका मेरा ही होता रहा है. जिम्मेदारियों से राहत भी चाहिए होती है कभी कभी. हम स्टेशन वक़्त पर पहुंचे लेकिन ट्रेन थोड़ी सी लेट हो गयी. स्टेशन की चाय हम पी सकें शायद इसलिए. किसी शहर को महसूस करना हो तो वहां के रेलवे स्टेशन पर थोड़ा वक़्त जरूर बिताना चाहिए. यहाँ जीवन जैसा है, वैसा मिलता है. एक ऊंघती हुई बच्ची अपने पापा के कंधों पर झूल रही थी, गजरा बालों में टांके एक लड़की एक लड़के के कंधे से टिककर ऊंघ रही थी. एक लड़का अभी-अभी बगल में खडे अंकल को चाय देकर गया. इधर से उधर तेजी से जाती ज्यादातर औरतों ने गजरे पहने हुए थे. ये इनके गजरे हमेशा फ्रेश कैसे रहते होंगे मैंने मन में सोचा और गम्भीर मुद्रा बनाकर ट्रेन के एनाउंसमेंट पर ध्यान केन्द्रित किया. थोड़ी ही देर में ट्रेन आ गयी और गोवा का हमारा सफर शुरू हुआ.

अजय जी मुझे खिड़की वाली सीट देकर यह बताकर कि 'रास्ता बेहद खूबसूरत है, देखती जाना' सो गये. उनके लिए यह रास्ता नया नहीं था और रात की नींद उनकी भी अधूरी ही रही थी. जब भी ट्रेन में कुछ खाने को आता, ब्रेकफास्ट या लंच या कुछ और वो जागते, खाते और सो जाते. जितनी देर वो जागते उनकी बातचीत बड़ी मजेदार होतीं. खूब हंसी आती मुझे और लगता कि सफर अच्छा कटने वाला है. मेरी अजय जी से दोस्ती पुरानी है लेकिन यह दोस्ती कम संवादों और इक्का-दुक्का छोटी छोटी मुलाकातों भर की है. उनसे अनौपचारिक मुलाकात का यह पहला मौका था और मुझे नहीं मालूम था कि उनकी उपस्थिति सहजता से भरपूर होगी. हमारी छुटपुट नोक-झोंक शुरू हो चुकी थी जो पूरे सफर में चलती रही.

मुम्बई से गोवा का रास्ता सचमुच बेहद खूबसूरत है. सारे रास्ते मैं चुप होकर खिड़की के बाहर देखती जा रही थी. तेजी से छूटते जा रहे पेड़, सडकें, गाँव, पानी सब मोह रहे थे. ऐसा लग रहा था सब मुझे जानते हैं और मुस्कुराकर हैलो कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इन सबसे पहली बार मिल रही थी. ट्रेन का खूबसूरत सफर मुझे सुकून से भर रहा था. सामने लगे स्क्रीन पर देखने के लिए जो फ़िल्में थीं वो भी काफी अच्छी थीं. मन में दुविधा थी कि फिल्म देखूं या दृश्य. मैंने दृश्य ही चुने. एक बैंगनी रंग के बड़े-बड़े पत्तों वाला पेड़ अब तक मेरी स्मृतियों में झूमता है.

करमाली स्टेशन आने वाला था. स्टेशन आने से पहले ही समन्दर दिखने शुरू हो गए थे. ये समन्दर के वो किनारे थे जो शायद शहर से नहीं दिखते. मन उछल-उछल जा रहा था खिड़की से समन्दर देखकर. कुछ ही देर में हम स्टेशन पर थे. स्टेशन ज्यादा बड़ा नहीं है लेकिन साफ़ और सुंदर है. मौसम गर्म था यहाँ. दिसम्बर के महीने में देहरादून से चलते समय जो ढेर सारी जैकेट लदकर आई थीं उनमें से आधी तो मुम्बई में ही पैक हो गयी थीं और बाकी के पैकअप का समय अब था.

मैं आँख भर स्टेशन देख रही थी और अजय जी कम से कम पैसे में मिलने वाला ऑटो ढूँढने में लगे थे. मुझे अजय जी से यह भी सीखना था कि यात्राएँ कैसे इकोनोमिक और अच्छे ढंग से की जाती हैं. आखिर हमें हमारे जैसे ही दो विदेशी दोस्तों के साथ शेयरिंग में ऑटो मिल गया और हम चल पड़े गन्तव्य की ओर.

पणजी बेहद खूबसूरत है. मांडवी नदी के किनारे पर बसे इस सुंदर शहर से बातें करने का जी चाह रहा था. ऑटो होटल की ओर भाग रहा था और पेड़ों से लुकाछिपी खेलते हुए समन्दर मुझे लुभा रहा था. जी तो चाह रहा रहा अभी रुक जाऊं लेकिन खुद को मैंने दिलासा दिया अब तो आ ही गयी हूँ, मिलूंगी तसल्ली से.

जारी...

Monday, August 12, 2019

गोवा से आई पुकार और प्यार



यह मेरी नहीं लहरों की बात है. उन लहरों की जिन्होंने मुझे हमेशा हर मुश्किल वक़्त में सहेजा है. कभी पास से, कभी दूर से. नहीं मालूम इन लहरों के इश्क़ में कबसे हूँ. तबसे जब इन्हें छूकर देखा भी नहीं था शायद. न नज़र से, न हाथ से. समन्दर की लहरों की बात कर रही हूँ. सिनेमा में देखे समन्दर थे या उपन्यासों और कहानियों में पढ़े समन्दर. कब कैसे मुझे समन्दर से इश्क़ हुआ पता नहीं. समन्दर को पहली बार देखने का अवसर मिला नवम्बर 2011 में. शायद समन्दर ने मुझसे मिलना तब तक के लिए मुल्तवी किया था जब तक उससे मिलना मेरे जीने की अंतिम जरूरत न रह जाय. कुछ भी योजनाबद्ध तरह से नहीं होता. कुछ भी नहीं सचमुच. जन्म भी नहीं, मृत्यु भी नहीं, जीवन के युद्ध भी नहीं और समर्पण भी नहीं. जीवन का यह समय युद्ध का नहीं था. समर्पण का था. ऊँहू ! समर्पण ठीक शब्द नहीं, ‘गिवअप’ ठीक शब्द है. दोनों में काफी फर्क है. मैं एकदम ‘गिवअप मोड’ में थी. तभी दोस्तों ने गोवा चलने का प्लान बनाया और मैं गोवा में थी. इत्तिफाक ही होगा कि जिन दोस्तों ने प्लान किया था वो खुद ही न आ सके थे और मैं और माधवी ही पहुंचे थे गोवा. शायद हम दोनों का मिलना और समन्दर से मुलाकात इससे अच्छे ढंग से नहीं हो सकती थी. हम दोनों पहली बार मिली थीं. हम दोनों जिन्दगी से जूझते-जूझते टूट रही थीं, हम दोनों मुश्किलों के बारे में बात करना पसंद नहीं करती थीं और हम दोनों समन्दर से बेपनाह प्यार करती थीं.

हमने आधी आधी रात तक गोवा के समन्दर से बातें की थीं, गोवा का चप्पा-चप्पा छानते हुए हम खुद को तलाश रहे थे. और जब हम मुठ्ठियों से समेट-समेट कर समन्दर जिन्दगी में भरकर वापस लौटे थे तो हम वो नहीं थे, जो हम गए थे. समन्दर ने हमसे उलझनें लेकर, हिम्मत और भरोसा देकर वापस भेजा था. लौटने के बाद उसी हिम्मत और भरोसे के साथ जिन्दगी को नयी राहों पर रख दिया था और वही नयी राहें आज तक हाथ थामे चल रही हैं.

इसके बाद कई बार समन्दर मिले, अलग-अलग नामों से, अलग-अलग देश में, प्रदेशों में. लेकिन 2018 के आखिरी में जब एकदम अचानक एक बार फिर से गोवा ने आवाज दी तो मैं चौंक गयी. इस वक़्त, गोवा? सोचना भी नामुमकिन था. जिन्दगी एक साथ कई खानों में उलझी और अटकी हुई थी. पहले से इतनी उलझनें थीं कि उनमें संतुलन बनाना ही मुश्किल हो रहा था और उस वक़्त गोवा से आई यह आवाज? आखिर क्या मायने हैं इसके. जब मोहब्बत आवाज दे तो इनकार कर पाना कितना मुश्किल होता है यह कोई आशिक मन ही जान सकता है. लेकिन हाँ कहना भी आसान नहीं था. गोवा से आई यह पुकार मुझे सोने नहीं दे रही थी. इस बार जब यह पुकार आई थी तब जिन्दगी में बहुत कुछ बदल चुका था. सचमुच बहुत कुछ. पहले आई पुकार उदासियाँ पोछने और हिम्मत देने के लिए थीं लेकिन इस बार हौसलों को परवाज देने, पहचान देने और जिन्दगी की मुश्किलों से लड़ने का ईनाम देने को थी. यह बुलावा था मेरी एक कविता 'ओ अच्छी लड़कियों' का इंटरनेशल सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल में शामिल किये जाने पर. इस कविता को मेवरिक प्ले लिस्ट में जगह मिली थी जिसे संगीतबध्ध किया था मेरी प्रिय शास्त्रीय संगीत सिंगर और संगीतकार शुभा मुद्गल और अनीश प्रधान ने. यह सब इतना अचानक, इतना अनायास था कि यकीन सा नहीं हो पा रहा था. यह मेरे लिए ऐसा समय था जैसे खेल रही हो जिन्मेदगी मेरे संग. जैसे-जैसे गोवा जाने की तारीखें करीब आती जा रही थीं वैसे-वैसे न जाने देने की स्थितियां मजबूत होती जा रही थी.

इश्क़ की पुकार में बहुत ताकत होती है. आखिर मैं गोवा के लिए निकल ही पड़ी ठीक वैसे ही जैसे लड़की भागती है मंडप से उठकर सारे बंधन तोड़कर. इसमें जोखिम भी बहुत होता है और रोमांच भी. आखिर मैंने गोवा को हाँ कर दी थी. मेरे इस हाँ कहने में यानी लड़की को जिन्दगी की तमाम दुश्वारियों वाले मंडप से भगाने में मेरे भाई, भाभी और दोस्त ज्योति का बड़ा रोल रहा. लहरों की ताल पर थिरकता मन मुम्बई एयरपोर्ट पर उतरा तो खुश था. मुम्बई से एक दोस्त को मैंने साथ चलने के लिए मना लिया था. हमने मुम्बई से गोवा ट्रेन से जाना चुना था.

  जारी...

(गोवा डायरी, दिसम्बर 2018 )

Monday, August 5, 2019

तुमसे प्यार है सोनम, डरो नहीं


'दीदी, आप नहीं जानतीं मुसलमान बहुत ख़राब होते हैं. बहुत कट्टर होते हैं. इनके साथ यही होना चाहिए. कश्मीर में कितना दंगे करते हैं ये लोग. अब मोदी जी सब ठीक कर देंगे.' सोनम एक सांस में अपनी बात उड़ेल देती है और पूछती है 'आज खाने में क्या बनेगा?' वो पहले भी ऐसी बातें करती रही है. ज्यादा बात नहीं करती लेकिन जब करती है तो मोदी जी की तारीफ ही करती है. गर्व से उसने बताया था कि उसने और उसके परिवार ने भाजपा को वोट दिया. यह कहना बल्कि सोचना भी मुझे बुरा लगता है कि सोनम कौन है किस जाति या धर्म की है, मैंने कभी नहीं पूछा किसी भी अपने सहायक से. लेकिन सोनम को अपनी पहचान छुपानी पड़ी थी. उसने खुद को हिन्दू बताकर घर में खाना बनाना शुरू किया था. हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था लेकिन एक महीने काम करने के बाद पता चला कि वो हिन्दू नहीं है. और यह पता चला मोहल्ले की पढ़ी लिखी आंटी से. उन्होंने मुंह बनाकर बताया 'आपको पता है सोनम मुलसमान है? वो रोजे से होती थी लेकिन छुपाती थी. डरती थी कि कहीं पहचान न खुल जाए.

सोनम हिन्दू नहीं है, मुलसमान है वो. बहुत डरी हुई है वो. हिन्दू घरों में काम करती है और वही बोलती है जो उन्हें सुनना अच्छा लगेगा. यही सोचकर वो मुझसे भी वह सब बोलती है जो काम करने के लिए, जीने के लिए रटकर घर से निकलती है. मैं उसकी तकलीफ समझ सकती हूँ. अभी भी वो मुझ पर पूरा यकीन नहीं कर पायी है हालाँकि उसे एक राहत है कि अब उसे मेरे घर में अपनी पहचान को लेकर झूठ नहीं बोलना पड़ता.

उसने किसे वोट दिया यह उसका अधिकार है, उसका चुनाव लेकिन वो अपना सच बता नहीं सकती. उसे सिर्फ लहर के मुताबिक बात करनी है. मुसलमानों को बुरा भला कहना है और किसी तरह अपनी रोजी रोटी कमानी है. एक रोज उसने कहा, दीदी आपकी बात और है, लेकिन सब लोग यही सुनना चाहते हैं कि मुसलमान ख़राब होते हैं तो हम वही बोलते हैं.

मैं उसके भीतर के डर का सामना नहीं कर पाती. सोनम अकेली नहीं है. बहुत से लोग हैं आसपास. जो चुप हैं. जो इस शोर में, उन्माद में आपके ठहाकों में आपके साथ ही नजर आते हैं लेकिन उनकी आँखों में जो डर है, पीड़ा है उसे देखने की फुर्सत किसी को नहीं. न सरकार को न नागरिकों को. उनके इस डर को अपना बनाना कैसे कहा जा सकता है?

जहाँ धारा 370नहीं है वहां क्या किया है सिवाय नफरत बोने के कि कश्मीर को अपना बनाने का यह तरीका निकाला गया है. इस तरह तो किसी को अपना बनाया नहीं जाता. कश्मीर सिर्फ जमीन नहीं है दिल है वहां के लोगों के उस दिल में क्या इस तरह जगह बना पायेंगे हम? क्या सोनम को अपनी पहचान न छुपानी पड़े यह हमारी चिंता है, हमारे दोस्तों को अपने मन की बात कहते-कहते रुक न जाना पड़े, या उनकी पलकें न भीग उठे, आवाज रुंध न जाए यह हमारी चिंता है. कश्मीर तो हमारा ही था पहले भी, उससे प्यार तब भी था,अब भी है.

अभी-अभी दोस्ती दिवस मनाया है और अब इस बात पर खुश हैं? कितना अच्छा होता कि यह होता लेकिन डर के साए में नहीं मोहब्बत के साए में होता. वो खुद शामिल होते इस फैसले में ख़ुशी से.

#standforpeaceandlove

Monday, July 29, 2019

'कविता कारवां'- गुलज़ार


कुछ खो दिया है पाई के
कुछ पा लिया गँवाई के...

बारिश की चुनरी ओढ़े सावन की कोई शाम गुलज़ार साहब के पहलू में सिमटकर बैठी हो तो दिल के हाल क्या कहें. बिलकुल ऐसा ही दिलफरेब मौसम बना कविता कारवां की देहरादून की बैठक में. जिस्म सौ बार जले फिर वही मिट्टी का ढेला है, रूह देखी है कभी रूह को महसूस किया है...गुलज़ार साहब की नज्म को उन्हीं की आवाज में सुनने से शाम का आगाज़ हुआ और यह आगाज़ उनकी तमाम नज्मों, गीतों, त्रिवेणियों के जरिये परवान चढ़ता गया. बाहर धुला धुला सा मौसम इतना हरा था मानो किसी रेगिस्तान की लड़की की दुआ क़ुबूल हो गयी हो. और गुलज़ार साहब की शोख मखमली आवाज में उनकी ही नज्मों का जादू.

कविताई में डूबी इस पहाड़ी शाम में 'बूढ़े पहाड़ों पर' का जिक्र कैसे न होता भला. विशाल भारद्वाज, सुरेश वाडकर और गुलज़ार साहब की त्रयी 'बूढ़े पहाड़ों पर' को सुनना किस कदर रूमानी था इसे बयान करना मुश्किल है. इसके बाद एक-एक कर 'अबके बरस भेज भैया को बाबुल', 'किताबें करती हैं बातें', 'बारिश आती है तो पानी को भी लग जाते हैं पाँव', 'प्यार कभी इकतरफा नहीं होता', 'अभी न पर्दा उठाओ', 'आँखों को वीजा नहीं लगता', 'यार जुलाहे', 'मुझको इतने से काम पर रख लो', 'मोरा गोरा अंग लई ले' सहित रचनाओं के साथ शाम गुलज़ार हुई.

गुलज़ार साहब से मुलाकातों के किस्से छिडे, उनकी फिल्मों का जिक्र हुआ, उनकी कविता के अलावा उनके प्रोज उनकी कहानियों पर भी बात हुई. बात हुई कि किस तरह बंटवारे की खराशें उनके लिखे में तारी हैं. गुलज़ार पोयट्री के साथ पोलिटिकल जस्टिस और पोलिटिकल बेचैनी को पोयटिक बनाने में माहिर हैं यह उनकी फिल्म आंधी, हू तू तू आदि में अच्छे से दिखता है. शाम थामे नहीं थम रही थी. गुलज़ार यूँ ही तो गुलज़ार नहीं हुए होंगे कि उनका जिक्र होगा तो जिक्र अमृता आपा का भी होगा और मीना कुमारी का भी और किस तरह उनका नाम गुलज़ार पड़ा इसका भी जिक्र होगा ही, सो हुआ. शाम बीत गयी लेकिन हम सब बैठक से गुलज़ारियत लिए लौटे हैं.

18 अगस्त को उनका जन्मदिन है देहरादून में उनके दीवानों ने उनका जन्मदिन एडवांस में मना लिया...मौसम ने इस शाम में खूब रंग भरे...