Wednesday, May 15, 2019

मेरा कोना भीग रहा है


जैसे किसी सपने में आँख खुली हो. जैसे मौन में कोई बात चली हो. खामोश बात धीमे धीमे सुबह की ओसभरी घास पर चलते हुए. मैं इस मौन को सुन रही हूँ. ठीक ठीक सुन नहीं पा रही हूँ शायद. जितना सुन पा रही हूँ उसमें असीम शांति है.

सामने लीची, आम और अनार के पेड़ भीग रहे है. मेरा शहर बरस रहा है. भीतर भी, बाहर भी. भीतर ज्यादा बरस रहा है. भीतर सूखा भी ज्यादा हो गया है. मैं बाहर झरती बारिश की आवाज में डूबी हूँ. सामने जो गार्डन है जिसकी बेंच पर रात में बैठकर कुछ देर खुद से बात करना अच्छा लगता है वो भी भीग रही है. कबूतर भीग रहे हैं और पांखें खुजला रहे हैं. झूले भीग रहे हैं. बच्चे स्कूल गये हैं. स्त्रियाँ घर की साफ सफाई में लगी हैं. ऑफिस जाने वाले ऑफिस जाने की तैयारी में लगे हैं. किसी के पास बारिश को सुनने की फुर्सत नहीं. हालाँकि सूखा सबके भीतर है. मेरी चाय के पास मेरे प्रिय कवि हैं विनोद कुमार शुक्ल 'कविता से लम्बी कविता' बनकर. जीवन से लम्बा जीवन, बारिश से ज्यादा बारिश, उदासी से ज्यादा उदासी और सुबह में ज्यादा सुबह का उगना महसूस हो रहा है.

बरसों की थकान है पोरों में. बहुत सारे सवाल हैं आसपास. ढेर उलझनें, लेकिन इस पल में कुछ भी नहीं. खुद मैं भी नहीं. स्त्री के लिए एक कोना होना जरूरी है. स्त्रियों अपने लिए, गहना, जेवर, महंगी साड़ियाँ बाद में लेना पहले माँगना या ले लेना अपना एक कोना. यह कोना जीवन है. इस कोने में हमारा होना बचा रहता है. आज जीवन के मध्य में एक सुबह के भीतर खुद को यूँ देखना मीठा लग रहा है. इस इत्ती बड़ी सी दुनिया में यह मेरा कोना है, मेरा घर. मेरा कोना बारिश में भीग रहा है...सूखा बहुत हो गया था सचमुच. यह भीगना सुखद है.

Wednesday, May 1, 2019

घर


रंग भरे जा रहे हैं दीवारों पर. दीवारें जिन पर मेरा नाम लिखा है शायद. कागज के एक पुर्जे पर लिखा मेरा नाम जिस पर लगी तमाम सरकारी मुहरें. जिसके बदले मुझे देने पड़े तमाम कागज के पुर्जे. 'घर' शब्द में जितना प्रेम है शायद वही प्रेम दुनिया के तमाम लोगों को घर बनाने की इच्छा से भरता होगा. मेरे भीतर ऐसी कोई इच्छा नहीं रही कभी. बड़े घर की, बड़े बंगले की, गाडी की, ये सब इच्छाएं नहीं थीं कभी. लेकिन इन सब इच्छाओं के न होने के बीच यह भी सोचती हूँ कि मेरी इच्छा क्या थी आखिर. जिन्दगी के ठीक बीच में आकर यह सोचना बहुत अजीब है कि मेरी कोई इच्छा ही नहीं थी. कोई सपना भी नहीं. बस इतना कि जो लम्हा है उसे भरपूर जिया जाय. जीवन में हरियाली खूब हो, आसपास कोई नदी हो, समन्दर हो, चिड़िया हो. शायद चारदीवारों वाले घर से बड़ी ख्वाहिश थी यह. हर मोहब्बत भरी आवाज मुझे मेरा घर लगने लगती थी.

आज मेरा खुद का घर है एक चिड़ियों की आवाजों से भरे इस खूबसूरत शहर में. मुझे इस शहर की हवाओं से प्यार है. यहाँ की सड़कों से प्यार है. मैंने कुछ नहीं किया सच, यह इस शहर से हुए प्यार का असर ही रहा होगा जिसने पहले आवाज देकर बुलाया और फिर इसरार करके बिठा लिया. मैं ठहर गयी हूँ इस शहर में. मैं चाहती हूँ कि दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी किसी मोहब्बत भरी आवाज को अनसुना न करे. हर पुकार कोई जवाब आना चाहिए.

भीतर कई तरह के मंथन चल रहे हैं. दीवारों पर रंग चढ़ाये जा रहे हैं. मेरी पसंद के रंग. वो मेरी पसंद का रंग कौन सा है पूछ रहे हैं कौन सा रंग मैं कहती हूँ, जंगल, नदी, सवेरा. वो मेरा मुंह देखते हैं. मैं झेंप जाती हूँ. मुझे दुनियादारी नहीं आती. जब प्यार आता है बहुत तो रोना भी आता है बहुत. दुःख में कम आता है रोना. प्यार में बहुत आता है, फूट फूटकर रोने को जी चाहता है. हालाँकि जब कोई रास्ता नहीं दिखाई देता आगे का तब भी रोना आता है, बिना आंसुओं वाला रोना. ये वाला रोना बहुत तकलीफ देता है.

आजकल कई तरह का रोना साथ रहता है. हर वक़्त. इसमें कोई भी सुख का रोना नहीं है. हालाँकि मेरा घर मेरे रंग में ढलने को तैयार है.

मैं उस घर की मोहब्बत में हूँ जो कागजों में मेरा नहीं था. लेकिन इसी घर ने मुझे सहेजा भी, सम्भाला भी. मैं एक सहमी सी नन्ही बच्ची की तरह आई थी यहाँ. एक सूटकेस लिए. इस घर में मैं बड़ी हुई. चलना सीखा, बोलना सीखा. इसकी दीवारों में मेरे आंसुओं की नमी है. एक-एक कोना मुझे हसरत से देख रहा है. यह घर मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट है. जब कोई नहीं था तब इसने हाथ थामा. रोने की जगह बना, हंसने की वजह भी. अब यह घर मेरा नहीं रहेगा. इस घर की दीवारों पर मेरी पसंद के रंग भी नहीं थे. लेकिन इस घर ने मुझे बहुत दुलराया है. छूटना आसान नहीं होता. लेकिन छूटना तय होता है.

अभी उस नए घर से मेरा रिश्ता बना नहीं है. सिर्फ कागजों पर बना है रिश्ता. यह बिलकुल उसी तरह है कि ब्याह हो गया है, अभी प्यार हुआ नहीं है. उम्मीद है प्यार भी हो जायेगा. लेकिन एक प्यार जो बिना रिश्ते के हो चुका वो कभी नहीं जायेगा जीवन से. इस घर से प्यार घर जो असल में मेरा नहीं था लेकिन शायद घर भी जानता होगा कि वो मेरा ही था हमेशा से...छूटना आसान नहीं. जाने क्या क्या छूट रहा है हालाँकि रात दिन सामान पैक हो रहा है...मैं जानती हूँ कुछ भी पैक नहीं हो पायेगा. सब छूट जाएगा...

Tuesday, April 30, 2019

म्यूजिक टीचर के असर में रहना


जैसे बुरे दिनों के लिए अम्मा छुपा के रखती थीं रसोई के डिब्बों में कुछ रूपये, जैसे बाबा बचा के रखते थे भीतर वाले खलीते (जेब) में गाढे वक़्त के लिए कुछ मुस्कुराहटें और ढेर सारी हिम्मत. जैसे हम बचपन में अपनी खाने की थाली में से बचाकर रख लेते थे बेसन का लड्डू फिर उसे सबके खा चुकने के बाद धीरे धीरे स्वाद लेकर खाते थे ठीक वैसे ही रखती हूँ अपने प्रिय लेखक के लिखे को. जब दिन का हर लम्हा आपस में गुथ्थम गुथ्था कर रहा होता है, जब सुबहों की शामों से एकदम नहीं बनती, जब नहीं लगता किसी काम में मन, न पढ़ा जाता है कुछ, न सूझता है कुछ भी लिखना. तब इस लेखक के लिखे को निकालती हूँ और जिन्दगी अंखुआने लगती है. लेखक यकीनन मानव कौल हैं. 'ठीक तुम्हारे पीछे' से बहुत पहले, 'प्रेम कबूतर' से भी बहुत पहले से वो मेरे प्रिय लेखक हैं. प्रिय निर्देशक भी. अब देख रही हूँ कि वो प्रिय अभिनेता भी बनने लगे हैं. इतनी लम्बी भूमिका है हाल ही में देखी उनकी फिल्म 'म्यूजिक टीचर' के बारे में कुछ कह पाने की कोशिश की.

सोचा था 19 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ होते ही देखूँगी इसे, लेकिन जिन्दगी सामने आकर हंस दी यह कहते हुए कि ' तुम नहीं मैं डिसाइड करुँगी तुम कब क्या करोगी.' और मेरे पास सर झुकाने के सिवा कोई चारा नहीं था. तमाम लोग फिल्म देखकर अपनी राय देते रहे मैंने कुछ नहीं पढ़ा, किसी को नहीं. यह फिल्म मेरे लिए बुरे दिनों की खर्ची थी, इसे संभालकर खर्चना था. बेहद उलझे और निराश दिनों में उम्मीद थी कि एक फिल्म है जो मुझे डूबने से बचा लेगी. कुछ है जो बचा हुआ है. फिर एक रोज तमाम मसायलों को दूर रखकर फिल्म देखना शुरू किया. फ़ोन स्विच ऑफ  करके भी कि कोई भी व्यवधान फिल्म की रिदम तोड़ दे यह नहीं चाहती थी.

सार्थक दास गुप्ता ने बेहद खूबसूरत फिल्म बनाई है. फिल्म का पहला फ्रेम जिस तरह खुलता है वो आपका हाथ पकडकर अपने साथ एक अलग दुनिया में ले जाता है. बेनी की दुनिया में, बेनी जो झरना है, गीत है, पहाड़ है, जंगल है, पुल है, नदी है. बेनी जो संगीत का शिक्षक नहीं समूचा संगीत है. पूरी फिल्म हर दृश्य में जिस तरह प्रकृति के अप्रतिम सौन्दर्य को लेकर सामने आती है वो मंत्रमुग्ध करता है. वो पहाड़ी रास्ते वैसे ही हैं जैसा होता है जीवन. देखने में बेहद खूबसूरत लेकिन चलने में साँस फूल जाय. पर्यटक का पहाड़ वहां के रहनवासियों के पहाड़ से इतर होता है. फिल्म के पहाड़,  जंगल , धुंध में डूबी वादी पर्यटक की नहीं है वहां के रहनवासियों की है.

स्मृतियों का कोलाज बनता बिगड़ता रहता है. बेनी इस फिल्म के हीरो हैं लेकिन एक हीरो और है फिल्म में इसके सिनेमेटोग्राफर कौशिक मंडल. ओह इतने सुंदर दृश्य, इतना मीठा संगीत जैसे कोई जादू. अमृता बागची ज्योत्स्ना के रोल में और बेनी के रोल में मानव कौल बेहद इत्मिनान वाले सुंदर दृश्य रचते हैं. फिल्म में कहीं कोई हडबडी नहीं. सब इत्मिनान से चलता है. जैसे आलाप हो कोई...या कोई तान.

कुछ दृश्य हैं जो कभी नहीं भूलूंगी. एक दृश्य जिसमें ज्योत्सना, बेनी से पूछती है 'मेरे कान के झुमके कैसे लग रहे हैं? 'फिर आगे पूछती है 'मैं कैसी लग रही हूँ?' सादा से इन सवालों के जवाब में बेनी का गाढ़ा संकोच, शर्मीलापन उनके भीतर तक की सिहरन को बयां करने में कामयाब है.
एक दृश्य जहाँ किसी का अंतिम संस्कार होने के बाद बेनी की पड़ोसन गीता (दिव्या दत्त) कुछ चीज़ें जला रही है. चीज़ें कहीं नहीं है, आग भी जरा सी है लेकिन धुआं ...ओह उस दृश्य में वह धुआं हीरो है जिसके बैकग्राउंड में बेनी और गीता हैं. दुःख के उन पलों में दो उदास लोग एक बहुत घना रूमान रचते हुए. वो धुआं कितना कुछ कहता है. मारीना त्स्वेतायेवा की  'द  कैप्टिव स्पिरिट' की याद हो आती है. काफ्का की याद उन्हीं दृश्यों में घुलने लगती है. वह बेहद खूबसूरत दृश्य है.
एक और दृश्य जिसमें बेनी बहन की शादी का कार्ड पोस्टबॉक्स में डालने की न डालने की दुविधा को कुछ लम्हों में दर्शाता है. वो कुछ सेकेण्ड भीतर की पूरी जर्नी की डिटेलिंग देते हैं.

दिव्या दत्त के बारे में अलग से बात किया जाना बेहद जरूरी है कि एक तो वो मुझे प्रिय हैं हमेशा से. जिस भी फिल्म में जब भी वो हुई हैं लगता है वो उसी किरदार के लिए जन्मी हैं. इतना इकसार हो जाती हैं वो और सच कहूँ तो वो जब तक रहती हैं सबको ओवरलैप कर लेती हैं. कमाल की अदायगी. इस फिल्म में भी गीता की भूमिका में ऐसा ही असर छोड़ जाती हैं. उनके रोल पर अलग से बात हो सकती है जिसमें बहुत सारे स्त्री विमर्श के शेड्स समाहित हैं.

मानव कौल ने इस फिल्म में अच्छा अभिनय किया है यह कहना ज्यादती होगी क्योंकि मुझे ऐसा लगा कि उन्होंने अभिनय किया ही नहीं है बल्कि जिया है पूरी फिल्म को, हर दृश्य को, हर संवाद को. वो फिल्म में घुले हुए हैं. यह फिल्म मानव कौल के सिवा और कौन कर सकता था भला. यह उन्हीं की फिल्म है. हर फ्रेम में, हर संवाद में और हर मौन में मानव एकदम परफेक्ट हैं.

अमृता बागची फ्रेश हैं. वो मानव के साथ स्क्रीन शेयर करते हुए अच्छी लगती हैं और जितनी उनकी भूमिका है उसे ठीक से करने का प्रयास करने का पूरा प्रयास करती हैं.

सार्थक दासगुप्ता के और काम को देखने की इच्छा बढ़ रही है. फिल्म के तमाम और पहलुओं पर बात हो सकती है, तमाम डिस्कोर्स जो रचे बसे हैं लेकिन अभी उन पर बात करने का मन ही नहीं है. बस कि कविता सी झरती इस फिल्म के असर में रहने का मन है कुछ दिनों.


Monday, April 22, 2019

'ये कविताओं के पंख फ़ैलाने के दिन हैं '


'क' से कविता यह नाम नया है लेकिन इस भावना वाला काम तो मैं तकरीबन 60-65 सालों से कर रहा हूँ कि दूसरों की कविताओं को सुनाना. वहां भी दूसरों की कविताओं को सुनाना जहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है मेरी अपनी कविताओं को सुनाने के लिये क्योंकि मुझे लगता है कि जो मुझसे भी अच्छी कवितायेँ लिखी गयी हैं वो भी उन सबको सुनानी चाहिए जो कविताओं से प्रेम करते हैं.' 
- नरेश सक्सेना 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

'क से कविता क से क्या कहने. मेरा जो मानना है कि कविता को जन तक कैसे ले जाएँ उसका यह बहुत अच्छा उपक्रम है. जनता को कविता की समीक्षा करने का मौका मिलता है मेरे ख्याल से यह बहुत बड़ी बात है. कविता अगर जिन्दा रहेगी तो लिखने से ज्यादा ऐसे कार्यक्रमों से जिन्दा रहेगी. नये नए ज्यादा से ज्यादा लोगों का कार्यक्रम से जुड़ना ही कार्यक्रम की उपलब्धि है.
- लाल बहादुर वर्मा 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

मुझे कार्यक्रम में आकर बहुत अच्छा लगा. मैं देहरादून का हूँ कविता के कार्यक्रम में इतने लोगों का जमा होना, बराबर बने रहना है यह बड़ी बात है. कार्यक्रम का कंटेंट, संचालन, पूरी बुनावट में जो तारतम्यता थी वो कमाल की थी. इसे जिस सादगी जिस सहज भाव से चलाया जा रहा है इसे ऐसे ही चलने दें.'
- हमाद फारुखी 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

कविता प्रेम, सच्चाई, मनुष्यता की ओर ले जाती है. हम सबको मिलकर स्कूलों में कॉलेजों में इस तरह के कार्यक्रम को जाना चाहिए और हम सबको छात्रों को इससे जोड़ने का प्रयास करना चाहिए.-
इन्द्रजीत सिंह 28 अप्रैल 'क' से कविता

एक बेहद सादा सा, सुंदर सा भाव था मन में कि कोई ऐसा ठीहा हो जहाँ दो घड़ी सुकून मिले. रोजमर्रा की आपाधापी से अर्ध विराम सा ठहरना हो सके. जहाँ होड़ न हो, जहाँ तालियों का शोर न हो, जहाँ छा जाने की इच्छा न हो, बस हो मिलना अपनी प्रिय कविताओं से और कविता प्रेमियों से. (अपनी कविता के प्रेमियों से नहीं).और संग बैठकर पीनी हो एक कप चाय. इस विचार ने बहुत मोहब्बत के साथ कदम रखा शहर देहरादून ने 23 अप्रैल 2016 को और दो साल पूरे होते होते यह उत्तरकाशी, श्रीनगर, हल्द्वानी, रुद्रपुर, खटीमा, टिहरी, रुड़की, पौड़ी, अगस्त्यमुनि, गोपेश्वर, लोहाघाट (चम्पावत), पिथौरागढ़,बागेश्वर और अल्मोड़ा तक इसकी खुशबू बिखरने लगी. 

कब सुभाष लोकेश और प्रतिभा पीछे छूटते चले गए और रमन नौटियाल, भास्कर, हेम,पंत शुभंकर, ऋषभ, मोहन गोडबोले निशांत, प्रमोद, विकास, राजेश, नीरज नैथानी, नीरज भट्ट, सिद्धेश्वर जी, प्रभात उप्रेती, अनिल कार्की, महेश पुनेठा, मनोहर चमोली, गजेन्द्र रौतेला, भवानी शंकर, पियूष आदि इस कारवां को आगे बढ़ाने लगे पता ही न चला. गीता गैरोला दी तो सबकी प्यारी लाडली दी हैं उन्होंने इसकी मशाल जिस तरह थामी कि मोहब्बत की आंच थोड़ी और बढ़ गयी. 

देहरादून में नूतन गैरोला, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, नीलम प्रभा वर्मा दी ने लगातार अपने प्रयासों से और स्नेह से इसे सींचा. कल्पना संगीता, कान्ता, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, सतपाल गाँधी, सुरभि रावत, स्वाति सिंह, नन्ही तनिष्का सहित सैकड़ों लोग नियमित भागीदार बनते गये. कार्यक्रम की सफलता असल में शहर की सफलता है. देहरादून को अब बारिशें ही नहीं कवितायेँ भी सींच रही हैं. उत्तराखंड के अन्य शहरों को भी.

इस कार्यक्रम को व्यक्ति का नहीं, समूचे शहर का होना था. व्यक्तियों को इसमें शामिल होना था. कहीं पहुंचना नहीं था, कुछ हासिल नहीं करना था बस कि हर बैठकी का सुख लेना था, लोगों से मिलने का सुख, सुकून से दो घड़ी बैठने का सुख, प्यारी कविताओं को पढने का सुख, सुनने का सुख.

बोलने और लिखने की होड़ के इस समय में यह पढ़ने और सुनने की बैठकी बनी. लेखकों की नहीं पाठकों की बैठकी. शहरों ने इस कार्यक्रम को अपने लाड़ प्यार से सींचा. जो लोग बैठकों में शामिल होने आये थे वो इसके होकर रह गए. अब घर हो या दफ्तर कुछ भी प्लान करते समय महीने के आखिरी इतवार की शाम पहले ही बुक कर दी जाने लगी. बच्चे, युवा, साहित्यकार, बिजनेसमैन, गृहणी, शिक्षक सब शामिल हुए. सबने अपनी प्रिय कवितायेँ पढ़ीं, कितनों ने पहली बार पढ़ीं. कितनों ने ही यहाँ आकर समझा पढने का असल ढब. सुना कि किसी को कोई कविता क्योंकर अच्छी लगती है आखिर.

यह कोई नया विचार नहीं था क्योंकि बहुत से लोग मिले जिन्होंने कहा कि ऐसा तो हम सालों से कर रहे थे. कुछ बैठकों में शामिल भी हुए हम कुछ के बारे में सुना भी. महेश पुनेठा पिथौरागढ़ में 'जहान-ए-कविता' चला ही रहे थे. भास्कर भी ऐसे तमाम प्रयोग करते रहे थे. हेम तो हैं ही प्रयोगधर्मी. फिर क्या ख़ास है इन बैठकों में. खास हुआ सबका जुडना. एक नयी जगह में बैठकी की सूचना परिवार में नए सदस्यों की आमद सा लगता.

उत्तराखंड ने इन बैठकों को अलग ही ऊँचाई दी. यहाँ हमें 'मैं' से दूर रहने वाली बात पर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. जो साथी शामिल हुए वो सब स्वयं 'मैं' से बहुत दूर थे दूर हैं. न शोहरत की तलाश, न पीठ पर किसी थपथपाहट की उम्मीद बस कि हर बैठक के बाद होना थोडा और समृद्ध, होना थोड़ा और मनुष्य, और तरल, और सरल.

इन बैठकों में शामिल लोग नाम विहीन से हो जाते थे, चेहरा विहीन. बिना तख्ती वाले लोग इतना सहज महसूस करते कि बैठकों का इंतजार रहने लगा. शहर ने बाहें पसारीं और कार्यक्रम को अपना लिया. हमें न कभी जगह की कोई परेशानी हुई न चाय की. जबकि न हमने चंदा किया न किसी से फण्ड लिया. सब कैसे इतनी आसानी से होता गया के सवाल का एक ही जवाब था प्रेम, कविताओं से प्रेम.

देहरादून में 28 अप्रैल को हुई दूसरी सालाना बैठक असल में राज्य स्तरीय बैठक न हो पाने के बाद आनन-फानन में मासिक बैठक से सालाना बैठक में बदल दी गयी. फिर न पैसे थे न इंतजाम कोई और न ही वक़्त. ज्यादातर साथी शहर में ही नहीं थे. लेकिन जब शहर किसी कार्यक्रम को अपना लेता है तो आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. और यह किसी कार्यक्रम की किसी विचार की सबसे बड़ी सफलता होती है कि उसे व्यक्तिपरक होने से उठाकर समाज से जुड़ जाए. शहर के सारे लोग इसकी ओनरशिप लेते हैं. सबकी चिंता होती है कि कोई कमी न रह जाए. सब मिलकर काम करते हैं, सब मिलकर एक-दूसरे के होने को सेलिब्रेट करते हैं. मेहमान कोई नहीं होता, मेजबान सब. कोई मंच नहीं, माल्यार्पण नहीं, मुख्य अतिथि नहीं, दिया बाती नहीं, किसी का कोई महिमामंडन नहीं. जेब में चवन्नी नहीं थी लेकिन दिल में हौसला था तो निकल पड़े थे सफर
में और देखिये तो कि आज दो बरस में पूरा उत्तराखंड कविता की इन भोली बैठकियों से रोशन है.

क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में लोग मुम्बई से भी आये थे, दिल्ली से भी लखनऊ से भी और उत्तरकाशी से भी. कबीराना थी शाम...फक्कड़ मस्ती, गाँव दुआर पे कहीं बैठकर, चौपाल में, कुएं की जगत पर खेत के किनारे मेड पर बैठकर भी जैसे कबीरी हुआ करती होगी वैसी हो चलीं हैं कविताओं की ये बैठकियां. 
 

Thursday, April 11, 2019

कहानी- स्कूल


- ज्योति नंदा

सुन ऋषि ,कल रात को खूब मजा आया" वो बोली।
"अच्छा। क्या हुआ ? फिर वही , झूठ- मूठ सोने की एक्टिंग "
"नहीं नहीं ,कल मम्मा -पापा को बहुत डांट पड़ी.।
हा हा हा..... ऋषि की हंसी रुक ही नहीं रही थी। मां पापा को भी कभी डांट पड़ती है क्या ? उसने तो कभी देखा ही नहीं था कि माँ को कभी किसी ने डाटा ?
"हंस क्यों रहा है तू ?, रात को अचानक दादी दादू आ गए ,गाँव से, उन्होंने डांटा बड़ा मजा आया। " सुडूप्प ..की आवाज़ के साथ होठों को गोल बना कर नूडल्स खाती है।
क्यों"? मुश्किल से हंसी रोकते हुए ऋषि ने पूछा।
"मम्मा पापा एक कमरे में नहीं सोते इसीलिए और क्या?" उसने व्यंग किया जिस तरह उसे फ़िज़ूल की बातो पे डात पड़ती है वैसे ही दादा ने अपने बेटे को डाटा। मानो कोई रीत हो जो पीढ़ियों से चलती आ रही है। बेवजह बातो पे बड़ो का छोटों को डांटना।
ऋषि झल्लाया "ऐ तू चुतिया है क्या?"
"ऐ ऐ तू पागल , इडियट ,जबान संभाल अपनी न न पुन.. सक हकलाती ज़बान में नया शब्द बोला उसने।

"व्हाट व्हाट.....यु सैड"
तू गन्दी बात बोलेगा तो मै भी बोलूंगी ."
"अच्छा अच्छा ठीक है अब नहीं कहूँगा पलटवार होते ही ऋषि समझौते की मुद्रा में आ गया."पर तूने क्या बोला, न न ??? यह तो कुछ नया है , कहा से सीखी ?
"पता नहीं" अदिति चिढ गयी।
ऋषि समझ गया ज्यादा पूछना ठीक नहीं "अच्छा तू ही बोल अलग सोने के लिए डांट पड़ती है क्या "?
"कल मम्मा पापा मुझे सुलाने के बाद फिर से झगड़ने लगे"
'अरे वाह! बहुत दिनों के बाद तेरे मम्मा पापा ने फाइट की" ऋषि ने चटकारे लेकर कहा.उसकी आँखे चमक से और फ़ैल गयी. ऐसा कुछ जानने कि लालसा में जो वह अक्सर सुनना चाहता है.लेकिन क्यों ? ये वो नहीं जानता।

अदिति मायूसी से बोली "अब तो मम्मा पापा बात ही नहीं करते.बस मेरे पीछे पड़े रहते है,अदिति खाना खालो, नहा लो, पढ़ लो. पर कल फिर से लड़ने लगे" मुँह टेढ़ा कर बोली."हम दिवाली पर गाँव गए थे न वहा भी दादी मम्मा पर गुस्सा कर रही थी एक छोटा भइय्या चाहिए ही चाहिए"
ऋषि परेशां हो गया "अब यह कैसे आएगा "?
"ओहो बुद्धू तुझे कुछ नहीं पता.तेरे मम्मा पापा साथ नहीं रहते न इसीलिए.जब मम्मा पापा एक कमरे में सोते हैं तभी तो छोटा भैय्या आता है." ऋषि इस नए प्राप्त हुय ज्ञान को समझने की कोशिश में लगा हुआ था.
".घर में सबको छोटा भैय्या चाहिए.दादी दादू नानू नानी सबको. पर मम्मा ने बोला उन्हें नहीं चाहिए.पापा से कहा की एक ही बहुत है. जैसे चल रहा है चलने दो, नहीं तो कुछ भी नहीं बचेगा और न मैं बचाउंगी "
"क्या बचाना है?" ऋषि के मन में जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे क्या बचाना है अदिति की माँ को। कही वो कोई सीक्रेट एजेंट तो नहीं है? या फिर सुपर मैन वीमेन के भेष में? उन्हें दुनिया बचानी है।

"यह तो मुझे भी नहीं प.ता फिर पापा उठ कर दूसरे कमरे में चले गए. रात को दादी ,दादू आ गए अचानक और मम्मा पापा को खूब डांटा.मजा आया." ताली बजा कर हसने लगी."सब समझ रहे थे में सो रही हूं पर......ऋषि ने फिर छेड़ा।
"पर तू तो नंबर वन चोरनी है सब सुनती देखती रहती है" ऋषि ने चिढाया .अदिति ने आँखे तरेरी.
"मैं तो रात भर आराम से सोता हूँ अपनी मम्मा के साथ , फिर थोडा ठहरा, गहरी सांस ली "कभी कभी नानी आ जाती है बड़ बड करने लगती है.........
...........अच्छा हुआ तू अलग हो गयी,रात को चैन से सो तो लेती है.....कोई फिजूल की झिक झिक नहीं करता........बुढा तो ना जीने देता है न मरने.....".
"बुड्डा कौन ?"अदिति ब्रेड का टुकड़ा मुह तक ले जाते हुय रुकी.
"नाना और कौन" हा हा...दोनों ने ठहाके लगाये "तेरी मम्मा क्या बोलती है?"
"कुछ नहीं बस सिर के नीचे रखा तकिया कान पे ढँक कर सो जाती है.नानी बड़ बड़ करके चली जाती है".
टन टन टन ......"चल-चल टिफिन टाइम ख़त्म हो गया.तेरी बातें ही नहीं ख़त्म होती".ऋषि ने फटाफट टिफिन समेटा और क्लास की ओर दौड़ गया.अदिति भी बेमन से पीछे हो ली.

दूसरे दिन स्कूल में सुबह से ही अदिति कुछ कहने के लिए उतावली दिख रही थी। जी.के.और मोरल साइंस की साप्ताहिक क्लास में अदिति का कभी मन नहीं लगता था। आज तो बिलकुल भी नहीं.टीचर बड़ों का आदर और माता पिता के सम्मान का महत्तव समझा रही थी। अदिति इस इन्तजार में थी कि कब टन टन की आवाज आये. ऋषि उसका उतावलापन भांप गया."ऐ ,क्या बात है?" वह अदिति के कान में फुसफुसाया.
"झूठ नहीं बोलना चाहिए" टीचेर का स्वर गूंजा.
"मम्मा पापा से बहुत गुस्सा है बोल रही थी तुम हमेशा झूठ बोलते हो" अदिति भी फुसफुसाई .
तभी घंटी बज गयी सारे बच्चे मैदान की तरफ दौड़ पड़े.अदिति और ऋषि अब भी घर का, समाज का और किताबी नैतिकता का भेद समझने की कोशिश कर रहे थे.
"कल मम्मा ऑफिस से आने के बाद थक कर लेटी थी तब पापा ने उन्हें एन्रेर्जी ड्रिंक दिया .उसके बाद मम्मा मुझे बहुत प्यार करने लगी .और......ही ही ...ही...."अदिति मुह पर हाथ रख कर हसने लगी.ऋषि फिर झल्लाया " क्या है जल्दी बता."........खी खी ....और न...और और . मम्मा,पापा को भी प्यार कर रही थी.फिर पापा ने कहा अदिति तू दादी के पास सो जा। मैं नहीं जा रही थी लेकिन दादी और पापा ने बोला सन्डे फिल्म दिखायेंगे और आइसक्रीम खिलायंगे तो मैं चली गयी.""ऐ चटोरी" ऋषि ने फिर चिढाया.
"अरे सुन तो. में तो सुबह वापस मम्मा के पास ही थी"
'"अच्छा ! जादू क्या" ऋषि को मजा आने लगा था.
"मम्मा को तो कुछ भी याद नहीं था. फिर मैंने मम्मा को बताया की उन्होंने पापा की दी हुए एनेर्जी ड्रिंक पी थी तो वह पापा से फिर लड़ने लगी और रोने लगी "तुमने मेरा रेप किया है "
"यह रेप क्या होता है? वो जो टी वी की न्यूज़ में नाना नानी दिनभर सुनते रहते है। जब पूछता हूँ तो चैनल बदल देते है। "
वो होगी कोई मामी पापा के बीच की बात, छोड़ न ,.पर दादी ने पता है.... बताया कि...कि"
क्या ?"
"अब छोटा भइय्या आयेगा हमारे घर "

Tuesday, April 2, 2019

पंचम सुर पर चढ़ी वीरानी


हाथों की लकीरें एक-एक कर टूट रही हैं. टूट-टूटकर हथेलियों से गिर रही हैं. नयी लकीरें उग भी रही हैं. टूटकर गिरने की गति नयी उगने की गति से काफी ज्यादा है. हथेली अमूमन अब बिना लकीरों की सी हो चली है. उसे देर तक देखती रहती हूँ. कोरे कागज सी कोरी हथेलियाँ. इन पर स्मृति का कोई चिन्ह तक अब शेष नहीं रहा. इतनी खाली हथेलियाँ देखी हैं कभी? मैं किसी से पूछना चाहती हूँ. लेकिन आसपास कोई नहीं. यह हथेलियों का खाली होना ही है. मुस्कुराते हुए बिना लकीरों वाले हाथ से चाय का कप थामते हुए ध्यान बाहर लगाती हूँ. मन के बाहर भी. बड़े दिन से बाहर देखा ही न हो जैसे. आसमान साफ़ है. ना-नुकुर करते हुए ही सही आखिर सर्दियों की विदाई हो चुकी है. चिड़ियों का खेल जारी है. जब मैं इन्हें नहीं देखती तब भी ये ऐसे ही तो खेलती होंगी. जीवन ऐसा ही है.

एक घर है, जिसकी बालकनी सनसेट प्वाइंट है, एक सड़क है जो आसमान को जाती है, एक पगडंडी है जो न देखे गए ख्वाबों की याद दिलाती है, एक घास का मैदान है जो पुकारता है नंगे पांव दौड़ते हुए आने को, कुछ पागल हवाएं हैं जिन्होंने शहर की सड़कों को गुलाबी और पीले फूलों से भर रखा है. इतना कुछ तो है फिर जीवन का यह वीराना कहाँ से आता है आखिर. जो भी हो यह वीरानगी किसी राग सी लग रही है. पंचम सुर पर चढ़ी वीरानी.

कुछ दिनों से पैदल चलने का मन हो रहा है. यह सड़कों से मेरे रिश्ते की बात है. बिना पैदल चले शहरों से रिश्ता नहीं बनता. बिना नंगे पाँव चले घास से रिश्ता नहीं बनता, बिना दूर जाए करीबी से रिश्ता नहीं बनता. बिना जार- जार रोये सुख से रिश्ता नहीं बनता. लकीरों का यह टूटकर गिरना सुखद है.

Thursday, March 28, 2019

चॉकलेट का पेड़ और उर्मि


उर्मि हर रोज शाम को घर लौटते पंछियों के झुण्ड को देखने को सब काम छोड़ छत पर आ जाती थी. दादी कहतीं कि शाम को पंछी लौटते हैं. वो कहाँ गये थे, कहाँ को लौट रहे थे नन्ही उर्मि को कुछ समझ में नहीं आता था. उसने दादी से कई बार पूछा, दादी वो कहाँ से लौटते है दादी ने हंसकर एक ही जवाब दिया, 'तेरे पापा की तरह वो भी तो ऑफिस जाते होंगे. है न?'

उर्मि की दुनिया में पंछियों के ऑफिस, गाय, भैंसों के ऑफिसों का दृश्य बनने लगते. वो सोचते-सोचते खुश होने लगती. 'दादी, मुझे भी जाना है पंछियों का ऑफिस देखने. वहां क्या काम होता होगा? चिडिया भी फ़ाइल देखती होगी.' ऑफिस का मतलब फ़ाइलों का ढेर और टाईपराइटर की खटर-पटर ही जाना था उर्मि ने अब तक. इसका कारण भी पापा के ऑफिस में कभी-कभार उसका जाना था.

'दादी, आराम से फुर्सत में पैर फैलाकर, खरबूजे के बीज छीलते हुए कहतीं, चिड़ियों के ऑफिस में घोसले की बात होती होगी शायद. कौन से पेड़ पर कौन सी चिड़िया का घोसला हो शायद यह तय होता होगा.'

'फिर तो उनका ऑफिस न ही होता हो यही अच्छा. उनको तो किसी भी पेड़ पर कितना भी बड़ा घोसला बनाने की आज़ादी होनी चाहिए. है न दादी?'
दादी चुप रहतीं. उर्मि का दिमाग चलता रहता.

'उनकी सैलरी कहाँ से आती होगी? कित्ते पैसे मिलते होंगे दादी?' वो भो अपने बच्चों के लिए चौकलेट लाते होंगे घर लौटते समय?

'हो सकता है वो शाम को बच्चों के लिए जो दाना लाते हों उसमें चॉकलेट होती हो.' दादी को भी उर्मि की बातों में मजा आने लगता.

'और गाय भैंस के ऑफिस में क्या होता होगा दादी?'
'क्या पता क्या होता होगा. तुम सोचो तो.'

उर्मि ने कहा, 'दादी गाय बैल को तो वैसे ही इतना काम करना होता है वो ऑफिस में कैसे काम करते होंगे. दिन भर तो खेत में काम करते हैं न बैल. गाय भी. ऊँट भी.'

'तो हो सकता है चारा चरके लौटते हों.' दादी ने कहा.

'अरे हाँ, कित्ता मजा आता होगा फिर तो. पिकनिक से लौटने जैसा. उनकी किटी पार्टी होती होगी. है न?
सुनो बहन, मेरा मालिक मुझे बहुत मारता है, क्या करूँ समझ में नहीं आता. एक कहती होगी. दूसरी कहती होगी, हाँ बहन मेरा भी यही हाल है. सारा दिन काम कराता है, सब दूध निकाल लेता है और खाना भी कम देता है. जी चाहता हूँ कहीं भाग जाऊं.'

उर्मि गाय, बैल की नकल करके ताली पीटकर हंस दी. लेकिन जल्दी ही उदास भी हो गयी. फिर तो वापस लौटते समय खुश नहीं होते होंगे न ये लोग. वही खूंटा, वही चारा, वही काम.'

दादी ने सोचा बच्ची फंस गयी है तो उसे उलझन से निकाल दें. 'लेकिन उसके बच्चे भी तो इंतजार करते होंगे न. जैसे तू करती है अपनी मम्मी, पापा का.' दादी ने कहा.

'हाँ, वो भी बच्चों के लिए चॉकलेट लाते होंगे क्या?' उर्मि की सुई चॉकलेट पर अटकी हुई थी.

'लेकिन दादी उनके पास तो पैसे नहीं होते होंगे फिर वो चॉकलेट कैसे लाते होंगे. वो कुछ भी कैसे लाते होंगे.' उर्मि फिर उदास हो गयी.

'दादी अगर मैं सबको खूंटे से खोल दूं तो ?' यह कहते हुए उर्मि की आँखें चमक उठी थीं.
 दादी ने कहा 'तुम बताओ फिर क्या होगा?'
'वो लोग भी ऑफिस जायेंगे, काम करेंगे और पैसे कमाएंगे. फिर शाम को चॉकलेट लेकर आयेंगे.'

'लेकिन यह भी तो हो सकता है उनके बच्चों को चॉकलेट पसंद ही न हो? जैसे मुझे पसंद नहीं.' दादी को उर्मि की बातों में इतना मजा आ रहा था कि उनकी दोपहर की नींद भी चली गयी थी.

'दादी. आप बूढी हो इसलिए आपको चॉकलेट पसंद नहीं. सब बच्चों को चाकलेट पसंद होती है.' उर्मि को लगा दादी एकदम बुध्धू है. भला चॉकलेट किसे पसंद नहीं होगी.

दादी पोपले मुंह से हो हो करके हंसने लगी. 'ओह मैं तो भूल गयी थी कि मैं बूढी हो गयी हूँ.'

'तो क्या करना चाहिए कि सब बच्चों को चाकलेट मिल जाए.' दादी ने उर्मि को मुश्किल में डालना चाहा.
उर्मि ने कुछ देर सोचा फिर कहा, 'मेरे पास एक आइडिया है.'
'क्या?' दादी ने पूछा.

'मैं नहीं बताउंगी.' उर्मि की आँखों में चमक थी.
दादी की उत्सुकता यह जानने की थी कि उर्मि के पास कौन सा आइडिया है. लेकिन उर्मि ने बताया नहीं.

अगले दिन से घर के बगीचे में लगे पेड़ पर बने घोसले में और पशुओं के बाड़े में  उर्मि की चॉकलेट के रैपर जब तब मिलने लगे. उर्मि अब जब भी चॉकलेट खाती तो उसमें से एक हिस्सा सबके नाम का जमीन में बोने लगी. थोड़ी चॉकलेट घोसलों में चुपके से रख आती कभी जानवरों के चारे में डाल आती.

चाकलेट भले ही चिड़ियों व जानवरों ने न खायी हो, भले ही न उगे हों चॉकलेट के पेड़ लेकिन उन चाकलेट्स की मिठास उर्मि की जिन्दगी में अब तक कायम है.


Wednesday, March 27, 2019

अभिनय


अपनी उन्मुक्त हंसी
दौड़ते भागते क़दमों की रफ़्तार
पार्टियों में लचकती कमर
और शोख अदाओं में

त्योहारों में मन जतन से शामिल होने
पकवानों को कभी खाते, कभी बनाने
दोस्तों के संग धौल-धप्पा करने
बेवजह की बातों में रूठ जाने
और फिर खुद ही मान जाने में

छुट्टे पैसे के लिए सब्जी वाले से झिक-झिक करने
और सिनेमा देखते वक़्त चुपके से रो लेने
कॉफ़ी की खुशबू में डूबने
और उतरते सूरज के संग मुस्कुराने में

सहकर्मियों संग करते हुए मजाक
या चुहलबाजियों में
वो आसानी से छुपा लेती हैंअपनी उदासियां

अभिनय कला में प्रवीण बनाता है जीवन स्त्रियों को. .

#worldtheatreday

Saturday, March 23, 2019

चलो न चाय पीते हैं

प्रिय देवयानी, 

उस रोज जब तुम्हारी जयपुर छोड़ने वाली पोस्ट पढ़ी तो जाने कितनी सिसकियाँ घेरकर बैठ गयी थीं. जाने क्यों सब इतना जिया हुआ लग रहा था उस पोस्ट का. हर्फ दर हर्फ. तुम मेरे भीतर जीती हो और शायद मैं भी तुम्हारे भीतर. आज 23 मार्च है. जानती हो आज ही के दिन सात बरस पहले मैंने भी तुम्हारी तरह अपना शहर छोड़ा था. सामान वाले ट्रक के साथ नहीं सिर्फ एक सूटकेस में रखे कुछ जोड़े कपड़ों के साथ. पहली बार अपने शहर से बिछड़ रही थी. बेटू से भी. जाने कैसा कच्चा-कच्चा सा मन था. लेकिन कुछ नया करने, देखने और जीने का चाव था. खुद पर जरा सा आत्मविश्वास था जो उस वक़्त ताजा ताजा कमाया था. बहुत सारा डर भी था कि जाने क्या होगा. देहरादून मेरे दोस्तों का शहर भी नहीं था. सिर्फ स्वाति थी जो हर वक़्त साथ रही, अब तक है.

लेकिन आज यह शहर मुझे मेरा शहर लगता है. बहुत सारे दोस्त हैं. ढेर सारा प्यार मिला यहाँ, सम्मान भी. यहाँ के रास्ते, पेड़, पंछी, हवाएं सबने मुझे अपनाया, दुलराया. नूतन गैरोला दी ने दूर से पहचाना और अपने प्रेम में रंग लिया. गीता गैरोला दी ने इतना अधिकार दिया कि उनकी वार्डरोब मेरी ही है अब और संतोषी के हाथ का खाना भी.

जानती हो, शहर छोड़ने चाहिए. शहर छूटता है तो नया शहर मिलता है. नए संघर्ष मिलते हैं जो निखारते हैं, नये लोग मिलते हैं जो संवारते हैं. नए ख़्वाब मिलते हैं जो जीने की वजह बनते हैं. तुम्हें भी खूब सारे नए पुराने दोस्त मुबारक, नए संघर्षों की आंच और ढेर सारे ख्वाब मुबारक.

तुम दिल्ली में हो तो दिल्ली मेरा भी हुआ थोड़ा सा जैसे मैं देहरादून में हूँ तो देहरादून तुम्हारा भी है ही. जयपुर और लखनऊ तो हैं ही अपने.

चलो न चाय पीते हैं.

Monday, March 18, 2019

अब लागे तुमड़ी फूलण लागे तुम भी फाग मनाओ

- जगमोहन चोपता 

ठंड कम होने के साथ ही उत्सवधर्मी पहाड़ और पहाड़ी समाज इस पल को उत्सवों में बदलने की कोई कसर नही छोड़ता है। जंगल बुरांश, मेहल, प्यूली के फूलों से लकदक होते हैं तो चीड़ अपने परागण से पूरी धरती को पीला करने की होड़ में है। ऐसे समय में कौन चाहेगा कि इस पल में राग और फाग का मिलन न हो। तो पहाड़ी उठाता है ढ़ोल-दमाऊ और उन्मुक्त हो गाते हैं होली गीत और गुलजार हो उठते हैं पहाड़, गांव और वहां का समाज। 

सच में ऐसा ही कुछ होता है चमोली के चोपता-कड़ाकोट क्षेत्र में जब युवाओं की टोली गांव-गांव जाकर होली के गीतों को गाकर होली के जश्न को मनाते हैं। शुरूआत होती है चीर काटने से। चीर जो कि मेहल की फूलों से लकदक टहनी को काटकर गांव के बीच मंदिर में स्थापित किया जाता है। चीर काटने के दो तीन तक युवाओं की टोली होली का झंण्डा और ढ़ोल दमाऊं की थाप पर गांव गांव जाकर होली के गीत गाते हैं। इसी बहाने अपने बड़े बुर्जुगों का आशीवार्द लेने, अपने दोस्तों को मिलने और अपने क्षेत्र को जानने समझने का मौका होता है। होलिका दहन के दिन चार दिन पूर्व काटे चीर का दहन किया जाता है। जिसकी राख और रंग गुलाल से होली के दिन होली खेली जाती है। इस क्षेत्र के होली के गीतों को जब देखते हैं तो इनमें यहां के समाज की प्रतिध्वनियां सुनाई देती है। इन प्रतिध्वनियों में कहीं कहीं देशज शब्दों के साथ ही ब्रज की खुशबू भी मिलती है।
वैसे तो होली के गीत पूरे ही पहाड़ में खेती किसानी, पहाड़ के संघर्ष और उल्लास के पलों, देवताओं के वृतांतों के इर्द गिर्द होते हैं। बस इनमें क्षेत्र बदलने पर गाने के तरीको और कुछ कुछ शब्दों का हेर फेर होता रहता है। शायद यही लोक की ताकत है कि वह किसी खास जकड़न से मुक्त देशकाल के अनुरूप अपने को बदलते रहता है। यही लचीलापन इन गीतों को गाने के तरीकों, शब्दों के चयन और शिल्प में दिखता है जो इन गीतों में विविधिता लाता है।
पहाड़ के होली के गीतों के प्रकारों को समझना हो तो इनको मोटा मोटा पांच हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला, खेती किसानी और वहां के भूगोल का वर्णन करने वाले गीत। दूसरा रिश्ते नातों जैसे देवर-भाभी, दोस्त, प्रियतमा या परिवार जन को संबोधित करने वाले गीत। तीसरे किस्म के वे गीत हैं जो व्यापारी या किसी परदेशी के जीवन और कर्म से संबंधित हैं। चैथा, देवी देवताओं से संबंधित गीत जिसमें मुख्य रूप से राम, कृष्ण, सीता, दुर्गा आदि देवताओं के इर्दगिर्द गीत रचे गये हैं। पांचवा आशीष गीत है जिनमें होल्यार लोगों को आशीष देकर अगले साल आने की कामना करते हैं।
खेतीहर समाज में खेती एकमात्र आजीविका के मुख्य साधन था। ऐसे में होली के गीतों में पहाड़, खेती और उससे जुड़े हल-बैल, बीज, खेत आदि के वर्णन में सहज और गेयता का शानदार मिश्रण मिलता है। होली के गीतों में खूब सारे गीत खेती-किसानी और खेत खलिहान के जीवंत अनुभवों से भरे हैं इसकी एक बानगी देखिये-
पूरब दिशा से आयो फकीरो/ लाया तुमड़ि को बीज, तुम भी राग मनाओ
अब लागे तुमड़ी बोयण लागे/ बोये सकल खेत, तुम भी राग मनाओ
अब लागे तुमड़ी जामण लागे/जागे सकल खेत तुम फाग मनाओ
अब लागे तुमड़ी गोडण लागे/गोड़े सकल खेत तुम भी फाग मनाओ
अब लागे तुमड़ी फूलण लागे/फूल सकल खेत तुम भी फाग मनाओ
अब लागे तुमणी काटण लागे/काटे सकल खेत तुम भी

इस गीत में तुमड़ी यानि कद्दू के बीच की यात्रा और उसको बोने से लेकर काटने तक की पूरी यात्रा का जिक्र है। यह सिर्फ जिक्र भर नहीं है बल्कि इसके जरिये खेती किसानी में बीजों को दूसरी जगहों से लाने, उपजाने और उसको पूरा सम्मान देने का मामला लगता है। किसी बीज के प्रति इस तरह का प्रेम खेतीहर समाज की सृजनशीलता को दर्शाता है। ऐसे खूब सारे गीतों के जरिये वे बीज, हल, बैल, खेती को पूरा सम्मान देने के साथ ही उसका जश्न मनाते हैं। ऐसा ही एक और शानदार होली गीत में खेती, पशुधन और घर की गृहस्थी का मजेदार समावेश दिखता है।
देश देखो रसिया बृजमण्डल/हमारे मुलक में गाय बहुत है
बड़ी-बड़ी गाये, छोटी है बछिया, रसिया बृजमण्डल
हमारे मुलक में धान अधिक है/कूटत नारि पकावत खीर, रसिया बृजमण्डल
हमरे मुलक में गेंहू अधिक है/पीसत नारि पकावत पूरि, रसिया बृजमण्डल
होली में खूब सारे गीत हैं जो देवर-भाभी, प्रेमी और परदेश में रह रहे अपने परिजनों की सलामती और उनके होली आगमन की कामना लिये होते हैं। पहाड़ के प्रकृति पे्रमी होल्यारों ने देवर भाभी के गीतों की रचना में भी सादगी और निर्मल प्रेम को ही केन्द्रबिंदु बनाया। उसकी बानगी देखिये-
मेरा रंगिलो देवर घर आयो रह्यो/केहिणू झुमका केहिणू हार
मैखुणी गुजिया लायो रह्यो, मेरो रंगिलो...
केखुणी बिंदी, केखुणी माला/मैखुणी साड़ी लायो रह्यो मेरा, मेरो रंगिलो.....
पहाड़ की जटिल भौगोलिक बसाहटों में किसी अपरिच का आना भी अनोखी बात रही होगी। ऐसे में होली के गीतों में उस समाज में आने वाले हर प्रकार के अजनबी लोगों का भी जिक्र है। जिन्होंने वहां आकर वहां के लोगों के जीवन को सरल, सहज बनाने में योगदान दिया। ऐसे ही घूम घूक कर व्यापार करने वाले व्यापारियों को लेकर एक मशहूर होली गीत है। जिसमें उनकी भूख-प्यास और पैदल चलने से लगी थकान का सुन्दर वर्णन मिलता है। उसकी बानगी देखिये।
जोगी आयो शहर में ब्यौपारी झू की/इस ब्यौपारी को क्या कुछ चाहिए
इस ब्यौपारी को प्यास लगी है/पानी पिलाई दे नथ वारी, झुकी आयो
इस ब्यौपारी को भूख लगी है/खाना खिलादो नथ वारी जोगी
होली में खूब सारे गीत ऐसे रचे गये हैं जिनमें होली की रचना को देवताओं की उपज माना गया है। इसके जरिये इसकी महत्ता और जरूरत को धार्मिक रूप से स्थापित करने की पहल दिखती है। ऐसे गीतों के जरिये स्थापित देवी देवताओं के साथ ही स्थानीय देवी देवताओं के नाम जोड़कर अपने गांव या क्षेत्र में होली की रचना को स्थापित करने की कोशिश की जाती है। उसकी बानगी देखिये!
एकादश द्वादशी चीर ब्रहमा ने होली रची है/रची ब्रह्मा ने होली होली की धूम मची है।
चोपता मण्डल बीच दुर्गा ने होली रची है/रची दुर्गा ने होली होली की धूम मची है
मथुरा मण्डल बीच कृष्ण ने होली रची है।/रची कृष्ण ने होली होली की धूम मची है
होली के गीतों को देखे तो इनमे राममायण के तमाम प्रसंग, कृष्ण लीलाओं के प्रसंग, शिव-पार्वती प्रसंगों का खूब प्रभाव दिखता है। लोक के खरे और खनकदार शब्दों में पगे इन होली गीतों में खूब सारी करूणा, प्रेम, वीरता, विपदाओं और अल्हाद के भाव भरे पड़े हैं। ऐसे में होल्यार जब किसी करूण और विपदाओं प्रसंग पर होली गाते हैं तो उनकी आवाज में वो दर्द साफ झलकता। ऐसे में गीतों को सुन रहे लोगों की आखों के पोर गीले हो जाते और वे करूणा से भर उठते हैं। वे अपने जीवन के दुख और विपदाओं को इन गीतों के साथ संतति बैठाकर झूमने लगते। वहीं वीररस के होली गीतों में वे ठेठ पहाड़ी पराक्रम से भुजाओं को फटकाते हुए ऐसे गाते हैं जैसे किसी नरभक्षी बाघ के शिकार के लिये निकल पड़े हों। राम के वनवास के समय का ऐसा ही एक गीत की बानगी देखिये।
ओहो केकई राम गयो वनवासन/पिता दशरथ अरज करत है
राम न माने एक, केकई राम/माता कौशल्या अरज करत है
राम ना माने एक, केकई राम/मात्रा सुमित्रा अरज करत है
राम न माने एक, केकई राम/भाई भर अरज करत है
लंका प्रसंग को होली के गीतों में हनुमान के जरिये लंका कैसे है का विवरण है जिसमें हनुमान के जरिये लंका की भौगोलिक स्थिति के साथ ही राम के भक्त विभिषण का जिक्र किया जाता है। इस तरह-
बोलो पवनसुत वीर, गढ़लंका कैसी बनी है/ वार समुन्दर पार समुन्दर बीच में टापू एक
लंका गढ़ के चार है द्वारे, उन पर पहरे अनेक/गढ़ लंका ऐसी बनी है
लंका गढ़ में घोर निशाचर, भक्त विभिषण एक/गढ़ लंका ऐसी बनी है
बोलो पवनसुत बीर, गढ़ लंका कैसी बनी है
देवताओं से संबंधित खूब सारे होली गीतों में दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की अलग अलग तरह से वर्णन किया जाता है। उनकी पूजा अर्चना से लेकर आशीष देने की कामना इन गीतों में भरी हुई हैं। इसी प्रकार के गीतों में से एक होली गीत है उसको देखिये।
खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर/दर्शन दीजे माई अम्बे दुलसी रहो जी/दुलसी रहो घड़ी चार अम्बे दुलसी रहो जी
तिल का तेल, कपास की बाती/दर्शन दीजे माई अम्बे दुलसी रहोजी 

होल्यार जब लोगों के आंगन में पहुंच कर होली के खूब सारे गीत गाने के बाद विदा लेते हैं तो वे लोगों को खूब सारा आशीष देते हैं। आशीष के इन गीतों में बाल बच्चों की खुशहाली, समाज की खुशहाली, खेत-हल-बैल की खुशहाली के साथ अगले साल आने का वादा होता है। यह वादा ही होता है जो पूरे सालभर तमाम कठिनाइयों के बाद भी होल्यारों को जीवन जीने का संबंध देता है। ऐसे पलों में होल्यार खुद भी भावुक हो कर विदा लेते लेते गाते हैं-
गावे बजावे, देवे आशीषा/तुम हम जींवे लाखों बरिषा/ह्वे जाया नाती खैल्यूणा/रंगो में राजी रहो जी
राजी रहो मेरे खेल खिलाड्यों/अब आऊंगी दूसरे फागुन को.


(19 मार्च को लखनऊ से प्रकाशित दैनिक 'जनसन्देश टाइम्स' में प्रकाशित)


चुनाव


हमारे जन्म के लिए
नहीं दिया था हमने कोई प्रार्थना पत्र
न हिन्दू या मुसलमान बनकर
जन्मने के लिए
न स्त्री होकर जीने के लिए
न पुरुष होकर
न पंडित, ठाकुर या दलित होकर
जन्म लेने के लिए

न पूछा गया था हमसे
किस देश या राज्य में
लेना चाहते हैं जन्म
कौन सा धर्म पसंद है हमें
किसके रीति रिवाज, परम्परायें
निभाना चाहेंगे हम

बिना अपने चुनाव के इस जन्म को
उसी तरह जीने लगे हम
जैसे जीना तय किया सबने
सिवा हमारे
मन्त्र जपने थे
या पढनी थीं कुरान की आयतें
कहाँ पता था हमें

लेकिन मनुष्य तो हम होते ही
अगर बदल भी जाता
धर्म, जाति, देश, लिंग सबकुछ

धर्म अगर एक ही होता धरती का
जो न होतीं लकीरें सरहदों पर
या हम जन्मे ही होते सरहद पार
तो बदला होता न  सब कुछ
बदल जाती पहचान 
आस्थाएं, विचार

बस कि नहीं बदलता चोट लगने पर दर्द होना
और प्यार पाकर निहाल हो जाना

मुंह में ठूंस दिए गये नारे,
ताली बजाने को उठते हाथ
किसी झुण्ड के पीछे
दौड़ पड़ने का पागलपन
कुछ भी नहीं है हमारा खुद का

यह पागलपन बोया गया है
इस पागलपन से बचना
हो सकता है हमारा चुनाव

समझना होगा खुद ही
कि जन्म हमारा चुनाव नहीं
जीवन हमारा चुनाव हो सकता है
धर्म हमारा चुनाव न सही
संवेदना हमारा चुनाव हो सकती है
जाति हमारा चुनाव न सही
मनुष्यता हमारा चुनाव हो सकती है
जन्म भले हुआ हो धरती के किसी कोने पर
लेकिन पूरी धरती को प्यार करके
उसमें रच बस जाने का सपना
हमारा खुद का चुनाव हो सकता है

मोहरे बनकर सियासत की बिसात पर
नफरत फ़ैलाने को दौड़ते फिरने से बचना
हो सकता है हमारा चुनाव

हमारे यही चुनाव
होंगे जीवन के लोकत्रंत का उत्सव.

Sunday, March 17, 2019

बाद मुद्दत जो आज इतवार मिला


खोया हुआ एक झुमका मिला
जो जोड़े से बिछड़ कर उदास था कबसे

पीले दुपट्टे पर टंके सुनहरे घुँघरू मिले
जो तुमने तोड़ दिए थे यह कहकर
कि तुम्हारी आवाज ही है घुंघरुओं सी
दुपटट्टे में घुंघरू बेवजह ही तो हैं

बांस की वो पत्ती मिली
जो तुमने टांक दी थी जूड़े में
और मन बांसवारी हो उठा था

रूमाल में बंधा वो मौसम मिला
जिसमें भीगकर सूखते हुए हमने
देर तक देखा था बादलों का खेल

उदास रातों की नमी मिली
जिन्दगी में तुम्हारी कमी मिली

घर की सफाई में कुछ सामान मिला
बाद मुद्दत जो आज इतवार मिला.

Thursday, March 14, 2019

लोक के आख्यानों पर भी केन्द्रित हो हमारे व्याख्यान- जगमोहन चोपता


जगमोहन चोपता सामजिक सरोकारों से जुड़े युवा हैं. पहाड़ में रचे-बसे हैं. उनकी पैनी नजर और संवेदनशीलता नजरिये को विस्तार देती है. चूंकि वो जिया हुआ ही लिखते हैं इसलिए उनके लिखे में उनका जिया, महसूस किया हुआ आसानी से देखा और महसूसा जा सकता है. उनका यह आलेख 'सुबह सवेरे' अख़बार में थोड़ा सा सम्पादित होकर प्रकाशित हो चुका है. 'प्रतिभा की दुनिया' में यह समूचा लेख सहेजते हुए ख़ुशी है. - प्रतिभा 

हम संभवतः गांव की उन आखिरी पीढ़ी में से हैं जिन्होंने अपने बुजुर्गों से खूब सारे किस्से कहानी सुने हैं। हर मौके के लिये हमारे बजुर्गों के खजाने में ऐसे ही आख्यान भरे पड़े होते थे। ये आख्यान पिण्डर नदी के गोल पत्थरों की तरह खूब भारी, चमकीले और सुगढ़ होते हैं। ऐसे पत्थर जिन्होंने पिण्डर नदी के अथाह पानी को बहते देखा है। वर्षों से विपदाओं-आपदाओं से घिसटते-घिसटते जैसे ये पत्थर गोल हो गये हैं वैसे ही लोक की मौखिक परम्पराओं से आते-आते लोक अख्यान भी सुगढ़ और खूबसूरत हो गये हैं। इनमें जीवन जीने का सार है। ये किसी महादेश के संविधान की धाराओं, उपधाराओं, अधिकार, कर्तव्य और निति निर्देशक तत्वों की तरह लगते हैं। 

बस एक फर्क रहता है कि इन आख्यानों के खिलाफ जाने पर कोई दण्ड या अवमानना नहीं होती। लेकिन प्रकृति समय-समय पर अपना दण्ड किसी न किसी प्राकृतिक आपदा के रूप में जरूर देती रहती है। और तब-तब ये आख्यान अपनी सार्थकता और महत्व की ओर याद दिलाते हैं।

आज भी अचानक किसी घटना को देखते हुए ये मुझे लोक के आख्यान याद आ जाते हैं। ये आख्यान मुझे प्रकृति को देखने, समझने और उससे अतःक्रिया की तमीज देते हैं। इनका साथ होना चीजों को देखने समझने के नजरिये को भी देते हैं। ऐसे ही कुछ आख्यानों को आप से साझा कर रहा हूं।

गोपेश्वर से ऋषिकेश आते-जाते ऑल वेदर रोड़ का निर्माण कार्य को देखते रहता हूं। बड़े-बड़े बुल्डोजर पहाड़ को काटकर खूब चौड़ी रोड़ बना रहे हैं। पहाड़ की कटान से आये मलबे को जगह-जगह डंपिग जोन बनाकर डंप किया जा रहा है। आप अगर गौर करेंगे तो देखेंगे कि रोड़ की कटान से निकला अधिकांश मलबा ऐसे बरसाती गदेरों में उड़ेला जा रहा है। जिनमें आजकल बहुत कम पानी या कुछ जगह तो सिर्फ नमी बाकी है। लेकिन जब बरसात में इनमें रवानगी पर होते हैं तो इनमें खूब पानी होता है, तब क्या होगा? जब-जब में सड़क किनारे डंपिग 
जोन के बोर्ड देखता हूं तो मुझे कड़ाकोट चोपता क्षेत्र के बजुर्गों से सुनी कहानी याद आती है। 


एक पहाड़ी गदेरा जो बरसात में विशाल नदी की तरह हो गया है। बड़े अक्कड़ के साथ पिण्डर नदी से अपने बेटे के लिये रिश्ता मांगने जाता है। उसक रौद्र रूप और पानी की विशालता से पिण्डर नदी थोड़ा सकुचाती है। फिर सोचती है कि अभी अगर मना किया तो यह गदेरा उसको तहस-नहस कर सकता है। हां कर दूं तो ऐसे घमण्डी और बरसाती गदेरे के साथ उसकी बेटी कैसे रह गुजर करेगी। काफी सोच-विचार कर पिण्डर नदी कहती है कि आजकल तो बहुत पानी बरस रहा है और फुर्सत ही नहीं है इसलिये आप जेठ के महीने में आइयेगा। शादी खूब धूमधाम से करेंगे। जेठ में जब सारे बरसाती गदेरे सूख जाते हैं या उनका पानी इतना कम हो जाता है कि उनको गदेरा कहना ही बेकार है। ऐसे में जेठ आते ही गदेरा अपना सूखा सा मुंह लिये पिण्डर को ताकते रह जाता है। 

अब आप सोच रहे होंगे मैंने ये कहानी क्यों सुनाई। मैं चाहता हूं कि देशभर के जितने भी इंजिनियरिंग संस्थान हैं वहां के छात्रों को इस कहानी को जरूर सुनाना चाहिए। मेरी माने तो उनके कोर्स में इसको जितना जल्दी हो सके शामिल कर दीजिए। ताकि वे इसके मर्म को समझ पायें कि कोई भी बरसाती गदेरा बरसात में किसी नदी से ज्यादा विकराल हो सकते हैं। जब उन्हें ऐसे पहाड़ी इलाकों में कोई योजना तैयार करनी हो तो वे बरसाती गदेरे की ताकत का आंकलन कर अपनी योजना तैयार करें। अभी आप देख ही रहे होंगे कि ऑल वेदर रोड़ का पूरा मलबा ऐसे ही बरसाती गदेरों में डंप किया जा रहा है। इसका खामियाजा आने वाली बरसात में नदी और उसके किनारे के रहवासियों को भुगताना होगा। तब इसको प्राकृतिक आपदा नाम दिया जायेगा। जबकि यह लोक के उन आख्यानों की अवमानना का दण्ड है जो प्रकृति के नियमों के विपरीत आचरण के लिये मिलेंगे।

कुछ महीनों पहले मैं साथी ठाकुर नेगी के साथ फूलों की घाटी घूमने गया। खड़ी चढ़ाई हमको एक अलग दुनिया की ओर ले जा रही थी। वहां पेड़ों से छट कर आ रही धूप सहलाती रही थी। पेड़ों पर भांति-भांति की पक्षियों का कलरव रोमांचक संगीत जैसा था। पहाड़ी गदेरे से तेजी से बह रहे पानी से उपजा गीत हमको अलग लोक में होने का अहसास दिला रहा था। हम खड़ी चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते इसका आंनद उठा ही रहे थे कि हैलीकैप्टर की गर्जना ने इस पूरे माहौल को ध्वस्त कर दिया। ऐसा लगा जैसे पूरी भ्यौंडार घाटी में कोई युद्ध हो रहा हो। ऐसे में हॉलीवुड की फिल्मों के तमाम दृश्य याद आ रहे थे। लगातार आज जा रहे इन दैत्याकार हैलीकैप्टर की गर्जना में हम ठगे से कहीं गुम हो गये।

वहां पर्यटकों और स्थानीय जनों से बातचीत की तो पता लगा कि इस तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है कि इन गर्जना करने वाले यातायात के मंहगे साधन हैलीकैप्टर से यहां के जीव-जन्तुओं, पहाड़ों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। हां उनके अनुभव जरूर कहते हैं कि अब इस घाटी में पहले की तुलना में पक्षियों का दिखना तेजी से साल दर साल घटता जा रहा है। पहले आपको खूब सारे जंगली जानवर पहाड़ी या गदेरों के किनारे पानी पीते दिख जाते थे जो अब काफी कम ही दिखता है।

ऐसे में मुझे अपने बजुर्गों से सुना किस्सा रह रह कर याद आता है। बुजुर्ग कहते थे कि जंगल में ज्यादा तेज आवाज में बोलना या गाना नहीं चाहिए। ऐसा करने से आंछरी (परियां) हरण कर लेती है। अपनी मौत के डर से जंगलों में चारा-पत्ती या जलावन के लिये जा रही महिलायें और पुरूष को धीरे-धीरे बातचीत या गीत गुनगुनाते थे। इस बात के पीछे जंगल की आंछरियों वाले डर को यदि छोड़ लिया जाय तो इस बात के मूल में जंगलों पर निर्भर इस समाज को वहां की जैविक संपदा और जंगल के पशु पक्षियों की फिक्र ज्यादा दिखती है। आदमियों की चीख पुकार से वे डर सकते थे। जंगल में पशु-पक्षियों का डरना उस क्षेत्र से पलायन का कारण हो सकता था। जिससे फूलों के परागण, नये बीज का इधर उधर बिखेरने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। इससे जंगल बनने और बढ़ने की पूरी व्यवस्था भंग हो सकती थी।
इस किस्से को उन तमाम निर्माण कंपनियों के लिये तैयार हो रहे युवाओं को जरूर सुनाना चाहिए। ताकि वे बड़े-बड़े विस्फोटक से पहाड़ों को खत्म करने से पहले सोच पायें। उन तमाम हेली कंपनियों को अनुमति देने वाले अधिकारियों को जरूर सुनाना चाहिए ताकि वे बर्फिले या जैव विविधता वाले जंगलों के बीच स्थित चार धाम में हेलीकैप्टर की गर्जना के बजाय सहज और सुलभ यातायात का कुछ और रास्ता निकाल पायें।

आप कभी फूलों की घाटी घूमने जाओ तो रास्ते में भ्यूडार नदी के किनारे नदी के मलबे से दबे गांव को देख सकते हैं। किसी दौर में सौ सवा सौ घरों वाले इस गांव में हजार पन्द्रह सौ लोग रहते थे। नदी की बाढ़ के मलबे से यह आधा गांव दब गया। इस भयावह हादसे के बाद गांव के लोग दूसरी जगहों पर बसने को मजबूर हुए। 

क्या आप सोच रहे हैं कि इसको लेकर भी मैंने अपने बुजुर्गों से कुछ सुना है। यदि आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप सही हैं। बुजुर्ग जब-तब कहते थे नदी का बासा कुल का नाशा। यानि नदी के किनारे बसना मतलब अपने कुल का नाश करना। पहाड़ में रिवर बेड ढ़ालदार होने के चलते नदियों का बहाव बहुत अधिक होता है। ऐसे में बरसात के समय नदियों का पानी बढ़ते ही वे किनारे की ओर अंधाधुंध कटाव करती है। नदियों के इस व्यवहार को देखकर ही पहाड़ के बुजुर्गों ने यह लोकोक्ति गढ़ी होगी। इस लोकोक्ति के गढ़ने और हम तक पहुंचने तक की यात्रा में न जाने कितने पहाड़ी गावों के तबाह होने के दर्दनाक अनुभव इसके अंदर समाहित हैं।

नदियों के किनारे अव्यवस्थित बसाहटों के चलते ही उत्तराखण्ड में हर साल हजारों की संख्या में लोग प्रभावित होते हैं। अगर इस आख्यान को हमारे नीति नियंताओं और हमारे राजनेताओं ने सुना और इस पर मनन किया होता तो वे केदार नाथ से लेकर पूरे पहाड़ की नदियों के किनारे बसने पर सख्त रोक लगाते। अगर वे ऐसा करते तो आपदा में केदारनाथ सहित पूरे पहाड़ में हजारों लोगों की जान को बचाया जा सकता था।

भौगोलिक चिंतन का इतिहास को देखे तो इसमें प्रकृति के साथ अन्तःकरण को लेकर तमाम विचार और विचारधाराओं की बात की जाती है। इनमें मुख्य रूप से तीन वाद दिखते है। मनुष्य जब प्रकृति के सानिध्य में था वह उसकी हर घटना के अनुरूप चलता था जिसे विद्यानों ने निश्चयवाद नाम दिया। मानव ने धीरे धीरे तकनिकी विकास के जरिये प्रकृति को अपने वश में करने की। इस कोशिश का परिणाम यह रहा कि उसने प्रकृति का अंधधुध दोहन किया और उसके दुष्परिणाम आज पूरा विश्व भुगत रहा है। आज भी इस तरह की कोशिशे जारी है। 

ऐसे दौर में भूगोलवेता ग्रिफिथ द्वारा सुझाए गए नवनिश्चयवाद का विचार दिया जिसे पर्यावरणीय निश्चयवाद भी कहा जाता है। पूर्णतः आश्रित और अंधाधुध दोहन के बीच नवनिश्चयवाद आज ज्यादा कारगर लगता है। यह सड़क के नियम की तरह रूको, देखो और जाओ जैसी बात है। यानि प्रकृति के साथ समन्वय जहां प्रकृति के विरोध में लग रहा है वहां रूक जाओ और जहां-जहां संभव हो और जो प्रकृतिसम्मत हो वहां काम करो। जिसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर विकास की बात की जा रही है। ऐसा विकास जिसके केन्द्र में सिर्फ मानव नहीं है बल्कि उसके परिवेश में विद्यमान जीव जन्तु और वनस्पति भी है। 

आप इन तमाम आख्यानों को सुनने के बाद कहेंगे कि मेरा ये व्याख्यान तो विकास विरोधी है। पहाड़ को विगत दो दशकों से देखने समझने के अनुभव के आधार पर मैं इन बातों को कहने की कोशिश कर रहा हूं। मैं इस बात को कहने की कोशिश कर रहा हूं कि देश के हर गांव में विकास की किरण पहुंचनी ही चाहिए। लेकिन उस किरण को पहुंचने के रास्ते, साधन और प्रक्रिया क्या हो इस पर सोचा जाना चाहिए। यदि हम विकास को लेकर एंकाकी सोच में फंसे रहे और अन्य जगहों के विकास का मॉडल संवेदनशील पहाड़ों पर भी थोपते हैं तो आप विकास नहीं विनाश के बीज बो रहे हैं।

सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थी होने के नाते में पूर्णविश्वास से कहता हूं कि लोक में व्याप्त इन आख्यानों को यदि हम अपने व्याख्यान या सीखने-समझने की प्रकियाओं का हिस्सा बनाना ही होगा। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम आदिवासियों को उनकी जमीनों से खदेड़ने से पहले ठिठक पायेंगे। हम पहाड़ों को रौंदने वाले इस भवाहव विकास के पहिये को रोकर प्रकृति के साथ सामंजस्य करने वाले अन्य साधनों की ओर देख पायेंगे या खोज पायेंगे। ऐसा करना समय के साथ-साथ इस धरती और यहां के रहने वाले तमाम जीवधारियों के हित में होगा। वरना हम विकास के ऐसे शिखर पर होंगे जहां मानव तो होंगे लेकिन मानवता कहीं नहीं दिख रही होगी।

Tuesday, March 12, 2019

कुछ पैगाम भेजे हैं



फागुनी खुशबू
आम की बौर की बौराहट के साथ
आवारगी के तमाम राग भेजे हैं

नीले पंखों वाली चिड़िया
की आवाज भेजी है
लड़कपन के तमाम सवाल भेजे हैं

साईकल की उतरी हुई चेन
और हाथों में सनी ग्रीस के निशान भेजे हैं
तुम्हारे पीछे भागने की मेरी इच्छा
और तुम्हारे ढूँढने पर छुप जाने के
शरारती खेल भेजे हैं

उतरती शाम के साए तले
अजनबी रास्तों में खो जाने के
ख्वाब भेजे हैं

तुम्हारी कलाई में रक्षा धागे की जगह
खुद को बाँध देने के ख्याल भेजे हैं

मोहब्बत भरे कुछ सलाम भेजे हैं

तुम्हारी उदास आवाज के नाम
कुछ पैगाम भेजे हैं


Wednesday, March 6, 2019

वो शाम अब तक ढली नहीं है


एक रोज जब 
तुम्हारे क़दमों की 
लय से लय मिलाते मेरे कदम 
तय कर रहे थे 
जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफर 
तो आसपास खिल उठा था 
मुस्कुराहटों का मौसम 

वो शाम अब तक ढली नहीं है
वो लम्हे अब तक महक रहे हैं.



Monday, March 4, 2019

बिना तुम्हारी मर्जी


बहुत चुपके से
बैठ जाता है वो
एकदम करीब आकर

पूछता नहीं तुम्हारी रज़ा
न देखता है उम्र
न समय, न हालात

वो जानता है कि तुम्हें
नहीं था उसका इंतज़ार न
बल्कि चिढ़ते ही थे तुम
उसके जिक्र से

फिर भी वो तुम्हारे काँधे से लगकर
एकदम सटकर बैठ जाता है
सामने डूबता सूरज
उगने लगता है तुम्हारे भीतर
कि तुम्हारी पूरी दुनिया बदलने लगती है

डरी सहमी आँखों में साहस तैरने लगता है
उदासी बाँधने लगती है पोटली
लौट आती हैं तमाम
अधूरी ख़्वाहिशें

तुम्हारी 'हाँ' या 'न' की परवाह किये बगैर
वो आता है और
चला जाता है तुम्हें साथ लेकर

हाँ, बिलकुल इसी तरह आता है प्रेम
और ठीक इसी तरह आती है मृत्यु।





Saturday, March 2, 2019

फिर खिले उम्मीद की कोई शाख...


मृत्यु बाहर नहीं घटती, भीतर घटती है. बाहर शोक का शोर घटता है जो एक लय में बढ़ता जाता है फिर शांत होकर सो जाता है. शोर जितना अधिक होता है, शोक उतना क्षीण। इन दिनों शोर बहुत है, मृत्यु का शोक. पूरा देश शोक में है, शोर में भी. शोक को शोर में बदल देने का पूरा कारोबार है. जो शोर में हैं वो दूसरों से पूछते हैं, तुम शोक में नहीं हो? यानी तुम्हें दुःख नहीं? कैसे इंसान हो तुम, इतना कुछ गुजर गया तुम्हें दुःख ही नहीं. लेकिन वो जो शोक में हैं वो शोर में होना नहीं जानते, जानना चाहते भी नहीं. दुःख हमेशा आंसुओं से बड़ा होता है, बहुत बड़ा. मैं शोक और शोर के द्वंद्व के बीच के फासलों को देख रही हूँ.

मैंने इस बरस बहुत सारी मृत्यु को आसपास देखा है. सालों मंडराने के बाद एक दिन चुपके से घट जाते हुए. उसके मंडराने का शोर घट जाने के साथ ही शांति में बदलते देखा है. खुद को नन्हे-नन्हे फिल्म या धारावाहिक के दृश्यों पर सिसकने से न रोक पाने वाली मैं मृत्यु के पलों में बुत ही रही हूँ हमेशा. फिर लम्बा समय गुजर जाने के बाद उस शोक को किसी सूनेपन में टूटते महसूस भी किया है. अजब है न सब. पर सच है. मृत्यु भीतर घटती है, शोक भी भीतर ही घटता है और शोक से लड़ने का साहस भी भीतर ही. फिर बाहर क्या है आखिर? 

मृत्यु ही नहीं जीवन भी भीतर ही घटता है, अन्तस में, भावनाओं के सबसे निजी कक्ष में. बाहर जीवन का विस्तार है, सुख की दशा में ख़ुशी से नाचती बूँदें, दुःख की दशा में प्रकृति का विलाप लगने लगती हैं. जब सब कुछ भीतर है तो इस भीतर के परिमार्जन की कोई बात क्यों नहीं। क्यों बाहर शोर का इतना सारा कचरा है?

अभी हाल ही में एक साथ में काम करने वाले साथी ने अपना जीवन साथी खोया है. कुछ दिन भीतर बाहर का शोर उछाले लेता रहा. भीतर घटती मृत्यु को जीवन में बदल पाने के प्रयास चलते रहे लेकिन मृत्यु घट चुकी थी. साथी जा चुका था. सरहद पर भी बहुत सारी मृत्यु घट रही है, शोर चिता की लपटों के साथ सिमट  जाता है बचता है सिर्फ शोक. गहन शोक. यह शोक शोर से डरता है. संवेदना के शब्दों से घबराता है. 

बाहर बारिश हो रही है. मुझे नहीं पता कि उस गहन शोक में अपने अन्तस के सूनेपन को कोई कैसे संभाल रहा होगा. मुझे नहीं पता कि दुनिया के किसी भी शब्दकोश में ऐसा कोई शब्द है जो भीतर घटते रुदन, अकेलेपन और शोक पर मरहम की तरह रखा जा सके. सबको अपने युद्ध खुद लड़ने हैं, अपना शोक खुद अपने कंधे पर उठाना है. फिर शोर क्यों बरपा है आखिर? 

देश और पड़ोस में कोई फर्क नहीं. दुःख जहाँ है वहां कोई शोर पहुँच नहीं सकता और शोर जहाँ है वहां दुःख कैसे टिकेगा भला? किसी के दुःख का, किसी के प्रेम का, संवेदना का हिसाब माँगना अश्लील है. सच में दुःख में डूबा व्यक्ति न किसी से हिसाब मांगेगा और न ही कोई हिसाब दे सकेगा. 

बाहर बारिश की बूँदें टूट रही हैं, भीतर टूट रहा है मन आहिस्ता आहिस्ता. दुआ है कि जो जहाँ है अकेला, उदास वहां शक्ति का जन्म हो. उसके भीतर फिर खिले उम्मीद की कोई शाख. 

Sunday, February 24, 2019

सुर और शब्दों की संगत ने यादगार बनायी शाम



देश दुनिया के हालात मन बेचैन करने को उतावले थे ऐसे में कुछ पल को कविता की छांव में रख देने को जी चाहा तो 'क' से कविता की 34 वीं बैठक में ठौर मिला. इस बार की बैठक के संयोजन की जिम्मेदारी ली थी सप्तक कॉलेज ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स की निदेशक स्वाति सिंह ने. बैठक हेतु प्रेम और इंसानियत के इर्द-गिर्द कवितायें पढ़ने का मन बना.

बैठक का आगाज़ रमन नौटियाल ने 'क' से कविता की बैठक की शुरुआत से लेकर अब तक की यात्रा और उद्देश्य के बारे में संक्षिप्त जानकारी देने और सभी का एक-दूसरे से परिचय देकर हुआ. कार्यक्रम में रामधारी सिंह दिनकर, कबीर, बशीर बद्र, केदारनाथ सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, अश्वघोष, माखनलाल चतुर्वेदी, गीत चतुर्वेदी, गुलज़ार, पुष्कर, दुष्यंत कुमार, बहादुर शाह ज़फर, सुमित्रानंदन पंत, आशुतोष, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, अकबर इलाहाबादी, नज़ीर, शबीह अब्बास, मज़रूह सुल्तान पुरी, इंदीवर आदि कवियों व गीतकारों की रचनायें साझा की गयीं. अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम भजन भी सुना और पुलवामा के शहीदों को स्मृति नमन भी किया. इस मौके पर नामवर जी को भी याद किया गया. संगीत की संगत थी तो बहुत से गीत तरन्नुम में प्रस्तुत किये गए.
कार्यक्रम में तूलिका, तनिष्का, शैलजा सहित कक्षा 2 में पढ़ने वाले  पार्थ सारथी जैसे नन्हे साथियो ने भी अपनी प्रिय कवितायेँ सुनायीं.

इस बार की बैठक में सतेंद्र शर्मा, हृदयेश जोशी, प्रवीण भट्ट, दीपिका पांथरी, आसिम चौधरी, रिया शर्मा, कुसुम भट्ट, नीरज डंगवाल आदि नए दोस्त भी 'क' से कविता परिवार का हिस्सा बने.


वक़्त खत्म होता जा रहा था लेकिन बैठक समेटने का किसी का मन नहीं हो रहा था. कुछ पल की सही राहत तो थी इस बैठक में और थे ढेर सारे सपने इस धरती को कविताओं से, प्रेम से, सौंदर्य से, संगीत से भर देने के.

गीता गैरोला जी ने सभी साथियों का आभार प्रकट करते हुए आने वाली बैठकों को और बेहतर करने और नए युवा साथियो को जोड़ने की बात कहते हुए कार्यक्रम के समापन की घोषणा की. 

Wednesday, February 13, 2019

मीठी यादों वाली खिड़की और लोक की यादें


- प्रतिभा कटियार

जैसे ही कानों में टकराता है ‘लोक’ शब्द कोई खिड़की खुलती है ज़ेहन में. वो खिड़की जो उम्र के कई बरसों को रिवाइंड करके ले जाती है एक ऐसी दुनिया में जिसमें बचपन सहेजा रखा था. फ्रॉक वाले दिनों की याद, चूल्हा जलाने की जिद, सीखना कुएं से पानी भरने की कवायद, मटके पर मटके रखकर, और एक मटका कमर में टिकाकर, दुसरे हाथ में बाल्टी लेकर बहुत आराम से चलती चाची, बुआ, मौसी, जीजी को हैरत से देखना और जिद करना अपने सर पर भी मटका रखकर चलने की. एक रोज जीजी ने हंसकर छोटी सी मटकी रख दी थी सर पर. आधी ही भरी थी फिर भी घर तक पहुँचते-पहुँचते गर्दन मेले में मिलने वाली गर्दन हिलाने वाली सेठानी की तरह लचक रही थी. उस रोज रास्ता कितना लम्बा लगा था.

ऐसे ही एक रोज खेतों से गठ्ठर लाने की हुमक उठी थी और जिद कि मुझे भी उठाना है गठ्ठर. मौसा जी हंस दिए थे. एक छोटा गठ्ठर रख दिया था सर पर. हालत वही हुई जो पानी की कलशी उठाते वक़्त हुई थी. लोक की उस दुनिया की यादों में नाना के रात भर चलने वाले किस्से अब भी मुस्कुराते हैं. अलाव की खुशबू और उसकी आंच साँसों की ऊष्मा हो मानो.

कटोरी भर अनाज से बदल कर एक छोटी सी डंडी वाली बर्फ खाना, होंठ रंगने वाली टिकिया से नयी दुल्हनों का श्रृंगार होना, हालाँकि लिपिस्टक की आमद होने लगी थी गाँव में तब तक.

ऐसी न जाने कितनी ही यादें हैं जो अब भी बचपन को जियाये हुए हैं. और भी बहुत कुछ है इन यादों में.

दादी के पिटारे में थे लोक के खाने, लड्डू, पापड़, खील, भुना मकई, बाजरा, सत्तू. बाबा की पोटली में थीं कुछ चुनी हुई कहानियां. बाबा को ज्यादा कहानियां नहीं आती थीं लेकिन वो उन्हीं कहानियों को तरीका बदल बदल कर बार बार सुनाते थे. हम बच्चे कटोरे में मकई, खील लेकर पूरे गाँव में घूमते-फिरते थे. ये गांवों के आधुनिकता के पाँव पड़ने से पहले के दिनों की बात है. जब गांवों में गाँव बचा था और बचे थे रिश्तों में रिश्ते.

खेतों और मेड़ों से होकर गुजरा जीवन का रास्ता- हम साल में दो तीन कभी चार बार भी गाँव जाया करते थे. करीब 2 से 3 किलोमीटर का रास्ता पैदल का होता था. सारा रास्ता पिकनिक मनाने सा लगता था. सारे रास्ते कोई नहर साथ चलती रहती. एक तरफ नहर दूसरी तरफ खेत. खेतों में लगी मटर की फलियाँ, चना, कभी साग, कभी गन्ना सब अपना ही तो था. नहर में पाँव डालकर बैठना और बाकियों को नहर में कूद कूदकर नहाते देखना. पूरा गाँव हमें जानता था. आज जैसा नहीं था कि 5 बरस से रहते हुए अपने पडोसी का नाम तक पता न हो. जो भी करीब से गुजरता मेरे गाल खींचता, कहता रसगुल्ला. मेरे गाल फूले होते थे तब और मुझे यूँ गाल खींचने वाले लोग एकदम पसंद नहीं थे. मैं कभी कभी-शीशा देखकर गाल पिचकाया करती थी. कितना हास्यास्पद लगता है यह सब अब. घर पहुंचकर योजनायें बनतीं खेतों का रूख किया जाता, सब मिलकर हरी धनिया मिर्च का नमक, पानी की बाल्टी और एक चादर. कभी साथ में रोटी सब्जी भी. और फिर दोपहरें खेतों में गुलज़ार होतीं. हम लकड़ियाँ बीनते, भुट्टे भूनते, मटर भूनते, आलू भूनते, ज्वार, बाजरे के भुट्टे भूनते, नमक से खाते, पेड़ के नीचे सो जाते. फिर घूमने निकल जाते. इस बीच चाची और जीजी लोग चारा काट लेते या साग तोड़ लेते. दादी बहुत तेज़ साग तोड़ती थीं. एक ख़ास तरह साडी का पल्ला बनाया जाता जिसमें तोड़कर साग डाला जाता.

इसके अलावा बारियाँ भी थीं जिनमें सब्जियां उगाई जाती थीं जो शाम को क्या बनेगा के आधार पर तोडा जाता. हम बच्चे कभी-कभी बड़ों की ऊँगली छुड़ाकर भाग निकलते और बागों का रुख करते. कैथा, अमरुद, इमली, बेर तोड़ते, खाते कम, जमा ज्यादा करते.

तालाबों के किनारे तितलियाँ पकड़ते, गन्ने के रस को पीने से ज्यादा उसके निकाले जाने को देखने का सुख था. धान उड़ाया जाता जहाँ वहां का दृश्य अपलक देखते. वापस लौटकर जाने पर जीवन से भरे जीवन के वो दृश्य अब धूमिल पड़ते नज़र आते हैं. उन यादों में अब आधुनिकता के तमाम मुलम्मे चढ़ गए हैं. ढूंढती हूँ गाँव में अपना बीता हुआ बचपन.

कुएं, तालाब, नहरों के किस्से- कुँए बहुत से थे गाँव में. एक कुयाँ एकदम घर के सामने था. लेकिन उस कुँए का पानी मीठा नहीं था. उससे दाल नहीं पकती थी. साबुन साफ़ नहीं होता था. तो सामने वाले कुँए का पानी रोज के ऊपरी खर्च के लिए भरा जाता था और बाकी पानी के लिए मीठे कुँए का रूख किया जाता. पानी भरने का जयादा काम स्त्रियों के हिस्से ही होता था. कभी कभार चाचा लोग पानी भरते थे. लेकिन उनके पानी भरने का वक़्त अलग होता था. सुबह और शाम का वक़्त स्त्रियों का था. जिसमें भाभियाँ, चाचियाँ, जीजी, बुआ वगैरह जाया करती थीं. पानी भरने जाना एक उत्साह जनक समय था जिसकी पूरी तैयारी होती थी. खासकर शाम के वक़्त. घंटे भर पहले से स्त्रियाँ तैयार होना शुरू करती थीं. कलशियाँ चमकाई जाती थीं. घूँघट एकदम नपा होता था. कुँए की जगत पर खिलखिलाहटों का चुहलबाजियों का रेला लगा होता. पानी की कलशी घुड्प करके कुँए में डूबती, फिर गिर्री पर चढकर उसे खींचा जाता. मुझे यह सब खेल लगता था. लेकिन जब भी मैंने पानी खींचने की कोशिश की मुझसे हुआ नहीं. जीजी कहती ‘तू खुद ही कुँए में लुढक जायेगी.’ मुझे कुँए से दूर रहने को कहा जाता. मैं दूर बैठकर इन सबकी हंसी ठिठोली देखा करती. किसी नयी बहू के कुँए पर आने की रस्म भी गजब थी. खूब सज धज के वो कुँए पर जाती. पानी भरती. उसकी निगरानी करती ननद की हवलदारी.

ऐसा ही नहर किनारे जाने पर हुआ करता था. दिन के काम निपटाकर कभी नहर में कपडे धोने के बहाने निकलती टोली. हंसी के बगूले उड़ाती, नहर की धार से होड़ लगाती जिन्दगी.

त्योहारों की आमद और उड़ती एक खुशबू- स्मृतियों की खिड़की जब खुलती है तो उसमें पकवानों की खुशबू और त्योहारों की रंगत भी खुलती है. हर त्योहार पर खेत, कुँए, नहर, नदियाँ, पेड़ों को पूरा महत्व मिलता था. जानवरों को खूब रगड़-रगड़ कर नहलाया जाता. उनके शरीर पर रंगों के गोले बनाकर उन्हें सजाया जाता. उनके गले के लिए नयी प्यारी-प्यारी घंटियाँ लाई जातीं. उनके रहने की जगहों की ख़ास साफ़-सफाई की जाती. रंगों और रौशनी से उन्हें सजाया जाता.

घरों में पकवानों की खुशबू उडती जो पूरे गाँव में उड़ती फिरती. सुख दुःख साझा होते थे सबके. पकवान किसी के भी घर के हों, स्वाद सबके साझे होते थे. या तो मेरी बचपन की स्मृतियों में वर्ग भेद या जाति भेद है नहीं या उस लोक में जिसमें ये स्मृतियाँ बनीं उसमें वो थे नहीं क्योंकि मैंने हमेशा सबको एक-दूसरे के सुख-दुःख में साझा खुश होते और उदास होते ही देखा.

दीवाली में सबके घर के पकवान एक-दूसरे के घर जाते, छोटे लोग बड़ों से आशीर्वाद लेने जाते. पकवान चखते, बच्चे चहकते. होली में रंगों की टोली निकलती. स्त्रियों की अलग, बच्चों की अलग, पुरुषों की अलग. फाग गाई जाती. ढोलकी बजती, मंजीरा बजता. खुशबू वाले रंग उड़ते और गुझिया, पापड़ का स्वाद सजता. जैसे पूरा गाँव एक ले में एक सुर में बंधा हुआ. उन स्मृतियों में कहीं भी दिखावा नहीं था. सब कुछ जैसा था, वैसा ही था. सहज और मिठास भरा. बिलकुल लोक की भाषा की तरह.

बचपन के खेल- बहुत सारे खेल हुआ करते थे उन स्मृतियों में. हम सब बच्चे, सब माने सब. हर जाति वर्ग के बच्चे सब साथ खेलते थे. किसी की कोई हेकड़ी नहीं चलती थी. लेकिन एक बात याद है जरूर उन खेलों की याद के साथ जितनी आसानी से हम अपने घरों से निकल जाते थे खेलने उतनी आसानी से सारे बच्चे नहीं निकल पाते थे, खासकर लड़कियां. उन्हें खेलने के लिए निकलने से पहले जल्दी जागकर घर के काम निपटाते होते थे ताकि खेलने की मनाही न हो. कुछ को खेतों में भी काम करना होता था. कभी काम रह जाता तो वो डांट भी खाया करते थे. कभी-कभी जब हम उनका हाथ बंटाने लगते ताकि वो जल्दी से काम से आज़ाद होकर खेल सकें तो उनके माँ बाप उन्हें डांटते थे कि ‘हमें’ काम क्यों करने दिया. उस वक़्त उस डांट का मतलब समझ में नहीं आया था, अब आता है. बहरहाल लोक के उन खेलों में पोसम्पा से लेकर छुक छुक चलनी, आइस, पाइस, छुपम छुपाई, ऊंचा नीचा गिलास, खो खो सब शामिल होता था. और सोचिये, छुपम छुपाई की रेंज थी पूरा गाँव. कभी कभी तो हम छुपे ही रह जाते और बच्चे खेल ख़त्म करके घर चले जाते. सच्ची, बड़ा बुरा लगता था उस समय तो.

विवाह, लोक गीत और कहावतें- लोक की यादें खुलें लोक के गीतों की खुशबू न बिखरे ऐसा भला कहाँ संभव है. मौका विवाह का हो या बाल बच्चा होने का या रोजमर्रा का जीवन. विवाह के दौरान बन्ना बन्नी, मंडप जिसे मडवा कहा जाता था, पूड़ी बेलने के गीत, चक्की के गीत, कुँए से पानी भरने के गीत, विदाई गीत, गाली गीत सब, नकटा गीत सब तो गाये जाते थे. फसलों के गीत, खेत में रोपाई के गीत, मौसमों के गीत, खेल गीत, श्रृंगार गीत क्या-क्या नहीं होता था. ऐसा मालूम होता था कि हर अवसर के लिए कोई गीत था. ऐसा ही हाल था मुहावरों का. माँ नाना जी, मौसियाँ, चाचा, बुआ इन सबके पास जैसे खजाना था मुहावरों का. माँ ज्यादातर बात मुहावरों में करती थीं, अब भी करती हैं. उन मुहावरों की मिठास जीवन की सबसे मीठी बात लगती है. विवाह के मौके पर किये जाने वाला नकटा भी खूब याद है जिसे विवाह के मौके पर बारात जाने के बाद (जिसका अर्थ होता है समस्त पुरुषों का जाना) रात भार जागकर किय जाता था. इसमें कुछ स्त्रियाँ ही पुरुषों का स्वांग करती थीं. हंसी मजाक के लहजे में सारी रात नाटक होते. इनमें स्त्रियाँ अपने भीतर का तमाम अवसाद भी निकालती थीं ऐसा मुझे अब लगता है.

शब्दों का सफ़र- सोचती हूँ तो उन स्मृतियों में कितने सुंदर शब्द हुआ करते थे जिनकी अब सिर्फ यादे हैं. नाना जी अमरुद को हमेशा बिहीं कहा करते थे. कुँए से पानी निकालने वाली रस्सी को उघानी कहा जाता था और ताला चाबी को कुलुप और उघन्नी कहा जाता था. हम बाबा और नाना को नन्ना कहा जाता था. बिट्टा, लल्ला जैसे रस में भीगे हुए लगते थे. ‘बिट्टा तुम किते जाय रई’ अगर कहीं से कोई पूछ ले तो लगता है निष्प्राण होती देह में रक्त संचार बढ़ गया हो. यह है लोक से जुड़े अपनेपन की ऊष्मा का असर.

आज यह लोक की याद क्यों – अजीब लग सकता है कि अब जब कि समय इतना बदल चुका है तो इस सब को याद करने की क्या वजह हो सकत है भला. लोक की ताकत को क्या हम स्कूली शिक्षा से उस तरह से जोड़ पा रहे हैं जैसा उसे जुड़ना चाहिए था. अगर जोड़ पा रहे हैं तो बहुभाषिकता को समस्या की तरह देखा क्यों जा रहा है, उसे संसाधन की तरह क्यों नहीं देखा जा रहा है. दूर देश में अपनी बोली अपनी भाषा के दो शब्दों के छींटें अगर कान में पड़ते ही सुकून महसूस होता है तो उसी बोली भाषा को कक्षा में वो स्थान क्यों नहीं मिल सकता.

देहरादून के एक प्राथमिक स्कूल का अनुभव याद आता है जहाँ शिक्षिका ने साझा किया कि एक छत्तीसगढ़ का बच्चा आया था स्कूल में. वो कई महीनों तक बोलता ही नहीं था. क्योंकि उसे सिवाय छतीसगढ की भाषा के और कुछ बोलना आता ही नहीं था. और जब वो बोलता था कक्षा के बाहर भी तो उसके साथी उसका मजाक उड़ाते थे. कक्षा में भी वो इस डर से चुप ही रहता था, डरा हुआ खामोश.

राजस्थान में एक शिक्षक ने ऐसा ही अनुभव साझा किया जहाँ वो बच्चों से उनकी लोक की भाषा में ही संवाद किया करते थे जिसे सुनकर एक बारगी लोगों को लगता कि बच्चे अपने शिक्षक का सम्मान नहीं कर रहे. जैसे कि बच्चे बोलते, ‘मास्टर तु म्हाने ठीक तरया स्यूं पढ़ा कोनी रयो आ बात समझ म कोनी आ री’. मास्टर को पता था कि इस बोली में बच्चों से संवाद के ज़रिये उसने दिल में जगह बना रखी है जिसमें सम्मान की तासीर इतनी गाढ़ी है कि उससे ज्यादा कुछ हो ही नहीं सकता.

लोक की इसी ताकत को एनसीएफ ने कक्षाकक्ष और कक्षा शिक्षण की ताकत बनाने की बात भी कही. यह बात लोक के सम्मान और प्यार को सहेजने की बात है. सभ्य होने की की दौड़ में लोक से दूरी बननी कब और कैसे शुरू हो गयी पता नहीं लेकिन यह जरूर महसूस होता है कि इस दूरी ने जिन्दगी का मीठापन चुरा लिया है. जिन स्मृतियों की छुअन भर से झुरझुरी होती है उस लोक की भाषा उसकी संस्कृति उसकी ताकत को यूँ ही तो नहीं जाने दे सकते.

(अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन से प्रकाशित पत्रिका प्रवाह में प्रकाशित)

Monday, February 11, 2019

राजनीति से दूर रखने की राजनीति


- प्रतिभा कटियार

नई बहू आई थी घर में, गाँव में. बच्चों में बहू को देखने का चाव था कि जरा घूँघट हटे और एक झलक मिले. बडी-बुजुर्ग महिलाओं और जवान ननदों की यह चिंता कि घूँघट कहीं हट न जाए. नयी बहू का उत्साह रसोई में तरह-तरह के व्यंजनों में, साज-श्रृंगार में छलकता रहता. इसी बीच आ गए चुनाव और नयी बहू का वोट इसी गाँव में पड़ना तय हुआ. घर में ही नहीं पूरे गाँव में एक पार्टी, एक नेता की लहर थी. सोचने-समझने की कोई गुंजाईश किसी के लिए थी ही नहीं. महिलाएं भी वोट डालने के उत्साह में थीं. उसी जगह वोट डालने के उत्साह में जहाँ डालने को घर के मर्दों ने कहा था. नयी बहू ने अपनी ननद से पूछा, ‘दीदी आप किस पार्टी को वोट दोगी?’ ननद ने इतराते हुए कहा, ‘जहाँ सब घर के लोग डालेंगे.’ ‘सब लोग यानि सब आदमी?’ बहू ने पूछा, ‘हाँ, तो और क्या? अम्मा, चाची, ताई सब वहीँ डालते हैं.’ ‘लेकिन क्यों? वो पार्टी महिलाओं के लिए क्या करने वाली है?’ ‘ऐ भाभी, इत्ता न सोचते हम, ये सब सोचना हमारा काम नहीं. भैया, चाचा लोग कुछ गलत थोड़ी न कह रहे होंगे.’ भाभी कुछ समझती इससे पहले देवर जी पर्ची लेकर आ गये और सबको समझाने लगे किस तरह वोट देना है, कौन से खाने में मुहर लगानी है. नई बहू ने कुछ कहना चाहा तो उसको समझाया गया ‘तुम नयी हो अभी, यही कैंडीडेट ठीक है यहाँ के लिए. सवाल न करो, जल्दी चलो वोट देने.’ बहू ने सोचा कि उसका वोट तो उसका है, वो तो वहीँ डालेगी जहाँ उसे डालना है. लेकिन जब वो पोलिंग बूथ पर पहुंची तो पता चला उसका वोट पड़ चुका था.

यह किस्सा 2014 के चुनाव का है और एकदम सच्चा है कि मैं उस बहू को करीब से जानती हूँ. यही वजह है कि कितने प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाला इन आंकड़ों को देख मैं खुश नहीं हो पाती. आंकड़ों में शामिल वो बहू भी तो है हालाँकि उसने तो वोट भी नहीं डाला था, आंकड़ों में वो ननद और सास भी हैं जिन्होंने घर के मर्दों की मर्जी से वोट दिया, जहाँ वो चाहते थे. उदाहरण भले यह एक हो लेकिन ऐसी महिलाएं बहुत हैं.

राजनीति पर बात करना महिलाओं को क्यों पसंद नहीं होता होगा, क्यों साड़ी, चूड़ी और व्यंजन की बात करना उन्हें पसंद होता होगा. क्योंकि दूसरों की बात मान लेने की आदी महिलाओं की पसंद नापसंद भी एक ख़ास ढांचे में ढाला गया. उन्हें जानबूझकर राजनैतिक हस्तक्षेप से दूर रखा गया. उस वक्त जब उनके सौन्दर्य की प्रशंसा, पकवान के स्वाद की तारीफ की जा रही थी, उन्हें समर्पण की देवी कहकर भरमाया जा रहा था ठीक उसी वक़्त देश दुनिया की राजनीति के दाँव-पेच चले जा रहे थे.

उन्हें सवाल न करना सिखाया गया और सवाल न करने, बात मानने वाली महिलाओं के लिए तमगे गढ़े गए और बदले में उन्हें एक कम्फर्ट जोन भी परोसा गया. घर में होने वाले राजनैतिक डिस्कशन्स के दौरान चाय देकर सीरियल देखने का या सब्जी बनाने का, होमवर्क कराने का कम्फर्ट. कभी तो घर के किसी सूने कोने में रो लेने का कम्फर्ट भी. कितनी गहरी राजनीति थी यह महिलाओं को राजनैतिक चर्चाओं से, भागीदारी से दूर रखने की. ‘तुम परेशान मत हो, मैं संभाल लूँगा सब’ कहकर कितनी ही महिला सीट के लिए चयनित ग्राम प्रधानों की मुश्किल हल की है उनके घर के पुरुषों ने. उस वक़्त भी चुपचाप हर बताई गयी जगह पर हस्ताक्षर करती जाती स्त्रियाँ क्या सच में कुछ नहीं सोचती होंगी.

महिलाएं अब भी सॉफ्ट टारगेट हैं, उनसे (सबसे नहीं) वो लिखवाया जा रहा है जो लिखवाया जाना पहले से तय है, वो बुलवाया जा सकता है, जो सबको सुनना अच्छा लगता है, उनसे वो करवाया जा सकता है जिसकी पितृसत्ता को जरूरत है. महिलाओं का अपनी चुनौतियाँ, अपना गुस्सा, अपना सुख-दुःख साझा करने वाला कोई समाज बनने ही नहीं दिया गया.

वोटर होना उनकी राजनैतिक भागीदारी की शुरुआत बने यह होना अभी बाकी है. पति के नाम उसकी राजनैतिक सत्ता सँभालने के लिए रबर स्टैम्प बनने से इंकार करना बाकी है, पंचायतों में सिर्फ महिला सीट होने की वजह से उनके नाम का इस्तेमाल हो जाने और खुद को कठपुतली की तरह काम करने से रोकना अभी बाकी है. बाकी है अपनी डिग्रियों को किनारे रख अपनी शिक्षा को असल शिक्षा में तब्दील करना और सोचना खुद से, खुद के लिए. बाकी है हिम्मत से सामना करना बाहर निकलने पर आने वाली मुश्किलों का सामना करना. बाकी है धता बताना है उन तमाम चालाकियों को जो सुरक्षा और सुविधा के नाम पर उनका रास्ता रोके हैं.

राजनीति में शामिल होकर ही राजनीति का शिकार होने से बचा सकता है. सिर्फ वोट देने, इलेक्शन लड़ने से, ऊंचे पद हासिल करने भर की बात नहीं है यह, महिलाओं को अपनी शक्ति और अपनी जरूरत को महसूस करना होगा और उसके लिए लड़ना भी सीखना होगा.

इसकी शुरुआत आने वाले चुनाव से की जा सकती है सिर्फ वोटर बनने की नहीं जागरूक वोटर बनने की जरूरत है. राजनैतिक विमर्श में शामिल होना, तमाम पार्टियों के घोषणापत्रों को ठीक से पढ़ना, उनके इरादों को भांपना और तय करना एक ठीक उम्मीदवार. अगर नहीं है कोई उम्मीदवार मन मुताबिक तो ‘नोटा’ है न? लेकिन अब महिलाओं की भागीदारी के आंकड़ों को असल में महिलाओं की भागीदारी में ही बदलने का वक़्त आ गया है. महिलाओं को राजनीति से दूर रखने की राजनीति को अब समझना भी होगा और उस राजनीति का शिकार होने से खुद को बचाना भी सीखना होगा.

Saturday, February 9, 2019

उगना बसंत का





एक कवि को उसकी कविता के लिए
भेज दिया जाना सीखचों के पीछे
खुलना है उम्मीदों की पांखे
कि बची है कविता में कविता
और भागते-दौड़ते जिस्मों में
बची ही जिन्दगी भी

नजरबंद किया जाना लिखते-पढ़ते लोगों को
ऐलान है इस बात का कि
नज़राना हैं ऐसे खूबसूरत लोग दुनिया के लिए
कि उनमें बचा है हौसला
सच लिखने का

गुम हुए युवा बेटे को ढूंढती माँ की धुंधलाती नज़र
उसे मिलने वाली धमकियां
सड़कों पर मिलते धक्के
बताते हैं कि कितना डरा हुआ है
सत्ता का चेहरा
और उतना ही है बेनक़ाब भी

परोसी गयी हर बात पर भरोसा करती
बिना सोचे समझे व्यक्ति से भीड़ बनती
और क्रूर खेल में शामिल होती जनता
गवाही है इस बात की
कि शिकार वही है सबसे ज्यादा
उसी सत्ता की जिसके वो साथ है

अपना ही मजाक उड़ाते चुटकुलों को फॉरवर्ड करती
उड़ाती अपना ही परिहास
कैद करती खुद को खुद की मर्जी से
त्याग, समर्पण और देवी जैसे शब्दों के कैदखानों में
ये स्त्रियाँ
सदियों पुरानी पितृसत्ता की साजिश का आईना हैं

इन सबके बीच
पंछियों का लेना बेख़ौफ़ ऊंची उड़ान
बच्चों की आँखों से छलकना उम्मीद
उनका यकीन करना प्रेम पर
मानना बसंत का उत्सव
उगना है बंजर ज़मीन पर नन्ही कोंपलों का...

Saturday, February 2, 2019

देखो न कितना सुर्ख इतवार उगा है आज



धूप बिखरी हुई है हथेलियों पर
देर तक सोयी आँखों से
ख्वाब झरे नहीं अब तक

चाय की तलब और आलस में लगी है होड़
शोर है बच्चों और पंछियों का
शरारतें हैं

पिछले बरस जब बर्फ गिर रही थी इन दिनों
तुम साथ थे
इस बरस भी पहाड़ियां लिपटी हैं
नगीने जड़ी सुफेद चादर में
बर्फ बन बरस रही है तुम्हारी याद उन पर
सुना है कई बरसों के रिकॉर्ड टूटे हैं

देखो न कितना सुर्ख इतवार उगा है आज.

Friday, February 1, 2019

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा



'मुझे कहानियां लिखना नहीं आता'
'तो कहानियां लिखता ही क्यों है तू, सच लिखा कर...'

- 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' से

'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' में एक बार फिर राजकुमार राव ने अपने अभिनय कौशल का मुरीद कर लिया. लेखक की भूमिका में राजकुमार जैसे खिल रहे थे. उनकी मुस्कुराहट बड़े परदे पर रौशनी की तरह बिखरती है. अजीब बात है कि मेरे लिए यह फिल्म थी तो अनिल कपूर जूही चावला की लेकिन बन गयी राजकुमार राव और फिल्म की लेखिका गज़ल धालीवाल की. स्क्रिप्ट जितनी मजबूत थी उसे निभाया भी उसी जतन से गया है. अनिल कपूर खाना बनाने को लेकर जिस तरह पैशनेट हैं और बार बार कहते हैं कि बनना तो वो इण्डिया के नम्बर वन शेफ चाहते थे लेकिन बना बिजनेसमैन दिए गए...के भीतर कई सवाल खुलते हैं. एक तो ये अपने मन का कुछ करना हो तो नम्बर वन जाने क्यों चिपक जाता है साथ में. बिना नम्बर रेस के भी होती है न जिन्दगी शायद अभी वहां तक पहुंचना बाकी है. फिल्म जटिल विषय के साथ पूरी संवेदनशीलता से पेश आती है. यह प्रेम कहानी है. विशुद्ध प्रेम कहानी. अब तक गरीब अमीर, हिन्दू मुसलमान, प्रेम यही प्रेम की अडचनें होती आई हैं फिल्म के विषयों में लेकिन इस बार बात थोड़ी अलग है. यह अलग बात पहले भी फिल्मों में आ चुकी है, अलीगढ़, फायर, दोस्ताना जैसी फ़िल्में बनी हैं लेकिन इस फिल्म ने अलग जानर की फिल्म बनकर न रह जाने की बजाय आम पब्लिक की फिल्म बनने की राह चुनी है. शायद इसके जरिये बात दूर तक जाय. फिल्म मुझे अच्छी लगी, जरूरी भी लगी. सबसे अच्छे लगे राजकुमार राव.

Saturday, January 26, 2019

कहीं खो तो नहीं गया बतौर शिक्षक हमारा सुख


‘और देखते-देखते रास्ते वीरान, संकरे और जलेबी की तरह घुमावदार होने लगे थे. हिमालय बड़ा होते होते विशालकाय होने लगा. घटायें गहराती-गहराती पाताल नापने लगीं. वादियाँ चौड़ी होने लगीं. बीच-बीच में करिश्मे की तरह रंग-बिरंगे फूल शिद्दत से मुस्कुराने लगे. उन भीमकाय पर्वतों के बीच और घाटियों के ऊपर बने संकरे कच्चे-पक्के रास्तों से गुजरते यूँ लग रहा था जैसे हम किसी सघन हरियाली वाली गुफा के बीच हिचकोले खाते निकल रहे हों. इस बिखरी असीम सुन्दरता का मन पर यह प्रभाव पड़ा कि सभी सैलानी झूम-झूम कर गाने लगे, ‘सुहाना सफर और ये मौसम हंसी...’ पर मैं मौन थी. किसी ऋषि की तरह शांत थी. मैं चाहती थी कि इस सारे परिदृश्य को अपने भीतर भर लूं. मेरे भीतर कुछ बूँद-बूंद पिघलने लगा था. जीप की खिड़की से मुंडकी निकालकर मैं कभी आसमान को छूते पर्वतों को देखती तो कभी ऊपर से दूध की धार की तरह झर-झर गिरते जल प्रपातों को. तो कभी नीचे चिकने-चिकने गुलाबी पथ्थरों के बीच इठला-इठला कर बहती चांदी की तरह कौंध मारती बनी-ठनी तिस्ता नदी को. सिलीगुड़ी से ही हमारे साथ थी यह तिस्ता नदी. पर यहाँ उसका सौन्दर्य पराकाष्ठा पर था. इतनी खूबसूरत नदी मैंने पहली बार देखी थी. मैं रोमांचित थी. पुलकित थी. चिड़िया के पंखों की तरह हल्की थी. ‘

- साना साना हाथ जोड़ी से – लेखिका- मधु कांकरिया

इन दिनों मैं दसवीं में पढ़ रही हूँ, अपनी दसवीं में पढने वाली बिटिया के साथ. हाल ही में उसने मुझे हिंदी के एक पाठ 'नौबतखाने में इबादत' पाठ को लेकर कहा, सिर्फ यही मुझे एकदम बोर लगता बाकी सब अच्छे हैं. इसके पहले यही बात उसने 'साना साना हाथ जोड़ी' को लेकर भी कही थी. कुछ दिनों पहले ‘मैं क्यों लिखता हूँ’ के बारे में भी.

मुझे अपने स्कूल के दिन याद आते हैं उसकी ऐसी बातें सुनकर. दुःख है कि मेरे जीवन में साहित्य या कुछ भी स्कूल में या कॉलेज में पढने से नहीं आया. जिन हिंदी की कविताओं को घर में खुद पढ़ने में सुख होता था वही पाठ वही कवितायेँ स्कूल में शिक्षिका द्वारा पढाये जाने पर भारी बोझ सी लगने लगती थीं. ऐसा और विषयों में भी हुआ ही. मैंने बिटिया से कहा जो पाठ तुमको बोर करते हैं वो दिखाओ, उसने मुझे पाठ दिखाए तो मेरा चेहरा खिल उठा. 'साना साना हाथ जोड़ी' मधु कांकरिया जी का लिखा यात्रा वृतांत है और 'नौबतखाने में इबादत' यतीन्द्र मिश्र द्वारा लिखा संस्मरण और प्रिय कवि अज्ञेय का लिखा पाठ ‘मैं क्यों लिखता हूँ’ था.

मैंने बिटिया की समस्या का कोई हल नहीं किया सिवाय इसके कि जब वह हल्के-फुल्के मूड में होती उसके साथ मिलकर इन पाठों को मन से पढ़ा. 'साना साना हाथ जोड़ी' पढ़ते हुए गंगटोक और सिक्क्किम की यात्राओं के बहाने हमने न जाने कितनी यात्राएँ कीं, कितनी ही यात्राओं को फिर से महसूस किया, पिंडर, झेलम, नर्मदा, बेतवा नदियों को तिस्ता के बहाने याद किया. भाषा की सुन्दरता को महसूस किया, लेखिका के मन की स्थिति को समझा. ठीक यही हुआ 'नौबतखाने में इबादत' को पढ़ते हुए. बिस्मिल्ला खां के बारे में पढ़ते हुए बनारस शहर का जिक्र जिस तरह आता है कि कचौड़ियों की खुशबू देहरादून में महसूस होने लगती है. एक सही सुर के लिए बिस्मिल्ला खां साहब की तलब, उनकी सादगी, विनम्रता, फटी लुंगी का किस्सा और उनके जन्म शहर डुमरांव की नरकट घास तक का जिक्र पाठ के लिए मोहब्बत जगाने में पूरी तरह कामयाब है. अज्ञेय का 'मैं क्यों लिखता हूँ' पढ़ते हुए भी कुछ ऐसे ही हालात बने. लिखना किस तरह आंतरिक विवशता से होता है इस बात को उसने खूब अच्छे से समझा और अक्सर मुझे लिखते देख हंसकर कहती, 'नानी अभी मम्मा को आंतरिक विवशता आ रही है.'

हम माँ बेटी ने इन पाठों का आनन्द लिया. अभ्यास प्रश्नों की ओर हमने देखा भी नही. मुझे यकीन है कि जिस तरह उसने पाठ को समझा है उसके लिए कोई प्रश्न मुश्किल नहीं होगा.

मुझे यह प्रसंग इन दिनों इसलिए भी याद आ रहे हैं कि इन इनों उत्तराखंड में चल रहे सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण में शिक्षकों के साथ संवाद में हूँ. जहाँ शिक्षक कई बार किताबों में ज्यादा कोर्स होने, पढ़ाने के दौरान आने वाली चुनौतियों के बारे में बात करते हैं, समय की कमी, बहुत सारे काम करने होते हैं की बात करते हैं. मुझे इन सब समस्याओं का एक ही हल दिखता है कि क्यों शिक्षण के इस खूबसूरत काम को अपना आनन्द बना लिया जाए. जब तक पढाना पहले पढना नहीं होगा, खुद का आनंद नहीं होगा तब तक ये खूबसूरत पाठ काम के बोझ से लगते रहेंगे. फिर यही बोझ बच्चों को भी ट्रांसफर होगा. होता ही है.

जिन पाठों को पढ़ते हुए जिन्दगी से जुड़ा जा सकता था, उन्हें पढ़ना बच्चों को और पढाना शिक्षकों को बोझ लग रहा है. शायद मेरी बेटी को हिंदी पढ़ाने वाली शिक्षिका ने भी अपनी नौकरी की पूर्ति के तौर पर पाठ पढ़ाया होगा. तो भला दिल से लिखे गये ये खूबसूरत पाठ बच्चों के दिल में किस तरह उतरते जब वो शिक्षक के दिल में ही नहीं उतरे. बाकी विषयों के बारे में यकीन से नहीं कह सकती लेकिन भाषा के संदर्भ में जरूर लगता है कि भाषा चाहे हिंदी हो, अंग्रेजी या कोई और उसका कनेक्शन सीधे दिल से होना जरूरी है. दिल से रिश्ता न होगा तो भाषा अपने पेचोखम में उलझा लेगी, जो लिखा गया है उसकी भावभूमि तक पहुंचना मुश्किल ही होगा.

एनसीईआरटी ने बेहद खूबसूरत किताबें बनायी हैं, इन्हें पढ़ना एक सुख है, जाहिर है इन्हें पढ़ाना भी सुख होना चाहिए. अगर यह काम हो रहा है, सुख नहीं तो जरूर हमने पढ़ाने से पहले अपने पढ़ने के सुख को खो दिया है. आइये, पहले अपने सुख को तलाशें.

Saturday, January 12, 2019

जरा तुम अपना हाथ देना


सखि, जरा तुम अपना हाथ देना
तुम भी, अरे तुम भी
अम्मा तुम भी, ताई तुम भी
मौसी तुम भी, चाची तुम भी
बहना तुम भी, सासू माँ तुम भी
देवरानी प्यारी तुम भी
जेठानी हमारी तुम भी
जरा अपना हाथ देना.

मैडम जी आप भी देना तो जरा
अरी कमला, विमला तुम भी
घर के काम छोड़ो न कुछ देर को
बस जरा तुम अपना हाथ देना
ओ नन्ही गुड़िया तुम भी दो न अपना हाथ
मैडम एमएलए जी,
एनजीओ वाली मैडम/दीदी
बाद में बताना समाज कैसे बदलेगा वाली बात
अभी अपना हाथ दो न जरा.

कलक्टर मैडम आप भी
अरी ओ छोरियों
ब्वायफ्रेंड से लड़ लेना बाद में
अभी तो जरा आपना हाथ देना
ओह,सुनीता दर्द में हो तुम बहुत
तो हम आयेंगे तुम्हारे हाथ में अपना हाथ देने
आँखों में भरे हैं तुम्हारे आंसू
तो उन्हें उठाएंगे अपनी पलकों पर
बस कि तुम्हारी हथेलियों का
हमारी हथेलियों में होना जरूरी है इस वक़्त

कोई बहुत बड़ी लड़ाई नहीं है ये
एक दूसरे की हथेलियों में हथेलियाँ देकर
महसूस करना है अपनी ताकत
यह साथ में होना
है हमारे होने की बात
अपने ख्वाबों को एक-दूसरे की हथेलियों में
सुरक्षित रख लेने की बात

ईश्वर तो एक बहाना है
असल में तो खुद को पाना है...

#सबरीमाला

Thursday, January 3, 2019

एक लम्हे में अपना बना लेता है उदयपुर


दिन इतनी तेज़ी से भाग रहे थे कि भागते-भागते हांफने लगे थे. दो घड़ी ठहरकर सांस लेने लगते तो रफ्तार कम हो जाती और लगता कि कितना कुछ छूट गया है. कोई काम, कोई जिम्मेदारी मुंह बिसूरने लगती. ऐसे ही भागते दौड़ते दिनों में कानों से टकराया था उदयपुर का नाम. जैसे जेठ की चिलचिलाती धूप में ठंडी हवा का एक झोंका छूकर गुजरा हो. न किसी ने मुझे पहले से उदयपुर के किस्से सुनाये थे, न मैंने साहित्य के किसी टुकड़े को पढ़ते हुए इस शहर से राब्ता बनते महसूस किया था. इतिहास पढ़ते हुए शायद गुजरा था यह नाम बिना किसी एहसास के सिर्फ एक चैप्टर की तरह. फिर क्या था ऐसा उस रोज इस नाम में कि दिल की धडकनों को थोड़ा सुकून आया. हालाँकि यह कोई यात्रा नहीं थी, सिर्फ गुजरना भर था वहां से होकर लेकिन जाने क्या था कि दिल को राहत मिल रही थी. जैसे कोई अजनबी इंतजार में हो, जैसे किसी अनकहे में भरा हो जीवन भर का कहा, जैसे किसी के काँधे पर टिककर आ जाये एक टुकड़ा बेफिक्र नींद. एक बार एक दोस्त ने कहा था कि मैं हर आने वाले लम्हे का उत्सुकता से इंतजार करता हूँ कि न जाने उसमें मेरे लिए क्या हो. मुझे भी अब ऐसा ही लगने लगा है. उदयपुर की पुकार को सहेजा और निकल पड़ी सफर में.

न कोई वहां इंतजार में था, न कोई जल्दी थी कहीं पहुँचने की. पूरे इत्मिनान के साथ सफर कटता रहा. रास्ते में मानव कौल के कहानी संग्रह ‘प्रेम कबूतर’ से दो कहानियां पढ़ीं. किस कहानी को कहाँ पढ़ा जाना है यह भी वो कहानी खुद तय करके रखती हो शायद. इतने दिनों से सिरहाने रखे रहने के बाद महीनों बैग में घूमने के बाद आखिर इन कहानियों ने चुना हवा में उड़ते हुए पढ़ा जाना. कहानियां अपने साथ उड़ा ले जाने में कामयाब थीं. इति और उदय, प्रेम कबूतर दोनों कहानियां. प्रेम कबूतर का असर लिए उदयपुर पहुंचना हुआ.

जब कहीं कोई इंतजार नहीं कर रहा होता तो अक्सर हम वक़्त पर या वक़्त से पहले पहुँच जाते हैं. उदयपुर भी वक़्त से थोड़ा पहले ही पहुँच गयी. सलीम भाई कैब के ड्राइवर थे. उनसे बात करते हुए राजस्थान की खुशबू ने घेर लिया. शहर को मैं हसरत से देख रही थी, इस उम्मीद से कि जाने वो मुझसे दोस्ती करेगा या नहीं. हवा में हल्कापन था, हालाँकि देहरादून से जिस्म पर लदकर गयी जैकेट बेचारी बड़ा अजीब महसूस कर रही थी कि यहाँ तो ठीक ठाक गर्म था मौसम. शहर की हवा आपको बता देती है कि उसका आपको लेकर इरादा क्या है और मुझे इस शहर की हवाओं का मिज़ाज़ आशिकाना लगा. एयरपोर्ट से होटल पहुँचने के बीच मैं रास्तों से बातें करती रही, खुद को उदयपुर की हवाओं के हवाले करती रही. इस बीच सलीम भाई बात करते रहे. वो उदयपुर के दीवाने लगे मुझे. सारे रस्ते जिस मोहब्बत से वो उदयपुर के बारे में बताते रहे सुनकर बहुत अच्छा लग रहा था. यह जानकर कि मैं यहाँ पहली बार आई हूँ शायद उन्होंने इस बात की जिम्मेदारी ले ली थी कि वो मेरी दोस्ती उदयपुर से करवा ही दें. उन्होंने बताया कि यह शहर बनास नदी के किनारे बसा है. यहाँ बहुत सारी झीलें हैं, बहुत सारे महल. उन्होंने महाराज उदय सिंह के किस्से भी सुनाये जिन्होंने इस शहर को बसाया था. सलीम भाई की गाड़ी मानो सडक पर नहीं झील में नाव की तरह चल रही हो और उनकी बातें लहरों सी. कि यह शहर जादू करता है, जो यहाँ आ जाता है यहीं का हो जाता है. कि यहाँ के लोगों को किसी बात की हड़बड़ी नहीं, सब तसल्ली से जीते हैं. कि यहाँ भीड़ नहीं है, जनसंख्या भी तो बस 30 लाख ही है. सब पता है सलीम भाई को. वो चाहते हैं कि मैं पूरा उदयपुर देखूं, खूब दिन यहाँ रुकूँ और यहाँ का खाना खाऊं. होटल पहुँचने तक मैं सलीम भाई की जुबानी जिस उदयपुर से मिल चुकी थी, उसे अपनी नजर से देखने की इच्छा बढती जा रही थी. खाना खाने में वक़्त जाया न हो कि मेरे पास वक़्त ही बहुत कम है इसलिए खाने की इच्छा और भूख दोनों को इग्नोर किया और चल पड़ी अकेले फ़तेह सागर झील से मिलने. सलीम भाई जाते-जाते बता गये थे कि किस तरह सुखाडिया सर्कल जहाँ हम रुके थे से सिर्फ दस रूपये में मैं फतेह सागर पहुँच सकती हूँ. चलते समय कुछ दोस्तों ने फतेह सागर झील के लिए संदेशे भेजे थे उन संदेशों को साथ लिया और चल पड़ी. सुखाड़िया सर्कल से महज दस रूपये देकर विक्रम में बैठकर तेज़ आवाज में राजस्थानी संगीत सुनते हुए फतेह सागर झील के किनारे जा पहुंची. थोड़ा रास्ता पैदल का था जो अतिरिक्त सुख था. यह पैदल चलना मेरा खुद का चुनाव था. यह सुख लेना मैंने लन्दन की सड़कों पर घूमते हुए सीखा है. किसी भी शहर से दोस्ती करनी हो तो पहले उस शहर की सड़कों को दोस्त बनाना होता है. पैदल चलते हुए शहर जितना करीब आता है, कैब में बैठकर नहीं आता.

झील के किनारे पहुंचकर सबसे पहली अनुभूति हुई सुकून की, ठहराव की. मैंने झील को आदाब कहा उसने पलके झपकाकर, मुस्कुराकर करीब बिठा लिया. हम दोनों के बीच लम्बा मौन रहा. इस सुकून की मुझे कबसे तलाश थी. यह ठहराव, कबसे चाहिए था. भागते-भागते पाँव में छाले पड़ चुके थे लेकिन उन्हें देखने की फुर्सत तक नहीं थी. झील की ठंडी हवाओं ने उन तमाम जख्मों को सहलाया तो मेरी पलकें नम हो उठीं. जैसे बाद मुद्दत मायके लौटी बेटी को माँ की गोद मिली हो. जैसे प्रेमी ने माथा चूमते हुए और सर पर हाथ रखकर कहा हो ‘मैं हूँ न’. मैं अपलक उस शांति में थी. घूँट घूँट उस शांति को पीते हुए. इस पार से उस पार झील के किनारे धीर-धीरे चलते हुए मैंने खुद को पूरी तरह समर्पण की स्थिति में पाया.

अब तक निशांत आ पहुंचा था. निशांत हमारा देहरादून का साथी है. ‘क’ से कविता का साथी. वो उदयपुर में गांधी फेलोशिप कर रहा है. उससे मिलने के बाद मुझे लगा कि उदयपुर पहुँचने के बाद से अब तक जो मेरे साथ हो रहा है, निशांत भी उसी गिरफ्त में है. एकदम इश्कियाना. निशांत पूरे वक़्त उदयपुर की तारीफ में था. उसने पुराने उदयपुर से लेकर नए तक सब घुमाया. यहाँ के लोग, यहाँ की संस्कृति, मौसम, मिजाज़, खाना, चाय, सुबह, शाम, पंछी, ऊँट, झीलें, महल सबके सब निशांत की बातों में बनारस के पान की तरह घुले थे. मैं उस पान का स्वाद ले रही थी, मुस्कुरा रही थी. ‘मैम यहाँ की शाम बहुत अच्छी होती है, यहाँ शांति बहुत है. बहुत सुकून है यहाँ. यहाँ के लोगों को कोई जल्दी नहीं होती किसी बात की. कोई हड़बड़ी नहीं. लोग इत्मीनान से जीते हैं यहाँ. यहाँ लोगों ने अपनी संस्कृतियों को खूब सहेजा हुआ है. रोज शाम को कुछ न कुछ तो जरूर हो रहा होता है. यहाँ का खाना बहुत अच्छा होता है, थोड़ा तीखा होता है लेकिन स्वादिष्ट भी. यहाँ के जैसी चाय तो मैंने कहीं पी ही नहीं. यहाँ रह जाने का जी करता है...’ वो लगातार उदयपुर की तारीफ में था. सच कहूँ तो उसकी बाइक पर बैठकर उदयपुर घूमते हुए मुझे एक पल को भी नहीं लगा कि वो कुछ रत्ती भर भी ज्यादा तारीफ कर रहा है. उसकी बातों में जो उदयपुर था और मेरे सामने जो उदयपुर था दोनों ने मिलकर मुझे अपने इश्क की गिरफ्त में ले लिया था. निशांत मुझे सिटी पैलेस और पिछोला झील देखने के लिए छोड़कर चला गया शाम को फिर मिलने आने के लिए.

मैं अब सिटी पैलेस में थी. महलों की भव्यता में एक किस्म का गर्वीलापन शामिल रहता है. बड़े-बड़े किले, महल मुझे ज्यादा रास नहीं आते, उनकी बजाय मुझे नदियों, तालाबों के किनारे बैठना और ठेली पर चाय पीना ज्यादा पसंद है. लेकिन सिटी पैलेस की भव्यता में एक किस्म की सादगी भी दिखी मुझे. यह भव्यता आपको आक्रांत नहीं करती, आपसे दोस्ती करती है. मैं महल में घूमती फिर रही थी. यहाँ के दरो-दीवार से मुखातिब. कोई जल्दी नहीं थी. किसी के मूड का ख्याल नहीं रखना था. कहीं भी बैठ जाती थी, देर तक बैठी रहती फिर चल पड़ती. मैं असल में हवा को महसूस कर रही थी. अरसे से इस सुकून की तलाश में थी.

फिर पिछोला झील का किनारा मिला. शान्ति का चरम था यह. न कोई भीड़, न कोई हल्ला. सामने लहराती खूबसूरत झील और किनारे असीम शान्ति. देर तक उसे निहारती रही. फिर वहीँ बैठ गयी पहले कुर्सी पर फिर जमीन पर. ठंडी हवा के झोंके मन की थकन भी मिटा रहे थे. जो कभी नहीं हुआ वो पिछोला झील ने कर दिखाया कि थपकी देकर अपने काँधे पर सर रखकर सुला लिया. दिन में यूँ बाहर अकेले अनजाने लोगों के बीच अनजानी जगह मैं सो भी सकती हूँ कभी सोचा नहीं था. कब नींद आई पता ही नहीं चला. जब नींद खुली तो खुद को थकन से आज़ाद पाया. मैं पिछोला को देख मुस्कुराई, तुम्हें पता था न मुझे क्या चाहिए था. पिछोला के पानी ने छोटी सी उछाल ली और कहा, खुश रहो.

वहां से लौट रही थी बिलकुल ताज़ा और तनाव मुक्त होकर. शाम निशांत के इश्क के किस्सों के नाम और उदयपुर की स्पेशल चाय के नाम रही. आलू के पराठों के नाम भी. निशांत फिर से उदयपुर के किस्से सुना रहा था. यहाँ ये बहुत अच्छा है, यहाँ वो बहुत अच्छा है. आप रुकतीं तो वहां ले जाता आपको, वहां ले जाता. वो जहाँ ले जाना चाहता था उन जगहों के विवरण और उनसे उसका लगाव मुझे वहां ले जा चुका था, यह वो नहीं जानता था. जैसे कोई आशिक अपनी महबूबा के बारे में हर वक़्त बात करना चाहता है और बात करते हुए उसके चेहरे पर जो ख़ुशी होती है वैसी ही खुशी थी निशांत के चेहरे पर. उत्तराखंड के अगस्त्यमुनि की सुंदर वादियों में पला बढा, देहरादून में अपनी वैचारिकी निखारता यह लड़का आखिर उदयपुर के इश्क़ में यूँ ही तो नहीं पड़ा होगा. ‘मैम रात में उदयपुर बहुत खूबसूरत लगता है.’ वो बोल रहा था और मैं उदयपुर के इश्क में गिरफ्तार हुई जा रही थी.

यात्राओं में अक्सर अच्छी चाय न मिलना बेहद अखरता है. ज्यादातर अच्छी चाय के नाम पर ढेर सारा दूध, और शकर वाली चाय मिल जाती है लेकिन यहाँ कुल्हड़ में जो मिली स्वादिष्ट चाय तो दिल खुश हो गया. एक के बाद एक 3 चाय पी हमने. खूबसूरत रात, हल्की झरती ठंड जिसके लिए सिर्फ गुलाबी शाल काफी था के साये में पैदल घूमना...दिन बीत गया था. सुबह अल्लसुबह हमें सिरोही के लिए निकलना था. लेकिन सच यह है कि मैं अब भी उदयपुर में ही हूँ. उन्हीं गलियों में कहीं, वहीँ फतेह सागर झील के किनारे बैठी हुई, सिटी पैलेस में टेक लगाये हुए, पिछोला झील के किनारे सोई हुई या चाय की गुमटी पर चाय पीती हुई...

(फेमिना जनवरी 2019 अंक में प्रकाशित)