Saturday, September 14, 2019

ऊँचाई एक भ्रम है


जब मैं छोटी थी तब बहुत तेज़-तेज़ चढ़ा करती थी सीढ़ियाँ. एक सांस में झट से ऊपर जा पहुँचती थी, दूसरी ही सांस में सरर्र से नीचे. सीढियां उतरते हुए नहीं लगभग फिसलते हुए. खेल था ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना. इस चढने और उतरने के दौरान बीच का हिस्सा कब गुजर जाता पता ही नहीं चलता. मुझे हमेशा पहली सीढ़ी और आखिरी सीढ़ी की अनुभति ही गुगुदाती थी. माँ की आवाज आती और मैं सर्रर्र से नीचे, पतंगों का खेल देखना हो सर्रर्र से ऊपर.

तब मेरे लिए ऊपर का अर्थ सिर्फ पतंगों से भरा आसमान, पंछियों की टोली, नीला आसमान और वो एकांत था जिसमें मुझे सुख मिलता था और नीचे का अर्थ था माँ की पुकार, जिम्मेदार बेटी के हिस्से के कुछ काम, चीज़ों को ठीक से जमाना, मेहमानों की आवभगत. ऐसा नहीं कि नीचे आना मुझे बुरा लगता था कि बुरे भले की समझ ही कहाँ थी. लेकिन यह सच है कि सीढ़ियों वाला खेल मुझे पसंद था.

इस खेल में ऊपर चढने का वो अर्थ नहीं था जिसे सफलता से जोड़ा जाता है, यह बाद में समझ में आया. जब से समझ में आया ऊपर चढने का रूमान जाता रहा. अब यह आनंद नीचे उतरने में आने लगा. नदियों में, पोखरों में, समन्दर में उतरने का आनंद. नीचे उतरते हुए पैरों को धरती पर जमाये रखने का आनंद.

असल आनंद साथ का है यह सबसे बाद में समझ में आया. साथ खुद का. सीढियां सिर्फ माध्यम हैं ऊँचाई एक भ्रम है. गहराई महत्वपूर्ण है. गहराई में उतरते हुए पैरों को जमाये रखना, डूबने की इच्छा के साथ डूबना भी.

माँ की पुकार गहराई की पुकार थी. आज भी माँ की पुकार तमाम सीढ़ियों को भरभराकर गिरा देती है. चाय बनाते हुए मुस्कुराती हूँ. अपने भीतर की सीढियां उतरते हुए अपने भीतर की नदी में छलांग लगा देती हूँ....छपाक!

(इश्क़ शहर, डूबता मन )

Friday, September 13, 2019

बारिश का बोसा और सितम्बर

पीले फूलों में आस भर देता है
तेज़ कर देता है खिलखिलाहटों की लय
बिखेरता है धरती पर मोहब्बत के बीज
उदास ख़बरों की उदासी पोंछता है
बंधाता है ढाढस
बारिश का बोसा देता है सितम्बर...


Tuesday, September 10, 2019

देश में सब ठीक है


किसी ने नहीं मारा तबरेज अंसारी को
न, किसी ने नहीं
मॉब लिंचिंग?
वो क्या होती है
हमारे देश में तो नहीं होता ऐसा कुछ
वो तो मरा दिल के दौरे से 
अरे साहब, रिपोर्ट में आया है ऐसा 
तो अब आप साक्ष्यों पर भी शक करेंगे ?
न्यायपालिका पर भी?

नजीब अहमद तो तभी आ गया था वापस
मजे में घर में है अपनी माँ के पास
देशद्रोही है न इसलिए छुपकर बैठा है
घुमराह करने को देश को
उसे कुछ हुआ ही नहीं था

कश्मीर में सब ठीक है
सामान्य है सब
खुश हैं लोग वहां
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
काम सब ठीक से चल रहे हैं

रोहित ने किसी दबाव में नहीं की थी आत्महत्या
वो ऊब गया था जीते-जीते
नयी उम्र का जोश था कर गया गलती
व्यवस्था का कोई दोष नहीं था इसमें

किसी ने नहीं मारा
गौरी लंकेश, दाभोलकर, कलबुर्गी को

उन्नाव में कुछ नहीं हुआ
ठीक वैसे ही जैसे कठुआ में नहीं हुआ था कुछ

अब चिन्मयानन्द को फंसा रहे हैं लोग
ये देशद्रोही हैं देश की छवि बिगाड़ने वाले

बताइए मिड-डे मिल में नून रोटी बंटने की खबर
भी खबर है ?
देश का नाम बदनाम करने वाले बुडबक हैं ये लोग
इनको सजा मिलनी ही चाहिए मी लार्ड

उन सबको भी मिलनी चाहिए
जो दिमाग लड़ाते रहते हैं हमेशा
इंटीलेक्चुअल दिखने की भूख है और कुछ नहीं
इन सबको पाकिस्तान भेज देना चाहिये.

एनआरसी आ गया है न
सब ठीक कर देगा

मी लार्ड देश में सब ठीक ठाक है
बेरोजगारी, महंगाई, किसान आत्महत्या, दलित शोषण
बलात्कार, भ्रष्टाचार यह सब देशद्रोहियों के राग हैं
ये अपने ही देश का सर झुकाने को
इन मुद्दों को सामने लाते हैं
इन पर बात करते हैं

हम आपको सही वक़्त पर सेना के करतब दिखाते हैं
'उरी' दिखाते हैं
'ट्वायलेट' दिखाते हैं, 'मिशन मंगल' दिखाते हैं
और आप हैं कि बार-बार वही बात करते हैं
कुंठित हैं आप
ध्यान से देखिये सब ठीक है देश में
चैन से सोइए न पैर फैलाकर
वीकेंड आने वाला है दो पेग लगाइए
देश की चिंता छोड़िये न
देश सुरक्षित हाथों में है
देश में सब ठीक ठाक है.

Monday, September 9, 2019

'कोई था जो लड़ रहा था.'- रवीश कुमार



भावुक दिन है आज. अवतार सिंह पाश का जन्मदिन है और आज ही रवीश कुमार को मनीला में रमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित किया गया है. चाटुकारिता और टुच्चेपन की तमाम हदें तोड़ते पत्रकारिता के काले समय में रवीश का होना उम्मीद का होना हमेशा से रहा. उस उम्मीद का सम्मान सुखद है.

सम्मान समरोह के उस बड़े से हॉल में तालियों की गडगडाहट के बीच अपनी विनम्र और संकोची मुस्कान में सजे धजे रवीश को देखना ऐसा सुख था जो पलकें भिगोता है. मुझे याद है प्राइम टाइम देखने के बाद अक्सर माँ का कहना 'उससे कहो, अपना ख्याल रखे. बहुत चिंता होती है. ' माँ ट्विटर नहीं देखतीं वो फेसबुक पर भी नहीं हैं. लेकिन वो समय की नब्ज़ को समझती हैं.
आज माँ खुश हैं. भावुक हैं.

जहाँ एक तरफ अपने ही देश में उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही हों वहीँ दूसरी ओर उसी देश के नागरिकों तक सही और जरूरी सच्ची खबरों पहुँचाने की जिद के चलते उनका सम्मान किया जाना मामूली बात नहीं है.

जब रवीश हर दिन खबरों के लड़ रहे थे, झूठी खबरों के मायाजाल को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, धमकियां सुन रहे थे, ट्रोल हो रहे थे और बिना हिम्मत खोये, बिना हौसला डिगाए लगातार आगे बढ़ रहे थे तब वो नहीं जानते थे कि उन्हें ऐसा कोई सम्मान भी मिलेगा.

ईमानदार कोशिश अपने आप में काफी बड़ी चीज़ है. सही कहा सुदीप्ति तुमने 'रवीश का यह कहना कि हार लड़ाई जीतने के लिए नहीं लड़ी जाती कुछ लड़ाईयां इसलिए लड़ी जाती हैं कि कोई था जो लड़ रहा था'. हाँ सचमुच लड़ाईयां इसलिए लड़ी जाती हैं कि लडे बिना रहा नहीं जाता. कि वक़्त जब उस समय का हिसाब मांगे तो सिर्फ और सिर्फ अँधेरा ही न दिखे एक उम्मीद भी दिखे, उम्मीद जो कहे 'कोई था जो लड़ रहा था.'

रवीश जी आपने देश का सर ऊंचा किया है. आपने उम्मीद पर आस्था को बचाया है. आपने मेरी माँ जैसी और बहुत सारी माओं की चिंता में जगह बनाई थी उन सबको आज मुस्कुराहट का तोहफा दिया है.

बहुत बधाई आपको !

Wednesday, September 4, 2019

पत्नियाँ और प्रेमिकाएं- एकता नहर

1.
पत्नियां कर रही होती हैं अपडेट
डिजिटल कैमरे से कराए फोटोशूट
प्रेमिकाएं चुपके से सहेज रही होती हैं
प्रेमी के साथ आड़ी-तिरछी तस्वीरें

2.
पत्नियों के लॉकर में होते हैं
बहुमूल्य गहने
प्रेमिकाओं की अलमारी में
अनमोल प्रेम-पत्र

3.
पत्नियाँ मछली हैं, अक्वेरियम की
प्रेमिकाएं चिड़िया हैं, आसमान की
प्रेमिकाएं पालती हैं ख्वाब
प्रेमी के घर की मछली हो जाने का
पत्नियाँ चाहती हैं
प्रेमिकाओं की तरह फिर चिड़िया हो जाना

4.
प्रेमिकाएं भाग जाती हैं घर से
अपने प्रेमी के लिए
पत्नियां चाह कर भी रोक लेती हैं खुद को
अपने पति के लिए

5.
प्रेमिकाएं छिपाती हैं अपने एब
प्रेमी से पत्नी का दर्जा पाने के लिए
पत्नियां सीखती हैं रिझाने के तरीके
पति की प्रेमिका बन जाने के लिए

6.
एक दिन
पत्नी और प्रेमिका रोती हैं गले लगकर
आपस में करती हैं दुलार
एक पुरुष के लिए
वे एक-दूसरे की पूरक बन गयीं

(एकता नाहर पत्रकारिता और लेखन से जुड़ी हैं। उनका एक कविता संग्रह आ चुका है ‘सूली पर समाज’। वे दतिया मध्य प्रदेश से हैं।)

(साभार मेरा रंग)

Saturday, August 31, 2019

समंदर किसी को खाली हाथ नहीं भेजता


यह आखिरी दिन था, यह वापिसी का दिन था. हम आसपास का चप्पा-चप्पा छान लेने में लगे थे. जंगल ही था आसपास. यहाँ के लोगों से बातें करना, चर्च देखना, जाने से पहले एक बार फिर से समन्दर से मिलने जाना और वापसी. कारमोना से एयरपोर्ट की दूरी कम से कम चार घंटे की होगी. हमारे पास वक़्त काफी था सो हमने कुछ रास्ता पैदल तय किया फिर एक जगह रुककर लंच किया. आज लंच में हमने गोवा की ट्रेडिशनल सब्जी गोअन चीज़ शाकुती खाई. इसे गोवन मसालों और नारियल के तेल में बनाया जाता है और सादा चावल के साथ खाते हैं. यह काफी मसालेदार होती है. गोवा में लिकर काफी सस्ती है इसलिए लोग यहाँ से ले जाना भूलते नहीं. हम जिस दुकान में पहुचे वह अच्छी सी दुकान थी. काफी करीने से सजी. ब्रांड्स का मुझे पता नहीं लेकिन लौटते समय अजय जी ने बताया कि यहाँ लगभग सभी अच्छे ब्रांड्स थे. मुझे यहाँ इस शॉप में जो बात अच्छी लगी वो माँ बेटी की जोड़ी. दोनों माँ बेटी जिस मुस्तैदी से हर ब्रांड के बारे में डिटेल से रही थीं, सजेस्ट कर रही थीं कि कौन सी वाइन अच्छी होगी या कौन सी ब्रांडी वह मुझे आकर्षित कर रहा था. हम अपने यहाँ मतलब उत्तर भारत में ऐसे दृश्यों की कल्पना नहीं कर सकते. मैं उन दोनों से देर तक बातें करती रही. जब उन्हें पता चला कि मेरी भी बेटी है और मैं उसके लिए कोई गिफ्ट ले जाना चाहती हूँ तो उन्होंने इसमें मेरी मदद की. 


गोवा में यह ख़ास बात है कि यहाँ कोई आपको जज नहीं करता. आप किसके साथ हैं, उसका आपके साथ क्या रिश्ता है आदि. न ही लोग बेवजह के अंदाजे लगाते हैं आपके बारे में, न कोई खुसुर-फुसुर. दोस्त शब्द को पूरा अस्तित्व मिलता नजर आता है. उन्हीं माँ बेटी ने हमें बताया कि सामने अगर थोड़ी देर इंतजार करें तो हमें मलाड स्टेशन तक की बस मिल जाएगी. हम उनके बताये के मुताबिक बस का इंतजार करने लगे लेकिन बस से पहले ही हमें ऑटो मिल गया. हम स्टेशन ट्रेन के आने से काफी पहले पहुँच गये थे. 30 रूपये की टिकट ली और चाय पीते हुए आराम से और उतरते सूरज को देखने लगे. छोटा सा साफ़ स्टेशन था यह. आखिरी दिन का सनसेट प्वाइंट था स्टेशन का पुल. यह गोवा से विदाई का सूरज था. ट्रेन आ चुकी थी. वापसी का सफर काफी अलग होता है. न सिर्फ जाने की दिशा बदलती है बल्कि भीतर भी काफी कुछ बदल चुका होता है. वो यात्रा यात्रा ही नहीं जो हमें भीतर से और परिपक्व और संवेदनशील और स्पष्ट न बनाये. ट्रेन चल रही थी और मैं सोच रही थी कि जब गोवा से पुकार आई थी तब कितना मुश्किल था निकल पाना लेकिन अब वापस जाते समय महसूस हो रहा है कि उसी समय तो सबसे ज्यादा जरूरी था निकलना. हम जब अपने बारे में ठीक निर्णय नहीं ले पाते तब कुदरत यह काम करती है. कम से कम मेरा तो यही अनुभव है. 

हम स्टेशन पहुँच गये. एयरपोर्ट स्टेशन के एकदम पास था. जिस एयरपोर्ट पहुँचने के लिए 4000 रूपये लगने थे वहां हम महज 160 रूपये में पहुँच चुके थे. यह मेरे लिए इतनी एक्साइटिंग बात थी कि इसे मैंने माँ को फोन करके तुरंत बताया. मैं हमेशा सोचती थी कि कुछ लोग इतनी विदेश यात्राएँ किस तरह कर लेते हैं. इतना पैसा कहाँ से लाते हैं तो अजय जी हमेशा कहते थे बहुत पैसा नहीं चाहिये होता है बस घूमने की इच्छा चाहिए होती है. आज मेरे सामने कुछ उदाहरण थे. घुमंतू को लग्जरी के पीछे भागने वाला नहीं होना चाहिए. मेहनती, कम से कम में काम चला लेने वाला होना चाहिए. महंगे होटलों में रुककर, बड़ी गाड़ियों में बैठकर साल में एक ट्रिप की जा सकती है घुमंतू नहीं हुआ जा सकता. मुझे उनकी बात ठीक लगी, तभी तो ज्यादातर सैलानी पीठ पर बड़ा सा पिठ्ठू बैग लादे पैदल चलते नजर आते हैं. मुझे अभी सैलानी बनना सीखना बाकी है मैंने खुद से कहा. 

हम वापस लौट रहे थे...सुख और शांति से भरे हुए. समन्दर किसी को खाली हाथ नहीं भेजता.

समाप्त.

Tuesday, August 27, 2019

वो प्रेम की लहरों में सिमटते जाना

समन्दर फिर सामने था, इस बार हम दोनों के चेहरे तसल्ली वाली मुस्कराहट थी. समन्दर ने पलकें झपकाकर पूछा, ‘आ गयीं?’ मैंने भी नजरें मिलाकर जवाब दिया,’बिलकुल’ अजय जी अब तक मेरे और समन्दर के रिश्ते से वाकिफ हो चुके थे उन्होंने मुझे चिढाते हुए कहा, ‘लो तुम्हारी ससुराल आ गयी’. वो मेरे बचपने पर हंसते हुए कहने लगे, ‘यह तुम जो कहती हो कि समन्दर तुम्हारा प्रेमी है यह तो तुम्हारा मानना है न कभी समन्दर बेचारे से भी पूछा है’ उनकी इस चिढाने वाली बात के बीच ही एक बड़ी सी लहर ने हमें घेर लिया. मैंने कहा, ‘मिल गया जवाब.’ वो हंस दिए. बोले ‘पागल हो तुम एकदम.’

समन्दर के किनारे वो जो लगी होती हैं न बड़ी बड़ी छतरियां और उनके नीचे लेटने को सिंहासन नुमा बेंच. फिल्मों में इन्ह्ने खूब देखा था, फिर सामने से भी देखा समन्दर के किनारे जब भी गये यह दीखते रहे लेकिन कभी इस सिंहासन पर विराजने की हिम्मत न हुई. लेकिन अजय जी ने पहुँचते ही इसी सिंहासन पर धावा बोल दिया. अगर आप इन सिंहासन पर विराजना चाहते हैं तो आपको रेस्टोरेंट से कुछ ऑर्डर करना होगा या फिर अलग से इस पर विराजने का चार्ज देना होगा. मैं यह सुबह पता कर चुकी थी. सुबह रेस्तरां वाले जिस लडके ने मुझे एक मिनट के लिए बैठकर फोटो तक खींचने नहीं दी थी अब वो हमारी सेवा में था. मुझे इत्ता मजा आ रहा था. टोपी वोपी लगाकर फिल्मों में देखे सारे पोज मारने की कोशिश मैं कर रही थी. गंवार अल्हड़ किशोरी उस सपने को जी रही थी जो उसने देखे तक नहीं थे. खुद पर ही हंसी भी आ रही थी और मजा भी आ रहा था. कोई नहीं था जो मुझे यूँ अजीबोगरीब हरकतें करते देख मुंह बनाये या मजाक उडाये मेरा. बल्कि मेरे इस पागलपन को अजय जी फोटो खींचकर बढ़ा ही रहे थे. सबकुछ बहुत रोमांचक लग रहा था.


दोपहर का समन्दर सुबह के समन्दर से अलग होता है. कुछ अलसाया सा, कुछ सुस्त सा. जैसे-जैसे शाम ढलती जाती है समन्दर का मिजाज़ बदलता जाता है और रात होते-होते वह उच्छश्रृंखल प्रेमी बन जाता है. दिन में जिस जगह हम आराम से एक रंगीन छतरी के नीचे पसरकर आलू चिप्स खाते हुए गाने सुन रहे थे शाम होते होते वह जगह पानी के हवाले थी.

मैं समन्दर के प्रेम में थी. लहरों के संग खेल रही थी. लहरें खींच कर भीतर ले जातीं. मैं वापस लौट आती फिर तैयार खींचकर भीतर ले जाए जाने के लिए. लहरों के बीचोबीच पालथी लगाकर बैठ गयी थी डूबते सूरज को देखने को. यह वही गोवा था जहाँ पिछली बार सनसेट छूट गया था हमसे. हम अग्वादा फोर्ट से भागते हुए यहाँ पहुंचे थे लेकिन सूरज डूब चुका था. इस बार ढलते सूरज के सामने धूनी लगा ली थी मैंने. उसकी हर अदा को जी भरके देख रही थी.
लहरों का जादू ऐसा होता है कि जितना भी वक़्त इनके साथ बिताओ कम ही लगता है. घंटों समन्दर में पड़े-पड़े त्वचा फूलने लगती है फिर भी मन बाहर आने का करता ही नहीं. भूख, प्यास मानो सब स्थगित. जब रात काफी हो गयी और सिक्योरिटी अलर्ट के चलते बाहर आने को बोला जाने लगा तब कोई चारा नहीं था. लेकिन डिनर वहीँ समन्दर के किनारे ही किया ताकि नजर से ओझल न हो पल भर समन्दर. 
खूब संतुष्टि, अपार सुख लिए हम लौटे तो सामने फिर वही सवाल था वापस कैसे जायेंगे. इतनी दूर पैदल जाने की तो ताकत बची नहीं थी. कम से कम मेरी तो नहीं. लेकिन कोई चारा भी नहीं था. 

यह पैदल चलकर पहुंचना अच्छा ही हुआ हमने उस छोटे से गाँव में क्रिसमस की रौनक देखी. शायद गाडी से जाते तो यह न देख पाते. नाचते, गाते, खाते पीते झूमते लोग. इतना सुंदर क्रिसमस मैंने तो नहीं मनाया था पहले.


Thursday, August 22, 2019

कहा न प्यार है !

क्रिसमस की तैयारियों ने पूरे कारमोना को दुल्हन सा सजा रखा था. लेकिन इस धज में शोर नहीं था, शांति थी. किसी सजे हुए घर से गिटार पर बजती हुई धुन सुनकर रुक ही गये कदम, कहीं नारियल के पेड़ पर अटके चाँद से आँख लड़ा बैठे. ऐसी शांति अरसे बाद मिली थी. ऐसी बेफिक्री तो शायद पहली बार ही. लम्बे सफर की थकान और अधूरी नींदों का असर था या जिन्दगी की आपाधापियों से निजात का असर जल्द ही गहरी नींद ने जकड़ लिया. याद नहीं इतनी गहरी, बेफिक्र नींद आखिरी बार कब हिस्से आई थी. सुबह एकदम खिली हुई थी. सुबह मैं जल्दी से जल्दी समन्दर के पास जाने की हड़बड़ी में थी लेकिन अजय जी की नींद उन्हें छोड़ नहीं रही थी. वो विदेशी क्लाइंट्स के साथ डील करते हैं इसलिए उन्हें देर रात तक जागने की और सुबह देर तक सोने की आदत है यह वो बता चुके थे. उनकी बायोलॉजिकल क्लॉक विदेशों के हिसाब से सेट थी. मैंने उनसे इतना भर पूछा कि क्या मैं अकेली चली जाऊं? इस पूछने में कई तरह की हिचक, संकोच सब था लेकिन जिस सहजता से उन्होंने कहा, ‘इसमें पूछने की क्या बात है, तुम्हें जाना ही चाहिए.’ मैं खुश हो गयी और जल्दी से नाश्ता ठूंसकर समन्दर की ओर भागी. बीच तक ले जाने के लिए होटल की एक गाडी जाती थी मैने झट से उसमें जगह बना ली. मेरे बगल में एक जोड़ा बैठा था. लड़की बिकनी में थीं. लड़की सहज थी, मुझे सहज होने में दो मिनट लगे. हंसी भी आई खुद पर, कितना कुछ है टूटने को अपने भीतर, कितना कुछ बाकी है उगने को. मैं हर पल बदल रही थी. हर पल मुझे मुझमें कुछ नया होता महसूस हो रहा था. सबसे ज्यादा बदल रहा था सहज होना सीखना. जेंडर के पूर्वाग्रह से मुक्त होना. दोस्त सिर्फ दोस्त होता है वो स्त्री या पुरुष नहीं होता यह समझना. इन बातों को कहना आसान है, इन्हें विमर्श बनाना आसान है लेकिन जीना इतना भी आसान नहीं होता. कंडिशनिंग आड़े आती ही है कभी चेतन में कभी अवचेतन में. उस कंडिशनिंग का टूटना सुखद होता है. 

सुबह का समन्दर रात के समन्दर से अलग होता है. बहुत अलग. अब मैं और समन्दर आमने-सामने थे. मुझे अब कहीं नहीं जाना था. समूची यात्रा जिस मुलाकात के लिए थी वो अब होने को थी. जालोर बीच शहर से दूर है, यहाँ ज्यादा भीड़ नहीं, बहुत कम टूरिस्ट हैं यहाँ वह भी तब जबकि क्रिसमस करीब है. मुझे ऐसी ही शांति तो चाहिए थी. नंगे पाँव गीली रेत पर चलते हुए मैं कहीं दूर निकलती जा रही थी. लहरों के बीच से होते हुए मैंने एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चलते जाना शुरू किया. रास्ते भर लहरें मुझसे खेलती रहीं, लुभाती रहें, ललचाती रहीं. टखने से घुटने तक घुटने से कमर तक और कमर से चेहरे तक आने में कहाँ वक्त लगा था उन्हें. जिस तेज़ बहाव से वो मेरी ओर आतीं भीतर से सीत्कारी सी फूटती. मेरी आँखें लगातार बह रही थीं. लहरें जिस दबाव के साथ जकड़ रही थीं वह कितना निर्मल कितना अद्भुत था. यही तो है प्रेम की जकडन जिससे छूटने को जी नहीं चाहता. मेरे कानों ने मेरे होंठों को कहते सुना, ’हाँ हाँ आई लव यू’. समन्दर के इसरार ने आखिर मेरा इकरार सुन ही लिया.

समन्दर के किनारे मछुवारों का संगीत बज रहा था और एक चिड़िया मेरी ही तरह लहरों के संग खेल रही थी. मैंने उस चिड़िया के खेल को कैमरे में कैद किया अपनी छाया समेत. वह चिड़िया मानो मैं ही थी और वह लहर भी मैं ही थी. और अंत में सारे मैं विलीन हो गये थे सिर्फ असीम शांति बची थी. यह अकेलापन इतना भरपूर था कि इसे जी लेने के बाद कोई इच्छा शेष नहीं रहती. पूरे बीच का चक्कर लगाने के बाद मैं लहरों के बीच धूनी जमाकर बैठ गयी थी. लहरें मुझे पूरा ढंक लेती थीं और दूर तक अपने साथ लिए चली जाती थीं. उस लम्हे में मैं कहाँ थी पता नहीं. वो लम्हे जिन्दगी थे, वो लम्हे सुख थे, वो लम्हे निर्वाण भी थे. इन्हीं लम्हों में जिन्दगी के वो तमाम झमेले जो हमें पूरी तरह जकड़े होते हैं बौने लगने लगते हैं. यही पल यात्रा का हासिल होते हैं. 
पूरे चार घंटे बीत चुके थे. होटल वापस ले जाने वाली गाडी जा चुकी थी. मैंने एक्टिवा की तलाश शुरू की जो काफी कोशिश करने के बाद भी नहीं ही मिली क्योंकि क्रिसमस के कारण सारी एक्टिवा बुक हो चुकी थीं. मेरे सामने सवाल यह था कि समन्दर में चार घंटे रहने के बाद की थकान के बाद 3 किलोमीटर पैदल चलकर कैसे जाऊं. गोवा में लिफ्ट लेकर चलने के बारे में खूब सुना था. आज मेरे सामने उस सुने हुए को आजमाने का मौका था. मैंने एक अनजान से लिफ्ट ली. उसकी एक्टिवा ने मुझे आधे रास्ते तक लिफ्ट दी. यह अनुभव भी काफी रोमांचक था. मुझे लगा जो सुना था वो मैं भी कर सकी. अच्छा लग रहा था. बाकी का आधा रास्ता मैंने पैदल तय किया. आखिर अपने कमरे तक पहुँच चुकी थी मैं. मुझे जोरों की भूख लगी थी. खाने के बाद मुझे भयंकर नींद ने जकड़ लिया. नींद खुली तो शाम के 5 बज रहे थे. फिर से समंदर पुकार रहा था, इस बार अजय जी भी साथ गए. उनके एजेंडे में मछली खाना था मेरे एजेंडे में था समन्दर में डुबकी लगाना जो सुबह बाकी रह गया था.

जारी...

Monday, August 19, 2019

महबूब की एक झलक जीने का सामान


जिस पुकार पर गोवा आई थी उसे ठीक से सुन लिया था, गुन लिया था. एक मुक्कमल शाम के बाद प्यारी सी सुबह को जी लेने के बाद अब सिर्फ इन हवाओं के हवाले करना बाकी था. मन गिलहरी हुआ जाता था. हर सडक पर भागने को व्याकुल, हर कोने में खड़े होकर गहरी सांस लेने को बेताब, बीच सडक पर खड़े होकर चिल्लाकर कहने को बेकरार कि आई लव माइसेल्फ़. ये सेल्फ न बहुत खूबसूरत होता है. इसी गोवा में अंजना, बाघा और वागातोर बीच ने मुझे खुद से मिलवाया था. लहरों ने थपकी देकर सुलाया था, कहा था खुद से प्यार करो. और आज मैं खुद के प्रेम में हूँ. यह प्रेम सेल्फ अप्रिसिएशन सेल्फ से अटैचमेंट तो हो लेकिन सेल्फ ऑब्सेशन न हो इसका ख्याल रखना होता है जिसका जिम्मा भी कुछ दोस्तों को ही दे रखा है. जैसे ही गडबड करूँ अनजाने ही सही वो थप्पड़ लगाकर सुधार लें. 

कल से जो समन्दर झलक दिखा रहा था, अब उसके करीब जाने का समय आ चुका था. इस दफे भीतर भी सुख का समन्दर था और बाहर भी. यह जो भीतर का सुख था ‘यह कोई उफान तो नहीं था,’ खुद से पूछती हूँ. आवाज आती है ‘नहीं यह अपने होने का सुख है मात्र.’ जिन्दगी का बड़ा हिस्सा दूसरों को महसूस करते हुए, समझते हुए बिताने के बाद यह खुद को महसूस करना सच में सुंदर था. बिना जिया हुआ बचपन हमेशा हाथ थामे चलता है. जिन्दगी के किसी भी मोड पर अपने जिए जाने की इच्छा लिए. शायद आज उसी बचपन को जिए जाने का समय था. मुझे नहीं पता मैं क्या होने लगी थी. मैं रूई से भी हल्का महसूस कर रही थी. कहीं भी जाने को, कुछ भी करने को, कैसे भी चलने को, कैसे भी बात करने को आज़ाद. यहाँ कोई मुझे जज नहीं कर रहा था. अजय जी साथ थे लेकिन उनका होना इस आज़ादी को बढ़ा ही रहा था. वो जज नहीं करते, दखल भी नहीं देते, टोकते भी नहीं. उनकी अपनी दुनिया है वो उसमें रहते हैं. साथ होते हैं लेकिन साथ होने के भाव से मुक्त भी करते हैं. यह बिलकुल नया अनुभव था कि ऐसे भी हुआ जाता है क्या? सडक के किनारे खड़े होकर आइसक्रीम खाना हो, अनजाने लोगों से समन्दर किनारे तस्वीर खिंचवाना हो या नंगे पाँव गार्डन में भागते फिरना. कितना आसान है अपने जीवन को अपने लिए महसूस करना लेकिन कितना मुश्किल बना दिया गया है इसे. इसी उछलकूद के दौरान मन हुआ कि ओमकार से बात की जानी चाहिए. उसका नम्बर शुभा जी ने दिया था. उससे मिलना था लेकिन उसकी फ्लाईट थी इसलिए वो सुबह जल्दी ही निकल चुका था. मैंने उसे फोन लगाकर जैसे ही कहा मैं प्रतिभा कटियार बोल रही हूँ वो इतना खुश हुआ कि क्या कहूँ. उसने कुछ भी कहने की बजाय ‘ओ अच्छी लड़कियो’ गुनगुनाना शुरू कर दिया. अब हम दोनों हंस रहे थे. मैं उससे कह रही थी तुमने बहुत अच्छे से गया उसे और वो मुझसे कह रहा था कि मैंने बहुत अच्छा लिखा. जो भी हो पणजी की हवाओं में हमारी हंसी घुल रही थी, संतुष्टि से भरी हुई हंसी. संतुष्टि कि हम दोनों मिलकर एक सन्देश को ठीक से दूर तक ले जा पाए. 

अब हमे कारमोना जाना था. जहाँ हमने दो दिन रहने के लिए बुकिंग की थी. पंजिम से 4 घंटे की दूरी पर है यह. हमने तय किया कि हम लंच करने के बाद ही निकलेंगे. क्योंकि पहुँचते हुए शाम हो ही जानी थी. मेरा मन था कि सूरज डूबने से पहले मैं समन्दर के पास पहुँच सकूँ. रास्ते भर मैं पिछली गोवा यात्रा और इस गोवा यात्रा के दरमियाँ डोलती रही. जिन्दगी के सफर के बारे में सोचती रही. उन जगहों के बारे में भी जहाँ मैं और माधवी एक्टिवा दौड़ाया करते थे. जिन्दगी पर भरोसा करना चाहिए. यह सीख मुझे जीकर मिली है. इधर हमारी कैब रुकी, उधर मैं समन्दर की तरफ भागी. कहाँ सामान है, कहाँ दस्तखत करने है, किसे आईडी देनी है मुझे कोई मतलब नहीं था. सब जिम्मेदारी एक जिम्मेदार दोस्त के हवाले थी और इतनी सी देर में यह समझ में आ चुका था कि अपनी इस हरकत के लिए मुझे कोई डांट नहीं पड़ने वाली थी. इतना सहज साथ कम ही मिलता है जो आपको मुक्त तो करता ही है इस बात का कोई बोझ आपको नहीं देता. वो साथ तो होता है लेकिन बिना आपके स्पेस में जरा भी हस्तक्षेप किये. 

आखिर कारमोना का खूबसूरत जालोर बीच सामने था, डूबता सूरज था, मैं थी और था समन्दर. विस्मित, अवाक, मंत्रमुग्ध. इन दुर्लभ पलों के लिए कितना इंतजार किया है. ओह समन्दर...मेरे पाँव आगे बढ़ते ही जा रहे थे और समन्दर करीब आता ही जा रहा था. देर तक लहरों ने मुझे सहलाया, मेरे बीते तमाम जख्मों पर मरहम रखा. मेरे भीतर की नदी सामने के समन्दर में विलीन होने को व्याकुल होने को थी कि फोन की घंटी बजी. मुझे वापस लौटना था. मैंने समन्दर के कान में कहा, कल से हर वक्त तुम्हारे साथ ही हूँ.’ उसने हंसकर विदा किया.

जारी...

Saturday, August 17, 2019

पंजिम की सुबह और शुभा जी का जादू


अगली सुबह में बीती शाम की खुशबू थी. ढेर सारा उत्साह, सुख और शांति. हमें शुभा जी के साथ ब्रेकफास्ट के लिए जाना था. कितनी ख़ुशी थी बता नहीं सकती. यकीन नहीं हो रहा था कि शुभा जी अब हमारी दोस्त हो चुकी थीं. इसमें उनकी ही सहजता, उनकी ही विनम्रता और जीने के ढब को क्रेडिट है. होटल ताज हमारे होटल मांडवी से ज्यादा दूर नहीं था इसलिए हमने पैदल जाना ही चुना यह सोचकर कि सुबह की सैर भी हो जाएगी और सुबह की ताजा हवा में पणजी शहर की देखने का आनंद भी मिलेगा. यूँ भी मौसम और साथ अच्छा हो, सड़कें साफ हों तो पैदल चलने का मजा ही कुछ और है. पणजी हमें मुस्कुराता हुआ मिला. हम वक़्त पर पहुंचे थे. शुभा जी इंतजार में थीं वो हमें लॉबी में ही मिल गयीं. बीती रात की चमक उनके चेहरे पर भी थी. लोकल के सभी अख़बार कल की शाम की खबर से सजे हुए थे.

शुभा जी और अनीश जी खूब भले लोग हैं. शुभा जी ने हमसे हमारे बारे में पूछा और बताया कि किस तरह उन्होंने इस प्ले लिस्ट के लिए तमाम कविताओं की तलाश की और उसी तलाश में उन्हें ‘ओ अच्छी लड़कियो’ मिली. उन्हें और उनकी पूरी टीम को कविता बहुत अच्छी लगी. किस तरह इस कविता की बाबत मुझे सम्पर्क किया. मैंने उन्हें बताया कि किस तरह पिया तोरा कैसा अभिमान, अली मोरे अंगना और, पिया हाजी अली मैं रिपीट में सुना करती थी. उन्हें अजय जी से यह जानकर कि वो फिल्मों के लिए गाने लिखते हैं और उनका लिखा एक गीत लता जी गा चुकी हैं वो बहुत खुश हुईं. अनीश जी ने बताया कि वो हिंदी कविताओं पर कुछ काम करना चाहते थे. उनके मन में काफी दिनों से यह सब चल रहा था. सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के लिए मेवरिक प्ले लिस्ट बनाने का अवसर उनकी उस इच्छा को साकार करने का जरिया बना. उन्होंने ओमकार जिसने इस कविता को आवाज दी थी के बारे में भी बताया कि किस तरह वो कविता पढकर एक-एक शब्द में डूब गया था. उसका वह डूबना उसकी कल की परफौर्मेंस में दिख रहा था. मैं सोच रही थी कि यही होती है शब्दों की ताकत, विचारों की ताकत जो दुनिया एक कोने में बैठे व्यक्ति को दूसरे कोने में बैठे व्यक्ति से जोड़ देती है. लिखने वाला पढने वाले से पीछे छूट जाता है और इस बात का उसे सुख होता है. इस वक़्त मैं उसी सुख में थी. सब उस कविता में डूबे हुए लोग थे और मैं उन्हें देखने के महसूस करने के सुख में. जब यह कविता लिखी थी तब सिर्फ इतना था मन में कि यह बात मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक काश पहुंचा सकूँ कि लड़कियों को अच्छे होने के बोझ से मुक्त करो अब. और यह बात दूर तक पहुँच रही थी. यह बात जीकर जानी थी कि अच्छा होने का बोझ अनजाने चुपचाप हमें भीतर ही भीतर खोखला करता रहता है, बांधता रहता है. एक किस्म की सोशल कंडिशनिंग है यह जो बहुत गहरी है. पीढ़ियों से स्त्रियाँ इसकी शिकार भी हैं और जानती भी नहीं कि वो शिकार हैं.

नाश्ते की टेबल पर शुभा जी के कुमाऊनी घर की स्मृति भी खुली. मैंने उनसे पूछा आपका मन नहीं करता कि आप कुछ पहाड़ी लोक गीत गायें. उन्होंने मुस्कुराकर कहा, बहुत मन करता है लेकिन बहुत मुश्किल है इसमें. जैसे ही मैं पहाड़ का राजस्थान का कोई लोकगीत गाना चाहती हूँ यह बात होने लगती है कि हम लोक का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन लोक के लिए कुछ कर नहीं रहे. मैं गायिका हूँ, संगीत दे सकती हूँ आवाज दे सकती हूँ मेरी भी सीमा है. मैं कोई विवाद नहीं चाहती, शांति से जीना चाहती हूँ. इसलिए किसी भी ऐसे काम को नहीं करती जिसमें कोई भी द्वंद्व हो. उन्होंने बताया कि उन्हें विद्यापति पसंद हैं. रेनकोट के समय विद्यापति को पढ़ना शुरू किया तो पढ़ती ही गयी. मीरा बहुत पसंद है, पलटूदास उन्हें पसंद हैं. केदारनाथ सिंह, दुष्यंत, साहिर, फैज़ आदि को पढ़ा है उन्होंने.

एक मजेदार बात उन्होंने बताई, हर साल दिसम्बर में वो पणजी में म्यूजिकल फेरी चलाती हैं. खुले आसमान के नीचे और समन्दर के बीचोबीच संगीत. यह पूर्णिमा के आसपास होता है. सुनकर ही सुख हो रहा था. हमारी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं. लेकिन वक़्त है न मुस्तैद पहरेदार उसने याद दिलाया कि ब्रेकफास्ट को लंच तक नहीं ले जा सकते. आखिर हमने एक मुक्कमल, भरपूर मुलाकात के बाद विदा ली.

अब सामने था पंजिम और एक नन्हा सा उन्मुक्त मन.

जारी...

Thursday, August 15, 2019

पणजी में 'ओ अच्छी लड़कियों' से मुलाकात



फाइनली हम पणजी में थे. खिड़की का पर्दा हटाया तो सामने समन्दर मुस्कुराता मिला. जैसे वो मेरे सब्र का इम्तिहान ले रहा हो. शाम करीब थी और समन्दर सामने. मैं लहरों का उछाल देख पा रही थी, आवाज सुन पा रही थी बस हाथ बढ़ाने की देरी थी...लेकिन अभी हाथ बढ़ाने का वक़्त नहीं था कि गोवा ने जिस वजह से पुकारा था आज शाम तो उसी के नाम थी. कभी सोचा न था कि कोई कविता यूँ हाथ पकड़कर गोवा तक घुमाने ले आएगी. जबसे 'ओ अच्छी लड़कियों' को शुभा जी द्वारा संगीतबद्ध करने की बात सुनी थी तबसे शुभा जी के तमाम गीत साथ चलते रहते थे. एक ही बात मन में थी कि किस तरह वो इस कविता को संगीतबद्ध करेंगी भला. दूसरा उत्साह था शुभा जी और अनीश जी से मिलने का. मुझे नहीं मालूम कैसी मुलाकात होने वाली थी. एक मन हुआ चुपके से भीड़ में छुपकर बैठ जाऊं और होते देखूं सब कुछ. लेकिन यह मौका शायद कुछ और था. शाम के उत्सव में शामिल होने लिए हमने पैदल ही चलना चुना ताकि थोड़ा शहर भी तो देखें, उसे हैलो तो बोलें. एक तरफ कार्यक्रम का समय हो चला था दूसरी तरफ पेट में भूख गुडगुडा रही थी. मेरा मन हुआ कि भूख को इग्नोर कर दिया जाय लेकिन अजय जी इसके लिए तैयार नहीं थे. फाइनली हमने शॉर्ट कट वाली पेट पूजा की और उसके बाद पहुंचे कार्यक्रम की जगह. सच कहूँ तो यहाँ आने के पहले तक मुझे इस फेस्टिवल की ऊंचाइयों का पता नहीं था. यहाँ आकर देखा पूरा शहर सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल के पोस्टरों बैनर से पटा पड़ा था. अब मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी थी. लेकिन ज्यादा देर घबराहट के रुकने को वक़्त नहीं मिला. गेट पर पहुँचते ही प्रेरणा लेने आ गयी. और पलक झपकते ही मैं शुभा मुदगल, अनीश प्रधान और उनकी टीम के साथ थी. शुभा जी मिलकर इतनी खुश हुईं उन्होंने तुरंत गले लगा लिया.अनीश जी ने बहुत विनम्रता के साथ स्वागत भी किया और शुक्रिया कहा इस कविता को लिखने के लिए. ऐसे मौकों पर कुछ समझ नहीं आता कि क्या कहूँ बस कि आँख भर आती है.  शुभा जी और अनीश दोनों बहुत सहज, सरल लोग हैं. यह विनम्रता ही उनके संगीत को अलग आयाम देती होगी. हमारी मुलाकात ग्रीन रूम में हुई थी. कार्यक्रम शुरू होने को था और हम कार्यक्रम स्थल की ओर ले जाए गये.

यह गोवा की यादगार शाम थी. मुझे नहीं पता था कि इस बार गोवा मुझे सर पर चढ़ाने के लिए पुकार रहा था. मुझे नहीं पता था कि गोवा ने जिन्दगी को गले लगाने, तमाम बाधाओं को पार करने के एवज में यह शाम मुझे तोहफे में देने को बुलाया था. सामने भव्य स्टेज था और पीछे शानदार ऑडियंस. इन सबके बीच मैं भी थी. मैं भी...क्या यह मैं ही हूँ. सब कुछ बहुत तेज़ था. अनीश जी ने मुझे बोला था कि 'आपकी कविता हमें इतनी ज्यादा अच्छी लगी है कि हम कार्यक्रम को इसी कविता से क्लोज करेंगे. तो मन में इतनी राहत थी कि अभी थोड़ा वक़्त था दिल को संभाल लेने को. शुभा जी मेरे बगल में बैठी थीं और उनके बगल में अनीश. मेरे दूसरी तरफ अजय जी थे. ऐसे मौकों पर दोस्तों का साथ होना कितना मायने रखता है यह सिर्फ समझा जा सकता है.


कार्यक्रम शुरू हुआ और लगातार परवान चढ़ता गया. इस शाम के लिए कुछ हिंदी कविताओं को संगीतबद्ध करने को चुना गया था. केदारनाथ सिंह, नज़ीर अकबराबादी, मीराबाई ,पल्टूदास, शुभा मुदगल और प्रतिभा कटियार की कवितायेँ थीं ये. मैं एक एक कर कविताओं की खूबसूरत प्रस्तुती देखकर मुग्ध हो रही थी. यकीन नहीं हो रहा था कि इन कविताओं को ऐसे भी प्रस्तुत किया जा सकता है. शुभा जी बीच-बीच में पूछती जा रही थीं ठीक तो है न? और मैं उनके इस विनम्र सवाल के बदले सिर्फ सर हिला पा रही थी. इन कविताओं को स्वर दिया ओमकार पाटिल और प्रियंका बर्वे ने. दोनों की ऊर्जा देखते ही बनती थी, दोनों बेहद कमाल के आर्टिस्ट हैं. ओमकार तो ऐसे हैं कि वो मानो आते ही कहते हों, खबरदार जो ध्यान रत्ती भर भी इधर-उधर किया कि जब तक मैं हूँ मैं आपका पूरा ध्यान चुरा लूँगा और धीरे से दिल भी. ऑडियंस को बांधना उसे आता है. तमाम कविताओं के बीच जब उसने केदारनाथ सिंह की कविता 'भाई मैंने शाम बेच दी है' गई तो मैं एकदम से अलग ही दुनिया में चली गयी. इतनी बार पढ़ी थी यह कविता लेकिन आज इसे शुभा जी, अनीश जी और ओमकार के जानिब से सुनना कुछ अलग ही अनुभव था.

आखिर कार्यक्रम आखिरी कविता तक आ पहुंचा. यानी मेरी कविता 'ओ अच्छी लडकियों.' कविता शुरू होने से पहले अनीश जी और शुभा जी ने मेरी तरफ देखा और कहा 'उम्मीद है आपको पसंद आएगी.' स्टेज पर मेरा नाम लिया जा रहा था और मैं अपनी हथेलियाँ शुभा जी की हथेलियों में छुपाये बैठी थी. जैसे ही ओमकार ने कहा, प्रतिभा जी हमारे बीच मौजूद हैं, शुभा जी ने उत्साह में भरकर कहा, यहाँ हैं यहाँ हैं...और सारी तेज़ लाइट्स हम पर थीं. उफ्फ्फ. ऐसी चकाचौंध की आदत कहाँ हमें. घबरा से गये कुछ पल की. कविता शुरू हो चुकी थी..'ओ अच्छी लड़कियों तुम मुस्कुराहटों में समेट देती हो दुःख और ओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनर...'  काफी तेज़ संगीत में इसे ढाला गया था. कहाँ रुकना है, कहाँ ज्यादा रुकना है, कहाँ ऊंचा करना है स्वर ओमकार को सब पता था. मुझे लग रहा था क्या यह सच में मैं हूँ. देहरादून के किसी कोने में बहुत उलझे से मन और द्वंद्व के बीच जब लिख रही थी यह कविता तब कहाँ जानती थी कि इसे इतना प्यार मिलेगा. शुभा जी हथेलियों का दबाव मुझे कसता जा रहा था यह उनका प्यार था. शायद वो भी मेरी तरह संकोच में थीं.


कविता खत्म हुई...अँधेरे में अपने आँखों में भर आये समन्दर को संभालना आसान था. कार्यक्रम खत्म होते ही रौशनी ने हमें घेर लिया था. बधाइयों, फोटो खींचने, खिंचाने, लोगों से मिलने मिलाने के बीच गोवा की वह खूबसूरत शाम दिल में दर्ज हो गयी. शाम ने बीतते-बीतते अगले दिन की सुबह नाश्ते पर शुभा जी से आराम से मिलने, बतियाने का प्रस्ताव भी दे दिया.

हम एक बेहद खूबसूरत शाम को जीकर, समेटकर लौट रहे थे.

जारी....

Tuesday, August 13, 2019

मिलूंगी तुमसे तसल्ली से...


मुम्बई से गोवा के लिए हमें अल्सुबह तेजस एक्सप्रेस पकडनी थी. मुम्बई में मैं माधवी के घर रुकी थी. उसके घर पहले भी जा चुकी हूँ. उस मुलाकात और इस मुलाकात के बीच कई बरस बीत चुके थे. उससे मिलकर लगा कि वो और भी खूबसूरत हो गयी है, उसकी खूबसूरती में मातृत्व का नमक जो शामिल हो चुका है. उसके दो प्यारे से बच्चों से मिलना बहुत सुंदर अनुभव था. जरा सी देरी में दोनों बच्चे मासी-मासी की धुन में थे. शरारतें, मस्ती, गप्पें इन सबके बीच नींद कहाँ. ट्रेन पकड़ने के लिए सुबह चार बजे ही निकलना था. लगभग न के बराबर नींद लिए हम गोवा के लिए निकले थे. हालाँकि नींद कहीं थी भी नहीं. यह शायद उत्साह के कारण हुआ होगा..

मेरे साथ अजय गर्ग थे. वो घुमक्कड़ हैं. दुनिया भर घूमते फिरते हैं. सच कहूँ तो घूमने का चस्का अजय जी और माधवी का ही दिया हुआ है. लेकिन मैंने अजय जी के साथ कभी ट्रेवल नहीं किया था. मेरे लिए यह यात्रा कई मायनों में अलग होने वाली थी. पहली राहत की बात तो यही थी कि अजय जी के साथ होने के कारण टिकट, ट्रेवल, स्टे इन सबके इंतजाम के झंझटों से मैं मुक्त थी. यानी मुझे सिर्फ मजे करने थे. लम्बे समय बाद यह राहत मिली थी. वरना तो हर ट्रेवल चाहे परिवार के साथ हो या दोस्तों के साथ या अकेले इन सब जिम्मेदरियों का ठेका मेरा ही होता रहा है. जिम्मेदारियों से राहत भी चाहिए होती है कभी कभी. हम स्टेशन वक़्त पर पहुंचे लेकिन ट्रेन थोड़ी सी लेट हो गयी. स्टेशन की चाय हम पी सकें शायद इसलिए. किसी शहर को महसूस करना हो तो वहां के रेलवे स्टेशन पर थोड़ा वक़्त जरूर बिताना चाहिए. यहाँ जीवन जैसा है, वैसा मिलता है. एक ऊंघती हुई बच्ची अपने पापा के कंधों पर झूल रही थी, गजरा बालों में टांके एक लड़की एक लड़के के कंधे से टिककर ऊंघ रही थी. एक लड़का अभी-अभी बगल में खडे अंकल को चाय देकर गया. इधर से उधर तेजी से जाती ज्यादातर औरतों ने गजरे पहने हुए थे. ये इनके गजरे हमेशा फ्रेश कैसे रहते होंगे मैंने मन में सोचा और गम्भीर मुद्रा बनाकर ट्रेन के एनाउंसमेंट पर ध्यान केन्द्रित किया. थोड़ी ही देर में ट्रेन आ गयी और गोवा का हमारा सफर शुरू हुआ.

अजय जी मुझे खिड़की वाली सीट देकर यह बताकर कि 'रास्ता बेहद खूबसूरत है, देखती जाना' सो गये. उनके लिए यह रास्ता नया नहीं था और रात की नींद उनकी भी अधूरी ही रही थी. जब भी ट्रेन में कुछ खाने को आता, ब्रेकफास्ट या लंच या कुछ और वो जागते, खाते और सो जाते. जितनी देर वो जागते उनकी बातचीत बड़ी मजेदार होतीं. खूब हंसी आती मुझे और लगता कि सफर अच्छा कटने वाला है. मेरी अजय जी से दोस्ती पुरानी है लेकिन यह दोस्ती कम संवादों और इक्का-दुक्का छोटी छोटी मुलाकातों भर की है. उनसे अनौपचारिक मुलाकात का यह पहला मौका था और मुझे नहीं मालूम था कि उनकी उपस्थिति सहजता से भरपूर होगी. हमारी छुटपुट नोक-झोंक शुरू हो चुकी थी जो पूरे सफर में चलती रही.

मुम्बई से गोवा का रास्ता सचमुच बेहद खूबसूरत है. सारे रास्ते मैं चुप होकर खिड़की के बाहर देखती जा रही थी. तेजी से छूटते जा रहे पेड़, सडकें, गाँव, पानी सब मोह रहे थे. ऐसा लग रहा था सब मुझे जानते हैं और मुस्कुराकर हैलो कह रहे हैं, लेकिन मैं तो इन सबसे पहली बार मिल रही थी. ट्रेन का खूबसूरत सफर मुझे सुकून से भर रहा था. सामने लगे स्क्रीन पर देखने के लिए जो फ़िल्में थीं वो भी काफी अच्छी थीं. मन में दुविधा थी कि फिल्म देखूं या दृश्य. मैंने दृश्य ही चुने. एक बैंगनी रंग के बड़े-बड़े पत्तों वाला पेड़ अब तक मेरी स्मृतियों में झूमता है.

करमाली स्टेशन आने वाला था. स्टेशन आने से पहले ही समन्दर दिखने शुरू हो गए थे. ये समन्दर के वो किनारे थे जो शायद शहर से नहीं दिखते. मन उछल-उछल जा रहा था खिड़की से समन्दर देखकर. कुछ ही देर में हम स्टेशन पर थे. स्टेशन ज्यादा बड़ा नहीं है लेकिन साफ़ और सुंदर है. मौसम गर्म था यहाँ. दिसम्बर के महीने में देहरादून से चलते समय जो ढेर सारी जैकेट लदकर आई थीं उनमें से आधी तो मुम्बई में ही पैक हो गयी थीं और बाकी के पैकअप का समय अब था.

मैं आँख भर स्टेशन देख रही थी और अजय जी कम से कम पैसे में मिलने वाला ऑटो ढूँढने में लगे थे. मुझे अजय जी से यह भी सीखना था कि यात्राएँ कैसे इकोनोमिक और अच्छे ढंग से की जाती हैं. आखिर हमें हमारे जैसे ही दो विदेशी दोस्तों के साथ शेयरिंग में ऑटो मिल गया और हम चल पड़े गन्तव्य की ओर.

पणजी बेहद खूबसूरत है. मांडवी नदी के किनारे पर बसे इस सुंदर शहर से बातें करने का जी चाह रहा था. ऑटो होटल की ओर भाग रहा था और पेड़ों से लुकाछिपी खेलते हुए समन्दर मुझे लुभा रहा था. जी तो चाह रहा रहा अभी रुक जाऊं लेकिन खुद को मैंने दिलासा दिया अब तो आ ही गयी हूँ, मिलूंगी तसल्ली से.

जारी...

Monday, August 12, 2019

गोवा से आई पुकार और प्यार



यह मेरी नहीं लहरों की बात है. उन लहरों की जिन्होंने मुझे हमेशा हर मुश्किल वक़्त में सहेजा है. कभी पास से, कभी दूर से. नहीं मालूम इन लहरों के इश्क़ में कबसे हूँ. तबसे जब इन्हें छूकर देखा भी नहीं था शायद. न नज़र से, न हाथ से. समन्दर की लहरों की बात कर रही हूँ. सिनेमा में देखे समन्दर थे या उपन्यासों और कहानियों में पढ़े समन्दर. कब कैसे मुझे समन्दर से इश्क़ हुआ पता नहीं. समन्दर को पहली बार देखने का अवसर मिला नवम्बर 2011 में. शायद समन्दर ने मुझसे मिलना तब तक के लिए मुल्तवी किया था जब तक उससे मिलना मेरे जीने की अंतिम जरूरत न रह जाय. कुछ भी योजनाबद्ध तरह से नहीं होता. कुछ भी नहीं सचमुच. जन्म भी नहीं, मृत्यु भी नहीं, जीवन के युद्ध भी नहीं और समर्पण भी नहीं. जीवन का यह समय युद्ध का नहीं था. समर्पण का था. ऊँहू ! समर्पण ठीक शब्द नहीं, ‘गिवअप’ ठीक शब्द है. दोनों में काफी फर्क है. मैं एकदम ‘गिवअप मोड’ में थी. तभी दोस्तों ने गोवा चलने का प्लान बनाया और मैं गोवा में थी. इत्तिफाक ही होगा कि जिन दोस्तों ने प्लान किया था वो खुद ही न आ सके थे और मैं और माधवी ही पहुंचे थे गोवा. शायद हम दोनों का मिलना और समन्दर से मुलाकात इससे अच्छे ढंग से नहीं हो सकती थी. हम दोनों पहली बार मिली थीं. हम दोनों जिन्दगी से जूझते-जूझते टूट रही थीं, हम दोनों मुश्किलों के बारे में बात करना पसंद नहीं करती थीं और हम दोनों समन्दर से बेपनाह प्यार करती थीं.

हमने आधी आधी रात तक गोवा के समन्दर से बातें की थीं, गोवा का चप्पा-चप्पा छानते हुए हम खुद को तलाश रहे थे. और जब हम मुठ्ठियों से समेट-समेट कर समन्दर जिन्दगी में भरकर वापस लौटे थे तो हम वो नहीं थे, जो हम गए थे. समन्दर ने हमसे उलझनें लेकर, हिम्मत और भरोसा देकर वापस भेजा था. लौटने के बाद उसी हिम्मत और भरोसे के साथ जिन्दगी को नयी राहों पर रख दिया था और वही नयी राहें आज तक हाथ थामे चल रही हैं.

इसके बाद कई बार समन्दर मिले, अलग-अलग नामों से, अलग-अलग देश में, प्रदेशों में. लेकिन 2018 के आखिरी में जब एकदम अचानक एक बार फिर से गोवा ने आवाज दी तो मैं चौंक गयी. इस वक़्त, गोवा? सोचना भी नामुमकिन था. जिन्दगी एक साथ कई खानों में उलझी और अटकी हुई थी. पहले से इतनी उलझनें थीं कि उनमें संतुलन बनाना ही मुश्किल हो रहा था और उस वक़्त गोवा से आई यह आवाज? आखिर क्या मायने हैं इसके. जब मोहब्बत आवाज दे तो इनकार कर पाना कितना मुश्किल होता है यह कोई आशिक मन ही जान सकता है. लेकिन हाँ कहना भी आसान नहीं था. गोवा से आई यह पुकार मुझे सोने नहीं दे रही थी. इस बार जब यह पुकार आई थी तब जिन्दगी में बहुत कुछ बदल चुका था. सचमुच बहुत कुछ. पहले आई पुकार उदासियाँ पोछने और हिम्मत देने के लिए थीं लेकिन इस बार हौसलों को परवाज देने, पहचान देने और जिन्दगी की मुश्किलों से लड़ने का ईनाम देने को थी. यह बुलावा था मेरी एक कविता 'ओ अच्छी लड़कियों' का इंटरनेशल सिरिंडपिटी आर्ट फेस्टिवल में शामिल किये जाने पर. इस कविता को मेवरिक प्ले लिस्ट में जगह मिली थी जिसे संगीतबध्ध किया था मेरी प्रिय शास्त्रीय संगीत सिंगर और संगीतकार शुभा मुद्गल और अनीश प्रधान ने. यह सब इतना अचानक, इतना अनायास था कि यकीन सा नहीं हो पा रहा था. यह मेरे लिए ऐसा समय था जैसे खेल रही हो जिन्मेदगी मेरे संग. जैसे-जैसे गोवा जाने की तारीखें करीब आती जा रही थीं वैसे-वैसे न जाने देने की स्थितियां मजबूत होती जा रही थी.

इश्क़ की पुकार में बहुत ताकत होती है. आखिर मैं गोवा के लिए निकल ही पड़ी ठीक वैसे ही जैसे लड़की भागती है मंडप से उठकर सारे बंधन तोड़कर. इसमें जोखिम भी बहुत होता है और रोमांच भी. आखिर मैंने गोवा को हाँ कर दी थी. मेरे इस हाँ कहने में यानी लड़की को जिन्दगी की तमाम दुश्वारियों वाले मंडप से भगाने में मेरे भाई, भाभी और दोस्त ज्योति का बड़ा रोल रहा. लहरों की ताल पर थिरकता मन मुम्बई एयरपोर्ट पर उतरा तो खुश था. मुम्बई से एक दोस्त को मैंने साथ चलने के लिए मना लिया था. हमने मुम्बई से गोवा ट्रेन से जाना चुना था.

  जारी...

(गोवा डायरी, दिसम्बर 2018 )

Monday, August 5, 2019

तुमसे प्यार है सोनम, डरो नहीं


'दीदी, आप नहीं जानतीं मुसलमान बहुत ख़राब होते हैं. बहुत कट्टर होते हैं. इनके साथ यही होना चाहिए. कश्मीर में कितना दंगे करते हैं ये लोग. अब मोदी जी सब ठीक कर देंगे.' सोनम एक सांस में अपनी बात उड़ेल देती है और पूछती है 'आज खाने में क्या बनेगा?' वो पहले भी ऐसी बातें करती रही है. ज्यादा बात नहीं करती लेकिन जब करती है तो मोदी जी की तारीफ ही करती है. गर्व से उसने बताया था कि उसने और उसके परिवार ने भाजपा को वोट दिया. यह कहना बल्कि सोचना भी मुझे बुरा लगता है कि सोनम कौन है किस जाति या धर्म की है, मैंने कभी नहीं पूछा किसी भी अपने सहायक से. लेकिन सोनम को अपनी पहचान छुपानी पड़ी थी. उसने खुद को हिन्दू बताकर घर में खाना बनाना शुरू किया था. हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था लेकिन एक महीने काम करने के बाद पता चला कि वो हिन्दू नहीं है. और यह पता चला मोहल्ले की पढ़ी लिखी आंटी से. उन्होंने मुंह बनाकर बताया 'आपको पता है सोनम मुलसमान है? वो रोजे से होती थी लेकिन छुपाती थी. डरती थी कि कहीं पहचान न खुल जाए.

सोनम हिन्दू नहीं है, मुलसमान है वो. बहुत डरी हुई है वो. हिन्दू घरों में काम करती है और वही बोलती है जो उन्हें सुनना अच्छा लगेगा. यही सोचकर वो मुझसे भी वह सब बोलती है जो काम करने के लिए, जीने के लिए रटकर घर से निकलती है. मैं उसकी तकलीफ समझ सकती हूँ. अभी भी वो मुझ पर पूरा यकीन नहीं कर पायी है हालाँकि उसे एक राहत है कि अब उसे मेरे घर में अपनी पहचान को लेकर झूठ नहीं बोलना पड़ता.

उसने किसे वोट दिया यह उसका अधिकार है, उसका चुनाव लेकिन वो अपना सच बता नहीं सकती. उसे सिर्फ लहर के मुताबिक बात करनी है. मुसलमानों को बुरा भला कहना है और किसी तरह अपनी रोजी रोटी कमानी है. एक रोज उसने कहा, दीदी आपकी बात और है, लेकिन सब लोग यही सुनना चाहते हैं कि मुसलमान ख़राब होते हैं तो हम वही बोलते हैं.

मैं उसके भीतर के डर का सामना नहीं कर पाती. सोनम अकेली नहीं है. बहुत से लोग हैं आसपास. जो चुप हैं. जो इस शोर में, उन्माद में आपके ठहाकों में आपके साथ ही नजर आते हैं लेकिन उनकी आँखों में जो डर है, पीड़ा है उसे देखने की फुर्सत किसी को नहीं. न सरकार को न नागरिकों को. उनके इस डर को अपना बनाना कैसे कहा जा सकता है?

जहाँ धारा 370नहीं है वहां क्या किया है सिवाय नफरत बोने के कि कश्मीर को अपना बनाने का यह तरीका निकाला गया है. इस तरह तो किसी को अपना बनाया नहीं जाता. कश्मीर सिर्फ जमीन नहीं है दिल है वहां के लोगों के उस दिल में क्या इस तरह जगह बना पायेंगे हम? क्या सोनम को अपनी पहचान न छुपानी पड़े यह हमारी चिंता है, हमारे दोस्तों को अपने मन की बात कहते-कहते रुक न जाना पड़े, या उनकी पलकें न भीग उठे, आवाज रुंध न जाए यह हमारी चिंता है. कश्मीर तो हमारा ही था पहले भी, उससे प्यार तब भी था,अब भी है.

अभी-अभी दोस्ती दिवस मनाया है और अब इस बात पर खुश हैं? कितना अच्छा होता कि यह होता लेकिन डर के साए में नहीं मोहब्बत के साए में होता. वो खुद शामिल होते इस फैसले में ख़ुशी से.

#standforpeaceandlove

Monday, July 29, 2019

'कविता कारवां'- गुलज़ार


कुछ खो दिया है पाई के
कुछ पा लिया गँवाई के...

बारिश की चुनरी ओढ़े सावन की कोई शाम गुलज़ार साहब के पहलू में सिमटकर बैठी हो तो दिल के हाल क्या कहें. बिलकुल ऐसा ही दिलफरेब मौसम बना कविता कारवां की देहरादून की बैठक में. जिस्म सौ बार जले फिर वही मिट्टी का ढेला है, रूह देखी है कभी रूह को महसूस किया है...गुलज़ार साहब की नज्म को उन्हीं की आवाज में सुनने से शाम का आगाज़ हुआ और यह आगाज़ उनकी तमाम नज्मों, गीतों, त्रिवेणियों के जरिये परवान चढ़ता गया. बाहर धुला धुला सा मौसम इतना हरा था मानो किसी रेगिस्तान की लड़की की दुआ क़ुबूल हो गयी हो. और गुलज़ार साहब की शोख मखमली आवाज में उनकी ही नज्मों का जादू.

कविताई में डूबी इस पहाड़ी शाम में 'बूढ़े पहाड़ों पर' का जिक्र कैसे न होता भला. विशाल भारद्वाज, सुरेश वाडकर और गुलज़ार साहब की त्रयी 'बूढ़े पहाड़ों पर' को सुनना किस कदर रूमानी था इसे बयान करना मुश्किल है. इसके बाद एक-एक कर 'अबके बरस भेज भैया को बाबुल', 'किताबें करती हैं बातें', 'बारिश आती है तो पानी को भी लग जाते हैं पाँव', 'प्यार कभी इकतरफा नहीं होता', 'अभी न पर्दा उठाओ', 'आँखों को वीजा नहीं लगता', 'यार जुलाहे', 'मुझको इतने से काम पर रख लो', 'मोरा गोरा अंग लई ले' सहित रचनाओं के साथ शाम गुलज़ार हुई.

गुलज़ार साहब से मुलाकातों के किस्से छिडे, उनकी फिल्मों का जिक्र हुआ, उनकी कविता के अलावा उनके प्रोज उनकी कहानियों पर भी बात हुई. बात हुई कि किस तरह बंटवारे की खराशें उनके लिखे में तारी हैं. गुलज़ार पोयट्री के साथ पोलिटिकल जस्टिस और पोलिटिकल बेचैनी को पोयटिक बनाने में माहिर हैं यह उनकी फिल्म आंधी, हू तू तू आदि में अच्छे से दिखता है. शाम थामे नहीं थम रही थी. गुलज़ार यूँ ही तो गुलज़ार नहीं हुए होंगे कि उनका जिक्र होगा तो जिक्र अमृता आपा का भी होगा और मीना कुमारी का भी और किस तरह उनका नाम गुलज़ार पड़ा इसका भी जिक्र होगा ही, सो हुआ. शाम बीत गयी लेकिन हम सब बैठक से गुलज़ारियत लिए लौटे हैं.

18 अगस्त को उनका जन्मदिन है देहरादून में उनके दीवानों ने उनका जन्मदिन एडवांस में मना लिया...मौसम ने इस शाम में खूब रंग भरे...

Sunday, July 28, 2019

मनमर्जियों की बेल लहलहा रही है


कोरी हथेलियों को देखती हूँ तो देखती ही जाती हूँ. कोरी हथेलियों पर मनमर्जियां उगाने का सुख होता है. मनमर्जियां...कितना दिलकश शब्द है लेकिन इस शब्द की यात्रा बहुत लम्बी है. आसानी से नहीं उगता यह जिन्दगी के बगीचे में. इस शब्द की तासीर सबको भाती है लेकिन इसे उगाने का हुनर कमाना आसान नहीं. और यह आसान न होना मनमर्जियो के माथे पर तमाम इलज़ाम धर देता है.

जिसने सीख लिया मनमर्जियां उगाना उसे हर पल सींचना पड़ता है इसे पूरी लगन से, शिद्दत से, सींच रही हूँ जाने कबसे. इन दिनों बारिशें हैं सो थोड़ी राहत है, सींचना नहीं पड़ता खुद-ब खुद-बढ़ रही है मनमर्जियों की बेल. मैं चाहती हूँ यह आसमान तक जा पहुंचे, हर आंगन में उगे. लडकियों के मन के आंगन में तो जरूर उगे.

अबकी बारिशों में खूब भीगना हो रहा है, लगभग रोज ही. निकलती हूँ घर से तो साथ हो लेती है बारिश...साथ ही चलती जाती है. रात होती है सरगम सी घुलती जाती है इसकी आवाज़ और सुबह चेहरे पर छींटे मिलते है बेहिसाब. रेनकोट बेचारा इग्नोर फील कर रहा है.

एकदम हरी सुरंग से हो रहे हैं रास्ते, बादल आँखों के सामने खेलते रहते हैं. पहाड़ियां मुस्कुरा रही हैं, फूल बारिशों में नहाये हैं, थिरक रहे हैं. चमकती हैं हीरे की कनी से बूंदों पर अटकी बूँदें. ये जिन्दगी कितनी खूबसूरत है. मैं बारिशों को पी जाना चाहती हूँ.

अक्सर पाया है कि जब हम जीवन को कोस रहे थे जीवन बड़ी उम्मीद से हमें देख रहा था.

मेरी मनमर्जियों की बेल कई दोस्तों के कांधो का सहारा लेकर भी बढ़ रही है, उसमें अब बूंदों वाले फूल उग रहे हैं. भीगे-भीगे फूल. राग मालकोश की धुन बज रही है कहीं...

Wednesday, July 24, 2019

साढे चार मिनट



कमरे में तीन ही लोग थे। वो मैं और एक हमारी दोस्त...

तीनों ही मौन थे।
मैं वहां सबसे ज्यादा थी या शायद सबसे कम।
वो वहां सबसे कम था या शायद सबसे ज्यादा।
दोस्त पूरी तरह से वहीं थी।
मैं खिड़की से बाहर देख रही थी।

सब खामोश थे। यह खामोशी इतनी सहज थी कि किसी राग सी लग रही थी। मैं खिड़की के बाहर लगे अनार के पेड़ों पर खिलते फूलों को देख रही थी। जिस डाल पर मेरी नजर अटकी थी वो स्थिर थी हालांकि उस पर अटकी पत्तियां बहुत धीरे से हिल रही थीं।

उन पत्तियों का इस तरह हिलना मुझे मेरे भीतर का कंपन लग रहा था। मुझे लगा मैं वो पत्ती हूं और वो...वो स्थिर डाल है। डाल स्थाई है। पत्तियों को झरना है। फिर उगना है। फिर झरना है...फिर उगना है।

'मुझे मां से बात करनी है...' वो बोला।

उसके ये शब्द खामोशी को सलीके से तोड़ने वाले थे।
मैं मुड़ी नही। वहीं अनार की डाल पर अटकी रही।
दोस्त ने कहा, 'अच्छा, कर लीजिए।'
'क्या वो यहीं हैं...?' उसने पूछा।
'हां, वो अंदर ही हैं।' बुलाती हूं।

कुछ देर बाद कमरे में चार लोग थे। मां मैं वो और दोस्त।
मैं अब भी खिड़की के बाहर देख रही थी।
'आप अंकल से बात कर लीजिए...' उसने मां से कहा।
मां चुप रहीं।

'लेकिन...' दोस्त कुछ कहते-कहते रुक गई।
'किसी लेकिन की चिंता आप लोग न करें...मैं सब संभाल लूंगा। सब।'
उसने मां की हथेलियों को अपने हाथों में ले लिया।
दोस्त ने कहा, 'फिर भी।'
'परेशान मत हो। यकीन करो। ' उसने बेहद शांत स्वर में कहा।

कमरे में मौजूद लोगों की तरफ अब तक मेरी आधी पीठ थी। अब मैंने उनकी तरफ पूरी पीठ कर ली ताकि सिर्फ अनार के फूल मेरे बहते हुए आंसू देख सकें।

मां कमरे से चलीं गईं...दोस्त भी।

वो मेरे पीछे आकर खड़ा हुआ। अब वो भी कमरे के बाहर देख रहा था। शायद अनार के फूल...या हिलती हुई पत्तियां। कमरे में कुछ बच्चे खेलते हुए चले आए। उसने बच्चों के सर पर हाथ फिराया...बच्चे कमरे का गोल-गोल चक्कर लगाकर ज्यूंयूयूँ से चले गए।

अब कमरे में वो था और मैं...बाहर वो अनार की डाल...
उसकी तरफ मेरी पीठ थी....उसने कहा, 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा है...'

गहरी सर्द सिसकी भीतर रोकने की कोशिश अब रुकी नहीं।
अनार की डाल मुस्कुरा उठी।
'सिर्फ साढ़े चार मिनट नहीं, साढ़े चौदह साल...' मैंने कहा...

उसने मुझे चुप रहने का इशारा किया।
हम दोनों अनार की डाल को देखने लगे...
बच्चे फिर से खेलते हुए कमरे में आ गए थे...उसने फिर से उनकी पीठ पर धौल जमाई...

वो आखिरी बार था जब मां की जिंदा हथेलियों को इस तरह किसी ने अपनी हथेलियों में रखा था।
उसी रात मां मर गई।
रोज की तरह चांद गली के मोड़ वाले पकरिया के पेड़ में उलझा रहा।
मां रात को सारे काम निपटाकर सोईं और फिर जगी नहीं।
बरसों से वो उचटी नींदों से परेशान थीं। सुबह उनके चेहरे पर सुकून था। वो सुकून जो उनके जिंदा चेहरे पर कभी नहीं दिखा।

वो आता, थोड़ी देर खामोशी से बैठता, चाय पीता चला जाता।
न वो मेरी खामोशी को तोड़ता न मैं उसकी।
हमारे दरम्यिान अब सवाल नहीं रहे थे। उम्मीद भी नहीं।
लाल कलगी वाली चिडि़या जरूर कुछ उदास दिखती थी।
मां ने पक्षियों को दाना देकर घर का सदस्य बना लिया था। वो घर जो उन्हें अपना नहीं सका, उस घर को उन्होंने कितनों का अपना बना दिया।

'तो तुमने क्या सोचा?' एक रोज उसने खामोशी को थोड़ा परे सरकाकर पूछा।
मैं चुप रही।
वो चला गया।
मैं भी उसके साथ चली गई थी हालांकि कमरे में मैं बची हुई थी।

दोस्त मेरी हथेलियों को थामती। मुझसे कहीं बाहर जाने को कहती, बात करने को कहती। उसे लग रहा था कि मैं मां के मर जाने से उदास हूं।
असल में मां की इतनी सुंदर मौत से मैं खुश थी। इसके लिए मैं उसकी अहसानमंद थी।
जीवन भर मां को कोई सुख न दे सकी कम से कम सुकून की मौत ही सही।

अनार की डाल पर इस बरस खूब अनार लटके। इतने कि डालें चटखने लगीं।
लाल कलगी वाली चिडि़या फिर से गुनगुनाने लगी।
मां की तस्वीर पर माला मैंने चढ़ने नहीं दिया।

उस रोज भी कमरे में चार लोग थे।
वो, मैं दोस्त और मां तस्वीर में.
वो जो सबसे कम था लेकिन था
मैं जो थी लेकिन नहीं थी
दोस्त पिछली बार की तरह वहीं थी न कम न ज्यादा
मां कमरे में सबसे ज्यादा थीं, तस्वीर में।

'साथ चलोगी?' उसने पूछा.
'साथ ही चल रही हूं साढे़ चौदह सालों से,' मैंने कहना चाहा लेकिन चुप रही।
'कहां?' दोस्त ने पूछा।
'अमेरिका....' उसने कहा
'लेकिन...' दोस्त ने कुछ कहना चाहा पर रुक गई।
'यहां सबको इस तरह छोड़कर...कैसे...' दोस्त ने अटकते हुए कहा।
शायद उसे उम्मीद थी कि वो पिछली बार की तरह उसे रोक देगा यह कहकर कि, 'लेकिन की चिंता मत करो, मैं संभाल लूंगा। सब। बस यकीन करो।'

उसने कुछ नहीं कहा। मैं मां की तस्वीर को देख रही थी।
'हां, मैं भी वही सोच रहा था।' उसने आखिरी कश के बाद बुझी हुई सिगरेट की सी बुझी आवाज में कहा।
'आपका जाना जरूरी है?' दोस्त राख कुरेद रही थी।

वो खामोश रहा।
चांदनी अनार के पेड़ पर झर रही थी।
'हां,' उसने कहा। दोस्त उठकर कमरे से चली गई। शायद गुस्से में। या उदासी में।
अब कमरे में तीन लोग थे मैं वो और मां।

'तुमने मेरी मां को सुख दिया,' कहते हुए मेरी आवाज भीगने को हो आई।
'तुम्हें भी देना चाहता था...' उसने कहा।
मेरे कानों ने सिर्फ 'था' सुना...

वो बिना ये कहे कमरे से चला गया कि 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा।'
न मैं यह कह पाई कि 'उम्र भर उसे न देख सकने का रियाज कर रही हूं...'

Tuesday, June 11, 2019

जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये...



चाँद एकदम ठीक से सज गया है खिड़की में. न कम न ज्यादा, न रत्ती भर दाएं, न रत्ती भर बाएं खिड़की के ठीक सामने। सामने वाले पेड़ के कोने से झांकता. मैं उसे देख सुकून की सांस लेती हूँ. भीतर की सूखी नदी को नमी महसूस होती है. भागते-भागते थक चुके पैरों पर उभर आये छालों को जैसे मरहम मिला हो. तेज़ हवा का झोंका करीब आकर बैठ गया है. बीती हुई शाम की खुशबू मोगरे के फूलों में बसी हुई है. मोगरे जो पास ही कहीं खिले हैं. वो दिख नहीं रहे, महसूस हो रहे हैं. इश्क़ की तरह.

गोमती के किनारे से गुजरते हुए नदी में पांव डालकर बैठने की जिस इच्छा को पाला पोसा था उसे हरिद्वार में गंगा में पांव डालकर घंटों बैठकर पूरा होते देखना सपना नहीं था. सोचती हूँ कि सपना क्या था आखिर. मेरी आँखें छलक उठती हैं कि मेरा कोई सपना नहीं था. न है. बस कि नन्हे नन्हे लम्हों को शिद्द्त से जीने की इच्छा थी. बारिशों को पीने की, समंदर के किनारों पर घंटों पड़े रहनी की इच्छा जो अवचेतन में ही पड़ी रही होगी शायद। कि जब बारिश ने मुझे अपनी गिरफ्त में लिया तब मुझे अपनी इच्छा का इल्म हुआ, जब समंदर ने किनारे से उठाकर भीतर फेंक दिया तब समझी कि आह यह भी कोई इच्छा थी भीतर.

हमेशा जीकर ही जाना है अपनी इच्छाओं को, जी चुकने के बाद या कभी-कभी जीते हुए भी. जीने से पहले किसी इच्छा को जाना होता तो उसका पीछा किया होता. सपने खूब देखने चाहिए कहते हुए भी खुद के सपनों का पता नहीं लगा सकी.

आज फिर ऐसी ही किसी अनजानी इच्छा के भीतर हूँ. उसके भीतर होते हुए, उसे जीते हुए उसे जीने के लिए जूझते हुए, थकते हुए, निढाल होते हुए यूँ चाँद देखने का सुख मेरा सपना तो नहीं था. फिर क्योंकर मैं ऐसी घर की तलाश में भटक रही थी जिसकी खिड़की से चाँद दिखता हो.

वो सपने जो डरकर हम देखते नहीं वो अपना तिलस्म गढ़ लेते हैं, वो बैकडोर इंट्री लेते हैं. मैं इन दिनों ऐसे ही किसी अनदेखे सपने की जद में हूँ. वो सपना जो मेरा नहीं था लेकिन जिसमें होने का सुख मेरा ही है.

मेंहदी हसन को सुनना इस सपने का उन्वान है. गहरी ख़ामोशी है आसपास, 'जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये... अरसे बाद यह आवाज कानों में घुल रही है. यह चुराया हुआ लम्हा है, या बहुत मेहनत से उगाया हुआ. यह लम्हा बहुत छोटा है लेकिन इसने मुझे थाम लिया है. मुझे अपने खुद के पास वापस लौटने की इच्छा वापस जागती हुई नज़र आ रही है. खुद को छूकर देखती हूँ. कोई सिसकी फूटती है... कितनी दूर निकल गयी हूँ खुद से. कोई नहीं कहता कि 'लौट आओ, मत जाओ... ' फिर मैं दूर जाती ही जाती हूँ किसी रोबोट की तरह.. लेकिन ये चाँद मेरा रास्ता रोके खड़ा है आज. मेरी खिड़की के ठीक सामने टंगा चाँद। मेरे कमरे से नज़र आता चाँद.

मैं बहुत रोना चाहती हूँ. बहुत सोना चाहती हूँ. थोड़ा सा जीना चाहती हूँ बहुत सारा मरना चाहती हूँ. कि मेरी हथेलियों में कोई लकीरें नहीं, मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं बस कि माथे पर चाँद का टीका है...

पांव का दर्द टप टप कर रहा है. यह दर्द दिल के दर्द से कितना कम है. मैं न दुखी हूँ न उदास हूँ बस मैं हूँ... बाद मुदद्त।


(इश्क़ शहर, घर)

Wednesday, May 15, 2019

मेरा कोना भीग रहा है


जैसे किसी सपने में आँख खुली हो. जैसे मौन में कोई बात चली हो. खामोश बात धीमे धीमे सुबह की ओसभरी घास पर चलते हुए. मैं इस मौन को सुन रही हूँ. ठीक ठीक सुन नहीं पा रही हूँ शायद. जितना सुन पा रही हूँ उसमें असीम शांति है.

सामने लीची, आम और अनार के पेड़ भीग रहे है. मेरा शहर बरस रहा है. भीतर भी, बाहर भी. भीतर ज्यादा बरस रहा है. भीतर सूखा भी ज्यादा हो गया है. मैं बाहर झरती बारिश की आवाज में डूबी हूँ. सामने जो गार्डन है जिसकी बेंच पर रात में बैठकर कुछ देर खुद से बात करना अच्छा लगता है वो भी भीग रही है. कबूतर भीग रहे हैं और पांखें खुजला रहे हैं. झूले भीग रहे हैं. बच्चे स्कूल गये हैं. स्त्रियाँ घर की साफ सफाई में लगी हैं. ऑफिस जाने वाले ऑफिस जाने की तैयारी में लगे हैं. किसी के पास बारिश को सुनने की फुर्सत नहीं. हालाँकि सूखा सबके भीतर है. मेरी चाय के पास मेरे प्रिय कवि हैं विनोद कुमार शुक्ल 'कविता से लम्बी कविता' बनकर. जीवन से लम्बा जीवन, बारिश से ज्यादा बारिश, उदासी से ज्यादा उदासी और सुबह में ज्यादा सुबह का उगना महसूस हो रहा है.

बरसों की थकान है पोरों में. बहुत सारे सवाल हैं आसपास. ढेर उलझनें, लेकिन इस पल में कुछ भी नहीं. खुद मैं भी नहीं. स्त्री के लिए एक कोना होना जरूरी है. स्त्रियों अपने लिए, गहना, जेवर, महंगी साड़ियाँ बाद में लेना पहले माँगना या ले लेना अपना एक कोना. यह कोना जीवन है. इस कोने में हमारा होना बचा रहता है. आज जीवन के मध्य में एक सुबह के भीतर खुद को यूँ देखना मीठा लग रहा है. इस इत्ती बड़ी सी दुनिया में यह मेरा कोना है, मेरा घर. मेरा कोना बारिश में भीग रहा है...सूखा बहुत हो गया था सचमुच. यह भीगना सुखद है.

Wednesday, May 1, 2019

घर


रंग भरे जा रहे हैं दीवारों पर. दीवारें जिन पर मेरा नाम लिखा है शायद. कागज के एक पुर्जे पर लिखा मेरा नाम जिस पर लगी तमाम सरकारी मुहरें. जिसके बदले मुझे देने पड़े तमाम कागज के पुर्जे. 'घर' शब्द में जितना प्रेम है शायद वही प्रेम दुनिया के तमाम लोगों को घर बनाने की इच्छा से भरता होगा. मेरे भीतर ऐसी कोई इच्छा नहीं रही कभी. बड़े घर की, बड़े बंगले की, गाडी की, ये सब इच्छाएं नहीं थीं कभी. लेकिन इन सब इच्छाओं के न होने के बीच यह भी सोचती हूँ कि मेरी इच्छा क्या थी आखिर. जिन्दगी के ठीक बीच में आकर यह सोचना बहुत अजीब है कि मेरी कोई इच्छा ही नहीं थी. कोई सपना भी नहीं. बस इतना कि जो लम्हा है उसे भरपूर जिया जाय. जीवन में हरियाली खूब हो, आसपास कोई नदी हो, समन्दर हो, चिड़िया हो. शायद चारदीवारों वाले घर से बड़ी ख्वाहिश थी यह. हर मोहब्बत भरी आवाज मुझे मेरा घर लगने लगती थी.

आज मेरा खुद का घर है एक चिड़ियों की आवाजों से भरे इस खूबसूरत शहर में. मुझे इस शहर की हवाओं से प्यार है. यहाँ की सड़कों से प्यार है. मैंने कुछ नहीं किया सच, यह इस शहर से हुए प्यार का असर ही रहा होगा जिसने पहले आवाज देकर बुलाया और फिर इसरार करके बिठा लिया. मैं ठहर गयी हूँ इस शहर में. मैं चाहती हूँ कि दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी किसी मोहब्बत भरी आवाज को अनसुना न करे. हर पुकार कोई जवाब आना चाहिए.

भीतर कई तरह के मंथन चल रहे हैं. दीवारों पर रंग चढ़ाये जा रहे हैं. मेरी पसंद के रंग. वो मेरी पसंद का रंग कौन सा है पूछ रहे हैं कौन सा रंग मैं कहती हूँ, जंगल, नदी, सवेरा. वो मेरा मुंह देखते हैं. मैं झेंप जाती हूँ. मुझे दुनियादारी नहीं आती. जब प्यार आता है बहुत तो रोना भी आता है बहुत. दुःख में कम आता है रोना. प्यार में बहुत आता है, फूट फूटकर रोने को जी चाहता है. हालाँकि जब कोई रास्ता नहीं दिखाई देता आगे का तब भी रोना आता है, बिना आंसुओं वाला रोना. ये वाला रोना बहुत तकलीफ देता है.

आजकल कई तरह का रोना साथ रहता है. हर वक़्त. इसमें कोई भी सुख का रोना नहीं है. हालाँकि मेरा घर मेरे रंग में ढलने को तैयार है.

मैं उस घर की मोहब्बत में हूँ जो कागजों में मेरा नहीं था. लेकिन इसी घर ने मुझे सहेजा भी, सम्भाला भी. मैं एक सहमी सी नन्ही बच्ची की तरह आई थी यहाँ. एक सूटकेस लिए. इस घर में मैं बड़ी हुई. चलना सीखा, बोलना सीखा. इसकी दीवारों में मेरे आंसुओं की नमी है. एक-एक कोना मुझे हसरत से देख रहा है. यह घर मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट है. जब कोई नहीं था तब इसने हाथ थामा. रोने की जगह बना, हंसने की वजह भी. अब यह घर मेरा नहीं रहेगा. इस घर की दीवारों पर मेरी पसंद के रंग भी नहीं थे. लेकिन इस घर ने मुझे बहुत दुलराया है. छूटना आसान नहीं होता. लेकिन छूटना तय होता है.

अभी उस नए घर से मेरा रिश्ता बना नहीं है. सिर्फ कागजों पर बना है रिश्ता. यह बिलकुल उसी तरह है कि ब्याह हो गया है, अभी प्यार हुआ नहीं है. उम्मीद है प्यार भी हो जायेगा. लेकिन एक प्यार जो बिना रिश्ते के हो चुका वो कभी नहीं जायेगा जीवन से. इस घर से प्यार घर जो असल में मेरा नहीं था लेकिन शायद घर भी जानता होगा कि वो मेरा ही था हमेशा से...छूटना आसान नहीं. जाने क्या क्या छूट रहा है हालाँकि रात दिन सामान पैक हो रहा है...मैं जानती हूँ कुछ भी पैक नहीं हो पायेगा. सब छूट जाएगा...

Tuesday, April 30, 2019

म्यूजिक टीचर के असर में रहना


जैसे बुरे दिनों के लिए अम्मा छुपा के रखती थीं रसोई के डिब्बों में कुछ रूपये, जैसे बाबा बचा के रखते थे भीतर वाले खलीते (जेब) में गाढे वक़्त के लिए कुछ मुस्कुराहटें और ढेर सारी हिम्मत. जैसे हम बचपन में अपनी खाने की थाली में से बचाकर रख लेते थे बेसन का लड्डू फिर उसे सबके खा चुकने के बाद धीरे धीरे स्वाद लेकर खाते थे ठीक वैसे ही रखती हूँ अपने प्रिय लेखक के लिखे को. जब दिन का हर लम्हा आपस में गुथ्थम गुथ्था कर रहा होता है, जब सुबहों की शामों से एकदम नहीं बनती, जब नहीं लगता किसी काम में मन, न पढ़ा जाता है कुछ, न सूझता है कुछ भी लिखना. तब इस लेखक के लिखे को निकालती हूँ और जिन्दगी अंखुआने लगती है. लेखक यकीनन मानव कौल हैं. 'ठीक तुम्हारे पीछे' से बहुत पहले, 'प्रेम कबूतर' से भी बहुत पहले से वो मेरे प्रिय लेखक हैं. प्रिय निर्देशक भी. अब देख रही हूँ कि वो प्रिय अभिनेता भी बनने लगे हैं. इतनी लम्बी भूमिका है हाल ही में देखी उनकी फिल्म 'म्यूजिक टीचर' के बारे में कुछ कह पाने की कोशिश की.

सोचा था 19 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ होते ही देखूँगी इसे, लेकिन जिन्दगी सामने आकर हंस दी यह कहते हुए कि ' तुम नहीं मैं डिसाइड करुँगी तुम कब क्या करोगी.' और मेरे पास सर झुकाने के सिवा कोई चारा नहीं था. तमाम लोग फिल्म देखकर अपनी राय देते रहे मैंने कुछ नहीं पढ़ा, किसी को नहीं. यह फिल्म मेरे लिए बुरे दिनों की खर्ची थी, इसे संभालकर खर्चना था. बेहद उलझे और निराश दिनों में उम्मीद थी कि एक फिल्म है जो मुझे डूबने से बचा लेगी. कुछ है जो बचा हुआ है. फिर एक रोज तमाम मसायलों को दूर रखकर फिल्म देखना शुरू किया. फ़ोन स्विच ऑफ  करके भी कि कोई भी व्यवधान फिल्म की रिदम तोड़ दे यह नहीं चाहती थी.

सार्थक दास गुप्ता ने बेहद खूबसूरत फिल्म बनाई है. फिल्म का पहला फ्रेम जिस तरह खुलता है वो आपका हाथ पकडकर अपने साथ एक अलग दुनिया में ले जाता है. बेनी की दुनिया में, बेनी जो झरना है, गीत है, पहाड़ है, जंगल है, पुल है, नदी है. बेनी जो संगीत का शिक्षक नहीं समूचा संगीत है. पूरी फिल्म हर दृश्य में जिस तरह प्रकृति के अप्रतिम सौन्दर्य को लेकर सामने आती है वो मंत्रमुग्ध करता है. वो पहाड़ी रास्ते वैसे ही हैं जैसा होता है जीवन. देखने में बेहद खूबसूरत लेकिन चलने में साँस फूल जाय. पर्यटक का पहाड़ वहां के रहनवासियों के पहाड़ से इतर होता है. फिल्म के पहाड़,  जंगल , धुंध में डूबी वादी पर्यटक की नहीं है वहां के रहनवासियों की है.

स्मृतियों का कोलाज बनता बिगड़ता रहता है. बेनी इस फिल्म के हीरो हैं लेकिन एक हीरो और है फिल्म में इसके सिनेमेटोग्राफर कौशिक मंडल. ओह इतने सुंदर दृश्य, इतना मीठा संगीत जैसे कोई जादू. अमृता बागची ज्योत्स्ना के रोल में और बेनी के रोल में मानव कौल बेहद इत्मिनान वाले सुंदर दृश्य रचते हैं. फिल्म में कहीं कोई हडबडी नहीं. सब इत्मिनान से चलता है. जैसे आलाप हो कोई...या कोई तान.

कुछ दृश्य हैं जो कभी नहीं भूलूंगी. एक दृश्य जिसमें ज्योत्सना, बेनी से पूछती है 'मेरे कान के झुमके कैसे लग रहे हैं? 'फिर आगे पूछती है 'मैं कैसी लग रही हूँ?' सादा से इन सवालों के जवाब में बेनी का गाढ़ा संकोच, शर्मीलापन उनके भीतर तक की सिहरन को बयां करने में कामयाब है.
एक दृश्य जहाँ किसी का अंतिम संस्कार होने के बाद बेनी की पड़ोसन गीता (दिव्या दत्त) कुछ चीज़ें जला रही है. चीज़ें कहीं नहीं है, आग भी जरा सी है लेकिन धुआं ...ओह उस दृश्य में वह धुआं हीरो है जिसके बैकग्राउंड में बेनी और गीता हैं. दुःख के उन पलों में दो उदास लोग एक बहुत घना रूमान रचते हुए. वो धुआं कितना कुछ कहता है. मारीना त्स्वेतायेवा की  'द  कैप्टिव स्पिरिट' की याद हो आती है. काफ्का की याद उन्हीं दृश्यों में घुलने लगती है. वह बेहद खूबसूरत दृश्य है.
एक और दृश्य जिसमें बेनी बहन की शादी का कार्ड पोस्टबॉक्स में डालने की न डालने की दुविधा को कुछ लम्हों में दर्शाता है. वो कुछ सेकेण्ड भीतर की पूरी जर्नी की डिटेलिंग देते हैं.

दिव्या दत्त के बारे में अलग से बात किया जाना बेहद जरूरी है कि एक तो वो मुझे प्रिय हैं हमेशा से. जिस भी फिल्म में जब भी वो हुई हैं लगता है वो उसी किरदार के लिए जन्मी हैं. इतना इकसार हो जाती हैं वो और सच कहूँ तो वो जब तक रहती हैं सबको ओवरलैप कर लेती हैं. कमाल की अदायगी. इस फिल्म में भी गीता की भूमिका में ऐसा ही असर छोड़ जाती हैं. उनके रोल पर अलग से बात हो सकती है जिसमें बहुत सारे स्त्री विमर्श के शेड्स समाहित हैं.

मानव कौल ने इस फिल्म में अच्छा अभिनय किया है यह कहना ज्यादती होगी क्योंकि मुझे ऐसा लगा कि उन्होंने अभिनय किया ही नहीं है बल्कि जिया है पूरी फिल्म को, हर दृश्य को, हर संवाद को. वो फिल्म में घुले हुए हैं. यह फिल्म मानव कौल के सिवा और कौन कर सकता था भला. यह उन्हीं की फिल्म है. हर फ्रेम में, हर संवाद में और हर मौन में मानव एकदम परफेक्ट हैं.

अमृता बागची फ्रेश हैं. वो मानव के साथ स्क्रीन शेयर करते हुए अच्छी लगती हैं और जितनी उनकी भूमिका है उसे ठीक से करने का प्रयास करने का पूरा प्रयास करती हैं.

सार्थक दासगुप्ता के और काम को देखने की इच्छा बढ़ रही है. फिल्म के तमाम और पहलुओं पर बात हो सकती है, तमाम डिस्कोर्स जो रचे बसे हैं लेकिन अभी उन पर बात करने का मन ही नहीं है. बस कि कविता सी झरती इस फिल्म के असर में रहने का मन है कुछ दिनों.


Monday, April 22, 2019

'ये कविताओं के पंख फ़ैलाने के दिन हैं '


'क' से कविता यह नाम नया है लेकिन इस भावना वाला काम तो मैं तकरीबन 60-65 सालों से कर रहा हूँ कि दूसरों की कविताओं को सुनाना. वहां भी दूसरों की कविताओं को सुनाना जहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है मेरी अपनी कविताओं को सुनाने के लिये क्योंकि मुझे लगता है कि जो मुझसे भी अच्छी कवितायेँ लिखी गयी हैं वो भी उन सबको सुनानी चाहिए जो कविताओं से प्रेम करते हैं.' 
- नरेश सक्सेना 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

'क से कविता क से क्या कहने. मेरा जो मानना है कि कविता को जन तक कैसे ले जाएँ उसका यह बहुत अच्छा उपक्रम है. जनता को कविता की समीक्षा करने का मौका मिलता है मेरे ख्याल से यह बहुत बड़ी बात है. कविता अगर जिन्दा रहेगी तो लिखने से ज्यादा ऐसे कार्यक्रमों से जिन्दा रहेगी. नये नए ज्यादा से ज्यादा लोगों का कार्यक्रम से जुड़ना ही कार्यक्रम की उपलब्धि है.
- लाल बहादुर वर्मा 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

मुझे कार्यक्रम में आकर बहुत अच्छा लगा. मैं देहरादून का हूँ कविता के कार्यक्रम में इतने लोगों का जमा होना, बराबर बने रहना है यह बड़ी बात है. कार्यक्रम का कंटेंट, संचालन, पूरी बुनावट में जो तारतम्यता थी वो कमाल की थी. इसे जिस सादगी जिस सहज भाव से चलाया जा रहा है इसे ऐसे ही चलने दें.'
- हमाद फारुखी 28 अप्रैल 'क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में 

कविता प्रेम, सच्चाई, मनुष्यता की ओर ले जाती है. हम सबको मिलकर स्कूलों में कॉलेजों में इस तरह के कार्यक्रम को जाना चाहिए और हम सबको छात्रों को इससे जोड़ने का प्रयास करना चाहिए.-
इन्द्रजीत सिंह 28 अप्रैल 'क' से कविता

एक बेहद सादा सा, सुंदर सा भाव था मन में कि कोई ऐसा ठीहा हो जहाँ दो घड़ी सुकून मिले. रोजमर्रा की आपाधापी से अर्ध विराम सा ठहरना हो सके. जहाँ होड़ न हो, जहाँ तालियों का शोर न हो, जहाँ छा जाने की इच्छा न हो, बस हो मिलना अपनी प्रिय कविताओं से और कविता प्रेमियों से. (अपनी कविता के प्रेमियों से नहीं).और संग बैठकर पीनी हो एक कप चाय. इस विचार ने बहुत मोहब्बत के साथ कदम रखा शहर देहरादून ने 23 अप्रैल 2016 को और दो साल पूरे होते होते यह उत्तरकाशी, श्रीनगर, हल्द्वानी, रुद्रपुर, खटीमा, टिहरी, रुड़की, पौड़ी, अगस्त्यमुनि, गोपेश्वर, लोहाघाट (चम्पावत), पिथौरागढ़,बागेश्वर और अल्मोड़ा तक इसकी खुशबू बिखरने लगी. 

कब सुभाष लोकेश और प्रतिभा पीछे छूटते चले गए और रमन नौटियाल, भास्कर, हेम,पंत शुभंकर, ऋषभ, मोहन गोडबोले निशांत, प्रमोद, विकास, राजेश, नीरज नैथानी, नीरज भट्ट, सिद्धेश्वर जी, प्रभात उप्रेती, अनिल कार्की, महेश पुनेठा, मनोहर चमोली, गजेन्द्र रौतेला, भवानी शंकर, पियूष आदि इस कारवां को आगे बढ़ाने लगे पता ही न चला. गीता गैरोला दी तो सबकी प्यारी लाडली दी हैं उन्होंने इसकी मशाल जिस तरह थामी कि मोहब्बत की आंच थोड़ी और बढ़ गयी. 

देहरादून में नूतन गैरोला, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, नीलम प्रभा वर्मा दी ने लगातार अपने प्रयासों से और स्नेह से इसे सींचा. कल्पना संगीता, कान्ता, राकेश जुगरान, नन्द किशोर हटवाल, सतपाल गाँधी, सुरभि रावत, स्वाति सिंह, नन्ही तनिष्का सहित सैकड़ों लोग नियमित भागीदार बनते गये. कार्यक्रम की सफलता असल में शहर की सफलता है. देहरादून को अब बारिशें ही नहीं कवितायेँ भी सींच रही हैं. उत्तराखंड के अन्य शहरों को भी.

इस कार्यक्रम को व्यक्ति का नहीं, समूचे शहर का होना था. व्यक्तियों को इसमें शामिल होना था. कहीं पहुंचना नहीं था, कुछ हासिल नहीं करना था बस कि हर बैठकी का सुख लेना था, लोगों से मिलने का सुख, सुकून से दो घड़ी बैठने का सुख, प्यारी कविताओं को पढने का सुख, सुनने का सुख.

बोलने और लिखने की होड़ के इस समय में यह पढ़ने और सुनने की बैठकी बनी. लेखकों की नहीं पाठकों की बैठकी. शहरों ने इस कार्यक्रम को अपने लाड़ प्यार से सींचा. जो लोग बैठकों में शामिल होने आये थे वो इसके होकर रह गए. अब घर हो या दफ्तर कुछ भी प्लान करते समय महीने के आखिरी इतवार की शाम पहले ही बुक कर दी जाने लगी. बच्चे, युवा, साहित्यकार, बिजनेसमैन, गृहणी, शिक्षक सब शामिल हुए. सबने अपनी प्रिय कवितायेँ पढ़ीं, कितनों ने पहली बार पढ़ीं. कितनों ने ही यहाँ आकर समझा पढने का असल ढब. सुना कि किसी को कोई कविता क्योंकर अच्छी लगती है आखिर.

यह कोई नया विचार नहीं था क्योंकि बहुत से लोग मिले जिन्होंने कहा कि ऐसा तो हम सालों से कर रहे थे. कुछ बैठकों में शामिल भी हुए हम कुछ के बारे में सुना भी. महेश पुनेठा पिथौरागढ़ में 'जहान-ए-कविता' चला ही रहे थे. भास्कर भी ऐसे तमाम प्रयोग करते रहे थे. हेम तो हैं ही प्रयोगधर्मी. फिर क्या ख़ास है इन बैठकों में. खास हुआ सबका जुडना. एक नयी जगह में बैठकी की सूचना परिवार में नए सदस्यों की आमद सा लगता.

उत्तराखंड ने इन बैठकों को अलग ही ऊँचाई दी. यहाँ हमें 'मैं' से दूर रहने वाली बात पर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. जो साथी शामिल हुए वो सब स्वयं 'मैं' से बहुत दूर थे दूर हैं. न शोहरत की तलाश, न पीठ पर किसी थपथपाहट की उम्मीद बस कि हर बैठक के बाद होना थोडा और समृद्ध, होना थोड़ा और मनुष्य, और तरल, और सरल.

इन बैठकों में शामिल लोग नाम विहीन से हो जाते थे, चेहरा विहीन. बिना तख्ती वाले लोग इतना सहज महसूस करते कि बैठकों का इंतजार रहने लगा. शहर ने बाहें पसारीं और कार्यक्रम को अपना लिया. हमें न कभी जगह की कोई परेशानी हुई न चाय की. जबकि न हमने चंदा किया न किसी से फण्ड लिया. सब कैसे इतनी आसानी से होता गया के सवाल का एक ही जवाब था प्रेम, कविताओं से प्रेम.

देहरादून में 28 अप्रैल को हुई दूसरी सालाना बैठक असल में राज्य स्तरीय बैठक न हो पाने के बाद आनन-फानन में मासिक बैठक से सालाना बैठक में बदल दी गयी. फिर न पैसे थे न इंतजाम कोई और न ही वक़्त. ज्यादातर साथी शहर में ही नहीं थे. लेकिन जब शहर किसी कार्यक्रम को अपना लेता है तो आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. और यह किसी कार्यक्रम की किसी विचार की सबसे बड़ी सफलता होती है कि उसे व्यक्तिपरक होने से उठाकर समाज से जुड़ जाए. शहर के सारे लोग इसकी ओनरशिप लेते हैं. सबकी चिंता होती है कि कोई कमी न रह जाए. सब मिलकर काम करते हैं, सब मिलकर एक-दूसरे के होने को सेलिब्रेट करते हैं. मेहमान कोई नहीं होता, मेजबान सब. कोई मंच नहीं, माल्यार्पण नहीं, मुख्य अतिथि नहीं, दिया बाती नहीं, किसी का कोई महिमामंडन नहीं. जेब में चवन्नी नहीं थी लेकिन दिल में हौसला था तो निकल पड़े थे सफर
में और देखिये तो कि आज दो बरस में पूरा उत्तराखंड कविता की इन भोली बैठकियों से रोशन है.

क' से कविता की दूसरी सालाना बैठक में लोग मुम्बई से भी आये थे, दिल्ली से भी लखनऊ से भी और उत्तरकाशी से भी. कबीराना थी शाम...फक्कड़ मस्ती, गाँव दुआर पे कहीं बैठकर, चौपाल में, कुएं की जगत पर खेत के किनारे मेड पर बैठकर भी जैसे कबीरी हुआ करती होगी वैसी हो चलीं हैं कविताओं की ये बैठकियां. 
 

Thursday, April 11, 2019

कहानी- स्कूल


- ज्योति नंदा

सुन ऋषि ,कल रात को खूब मजा आया" वो बोली।
"अच्छा। क्या हुआ ? फिर वही , झूठ- मूठ सोने की एक्टिंग "
"नहीं नहीं ,कल मम्मा -पापा को बहुत डांट पड़ी.।
हा हा हा..... ऋषि की हंसी रुक ही नहीं रही थी। मां पापा को भी कभी डांट पड़ती है क्या ? उसने तो कभी देखा ही नहीं था कि माँ को कभी किसी ने डाटा ?
"हंस क्यों रहा है तू ?, रात को अचानक दादी दादू आ गए ,गाँव से, उन्होंने डांटा बड़ा मजा आया। " सुडूप्प ..की आवाज़ के साथ होठों को गोल बना कर नूडल्स खाती है।
क्यों"? मुश्किल से हंसी रोकते हुए ऋषि ने पूछा।
"मम्मा पापा एक कमरे में नहीं सोते इसीलिए और क्या?" उसने व्यंग किया जिस तरह उसे फ़िज़ूल की बातो पे डात पड़ती है वैसे ही दादा ने अपने बेटे को डाटा। मानो कोई रीत हो जो पीढ़ियों से चलती आ रही है। बेवजह बातो पे बड़ो का छोटों को डांटना।
ऋषि झल्लाया "ऐ तू चुतिया है क्या?"
"ऐ ऐ तू पागल , इडियट ,जबान संभाल अपनी न न पुन.. सक हकलाती ज़बान में नया शब्द बोला उसने।

"व्हाट व्हाट.....यु सैड"
तू गन्दी बात बोलेगा तो मै भी बोलूंगी ."
"अच्छा अच्छा ठीक है अब नहीं कहूँगा पलटवार होते ही ऋषि समझौते की मुद्रा में आ गया."पर तूने क्या बोला, न न ??? यह तो कुछ नया है , कहा से सीखी ?
"पता नहीं" अदिति चिढ गयी।
ऋषि समझ गया ज्यादा पूछना ठीक नहीं "अच्छा तू ही बोल अलग सोने के लिए डांट पड़ती है क्या "?
"कल मम्मा पापा मुझे सुलाने के बाद फिर से झगड़ने लगे"
'अरे वाह! बहुत दिनों के बाद तेरे मम्मा पापा ने फाइट की" ऋषि ने चटकारे लेकर कहा.उसकी आँखे चमक से और फ़ैल गयी. ऐसा कुछ जानने कि लालसा में जो वह अक्सर सुनना चाहता है.लेकिन क्यों ? ये वो नहीं जानता।

अदिति मायूसी से बोली "अब तो मम्मा पापा बात ही नहीं करते.बस मेरे पीछे पड़े रहते है,अदिति खाना खालो, नहा लो, पढ़ लो. पर कल फिर से लड़ने लगे" मुँह टेढ़ा कर बोली."हम दिवाली पर गाँव गए थे न वहा भी दादी मम्मा पर गुस्सा कर रही थी एक छोटा भइय्या चाहिए ही चाहिए"
ऋषि परेशां हो गया "अब यह कैसे आएगा "?
"ओहो बुद्धू तुझे कुछ नहीं पता.तेरे मम्मा पापा साथ नहीं रहते न इसीलिए.जब मम्मा पापा एक कमरे में सोते हैं तभी तो छोटा भैय्या आता है." ऋषि इस नए प्राप्त हुय ज्ञान को समझने की कोशिश में लगा हुआ था.
".घर में सबको छोटा भैय्या चाहिए.दादी दादू नानू नानी सबको. पर मम्मा ने बोला उन्हें नहीं चाहिए.पापा से कहा की एक ही बहुत है. जैसे चल रहा है चलने दो, नहीं तो कुछ भी नहीं बचेगा और न मैं बचाउंगी "
"क्या बचाना है?" ऋषि के मन में जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे क्या बचाना है अदिति की माँ को। कही वो कोई सीक्रेट एजेंट तो नहीं है? या फिर सुपर मैन वीमेन के भेष में? उन्हें दुनिया बचानी है।

"यह तो मुझे भी नहीं प.ता फिर पापा उठ कर दूसरे कमरे में चले गए. रात को दादी ,दादू आ गए अचानक और मम्मा पापा को खूब डांटा.मजा आया." ताली बजा कर हसने लगी."सब समझ रहे थे में सो रही हूं पर......ऋषि ने फिर छेड़ा।
"पर तू तो नंबर वन चोरनी है सब सुनती देखती रहती है" ऋषि ने चिढाया .अदिति ने आँखे तरेरी.
"मैं तो रात भर आराम से सोता हूँ अपनी मम्मा के साथ , फिर थोडा ठहरा, गहरी सांस ली "कभी कभी नानी आ जाती है बड़ बड करने लगती है.........
...........अच्छा हुआ तू अलग हो गयी,रात को चैन से सो तो लेती है.....कोई फिजूल की झिक झिक नहीं करता........बुढा तो ना जीने देता है न मरने.....".
"बुड्डा कौन ?"अदिति ब्रेड का टुकड़ा मुह तक ले जाते हुय रुकी.
"नाना और कौन" हा हा...दोनों ने ठहाके लगाये "तेरी मम्मा क्या बोलती है?"
"कुछ नहीं बस सिर के नीचे रखा तकिया कान पे ढँक कर सो जाती है.नानी बड़ बड़ करके चली जाती है".
टन टन टन ......"चल-चल टिफिन टाइम ख़त्म हो गया.तेरी बातें ही नहीं ख़त्म होती".ऋषि ने फटाफट टिफिन समेटा और क्लास की ओर दौड़ गया.अदिति भी बेमन से पीछे हो ली.

दूसरे दिन स्कूल में सुबह से ही अदिति कुछ कहने के लिए उतावली दिख रही थी। जी.के.और मोरल साइंस की साप्ताहिक क्लास में अदिति का कभी मन नहीं लगता था। आज तो बिलकुल भी नहीं.टीचर बड़ों का आदर और माता पिता के सम्मान का महत्तव समझा रही थी। अदिति इस इन्तजार में थी कि कब टन टन की आवाज आये. ऋषि उसका उतावलापन भांप गया."ऐ ,क्या बात है?" वह अदिति के कान में फुसफुसाया.
"झूठ नहीं बोलना चाहिए" टीचेर का स्वर गूंजा.
"मम्मा पापा से बहुत गुस्सा है बोल रही थी तुम हमेशा झूठ बोलते हो" अदिति भी फुसफुसाई .
तभी घंटी बज गयी सारे बच्चे मैदान की तरफ दौड़ पड़े.अदिति और ऋषि अब भी घर का, समाज का और किताबी नैतिकता का भेद समझने की कोशिश कर रहे थे.
"कल मम्मा ऑफिस से आने के बाद थक कर लेटी थी तब पापा ने उन्हें एन्रेर्जी ड्रिंक दिया .उसके बाद मम्मा मुझे बहुत प्यार करने लगी .और......ही ही ...ही...."अदिति मुह पर हाथ रख कर हसने लगी.ऋषि फिर झल्लाया " क्या है जल्दी बता."........खी खी ....और न...और और . मम्मा,पापा को भी प्यार कर रही थी.फिर पापा ने कहा अदिति तू दादी के पास सो जा। मैं नहीं जा रही थी लेकिन दादी और पापा ने बोला सन्डे फिल्म दिखायेंगे और आइसक्रीम खिलायंगे तो मैं चली गयी.""ऐ चटोरी" ऋषि ने फिर चिढाया.
"अरे सुन तो. में तो सुबह वापस मम्मा के पास ही थी"
'"अच्छा ! जादू क्या" ऋषि को मजा आने लगा था.
"मम्मा को तो कुछ भी याद नहीं था. फिर मैंने मम्मा को बताया की उन्होंने पापा की दी हुए एनेर्जी ड्रिंक पी थी तो वह पापा से फिर लड़ने लगी और रोने लगी "तुमने मेरा रेप किया है "
"यह रेप क्या होता है? वो जो टी वी की न्यूज़ में नाना नानी दिनभर सुनते रहते है। जब पूछता हूँ तो चैनल बदल देते है। "
वो होगी कोई मामी पापा के बीच की बात, छोड़ न ,.पर दादी ने पता है.... बताया कि...कि"
क्या ?"
"अब छोटा भइय्या आयेगा हमारे घर "

Tuesday, April 2, 2019

पंचम सुर पर चढ़ी वीरानी


हाथों की लकीरें एक-एक कर टूट रही हैं. टूट-टूटकर हथेलियों से गिर रही हैं. नयी लकीरें उग भी रही हैं. टूटकर गिरने की गति नयी उगने की गति से काफी ज्यादा है. हथेली अमूमन अब बिना लकीरों की सी हो चली है. उसे देर तक देखती रहती हूँ. कोरे कागज सी कोरी हथेलियाँ. इन पर स्मृति का कोई चिन्ह तक अब शेष नहीं रहा. इतनी खाली हथेलियाँ देखी हैं कभी? मैं किसी से पूछना चाहती हूँ. लेकिन आसपास कोई नहीं. यह हथेलियों का खाली होना ही है. मुस्कुराते हुए बिना लकीरों वाले हाथ से चाय का कप थामते हुए ध्यान बाहर लगाती हूँ. मन के बाहर भी. बड़े दिन से बाहर देखा ही न हो जैसे. आसमान साफ़ है. ना-नुकुर करते हुए ही सही आखिर सर्दियों की विदाई हो चुकी है. चिड़ियों का खेल जारी है. जब मैं इन्हें नहीं देखती तब भी ये ऐसे ही तो खेलती होंगी. जीवन ऐसा ही है.

एक घर है, जिसकी बालकनी सनसेट प्वाइंट है, एक सड़क है जो आसमान को जाती है, एक पगडंडी है जो न देखे गए ख्वाबों की याद दिलाती है, एक घास का मैदान है जो पुकारता है नंगे पांव दौड़ते हुए आने को, कुछ पागल हवाएं हैं जिन्होंने शहर की सड़कों को गुलाबी और पीले फूलों से भर रखा है. इतना कुछ तो है फिर जीवन का यह वीराना कहाँ से आता है आखिर. जो भी हो यह वीरानगी किसी राग सी लग रही है. पंचम सुर पर चढ़ी वीरानी.

कुछ दिनों से पैदल चलने का मन हो रहा है. यह सड़कों से मेरे रिश्ते की बात है. बिना पैदल चले शहरों से रिश्ता नहीं बनता. बिना नंगे पाँव चले घास से रिश्ता नहीं बनता, बिना दूर जाए करीबी से रिश्ता नहीं बनता. बिना जार- जार रोये सुख से रिश्ता नहीं बनता. लकीरों का यह टूटकर गिरना सुखद है.

Thursday, March 28, 2019

चॉकलेट का पेड़ और उर्मि


उर्मि हर रोज शाम को घर लौटते पंछियों के झुण्ड को देखने को सब काम छोड़ छत पर आ जाती थी. दादी कहतीं कि शाम को पंछी लौटते हैं. वो कहाँ गये थे, कहाँ को लौट रहे थे नन्ही उर्मि को कुछ समझ में नहीं आता था. उसने दादी से कई बार पूछा, दादी वो कहाँ से लौटते है दादी ने हंसकर एक ही जवाब दिया, 'तेरे पापा की तरह वो भी तो ऑफिस जाते होंगे. है न?'

उर्मि की दुनिया में पंछियों के ऑफिस, गाय, भैंसों के ऑफिसों का दृश्य बनने लगते. वो सोचते-सोचते खुश होने लगती. 'दादी, मुझे भी जाना है पंछियों का ऑफिस देखने. वहां क्या काम होता होगा? चिडिया भी फ़ाइल देखती होगी.' ऑफिस का मतलब फ़ाइलों का ढेर और टाईपराइटर की खटर-पटर ही जाना था उर्मि ने अब तक. इसका कारण भी पापा के ऑफिस में कभी-कभार उसका जाना था.

'दादी, आराम से फुर्सत में पैर फैलाकर, खरबूजे के बीज छीलते हुए कहतीं, चिड़ियों के ऑफिस में घोसले की बात होती होगी शायद. कौन से पेड़ पर कौन सी चिड़िया का घोसला हो शायद यह तय होता होगा.'

'फिर तो उनका ऑफिस न ही होता हो यही अच्छा. उनको तो किसी भी पेड़ पर कितना भी बड़ा घोसला बनाने की आज़ादी होनी चाहिए. है न दादी?'
दादी चुप रहतीं. उर्मि का दिमाग चलता रहता.

'उनकी सैलरी कहाँ से आती होगी? कित्ते पैसे मिलते होंगे दादी?' वो भो अपने बच्चों के लिए चौकलेट लाते होंगे घर लौटते समय?

'हो सकता है वो शाम को बच्चों के लिए जो दाना लाते हों उसमें चॉकलेट होती हो.' दादी को भी उर्मि की बातों में मजा आने लगता.

'और गाय भैंस के ऑफिस में क्या होता होगा दादी?'
'क्या पता क्या होता होगा. तुम सोचो तो.'

उर्मि ने कहा, 'दादी गाय बैल को तो वैसे ही इतना काम करना होता है वो ऑफिस में कैसे काम करते होंगे. दिन भर तो खेत में काम करते हैं न बैल. गाय भी. ऊँट भी.'

'तो हो सकता है चारा चरके लौटते हों.' दादी ने कहा.

'अरे हाँ, कित्ता मजा आता होगा फिर तो. पिकनिक से लौटने जैसा. उनकी किटी पार्टी होती होगी. है न?
सुनो बहन, मेरा मालिक मुझे बहुत मारता है, क्या करूँ समझ में नहीं आता. एक कहती होगी. दूसरी कहती होगी, हाँ बहन मेरा भी यही हाल है. सारा दिन काम कराता है, सब दूध निकाल लेता है और खाना भी कम देता है. जी चाहता हूँ कहीं भाग जाऊं.'

उर्मि गाय, बैल की नकल करके ताली पीटकर हंस दी. लेकिन जल्दी ही उदास भी हो गयी. फिर तो वापस लौटते समय खुश नहीं होते होंगे न ये लोग. वही खूंटा, वही चारा, वही काम.'

दादी ने सोचा बच्ची फंस गयी है तो उसे उलझन से निकाल दें. 'लेकिन उसके बच्चे भी तो इंतजार करते होंगे न. जैसे तू करती है अपनी मम्मी, पापा का.' दादी ने कहा.

'हाँ, वो भी बच्चों के लिए चॉकलेट लाते होंगे क्या?' उर्मि की सुई चॉकलेट पर अटकी हुई थी.

'लेकिन दादी उनके पास तो पैसे नहीं होते होंगे फिर वो चॉकलेट कैसे लाते होंगे. वो कुछ भी कैसे लाते होंगे.' उर्मि फिर उदास हो गयी.

'दादी अगर मैं सबको खूंटे से खोल दूं तो ?' यह कहते हुए उर्मि की आँखें चमक उठी थीं.
 दादी ने कहा 'तुम बताओ फिर क्या होगा?'
'वो लोग भी ऑफिस जायेंगे, काम करेंगे और पैसे कमाएंगे. फिर शाम को चॉकलेट लेकर आयेंगे.'

'लेकिन यह भी तो हो सकता है उनके बच्चों को चॉकलेट पसंद ही न हो? जैसे मुझे पसंद नहीं.' दादी को उर्मि की बातों में इतना मजा आ रहा था कि उनकी दोपहर की नींद भी चली गयी थी.

'दादी. आप बूढी हो इसलिए आपको चॉकलेट पसंद नहीं. सब बच्चों को चाकलेट पसंद होती है.' उर्मि को लगा दादी एकदम बुध्धू है. भला चॉकलेट किसे पसंद नहीं होगी.

दादी पोपले मुंह से हो हो करके हंसने लगी. 'ओह मैं तो भूल गयी थी कि मैं बूढी हो गयी हूँ.'

'तो क्या करना चाहिए कि सब बच्चों को चाकलेट मिल जाए.' दादी ने उर्मि को मुश्किल में डालना चाहा.
उर्मि ने कुछ देर सोचा फिर कहा, 'मेरे पास एक आइडिया है.'
'क्या?' दादी ने पूछा.

'मैं नहीं बताउंगी.' उर्मि की आँखों में चमक थी.
दादी की उत्सुकता यह जानने की थी कि उर्मि के पास कौन सा आइडिया है. लेकिन उर्मि ने बताया नहीं.

अगले दिन से घर के बगीचे में लगे पेड़ पर बने घोसले में और पशुओं के बाड़े में  उर्मि की चॉकलेट के रैपर जब तब मिलने लगे. उर्मि अब जब भी चॉकलेट खाती तो उसमें से एक हिस्सा सबके नाम का जमीन में बोने लगी. थोड़ी चॉकलेट घोसलों में चुपके से रख आती कभी जानवरों के चारे में डाल आती.

चाकलेट भले ही चिड़ियों व जानवरों ने न खायी हो, भले ही न उगे हों चॉकलेट के पेड़ लेकिन उन चाकलेट्स की मिठास उर्मि की जिन्दगी में अब तक कायम है.