Thursday, October 4, 2018

बचा रहे बनारस...


दाल में बचा रहे रत्ती भर नमक
इश्क़ में बची रहें शिकायतें
आँखों में बची रहे नमी
बचपन में बची रहें शरारतें
धरती पर बची रहें फसलें
नदियों में बचा रहे पानी
सुबहों में बची रहे कोयल की कूक
शामों में बची रहे सुकून की चाय
दुनिया में बची रहे मोहब्बत
और बचा रहे बनारस...

8 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-10-2018) को "सुनाे-सुनो! पेट्रोल सस्‍ता हो गया" (चर्चा अंक-3116) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी said...

2019 तक तो बचा ही रहना चाहिये :)

Rohitas ghorela said...

खत्म हो रहे हैं ना ये सब...
काश आपकी ये रचना उपर वाला सुन ले..
ये कविता नहीं ये प्रार्थना हो सकती है.

आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ..बहुत अच्छा लगा.
आप भी आइयेगा नाफ़ प्याला याद आता है क्यों? (गजल 5)

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 05/10/2018 की बुलेटिन, 'स्टेंड बाई' मोड और रिश्ते - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Unknown said...

सटीक लेख
book publishers in India

anuradha chauhan said...

बहुत सुंदर

Abhilasha said...

बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना 🙏

Abhilasha said...

बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना 🙏