Sunday, July 29, 2018

असफल प्रेमिकाएं- असीमा भट्ट




वो प्रेतात्माएं नहीं थीं
वो प्रेमिकाएँ थीं
वो खिलना जानती थीं फूलों की तरह
महकना जानती थीं खुशबू की तरह
बिखरना जानती थीं हवाओं की तरह
बहना जानती थीं झरनो की तरह
उनमें भी सात रंग थे इंद्रधनुषी
उनमें सात सुर थे
उनकी पाज़ेब में थी झंकार .
वो थीं धरती पर भेजी गयी हब्बा की पाकीज़ा बेटियां
जिन्हें और कुछ नहीं आता था सिवाय प्यार करने के
वो बार बार करती थीं प्यार
असफल होती थीं.
टूटती थीं
बिखरती थीं
फिर सम्हलती थीं
जैसे कुकनूस पक्षी अपनी ही राख से फिर फिर जी उठता है
फिर प्यार करती थीं
उसी शिद्दत से और उसी जुनून से
दिल ओ जान लुटाना जानती थीं अपने प्रेमियों पर
दे देना चाहती थीं उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ
बचा लेना चाहती थीं दुनिया की हर बुरी नज़र से
कोई भी बला आये तो पहले हमसे होकर गुज़रे
अपने रेशमी आंचल को बना देती थीं अपने प्रेमियों का सुरक्षा कवच
बन जाती थीं उनके लिए नज़रबट्टू लगा कर आँखों में मोटे मोटे काजल
उनके लिए बुनती थीं स्वेटर और सपने दोनों
गुनगुनाती रहती थीं हर वक़्त अपने अपने प्रेमी की याद में
खोयी खोयी अनमनी
अपनी ही धुन में
न किसी का डर
न दुनिया की परवाह
करती थीं रात रात भर रतजगा
और
ऊपर से कहती थी - ख्वाब में आके मिल
उनींदी आँखें लाल होती हैं असफल प्रेमिकाओं की
जैसे रात भर किसी जोगी ने रमाई हो धुनी

असफल प्रेमिकाएँ करती हैं व्रत, रखती है उपवास
बांधती हैं मन्नत का धागा
लगाती हैं मंदिरों और मज़ारों के चक्कर
देती हैं भिखारियों को भीख और मांगती हैं दुआँ में अपने प्यार की भीख
‘मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए’ कहते हुए गाती थी
‘हम इंतजार करेंगे तेरा क़यामत तक’
वो भूल जातीं दिन, महीने और तारीख
भूल जातीं खाना खाना
बेख्याली में कई बार पहन लेतीं उलटे कपड़े
लोग कहते - कमली है तू
और वो खुद पर ज़ोर ज़ोर से हँसतीं
बहाने बनातीं
जल्दी में थी
कमरे में अन्धेरा था
क्या करती, ठीक से दिखा ही नहीं
असफल प्रेमिकाएँ बचाये रखती हैं हर हाल में अपना विश्वास
बचाए रखती हैं अपने प्रेमी के प्रेमपत्र और उनकी तस्वीरें
गीता और कुरआन की तरह .

असफल प्रेमिकाएँ जब जब रातों को अकेली घबरा जाती हैं, रोती हैं तकिये
में मुंह रख कर
सोचती
नितांत एकांत रात में
सन्नाटे को चीरती हुई
उनकी चीत्कार ज़रूर पंहुचती होगी उनके प्रेमी के कानों में
वो अच्छा हो, वो भला हो
सब ठीक हो उनके साथ
कोई आफत न आयी हो उनके पास
जहाँ भी हो सुखी हो
मन ही मन बस यही कामना करती हैं असफल प्रेमिकाएँ
असफल प्रेमिकाएँ लगने लगती हैं असमय बूढ़ी
आ जाती है बालों में समय से पहले सफ़ेदी
और गालों पर झुर्रियां
वो झेल जाती हैं सबकुछ
नहीं झेल पातीं तो अपने प्रेमी द्वारा दी गयी पीड़ा, यातना, उपेक्षा और अपमान
लम्बी फेहरिश्त है असफल प्रेमिकाओं की
जो या तो पागल हुईं
या कुछ ने अपना लिया अध्यात्म
आश्रम या मेंटल एसालम बना उनका घर
वो जिसने खा ली नींद की गोलियां
या काट ली कलाई
किसी से न बर्दाश्त हुआ सदमा और रुक गयी दिल की धड्कन
बहुत उदास और अपमानित हो कर गयीं दुनिया से
वो मरी नहीं
उन्होंने आत्महत्या नहीं की
हत्या हुई उनकी
वो लोग जो उनसे प्यार का नाता जोड़ कर देने लगे समझदारी भरा बौद्धिक तर्क
कहने लगे - प्यार का कतई यह मतलब नहीं कि हमेशा साथ रहें.
हम दूर रह कर भी साथ रह सकते हैं
खुश रह सकते हैं
दूर हैं, दूर नहीं
वो कहती रहीं - एक झलक देखना चाहती हूँ
छूना चाहती हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारी साँसें
तुम्हारी मजबूत बाहों में पहली बार जो गरमाहट और सुरक्षा महसूस किया
था फिर से करना चाहती हूँ वैसा ही मह्सूस
और तुम ज़ोर से हँसते हुए कहते - ‘क्या बचपना है, यह सब बकवास है.’
ले ली उनकी जान इस बकवास ने
तुम्हारे आपराधिक प्रवृति ने
तुम्हारी कुटिल हंसी ने
तुम उड़ाने लगे उनका मज़ाक
खेलने लगे मासूम भावनाओं से
खेलने लगे उनके दिल से
कहती रहीं - खेलो न मेरे दिल से
पूछती रहीं - यह तुम्हीं थे
कौन था वो जो पहरों पहर मुझसे फोन पर करता था बातें
हरेक छोटी छोटी बातें पूछता
अभी कैसी लग रही हो
क्या पहना है
क्या रंग है
बताओ

बताओ ओ प्रेमी !
क्या तुम्हें नहीं लगता
वो बनी ही थीं प्यार करने के लिए
और तहस नहस करके रख दी उनकी जिंदगी
तुमने ले ली उनकी जान
अब डर लगता है तुम्हें
वो कहीं से प्रेतात्माएं बन कर आयेगीं और तुम्हें डरायेंगी
डरो मत
वो प्रेमिकाएँ हैं
प्रेतात्माएं नहीं
वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ती
वो तो क़ब्र में भी गाती हैं अपने प्रेमी के लिए शगुनों भरी कविता
देखना वो अगले बसंत फिर से निकलेंगी अपनी अपनी कब्र से बाहर
और करेंगी प्यार
और यह धरती जब तक अपनी धूरी पर घूमती रहेगी
तब तक वो करती रहेंगी प्यार
और पूरी दुनिया को सिखाती रहेंगी प्यार ...
https://www.youtube.com/watch?v=LhzBPGTydSs

Thursday, July 19, 2018

आपके साथ बीडी पीना तो रह ही गया नीरज जी


(एक पुराना लेख जो उनके जन्मदिन पर लिखा था.)



'आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी’ - नीरज

एक- एक नन्ही सी लड़की चुपचाप अपनी फ्रॉक के किनारी पर लगी फ्रिल को कुतरा करती थी. वो खामोश रहती थी. उसके कोई दोस्त नहीं थे. स्कूल में अपने हम उम्र बच्चों के बीच भी वो अकेली ही थी. क्लास में बैठकर क्लास के बाहर ताका करती और घंटी बजने का इंतजार करती. घन्टी बजते ही सब बच्चे खेल के मैदान की ओर दौड़ जाते और वो धीमे क़दमों से मैदान के किसी कोने में अकेले टिफिन खाती और अकेली घूमती रहती. वो टीचर्स की फेवरेट नहीं थी. घर में उससे यह पूछने वाला कोई नहीं था कि ड्रेस चेंज की या नहीं, खाना खाया या नहीं. ऐसे में भला ये कौन पूछता कि स्कूल में दिन कैसा रहा? क्योंकि उसके माँ बाप जीवन के दूसरे संघर्षों में उलझे थे. उस कक्षा एक में पढ़ने वाली नन्ही लड़की का अकेलापन भांप लिया एक शिक्षक ने जिनका नाम था गोपी सर. गोपी सर भी शायद स्कूल में, या हो सकता है जीवन में ही उस नन्ही बच्ची की तरह अकेले थे. उन्होंने स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए उस नन्ही बच्ची के तरह अकेले और उपेक्षित रह गए बच्चों की ओर हाथ बढ़ाया. ये वो बच्चे थे जिन्हें स्कूल के किसी कार्यक्रम में जगह नहीं मिलती थी, ये सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनते और ताली बजाते. गोपी सर ने उन सारे छूट गए उपेक्षित बच्चों का हाथ थामा और उनके लिए एक कार्यक्रम की योजना बनाई. कार्यक्रम तैयार हुआ ‘कवि सम्मेलन का’. कक्षा एक में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों को सुंदर-सुंदर कविताओं की कुछ छोटी-छोटी लाइने दी गयीं. उन्हें बाकायदा ड्रेसअप किया गया. अब वो बच्चे भी उत्साहित थे. उन बच्चों ने पहली बार मंच पर उन कवियों की कवितायेँ पढ़ीं जिनका शायद नाम भी नहीं सुना था. जिन्हें कविता होती क्या है यह भी पता नहीं था. ये 32 बरस पुरानी बात है. वो ‘इंडियन आइडियल’ और ‘सुपर डांसर’ जैसे कार्यक्रमों का समय नहीं था. उन बच्चों के जीवन में यह छोटी सी प्रतिभागिता बहुत महत्वपूर्ण थी. गोपी सर ने उस रोज न सिर्फ उन बच्चों का हाथ थामा था बल्कि उनकी जिन्दगी में हमेशा के लिए कविता का एक बीज बो दिया था. वो नन्ही सी लड़की मैं थी. उस रात मैंने जिस कवि की कविता पढ़ी थी उनका नाम है गोपालदास नीरज. यह मेरे जीवन में कविता की पहली आहट थी. वो लाइनें टूटी फूटी सी ही याद रहीं, ‘कोई कैसे जिए अब चमन के लिए, शूल भी तो नहीं हैं चुभन के लिए’.

दो- जब मैंने हाईस्कूल पास कर लिया तब पापा टेपरिकॉर्डर लाये थे. घर में बेलटेक का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी था, फिलिप्स का रेडियो भी था जिसका इस्तेमाल ‘बीबीसी की ख़बरें’ या ‘बिनाका गीतमाला’ और ‘हवा महल’ सुनने के लिए होता था, कभी-कभी ‘फौजी भाइयों के लिए कार्यक्रम’ भी. कब कौन सा कार्यक्रम रेडियो पर सुना जायेगा यह तय करने का हक बच्चों का नहीं होता था. ऐसे में टेप रिकॉर्डर आना सुखद घटना थी. चूंकि टेप रिकॉर्डर पापा लाये थे तो जाहिर है अपनी ही पसंद की चार कैसेट भी लाये थे. महीनों वो चार कैसेट ही मेरी खुराक बने रहे. उन चारों कैसेटों में से जिनमें एक थी ‘लता के सुपरहिट गीत’, दूसरी थी ‘मेरा नाम जोकर’, तीसरी थी ‘मुकेश के गीत’ और चौथी थी ‘नई उमर की नई फसल.’ मैंने पहली बार इस फिल्म का नाम सुना था. धीरे धीरे यह कैसेट मेरी फेवरेट हो गयी. ‘कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे’ तो मुझे अच्छा लगता ही था इस कैसेट का एक और गीत मुझे बेहद पसंद था, आज भी बहुत पसंद है ‘आज की रात बहुत शोख बहुत नटखट है, आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी, अब तो तेरे ही यहाँ आने का ये मौसम है, अब तबियत न ख्यालों से बहल पाएगी...’ इस तरह कोई कैसेट जो मेरी प्रिय कैसेट के रूप में और कोई कवि या गीतकार मेरी फेवरेट लिस्ट में पहली बार शामिल हुआ वो थे गोपालदास नीरज.

पत्रकारिता के दिनों की मेरे सबसे गाढ़ी कमाई यही है कि इस दौरान ढेर सारे प्यारे लोगों से मुलाकातें हुईं, उनसे स्नेह हासिल हुआ, दुलार मिला. इसी गाढ़ी कमाई में शामिल है गोपालदास नीरज का नाम भी.

अब तक मैं उन्हें काफी पढ़ चुकी थी. उनसे मेरी पहली मुलाकात थी. अख़बारों में जिस तरह की अफरा-तफरी के माहौल में काम होता है उसमें महसूस करने की स्पेस बहुत कम होती है. उनका इंटरव्यू लेना एक असाइनमेंट भर था. यह उन दिनों की बात है जब मेरी नयी-नयी शादी हुई थी और जैसा कि नयी शादी के बाद का तमाशा होता है पार्टीबाजी, सोशलाइज़िंग वगैरह तो उसका दबाव भी था. तो मुझे ऑफिस से रात नौ बजे निकलकर इंटरव्यू लेना था और साढ़े नौ बजे साड़ी पहनकर किसी पार्टी में जाना था (तब तक ‘न’ कहना सीखा नहीं था).

बहरहाल, जल्दी-जल्दी में इंटरव्यू हुआ और अच्छा हुआ. अगले दिन हिंदुस्तान अख़बार में ‘नीरज खड़े प्रेम के गाँव’ शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ. मैंने साड़ी लपेटकर, लिपस्टिक पोतकर पार्टी भी अटेंड की लेकिन मन उखड़ा ही रहा. मुझे लगा मैं मिली ही नहीं नीरज जी से, इसे क्या मुलाकात कहते हैं, इसे क्या बात होना कहते हैं. स्टोरी भले ही सफल रही हो लेकिन मन खिन्न ही रहा लम्बे समय तक. हालाँकि इस इंटरव्यू में उन्होंने अपनी प्रेम कहानी सुनाई थी, बहुत मन से.

खैर, वक़्त ने न्याय किया. इसके बाद मेरी नीरज जी से कई मुलाकातें हुईं. कुछ अख़बारों में दर्ज हुईं कुछ नहीं भी क्योंकि अब तक मेरी उनसे दोस्ती हो चुकी थी. वो शहर में होते तो हम जरूर मिलते. ढेर सारी बातें करते. मैं उन्हें सुनती ज्यादा, सवाल कम करती. पूछकर जानना मुझे सूचनात्मक ही लगता है, महसूसने की आंच में पकते हुए यात्रा करना असल में जानने की ओर जानना लगा हमेशा सो कोशिश भर यही किया, और असाइनमेंट के बोनस में खूबसूरत दोस्तियाँ और स्नेह हासिल किया.

एक शाम जब वो मंच पर थे तो मुशायरे की स्तरहीनता से मेरा मन बहुत उदास हुआ था. उस शाम नीरज जी ने याद किये थे वो तमाम मुशायरे जब मंच पर साहिर, शैलेन्द्र, कैफ़ी वगैरह हुआ करते थे. वो उन सोने सी दमकती रातों का जिक्र करते हुए बहुत खुश थे, उनकी आँखों में चमक थी. उन्होंने गीतों की यात्रा पर बात की. किसी बात के अर्थ किस तरह खुलते हैं, गीत किस तरह दार्शनिक यात्रा तय करते हैं और सुनने वालों को न सिर्फ सुकून देते हैं बल्कि उनका परिमार्जन भी करते हैं, एक अलग यात्रा पर ले जाते हैं यह लिखने वालों और सुनने वालों दोनों को समझने की जरूरत है. साहिर और शैलेन्द्र को वो काफी याद करते.

मैंने उनसे एक मुलाकात में जिक्र किया अपने बचपन वाले कवि सम्मेलन का और उनकी उस कविता भी जो मुझे ठीक से याद भी नहीं रही...वो हंस दिए थे उस बचकाने से किस्से पर. उन्हें भी कविता याद नहीं थी. वो हमेशा खूब पढ़ने को कहते, जिन्दगी जीने को कहते. उनकी कविताओं को उनके कमरे में चाय पीते हुए सुनना किसी ख़्वाब को जी लेने जैसा होता था...उनका कविता पढ़ने का ढंग मुझे बहुत म्यूजिकल लगता. हालाँकि उनकी आवाज कांपने लगी थी. लखनऊ में चारबाग के पास के एक होटल में उनसे अब तक की आखिरी मुलाकात हुई थी, उस रोज उन्हें चलने में काफी दिक्कत हो रही थी. मेरा मन बहुत उदास था. आयोजकों ने उनके सम्मान के साथ इन्साफ नहीं किया था. उनके रहने की व्यवस्था बहुत सामान्य थी. जबकि उसी कार्यक्रम के लिए आये प्रसून जोशी सरीखे लोगों के लिए दिव्य व्यवस्था थी.

हम बुजुर्गों के सम्मान का भाषण देना जानते हैं, उनके नाम उनकी शोहरत को कैश कराना भी जानते हैं लेकिन उनके साथ इन्साफ नहीं करते. सचमुच मेरा मन बहुत उखड़ा था, वो शायद मेरा मन पढ़ चुके थे. बीड़ी पी चुकने के बाद उन्होंने मेरा मन हल्का करने को कहा ‘एक फोटो तो खिंचवा लो हमारे साथ.’ मैंने छलक आये अपने आंसुओं को सहेजते हुए कहा था, ‘अरे आपसे तो मिलना होता ही रहता है, अभी आप आराम करिए, फोटो फिर कभी खिंचवा लेंगे.’ वो हंस दिए थे...’क्या पता अगली बार हो ही नहीं’. मेरी आंसुओं को सहेजने की सारी मेहनत वो बेकार कर चुके थे...तस्वीर खींची जा चुकी थी...मन की उदासी कायम ही रही...आज उनका जन्मदिन है...उन्हें बहुत बहुत याद करते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ की दुआ कर रही हूँ. दुआ कर रही हूँ कि सेल्फियों और फेसबुक के लाइक्स की भीड़ में बदलता यह समाज, तमाम सामाजिक खांचों में बंटा समाज, हिंसा और आत्ममुग्धता से तृप्त होता समाज, नकली संवेदनाओं का नया मार्केट बनता यह समाज अपनी इतनी महत्वपूर्ण धरोहरों को सहेजना सीख सके...काश!

प्यारे नीरज जी, आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपसे मिलना है जल्दी ही फिर से और सुननी हैं बहुत सी कवितायेँ...इस बार आपकी बीड़ी भी पियूंगी...पक्का. लव यू ऑलवेज, हैपी बर्थडे!


Saturday, July 14, 2018

आइये चलें विदेश बिना पासपोर्ट वीजा

हेम पन्त रचनात्मक ऊर्जा से भरे उन युवाओं में से हैं जो अपने हर लम्हे को भरपूर जीने में और उस जिए से समाज को जोड़ने में यकीन करते हैं. पेशे से इंजीनियर हेम क्रिएटिव उत्तराखंड मंच से शुरुआत से जुड़े हैं. उन्होंने पढ़ने लिखने की संस्कृति के विकास के लिए एक सृजन पुस्तकालय बनाया है. वो 'क' से कविता से जुड़े हैं. थियेटर करते हैं. घुम्म्क्कड़ी, संगीत, साहित्य पढ़ने में खूब रूचि रखते हैं और हर काम में कुछ नया करने को बेताब रहते हैं. पिछले दिनों वो नेपाल यात्रा पर गए तो उन्होंने 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए कुछ संस्मरण लिखे।आइये पढ़ते हैं उनके संस्मरण- प्रतिभा 

नेपाल का एक दृश्य 
एक दृश्य जहाँ हम ठहरे गये 

प्राकृतिक विविधता और हर तरह के पर्यटक के अनुसार मनोरंजन साधनों के कारण नेपाल फिर से तेजी के साथ घुमक्कड़ों की पसन्द बनता जा रहा है। सीमा पार करने की सुगम सुविधाओं के कारण भारत से हर साल भारी संख्या में लोग नेपाल घूमने जाते हैं। लम्बे समय तक राजनैतिक अस्थिरता के बाद अब उथल-पुथल रुक गई है, संविधान का निर्माण हो चुका है और अब नेपाल के लोगों को उम्मीद है कि देश में तेजी से विकास होगा।

पिछले दिनों साथी सुनील सोनी के साथ उनकी कार से नेपाल के दो राज्यों में घूमने का मौका मिला। रविवार दिन में लगभग 4 बजे रुद्रपुर से निकलने के बाद हम दोनों लोग बनबसा (गड्डाचौकी) बोर्डर से होते हुए उसी शाम 7 बजे महेन्द्रनगर पहुंचे। अब रुद्रपुर से बनबसा तक सड़क की स्थिति बहुत अच्छी है। नेपाल की सीमा में प्रवेश करने के बाद कार का शुल्क (लगभग 300 भारतीय रुपये प्रतिदिन) देकर आसानी से रोड परमिट बन जाता है। हम लोगों का रात का विश्राम धनगढ़ी में था। महेन्द्रनगर से धनगढ़ी तक शुक्लाफांटा नेशनल पार्क के बीच से गुजरते हुए बहुत ही सुगम सड़क है। नेपाल में हर जगह सड़कों का काम बहुत तेजी से हो रहा है।

रात लगभग 9.30 बजे हम लोग धनगढ़ी शहर पहुंचे जहाँ हमारे मेजबान श्री केदार भट्ट जी हमारा बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मूल रूप से पिथौरागढ़ के निवासी श्री केदार भट्ट धनगढ़ी शहर के प्रतिष्ठित शिक्षक हैं। लगभग 40 साल से नेपाल में रहते हुए उन्होंने शहर में विज्ञान शिक्षक के रूप में बहुत नाम कमाया है, अभी भी धनगढ़ी में कई स्कूलों के साथ जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। श्रीमती भट्ट भी योग प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रही हैं।

नेपाल में संविधान निर्माण के बाद 7 राज्यों का निर्माण किया गया है और अब वहां भारत की तरह ही त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था स्थापित हो चुकी है। धनगढ़ी शहर को राज्य-7 की राजधानी बनाया गया है। यह एक तेजी से उभरता हुआ शहर है। शहर के आसपास ही भारतीय मूल के लोगों द्वारा संचालित कृषि आधारित औद्योगिक प्रतिष्ठान भी हैं। सड़कों के चौड़ीकरण का काम चल रहा है और बाजार-दुकानों में आधुनिकता की झलक दिखाई देने लगी है। एक अच्छी बात ये भी है कि नेपाल में अधिकांश दुकानें महिलाओं द्वारा चलाई जाती हैं। धनगढ़ी में कई उच्चस्तरीय पेशेवर शैक्षिक संस्थान भी हैं। यहां नॉर्वे की सहायता से स्थापित चेरिटेबल 'गेटा नेत्र अस्पताल' में आधुनिक मशीनों की मदद से सस्ती चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है। इस अस्पताल में यूपी-बिहार की तरफ से भी लोग आंखों के ऑपरेशन करवाने आते हैं। दिनभर धनगढ़ी घूमने के बाद अगले दिन हमने नेपालगंज जाने का विचार बनाया।

अगली सुबह 6 बजे हम दोनों लोग कार से नेपालगंज शहर की तरफ निकले जो धनगढ़ी से लगभग 200 किमी दूर है। इस रास्ते पर लगभग 20 साल पहले भारत ले सहयोग से 22 पुलों का निर्माण किया गया है। सड़क बहुत ही अच्छी है। एक पहाड़ी श्रृंखला अधिकांश रास्ते में सड़क के समानांतर चलती है। सड़क के किनारे हरियाली भरे खेत, छोटे कस्बे और ग्रामीण जीवन के खूबसूरत नजारे दिखते हैं। जगह जगह धान की रोपाई लगाते हुए नेपाल के लोग पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर और खुशहाल नजर आते हैं। बीच रास्ते में 'घोड़ा-घोड़ी ताल' नामक एक सरोवर है जहां खूब कमल के फूल खिलते हैं। आगे जाकर चिसापानी नामक स्थान पर 'करनाली नदी' के ऊपर जापान के सहयोग से एक भव्य पुल बना हुआ है। इस पुल को पार करते ही 'बर्दिया नेशनल पार्क' का इलाका शुरू हो जाता है।

नेपाल में सभी संरक्षित वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना के हाथों में है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' के बीच से गुजरती हुई शानदार सड़क पर भी सेना लगातार गश्त करती है। इस सड़क से गुजरते हुए कहीं भी रुकने की मनाही है। गाड़ी से प्लास्टिक या अन्य गन्दगी फेंकने पर भारी जुर्माना लगता है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' के बीच से गुजरने वाले East-West National Highway पर वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए एक अनूठा तरीका है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' में प्रवेश करते ही वनचौकी पर रुककर वाहन का टाइम कार्ड बनता है। एक चौकी से दूसरी चौकी की दूरी के बीच 40किमी/घण्टा की स्पीड से दूरी तय करनी होती है। 13किमी दूरी के लिए लगभग 20-22 मिनट तय है। रास्ते मे कहीं भी गाड़ी रोकने की अनुमति नहीं है। जल्दी पहुंचने का मतलब है कि आपने गाड़ी तेजी से चलाई है और देरी से पहुंचने का मतलब आप रास्ते में कहीं रुके थे। दोनों स्थितियों में जुर्माना हो सकता है। जंगल से बाहर निकलते समय सेना द्वारा गाड़ी की एक बार फिर से अच्छी तरह जांच की जाती है। गाड़ी से जंगली जानवर को चोट पहुंचाने पर 6 महीने की सजा और एक लाख नेपाली रुपये जुर्माना।

नेपाल में ज्यादातर लोग बस-मैटाडोर से सफर करते हैं। रोड पर ट्रैफिक बहुत ज्यादा नहीं है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि 200% कस्टम ड्यूटी के कारण कार और बाइक बहुत महंगी हैं। भारत में जो कार ₹5 लाख की है वो नेपाल में ₹15 लाख में आएगी (लगभग 23-24 लाख नेपाली रुपये) बड़े और मध्यम स्तर के शहरों के बीच Air Connectivity भी बहुत अच्छी है। सड़कों की स्थिति ठीकठाक है और भारतीय गाड़ियों के लिए बहुत सुगमता है। हमारे साथी मुकेश पांडे और उमेश पुजारी पिछले साल इसी रास्ते बाइक पर पूरा नेपाल लांघते हुए भूटान तक गए थे।

भारत के लोगों के साथ नेपाल के निवासी बहुत मित्रवत व्यवहार करते हैं। भाषा सम्बन्धी कोई खास समस्या भी नहीं होती। अकेले घूमने के शौकीन लोगों के लिए नेपाल में कई सुविधाएं उपलब्ध हैं और पारिवारिक भ्रमण के लिए भी नेपाल एक सुरक्षित स्थान है।

तो अगर आप दुनिया घूमने का शौक का शौक रखते हैं तो नेेेपाल से शुरुआत कीजिए, बिना पासपोर्ट और वीजा

‘नहीं, कभी नहीं’ के उस पार



इन दिनों वॉन गॉग साथ रहते हैं. सुबह की चाय हम साथ पीते हैं, शाम को हम एक साथ देखते हैं थके हुए सूरज का घर जाना और आसमान पर रंगों का खेल. रात हम बारिशों की धुन सुनते हैं. हम साथ होते हैं लेकिन खामोश रहते हैं.

मुझे यूँ चुप होकर साथ रहने वाले दोस्त अच्छे लगते हैं. रात भर बारिश हुई. गॉग और मैं इस बारिश की बाबत खामोश रहे. वो इस वक़्त प्रेम पर अटके हुए हैं, शायद मैं भी. ‘इस वक़्त’ के बारे में सोचकर ‘किस वक़्त नहीं’ मुस्कुरा रहा है.

यूँ प्रेम पर अटके होने का अर्थ है, उदासी के निकट होना. उदासी बरस जाए तो राहत हो, शायद इसीलिए मुझे बरसना पसंद है, गॉग को रंग बनकर बिखरना. हम दोनों एक दीवार के इस पार हैं जिसे उसने ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार का नाम दिया है. वो बोल रहा है, मैं चुप हूँ. प्रेम में ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार चाइना वॉल से भी बड़ी और मजबूत लगती है. लेकिन दीवार के इस पार खड़ा प्रेम, हमेशा उस पार के ‘नहीं, कभी नहीं’ के आगे सजदे में रहता है. पीसा की मीनार ने क्या पता इन प्रेमियों से झुककर रहना सीखा हो.

वॉन गॉग थियो को लिखी अपनी चिठ्ठियों में लिखते हैं, ‘‘तुम बतलाओ कि क्या तुम्हें यह विस्मित नहीं करता कि कोई प्रेम इतना गंभीर और भाव-प्रवण हो सकता है कि कैसे भी बर्फीले ‘नहीं, कभी नहीं’ के बावजूद निष्कम्प जलता रहे? मुझे तो लगता है कि यह अत्यंत ही स्वाभाविक और सामान्य है.’’

यह स्वाभाविक और सामान्य होना सबके हिस्से नहीं आता, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रेम सबके हिस्से नहीं आता. तो इस प्रेममय उदासी के अपने जीवन में आने के प्रति आभारी होना चाहिए हमें. लेकिन हम तो शिकायत से भर उठते हैं.

गॉग कहता है, ‘’प्रेम इतना सुदृढ़, सच्चा और सकारात्मक भाव है कि इसमें अपनी भावनाएं वापस लेना उतना ही असम्भव है जितना अपने प्राण ले लेना.’ मेरा जीवन और मेरा प्रेम दोनों एक हैं. मेरे लिए फ़िलहाल यह ‘नहीं, कभी नहीं’ बर्फ की एक सिल्ली है, जिसे मैं अपने सीने के ताप से पिघलाने में जुटा हूँ.’

गॉग की तरह शायद बहुत सारे प्रेमी अपने सीने के ताप से ‘नहीं, कभी नहीं’ की बर्फ की सिल्ली को पिघलाने की कोशिश में होंगे. शायद न भी हों. गॉग ने अपने रंगों और लकीरों को जीवन से लिया है. उसने जिन रंगों का प्रयोग किया वो दुकान से लिए भले ही गए होंगे लेकिन उन्हें जीवन के, महसूसने के पानी में घोलकर उसने रचा वो अद्भुत है. उसने बिना जिए एक लकीर भी नहीं खींची, यूँ ही सांसों को आने-जाने का क्रम होने से बचाकर रखा, जिया उसने शायद तभी उसने ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार के आगे ‘वही और दूसरी कोई नहीं’ की लकीर खींच दी. उसने थियो को लिखा, ‘मैं इसे कमजोरी न मानकर ताकत मानता हूँ. वह मेरा एकमात्र आधार है जिससे मैं हटना नहीं चाहता.’

‘नहीं, कभी नहीं’ का विलोमार्थी क्या होता होगा. गॉग ने इस विलोमार्थी को ‘वही, और कोई नहीं’ से गढ़ा. उसने भाई को लिखा कि, ‘अगर तुम्हें कभी प्रेम में ‘नहीं, कभी नहीं’ सुनने को मिले तो उसे चुपचाप स्वीकार मत करना.’

तो चुपचाप न स्वीकार करने का क्या अर्थ है आखिर, युद्ध करना, किससे, ‘नहीं कभी नहीं’ से या ‘वही और कोई नहीं’ से. अक्सर लोगों को इन दोनों के ही आगे घुटने टेकते पाया है. आज जो ‘वही, और कोई नहीं’ है कल वह ‘कोई और’ किस तरह हो जाता होगा मालूम नहीं. कभी-कभी लगता है, ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार से टकराना हमारे भीतर का कोई ईगो तो नहीं. तब तक उससे टकराना जब तक वो टूट न जाए. एक बार जो वो टूट गया तब? इसके आगे एक गहन शांति है. इस ‘नहीं, कभी नहीं’ का होना असल में हमारे होने को बचाए हुए है. यही उम्मीद है. गॉग कहते हैं कि, ‘’हम हमेशा यह बतलाने की स्थिति में नहीं होते कि वह क्या है जिसने हमें ढांप रखा है, बंदी बना रखा है. जो हमें दफन किये देता है, हालाँकि हम उन चट्टानों, उन दरवाजों, उन दीवारों को बखूबी महसूस करते हैं. क्या यह सब हमारी कल्पना या फंतासी है? मुझे नहीं लगता और मैं पूछता हूँ, हे ईश्वर! यह कितनी देर चलेगा, क्या आजीवन ऐसा ही कोहरा बना रहेगा? तुम जानते हो इस कारावास से मुक्ति कहाँ है? केवल एक सच्चे और गहरे प्रेम में.’’

सच्चा और गहरा प्रेम. क्या इसके अलावा भी कोई प्रेम होता है. प्रेम है तो उससे बड़ा सच कोई नहीं और उसकी गहराई आपको उदास सागर में डुबो देगी. ऐसे ही आता है प्रेम, सब ध्वस्त करते हुए. यही निर्माण की प्रक्रिया है. बिना प्रेम में पड़े हुए लोगों को कभी मालूम नहीं होता कि उन्हें प्रेम नहीं हुआ है, उन्हें उम्र भर मालूम नहीं होता इसलिए वो उदासी को प्रेम नहीं पढ़ पाते और प्रेमियों को ‘दुखी आत्मा’ कहते हैं. जबकि असल में वो सुखी आत्माएं ही हैं.

गॉग लिखते हैं, ‘’इस प्रेम की शुरुआत से जैसे यूँ लग रहा था कि इसमें मुझे खुद को पूरा झोंक देना है. बिना आगा पीछा सोचे, यूँ कूद पड़ने में ही थोड़ी उम्मीद है. पर फिर मैं थोड़ी या अधिक उम्मीद के बारे में क्यों सोचूं. प्रेम करते वक्त क्या मुझे यह सब फालतू बातें याद रखनी चाहिए. हरगिज नहीं. हम प्रेम करते हैं क्योंकि हम प्रेम करते हैं. बस. कल्पना करो कि एक स्त्री क्या सोचेगी यदि उसे पता चले कि सामने वाला उससे प्रेम निवेदन तो कर रहा है किन्तु एक हिचक के साथ. क्या तब उसका उत्तर ’नहीं, कभी नहीं’ से अधिक कठोर न होगा? ओह थियो, छोड़ो. कुछ और बात करते हैं. प्रेम तो सिर्फ प्रेम है, उसके आगे पीछे कुछ नहीं. उसमें डूबा हमारा मन एकदम साफ़ चमकीला और खुला होता है, न भावनाएं छुपाई जाती हैं न आग बुझाई जाती है. केवल एक सहज स्वीकार- खुदा का शुक्र है यह मोहब्बत है!”

ह्म्म्म खुदा का शुक्र है कि मोहब्बत है. खुदा का शुक्र है कि है ‘नहीं, कभी नहीं’ भी. क्या हमने प्रेम में पड़े हुए लोगों के साथ पेश आना सीखा है. क्या हमने मनुष्य के तौर पर किसी दूसरे मनुष्य के साथ पेश आना भी सीखा है? हम लोगों के सुखों को दुखों में बदल देने में माहिर लोग हैं शायद इसीलिए प्रेमी अपना एकांत गढ़ लेते हैं. दुःख का एकांत. जहाँ प्रेम, उदासी, ईश्वर, सब साथ रहते हैं. गॉग का यह कहना विभोर करता है कि, ‘’तुम मुझे इस ‘नहीं, कभी नहीं’ पर बधाई दो.’’

हम सांत्वना देते हैं इश्क में दुःख को जीते व्यक्ति को, हम उसे बधाई नहीं देते, गॉग सिखाता है हमें कि प्रेम में डूबे व्यक्ति से किस तरह पेश आना चाहिए. क्योंकर सोचना विचारना, क्या हो जाएगा उससे. कि प्रेम तो मृत्यु की तरह अनपेक्षित है. आपका बस तो उस पर चलना है नहीं तो आने दो उसे यूँ ही अपने बहाव में. सुनो ध्यान से कि ‘’जब भी प्रेम में पड़ो- बिना किसी हिचक के उसके साथ बह जाना. या फिर यूँ कहें कि जब तुम प्रेम में पड़ोगे तो तुम्हारी सारी हिचकिचाहट अपने आप ही दूर हो जाएगी. इसके अलावा जब तुम प्रेम करोगे तुम पहले से ही अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त तो नहीं होओगे पर बावजूद इसके मुस्कुराओगे.’

‘’कुछ भी हमें जीवन के यथार्थ के उतना करीब नहीं ले जाता, जितना सच्चा प्रेम. सच मानो, प्रेम के छोटे-छोटे दुःख भी मूल्यवान हैं.’’ इसलिए किसी की सिसकियों पर आंसुओं में डूबे चेहरे पर कभी तरस मत खाओ उसे प्रेम से देखो और उसके सुख को महसूस करो.

एक जन्म माँ बाप देते हैं, दूसरा जन्म देता है प्रेम. कि जीवन के अर्थ बदलने लगते हैं समूची सृष्टि को प्रेम और सद्भाव से भर देने की इच्छा प्रेम ही तो है. कि ‘’जबसे मैंने प्रेम के असली स्वरूप को जाना है, मेरे काम में सच्चाई बढ़ी है.’’

यह सच्चाई सिर्फ काम में नहीं जीवन में भी बढ़ी है शायद, इसे बढ़ना ही है और...और..और... बस कि प्रेम पर भरोसा रखना!

(पढ़ते हुए वॉन गॉग के खत, भाई थियो के नाम)

पुस्तक- मुझ पर भरोसा रखना
अनुवाद- राजुला शाह
प्रकाशक- सीज़नग्रे

https://www.prabhatkhabar.com/news/novelty/diary-of-a-writer-pratibha-katiyaar/1182628.html

Thursday, July 12, 2018

यह बारिश नहीं प्रेम है...


उस लड़की को भीगते देख 
मत होना नाराज उस पर 
न भागना उसकी मदद को 
न ताकीद देना उसे 
जल्दी घर पहुँचने की 
बुखार से बचने की 
कि उसने जान-बूझकर 
अपनी छतरियां गुमाई हैं 

------------

बहुत सारे कामों की लिस्ट जेहन में लिए
तेज़ क़दमों से सड़कें नापते हुए 
जिन्दगी की भागमभाग को सहेज पाने में 
सिरे से नाकाम होते हुए 
झुंझलाते हुए 
जब आप हों कहीं पहुँचने की जल्दी में  

मौसम साफ़ देख न रखा हो छाता ही साथ 
न रेनकोट ही 

कि अचानक आ जाए तेज़ बारिश 
संभलने का मौका न दे रत्ती भर 
तर-बतर कर दे सर से पाँव तक 
किसी दुकान में 
किसी बस स्टैंड में ठहरकर
बारिश से बचा लेने की 
गुंजाईश तक न मिले 

तो समझ लेना 
यह बारिश नहीं प्रेम है...

Wednesday, July 11, 2018

ये जो ठहरी हैं हथेलियों पर बूँदें ये तुम हो...



एक पुराना ख़्वाब था, कच्चा सा ख़्वाब कि किसी रोज किसी पहाड़ी गांव में बारिश की धुन बरसेगी रात भर, बूँदें लोरियां सुनाएंगी और मैं सारी रात बूंदों की आवाज ओढकर चैन से सोऊँगी. शायद उस चैन की नींद की तलाश में नींदे भी खूब भटक रही थीं. आपको पता हो न हो आपके ख़्वाबों को जिन्दगी के रास्तों का पता मालूम होता है शायद. जिस वक़्त मैं अपने सपनों पर खुद ही हंस रही होती थी वो सपने हकीकत में ढलने की तैयारी में थे. बारिशों के गाँव में रहती हूँ इन दिनों. सिरहाने बूंदों का राग बजता है, सुबहें धुली-धुली और खिली खिली सी हैं...ये जो बरसे हैं रात भर तेरी याद के बादल हैं, मेरे ख़्वाब के बादल हैं...ये जो ठहरी हैं हथेलियों पर बूँदें ये तुम हो...

तुम्हारी हंसी मेरे मन में हमेशा चमकती रहती है

जिंदगी से दोस्ती कराई थी तुमने माधवी. गोवा का वो समंदर, डूबते सूरज के पीछे भागना, समंदर की लहरों को एक साथ उठते और गिरते देखना, सब याद है. देर रात तक बेवजह हँसते जाना, सुनना कहानियां एक दूसरे से, तुम्हारा मुझे अगरबत्ती जलाना सिखाना सब खिला हुआ है। मैं हमेशा तुम्हें अपने पास महसूस करती हूँ माधवी, जोर की झप्पी और हैप्पी बर्थडे। देख न, जुलाई में कितने सारे प्यारे लोगों का जन्मदिन होता है न? एक तुम, एक मैं और बाकी बहुत सारे लोग... 

तुम्हारी हंसी मेरे मन में हमेशा चमकती रहती है- प्रतिभा 

1.

यात्रा से पहले

यात्रा और आत्महत्या से पहले
जहां तक हो सके
सब साफ़ छोड़ना चाहिए
दर्ज है
यात्रा की किसी किताब में

आत्महत्या कायर करता है
यात्रा साहसी का काम है
और साफ़ है सब-कुछ
पहले ही

एक अनंत यात्रा से पहले
एक और यात्रा
एक लंबी यात्रा से पहले
एक छोटी यात्रा

मन कब का गया
श्यामदेश की यात्रा पर
देह सामान बटोर रही है।

2.

यात्रा से लौटकर
यात्रा से लौटती हूं
तो कई दिनों तक घर
अस्त-व्यस्त रहता है

एक-एक कर अटैची से
बाहर आता है सामान
वही पुरानी जगह
ले लेने के लिए
कुछ सुखद स्मृतियां
और
सघन अनुभव भी
निकलते हैं

सामान सहेजती
सोचती हूं हर बार यही
यात्राएं कैसे परिष्कृत कर देती हैं
मनुष्य को भीतर से
निर्रथक व नगण्य
लगने लगता है बहुत कुछ
दृष्टि बदल देता है
जीवन के प्रति नया कोण

एक यात्रा से लौट
मैं दूसरी यात्रा पर
निकल जाना चाहती हूं।

3.

पर घर न छूटे
अनगिन लालसाएं
अनगिन यात्राओं की
न कोई पर्वत छूटे
न जंगल
न दरिया
न पठार
न बियाबान छूटे
न सागर
न रेत
न तलछट
न कोई दर्रा छूटे
न कंदरा
न घाटी
न आकाश
न उत्तर छूटे
न दक्षिण
न पूरब
न पश्चिम
न रंगीनी छूटे
न वीरानगी
न आनगी छूटे
न रवानगी
अनगिन लालसाएं
अनगिन यात्राओं की
कि धरती का
कोई छोर न छूटे
पर घर न छूटे
यह संभव कहां!

4.
हर सुबह देखती हूं
हर रोज़
बेकल रात को
बुनती हूं
इक नया सपना

कुछ सपने सदाबहार हैं
तितली कोई पकड़कर
बंद करना हौले से मुट्ठी
या उड़ते जाना अविराम
मीलों ऊपर, दिशाहीन

हर सुबह देखती हूं
हथेली पर बिखरे
तितलियों के वो
रंग अनगिन
और
रंग देती हूं तुम्हें
हर सुबह देखती हूं
हथेली पर ठहरा वो
आकाश अनन्त
और
भर लेती हूं उड़ान
लिए साथ तुम्हें।

5.
स्मृतियों में पहाड़
धौलाधार की पहाड़ियों पर
बर्फ़ झरी है बरसों बाद
और कई सौ मील दूर
स्मृतियों में
पहाड़ जीवंत हो उठे हैं
कहीं भी जाओ
पीछा नहीं छोड़ते पहाड़
संग चलते हैं
जीवन भर
वही हिम
वही उजास
वही उल्लास
स्मृतियों में उदात्त पहाड़
स्मृतियों में धवल चांदनी
स्मृतियों में निरभ्र शांति
मैं संतृप्त रहने की चेष्टा में हूं
स्मृतियों का शोर जारी है।

Monday, July 9, 2018

यही तो है मौसम


जिन्दगी की तमाम आपाधापियों के बीच कोई दोस्त किसी दूर के शहर में होकर भी आपके जीवन की नमी को सहेज देता है, उम्मीद को टूटने से बचा लेता है. इन बॉक्स में कुछ इस तरह खिलती हैं उम्मीदें बिना किसी संवाद के. हमें अभी होना सीखना है कि किसी की जिन्दगी में कैसे हुआ जाता है, कैसे रहा जाता है और किस तरह जिंदगी को मानीखेज बनाया जाता है...

बादलों का नाम न हो,
अम्बर के गाँवों में 
जलता हो जँगल 
खुद अपनी छाँव में 
यही तो है मौसम 

तुम और हम 
बादलों के नग़में गुनगुनाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं
मुश्किल है जीना 
उम्मीद के बिना 
थोड़े से सपने सजाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं 

रास्ता अकेला हो, 
हर तरफ़ अंधेरा हो 
रात भी हो घात की, 
दिन भी लुटेरा हो 
यही तो है मौसम 
आओ तुम और हम 
हम दर्द को बाँसुरी बनाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं...
(फिल्म थोड़ा सा रूमानी हो जायें)

https://www.youtube.com/watch?v=_C6WzQkKbys

Saturday, July 7, 2018

कितना सुख है मिलकर सीखने में


जैसा हम सोचते हैं, योजना बनाते हैं वैसा हमेशा कहाँ होता है. इसी तर्ज पर 6 जुलाई की सुबह की शुरुआत हुई. ठीक साढ़े नौ बजे प्राथमिक विद्यालय करनपुर पहुंची और पहुँचते ही एहसास हुआ कि जिस उद्देश्य से आई हूँ वह तो संभव नहीं क्योंकि आभा भटनागर मैम छुट्टी पर थीं और गीता कौशिक मैडम एक ही कक्षा में सभी क्लास के बच्चों को बिठाकर कुछ काम कर रही थीं. जिस वक़्त मैं वहां पहुंची गीता जी कुछ अभिभावकों से बात कर रही थीं. इस बीच मैंने बच्चों से बातचीत शुरू की. शुरुआत का सिरा था गर्मी की छुट्टियों वाला.
‘गर्मी की छुट्टियाँ कैसी रहीं?’ सवाल के साथ सभी बच्चे एक सुर में बंध गए.
‘बहुत अच्छी.’ बच्चों ने उत्साह से जवाब दिया.
‘छुट्टियों में क्या-क्या किया?’
‘घूमने गए, खेले, पढाई की.’
‘कहाँ-कहाँ घूमने गए?’
‘हरिद्वार, ऋषिकेश, मसूरी, नानी के घर, सहस्त्रधारा’.
‘अच्छा, घूमने गए तो क्या-क्या देखा?’
‘डोरिमान देखा पार्क में, नदी देखी, जंगल देखे, सड़क देखी, खूब मजे किये.’
‘नानी-दादी के घर क्या-क्या किया?’
‘हलवा खाया, पूड़ी खाई, मिठाई खाई.’ कुछ बच्चों ने जोड़ा ‘डांट भी खाई.’ जिसके बाद सारे बच्चे हंस दिए.
अब तक गीता मैम वापस आ गयी थीं. वो भी अब बातचीत में शामिल हो गयीं.
‘अच्छा कितने बच्चों ने छुट्टियों में खाना बनाया?’
करीब आधे बच्चों ने हाथ उठाया. जिन्होंने नहीं उठाया वो उम्र में बहुत छोटे थे. हाथ उठाने वाले बच्चों में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे. रोहित ने बताया कि उसने हलवा बनाया, मीट बनाया. प्रियंका ने बताया उसने कढ़ी बनानी सीखी. और भी बच्चों ने इसमें चीजें जोड़ीं.
‘अच्छा रोहित ने हलवा बनाया. सूजी का हलवा. कितने लोगों को हलवा पसंद है?’
‘हमको’ पूरी कक्षा के हाथ उठ गये.
‘अरे वाह, अच्छा यह बताओ कि हलवा कितनी चीज़ों से बनता है?’
‘गाजर से, सूजी से, लौकी से’
‘आलू का हलवा, शकरकंद का हलवा किसने खाया है?’
किसी का हाथ नहीं उठा.
अच्छा गीता मैडम से पूछो उनको आता है क्या आलू और शकरकंद का हलवा बनाना.
बच्चों ने पूछा तो मैडम ने कहा कि ‘हाँ मुझे बनाना आता है और यह बहुत स्वादिष्ट होता है.’ बच्चों ने मैडम से आलू का हलवा बनाने की विधि पूछी जिसे मैडम ने ख़ुशी से विस्तार से बताया. विधि में ड्राई फ्रूट आने पर बच्चों ने उसके बारे में अलग से पूछा.
इसके बाद कौन सा फल, कौन सी सब्जी कहाँ होती है इसे पर फटाफट सवाल जवाब वाला खेल हुआ.
भुट्टा, सिंघाड़ा, जामुन, आम, चुकन्दर, आड़ू, बैंगन, भिन्डी, राजमा, लोबिया, आदि कहाँ पैदा होते हैं. पानी में, जड़ में या पेड़ पर. इस जल्दी-जल्दी बताना था. बच्चों में बताने का उत्साह भी खूबी था. इस जल्दबाजी में कभी कढ़ी पेड़ पर लग गयी और कभी हलवा जमीन में उग गया. इसके बाद जो मजेदार दृश्य बना वह देखने लायक था. सब पेट पकडकर हंस रहे थे. इस पूरे संवाद में गीता मैडम को बड़ा अच्छा लग रहा था. उनकी नजर उन बच्चों पर थी जो अक्सर चुप रहते हैं. वो चुप अब भी थे लेकिन उनके चेहरे बोल रहे थे. इसके बाद बातचीत का रुख थोड़ा बदला.
‘बड़े होकर कौन क्या क्या बनना चाहता है?’
प्रतिमा, दिव्यांशु, कोमल, मोहन ने डाक्टर बनने की इच्छा जताई, कुछ बच्चों ने पुलिस बनने की इच्छा जताई, कुछ ने किसान बनने की, कुछ ने कहा वो हवाई जहाज चलाएंगे.
कक्षा में काफी जोश आ चुका था. बच्चे बहुत खुश थे और अपने भविष्य के सपनों के बारे में बात कर रहे थे. कक्षा दो में पढने वाले दिव्यांशु को बार-बार बोलने का मन हो रहा था लेकिन अपनी बारी आने पर वो शरमा जा रहा था. हमने एक छोटी सी स्किट आनन-फानन में की. प्रियंक से कहा कि दिव्यांशु डाक्टर है तुम जाओ मरीज बनकर. एक बच्चा (नाम याद नहीं) प्रियंक के साथ गया.
प्रियल- डाक्टर साहब डाक्टर साहब बहुत तेज बुखार है.
शर्माते हुए अंगूठा मुंह में डालता है
प्रियल(प्रियल कक्षा 4 के हैं)- अरे डाक्टर साहब शरमाओ नहीं मेरा इलाज करो.
दिव्यांशु और शरमाने लगता है. कक्षा के बाकी बच्चों को बहुत मजा आ रहा है.
प्रियल- दवाई दे दो डाक्टर साब लेकिन सुई मत लगाना.
यह बात डाक्टर दिव्यांशु को जंच गयी. वो प्रियंक को सुई लगाने का अभिनय करने लगा. प्रियंक भागा, दिव्यांशु पीछे-पीछे भागा. गीता मैडम समेत सभी बच्चों की हंसी रुक ही नहीं रही थी.
एक छोटा सा ब्रेक बच्चों को देना चाहा कि बातचीत करते हुए काफी देर हो चुकी थी लेकिन बच्चों को कोई ब्रेक नहीं चाहिए था.
अब बात शुरू की सपनों की. कौन-कौन सपने देखता है, तुम्हारा क्या सपना है? बड़े होकर पुलिस या डाक्टर बनने वाले सपने में और सोते हुए जंगल में खो जाने वाले सपने में क्या फर्क होता है. सारे बच्चे अपने सपनों के बारे में बताने को बेचैन हो उठे जिसे घर से लिखकर लाने और मैडम को देने की बात तय हुई. सब बच्चे अपने सपनों के बारे में लिखेंगे यह तय हुआ. इसके बाद उनके सामने एक नया सवाल आया.
‘यह जो तुम्हारे सपने हैं, ये तुम्हें किसने बताये?’
‘यह तो हमने खुद सोचा.’ बच्चों ने कहा.
‘ओह. यह सोचना क्या होता है? यह कैसे होता है?’
सोचना मतलब कुछ सोचना. नन्हे आदि ने कहा. मतलब अपने आप से कुछ सोचना, कुछ ऐसा जो किसी ने हमें बताया न हो, कुछ ऐसा जो हमको करने का मन हो. नन्ही कोमल ने कहा, जैसे सोचना कि शाम को खाने में क्या मिलेगा. अब बात बढ़ने लगी थी. सोचना कि स्कूल से जाकर क्या-क्या करेंगे, बड़े होकर क्या बनेंगे. अब सोचने पर खूब बात होने लगी.
‘अब सोचते-सोचते थक गए न हम, चलो कुछ और करें.’ जैसे ही मैंने यह कहा, बच्चे खुश हो गए. बाल लेखन कैम्प के दौरान धोरण स्कूल की शिक्षिका अंजलि गुप्ता ने एक बार एक कविता कराई थी वो मुझे बहुत पसंद आई थी. यह कविता कक्षा 2 की गणित की (एनसीईआरटी) पुस्तक में है भी. मैंने सोचा था आज यही कविता बच्चों के साथ करते हुए इस पर बात करेंगे. इत्तिफाक था कि आज ही सुबह गीता मैम ने यह कविता बच्चों को सिखाई थी. अब बारी बच्चों की थी मुझसे कविता करवाने की. बच्चे कविता बोल रहे थे और मुझे एक्शन करने थे.
धीरे-धीरे मेरे साथ एक्शन में और बच्चे भी शामिल होते गए. कविता कुछ इस तरह थी
एक बुढिया ने बोया दाना
गाजर का था पौध लगाना
गाजर हाथोंहाथ बढ़ी
खूब बढ़ी भई खूब बढ़ी...
कविता लम्बी है और भाषाई सौन्दर्य के साथ गणित की अवधारणाओं से भी जुडती है. लेकिन अभी हम सिर्फ कविता का आनंद ले रहे थे. गाजर को खेत से उखाड़ने में एक-एक कर लोगों का जुटते जाना कविता का आकर्षण था और अंत में गाजर का उखड़ना, उसको धोना और हलवा बनाना बच्चों को आनंदित कर रहा था. वैसे भी आज हलवे की बात काफी हो भी चुकी थी. कविता खत्म हुई.
‘किसको-किसको स्वाद आया हलवे का?’
खूब हाथ उठे.
‘किसको किसको स्वाद आया?’ इस पर थोड़े कम लेकिन कुछ उठे. जो हाथ उठे उन्होंने कहा, ‘मैडम जी खूब मीठा है हलवा.’
अपनी कल्पना के संसार में कैसे हम कुछ भी पा सकते हैं, कुछ भी महसूस कर सकते हैं यही बात अब उनके सामने थी. इस पर बात करते हुए बच्चों से कहा चलो कल्पना का एक खेल खेलते हैं. सब लोग अपनी आँखें बंद करते हैं. एकदम चुपचाप. सोचो कि हम गाजर के खेत में हैं. बच्चे बोले ‘हाँ, मैडम जी हरे-हरे खेत में. चारों ओर हरा ही हरा.’ नन्ही मुस्कान आधी आँख खोलकर दूसरों को देखने की कोशिश कर रही थी. बाकी बच्चे खेत में थे. ‘हवा चल रही है. धीरे-धीरे.’ मैंने कहा. बच्चों ने जोड़ा. ‘गाजर की पत्तियां हिल रही हैं.’ अभिनव ने हाथ को लहराकर पत्तियों के हिलने का संकेत दिया.
‘हवा अब तेज़ चलने लगी है,’ मैंने कहा. बच्चों ने आगे जोड़ा, ‘अब गाजर की पत्तियां जोर-जोर से हिल रही हैं...ठंडी हवा है मैडम जी.’
‘चिड़िया उड़ रही हैं मैडम जी.’ गीता मैडम यह सब देखते हुए मुस्कुरा रही थीं.
‘चलो अब आँखें खोलते हैं.’ गाजर का खेत कैसा था?
‘बहुत मजा आया मैडम जी. अगली बार हलवाई की दुकान में ले जाना वहां गाजर का हलवा भी मिल जाएगा.’ वैभव ने मुस्कुरा कर कहा.
‘कविता कैसी लगी?’
‘बहुत अच्छी’
‘खेत की सैर कैसी थी?’
‘बहुत मजेदार.’
‘अच्छा बताओ कविता या कहानी कैसे बनती होगी?’ मेरे मन में इस बातचीत का अंत बच्चों के द्वारा बनाई एक कविता से ही कराने की योजना थी.
बच्चों ने सोचना शुरू किया. गीता मैडम ने जोड़ा कि वो कविता कहानी बनवाती हैं बच्चों से. कुछ शब्द देकर उनसे कविता या कहानी बनाने को कहती हैं. कुछ बच्चे बहुत अच्छी कवितायेँ कहानियां बनाते हैं. लेकिन सब नहीं बना पाते. मैं उनकी बात को ध्यान से सुनते हुए बच्चों से बातचीत भी करती जा रही थी. बच्चों ने जवाब देना शुरू किया.
‘कविता या कहानी शब्द से बनती है’
‘वाक्य से बनती है.’
‘कलम से बनती है’
‘किसी बात से बनती है’
‘मैडम जो शब्द देती हैं उससे बनती है’
‘और अगर मैडम कोई शब्द न दें तो?’
‘तो कैसे बनेगी कविता, नहीं बनेगी’ बच्चों ने कहा.
एक बच्चे ने कहा, ‘बनेगी तब भी क्योंकि तब हम सोचकर बनायेंगे.’ यही मेरा केंद्र बिंदु था कि कहानी या कविता सोचने से बनती है.
मैंने कहा आज हम सब मिलकर अपनी खुद की कविता बनायेंगे. बच्चों ने कहा कविता नहीं, कहानी. कविता तो आज हो गयी. घडी की सुई का इशारा था कि वक़्त ज्यादा नहीं है. 30 बच्चों के साथ कहानी बनने में वक़्त लगेगा लेकिन आखिर मुझे बच्चों की इच्छा के अनुरूप कहानी की ओर ही मुड़ना पड़ा.
यह कहानी सबकी कहानी होगी. इस कहानी में वो होगा जो हम चाहेंगे. वैसे होगा जैसे हम चाहेंगे. बच्चे यह सुनकर काफी खुश हुए. उनके चेहरों की चमक लगातार बढती जा रही थी. अब बारी थी सबको अपने अपने किरदारों के बारे में सोचना की. किसकी कहानी में कौन होगा, एक किरदार के बारे में सोचना था. राजा रानी, हाथी, शेर, मोर, जंगल, खरगोश, किसान, राजकुमारी, चुड़ैल, डायनासोर, कौआ और बहुत सारे किरदार उस क्लास में अब दाखिल हो चुके थे. अब मौसम आने लगे थे, कहीं हवा चलने लगी, तो कहीं बारिश होने लगी. बच्चों की कल्पना के घोड़े भागते ही जा रहे थे. घडी बता रही थी कि छुट्टी होने का वक़्त करीब है और कहानी अभी शुरू भी नहीं हुई बनना.
आखिर मोहित ने कहानी शुरू की. जिसे एक-एक करके बच्चे बढ़ाते गए और कहानी में अपने किरदारों को, अपनी कल्पनाओं को जोड़ते गए. आइये कहानी की ओर चलते हैं... 

'एक राजा और रानी थे, जो अपने बड़े से महल में आराम से रहते थे. उनकी एक छोटी सी प्यारी सी बेटी थी. एक दिन राजा रानी महल में झूले में बैठे थे, खूब ठंडी हवा चल रही थी. वहीँ पास में उनकी बेटी यानि राजकुमारी खिलौनों से खेल रही थी. पास में एक प्यारा सा मोर नाच रहा था और राजकुमारी उसे देखकर खुश हो रही थी. तभी वहां एक शेर आ गया. राजकुमारी शेर को देखकर और भी खुश हो गयी. उसने शेर से दोस्ती कर ली. लेकिन जैसे ही वहां से खरगोश गुजरा राजकुमारी खरगोश के पीछे भागने लगी. मोर और शेर राजकुमारी को खेलते देखकर खुश हो रहे थे. तभी महल में एक किसान आया. किसान बहुत थका हुआ था, वो एक बड़ा सा जंगल पार करके राजा से मिलने आया था. राजा ने किसान से कहा तुम अभी आराम करो अभी हम राजकुमारी के लिए खिलौने लेने मॉल जा रहे हैं. राजकुमारी बहुत दिन से नए खिलौने मांग रही है, लौटकर आकर मैं तुम्हारी बात सुनूंगा. इधर राजा राजकुमारी के लिए खिलौने लेने गया, तभी वहां महल में एक चुड़ैल आ गयी और वो राजकुमारी को अपने साथ लेकर चली गयी. लेकिन यह अच्छी चुड़ैल थी. उस चुड़ैल के कोई दोस्त नही थे इसलिए वो राजकुमारी को अपना दोस्त बनाना चाहती थी, इसलिए उसे अपने घर ले आई थी. चुड़ैल ने राजकुमारी को खिलौने दिए, नयी ड्रेस दी और उसे मैगी बनाकर खिलाई. चुड़ैल ने उसे खोये की बर्फी भी खिलाई. उधर राजा रानी जब महल में लौटे और राजकुमारी को नहीं देखा तो बहुत रोये. तब किसान ने कहा, महाराज, आप रोयें नहीं मैं राजकुमारी को ढूंढकर लाऊँगा. किसान राजकुमारी को ढूँढने निकला तो एक कौआ किसान के साथ हो लिया. उसने देखा था चुड़ैल को राजकुमारी को ले जाते हुए. कौए की मदद से किसान चुड़ैल के घर पहुँच गया. उसने देखा राजकुमारी तो चुड़ैल के पास खूब खुश है. किसान ने चुड़ैल से कहा, राजकुमारी के मम्मी पापा बहुत रो रहे हैं, हमें राजकुमारी को वापस महल ले जाना चाहिए. चुड़ैल ने कहा कि ठीक है, लेकिन मैं भी राजकुमारी के साथ चलूंगी. ये मेरी बेस्ट फ्रेंड है. किसान मान गया. एक झाडू पर सबसे आगे चुड़ैल बैठी फिर राजकुमारी और सबसे पीछे किसान. झाड़ू उड़ते हुए महल में पहुंची. राजा रानी राजकुमारी को देखकर बहुत खुश हुए. शेर, मोर, हाथी, खरगोश भी बहुत खुश हुए. राजा ने चुडैल को थैंक यू कहा और उसे महल में ही रहने को कहा. और किसान को बहुत सारा ईनाम दिया.'

कहानी पूरी हो चुकी थी, इसके बनने में सारे बच्चे शामिल थे, वो बच्चे भी जो शर्मीले थे, चुप रहते थे. उन्हें साथ लेकर, उनकी कल्पना को बाहर निकालने में उनकी थोड़ी मदद की और वो कान में आकर बता गये कहानी की बढ़त को. इस कहानी की हर लाइन में बच्चे के मन की दुनिया छुपी नज़र आ रही थी मुझे, चाहे वो खिलौने हों, खोये की बर्फी या मैगी या झाड़ू पर बैठकर उड़ने का सुख. सबने अपनी कहानी पर अपने लिए तालियाँ बजाईं. छुट्टी का वक़्त हो गया था लेकिन बच्चे क्लास से जाने को तैयार नहीं थे. वो कहानी के बारे में बात करना चाहते थे. सबको उस कहानी में अपना हिस्सा अपना किरदार सबसे अच्छा लग रहा था. प्रमोद ने पीठ पर बस्ता चढाते हुए कहा, ‘देखा मेरे किसान ने बचा लिया न राजकुमारी को.’ तभी मुस्कान ने शरमाते हुए कहा, ‘और मेरी चुड़ैल कितनी अच्छी थी’. दिव्यांशु ने कहा, ‘और मेरा मोर भी तो सुंदर था.’ तभी आदि ने कहा ‘मेरा डायनासोर तो आया ही नहीं...’ अरे हाँ, डायनासोर तो रह ही गया, हम सबने सोचा. चक्कर में पड गए कि इस कहानी में डायनासोर कहाँ और कैसे फिट होगा. तभी कोमल ने कहा, ’राजा और रानी डायनासोर वाला खिलौना लेने ही तो मॉल गये थे.’ और इस तरह कोमल ने समस्या सुलझा दी.

कहानी बन चुकी थी, छुट्टी हो चुकी थी, लेकिन कहानी बच्चों के साथ ही घर जा रही थी. गीता मैम खुश थीं कि कई बच्चों ने पहली बार कहानी बनने में अपनी भूमिका निभाई.

मैंने बच्चों से विदा ली तो उन्होंने जल्दी फिर से आने का वादा करने को कहा. ‘पक्का प्रॉमिस मैम, जल्दी आओगी न’ मुस्कान ने कहा. मैंने कहा ‘हाँ’. मेरी वापसी के कदमों में सुख था कि कितना कुछ सीख सकी हूँ आज.

Friday, July 6, 2018

बदलाव की इच्छा का सुख



यूँ तो भीतर एक उथल-पुथल सी हमेशा चलती रहती है कि जो कर रही हूँ उसमें कितनी सार्थकता है. जिन रास्तों पर दौड़ रही हूँ, वो कहीं पहुंचेंगे भी या नहीं. यह बात, जिन्दगी के रास्तों की नहीं अपने पेशेवर काम के संदर्भ में कर रही हूँ. हर दिन खुद के ‘किये’ पर सवाल करना जैसे आदत हो, और ‘न किये पर’ सवाल करना और पक्की आदत. इन्हीं उहापोह के बीच काम करना आसान करने के जो भी बिंदु मिलते हैं उन्हें सहेजती चलती हूँ. क्योंकि यहीं से और गति के साथ चलने की ऊर्जा मिलती है.

ऐसे ही कुछ अनुभवों से भरा-पूरा गुजरा जून का महीना. जिन सरकारी शिक्षकों के काम करने की नीयत पर, जिनके काम की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगाने से न कभी सिस्टम हिचकिचाता है, न समाज यह उन्हीं सरकारी शिक्षकों की बाबत है. अपनी छुट्टियों के दिनों में परिवार के साथ समय बिताने, सिनेमा देखने जाने, रिश्तेदारों के यहाँ जाने आदि को स्थगित करके बिना किसी सरकारी आदेश के, शुद्ध रूप से अपनी इच्छा से अगर अपनी छुट्टियों के चार दिन (कुछ तो 8, और कुछ 12 दिन भी) अपनी कक्षा कक्ष प्रक्रियाओं को बेहतर कर पाने के उद्देश्य से किसी कार्यशाला में जाते हैं तो यह सामान्य बात नहीं है. उनके भीतर सीखने की, बेहतर करने की, अपने बच्चों को नए-नए तरीकों से, रोचक तरह से पढ़ाने की यह इच्छा बेहद उत्साहजनक है.

बीते जून में पूरे उत्तराखंड में हुई 80 कार्यशालाओं में करीब 1600 शिक्षकों ने इन कार्यशालों में भाग लेकर शिक्षा को लेकर फैली उन भ्रांतियों को मुंह चिढ़ाया है जिनके तहत शिक्षा जगत के सिर्फ नकारात्मक पक्ष को ही बार-बार सामने रखा जाता रहा है.

जब भी इन शिक्षकों से मिलती हूँ, मन में एक ही सवाल होता है कि आखिर क्या है जो उन्हें अपने काम के प्रति इतनी सकारात्मकता से भरता है. क्या है जो व्यवस्थागत अडचनों के बावजूद उनका रास्ता आसान करता चलता है. पाया कि इन शिक्षकों में अपने काम को लेकर एक आदर भाव है. यह बात उत्तराखंड के शिक्षकों के (सब नहीं) संदर्भ में ही कह रही हूँ. कितने ही शिक्षक मिलते हैं जो अपने परिवार का समय स्कूलों में लगा रहे हैं. कुछ निजी सहयोग से अपने स्कूलों को संवार रहे हैं. अपने बच्चों की एफडी तोड़कर अपने स्कूल की दीवारें व छत पक्की बनवाना कोई मामूली बात तो नहीं है. लेकिन इन शिक्षक साथियों को अपने पेशे के प्रति इस तरह के गैर मामूली लगाव का कोई भान भी नहीं है. यह इल्म न होना उनके काम के सौन्दर्य को बढाता है. अगर आप इनसे मिलेंगे और उनकी तारीफ करेंगे तो ये शिक्षक साथी संकोच से भर उठेंगे. हालाँकि ये शिक्षक लगातार यह मानते हैं कि उन्हें और नए तरीके जानने की जरूरत है ताकि बच्चों को बेहतर ढंग से सिखा सकें. इसीलिए वो अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन के टीचर्स लर्निग सेंटर्स या स्वैच्छिक शिक्षक मंच (वीटीएफ) में छुट्टी के दिनों में या काम के दिन में स्कूल की छुट्टी के बाद आते हैं. गर्मी और जाड़े की छुट्टियों में खुद की क्षमता संवर्धन हेतु आते हैं. बिना किसी सरकारी आदेश के बिना कहीं से कोई शाबासी मिलेगी ऐसी इच्छा के.

स्वैच्छिक प्रतिभाग कितना महत्वपूर्ण होता है इसका उन्हें अंदाजा है और यही बात काफी हद तक उनकी कक्षाओं में भी दिखती है. कोई भी तब बेहतर सीखता है जब या तो उसकी सीखने की प्रबल इच्छा होती है या जरूरत. इसलिए स्कूलों में सबसे पहले बच्चे का आने का मन होना, स्कूल में उसका रहने का मन होना, स्कूल में खुश महसूस करना कुछ भी सीखने-सिखाने से पहले की जरूरतें हैं. बच्चे जितना अपने शिक्षक से लगाव महसूस करते हैं उतना जल्दी सीखते हैं. सीखने को लेकर आत्मविश्वास भी जरूरी है. यह बात कि सीखा जा सकता है, सीखने की क्षमता है, बड़ों और बच्चों दोनों को सीखने की ओर बढाता है.

सीखने-सिखाने से जुडी कुछ इन्हीं संवेदनशील बातों का ध्यान रखते हुए गर्मी की छुट्टियों में अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन द्वारा कार्यशालाएं आयोजित की गयीं और उनमें शिक्षकों का प्रतिभाग उत्साहजनक रहा. यूँ तो यह बदलाव की एक बहुत छोटी सी शुरुआत है. लेकिन इन्हीं छोटी-छोटी रोशनियों में आने वाले कल का उजाला छुपा है. ‘कुछ बदल गया है’ के उत्सव के तौर पर नहीं ‘कुछ बदलने की इच्छा’ के तौर पर शिक्षकों के इस प्रतिभाग का सुख तो महसूस किया ही जा सकता है. बाकी सफर तो अभी शुरू हुआ है...

Tuesday, July 3, 2018

इस लम्हे के टूटकर बिखर जाने से पहले...


सुनो,

यह कोई खत नहीं है, बात है. इसे पढना मत. सुनना.

रात भर बारिश हुई है. मध्धम लय की बारिश. बिलकुल तुम्हारी याद के जैसी. बीच-बीच में जैसे याद की लय तेज़ होती है न, वैसे ही बारिश की भी लय बढ़ी. लेकिन उसे अपना सम पता है. जाये कितना ही ऊपर नीचे लेकिन ठहरती वहीं हैं अपने सम पर.

बरसती रात के बाद की सुबहों के लिए तुम्हें मेरा पागलपन तो याद ही होगा. अब वो पागलपन नहीं रहा. तमाम पागलपन भी उसी सम पर जाकर ठहर गया है. पता है आंगन में लगे अनार की पत्तियां मुस्कुरा रही हैं. वो जब मुस्कुराती हैं तो कितनी भली लगती हैं, तुम्हें बताना चाहती हूँ.

हल्के हरे को जैसे नर्म हाथों से कथ्थई रंग ने छू भर दिया हो. बरसकर थमी बूँदें पत्तियों पर अटकी हुई हैं. उन पर पड़ रही हैं ठंडी धूप की किरणें. मैं एकटक इन पत्तियों को देख रही हूँ. जैसे कोई जादू. ऐसा सौन्दर्य, कितनी शीतलता है इस लम्हे में. कितना सघन सौन्दर्य. मैं इन पलों के सजदे में हूँ.

इस सुख को जीते हुए इस लम्हे के टूटकर बिखर जाने का डर भी है. डर है कि अभी धूप तनिक तेज़ हो जाएगी और यह लम्हा टूटकर बिखर जाएगा. या बहुत तेज़ आ जाएगी बारिश तब भी तो गुम हो जायेगा न यह लम्हा. या कोई मुझे पुकार लेगा कहीं से, कोई फोन आ जायेगा ज़रूरी या कोई मेहमान बजाएगा कॉलबेल और यह लम्हा गिरकर छन्न से बिखर जाएगा. या हो सकता है ऐसा कुछ भी न हो और यह लम्हा वहीं अटका रहे. मैं ही इस लम्हे से बेज़ार हो जाऊं, हालाँकि इसकी संभावना कम ही है. देखो न, ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा की आशंका इस लम्हे में शामिल हो चुकी है. हालाँकि मैं चाहती थी इस लम्हे में सिर्फ मैं और तुम होते, चुप और साथ.

हवा से पत्तियां हिलने लगी हैं. जैसे मध्धम लय पर नृत्य कर रही हों हौले-हौले, अपने पंखों पर अटकी बूंदों को गिरने दिए बगैर. 'नृत्य कर रही हैं' बारिश के ठीक बाद बहती मंद हवा की लय पर झूमती पत्तियों को देखते जाना सुख है. इस सुख को महसूस करते हुए मौन में तुमसे संवाद करना सुख है.

इस लम्हे के टूटकर बिखर जाने से पहले या इस लम्हे की यात्रा पूरी होने से पहले मैं इस लम्हे से खुद को अलग कर लेना चाहती हूँ. इस तरह तीव्र इच्छाओं को महसूस करना, उन्हें पालना-पोसना और जब वो मुक्कमल हकीकत में ढलने लगें उनसे मुंह मोड़ लेना मैंने तुमसे ही सीखा है.

पहले मुझे बहुत बुरा लगता था ठीक उस वक़्त जब बमुश्किल होने वाली मुलाकातों में मिलन का सुख जब कोरों पर अटका होता था तुम्हारा कहना, 'तो अब मैं चलूँ?'. वो अटका हुआ सुख एकदम से कितना निरीह कितना कातर हो जाता था, एक शब्दहीन उदासी मुझे घेर लेती थी, तुम बिना नज़र मिलाये चले जाते थे, बिना मुड़कर देखे भी बारिश में भीगते हुए या धुप में सूखते हुए. तुम चले जाते थे. वो शब्दहीन उदासी मेरे साथ वापस लौटती. मैं बरसों इस उदासी के साथ रही हूँ. मुझे सुखों की आहट से डर लगने लगा है. वो आसपास से गुजरते भी हैं तो घबरा जाती हूँ कि उन सुखों के आने से पहले उनके खो जाने का डर आता है. यह खो जाने का डर इतना बड़ा होता है कि उसके आगे सारे सुख बौने लगते हैं. सबसे ज्यादा बौना लगता है तुम्हारे आने का, तुमसे मिलने का सुख कि तुम्हें खो देने का डर सबसे बड़ा जो है. जानती हूँ तुम्हें इस बारे में बात करना पसंद नहीं. अब मुझे भी पसंद नहीं.

इतने बरसों बाद मैंने भी तुम्हारी तरह कुछ हद तक सुखों के टूटने से पहले उनसे खुद को अलग करना सीखा है. कुछ हद तक ही. वो सारा जिया हुआ उस न जिए हुए के आगे किस कदर छोटा है, कितना कम है समझ पाती हूँ अब. 'होना' असल में 'न होने में' ही तो छुपा है. वो छुपा है होने की इच्छा में.

फिर से बारिश शुरू हो चुकी है. वो लम्हा अभी कुछ देर और ठहरेगा. बूंदों के साथ अनार की पत्तियों का खेल कुछ देर और चलेगा शायद. मैं उस दृश्य से बाहर हूँ हालाँकि वो दृश्य मेरे भीतर. अब वो लम्हा बीतकर भी बीत नहीं पायेगा. मेरे जिए में वो हमेशा यूँ ही महकता रहेगा. मेरा जिया जब मेरी स्मृतियों में बदल जाएगा तब इसके रंग फीके पड़ जायें शायद. क्योंकि मेरे पास अब रंग नहीं हैं. मेरी स्मृतियों के रंग भी सब उड़ गए हैं. कुछ स्मृतियाँ चटख रंगों की तलाश में कभी-कभी व्याकुल हो उठती हैं फिर उदास होकर धूसर रंगों में पनाह लेती हैं. मेरे पास अब कोई रंग नहीं हैं. मेरे सारे रंग मैंने तुम्हारे साथ विदा कर दिए थे. न, न नाराज मत हो. जानती हूँ मेरी ऐसी बातें तुम्हें पसंद नहीं लेकिन क्या करूं सच तो वही है कि अंतिम विदा के वक़्त किसी टहनी पर अटकी पीली पड़ चुकी पत्ती सा तुम्हारा हाथ अब तक थमा नहीं है. ओ हेनरी की कहानी 'द लास्ट लीफ' जैसा लगता है तुम्हारा विदा के लिए हिलता हाथ. उस पत्ती के हरे को भूरे रंग ने घेर लिया था. भूरे के कोने में पीलेपन ने भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी. यह पीला धीरे से भूरे को अपनी जद में लेगा और फिर हरे को. और एक रोज तेज़ हवा का झोंका, या शायद धीमी हवा भी पत्ती को पेड़ से अलग कर देगी. फिर वो पत्ती नीचे गिरेगी लहराते हुए, अपने हरे से पीलेपन की यात्रा पर इठलाते हुए. पीलेपन की ओढनी पहने वो अपने जैसी तमाम पत्तियों से मिलेगी, तमाम पीली पत्तियों से. वो खुश होगी कि डाल से बिछड़ने के अपने सबसे बड़े डर से अब वह मुक्त है. तभी एक उदास आँखों वाली लड़की वहां से गुजरेगी और अनायास उस पत्ती को अपनी हथेलियों पर रखेगी. उस पत्ती को वो सहलाएगी बार-बार. वो उसमें बचे हुए हरे को ढूंढ निकलना चाहेगी. वो लड़की उस पत्ती में वही हरा ढूंढ रही होगी, जो मैं ढूँढती फिरती हूँ जीवन में. क्या वो लड़की मैं हूँ, या वो पत्ती मैं हूँ. क्या दुनिया की तमाम लड़कियां पीली पड़ चुकी उम्मीदों वाली पत्ती में अपने हिस्से का हरा तलाशने में जुटी हैं. शायद. ऐसा ही हो काश! वो इन पत्तियों में हरा तलाश लेंगी एक दिन और इस धरती का तमाम हरा सहेज देंगी

यूटोपिया सा लगता है न सब कुछ. लेकिन यह यूटोपिया न हो तो क्या रह जाएगा भला.

बारिश अब भी हो रही है. मैं कनखियों से अनार की डाली को देखती हूँ. कुछ इस तरह कि देख भी लूं और नहीं देखा है का भ्रम भी बचा लूं. बारिश स्टेशन आने पर धीमी होती ट्रेन की रफ़्तार सी हो चली है. अब वहां उस अनार की डाल पर एक बुलबुल आकर बैठ गयी है. वो अकेली है. उसका साथी भी वहीं कहीं होगा आसपास. दादी ने बचपन में बताया था कि बुलबुल हमेशा जोड़े में रहती है. इन दिनों रोज बुलबुल के जोड़े को देखकर दादी की बात याद करती हूँ. दादी नहीं जानती थीं मेरे भीतर बुलबुल होने की इच्छा को उन्होंने ही रोपा है. बुलबुल के जोड़े को देखती हूँ तो पनीली आँखों में मुस्कान खिल उठती है.

तुम क्या कभी बुलबुल के बारे में सोचते होगे. या इन बारिश में भीगती अनार की पत्तियों के बारे में, या किन्ही भी पत्तियों के बारे में, या ओ हेनरी की 'द लास्ट लीफ' के बारे में, या विदा के वक़्त अपने उस हिलते हुए हाथ के बारे में जो अब भी हिल रहा है...