Sunday, November 26, 2017

प्रियतम की हथेली के प्रति- बाबुषा कोहली


[ जन्मों पुराना व्रत हूँ मैं
तुम्हारी अंजुरी से पी लिया जल
घूँट भर
त्योहार हो गया जीवन. ]

**
सदियाँ सोख कर बना है मेरी पुतलियों का गाढ़ा सियाह
जाने कब से देखती रही अपलक संसार को
ज्यों देख सकता है समय बिन ठहरे
बंद घड़ी के काँटों को
मेरी कविता के गलियारे में मुर्गे की बाँग तक सुनी है

कुछ उनींदे लोगों ने

दो सौ बरस तक चलती रही मेरी तीजा की रात
मैं जागी रही निर्जल
सितारों से पूछती रही उनके देश का हाल
मेघों के निकट रही बहुत
गाती रही सूखे कंठ लोकगीत बौछार के
द्वार पर बाँधती रही ऋतुओं के फुलहरे
देहरी पर नयन जलाए काटती रही अँधेरे की चाल
तोड़ती रही संसार के नियम
प्रतीक्षा का कठोर व्रत निभाती रही
मैं जागी रही निर्जल दो सौ बरस तक
थके-प्यासे यात्रियों से करती रही जल की बात

प्यासा ही नहीं चला जाता सदा कुएँ के निकट
कुआँ भी पुकारता है प्यासे को
रुई के फाहे को पुकारता चोटिल घुटनों का लहू
कागा को पुकारतीं सूनी छतें

नींद को पुकारते रहे मेरे स्वप्न
मैं अपने रतजगों में तुम्हें पुकारती रही

तुम्हें पाने का बालहठ कर बैठे जो, वह नादान है
तुम अमेरिका नहीं जिसे कोई कोलम्बस पा जाए
खो जाएँ जहाजों के बेड़े जहाँ
वह अटलांटिक हो तुम
मणिकर्णिका घाट नहीं जहाँ जीवन के हारे पाते हों मोक्ष
विश्वनाथ की उलझी हुई गलियाँ हो तुम जिसकी धूल फाँकते खो जाए कोई संन्यासिन

तुम सतपुड़ा के सघन वन हो
सागौन की लालसा में काट न ले कोई लकड़हारिन
एक पत्ता जूड़े में खोंसे
माँग में तुम्हारे हरे को भरे वनकन्या
तुमसे श्रृंगार रचाए
हृदय नहीं माँगा तुम्हारा
मैंने माँगी हथेली
कौंधती है आँखों में विस्मय की बिजली
धड़कन धमकती बादल गरजते
बेमौसम हो जाती बरसात
कितने तो रूप इस हथेली के
चन्द्रमा में जितनी कलाएँ नहीं !

सुबह का डाकिया डाल कर चला जाता
मेरी देहरी पर धूपीली चिट्ठियाँ
तुम्हारी उँगलियों के बीच की दरारों से
झर पड़ते ऊष्मा के पीले पोस्टकार्ड

मैं सूर्य की इच्छा करूँ
छज्जे पर दिन उतर आता है
ईश्वर की इच्छा करूँ
खाने की थाली लिए माँ चली आती है
मैं चाह लूँ दूर टिमटिमाता एक सितारा
तुम्हारी हथेली आकाश हो जाती है

जोगी !
सुबह उठते ही अपनी हथेली तो देखो
तुम्हारी रेखाएँ ओढ़े मैं ऊँघ रही हूँ

बेसुध !
ज्यों सोता है नवजात शिशु पिता की थपकियों की लय में निश्चिन्त

देखो तुम !
एक बार अपनी हथेली दुपहरी की चटख धूप में भी
रगों में आलस भरे उलटती-पलटती हूँ तुम्हारी रेखाओं के बिछौने पर
ज्यों करवटें बदलती है नव-विवाहिता
चादर की सलवटों पर

साँझ के ढलकते मद्धिम उजाले में देखो
सदियों की जागी थी
उठ रही अब
मैं वस्त्र बदल रही हूँ
सँवर रही
पहन रही हूँ तुम्हारी रेखाएँ
मैं जा रही हूँ तुम्हारी हथेली के अंतिम छोर तक
चन्द्रमा संग बैठूँगी अंतरिक्ष में पाँव लटकाए
यह रतजगा नहीं हृदय की जाग है, जोगी !
तीजा का व्रत अब पूरा हुआ
मेरे तलुवे और एड़ियों पर छपी धूल धुलेगी
बैठूँगी जल में पाँव डुबोए

मैं जान गयी हूँ
तुम्हारी तर्जनी से एक नदी निकलती है 


Saturday, November 18, 2017

वो लम्हे


'सिखाना' मुझे हमेशा सीखना' सुनाई दिया हमेशा. 'समझाना' सुनाई दिया 'समझना' और 'कहना' सुनाई दिया 'सुनना' ही. तो ऐसे ही सीखने, समझने और सुनने के रास्तों पर चलना लुभाता है. युवाओं से संवाद के हर अवसर को मैंने चुना अपनी आंतरिक ऊष्मा को संजोये रखने के लिए, उनकी आँखों के सपनों की भाषा को पढने के लिए, उनके सवालों की गठरी को टुकुर टुकुर देखने के लिए. उन सवालों में कुछ अपने सवाल भी मिला देने के लिए.

पिछले दिनों यह मौके कई रूपों में मिले, कभी दून स्कूल ने बच्चों से संवाद का अवसर दिया, कभी केन्द्रीय विद्यालय ने और अभी हाल ही में दून विश्वविद्यालय ने. भूमिका कुछ भी रही हो मैंने किया वही जो मैं कर सकती थी कि बच्चों को सुना उनसे बातें कीं. 

दून विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी 'बज़्म' में जिस तरह के रंग सजाये थे उसने अभिभूत किया. महसूसने के इस सफ़र में गीता गैरोला जी और राकेश जुगरान जी भी साथ ही रहे. बहुत उम्मीद भरे लम्हे थे,  उम्मीद की इस  खुशबू में यह दुनिया डूब जाए तो कितना सुन्दर हो...!


ख़्वाबों को थामे रहना सिखाती है 'तुम्हारी सुलू'


अगर आपके पास सपने नहीं हैं तो यकीनन कुछ भी नहीं हैं लेकिन अगर आपके पास सपने हैं और उन सपनों ने आपकी नींदें हराम कर रखी हैं, आप किसी भी कीमत पर अपने सपनों को पानी देना नहीं भूलते तो वही पूरा समाज, पूरा परिवार आपके खिलाफ खड़ा होने को आतुर होता है जो असल में पूरी जिन्दगी दूसरों के सपनों को पहले पोसता रहा और फिर जीने लगा. 'तुम्हारी सुलू' समाज और व्यक्ति के ऐसे ही बारीक़ धागों के उलझाव की ओर इशारा करती है.

फिल्म पूरी तरह से विद्या बालन और मानव कौल की है, विद्या अपने ख़ास अंदाज से एक मध्यवर्गीय स्त्री के सोये सपनों को झिन्झोडती हैं. मानव ने एक मध्यमवर्गीय पतियों के थोड़ा इम्प्रूव्ड वर्जन बनने की कोशिश करने और उसमे फेल होने की पीड़ा को बखूबी निभाया है .

सुलू असल में हर उस मध्मवर्गीय स्त्री की कहानी है जो पैसा कमाने के लिए काम नहीं करती यानी काम तो करती है लेकिन अनपेड.क्योंकि वो हाउसवाइफ है. वो दुनियावी सफलता के मीटर में फिट नहीं है लेकिन जिसकी आँखों में सपने बहुत हैं. इस मायने में सुलू थोड़ी अलग है कि उसने आम गृहिणियों की तरह खुद को रोजमर्रा की जिन्दगी को नियति मानकर सपने देखना और उनका पीछा करना नहीं छोड़ा है. वो हमेशा कुछ करने की खोज में लगी रहती है और अपने सपनों की ऊर्जा से भरी हुई है. हालाँकि उसे खुद भी यह स्पष्ट नहीं है कि उसके सपने हैं क्या लेकिन उसे यकीन है कि वो कर सकेगी. यही फिल्म की पंचलाइन है. बिलीव इन योर ड्रीम.

सुलू जिन्दगी के हर लम्हे को बेहद प्यार से अपनाती है, बेहद अपनेपन से. इसकी वजह पैसा कमाना नहीं है बल्कि कुछ करने की ख़ुशी को महसूस करना है. सुलू का पति अशोक उसके इन सपनों में उसका साथ भी देता है. दोनों की रूमानी कहानी खुशनुमा एहसासों से भरती है. बच्चे के स्कूल में मम्मियों की चम्मच नीबू की रेस हो या सोसायटी के कार्यक्रम या अन्य छोटे मोटे कम्पटीशन जीतना उसे सब खुश करता है. वो कहती भी है कि 'मैं हर चीज़ में बड़ी जल्दी खुश हो जाती हूँ.' लेकिन कहानी एक नाटकीय मोड़ लेती है और सुलू आरजे बन जाती है. पहली नौकरी, नाईट शिफ्ट, अच्छी सैलरी, शो का हिट होना, सुलू का स्टार बन जाना और शुरू होना घर में एक बार फिर 'अभिमान' फिल्म की कहानी का दोहराव. समाज, परिवार तो टांग अड़ाने की ताक में हमेशा रहता ही है अबकी बार हमेशा से मित्र रहे और प्रेम से भरे पति का ईगो भी आड़े आ ही गया. इसके बाद तमाम नाटकीय मोड़ लेते हुए कहानी आगे बढ़ती है.

सच कहें तो कहानी बहुत आगे बढ़ नहीं पाती है जिसकी गुंजाईश थी. कहानी में बहुत नयापन नहीं है इसके बावजूद फिल्म के संवाद, बीच बीच में मजबूत स्ट्रोक लगाते हैं. मानव और विद्या के अभिनय ने कहानी के कच्चेपन को जरूरत से ज्यादा संभाला है. निर्देशन एकदम चुस्त है, कहानी में घटनाएँ बहुत हैं, फिल्म तेजी से भागती है, कई जगह लगता है कि घटनाओं की भरमार महसूसने के आड़े आ रही है.

फिल्म का एक दृश्य है जब नायक की नौकरी छूटती है और वो बालकनी से जहाज उड़ाता है बेहद इंटेंस है. लेकिन जब तक रोयें खड़े होते, जब तक दर्शक नायक के भीतर के उद्वेलन के साथ रिश्ता बन पाते सीन कट हो जाता है. हालाँकि कुछ दृश्यों में इसकी गुंजाईश बरकरार भी रही है लेकिन वो दृश्य नायिका के हिस्से में ज्यादा आये हैं जैसे बच्चे के स्कूल में प्रिंसिपल द्वारा बच्चे के सस्पेंड होने की बात पर नायक का यह कहना कि 'अब वो ख्याल रखेगा बच्चे का' या फिल्म के परम नाटकीय क्लाइमेक्स में बच्चे के गायब होने और फिर मिलने पर नायिका द्वारा उसे भींच लेना.

फिल्म के कुछ दृश्य बेहद सशक्त बन पड़े हैं, जिसमें फिल्म के अंत में बच्चे को ढूंढते हुए स्टेशन पर बैठे नायक और नायिका. जहाँ नायक पर्स में रखे बच्चे के खत को नायिका से साझा करता है.

तुम्हारी सुलू खूब ख्वाब देखने, ख़्वाबों को सहेजने की, उन्हें पूरा करने के प्रयासों की फिल्म है. फिल्म का गीत 'रफू' बेहद खूबसूरत है. फिल्म मनोरंजन करती है, मैसेज भी देती है, सकारात्मकता से भरती भी है फिर भी कुछ कमी सी रह गयी लगती है. या कहानी पर और काम होना था या उस हड़बड़ी से बचना था शायद जहाँ सबकुछ ढाई घंटे में घोंट कर पिला देने की जिद हो.

फिल्म को देखना बनता है विद्या बालन और मानव कौल के अभिनय के लिए, मनोरंजन के लिये और अपने आस पास ख्वाब देख रहे लोगों को समझना सीखने के लिए उनको सम्मान देने के लिए भी.

Tuesday, November 14, 2017

जब टूटता है दिल


टूटना
पहाड़ तब नहीं टूटता
जब पहाड़ टूटता है
पहाड़ तब टूटता है
जब टूटता है दिल.

भरना
दिल भर आने से नहीं भर आतीं
सूखी नदियाँ
पोखर
कुएं
बावडी
इनके सूखेपन से
भर आता है दिल.

Saturday, November 11, 2017

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ



जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
पल भर को थम जाती है धरती की परिक्रमा
बुलबुल का जोड़ा मुड़कर देखता है
टुकुर टुकर

लीची के पेड़ के पत्तों पर से टपकती बूँदें
थम जाती हैं कुछ देर को
जैसे थम जाती हैं मुलाकात के वक़्त
प्रेमियों की साँसे

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
नदियों की कलकल में एक वेग आ जाता है
जंगलों के जुगनुओं की आँखें चमक उठती हैं
सड़क के मुहाने पर फल बेचने वाली बूढी काकी
सहेजती हैं फलों की नमी

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ तो
बढ़ जाती हैं बच्चों की शरारतें
गिलहरियों की उछलकूद
ज्यादा गाढे हो जाते हैं फूलों के रंग
और मीठी लगने लगती है बिना चीनी वाली चाय

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ
चरवाहे के गीत गूंजने लगते हैं फिजाओं में
शहर की टूटी सड़कें भी गुनगुना उठती हैं
प्यार में टूटे दिलों की धडकनों को
मिलता है कुछ पलों को आराम

जब मैं तुम्हें पुकारती हूँ
होंठों से नहीं निकलता कोई भी शब्द
फिर भी सुनती है
पूरी कायनात...

करीब करीब सिंगल होती है दिलों से मिंगल



संवादों के इस शोर में, लोगों की इस भीड़ में कोई अकेलापन चुपके से छुपकर दिल में बैठा रहता है, अक्सर बेचैन करता है. जीवन में कोई कमी न होते हुए भी ‘कुछ कम’ सा लगता है. अपना ख्याल खुद ठीक से रख लेने के बावजूद कभी अपना ही ख्याल खुद रखने से जी ऊब भी जाता है. वीडियो चैटिंग, वाट्सअप मैसेज, इंटरनेट, दोस्त सब मिलकर भी इस ‘कुछ कम’ को पूर नहीं पाते. करीब करीब सिंगल उस ‘कुछ’ की तलाश में निकले दो अधेड़ युवाओं की कहानी है. जया और योगी यानी इरफ़ान और पार्वती.

योगी के बारे में फिल्म ज्यादा कुछ कहती नहीं हालाँकि योगी फिल्म में काफी कुछ कहते हैं. लेकिन जया के बहाने समाज के चरित्र की परतें खुलती हैं. दोस्त उनके अकेले होने का बिंदास फायदा उठाते हैं और पीछे उनका मजाक भी उड़ाते हैं. कभी उसे कोई बच्चों के साथ शौपिग के लिए भेजती है, कभी कोई बेबी सिटिंग के लिए पुकार लेती है. मित्र भाव से जया यह सब करती भी है लेकिन साथ ही अकेले होने को लेकर एक तानाकशी का रवैया भी महसूस करती रहती है. एक अकेली स्त्री किस तरह समाज के लिए स्टपनी की तरह समझी जाती है. जिसे हर कोई अपना काम निकालने के लिए कहीं भी इस्तेमाल करना चाहता है. और खूँटी समझकर उस पर अपनी सलाह टांगने के लिए. जिस दिन वो खूँटी होने से मना कर देती है स्टपनी होने से इंकार कर देती है उस दिन उस दिन इस समाज की शक्ल देखने लायक होती है.

फिल्म की नायिका जिन्दगी में जिन्दगी तलाश रही है लेकिन उदासी को ओढ़े नहीं फिर रही है. शिकायत का रंग उसकी जिन्दगी के रंग में घुला हुआ हो ऐसा भी नहीं है. वो विधवा है लेकिन वैधव्य की नियति में घिसट नही रही. उसने भीतर जिन्दगी सहेजी हुई है, जिन्दगी जीने की लालसा को खाद पानी दिया है लेकिन इस जीने की जिजीविषा में ‘कुछ भी’ ‘कैसा भी’ की हड़बड़ी नहीं है. एक एलिगेंस, एक ठहराव वो जीती है और इसी की तलाश में है.

एक रोज वो एक डेटिंग वेबसाईट पर लॉगिन करती है. एकदम से वीयर्ड कमेंट्स नमूदार होते हैं, जया हडबडा जाती है. लेकिन अगले रोज एक मैसेज मिलता है उसे जो उसे अलग सा लगता है. यहीं से शुरू होती है फिल्म. किसी कॉफ़ी शॉप का बिजनेस बढ़ाने के बहाने शुरू हुई मुलाकातें ट्रैवेल एजेंसी का बिजनेस बढ़ाने लगती हैं. डेटिंग वेबसाईट कितनी भरोसेमंद होती हैं पता नहीं लेकिन फिल्म उनके प्रति उदार है. योगी की तीन पुरानी प्रेमिकाओं से मिलने के बहाने दोनों निकल पड़ते हैं पहले ऋषिकेश, फिर अलवर और उसके बाद गंगटोक.

फिल्म एक साथ दो यात्राओं पर ले जाती है. रोजमर्रा की आपाधापी वाली जिन्दगी से दूर प्राकृतिक वादियों में नदियों की ठंडक, हवाओं की छुअन महसूस करते हुए भीतर तक एक असीम शान्ति से भरती जाती है जिसमें योगी का चुलबुला अंदाज़ अलग ही रंग भरता है. प्रेम का पता नहीं लेकिन दोनों साथ में अलग-अलग यात्राओं को जीने में कोई कसर नहीं छोड़ते खासकर जया.

फिल्म की कहानी और इस कहानी का कहन दोनों ही अलहदा है. वो जो अकेले होना है, फिल्म में उसका बिसूरना कहीं नहीं है, उसकी गहनता है. जो संवाद हैं वो अपने भीतर ढेर सारे अनकहे को सहेज रहे होते हैं. और वो जो ख़ामोशी है वो बहुत गहरे उतरती है. शब्दहीनता में कोई जादू गढ़ती. फिल्म दिल्ली, देहरादून, ऋषिकेश, अलवर, गंगटोक घुमाते हुए ले जाती है अपने ही भीतर कहीं. यह एक खूबसूरत प्रेम कहानी है जो असल में प्रेम की यात्रा है. बेहद अनछुए लम्हों को सहेजते हुए, अनकहे को उकेरते हुए.

किसी ताजा हवा के झोंके सी मालूम होती है यह फिल्म. सारे मौसम, सहरा, पहाड़, जंगल, फुहार सब महसूस होते हैं. योगी की शायरी के बीच सुनी जा सकती है वो खामोश कविता जिसे इंटरनेट पर पब्लिसिटी की दरकार नहीं है.

यह फिल्म असल में ख्वाबों पर यकीन करने की फिल्म है, जिन्दगी में आस्था बनाये रखने की फिल्म है. एक संवेदनशील और मौजूं विषय को सलीके से उठाया भी गया है और निभाया भी गया है जिसमें हास्य की मीठी फुहारें झरती रहती हैं. बस योगी के किरदार को थोड़ा बंद सा रखा गया है, मसलन एक स्त्री के अकेलेपन पर समाज के रवैये को तो दिखाया गया है लेकिन एक पुरुष किरदार के जरिये दूसरे पक्ष को भी सामने लाने का मौका जैसा गँवा दिया गया हो. या फिर योगी करते क्या हैं, 'मेरे पास बहुत पैसा है 'और पुरानी गर्लफ्रेंड द्वारा 'फटीचर'कहे जाने के बीच वो कहीं अटके हुए हैं जिसका भेद खुलता नहीं है.

फिल्म के कुछ दृश्य बेहद प्रभावी हैं. तारों भरे आसमान के नीचे नींद की गोद में लुढ़क जाना हो या नींद की गोलियों के असर में जया की पजेसिवनेस का उभरना या बात करते करते योगी का सो जाना. फिल्म का क्लाइमेक्स बिना किसी हड़बड़ी के अपने मुकाम तक पहुँचता है...एक रिदम में. वो रिदम फिल्म के अंतिम दृश्य के अनकहे संवाद तक बनी रहती है.

फिल्म की खूबसूरती को सिनेमेटोग्राफी ने खूब निखारा है. कुछ फ्रेम तो जेहन में ठहर से जाते हैं. फिल्म की एडिटिंग चुस्त है, एक भी दृश्य या संवाद बेवजह नहीं लगता. इरफ़ान हमेशा की तरह लाजवाब हैं जया के किरदार में पार्वती भी खूब खिली हैं. बिना किसी ‘आई लव यू’ के यह साफ सुथरी सी प्रेम कहानी दिल को छू लेती है. संगीत फिल्म को कॉम्प्लीमेंट करता है. खासकर वो जो था ख्वाब सा क्या कहें या जाने दें’ गाना जो सुनने में मधुर, मौजूं और प्रभावी पिक्चरजाइशेन बांधता है. फिल्म के संवाद काफी चुटीले और असरदार हैं.

Friday, November 10, 2017

उम्र चौदह की होने को है...


ख़्वाहिश के भीतर खुद को देखती हूँ, उसकी उम्र को जीती हूँ. उसके स्कूल के दिन, दोस्तों की बातें, टिफिन की चोरियां, धौल धप्पे, अबे तबे, मस्तियाँ, शरारतें सब. वो स्कूल जाते समय साइकल के पैडल पर पैर मारती है तो महसूस करती हूँ पंख उगते हुए. स्कूल से लौटते ही किस मूड में दरवाजा खोलेगी इसका इंतजार करती हूँ. दरवाज़ा जिस मूड में खुलता है उसमें स्कूल में दिन कैसा बीता की पूरी दास्ताँ छुपी होती है...'क्या मम्मा इट वाज़ सो बोरिंग टुडे...' 'ओ वाव आज तो मजा ही आ गया...' 'कितना एक्साइटिंग दिन था. ' 'आज तो बस पनिशमेंट मिलते मिलते रह ही गयी...' 'पता है आज कैसे जुगाड़ करके अपनी दोस्त को मैम से डांट खाने से बचाया...' 'आयूष तो कल पिटेगा पक्का, बोलो टिफिन ऐसे गायब किया जैसे कभी था ही नहीं'...'

'मम्मा आज क्या हुआ पता है, सिमरन मैम आई थीं स्कूल, सिमरन मैम. हम लोग क्लास से भागकर पहुँच गए उनसे मिलने, पता है बाकी टीचर्स को सिमरन मैम से ईर्ष्या होती होगी, पूरे स्कूल के बच्चे उनके फैन हैं. वो टीचर्स की शाहरुख़ खान हैं' कहते कहते उसकी आवाज नम होने लगती है. सिमरन मैम पिछले साल क्लास टीचर थीं, मैं भी उनकी फैन हो गयी थी. सारे बच्चों के लिए किस तरह प्रोटेक्टिव थीं, पैरेंट्स से भी उनके बच्चों के लिए लड़ जाती थीं...और जिस दिन सिमरन मैम ने स्कूल छोड़ा उस दिन बल्कि कई हफ़्तों तक घर के कोनों में सिसकियाँ सुनाई देती थीं.

कार्निवाल की तैयारी, स्पोर्ट्स डे की तैयारी, पीटीएम का डर सब जीती हूँ. एक रोज मैंने उसे पूछा, तुम्हें तो डांट पड़ती नहीं तो तुम क्यों डरती हो पीटीएम से तो हंसकर बोली, 'हाँ मैं भी ऐसा सोचती हूँ कि मैं क्यों डरती हूँ फिर सोचा जब सब डरते हैं तो थोड़ा मैं भी डर ही लेती हूँ हा हा हा...' बताओ भला क्या लॉजिक है...इस उम्र में लॉजिक कहाँ चलते हैं. यह उम्र ख़्वाबों के आकार लेने की उम्र है. उसे छूती हूँ तो मानो आसमान छू लिया हो.

अभी वो मुझसे किसी बात पर नाराज है...मैं उसकी पसंद का पास्ता बना रही हूँ वो मुस्कुरा रही है. बुरी तरह से लूडो में हराने को वो फिर से तैयार है...गोटियाँ लगाई जा रही हैं...घर में चौदह बरस की दो लड़कियां रहती हैं इन दिनों...

(किशोरी बेटी की माँ की डायरी )

Thursday, November 9, 2017

फांस


तुम्हारी याद किसी फांस सी धंस गयी थी
टीसती रहती थी लगातार
टप टप टप...टपकता रहता था कोई दर्द

निकालने की कोशिश में
उसे और भीतर धंसा देती थी
दर्द की लहक बढ़ जाती थी

यह दर्द आदत बन चुका था
इस दर्द से मुक्ति की लगातार कोशिश
असल में फांस को भीतर धकेलने की कोशिश
दर्द को जिन्दा रखने की कोशिश थी
खुद को भी

एक रोज फांस को निकालने के बहाने जब
स्मृतियों की महीन सुई से उसके संग खेल रही थी
वो फांस निकल ही गयी एकदम से

धीरे-धीरे खत्म हो गया दर्द
जीवन भी...

Tuesday, November 7, 2017

रास्ते बंद हैं


जैसे  कोई  खाली कनस्तर बजता रहता है भीतर। मैं इस कनस्तर की आवाज़ को सुनने से बचने के लिए तरह तरह के उपाय करती हूँ. तेज़ म्यूज़िक सुनती हूँ, तेज़ आवाज़ में लोगों से बातें करती हूँ, सिनेमा देखती हूँ। लेकिन सब बेअसर। बाहर की आवाज़ें जितनी तेज़ करती हूँ कनस्तर की आवाज़ें उससे तेज़ बढ़ती जाती हैं। कानों में दर्द होने लगा है, इस दर्द से पीछा नहीं छूटता।

रास्ते सब बंद नज़र आते हैं, वो बंद होंगे नहीं जानती हूँ लेकिन मुझे वो बंद नज़र आते हैं. उनकी तरफ देखने का मन नहीं करता, पढ़ने का मन नहीं करता, लिखना तो कबका छूट चुका है, अब उसका छूटना अखरना भी बंद हो गया है. किसी से मिलने का मन नहीं करता, कोई आ जाता है मिलने तो लगता है फंस गयी हूँ, अब बेवजह मुस्कुराना पड़ेगा, दुनिया जहाँ की वो सब बातें करनी पड़ेंगी जिनका असल में कोई मायने नहीं। 'सब ठीक है' की डफली पर बेसुरा राग गाते रहना होगा जब तक वो चले न जाएँ। अगर यह कहूं कि सब ठीक नहीं है तो क्या ठीक नहीं है के सवाल पर फंस जाने का खतरा है. क्योंकि क्या ठीक नहीं है यह तो मुझे भी पता नहीं, लेकिन कुछ भी ठीक नहीं  है यह पता है. कोई कितना भी आपका करीबी हो आप उसे यह ठीक न होना समझा नहीं सकते, लेकिन इसे जीना नियति है. जीवन भार सा मालूम होता है.

यूँ जिंदगी एकदम व्यवस्थित है, सब कुछ तयशुदा खांचों के बरक्स परफेक्ट है फिर भी कुछ है जो गहरे धंसा है, फांस सा. इस फांस को निकालने का भी जी नहीं चाहता, इसकी आदत होने लगी हो जैसे, एक कसक, एक दर्द रिसता रहता है तो लगता है जी रही हूँ. जी रही हूँ यह जानती हूँ हालाँकि जीने की इच्छा को बहुत पहले जी चुकी हूँ, पूरी तरह से. तो यह जो जी रही हूँ यह क्या है आखिर। जीना या जीने का उपक्रम।

अगर कोई इच्छा न हो, आकांक्षा न हो, कोई युद्ध न हो, कोई चाहना न हो, किसी से नाराज़गी न हो तो जीवन कैसा होता होगा। मैं जीवन को जानती हूँ क्योंकि उसे मैंने खूब जिया है, ख्वाब में भी हक़ीक़त में भी. यह जो सरक रहे हैं दिन, रात, ये जो चल रहा है साँसों का चक्र यह जीवन नहीं।

एक दोस्त कहा करता था, जब भीतर बहुत सारा स्पेस बनता है तो नए की गुंजाईश बनती है. मेरे भीतर का यह स्पेस अंतरिक्ष सा विशाल होता जा रहा है, मैं बेसब्री से उस नए के उगने का इंतज़ार कर रही हूँ जिसके बारे में कुछ नहीं जानती।

खाली कनस्तर की आवाज़ से आज़िज़ आ चुकी हूँ. नया उगे न उगे इन आवाज़ों से मुक्ति चाहिए. चाहिए ही. 

Saturday, November 4, 2017

ये मेरे हाथ जो छूते हैं मुझे...


मानस का यह गद्य असल में पढने से पहले मैंने सुना था. एक सामान्य बातचीत में. मानस को शायद पता भी नहीं चला होगा कि बातचीत की वह शाम कितनी पोयटिक हो उठी थी. उसका बोलना असल में उसका सोचना था और उसका सोचना उसका जिया हुआ था. सब में एक लय थी, एक मासूमियत. कविता क्या होती है, कहाँ मिलती है, नहीं जानती, लेकिन मैं जीवन में ऐसी कविताओं को तलाशती रहती हूँ, उन्हें फिर-फिर जीती रहती हूँ. उस शाम मानस से पहली बार कहा था, जो कुछ अभी तुम कह रहे थे उसे लिख सकते हो क्या? वो गहरे संकोच में गड गया था. उसी संकोच में उसने मेरा कहा मान लिया था, थोड़ा वक़्त लगाकर ही सही लेकिन लिख दिया. इस टुकड़े को पढ़ना, उस शाम को बार-बार जीना है और एक ऐसे संभावनाशील युवा के बारे में सोचना जिसमें इतनी गहनता, इतना गाम्भीर्य और इतनी विनम्रता है जो दुर्लभ है. आज पूरे एक साल बाद इस टुकड़े को अपने ब्लॉग पर अपने और दोस्तों के लिए भी सहेज रही हूँ, इस उम्मीद के साथ की मानस अपनी भीतर की यात्राओं में और निखरते रहें. - प्रतिभा  
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एक अजनबी रात में किसी अनजान शहर में खो जाना कैसा लगता है? जब गलियाँ सुनसान हों, दूर दिखने वाली खिड़कियों से आती धीमी रोशनी भी बुझने लगे। दूर कहीं जलते अलाव का धुआँ भी अब हवा से लड़ाई में हार गया हो। आँखों में नींद और पैरों की थकान सामने सड़क पर सो रहे मजदूरों के सपनों से जा उलझी हो। और तब जब कोई अपना न हो? जब आप कहीं न जा सके? जब आपका कोई ठिकाना न हो? क्या यही अकेलापन है? या फिर अपने बिस्तर पर चौंक कर उठ जाएँ आप आधी रात को और खिड़की से छनकर आती पीली रोशनी नहला दे आपके आधे शरीर को। उस अँधेरे कमरे में न रहे कुछ भी, बस एक आत्मा जो देखती है अँधेरा और उस अँधेरे में थोड़ा और अँधेरा।

ये मेरे हाथ जो छूते हैं मुझे, क्या हैं ये मेरे साथी? ये मेरे पैर जो फैले हैं भरे-पूरे मेरे सामने, क्या करेंगे बातें अभी मुझसे? कौन हैं यहाँ मेरा जो दूर करेगा इस रात का अँधेरा? सिर्फ़ अँधेरा। मेरी बातों का कोई अंत नहीं है। कहने को मेरे पास अनगिनत शब्द हैं, पर वाक्य नहीं बनते उनसे। कोई चाहेगा क्या सुनना? अर्थ नहीं बनाते, ज्ञान नहीं देते, मनोरंजन नहीं करते, बस कहते हैं कुछ ये शब्द। कहते हैं ये उस चुप्पी को जो चाहिए मुझे। उस घटना को जो घटी किसी ऐसे समय जब सुप्त था मेरा मानस और कराह रही थी मेरी आत्मा यूँ ही किसी फंदे में फंसे शूकर की आवाज़ में। किसी जंगल में फँसी अकेली, घायल और भूखी प्यासी। आखिर अकेला होना है क्या? मैं अकेले रहता हूँ। किसी जानवर की तरह, खाता हूँ, सोता हूँ, अपने खाने का इंतज़ाम भी करता हूँ, सभी जैविक क्रियाएं करते हुए हर दिन निकाल देता हूँ।

अकेला रहता हूँ, पर अकेलापन नहीं आता कभी। क्यों? क्योंकि मैं जीता ही नहीं हूँ। मैं बस होता हूँ, वह भी होने के लिए। मुझे नहीं पता कि मैं कौन हूँ, मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ जा रहा हूँ। मैं हूँ भी या बस होने का एक विचार हूँ? बात विचित्र है पर अकेलापन अक्सर वहाँ होता है जहाँ उसके अर्थ के हिसाब से उसे नहीं होना चाहिए। ज़िन्दगी के हर छलावे की तरह कहीं किसी छोटे से छिद्र से अचानक ही आता है और फ़ैल जाता है किसी नशीली गैस की तरह। नशा अकेलेपन का, मीठा और विषैला। जान लेने वाला पर क्षणिक जीवन देने वाला। शुरू में कड़वा लगने वाला पर बाद में सबसे स्वादिष्ट बन जाने वाला। 

अकेलापन 'छोटी बहू' के चरित्र की तरह। अकेलापन हमारी संतान, हमसे ही निकला हुआ और हमारा ही एक हिस्सा। और हम, विचारों के गुलाम, बनाने में माहिर, वैध और अवैध संतानें। वैध जब हमारी इच्छा से, रहते हैं हम खुश उसके साथ। लगाते हैं उसे अपने फ़ायदे के कामों में, चाहिए जिनके लिए एकांत। और दिया हुआ दूसरों का, बना अवैध, बिना हमारी इच्छा का। चिढतें हैं हम उससे और परेशान रहते हैं इस अवैध संतान से। करना चाहते हैं उसे दूर क्योंकि हम चाहते ही नहीं थे उसे कभी। पर भला अपनी संतानों को कोई झुठला सका है कभी कोई? कुंती और कर्ण भी नहीं, यशोदा और कृष्ण भी नहीं। पर सबसे बुरा होता है अकेलापन भीड़ का। 

जब हम अकेले होते हैं हज़ारों लोगो के साथ। जब आपके साथ होता है सृष्टि का अकेलापन, युगों का अकेलापन, समय का अकेलापन और स्थानों का अकेलापन। जब आपके साथ होता है ईश्वर का अकेलापन। अकेलापन जो संतान नहीं होता। अकेलापन जो सहवासी होता है आपका। जो रहता है आपके साथ यात्राओं में, घरों में, सड़कों पर, पहाड़ों पर, गाड़ियों में और विचारों में। अकेलापन जो नहीं छोड़ता कभी आपका साथ, कहीं भी, कभी भी। चला जायेगा यह कुछ समय के लिए आपसे दूर, अलग कहीं। पर रहता है हमेशा किसी कोने में खड़ा मुस्कुराता क्योंकि लौट के उसे आना ही है आपके साथ, आपके मर जाने के बाद भी। एक ही साथी जो कभी नहीं छोड़ता हमारा साथ बाकी सांसारिक संबंधों की तरह। और हम चाहते हैं हमेशा इससे पाना छुटकारा। पर क्या संभव है अपनी आत्मा से छुटकारा पा लेना? खुद से छुटकारा पा लेना? अकेलेपन से छुटकारा पा लेना, हमेशा के लिए? मानिये या न मानिये, पर कभी न कभी हम सब अकेले रहे हैं और कभी न कभी अकेले रह जायेंगे। यह प्रश्न भी लग सकता है और उत्तर भी, समस्या भी और समाधान भी, नकारात्मक भी और सकारात्मक भी। पर जो सन्देह से परे है और जो अटल है, वह सत्य है।

Wednesday, November 1, 2017

जो रह जाता है जलने के बाद...


ये मेरे फ्रॉक वाले दिनों की बात है. 6 या 7 बरस की उम्र रही होगी शायद. त्योहारों पर हमेशा गाँव जाना होता था. हमारे घर में पूजा-वूजा का रिवाज तो कभी रहा नहीं. हाँ खाना-पीना बनता था मजे का, तरह -तरह का और दीवाली है तो दिए जलाते थे, होली हुई थी आल्हा की महफ़िल  सजती थी और रंगों में सारा गाँव सराबोर भी होता था. वैसे मैंने अपने पूरे गाँव में ही पूजा-पाठ का विधान देखा नहीं, बाद में जब थोड़ी बड़ी हुई तब पता चला कि यह हमारे बाबा राम स्वरुप वर्मा के विचारों का नतीजा था कि समूचे क्षेत्र से कर्मकांडों की छुट्टी हो चुकी थी .

खैर, आज जिस याद ने हाथ थामा है वो है दीवाली की रात और दूसरे दिन के बचपन के खेल. तब मोमबत्तियां कम मिट्टी के दिए ज्यादा जलाये जाते थे. दादी बहुत सारे दिए जलाती और एक बड़ी सी थाली में उन्हें रखकर गांव भर में जगह-जगह उन्हें रखने को चल देतीं. दादी का हाथ पकड़कर उनके साथ जाना और दिए सजाना मेरा प्रिय काम था. पहला दिया घूरे (जहाँ गोबर इकठ्ठा किया जाता है) पर रखा जाता, फिर जहाँ जानवर बांधे जाते थे वहां कुछ दिए रखे जाते, फिर खेतों की तरफ जाते हम, खेतों में दिए रखते, रास्ते में कोई उपेक्षित सा मंदिर दिख जाता तो वहां भी दिया रखते.

दादी बोलती कम थीं, लेकिन उनके काम करने में एक लय थी जो महसूस की जा सकती थी. लौटते वक़्त गाँव की आभा देखते ही बनती थी. हमारी तरह और भी बच्चे अपनी दादी, बाबा, चाचा ताऊ का हाथ थामे निकले होते थे दिए रखने. रास्ते भर हम एक-दूसरे से उल्लास से मिलते और धरती के हर कोने का अँधेरा मिटाने की तरफ लपकते जाते. इसके बाद शुरू होता एक-दूसरे के घर जाने का और घर की बनी मिठाइयाँ खाने का. किसके घर की जलेबी इस बार गजब बनी है, किसके घर के मोतीचूर के लड्डू की चाशनी गड़बड़ा गयी पूरे गाँव को पता होता था. बल्कि सुबह से ही जलेबी बनाने वाली लत्ती (वो कपड़ा जिसमें मैदा भरकर जलेबी बनाई जाती है ) अगर कोई अच्छी बन गयी तो पूरे गाँव में टहलने लगती थी. बाद में मिठाईयों में समोसे भी जुड़ने लगे, दही बड़े और नमकपारे भी.

दीवाली पर घर के जानवरों को रगड़- रगड़ कर नहलाना और उनके गले में नयी घंटियां बांधना, उनके शरीर पर रंग बिरंगे गोले बनाकर उनको प्यार से सजाना भी मजेदार होता था.

दीवाली का उत्साह पूरे गाँव में एक सा दिखता था, बिना किसी वर्गभेद के, जाति भेद के. क्योंकि अगर गाँव में कोई गमी (किसी की मृत्यु ) हुई है तो पूरा गाँव उस गमी में शामिल होता था और हर घर में त्योहार की लौ मध्धम हो जाती थी.

हम बच्चों की चांदी होती थी. पूरे वक़्त उत्साह से इसके उसके घर जाना, खाना-पीना, खेलना, शरारतें करना. दीवाली के अगले दिन का हमें बहुत इंतजार होता था. हम बच्चे लोग सुबह जल्दी जागते, बिना किसी के जगाये. जानते हैं क्यों? क्योंकि सुबह हमें रात के जले दीयों को इकठ्ठे करने निकलना होता था. हम जल चुके दिए इकठ्ठे करते, यह हमारा प्रिय खेल था. जिसके पास जितने ज्यादा दिए वो उतना ज्यादा खुश, फिर इन दीयों से तराजू बनती जिनसे खील खिलौने तोले जाते. ये सब बचपन के दिवाली वाले खेल थे. एक और खेल था, तब कच्चे रास्ते होते थे अब तो खैर सब पक्का हो गया है, तो उन कच्चे रास्तों की मिट्टी के खूब सारे ढेर बनाते थे हम और किन्ही ढेरों में दिया छुपा होता था. अब बूझना होता था दुसरे साथी को की दिए वाला ढेर कौन सा है. जो सही बता देता दिया उसका. और जाहिर है जिसके पास जितने ज्यादा दिए वो उतना बड़ा विजेता.

सारा दिन हम मिट्टी में सने, खील बताशे चबाते, दिए जमा करते, घर वालों की पुकार को अनसुना करते कभी-कभी पिट भी जाते. इस तरह हमारी दीवाली तब तक चलती रहती, जब तक बड़ों का वापस काम पर लौटने का और हमें स्कूलों में धकेले जाने का वक़्त नहीं आ जाता.

फेसबुक पर दीवाली के तमाम अपडेट्स के बीच रह-रह कर बचपन की यादें कौंधती रहीं. जलते हुए दीयों के पीछे भागती, चमकती हुई चीज़ों के पीछे भागती इस दुनिया को देखती हूँ तो सोचती हूँ बचपन के उस खेल में जीवन का कितना बड़ा फलसफा छुपा था, बुझ जाना ख़त्म हो जाना नहीं होता, असल खेल तो उसके बाद शुरू होता है...