Thursday, September 28, 2017

शरद, शाम, साहिर और सप्तक



हजारों गम हैं इस दुनिया में अपने भी पराये भी...मोहब्बत ही का गम तनहा नहीं हम क्या करें...जब भी जिन्दगी के झंझावात उलझाते हैं साहिर के शब्द आसपास ही मंडराने लगते हैं...साहिर महबूब शायर हैं...मन की बात समझते हैं...मन के हर मौसम से उनका लिखा कुछ न कुछ टकरा ही जाता है...ऐसा ही आज भी हुआ.

कई दिनों से मन बेहद उदास है और फुर्सत रत्ती भर नहीं है...तो उदासी की गठरी सर पर लादे लादे भटकती फिर रही हूँ...न मिलने वाली फुर्सतों  की यह अच्छी बात होती है कि वो आपकी उदासी भी आपसे छीन लेने को बेताब होती हैं...हालाँकि इसके एवज में कई बार चिड़चिड़ाहट साथ हो लेती है.

उतरते शरद के बीच मन का मौसम ऐसा बेढंगा हो यह जरा कम जंचने वाली बात तो है ही...तो आज की सुबह उतरी अपने साथ साहिर को लेकर...दोस्त चन्दर वर्मा की लिखी किताब 'साहिर और मैं' कबसे रास्ते में थी और जब मिली तो खूब मिली...महबूब शायर हैं साहिर उनकी किताब का आना कितना सुख दे गया बता नहीं सकती. हालाँकि यह किताब को सिर्फ पाने का सुख है...पढने का सुख अभी पूरा बाकी है...

दुनिया आज नवरात्र में कन्या जिमाने में लगी थी इसी बीच कुछ लोगों ने भगत सिंह को भी याद किया...भागते दौड़ते जेहन में कभी भगत सिंह, कभी साहिर चलते रहे....कि इसी बीच स्वाति ने आवाज़ दी कि आज लता जी का जन्मदिन है और इस मौके पर लता की सुर साधना का दसवां बरस...दस साल पहले लता की सुर साधना की पहली महफिल जमी थी उत्तर प्रदेश के उन्नाव में...तब भी स्वाति ने आवाज दी थी...तब नहीं पहुँच पायी थी...लेकिन उसके बाद जब भी मौका मिलता है ज़रूर जाती हूँ...

स्वाति खूब मेहनत करती है...संगीत उसका इश्क़ है...मगरूर इश्क...उसी में रमे रहना उसे भाता है...बचे हुए वक़्त में यायावरी करती है...जिन्दगी में और कोई उलझन उसने रखी ही नहीं...मुझे उसकी यह संगीत से, प्रकृति से, जिन्दगी से आशिक मिजाजी बहुत पसंद है...इसी आशिक मिजाजी से उपजी आज की शाम भी. उसकी मिश्री सी आवाज़ में सुनना ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें...इस दिलफरेब मौसम से मिलवा गया...

आज की यह महफ़िल महबूब शायर साहिर के करीब ले जाने की शाम थी...नन्हे पौधों को पेड़ बनते देखने की शाम थी, सुकून की शाम थी...

अब सिरहाने शरद का चाँद  है, हाथ में साहिर हैं और अभी-अभी बीती संगीत की प्यारी सी खुशनुमा शाम की मीठी सी याद है...ओह शरद...तुम मिल ही गए आखिर...साहिर के बहाने...लता जी के बहाने...सप्तक  के बहाने...

(शरद, साहिर, लता और इश्क शहर )

Wednesday, September 27, 2017

सुनो बेटियों, इनकार कर देना बनने से देवी



सुनो बेटियों,

हवाओं को चूमने से सकुचाना नहीं 
हरहराने देना अपने भीतर की नदी को
जी भर के 

खिलना तो इस कदर
कि हैरान हो जाए कुदरत भी 
और जब मिलना किसी से तो 
मिलने को देना नए अर्थ 
जिन्दगी तुम्हारी है यह भूलना मत 
कि जिंदगी के सारे सुख हैं तुम्हारे लिए भी 

चलना, गिरना, उठना फिर चलना
घबराने की बात नहीं
ढब है जीने का

रास्ते नहीं होते हमेशा कहीं पहुँचने के लिए
होते हैं भटकने के लिए भी 
भटकते हुए नये रास्तों की तलाश का सुख लेना और 
दुनिया के बनाये सही गलत वाले खांचों पर  
कट्टम कट्ट करके खिलखिलाना जोर से 

जीतना कोई मजेदारी नहीं
किसी की मुस्कुराहट पर
जिन्दगी हार जाने का सुख भी लेना
और दिलों को जीत लेने का भी

अपने 'खुद' को खंगालना बार-बार
बहुत चुपके से हमारी 'खुद की मर्जियों' में
शामिल हो जाती हैं जमाने की मर्जियां

तुम्हारी ख़ुशी तुमसे हो 
तुम्हारे दुःख भी हों तुमसे ही 
अपने  खुद के सुख दुःख कमाना
 कोई स्वार्थ नहीं
 जीवन है 

मत बढ़ाना अपने पाँव किसी पूजन-वूजन के लिए
इनकार कर देना बनने से देवी
और किसी को देवता बनाने से भी 
कि इन्सान होने से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं

माथे पर रोली लगाने को बढ़ते हाथों से कहना 
हमें आधी रात को भी
सड़कों पर घूमने की आज़ादी चाहिए
अपने सपनों को जीने की आज़ादी
यह पूजा अर्चन नहीं

कोई हक दिए जाने का इंतजार किये बगैर
खुद निकल पड़ना अपनी जिन्दगी की तलाश में 

फूंक मारकर उड़ा देना
दैहिक प्रशंसाओं वाले
या त्याग समर्पण की देवी वाले जुमलों को 
कि अपने हक के लिए आवाज उठाने से ज्यादा
सौन्दर्य कहीं नहीं
अपनी मर्जी के सफ़र पर निकल पड़ने से बड़ा
सुख कोई और नहीं...

Sunday, September 17, 2017

प्यारी सी है सिमरन...


 अगर बात सिर्फ बंधनों को तोड़ने की है तो यह बात जरूरी है लेकिन बात जब बंधनों को पहचानने की हो तो और भी ज़रूरी हो जाती है. सही गलत सबका अपना होता है ठीक वैसे ही जीवन जीने का तरीका भी सबका अपना होता है. भूख प्यास भी सबकी अपनी होती है, अलग होती है. हमारा समाज अभी इस अलग सी भूख प्यास को पहचानने की ओर बढ़ा नहीं है. सिमरन उसी ओर बढती हुई एक अच्छी फिल्म है.

जाहिर है हिंदी फिल्मों में भी एक लम्बे समय तक अमीरी गरीबी, जातीय वर्गीय भेद, सामंती पारिवारिक दुश्मनियों के बीच प्यार के लिए जगह बनाने की जद्दोजहद में लगा हिंदी सिनेमा अंत में मंगलसूत्रीय महिमा के आगे नतमस्त होता रहा. फिर समय आया कि अगर एक साथी बर्बर है, हिंसक है, बेवफा है तो कैसे सहा जाए और किस तरह उस साथी को वापस परिवार संस्था में लौटा लाया जाए, लेकिन इधर हिंदी सिनेमा ने नयी तरह की अंगड़ाई ली है. 

शादी, प्यार, बेवफाई के अलावा भी है जिन्दगी यही सिमरन की कहानी है. कंगना पहले भी एक बार 'क्वीन' फिल्म में अपने सपने पूरे करने अकेले ही निकलती है. शादी टूटने को वो सपने टूटने की वजह बनने से बचाती है लेकिन सिमरन की जिंदगी ही एकदम अलग है. वो प्यार या शादी की तमाम बंदिशों से पार निकल चुकी है. शादी के बाद तलाक ले चुकने के बाद अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहती है. उसके किरदार को देखते हुए महसूस होता है कि किस तरह नस-नस में उसकी जिंदगी जीने की ख्वाहिश हिलोरे मारती  है. जंगल के बीच अपनी फेवरेट जगह पर तितली की तरह उड़ती प्रफुल्ल यानि कंगना  बेहद दिलकश लगती है. उसका प्रेमी उसे कहता है, 'कोई इतना सम्पूर्ण कैसे हो सकता है, तुम्हें सांस लेते देखना ही बहुत अच्छा लगता है'. सचमुच जिंदगी छलकती है सिमरन यानि प्रफुल्ल में. 

वो अपने पिता से कहती है, 'हाँ मैं गलतियां करती हूँ, बहुत सी गलतियां करती हूँ लेकिन उन्हें मानती भी हूँ न'. वो जिंदगी का पीछा करते-करते कुछ गलत रास्तों पर निकल जाती है मुश्किलों में फंसती चली जाती है लेकिन हार नहीं मानती। उसकी संवेदनाएं उसका साथ नहीं छोड़ती। बैंक लूट के वक़्त जब एक सज्जन को दौरा पड़ता है तो उन्हें पानी पिलाती है.' बैंक लूट की घटना के बाद किस तरह ऐसे अपराधों के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार मान लिए जाने की आदत है लोगों में इस पर अच्छा व्यंग्य है साथ ही एक मध्यमवर्गीय भारतीय पिता की सारी चिंता किसी भी तरह बेटी की शादी पर ही टिकी होती हैं इसको भी अंडरलाइन करती है फिल्म।

सिमरन एक साफ़ दिल लड़की है. छोटे छोटे सपने देखती है, घर का सपना, जिंदगी जीने का सपना, शादी उसका सपना नहीं है, वो प्यार के नाम पर बिसूरती नहीं रहती लेकिन किसी के साथ कोई धोखा भी नहीं देती। गलतियों को जस्टिफाई नहीं करती, उनसे बाहर निकलने का प्रयास करती है. प्रफुल्ल के किरदार को कंगना ने बहुत प्यार और ईमानदारी से निभाया है. फिल्म शादी, ब्वॉयफ्रेंड, दिल टूटने या जुड़ने के किस्सों से अलग है. तर्क मत लगाइये, सही गलत के चक्कर में मत पड़िये बस कंगना से प्यार हो जाने दीजिये।

पिछले दिनों अपने बेबाक इंटरव्यू को लेकर कंगना काफी विवाद में रही है. विवाद जो उसकी साफगोई से उपजे। कौन सही कौन गलत से परे एक खुद मुख़्तार लड़की कंगना ने अपना मुकाम खुद बनाया है.... उसकी हंसी का हाथ थाम लेने को जी करता है, सब कुछ भूलकर जिन्दगी को जी लेने को दिल करता है.  


Friday, September 1, 2017

ताप, बारिश, इश्क शहर


देह पर से ताप यूँ गुजर रहा है
जिस तरह तुम्हारी याद गुजरती है
उनींदी आँखों की कोरों से
टप्प से टपक जाने से ठीक पहले

कानों में बारिशें किसी राग सी घुल रही हैं
मध्धम मध्धम
हरारत भरी आँखों में शरारत घुल रही है
बारिश के आगे फैलाई हथेलियों पर
गिरती हैं हल्की गर्म सी बूँदें
जैसा बारिश ने लिया हो हथेलियों का बोसा

बारिश में भीगे रास्ता भटककर मुंडेर पर आ बैठे पंक्षी
कनखियों से देखते हैं बारिश को भी मुझे भी
कि उनको अपने स्पर्श की गर्माहट देना चाहती हूँ
वो भी शायद करीब आने को आकुल हैं

देह पर से ताप यूँ ही नहीं गुजर रहा है
गुजर रहा है बहुत कुछ संग संग...