Thursday, July 27, 2017

जंग जहाँ भी है उसे हटाना होगा



हमने हाल ही में प्रोफेसर यशपाल को खो दिया है. यह देश का बड़ा नुकसान है. उनके विचारों को सहेजकर ही हम उन्हें सच्ची श्रधांजलि दे सकते हैं. वैज्ञानिक सोच की आज कितनी जरूरत है यह हम आसपास के माहौल से देख सकते हैं. हम अपने वैज्ञानिकों का, अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने वालों का कितना साथ देते हैं, कितना तड़प उठते हैं जब अन्धविश्वास के खिलाफ जिन्दगी भर काम करने वाले वैज्ञानिक की सरेआम हत्याएं होती हैं. वो तड़प का न होना ही आज सरेआम किसी को भी पीटकर मार दिए जाने में तब्दील हो ही रहा है. सोचने, समझने, तर्क करने और महसूस करने की हमारी निजी क्षमताओं पर किस तरह सत्ताएं कब्ज़ा करती हैं. किस तरह किसी का सोचा हुआ हमें हमारा निजी विचार लगने लगता है और हम उसके लिए लड़ते हुए किसी की हत्या तक करने को औचित्यपूर्ण मानने लगते हैं. शिक्षा को सत्ताओं ने हमेशा से मोहरा बनाया, वही घोलकर पिलाया जो उनके हित में था. हर सत्ता की पहली नज़र किताबें बदलने पर होती है, हालात बदलने पर नहीं. कि चेतन व्यक्तित्व सत्ताओं के लिए खतरा हैं, यह बात सत्ताओं को पता है. हमारी चेतना को सदियों से गुलाम बनाने का खेल जारी है...कठपुतलियों की तरह हम बस उछल रहे हैं.

यह बुरा समय है, शिक्षा से इन सबके लिंक जुड़े हैं. हमारी शिक्षा हमें कैसा बना रही है. क्या है ऐसे शिक्षित होने के अर्थ जिसके बाद अमरनाथ यात्रियों पर हुआ आतंकी हमला हिन्दुओं पर मुसलमानों के हमले के तौर पर देखा जाता है. हम इन्सान होने की बजाय हिन्दू मुसलमान, ब्राह्मण, दलित, पुरुष, स्त्री के समूहों में बंटते जा रहे हैं. संस्कृति की रक्षा के नाम पर परम्पराओं को सहेजने के नामपर अंधविश्वासों की परवरिश हो रही है. यह कैसी शिक्षा है जिसमें शिक्षिकाएं करवाचौथ के व्रत पर सरकारी छुट्टी होने पर खुश होती हैं बजाय इसका विरोध करने के. क्या सरकारें यह कहना चाहती हैं कि सभी महिलाओं को अपने पतियों की लम्बी उम्र के लिए व्रत रखने के लिए छुट्टी देकर वो उनका साथ दे रही हैं या वो सरकारें राज्य के तमाम पतियों की उम्र बढ़ने के अनुष्ठान में सरकारी आहुति डाल रही हैं. 

जो विज्ञान के छात्र है, शिक्षक हैं, वैज्ञानिक हैं वो भी अंध विश्वासों से मुक्त नहीं हैं फिर वो छात्रों को कैसे मुक्त कर सकेंगे भला. जबकि दूसरी ओर धर्म के ठेकेदारों ने विज्ञान के महत्व को समझा और उसे अपने स्वार्थ के मुताबिक गोल-मोल करके इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. आज तमाम प्रवचन वैज्ञानिकता की चाशनी में लिपटे हुए हैं लेकिन तमाम विज्ञान की कक्षाएं धर्म से डरी हुई हैं. श्रधांजलि देने की औपचारिकता से बेहतर है की अपने भीतर की रूढ़ियों पर नजर डाली जाय. उन्हें तोड़ा जाय. सवाल हिन्दू मुलसमान से ऊपर का है, जंग जहाँ भी है उसे हटाना होगा।

6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-07-2017) को "अद्भुत अपना देश" (चर्चा अंक 2680) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
विनम्र श्रद्धांजलि।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat said...

सार्थक विचारशील प्रस्तुति
प्रोफेसर यशपाल जी सादर श्रद्धा सुमन!

pushpendra dwivedi said...

heart touching articles apke jazbe ko tah e dil salaam

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " न्यू यॉर्कर बिहारी के मन की बात “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

shashi purwar said...

सार्थक पोस्ट ,

iBlogger said...

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