Wednesday, March 8, 2017

सहिराना जादू और रंग अपने होने के...


'तुम्हारी हथेलियों में क्या है?' लड़की ने अपनी नजरें नई कोंपले वाले पेड़ की सबसे ऊंची शाख पर टिकाते हुए पूछा.
लड़के ने मुस्कुरा कर कहा, 'रंग'
लड़की ने मुस्कुराकर कहा, 'दिखाओ...'
लड़के ने हथेलियां आगे कर दीं...सुर्ख लाल रंग से भरी हथेलियां।
'क्या ये रंग पक्का है?' लड़की ने पूछा
लड़के ने उसके गाल पर अपनी उंगली से लाल लकीर खींचते हुए कहा, 'एकदम पक्का.'
लड़की मुस्कुराई. सांझ ने अपनी चादर में उन दोनों को समेट लिया।

चैत दरवाजे पर था और फागुन अपनी पोटली बांध रहा था। एक मौसम के आने और दूसरे मौसम के आने के बीच का जो समय होता है जिसमें जिंदगी के राग रहते हैं उसी मौसम में जब स्त्रियां जिदंगी के पक्के रंग ढूंढ रही थीं रंग जो जेहन को नई तरबियत से नई समझ से रंगें, जो रूहे सुखन बनें।

जाते फागुन ने चैत की हथेलियों पर आम की बौर रखीं, गेंहूं की बालियां रखीं, सरसों की लहक रखी, मिट्टी की महक रखी, जिंदगी जीने की शिद्दत रखी, मुश्किलों से लड़ने का हौसला रखा और कान में हौले से कहा, 'इस धरती का कोना-कोना प्यार से रंग देना।'

चैत बस दो कदम की दूरी पर था, उसने अपनी हथेलियों में फागुन की दी सारी नियामतों को सहेजते हुए मुस्कुराकर कहा, 'फिक्र न करो दोस्त, मैं ऐसा ही करूंगा' और ऐसा कहते हुए उसने धरती की तमाम स्त्रियों की ओर देखा। धरती के कोने-कोने को प्रेम के रंग में रंगने का काम स्त्रियों के सिवा कौन कर सकता है भला। इतनी सदियों से इस रंग को सहेजने का बीड़ा तो स्त्रियों ने ही उठाया है। आज दो-दो विश्वयुद्ध का सामना कर चुकी इस दुनिया में अगर अब तक प्रेम पर यकीन कायम है तो स्त्रियों के ही कारण। विध्वंसक समय और समाज में भी लोग उम्मीदों पर भरोसा करना चाहते हैं तो स्त्रियों के ही कारण।

मौसम हों, त्योहार हो या कोई और दिवस सब स्त्रियों ने अपने कंधों पर उठा रखे हैं। लेकिन एक बात बिगड़ गई इस सबमें कि स्त्रियां प्रेम सहेजते-सहेजते, धरती को प्रेम के रंग में रंगने की कोशिश करते-करते खुद को बिसराने लगीं। भूलने लगीं कि जिंदगी का हर रंग कच्चा है, हर राग अधूरा अगर वो खुद की कीमत पर सहेजा गया हो। घर, परिवार, समाज की उम्मीदों का बीड़ा उन्हें थमाकर कहीं उनके रंगों को धुंधला तो नहीं कर दिया गया।

स्त्रियों ने अब अपने लिए रंग तलाशने शुरू किये। पक्के रंग। उन्होंने सूरज से कभी न छूटने वाला सिंदूरी रंग लिया, खेतों से लिया मन को हर्षाने वाला हरा...गेहूं की बालियों सा सुनहरा रंग उन्होंने कानों में पहना और सूरजुखी सा पीला अपने गालों पर रंगा...एक एक कर उसके आंचल में आकर सजने लगे जीवन के सारे रंग...

स्त्रियों की टोली जब टेसू के रंग लिए नदी किनारे पर पहुंचीं तो नदियों ने इठलाकर अपनी हथेली आगे कर दी। टेसू के रंग नदियों में घुलने लगे...रंग धरती पर दौड़ने लगे...स्त्री विमर्श के शोर गुल से अनजान टेसू के रंगों से रंगी हथेलियों वाली स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा...'स्वाभिमान...!'

फागुन ने मुस्कुराकर कहा, चलो देर से सही यह रंग तुम्हें मिल तो गया...स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा, 'हां, हमने यह रंग जिंदगी सहेजते-सहेजते कहीं संभालकर रख दिया था. जैसे घर संभालते-संभालते रख देती हैं तमाम जरूरी चीजें खूब संभालकर। और संभालकर रखी हुई चीजें अक्सर नहीं मिलतीं। फिर अचानक कुछ और ढूढते वक्त कुछ और मिल जाता है जैसे आज फागुन की रंगत ढूँढ़ते ढूंढते, जिंदगी को झाड़ते पोछते वक्त आज यह रंग मिल गया है। अब जो मिल गया है ये रंग तो इस रंग को खोने नहीं देंगे। इस रंग में कितनी प्यारी खुशबू है न?' स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा। बसंत और फागुन दोनों उनके चेहरे पर आई चमक को देख रहे थे। तमाम रंगों में सजी संवरी हंसती खिलखिलाती स्त्रियां यूं तो हमेशा ही लुभाती हैं, उन पर हर रंग निखरता है, वो हर रंग में खिलती हैं लेकिन यह रंग जिसने आज की स्त्रियों का हाथ थामा है उसकी चमक ही अलग है। इक जरा सा खुद का हाथ थामते ही, इक जरा सा खुद को महसूसते ही कैसे सारे रंग जीवन के निखरने लगे...

'तुम्हें यह रंग मिला कहां,' बसंत ने पलकें झपकाकर पूछा, स्त्री ने कहा, 'आज मेरे महबूब शायर साहिर का जन्मदिन है। मैं जब उनकी नज्मों के करीब गई तो वहीं से यह रंग मिला. उनकी नज्में पलटते-पलटते सारे रंग फीके पड़ने लगे कि मोहब्बत के रंग गाढ़े होने लगे, गाढ़े होने लगे अना के रंग, मज़लूमों के, इंसानियत के ह.क में खड़े होने की इच्छा के पक्के रंग, गुरबत से, अन्याय से लड़ने की हिम्मत के रंग. कच्ची उम्मीदों के रंगों से दिल बेजार था बहुत तो किनारा किया झूठे वादों और कच्ची उम्मीदों के रंगों से...अब यूं ही बाजार में बिकने वाले रंगों से न खेलेंगे हम होली न मनायेंगे कोई स्त्री दिवस...कि रंग अपने होने के, खुशबू अपने अस्तित्व की और जेहन में घुलती साहिर की नज्.मों का जादू...'

लड़का अगले रोज फिर आया था उसके पास...इस बार उसकी हथेलियों में लाल, पीले, हरे, नीले रंग नहीं थे...उसके हाथों में थे गालिब, फैज., कैफी, मज़ाज, और साहिर के नगमे...लड़की की आंखों की चमक बढ़ गई थीं...फागुन की महक भी...उसने साहिर की नज्.म को चूमते हुए कहा, जन्मदिन मुबारक मेरे महबूब शायर...!

धरती पर अब नदियां नहीं रंग बह रहे थे, पेड़ों की शाखों पर अब फूलों में राग खिल रहे थे...इस रंग में रंगने से धरती की कोई स्त्री कोई पुरुष बच न जाये ध्यान रखना..

http://epaper.dailynews360.com/1129301/khushboo/08-03-2017#page/1/1

2 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक को 09-03-2017 चर्चा मंच पर चर्चा - 2603 में दिया जाएगा
धन्यवाद

प्रिया said...

Sahir ke birthday ko kya rang diya aapne... Post padhte hue ehsaas nahi hua baat Sahir Pe hogi...mai to kahani ke rango me uljhi thi... Good one.. Interesting